Thursday, 14 May 2020

जितना बड़ा शहर उतना बड़ा कहर हॉट स्पॉट बनी बस्तियां महामारी का स्थायी ठिकाना बनेंगे



भारत में कोरोना के संक्रमित लोगों की संख्या 70 हजार पार कर चुकी है | लेकिन संतोष का विषय ये है कि मृत्यु दर अभी भी 3 फीसदी के आसपास स्थिर है वहीं कोरोना संक्रमित लोगों के स्वस्थ होने का प्रतिशत बढ़ते हुए 31हो गया है | कोरोना का फैलाव  और बढ़ेगा या कम होना शुरू हो जायेगा ये कोई नहीं  बता सकता क्योंकि देश भर से लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर अपने घरों को लौट रहे हैं | उनके वहां पहुंचने के बाद  संक्रमण गाँवों में नहीं फैला तब ये उम्मीद की जा सकेगी कि महामारी  ढलान पर आ गई है |

लेकिन इस  वायरस  ने एक बात स्पष्ट कर दी कि यह देश के सभी महानगरों में ज्यादा तेजी से न केवल फैला अपितु वहीं ज्यादा मौतें भी हो रही हैं | महाराष्ट्र और गुजरात क्रमशः कोरोना के शिकार दो सबसे बड़े राज्य हैं | लेकिन उसमें भी ध्यान देने योग्य बात ये है कि इन राज्यों के कुल कोरोना संक्रमित लोगों में  आधे से भी ज्यादा उनकी राजधानियों  मसलन मुम्बई और अहमदाबाद में हैं | कोरोना पीड़ित तीसरा सबसे बड़ा राज्य है दिल्ली जो अपने आप में महानगर तो है ही साथ में उप्र के नोएडा और गाज़ियाबाद तथा हरियाणा के गुरुग्राम को भी अपने में समेटे हुए एनसीआर की शक्ल ले चुका है | दिल्ली में भी तमाम प्रयासों के बावजूद कोरोना के नए मरीज मिलते ही जा रहे हैं | यही हाल तमिलनाडु  का है जो चौथे नम्बर पर है और यहाँ भी राजधानी चेन्नई कोरोना का सबसे प्रमुख केंद्र है | कर्नाटक  के बेंगुलुरु में  भी  यही स्थिति है | बंगाल के आंकड़ों को लेकर भ्रम की स्थिति है लेकिन वहां कोलकाता ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा हुआ है |

महानगरों से नीचे उतरें तो पुणे , नागपुर , इंदौर , भोपाल ,लखनऊ , जयपुर , कोची जैसे बड़े कहे जाने वाले  शहरों में कोरोना का कहर छोटे जिलों की तुलना में कहीं ज्यादा है | इसकी सफाई में कहा जा सकता हैं कि जहां आबादी ज्यादा होगी वहां संक्रामक बीमारियों का फैलाव होना स्वाभाविक है लेकिन इसकी असली वजह है वे बस्तियां हैं जिनमें घनी बसाहट की वजह से इंसान कीड़े - मकोड़ों की तरह रह रहे हैं | मुम्बई की धारावी झोपड़पट्टी में मात्र ढाई - तीन किलोमीटर  में  8 लाख लोगों  का निवास अपने आप में बहुत कुछ कहता है | 

मुम्बई में कोरोना का सबसे बड़ा हॉट स्पॉट  धारावी ही है | कमोबेश यही स्थिति अहमदाबाद , दिल्ली ,  लखनऊ , इन्दौर , भोपाल आदि की भी है | इन शहरों में भी घनी और बेतरतीब बसी आवासीय बस्तियों में कोरोना का संक्रमण सर्वाधिक है |  मेरे अपने शहर जबलपुर में ही जिन क्षेत्रों से कोरोना के नए मरीज रोजाना निकल रहे हैं वे भी सब बेहद सघन बसाहट वाले हैं |

कोरोना तो खैर , नई बीमारी है लेकिन मौसम बदलते ही जो भी संक्रामक बीमारियाँ आती हैं  उनका सबसे ज्यादा प्रभाव बड़े शहरों की इन बस्तियों में ही देखने मिलता है | अभी भले ही हॉट स्पॉट और कन्टेनमेंट क्षेत्र बनाकर वहां आवाजाही रोक दी गई तथा सैनिटाइजर का छिड़काव चल रहा हो लेकिन कोरोना का प्रकोप समाप्त होते ही ये इलाके फिर उसी दुर्दशा में लौट जायंगे | ऐसा नहीं है कि छोटे और  मध्यम श्रेणी के शहरों में संक्रामक बीमारियाँ नहीं फैलतीं लेकिन कोरोना जैसी बीमारी का संक्रमण जिन कारणों से होता है  वे शारीरिक स्पर्श या निकटता से उत्पन्न होते हैं | मास्क और  सैनिटाइजर का उपयोग इसीलिये सुझाया  जा रहा है | सोशल डिस्टेंसिंग जैसी मूलभूत जरूरत तो  घनी बस्तियों में  वैसे भी नामुमकिन है | कोरोना के कारण अपने शहर या गाँव लौटे अनेक लोगों ने अब छोटे शहर में जिंदगी बसर करने का मन बना लिया है | प्रवासी मजदूरों में से भी बहुत ऐसे हैं जिनका मुम्बई - दिल्ली की चकाचौंध से मोहभंग हो गया है |

ये वाकई बड़ा बदलाव है | झुग्गी - झोपड़ी यूँ तो हर शहर और कस्बों  में हैं लेकिन जितना बड़ा शहर , उतनी ही अधिक झुग्गियां देखने मिलती हैं | इनमें सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे से बने मकानों का नक्शा स्वीकृत नहीं होता | बावजूद इसके नगर निगम या नगर पालिकाएं इन्हें हटा नहीं सकतीं क्योंकि नेता लोग  बचाव में खड़े हो जाते हैं | और यदि हटाया भी जाता है तो दूसरी सरकारी जमीन कब्जाने दे दी जाती है | सभी चुनावी घोषणा पत्रों  में अवैध कालोनी को वैध बनाने और गरीबों को जमीन के पट्टे देने का वायदा स्थायी  तौर पर होता ही है |

भारत में कोरोना का आयात तो विदेश से लौटे व्यक्तियों के माध्यम से ही हुआ किन्तु उसको बड़े पैमाने पर फ़ैलाने का शुरुवाती काम तबलीगी जमात के लोगों ने मुस्लिम बस्तियों और मस्जिदों में छिपकर किया । और जब एक बार संक्रमण ने रफ़्तार पकड़ी तो फिर शेष घनी बस्तियों में उसने हल्ला बोला जो ऐसी किसी भी संक्रामक बीमारी की सबसे पसन्दीदा शरणस्थली होती हैं |

 इस विश्लेषण से ये निष्कर्ष निकलता है कि महानगरों और उनके बाद वाले बड़े नगरों में आबादी का बोझ कम करते हुए  झोपड़पट्टी जैसे इलाके खत्म हों | प्रवासी मजदूरों का  बड़े शहरों से हुआ पलायन इन शहरों के लिए एक राहत का कारण भी बन सकता है | यद्यपि उनके चले जाने से उद्योगों में  कामकाज शुरू करना बहुत मुश्किल हो गया है लेकिन मुम्बई , दिल्ली , अहमदाबाद , चेन्नई , बेंगुलुरु जैसे महानगरों  से लाखों श्रमिकों तथा अन्य कर्मचारियों के लौट जाने से जो खालीपन आया उसे स्थानीय स्तर पर ही भरा जावे | यूँ भी ये शिकायत हमेशा  सुनाई  देती है कि बाहरी  मजदूर आकर वहां की लोगों का हक छीन लेते हैं |

हालाँकि कम समय में इतने  मानव संसाधन की व्यवस्था आसान नहीं  है लेकिन बड़े शहरों और उनमें रहने वाले लोगों की सेहत को सुरक्षित रखना है तब इस तरह के कदम उठाना ही पड़ेंगे | और फिर जन स्वास्थ्य के साथ पर्यावरण संरक्षण के लिए भी महानगरों की जनसंख्या और बसाहट में बड़े बदलाव जरूरी होंगे | बीते डेढ़ महीने में महानगरों की आबोहवा में जिस तरह के सुखद परिवर्तन हुए वे भी इस तरफ इशारा कर रहे हैं | नदियाँ अपने आप साफ़ हो गईं और वायु  प्रदुषण कम होने से मई महीने की तपन भी सहने योग्य बन गयी है |

ये कहना गलत नहीं होगा कि जिन महानगरों और अन्य बड़े शहरों का ऊपर उल्लेख किया गया , वहां यदि घनी बस्तियों में संक्रमण का विस्तार नहीं हुआ होता तो अब तक कोरोना काफी हद तक काबू में आ  जाता | लॉक डाउन में रहना तो इन बस्तियों के लोगों के लिए खैर , एक तरह की मजबूरी बन गयी किन्तु सोशल डिस्टेंसिंग , मास्क  और हाथ धोने  जैसी सावधानियों के प्रति लापरवाही के कारण यह महामारी चिंताजनक स्थिति में पहुँच गई है |

तत्काल कुछ करना न तो व्यवहारिक होगा और न ही संभव लेकिन कोरोना के बाद तमाम बड़े शहरों की घनी बस्तियों का नये सिरे से नियोजन करना जरूरी है | प्रधानमन्त्री से लेकर अनेक प्रख्यात वैज्ञानिक और चिकित्सक ये कह रहे हैं कि कोरोना जल्दी जाने वाला नहीं है | और इसलिए हमें इसके साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए |

सलाह गलत तो नहीं है लेकिन जब उसके साथ ही जीना है तो क्यूँ न ढंग से जिया जाए ? बुद्धिमत्ता तो यह है कि कोरोना को दोबारा गर्दन दबोचने का कोई  भी मौका नहीं मिले | जैसे खबरें  आ रही हैं उनके अनुसार कोरोना के उद्गम स्थल  चीन के वुहान शहर में कुछ नए मरीज मिले हैं | जिससे ये आशंका प्रबल हो उठी है कि एक बार शांत हो जाने के बाद वायरस दबे पाँव फिर लौट सकता है | भारत तो अभी तक पहले चरण की लड़ाई में ही उलझा हुआ है | इसमें जीतने के बाद यदि वह  अदृश्य वायरस कहीं फिर लौटा तो  उसकी शुरुवात ही तीसरी पायदान अर्थात सामुदायिक फैलाव ( Community spread ) से होगी | ये देखते हुए अक्लमंदी इसी में है कि महानगरों और बाकी बड़े शहरों में संक्रमण के  जो हॉट स्पॉट घनी  आबादी और अवैध बस्तियों के कारण सामने आये , उनको हटाकर भावी खतरे के प्रति सचेत रहा जावे |

हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि मौत ने भारत में अपने लिए अनुकूल स्थान भीतर तक घुसकर देख लिए हैं | यदि हम वोटरों की  नाराजगी से बचने के लिए  हाथ पर हाथ  धरे बैठे रहे तो न जाने कब अमेरिका , इटली , ब्रिटेन और स्पेन जैसी हालत भारत में भी  बन जाये |

 क्या हम इसके लिए तैयार हैं ?

जनसंख्या की तेज रफ्तार पर स्पीड ब्रेकर जरूरी दो से अधिक बच्चों पर सुविधाएं बन्द हों : चीन से सीखें





देश इस समय जिस संकट से जूझ रहा है वह अप्रत्याशित और अकल्पनीय तो है ही जिसकी वजह से शुरुवात में सरकारी और निजी क्षेत्र को उससे निपटने में भारी तकलीफ उठानी पड़ी | जैसे - तैसे ये लगा कि मामला नियन्त्रण में आ जायेगा तब ही चिर  - परिचित समस्या सामने आकर खड़ी हो गई जिसका नाम है जनसंख्या | हमारे प्रधानमंत्री दुनिया में जहां जाते हैं भारत  के सवा सौ करोड़ लोगों का जिक्र करते हुए उन्हें देश की ताकत बताते हैं | हालाँकि अधिकृत आंकड़ा 138 करोड़ का है | लेकिन सच्चाई ये है कि  ये जनसंख्या उस  मोटे व्यक्ति जैसी है जो देखने में भले ताकतवर  लगे  लेकिन अधिक वजन ही उसकी समस्या बन जाता है जिसके कारण वह चार कदम चलने में ही थकने लगता है और यदि सीढ़ियों से एक मंजिल चढ़ना हो तो हिम्मत हार जाता है | भारत की जनसंख्या आज के संदर्भ में वैसी ही स्थिति उत्पन्न कर रही है |

कोरोना शुरू होते ही चौतरफा दबाव बनने लगा कि लोगों की जांच करवाई जाए जिससे संक्रमण फैलने से पहले ही रोका जा सके | सुझाव  गलत नहीं था किन्तु अव्वल तो जाँच किट नहीं थीं , फिर आईं तो लेबोरेट्रीज का टोटा  पड़ गया और अंत में  जांच क्षमता पर आकर बात अटकने लगी | कहा  जा रहा है कि फिलहाल प्रतिदिन 90 हजार जांच करने के क्षमता है लेकिन प्रशिक्षित स्टाफ नहीं होने से अधिकतम  75 हजार ही हो रही  हैं |

जाहिर हैं इस गति से पूरे देश की  जाँच करते - करते कोरोना के बाद वाली महामारी  भी आ जायेगी | उसने सबसे पहले जहाँ दस्तक दी वह है चीन जिसकी आबादी तकरीबन  170 करोड़ है | आबादी के लिहाज से  तीसरा सबसे बड़ा देश जो कोरोना से सर्वाधिक पीड़ित हुआ वह है अमेरिका | चीन चूँकि साम्यवादी शासन व्यवस्था के अंतर्गत है इसलिए वहां मानवाधिकार , अभिव्यक्ति की आजादी , स्वतंत्र न्यायपालिका जैसी  बातें निरर्थक हैं | आप सरकार के समर्थक भले न हों लेकिन विरोधी नहीं हो सकते | कोरोना  को लेकर भी चीन  की ये पहिचान बरकरार रही | आज तक कोई ये नहीं जान सका कि  उसके  वुहान शहर में ये बीमारी कैसे आई , उसमें  कितने लोग बीमार हुए और कितनों ने दम तोड़ा ?  कहा जा रहा है कि हजारों लाशों का  का अंतिम संस्कार उनके परिवार को बिना बताये कर दिया गया और  अवशेष भी  अभी तक  नहीं दिए गए | लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं होने के कारण चीन में किसी तरह का होहल्ला नहीं मचा | इसलिए ये कहना तर्कसंगत नहीं है कि चीन ने तो भारत से ज्यादा जनसंख्या होते हुए भी कोरोना को कुछ ही  महीने  में नियंत्रित कर लिया जबकि  हमारी आबादी तो उससे काफी कम है |

चीन और भारत की शासन व्यवस्था में चूँकि जमीन आसमान का अंतर है इसलिए भारत को इस महामारी पर नियन्त्रण करने में जो सबसे बड़ी परेशानी आ रही है वह है विशाल जनसंख्या | वैसे लोकतान्त्रिक व्यवस्था के कारण भारत अपनी तुलना अमेरिका से कर सकता है | लेकिन यहाँ भी  जबरदस्त विरोधाभास और विषमता है | अमेरिका की  जनसंख्या 33 करोड़ होने के बाद भी उसका क्षेत्रफल भारत से तकरीबन तीन गुना ज्यादा है | अर्थव्यवस्था के मामले में भी ऐसी ही विषमता है | दुनिया की दूसरी और तीसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश के बीच 105 करोड़ जनसंख्या का अंतर है | वहीं संसाधनों के मामले में तो अमेरिका वैसे भी हमसे कई गुना आगे है |

ऐसे में अमेरिका जैसे विशाल भूभाग और सबसे सम्पन्न देश में जब 13 लाख 53 हजार लोग कोरोना  संक्रमित हो गए और 80 हजार से भी ज्यादा मारे जा चुके हों तब भारत सरीखे देश में  अब तक लगभग 70 हजार ही संक्रमित मामले सामने आये जिनमें से लगभग 2500 की मृत्यु हुई  वहीं लगभग 22 हजार  ठीक होकर घर जा चुके हैं | अपनी सम्पन्नता और उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा पर इतराने वाला अमेरिका भारत के इन आंकड़ों को देखकर मन ही मन कुढ़ता तो जरुर होगा | 

लेकिन दुनिया की दूसरी  और तीसरी सबसे ज्यादा  आबादी वाले देश के बीच यदि जनसंख्या  का अंतर इतना ज्यादा नहीं होता तब कोरोना संबंधी आंकड़ों में अमेरिका से कई गुना बेहतर होते  हुए भी भारत जिन दूसरी  समस्याओं से जूझ रहा है उनके कारण कोरोना से पूरी ताकत से लड़ने की बजाय अन्य मोर्चों पर शासन और प्रशासन को उलझना पड़ रहा  है | इनमें सबसे बड़ी है   असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमिकों को उनके मूल निवास तक पहुंचाना | लॉक डाउन के कारण जो जहाँ था उसे वहीं रुकने का निर्देश मिलने के महज कुछ दिनों बाद दिल्ली सहित देश के अनेक हिस्सों से जो जनसैलाब सड़कों पर निकल पड़ा उसने उन तमाम एहतियातों और सावधानियों को कचरे की टोकरी में फेंक दिया जो कोरोना से लड़ने के लिए आधारभूत जरूरत थीं | प्रधानमंत्री ने  ग्रामीण भारत को कोरोना से बचाए रखने के बारे में मुख्यमंत्रियों के समक्ष जो चिंता जताई वह उस भावी खतरे का संकेत है जिसकी कल्पना तक रोंगटे खड़े कर देती है | पहले सरकार इस बात के लिए घेरी जा रही थी कि वह बेरोजगार हुए मजदूरों को उनके घर तक पहुँचाने का इंतजाम नहीं कर रही | जब श्रमिक एक्सप्रेस चलने लगीं तब कहा जा रहा है इससे कोरोना देश भर में फैल जायेगा |

गरीबों  को राशन और नगद राशि के साथ ही मुफ्त रसोई गैस भी दी गई | लेकिन दावा किया  जा रहा है प्रवासी मजदूरों को ऐसा कोई लाभ नहीं मिल सका  क्योंकि उनका पता - ठिकाना स्पष्ट नहीं होने से वैसा करना संभव नहीं हुआ | जिन राज्यों में  वे कार्यरत थे उनकी सरकारों को भी वे दो चार दिन में ही बोझ लगने लगे |

पूरा मंजर हम सबके सामने है | कोई सरकार का बचाव कर रहा है तो कोई उसे कठघरे में  खड़ा करने पर आमादा है | लेकिन इस विषम स्थिति में एक बार फिर बढ़ती  जनसंख्या का मुद्दा बिना कुछ  कहे  प्रासंगिक हो चला है | विकास दर और सकल घरेलू उत्पादन के आंकड़ों की फसल चाहे जितनी भी लहलहाये किन्तु कोरोना के कारण उत्पन्न हालातों में गरीबों का अपने गांवों की ओर चिलचिलाती गर्मी में चल पड़ना महज कुछ दिनों की हेड लाइन न होकर इस बात की चेतावनी है कि इस बोझ को यूँ ही बढ़ने दिया तब भविष्य में छोटी - छोटी आपदाएं भी भयंकर साबित होंगीं |

प्रश्न है , किया क्या जाए और सीधा सपाट उत्तर है जनसंख्या नियन्त्रण क़ानून | समय - समय पर इसकी चर्चा तो चला करती है लेकिन होता कुछ नहीं है | दरअसल इसे अल्पसंख्यक  विरोधी मान लिये जाने के कारण उसका जिक्र होते ही सियासी  तलवारें म्यान से बाहर आने लगती हैं | लेकिन कोरोना ने साबित कर दिया कि हमारे सारे इंतजाम और कार्य कुशलता  आबादी का  बोझ कंधो पर लादते ही लड़खड़ा जाते हैं |

ऐसे में जब कोरोना  के बाद भारत का आर्थिक , और सामाजिक ढांचा काफी कुछ बदलना  तय है तब आबादी के असीमित विस्तार को रोकने के लिए जनसंख्या नियन्त्रण कानून लाकर अर्थव्यवस्था के साथ ही बाकी  व्यवस्थाओं पर पड़ने वाले बोझ को हल्का करना भारत के सुखद भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है |

कुछ लोग ये भी कहेंगे कि फिलहाल इस विषय को छेड़ने की क्या  जरूरत है क्योंकि इसकी चर्चा शुरू होते ही पक्ष - विपक्ष में तू - तू , मैं  - मैं शुरू हो जायेगी | लेकिन जिस तरह कोरोना के चलते ही भविष्य के संकटों का सामना करने का तंत्र तैयार करने की कार्ययोजना बनाई जा रही है ठीक उसी तरह जनसँख्या के विस्तार को नियोजित करने की तैयारी भी तत्काल प्रारम्भ होनी चाहिए |

संसद के मॉनसून सत्र में इसे पेश करना पूरी तरह से देश के हित में होगा | इसके अंतर्गत नव दंपत्तियों को अधिकतम दो बच्चों की अनुमति होनी चाहिए और इससे ज्यादा वाले को सरकार की तरफ से मिलने वाली सुविधाओं से वंचित रखने का प्रावधान किया जावे | चीन ने तो एक समय सरकार की अनुमति लिए बिना नव दम्पत्तियों द्वारा संतान उत्पन्न करने पर ही रोक लगा रखी थी | उसका उसे लाभ भी हुआ और जनसंख्या वृद्धि की उसकी दर भारत से काफी कम हो गई | वहीं हमारे देश में वोटबैंक खिसक जाने के भय से परिवार कल्याण कार्यक्रम पर विस्मृति की धूल जमती गई |

कोरोना के बाद  भारतीय  अर्थव्यवस्था में उछाल की जो उम्मीदें लगाई जा रही हैं वे आबादी की अनियंत्रित वृद्धि के चलते हवा हवाई होकर रह जायेंगी | कोरोना  के हॉट स्पॉट जहां - जहाँ भी हैं वहां की ज्यादा जनसँख्या संक्रमण फ़ैलाने में मददगार हुई है | कोरोना ने चिकित्सा तंत्र को सुदृढ़ करने की जो आवश्यकता बताई  उसके लिए भी जनसंख्या के विस्तार का विकास दर के साथ समन्वय बिठाना  पड़ेगा | चीन ने ये कर दिखाया जिसके कारण वह तेजी से तरक्की कर सका |

ये ऐसा विषय है जिसका आम जनता समर्थन करेगी | आर्थिक प्रगति  और प्राकृतिक  संसाधनों के न्यायोचित बंटवारे के लिए जनसंख्या वृद्धि को राष्ट्रीय कर्तव्य के साथ जोड़ना होगा | वरना गरीबी  के बाद गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी तो हमने बना ली लेकिन आबादी इसी तरह बढ़ती  गयी तो इसके बाद कौन सी श्रेणी बनाई  जायेगी ये समझ से परे है |

कठिन परिस्थितियों से निपटने के लिए कठोर फैसले करना राष्ट्रहित में होता है | कोरोना ने जो घाव हमें दिए हैं उन्हें भरने के लिए जिन उपायों को सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ अमल में लाना चाहिए उनमें जनसँख्या नियन्त्रण कानून  फेहरिस्त में  सबसे ऊपर है | इसके पारित होने पर हंगामा करने वाले जब देखेंगे कि हेकड़ी दिखाने पर उन्हें मिलने वाली सरकारी खैराते बंद  हो जायेंगीं तब वे भी उस कानून का पालन करने प्रेरित और प्रोत्साहित होंगे |

शिक्षा और स्वास्थ्य को पूरी तरह निःशुल्क करने के सुझाव भी यदा - कदा  आया करते हैं और सरकार इस दिशा में सोचती भी है लेकिन ज्योंही उसकी नजर आबादी में वृद्धि की तेज रफ्तार पर जाती है तो उसके पाँव ठिठक जाते हैं |   जनसंख्या नियन्त्रण करने के लिए कानून बनाने का ये सबसे अच्छा समय है क्योंकि अधिकतर को समझ में आ गया है कि आबादी का विस्फोट कितना खतरनाक है ?

मध्यम वर्ग के मन में अफ़सोस भी है और आक्रोश भीबिना उसमें उत्साह जगाए बाजार गुलजार नहीं हो सकते




सोशल मीडिया पर प्रसारित हर जानकारी प्रामाणिक और विश्वसनीय नहीं होती | व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी नामक  व्यंग्य खूब सुनने में आता है | कोई मैसेज आते ही बिना उसकी सत्यता परखे उसे आगे बढ़ाने के कारण भ्रम की  स्थिति भी बन जाती है | लेकिन ये भी सही है कि विचारों और सूचनाओं के आदान - प्रदान के  इस माध्यम ने संपर्कों को जो वैश्विक स्वरूप प्रदान किया वह अकल्पनीय और अत्यंत क्रांत्तिकारी है | तमाम विसंगतियों के बावजूद सोशल  मीडिया कोरोना संकट के दौरान लॉक डाउन में विचारों के सम्प्रेषण के साथ ही विभिन्न विषयों पर जीवंत बहस एवं विमर्श का सशक्त माध्यम बन गया | अख़बारों के वितरण में आई रुकावटों एवं टीवी समाचारों में दोहराव के साथ ही एकरूपता से लोग सोशल मीडिया की और उन्मुख होते गये |

बड़ी - बड़ी हस्तियों ने इस माध्यम  की ताकत और पहुंच को महसूस करते हुए इसके जरिये लोगों तक अपनी बात पहुँचाने का जो प्रयास किया वह आने वाले समय में समाचार और विचार संप्रेषण के नये तौर - तरीके ईजाद करने का कारण बन जाए तो आश्चर्य नहीं होगा | सबसे बड़ी बात ये है कि इस माध्यम में अभिव्यक्ति पर पर कोई बंदिश नहीं है | स्वछ्न्दता और गैर जिम्मेदारी का परिचय देने वाले भी बहुतेरे हैं लेकिन उसके बाद भी सकारात्मक सोच और वैचारिक मंथन को इसकी वजह से जो अवसर और अधिकार मिला वह अपने आप में बड़ी उपलाब्धि है |

और ऐसा ही एक विचार आज एक वीडियो के माध्यम से मेरे संज्ञान में आया जिसमें निजी कम्पनी में कार्यरत एक मध्यमवर्गीय  युवा और उसकी पत्नी मौजूदा हालात और उसके बाद की परिस्थितियों पर आपस में बातचीत करते दिखाए गये  थे | उनकी चिंता का सबसे बड़ा कारण कर्ज की वे किश्तें हैं जिन्हें भरने के लिए बैंक ने तीन महीने की छूट  तो दे  दी थी लेकिन किश्त नहीं भरने से उन पर ब्याज का बोझ  और बढ़ जाएगा | सरकारी निर्देश पर बिजली का बिल भरने के लिए भी लॉक डाउन रहने तक की  छूट मिल गयी थी लेकिन बिजली वाले फोन करते हुए ऑन लाइन भुगतान का दबाव बनाये हुए हैं | ऊपर से अप्रैल महीने का बिल बिना मीटर रीडिंग किये ही पिछले साल के बराबर आ गया जबकि अभी तक  उनका एयर कंडीशनर चालू नहीं हुआ | इलेक्ट्रिशियन नहीं मिलने से विंडो कूलर भी नहीं लगा | जब इस ओर ध्यान दिलाया गया तो बिजली वाले बोले अभी जमा कर दीजिये , जब रीडिंग होगी  तब अगले बिल में समायोजन हो जाएगा | लॉक डाउन के कारण  मार्च के  अंत  में नगर निगम का टैक्स भी जमा  नहीं हो सका और अब निगम वाले भी दिन भर मैसेज भेज कर याद दिलवा रहे हैं |

बच्चों का स्कूल बंद होने के बावजूद ऑन लाइन क्लास लगाकर फीस वसूल ली गयी | जिस फ़्लैट में वे रहते हैं उसका मकान मालिक यूँ तो बहुत ही सज्जन है लेकिन किसी न किसी बहाने किराया वसूल ही लेता है | सबसे बड़ी चिंता का विषय ये है कि अप्रैल का वेतन अभी तक खाते में जमा नहीं हुआ जबकि लॉक डाउन के बाद भी वर्क फ्रॉम होम के अंतर्गत  सुबह  से शाम तक काम  करना पड़ रहा  है | और अब संकेत हैं कि वेतन कुछ कटकर मिलेगा और हो सकता है मई के बाद कुछ स्टाफ कम भी हो जाये | ये भी पता चला है कि कम्पनी दरअसल कर्मचारियों को नौकरी जाने का भय दिखाकर कम वेतन पर काम करने के लिए राजी करने की योजना बना रही है |

चूँकि मौजूदा समय में कोई विकल्प  नहीं है इसलिए कर्मचारी कम्पनी की सभी शर्तें मानने राजी हो जायेंगे | क्योंकि नौकरी बची रहना  भी  बड़ी राहत का विषय है किन्तु बात अचानक दूसरी ओर घूम जाती है | पत्नी ने बताया  कि अपने यहाँ जो नौकरानियाँ  काम करती है उनको  सस्ती दरों  पर अनाज के अलावा कुछ मात्रा में चावल - गेंहू मुफ्त भी मिले और रसोई गैस के तीन सिलेंडर भी निःशुल्क सरकार दे रही है | उनके मोहल्ले में सरकारी गाड़ियाँ आकर भोजन के पैकेट भी  दे जाती हैं | और कुछ नगदी उनके बैंक खातों में भी जमा हुई है | लेकिन अपने जैसों को क्या कुछ भी नहीं मिलेगा ? इस पर पति ने ऊंचे स्वर में कहा कि सरकार इन लोगों की ही परवाह करती है | फिर उसने बताया कि व्यापारी - उद्योगपति भी एकजुट होकर सरकार पर दबाव बनाकर राहत पैकेज मांग रहे हैं } सुना है एक दो दिन में ही उसका ऐलान भी हो जायेगा | बैंक इस संकट से निपटने के लिए उनको कम ब्याज दर पर और कर्ज देने को तैयार हैं | रिजर्व बैंक नें भी इस बारे में काफी फैसले हाल में किये हैं | लेकिन गरीबों और उद्योग - व्यापार जगत के बीच जो भारत की विशाल  मिडिल क्लास है उसकी तरफ सरकार देख तक नहीं रही | जबकि लॉक डाउन ने उसकी कमर  भी तोड़ी है |

ये कहते हुई पति - पत्नी आने  वाले कुछ महीनों का हिसाब लगाने  बैठे तब उनके माथे पर चिंता की लकीरें और गहरी हो गईं | अपने गृहनगर में बन रहे  मकान के  लोन की किश्त शुरू होते  ही वाहन लोन अटक जायेगा | दोनों भरें तो जीवन बीमा प्रीमियम और उसके अगले महीने हैल्थ इंश्योरेंस की प्रीमियम में परेशानी आयेगी | आगामी  दीपावली पर पुराना फर्नीचर हटाकर नया लेने की ख्वाहिश भी पूरी होने से रही |  |

उसके बाद दोनों ने विवाह के बाद की ज़िन्दगी से आज तक की यादों का पिटारा खोला तो निष्कर्ष ये निकला कि उनका जीवन  किश्त चुकाते ही बीतता आया है | घरेलु उपकरणों से शुरु होकर कार तक उन्होंने किशतों में खरीदी | परिवार और मित्रों में उनके अच्छे रहन - सहन की चर्चा भी होती है | लेकिन सुख - सुविधा के सारे साधन उन्होंने कर्ज की किश्तें चुकाकर ही जुटाए हैं | शायद वे ऐसा नहीं भी करते लेकिन गरीबों के मुकाबले बड़े आदमी दिखने और अमीरों की निगाह में गरीब नजर नहीं आने की  सोच ने उन पर किश्तों का कभी न खत्म होने वाला बोझ लाद दिया | भविष्य की उनकी योजना में बेटे को उच्च शिक्षा हेतु विदेश भेजने की भी है जिसके लिए कर्ज लेने की मानसिकता उन्होंने  अभी से बना ली है |

उक्त वीडियो और उसमें दिखाई गई बातें किसी लघु फिल्म का हिस्सा जैसी हैं लेकिन ये भारत के उस मध्यम वर्ग का सही चित्रण है जो गरीब और संपन्न वर्ग के बीच में अपनी  सम्मानजनक स्थिति बनाये रखने  की जद्दोजहद में ही उलझा रहता है | तकरीबन चार दशक पहले प्राणनाथ सेठ नामक लेखक की एक पुस्तक न्यूयॉर्क से होनोलुलू पढ़ी थी | उसमें भी एक युवा दम्पत्ति के बीच की बातचीत का विवरण देते हुए बताया गया कि पति किश्तों पर कुछ नई चीज खरीदने के लिए कर्ज लेने की बात करता है तो पत्नी उससे आग्रह करती है कि क्यों न उसके पहले हम नर्सिंग होम की बकाया किश्तें चुका दें जिससे अपना बच्चा पूरी तरह  हमारा हो जाये | हो सकता है वह बातचीत लेखक के अपने दिमाग  की कल्पना  हो लेकिन मध्यमवर्गीय परिवारों की ज़िन्दगी ऐसी ही सच्चाइयों से भरी रहती है |

लॉक डाउन से उत्पन्न हालातों में इस वर्ग के मन में इस बात का अफ़सोस भी है और आक्रोश भी कि संकट के इस दौर में सरकार का ध्यान या तो गरीबों पर जा रहा है या फिर अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने के लिए उद्योगपति - व्यवसायी पर , जबकि कोरोना संकट ने उसके भविष्य को भी अनिश्चित और असुरक्षित बना दिया है | उसे इस बात की भी शिकायत है कि वह भी करदाता है लेकिन समूची व्यवस्था में उसके लिए ऐसा कुछ नहीं होता जिससे उसे लगे कि व्यवस्था उसकी तकलीफों के प्रति भी उतनी ही संवेदनशील है | इस वर्ग में केवल नौकरपेशा ही नहीं लघु और मध्यम कारोबारी भी शमिल हैं |

इस बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि भारत में उदारवाद को सफल बनाने में इस मध्यम वर्ग का सबसे बड़ा योगदान रहा है , जिसने कर्ज लेकर आसान किश्तों को ही अपना जीवन बना लिया | बड़े लोगों के पास तो पहले भी कार होती थी | लेकिन भारत में औटोमोबाइल उद्योग को कल्पनातीत सफलता दिलवाने में इसी मध्यमवर्ग का  हाथ है | माइक्रोवेव , रेफ्रिजरेटर , वाशिंग मशीन , दो पहिया वाहन , एयर कंडीशनर , कम्प्यूटर , लैपटॉप , मोबाईल , एलईडी टेलीविजन  जैसे उपकरण का बाजार भी विकसित नहीं होता यदि मध्यमवर्ग इन्हें नहीं अपनाता |

एक -  दो दशक पहले तक यही वर्ग लघु बचत का सबसे बड़ा स्रोत हुआ करता था लेकिन  अब उसका स्थान किश्तों या ईएमआई ने ले लिया जो कि एक बहुत बड़ा बदलाव है | मौजूदा संदर्भ में इस वर्ग की अपेक्षाएं गलत नहीं हैं | गरीब की मदद करना तो इंसानियत का फर्ज  है और कारोबारी वर्ग की सहायता देश की आर्थिक सेहत के लिए जरूरी है | ऐसे में मध्यम वर्ग का ये सोचना गलत नहीं है कि उसे घर की मुर्गी दाल बराबर और Take for Granted मान  लिया गया है |

ये बात भी सही है कि इस वर्ग की कोई सामूहिक आवाज नहीं है |   लेकिन कोरोना के बाद की सामाजिक रचना को लेकर हो रहे विचार मंथन में मध्यम वर्ग के सामाजिक और आर्थिक महत्व को समझकर उसके हितों के संरक्षण की भी बराबरी से व्यवस्था होनी चाहिए |

अन्यथा सबका साथ भले मिल जाए लेकिन सबका विकास नहीं हो सकेगा | 

क्योंकि मध्यम वर्ग में उत्साह जगाए बिना बाजारों में रौनक नहीं लौट सकती |

प्रवासी मजदूर : न चंदा देने की हैसियत और न हड़ताल की हिम्मत ट्रेडयूनियनों की साख और धाक दोनों खतरे में

प्रवासी मजदूर : न चंदा देने की हैसियत  और न  हड़ताल की हिम्मत

टेड यूनियनों  की  साख और धाक दोनों खतरे में

यदि लॉक डाउन की वजह से देश के विभिन्न हिस्सों से प्रवासी श्रामिकों की वापिसी राष्ट्रीय समस्या न बनती तब शायद देश के लोगों को इस सच्चाई का पता ही नहीं चलता कि अपना गाँव -  देस छोडकर सैकड़ों मील दूर पूरी तरह अपरिचित माहौल में बतौर मजदूर काम करने वालों की संख्या  सैकड़ों , हजारों नहीं बल्कि लाखों से भी ऊपर  है | लॉक डाउन के बाद की  स्थितियां जब असहनीय होने लगीं और कोई  विकल्प नहीं मिला तो लाखों लोग पैदल ही लौट पड़े | 

उनके साथ घटी दुर्घटनाओं ने देश का ध्यान आकर्षित किया और तब उनकी गरीबी और बेबसी का बखान हुआ | उनके प्रति हर किसी की सहानुभूति इसलिए है क्योंकि वे श्रमिक हैं और तब सहसा याद आया कि इस देश में श्रमिक संगठनों की भी भरमार है | कांग्रेस , भाजपा , वामपंथी , समाजवादी खेमे के अपने - अपने श्रमिक संगठन हैं | वामपंथियों के दो हिस्से हुए तो श्रमिक संगठन भी  दो हो गए | लेकिन समाजवादी खेमा इतनी बार बिखरा कि उससे जुड़े श्रमिक संगठनों की पहिचान ही नष्ट हो गयी | इनके अलावा शिवसेना , द्रमुक और अद्रमुक तथा तृणमूल जैसे क्षेत्रीय दलों ने भी मजदूरों के बीच अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए संगठन बना रखे हैं |

इन संगठनों के जरिये राजनीतिक दल कर्मचारी वर्ग के साथ ही श्रमिकों को भी अपनी तरफ खींचने का प्रयास करते हैं | हालांकि मजदूर आंदोलनों से उपजे ये संगठन मुख्य रूप से कार्मिक वर्ग के हितों की रक्षा करने के लिए बनाये गये जिससे वेतन या मजदूरी पाने वाले का शोषण न हो | 

सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में जिस तरह का वेतनमान लागू होता गया  उसमें इन संगठनों का योगदान भुलाया नहीं  जा सकता | सेवा निवृत्ति लाभ , अनुकम्पा नियुक्ति , न्यूनतम मजदूरी , काम के घण्टे , अवकाश , चिकित्सा सुविधा , मुआवजा और ऐसे ही अनेक लाभ श्रमिक आंदोलनों की  ही देन है | इसीलिए बैंक , जीवन बीमा , रक्षा उत्पादन जैसे बड़े संस्थानों में राष्ट्रीय स्तर पर हड़ताल करवाने की ताकत इन संगठनों के पास रही  है |

लेकिन इसमें जो धार अस्सी के दशक तक दिखाई देती थी वह अब महसूस नहीं होती | इसकी एक वजह ये भी है कि सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में वेतन भत्ते इतने आकर्षक  हो गये कि अब लोगों  को ट्रेड यूनियन के आन्दोलन में सड़क पर आकर इंकलाब जिंदाबाद और बोल मजूरा हल्ला बोल जैसी नारेबाजी करने में अपराधबोध की अनुभूति होती  है | यही वजह है कि श्रमिक या कर्मचारी आन्दोलन अब पहले जैसा प्रभाव समाज और सरकार दोनों पर नहीं छोड़ पाते |

इसके पीछे एक बड़ी वजह श्रमिक संगठनों का राजनीतिक दलों के पिछलग्गू बन जाना भी रहा | जिसके कारण अपना मुख्य लक्ष्य भूलकर वे दलीय विचारधारा के प्रसार में लग गये | श्रमिक नेताओं का उपयोग  करने के लिए उनकी पालक पार्टी ने उन्हें विधायक , सांसद और मंत्री बनाना शुरू कर दिया | सत्ताधारी पार्टी से जुड़े श्रमिक नेताओं को श्रम विभाग के अंतर्गत अनेक समितियों में मनोनीत करते हुए उपकृत किया जाना आम है  | सरकारी सुविधाएँ  भी दी जाने लगीं | अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में विदेश घुमाया जाने लगा। और धीरे - धीरे ट्रेड यूनियनों पर पेशेवर नेताओं का आधिपत्य होता गया |  सरकार अथवा प्रबंधन के साथ निकटता के कारण हितों के आदान प्रदान का सिलसिला भी इसी के चलते शुरू हुआ |

कहने का आशय ये कि  राजनीतिक दलों  के साथ -  साथ श्रमिक संगठन भी ईमानदारी , समर्पण , निःस्वार्थ सेवा तथा जनता के हितों के लिए संघर्ष की क्षमता जैसे गुणों से दूर होते - होते केवल संगठित क्षेत्रों तक ही सिमटकर रह जो कि सुविधाभोगी माना जाने लगा है | इस वर्ग के  छोटे - बड़े  कर्मचारी या अधिकारी स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति के प्रस्ताव का इंतज़ार करते रहते हैं |  लेकिन इसके चलते श्रमिक आन्दोलन अपनी राह से भटक गया जिसका उदाहरण आज देश में सड़कों पर चले जा रहे वे  प्रवासी मजदूर हैं जो असंगठित क्षेत्र के होने की वजह से श्रमिक संगठनों की अनदेखी और उपेक्षा के शिकार होकर निराशा में डूबकर अपनी बदकिस्मती का बोझ कंधे पर उठाये चले जा रहे हैं , उस रास्ते पर जिसका अंत कब , कहां और कैसे होगा ये उन्हें नहीं पता | 

जिन जगहों पर ये काम करते थे वहां इनकी दुर्दशा देखने कोई श्रमिक संगठन या नेता नहीं आया | न ही किसी ने राज्य सरकार से मिलकर उन्हें राहत दिलवाने की पहल की | राष्ट्रीय स्तर पर भले ही चिट्ठियाँ और ज्ञापन भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली गई हो लेकिन कोई मैदानी प्रयास देखने नहीं मिला | प्रश्न ये है कि लाखों की संख्या वाले असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के बिना श्रमिक आंदोलन की कल्पना कैसे की  जा सकती है ? श्रमिक  नेताओं के रूप में स्थापित राजनीतिक दलों के कृपापात्र इस दौर में जिस तरह किसी मांद में जाकर छिपे उससे प्रवासी मजदूर नेतृत्व और दिशाविहीन होने के साथ ही खुद को असहाय और ठगा सा महसूस कर रहे हैं  |

राजनीतिक दलों के तौर - तरीके केवल अपने नफे नुकसान तक सीमित रहते हैं | जबकि श्रमिक संगठन शोषण के विरुद्ध और मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए हर समय संघर्ष करने के लिए बनाये गये थे | लेकिन इन लाखों असंगठित प्रवासी मजदूरों को शायद इसलिये बेसहारा छोड़ दिया गया क्योंकि वे यूनियन को चंदा देने की स्थिति में नहीं होते | रोज कमाने और रोज खाने की उनकी मजबूरी उन्हें किसी भी  हड़ताल , धरना या प्रदर्शन में हिस्सा लेने से भी रोक देती है |

पूंजीवाद , समाजवाद , उदारवाद जैसे शब्द उनकी जिन्दगी रूपी शब्दकोश में हैं ही नहीं | बुर्जुआ और सर्वहारा भी वे नहीं समझते | और इसी कारण वे किसी श्रमिक संगठन की भीड़ बढ़ाने का जरिया नहीं बन पाये  | बीते लगभग डेढ़ महीने में श्रमिक आन्दोलन की उपस्थिति कहीं नहीं दिखाई दी | यदि किसी से पूछें कि राष्ट्रीय स्तर के किसी ट्रेड यूनियन नेता का नाम बताओ तो वह सोच में पड़ जाएगा | स्थानीय  स्तर पर भी पहले कर्मचारी और श्रमिक नेताओं का जो दबदबा  था , वह भी नहीं दिखता |

ये स्थिति खतरनाक संकेत दे रही है | जो लाखों  प्रवासी श्रमिक इन दिनों सड़कों पर नजर आ  रहे हैं , उनके भविष्य के बारे में नहीं सोचा गया तो वे देश के भविष्य पर भारी पड़ जायेंगे | असंगठित होना भले ही आज  इनका अपराध और कमजोरी लग रही  हो लेकिन इनके प्रति उपेक्षा  का भाव कोरोना के बाद के हालातों को  और चिंताजनक बना देगा | 

श्रमिक संगठनों द्वारा इनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाना उनमें आये चारित्रिक बदलाव का प्रमाण तो है ही लेकिन उससे ये संकेत भी  मिल रहा है कि भारत में श्रमिक संगठन  क्रमशः समाप्ति की ओर बढ़ चले है | इसका एक प्रमुख कारण सोवियत संघ का विघटन होने के बाद चीन का पूंजीवादी हो जाना भी है जिसके परिणामस्वरूप भारत में साम्यवादी पार्टियों का प्रभावक्षेत्र लगातार सिमटता जा रहा है | एक समय उनकी समूची राजनीति किसान और मजदूर के नाम पर चलती थी | किसानों के अपने नेता बन गये और बढ़ते वेतन के कारण संगठित क्षेत्र खुद को श्रमिक कहलाने में लजाने लगा |

2004 में जब सीपीएम महासचिव हरिकिशन सिंह सुरजीत ने इस देश में पूंजीवादी उदारवाद और पश्चिमी देशों के हितों को सुरक्षित रखने  वाली मुक्त अर्थव्यवस्था के  जनक डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार को समर्थन देने के लिए वामपंथी दलों को राजी किया , उसी दिन से साम्यवादी पार्टियों का वैचारिक भटकाव शुरू हो गया । जिसकी वजह से श्रमिक आंदोलन पर वामपथी पकड़ कमजोर पड़ते - पड़ते समाप्ति पर आ गयी | जहाँ तक कांग्रेस के मजदूर संगठनों की हालत है तो वे उसी की तरह कमजोर होते जा रहे हैं और भाजपा समर्थक श्रमिक संगठन न चाहते हुए भी चुप रहने मजबूर  हैं |

ऐसे में राजनीतिक स्वार्थ दूर रखकर सभी दलों को इन मौन प्रवासी कर्मवीरों के भविष्य को सुरक्षित बनाने का पक्का इंतजाम करना चाहिए | रही बात श्रमिक संगठनों की तो वे अपनी प्रासंगिकता खो ही चुके हैं | और आखिर में वे भी करेंगे तो वही जो उनके राजनीतिक आका हुक्म देंगे |

श्रम और संसाधनों के समन्वय से ही दूर होगा संकट




गत रात्रि एक टीवी चैनल पर 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज पर चर्चा में कांग्रेस और भाजपा के प्रतिनिधियों के बीच बहस के दौरान मौजूद औद्योगिक संगठन के एक प्रतिनिधि से एंकर ने पूछा कि इस बारे में राजनेताओं की प्रतिक्रिया पर आपके क्या विचार हैं तो वे हंसते हुए बोले कि किसी भी मुद्दे पर राजनीतिक लोगों की प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर होती है कि वे कि सत्ता में हैं या विपक्ष में। उनका आशय कांग्रेस प्रतिनिधि द्वारा पैकेज की तीखी आलोचना से था। बात कुछ हद तक सही भी है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार को सुझाव दिया था कि गरीबों के खाते में 7500 रु. जमा करवा दें जिससे उनकी क्रय क्षमता बढ़े और बाजार में मांग पैदा हो सके। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने उन्हें सलाह दी थी कि 65 हजार करोड़ रु. गरीबों को दिलवा दिये जाएं तो अर्थव्यवस्था सुधर जायेगी। गत दिवस वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पैकेज में लिए गये फैसलों की पहली किश्त के बारे में बताया, जिसमें मुख्य रूप से एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम श्रेणी की इकाइयां) को सहारा देकर आर्थिक सुस्ती दूर करने पर जोर दिया गया। बजाय नगद राशि रूपी अनुदान देने के उन्हें बिना गारंटी कर्ज मिलने के अलावा इस श्रेणी में निवेश और टर्न ओवर की सीमा को भी कई गुना बढ़ा दिया गया जिससे वे अपना कारोबार बढ़ाने के बावजूद भी इससे मिलने वाले लाभों से वंचित न हों। इनके अलावा वित्तमंत्री ने कुछ और छूटों और प्रावधानों की जानकारी भी दी जिनसे बिल्डर, बिजली कंपनियां और कर्मचारी वर्ग को लाभ होगा। टीडीएस की कटौती में 25 फीसदी की कमी से बाजार में नगदी का प्रवाह बढ़ेगा वहीं भविष्य निधि संबंधी फैसलों से कर्मचारी और नियोक्ता दोनों कुछ राहत तो महसूस करेंगे ही। 200 करोड़ तक के सरकारी टेंडर में एमएसएमई को भी भाग लेने के सुविधा उनकी सेहत सुधारने में जहाँ सहायक होगी वहीं सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों द्वारा  45 दिन में इन इकाइयों के लम्बित भुगतान करने का फैसला भी उनके व्यवसाय को चलायमान रखने में सहायक बनेगा। बिजली कम्पनियों के बिलों का भुगतान करने हेतु 90 हजार करोड़ का आवंटन देश में बिजली आपूर्ति बनाये रखने में मददगार होगा। कुल मिलाकर गत दिवस जो घोषणाएं हुईं उनसे आम जनता की जेब में सीधे पैसे डालने की कांग्रेस की मांग भले पूरी नहीं हुई किन्तु इससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा का प्रवाह तेज होगा। सबसे बड़ी संभावना सूक्ष्म , लघु , मध्यम इकाइयों में काम शुरू होते ही रोजगार का सृजन होने की है जो आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अब चूँकि इन इकाइयों को इसी दायरे में रहते हुए अपना आकार बढ़ाने का अवसर मिल गया है इसलिए देश में निजी क्षेत्र के सबसे ज्यादा रोजगार प्रदाता की क्षमता में विस्तार का सीधा लाभ बेरोजगारी दूर करने में मिलेगा। नतीजे आने में हालांकि थोड़ा  वक्त लग सकता है लेकिन लोगों की जेब में बिना काम किये नगद राशि डालने का सुझाव अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ाएगा क्योंकि बिना उत्पादकता बढ़ाये मौजूदा स्थिति को सुधारना असंभव है और उसके लिये उपलब्ध श्रम शक्ति का अधिकाधिक उपयोग ही बेहतर तरीका है। हाल ही में शराब दुकानें खुलने पर अनेक गरीब लोगों ने सरकार से मिला सस्ता और मुफ्त अनाज बेचकर शराबखोरी की। ये बात राहुल गांधी नहीं जानते ऐसा नहीं है किन्तु इसके बाद भी वे 7500 रु. खाते में डालकर अर्थव्यवस्था सुधारने का जो सपना देख रहे हैं वह चार दिन की चांदनी जैसा होगा। उस लिहाज से कारोबार बढ़ाना ही बेहतर विकल्प है। यदि गरीब मेहनत करके कमाता है तब वह उत्पादन और मांग दोनों में वृद्धि का हिस्सा बनता है जबकि बिना कुछ किये उसे मिलने वाले पैसे से बाजार में थोड़े समय ही रौनक रह सकती है। ये देखते हुए गत दिवस हुईं घोषणाएं यदि जमीन पर सही तरीके से उतर सकीं तो आने वाले कुछ महीनों में ही अर्थव्यवस्था गति पकड़ लगी। अभी वित्तमंत्री के पिटारे से कृषि, बड़े उद्योग और मध्यम वर्ग के लिए क्या-क्या निकलता है उसे देखने के बाद इस पैकेज की सही समीक्षा हो सकेगी। अभी तक जो सामने आया है उससे लगता है सरकार मुफ्त का चन्दन घिसवाने से बचते हुए श्रम और संसाधन के समन्वय से अर्थव्यवस्था को ठोस आधार देना चाह रही है जो सही कदम है। लेकिन हमेशा की तरह देखने वाली बात ये होगी कि प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री द्वारा की गईं अच्छी-अच्छी घोषणाओं को अमली जामा पहिनाने वाला सरकारी और बैंकों का अमला भी क्या उतना ही संवेदनशील और समर्पित है? पुराने अनुभव बताते हैं कि सत्ता के शीर्ष स्तर पर होने वाले जनहितकारी फैसले निचले स्तर पर आते-आते अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं जिसके कारण उनका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। इस पैकेज के साथ ऐसा न हो इसकी भी चिंता साथ-साथ कर लेनी चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 13 May 2020

पैकेज : ग्लोबल की जगह लोकल क्रांतिकारी साबित होगा




प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी राष्ट्र के नाम संदेश देते हैं तब पूरे देश में एक आशंका सी तैर जाती है। नोट बंदी के बाद लॉक डाउन की घोषणा भी उन्होंने देश से बात करते हुए ही की। इसीलिये गत दिवस दिन के समय जब ये पता चला कि रात 8 बजे वे देश के नाम सन्देश देंगे तो सोशल मीडिया पर तरह-तरह के कटाक्ष होने लगे। तीन मई को जब डाउन बढ़ाया गया तब उसकी घोषणा करने श्री मोदी टीवी पर नहीं आये थे। उस पर उनके विरोधियों ने ये तंज कसा कि वे देश से मुंह छिपाते फिर रहे हैं। लेकिन गत दिवस उनके टीवी पर आने की खबर आई तब कुछ लोगों ने ये तक कहा कि जब मुख्यमंत्रियों से 15 मई तक लॉक डाउन संबंधी सुझाव मांगे गये हैं तब इतनी जल्दी क्या पड़ी है ऐलान करने की। और भी टिप्पणियाँ आईं किन्तु रात प्रधानमंत्री देश से मुखातिब हुए और अपनी बात रखना शुरू किया तब सभी आशंकाएं दरकिनार हो गईं। उद्योग-व्यापार जगत के अलावा विपक्ष भी लगातार मांग करता आ रहा था कि सरकार आर्थिक पैकेज की घोषणा करे। सोनिया गांधी ने इस आशय के पत्र लिखे और राहुल गांधी अमेरिका में बैठे भारतीय मूल के आर्थिक विशेषज्ञों से पूछ - पूछ्कर सरकार को सलाहें भेजते रहे। रघुराम राजन ने गरीबों में 65 हजार करोड़ बांट देने का सुझाव श्री गांधी को दिया जिससे उनकी क्रय शक्ति बढ़ सके और बाजार में मांग बढ़े। इस पर उन्होंने हर गरीब के खाते में 7500 रु. जमा करवाने की मांग भी सरकार से की। दूसरी तरफ उद्योग व्यापार जगत बेसब्री से सरकार द्वारा दी जाने वाली राहत का इन्तजार कर रहा था। विशेष रूप से छोटे व्यापारी और एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम श्रेणी उद्योग) को ये भय सता रहा है कि लॉक डाउन खुलने के बाद वे अपना कारोबार दोबारा कैसे शुरू करेंगे ? पूंजी का अभाव, बैंकों का दबाव और बाजार में कमजोर मांग के कारण व्यवसाय को दोबारा गतिशील बनाना बेहद कठिन होगा। रोज कमाने रोज खाने वाला कारोबारी तो बीते लगभग 50 दिनों में तबाही के कगार पर जा पहुंचा है। दिक्कत तो निजी क्षेत्र के उस नौकरपेशा मध्यमवर्ग के सामने भी आई जिसकी नौकरी या तो चली गई या फिर वेतन में कमी हो गयी। ऐसे में हर वर्ग सरकार से अपेक्षा कर रहा था कि वह उसके लिए कुछ करे। प्रधानमंत्री ने अपने आधा घंटे के भाषण में शुरुवाती समय में पूरी तरह से आत्मनिर्भरता पर बल दिया और बिना नाम लिए स्वदेशी का संदेश देते हुए ग्लोबल की बजाय लोकल को प्राथमिकता देने का आह्वान कते हुए बहुत बड़ा नीतिगत वक्तव्य दे डाला। उन्होंने जनता को ये बतलाने में तनिक भी संकोच नहीं किया कि जो आज ग्लोबल ब्रांड हैं वे भी कभी लोकल हुआ करते थे। श्री मोदी ने इस तरह से चीन को एक तरह से संदेश भेज दिया। और फिर 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की जो घोषण की वह चौंका देने वाली थी क्योंकि अभी तक सरकार और रिजर्व बैंक ने मिलकर जितनी भी राहत का ऐलान किया वे ऊँट की मुंह में जीरा मानकर मजाक का पात्र बन गईं। उद्योग और व्यापार जगत के प्रतिनिधि सरकार के साथ बैठकें करते हुए अपनी अपेक्षाएं बता चुके थे। लेकिन उन्हें भी लगता था कि पहले घोषित पैकेज की तरह ही झुनझुना पकड़ा दिया जावेगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने जब अपने उद्बोधन के उत्तरार्ध में 20 लाख करोड़ के पैकेज की बात की तो पूरे देश में उत्साह पैदा हो गया। हालांकि इसमें पहले घोषित पैकेज भी शामिल होने से लगभग 13 लाख 50 हजार करोड़ रु. अतिरिक्त मिलेंगे किन्तु श्री मोदी ने जिस तरह से सभी वर्गों का जिक्र किया उससे ये लगा कि पैकेज केवल बड़े लोगों तक सीमित नहीं रहेगा और उसमें किसान, मजदूर, मध्यमवर्ग, छोटे तथा मध्यम कारोबारी, एमएसएमई, और बड़े उद्योग सहित सभी को कुछ न कुछ न कुछ  देने का प्रावधान होगा। प्रधानमंत्री ने पैकेज की विस्तृत जानकारी देने के लिए वित्तमन्त्री निर्मला सीतारमन को दायित्व सौंप दिया। अब सबकी नजर उन पर टिकी रहेगी। प्रधानमंत्री ने विदेशी ब्रांड के पीछे भागने की बजाय भारतीय उत्पादों को महत्व दिये जाने की जो बात कही उससे भारत में बनने वाले सामान के समक्ष मांग का संकट नहीं आयेगा। सबसे बड़ी बात ये होगी कि चीन में बने माल से तबाह हुआ घरेलू उद्योग पुनर्जीवित हो जाएगा। श्री मोदी ने खादी के ब्रांड बनने का जिक्र करते हुए आत्मनिर्भरता, आत्मबल और आत्मविश्वास का समन्वय बनाने की बात कही और कुटीर तथा घरेलू उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करने पर बल दिया। साथ ही उन्होंने कुछ सुधार किये जाने पर भी जोर दिया। उनकी सरकार पर ये आरोप लग रहे थे कि दुनिया के तमाम देशों ने कोरोना संकट के समय आर्थिक गतिविधियों को बल देने के लिए अर्थव्यवस्था का 10 प्रतिशत तक बतौर राहत पैकेज दिया है। लेकिन भारत सरकार ने उसकी तुलना में बहुत ही मामूली राहत दी। लेकिन अर्थव्यवस्था का 10 फीसदी पैकेज देकर प्रधानमंत्री ने आलोचकों को फिलहाल तो ठंडा कर दिया। लेकिन वित्तमंत्री इस राशि का बंटवारा विभिन्न क्षेत्रों में किस तरह करती हैं ये आज शाम 4 बजे से पता लगना शुरू होगा। हालाँकि इस राशि का इंतजाम और राहत के लाभार्थी तक पहुंचने का समय और तरीका अभी तक स्पष्ट नहीं है। लेकिन 18 तारीख के बाद भी अलग रंगरूप वाले लॉक डाउन के स्पष्ट संकेत के साथ अर्थव्यस्था को दोबारा खड़ा करने में ये पैकेज प्राणवायु का काम करेगा ये उम्मीद कारोबारी जगत तो जता ही चुका है और आज सुबह शेयर बाजार ने भी अपनी खुशी जाहिर कर दी। यद्यपि अभी भी लोगों को आशंका है कि नौकरशाही का असहयोगात्मक रवैया इस खुशी को हवा में उड़ा देगा। ऐसे में सरकार को ये देखना होगा कि उसके द्वारा दिया गया पैसा सही हाथ में न सिर्फ  पहुंचे ही बल्कि पूरा हिस्सा उसे मिल सके। कोरोना के साथ जीने की बात दोहराकर श्री मोदी ने ये भी आगाह कर दिया कि मास्क, सैनिटाइजर, सोशल डिस्टेंसिंग और लॉक डाउन हमारी जिन्दगी से लम्बे समय तक जुड़े रहने वाले हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 May 2020

सारा दारोमदार आगामी 15 दिनों के नतीजों पर



अब ये तय हो गया है कि लॉक डाउन में शिथिलता आयेगी। विभिन्न राज्य रेड जोन में भी आर्थिक गतिविधियाँ शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। महाराष्ट्र के बाद कोरोना से सबसे ज्यादा पीड़ित गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने तो लॉक डाउन रखे जाने का ही विरोध प्रधानमंत्री के समक्ष कर दिया। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को केन्द्रीय हस्तक्षेप रास नहीं आ रहा लेकिन वे लॉक डाउन को जारी रखे जाने का समर्थन करती दिखीं। कांग्रेस के तमाम बड़े नेता लॉक डाउन को लेकर शुरू दिन से सवाल करते आये हैं लेकिन पंजाब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने उसे बढ़ाने का फैसला अपने स्तर पर ही कर लिया वहीं कांग्रेस की हिस्सेदारी वाली महाराष्ट्र सरकार के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने तो यहाँ तक कह दिया कि लॉक डाउन हटाने का सवाल ही नहीं उठता। तेलंगाना सरकार श्रामिकों को उनके घर पहुँचाने वाली श्रमिक एक्सप्रेस चलाने का भी विरोध कर रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी भय है कि लाखों बिहारी प्रवासी श्रमिकों की लौटने से कहीं राज्य में कोरोना संक्रमण सामुदायिक स्तर पर न फैल जाए। जो पार्टी जहाँ सरकार में है वहां शराब बिकवाकर राजस्व बटोरने में लगी है लेकिन जहां विपक्ष में है वहां उसे शराब दुकानें खोलने पर सख्त ऐतराज है। कुल मिलाकर संघीय ढांचे के अंतर्गत भारत की विभिन्नता सामने आ रही है। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि सभी राज्यों की परिस्थितियां अलग- अलग हैं। किसी राज्य के लिए लॉक डाउन में सख्ती बेहद जरूरी है तो कुछ को उसे बनाये रखने के साथ ही थोड़ी रियायतें दिया जाना जरूरी लग रहा है। गुजरात चाह रहा है कि सभी प्रवासी श्रमिक लौट जायें उसके पहले ही उसके यहाँ उद्योगों में काम शुरू हो जाए। मप्र में भी उद्योगों को काम करने कह दिया गया है। लेकिन सभी मुख्यमंत्रियों से सलाह के बाद केंद्र सरकार क्या फैसले लेती है इस पर सभी की निगाहें लगी रहेंगी। प्रधानमंत्री ने उनसे 15 मई तक अपने बचे हुए सुझाव लिखित में भेजने के बात भी कही। विगत दिवस लगभग 5 घंटे तक प्रधानमंत्री और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच हुए वीडियो संवाद में एक बात जरुर सभी ने स्वीकार की कि कोरोना का पूरी तरह खात्मा किये बिना भी आर्थिक गतिविधियाँ प्राथमिकता के साथ प्रारम्भ होना ज़रूरी हैं। दूसरी बात जिसका उल्लेख स्वयं नरेन्द्र मोदी ने किया वह है प्रवासी मजदूरों के उनके गाँव तक पहुँचने के बाद कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकना। क्योंकि अब तक गाँव कोरोना से काफी हद तक बचे हुए हैं लेकिन देश के विभिन्न शहरों से भीड़ के रूप में लौटे लाखों मजदूरों को क्या क्वारंटीन किया जा सकेगा ये बड़ा सवाल है। और उससे भी बड़ा ये कि उद्योग-धंधे दोबारा शुरू होने के बाद क्या वे उन्हीं नगरों में काम करने वापिस लौटेंगे जहाँ भूख और बदहाली से पीड़ित होकर वे अकल्पनीय मुसीबातें झेलते हुए जीवित अपने गाँव लौट सके, इस इच्छा के साथ कि मरना है तब क्यों न अपने घरों को लौटकर ही मरें। ये सब देखते हुए आगामी कुछ हफ्ते बेहद तनाव भरे होंगे क्योंकि श्रमिक एक्सप्रेसों के बाद अब नियमित रेल गाड़ियां  सीमित रूटों पर चलाई जा रही हैं जिनके जरिये अपने शहर से बाहर फंसे गैर श्रामिक भी घरों को लौट सकें। विभिन्न कम्पनियों ने अपने कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम की जो सुविधा दी है उसे स्थायी बनाकर एक नई प्रबंधन शैली विकसित करने का प्रयोग चल पड़ा है। यदि ये सफल हुआ तब कार्यालयों की शक्ल और संस्कृति ही बदल जायेगी। लेकिन जब तक कोरोना का प्रसार नहीं रुकता तब तक कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। जिन राज्यों में लॉक डाउन जारी है उन्हें भी उसे खोलने के बारे में विचार करना पड़ सकता है। वहीं जो राज्य उसे शिथिल करने जा रहे हैं उन्हें हो सकता है कदम पीछे खींचना पड़ें। पूरे प्रदेश में तो क्या एक शहर के विभिन्न हिस्सों तक में स्थितियां भिन्न हैं। बीते एक सप्ताह में जिस तेजी से कोरोना के नए मरीज सामने आये उसके कारण खतरे की गम्भीरता और बढ़ गयी। लेकिन ये भी उतना ही जरूरी है कि लोगों की जि़न्दगी को सामान्य किया जाए। ऐसे में अगले दो सप्ताह बेहद निर्णायक होंगे। देश के बड़े भाग में उद्योग व्यापार के अलावा परिवहन भी शुरू किया जा रहा है। राजमार्ग अब सूने नहीं रहे क्योंकि उन पर वाहनों की कतारों के साथ ही मनुष्यों की भी भारी भीड़ है। मई खत्म होने तक आबादी का ये आवागमन तकरीबन पूरा हो जाएगा। और तब ग्रामीण इलाकों में कोरोना का संक्रमण फैलने से किस तरह रोका जा सकेगा इस पर भविष्य निर्भर करेगा। फिलहाल तो सब कुछ प्रायोगिक तरीके से ही हो रहा है। लॉक डाउन को लेकर सभी राज्यों के एकमत नहीं होने से केंद्र के सामने भी दुविधा की स्थिति है। आर्थिक गतिविधियों के बीच लॉक डाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के अंतर्गत शारीरिक दूरी का पालन कैसे होगा ये देखने वाली बात है। यदि 30 मई तक कोरोना की रफ्तार में और तेजी नहीं आई तब तो उस पर नियन्त्रण करने की उम्मीदें बढ़ जायेंगीं अन्यथा लड़ाई का नया तरीका तलाशना पड़ेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी