Saturday, 20 June 2020

कोरोना से पहले ही ये देश भ्रष्टाचार के साथ जीने की आदत डाल चुका है इसीलिये सत्ता बदलती है व्यवस्था नहीं ....





 सोशल मीडिया पर एक मित्र ने भारतीय शासन व्यवस्था पर मुझसे मेरे विचार पूछे | मैं उसे व्यक्तिगत जवाब दे सकता था किन्तु फिर मुझे लगा क्यों न इस गम्भीर विषय पर अपनी राय सभी मित्रों के साथ बांटी जाए | दरअसल भारत की शासन व्यवस्था पर कुछ बोलना या लिखना किसी शोध प्रबंध से कम नहीं है | एक मजाक अक्सर सुना जाता है :- ये देश जिस तरह चल रहा है उसे देखकर बड़े से बड़े  नास्तिक भी एक  पल के लिए  ईश्वरीय सत्ता पर भरोसा करने लग जाते हैं | बाकी सभी देशों में  रामराज हो ये कहना गलत होगा लेकिन हमारे देश में तो सब कुछ राम मय होने के बाद भी रामराज केवल तुलसीदास जी की इस चौपाई में आकर सिमट गया है :- दैहिक  दैविक भौतिक  तापा , रामराज काहू न व्यापा |

नोट गिनने की मशीन आने के पहले अपनी लचर कार्यशैली के लिए कुख्यात देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक में प्रारम्भिक घंटे में आये ग्राहक ने जब नोटों के बण्डल जमा कराने कैशियर को दिए तो सवाल आया क्या रात भर सोये नहीं जो बैंक खुलते ही आ गये | कुछ दिनों बाद वही ग्राहक दोपहर में आया और जब नोटों के बंडल उसी कैशियर को जमा करने दिए तो उलटा  सवाल दागा गया कि क्यों भैया आज क्या देर से सोकर उठे ? चंद अपवाद छोड़कर शायद ही किसी भी सरकारी दफ्तर में समय पर काम   शुरू होता हो | और यदि हो भी जाए तो सुनवाई कितनी देर में होगी ये सुनिश्चित नहीं है | यहाँ तक कि जो न्यायपालिका किसी भी कार्य को करने की समय सीमा तय करती  है वह खुद किसी मामले को कितने दिन में निपटायेगी  ये कोई नहीं  बता सकता |

हमारे देश को शासन और प्रशासन की शैली अंग्रेजों से मिली उसमें काले हिन्दुस्तानी को दोयम दर्जे का मानकर तिरस्कृत करने की जो मानसिकता थी ,  वही आजाद हिंदुस्तान के आम इन्सान के साथ प्रयुक्त की जाती है | कभी -  कभी तो ऐसा लगता है मानों सरकारी  अधिकारी को प्रशिक्षण के समय  सिखा दिया जाता है कि काम नियमानुसार  ही  क्यों न हो किन्तु उसे आसानी से पहली  मर्तबा न किया जावे वरना  प्रशासन का रुतबा नहीं रहेगा | यहीं से सुविधा शुल्क शुरू होता है | 

हमारे देश में सरकार और भ्रष्टाचार समानार्थी शब्द हैं | कुछ लोग उसे शिष्टाचार भी कहते हैं | आजादी के बाद के कुछ वर्षों तक देश में गांधी जी के आदर्शों का पालन करने वाले नेतागण सत्ता और विपक्ष दोनों में थे | प्रशासन में भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग आये जिनका आजादी की लड़ाई से सम्बन्ध रहा | लेकिन एक दशक बीतते - बीतते तक गांधी जी अप्रासंगिक होते गए | सवाल ये उठता है कि भ्रष्टाचार का जन्मदाता नेता है या नौकरशाही ? और इसका सीधा -  सपाट जवाब है कि ये दोनों का संयुक्त उपक्रम है |

कुछ नेता और नौकरशाह आज  के दौर में भी नैतिक मूल्यों का पालन कर रहे हैं | लेकिन उनकी  दशा लंका में रहने वाले विभीषण जैसी  है | शासन व्यवस्था में भ्रष्टाचार का रोना आपको हर उस नेता या सरकारी अधिकारी या कर्मी से मिल जायेगा जो मलाईदार महकमे से वंचित है | किसी पुलिस वाले को  पुलिस मुख्यालय अथवा वायरलैस , होमगार्ड जैसी जगह भेजे जाने पर वह अपने साथ हुए अन्याय का बखान  करने लग जाता है | लोककर्म  या सिंचाई विभाग के इन्जीनियर को  भी दफ्तर में पोस्टिंग सजा लगती है | यही दशा किसी जिले के कलेक्टर की अचानक सचिवालय में पदस्थ किये जाने पर होती है  | पुलिस थानों की तरह ही मंत्रियों के विभाग भी मलाईदार होते हैं | विधायक या सांसद  केवल मंत्रीपद से संतुष्ट नहीं होते | उन्हें ऐसा मंत्रालय चाहिए होता है जिसमें केवल राजयोग नहीं बल्कि धनयोग भी हो |  भ्रष्टचार समूची व्यवस्था में ऐसे वायरस की तरह घुसकर बैठ गया है जिसकी न दवा है और न वैक्सीन | नरेंद्र मोदी ने न खाऊंगा और न खाने दूंगा जैसा वायदा किया था | कहा जाता है उनके राज में केन्द्रीय सचिवालय में होने वाला लेनदेन नियंत्रित हुआ और मंत्रियों के हाथ भी बंधे हुए हैं   लेकिन ज्यों - ज्यों बात  निचले स्तर तक आती जाती है त्यों - त्यों वह  भ्रष्टाचार रूपी प्रदूषण का शिकार होती जाती है |

एक वकील साहब के पास बैठे मुवक्किल ने नये खरीदे भूखंड को सरकारी रिकार्ड में अपने नाम  चढ़वाने की फ़ीस पूछी  | वकील साहब द्वारा बताई गयी  राशि ज्यादा लगी तो उसने कहा कि  भूमि का  नामान्तरण शुल्क तो बहुत मामूली है फिर इतनी फीस किसलिए और तब वकील साहब ने जवाब दिया पटवारी को तलाशने  के लिए | वह उत्तर हमारी शासन व्यवस्था की समूची तस्वीर पेश कर  देता है | ऐसे में शीर्ष पर बैठा शासक भले ही प्रामाणिक हो किन्तु  ज्यों - ज्यों नीति - और निर्णय क्रियान्वयन के स्तर पर नीचे की पायदानों पर आते जाते हैं उनमें विकृति नजर आने लगती है |

किसी बौद्धिक चर्चा में मैंने एक बार कहा कि सरकार अपनी तरफ से जो जनहितकारी नीतियाँ बनाती है वे बादल से निकले पानी की उस बूँद जैसी होती हैं  जिसकी शुद्धता और निर्मलता असंदिग्ध  है | लेकिन वायुमंडल के सम्पर्क में आते ही उसमें प्रदूषण शुरू हो जाता है और धरती पर गिरने के बाद मिट्टी से मिलते ही वह  कीचड़ में तब्दील हो जाती है | वहां उपस्थित एक सेवानिवृत्त नौकरशाह  ने उस व्याख्या की तारीफ करते हुए स्वीकार किया कि वही सत्य है | लेकिन प्रश्न ये है कि क्या केवल प्रशासनिक अमला ही अकेला कसूरवार है ? परिवहन विभाग को सबसे भ्रष्ट माना जाता है लेकिन जब तक सत्ताधारी दल की रैलियों के लिए मुफ्त बसों के इंतजाम की संस्कृति रहेगी तब तक परिवहन अधिकारी को ईमानदार बनाने की कल्पना व्यर्थ  है | किसी शहर के  वीआईपी इलाके  ( सिविल लाइंस ) के थाने में पदस्थ पुलिस  अधिकारी का दर्द सुनने पर समझ में आ जायेगा कि बड़े - बड़े सरकारी बंगलों में रहने वाले अधिकतर  साहब कितनी छोटी सोच के होते हैं |

लेकिन सरकारी अमला बिना राजनीतिक संरक्षण के भ्रष्टाचार नहीं कर सकता | वहीं राजनेताओं को  चुनाव में खर्च होने वाला अनाप - शनाप धन भ्रष्टाचार को गले लगाने बाध्य करता है | ये बात हर कोई महसूस करता होगा कि जैसे - जैसे चुनाव महंगे होते गए , तैसे  - तैसे भ्रष्टाचार भी संस्थागत रूप लेता गया | करोड़ों खर्च कर  विधायक / सांसद बनने वाला मौका मिलते ही वसूली में लग जाता है | जो लोग चुनावी चंदा देते हैं वे  सत्ता पर दबाव डालकर अपने हितों की रक्षा कर लेते हैं | मनचाहे थाने में नियुक्ति के लिए मुंहमांगी घूस देकर आये थानेदार से पुलिस  के ध्येय वाक्य देशभक्ति - जनसेवा की उम्मीद करना मूर्खों के स्वर्ग में रहने जैसा है | यदि नेता का ध्येय जनता की सेवा और सरकारी कर्मचारी का मकसद ईमानदारी से काम करना है तब मलाईदार विभाग का  औचित्य ही क्या है ?

आबकारी आयुक्त जैसे पद की शासन / प्रशासन में क्या अहमियत है ये सर्वविदित है | प्रश्न ये है कि क्या इसमें सुधार संभव है ? इसका जवाब अधिकतर लोगों द्वारा नहीं में दिया जावेगा | लेकिन देश में कानून का राज ईमानदारी से हो जाये और प्रधानमंत्री तथा मुख्यमंत्री पद पर बैठा व्यक्ति ठान ले कि भले ही अगला चुनाव हार जाऊं लेकिन गलत काम नहीं होने दूंगा तो देश को सुधरने में देर नहीं लगेगी | दुर्भाग्य से हमारे देश में सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता की योग्यता का आकलन चुनाव जिताने की उसकी क्षमता से किया जाता है | और इसीलिये भ्रष्टाचार कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है |

चप्पल बनाने वाली कम्पनी के एक विज्ञापन  में एक व्यक्ति दफ्तर के चक्कर लगा - लगाकर परेशान होने के बाद एक दिन झल्लाकर बाबू से कहता है कि आपके आफिस आते - आते मेरी चप्पलें घिस गईं  | ये सुनकर बजाय उस व्यक्ति की समस्या हल करने के वह बाबू  उलाहना देता है कि क्या आपने फलाँ कम्पनी की आफिस चप्पल नहीं खरीदी ?

आज देश में विश्वास का जो संकट  है उसके लिए सियासत , शासन और प्रशासन का गठजोड़ तो जिम्मेदार  है ही लेकिन न्यायपालिका और समाचार माध्यम भी कम जिम्मेदार नहीं है | एक और वर्ग ऐसा है जो टीका टिप्पणी तो भरपूर करेगा किन्तु उससे कुछ होता  - जाता नहीं है और  वह है बुद्धिजीवी |

सत्तर के दशक में मेरे विद्यालय में जबलपुर के प्रख्यात हास्य कलाकार कुलकर्णी बंधु ने किसी विपक्षी नेता के चुनावी भाषण की मिमिक्री ( नकल ) करते हुए कहा कि सत्ता में बैठी पार्टी ने भ्रष्टाचार किया , उसके राज में खूब घपले हुए , भाई - भतीजावाद , लालफीताशाही भी बढ़ी | अबकी बार कृपया हमें मौका दीजिये | हम लोगों ने उनके अभिनय पर तालियाँ बजा दीं | लेकिन जब दुनियादारी की जानकारी हुई तब पता चला उस अभिनय में कितना गहरा  व्यंग्य था | यही वजह है कि हमारे देश में सत्ता बदलती है किन्तु व्यवस्था नहीं  | जिस तरह हमें  कोरोना के साथ जीने की आदत डालने की समझाइश दी जा रही है ठीक वैसे ही बिना कहे भ्रष्टाचार के साथ जीने के लिए दी जा चुकी है |

बावजूद इसके भारत  में क्रन्ति इसलिए नहीं होती क्योंकि सम्पन्न वर्ग को उसकी जरूरत नहीं , मध्यम वर्ग को फुर्सत नहीं  और गरीबों में हिम्मत नहीं |

स्व. काका हाथरसी कई दशक पहले लिख गये थे :-
रिश्वत लेते पकड़ जा, तो रिश्वत दे के छूट |

कांग्रेस और वामपंथी संकट में भी साथ नहीं


 ऐसा लगता है कांग्रेस भी मुख्यधारा से अलग होकर वामपंथियों की तरह मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग वाली कहावत चरितार्थ करने में जुट गयी है | राहुल गांधी के  बेतुके बयानों के बाद गत दिवस उनकी माताश्री सोनिया गंधी ने भी प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई विपक्षी दलों की  बैठक में व्यर्थ के सवाल उठाकर दुनिया भर को ये सन्देश दे दिया कि सीमा पर संकट के समय भी भारत का सबसे बड़ा विपक्षी दल अपने राजनीतिक हितों को ज्यादा महत्व देता है | बैठक में श्रीमती गांधी  ने भी सरकार पर वही सवाल दागे जो वे और राहुल बीते काफी समय से उठा रहे थे | लेकिन बैठक में मौजूद वामपंथी दलों को छोड़कर अन्य सभी ने एक स्वर से सरकार का साथ देते हुए चीन के विरुद्ध सामरिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर कड़े कदम उठाने पर जोर दिया | सबसे बड़ी बात कही राकांपा नेता  शरद पवार ने | उन्होंने बिना नाम लिए राहुल गांधी द्वारा गलवान मुठभेड़ में सैनिकों को निहत्थे भेजे जाने संबंधी सवाल पर कहा कि सैनिक अग्रिम मोर्चे पर हथियार लेकर जाएं या निहत्थे , ये अन्तर्राष्ट्रीय संधि से तय होता है और इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप उचित नहीं है | उल्लेखनीय है श्री पवार की पार्टी महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार में हिस्सेदार है | इसी तरह उस सरकार के मुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भी प्रधानमंत्री को खुला समर्थन देते हुए कहा कि भारत  में दुश्मन की  आँख निकालकर हाथ में देने की  ताकत है | उन्होंने साफ़ किया कि ये समय सियासत का नहीं है | प्रधानमंत्री से बात - बात में भिड़ने  वाली तृणमूल नेत्री  और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी  ने सरकार से  पारदर्शिता की अपेक्षा तो की लेकिन दो टूक कहा कि वे प्रधानमन्त्री के साथ हैं और इस जंग में चीन हारेगा , भारत जीतेगा | बीजू जनता दल , तेलंगाना राज्य परिषद , वाईएसआर कांग्रेस आदि ने भी केंद्र सरकार का समर्थन करते हुए चीन के विरुद्ध सख्ती से निपटने की बात कही | बसपा की ओर से मायावती और सपा के रामगोपाल यादव भी पूरी  तरह प्रधानमन्त्री के साथ खड़े  नजर आये | जनता दल ( यू ) और लोक जनशक्ति पार्टी तो भाजपा की सहयोगी हैं ही  | बैठक में प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी समर्थन हासिल हुआ | लेकिन कांग्रेस की देखासीखी सीपीआई नेता डी. राजा ने चीन के विरुद्ध मुंह खोलने की जगह सरकार को अमेरिका से बचने के सलाह दे डाली | वहीं चीन  की पिट्ठू कही  जाने वाली सीपीएम के सीताराम येचुरी पंडित नेहरु और चाऊ एन लाई के बीच हुए उस पंचशील समझौते के अंतर्गत काम करने की समझाइश  देते रहे जिसके फेर में भारत की  हजारों वर्गमील भूमि चीन के कब्जे में चली गयी | इस तरह कांग्रेस और वामपंथी दलों को छोड़कर तकरीबन सभी ने राष्ट्रीय एकता की खातिर  सरकार के साथ खड़े  होने की बुद्धिमत्ता दिखाई किन्तु कांग्रेस एक बार फिर वक्त की  नजाकत के साथ देश  के मूड को भांपने में चूक गयी | उसकी सहयोगी पार्टियों तक ने उसे तिरस्कृत कर  दिया | शरद पवार द्वारा  परोक्ष रूप से राहुल पर किये कटाक्ष को इसीलिये काफ़ी प्रचार मिला | पूर्व में रक्षामंत्री रहे राकांपा नेता ने ये जाहिर  कर दिया कि राजनीतिक परिपक्वता क्या होती है ? मुख्यधारा से पूरी तरह कटने के कारण वामपंथी दलों का महत्व तो वैसे भी बचा नहीं है | और फिर उनके  माई - बाप कहे जाने वाले  साम्यवादी चीन के विरुद्ध बोलने की हिम्मत उनसे अपेक्षित भी नहीं थी | इसीलिये श्री राजा और श्री येचुरी ने  विषय से इतर बातें कीं | लेकिन कांग्रेस का रवैया वाकई उसके राजनीतिक खोखलेपन को प्रमाणित कर गया |  जिस तरह के प्रश्न राहुल उठाते रहे और कल सोनिया जी ने भी पूछे उनसे कांग्रेस की छवि जनमानस में और गिर गई | बैठक पहले बुलाये जाने की उनकी मांग का भी कोई औचित्य नहीं था | सरकार और सेना ने संकट को सुलझाने और  सीमा पर  अपनी स्थिति मजबूत करने के कूटनीतिक और सामरिक प्रबंध करने के बाद बैठक इसलिए बुलाई जिससे विपक्ष को एक साथ पूरी जानकारी दी जा सके | लेकिन सोनिया जी सरकार को घेरने के चक्कर में सेना का मनोबल तोड़ने की गलती कर बैठीं | वैसे उनसे श्री मोदी की प्रशंसा या समर्थन की उम्मीद कोई नहीं करता किन्तु ऐसे मौकों पर व्यक्ति नहीं देश सर्वोपरि होता है | बैठक में रक्षा और विदेश मंत्री ने उपस्थित विपक्षी नेताओं को कूटनीतिक और सैन्य जानकारी दी | प्रधानमंत्री ने खुले शब्दों में कहा कि हमारी सीमा में कोई नहीं घुसा | उन्होंने सीमा पर चल रहे तनाव का कारण बताते हुए कहा कि उस पहाड़ी क्षेत्र में सड़क आदि बनने से पूरे इलाके में हमारी निगरानी बढ़ी  और चीन के सैनिकों की स्वछन्द आवाजाही पर  नियन्त्रण लगा जिससे वह बौखलाया हुआ है | श्री मोदी ने साफ़ किया कि चीन को ये सन्देश दे दिया गया है कि भारत , थल , जल और नभ हर जगह निपटने तैयार है | गलवान घाटी में हुए संघर्ष  में भी हमारे जवानों ने पलटवार कर चीनियों को अच्छा सबक सिखाया | कुल मिलाकर विपक्ष के साथ हुई उक्त बैठक से एक तरफ तो ये सन्देश गया कि संकट  के  इस समय अधिकाँश विपक्ष सरकार के साथ खड़ा है | लेकिन कांग्रेस और वामपंथी  निहित राजनीतिक स्वार्थों की खातिर अपनी  ढपली अलग से बजाने में लगे हुए हैं क्योंकि  देश की एकता शायद उनकी प्राथमिकता नहीं है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 19 June 2020

हिटलर वाली गलती दोहरा बैठे जिनपिंग दुनिया पर राज करने के फेर में चीन की सत्ता ही न गंवा दें

हिटलर वाली गलती दोहरा बैठे जिनपिंग

दुनिया पर राज करने के फेर में चीन की सत्ता ही न गंवा दें

कोरोना के विश्वव्यापी प्रसार के साथ ही चीन पर उँगलियाँ उठने लगीं | हालांकि अब तक ये साबित नहीं हो सका कि इसके पीछे चीन का षडयंत्र था । लेकिन इस वायरस की जानकारी विश्व समुदाय को देर से देने का आरोप जरुर उस पर है | प्रारम्भ में  कोरोना को चीन द्वारा जैविक हथियार बनाकर  तीसरे विश्व युद्ध का पूर्वाभ्यास किये  जाने की आशंका व्यक्त की गयी |  कुछ लोगों ने उसे  अतिशयोक्ति बताते हुए हवा में उड़ा दिया किन्तु  जब चीन ने कोरोना की उद्गम स्थली वुहान की लेबोरेट्रीज के निरीक्षण के साथ अपने यहाँ कोरोना संक्रमित हुए लोगों विशेष रूप से मरने वालों की जानकारी छिपाई  तब संदेह गहराने लगा | और फिर तो बात यहाँ तक बढ़ी कि विश्व स्वास्थ्य संगठन तक चीन का बचाव  करने के कारण विवादग्रस्त हो गया |

जब यूरोप और अमेरिका सहित बाकी देशों में कोरोना चरम पर था तब चीन ने उससे मुक्त होने का दावा करते हुए पीड़ित देशों की सहायता का नाटक भी रचा | तभी विश्व समुदाय को लगा कि चीन सबकी अर्थव्यवस्था चौपट करने के बाद अपना आर्थिक साम्राज्य स्थापित करने की  रणनीति पर चल रहा है | दुनिया की सभी बड़ी सामरिक और आर्थिक महाशक्तियां बीते अनेक महीनों से कोरोना से जूझने में व्यस्त होने से चीन के  राष्ट्रपति शी जिनपिंग को दुनिया का चौधरी बनने के सपने आने लगे |

उसने ताईवान को चारों तरफ  से घेरने के साथ ही हांगकांग के लिए विवादास्पद कानून पारित करते हुए अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी को ठेंगे पर रखने के इरादे दिखा दिए | जिस वियतनाम ने चीन की मदद से  अमेरिका के  विरुद्ध विजय हासिल की  वह भी चीन के विस्तारवादी रवैये के कारण उसका  शत्रु बन बैठा | जबकि वह भी साम्यवादी देश ही है  | कम्बोडिया , इंडोनेशिया , फिलीपींस और दक्षिण कोरिया ही नहीं अपितु जापान और ऑस्ट्रेलिया तक चीन की दादागिरी से भयभीत हैं | मंगोलिया पर भी उसकी  गिद्ध दृष्टि  है | रूस कभी - कभार अमेरिका के विरोध की  खातिर उसका साथ दे देता है लेकिन वह भी उसकी बढ़ती ताकत को पसंद नहीं करता |

चीन के पड़ोस में भारत जैसी उभरती हुई महाशक्ति भी है जिससे उसके व्यापारिक सम्बन्ध मजबूत होने के अलावा शीर्षस्थ नेताओं के स्तर पर संपर्क और संवाद भी अच्छा रहा है | लेकिन उसने भारत के सभी पड़ोसियों को किसी न किसी एहसान के तले दबाकर उसके  साथ खड़े होने से रोक दिया | केवल बांग्ला देश और म्यांमार ही हैं जो अभी भी भारत के प्रति द्वेषभाव  नहीं दिखा रहे | रही बात नेपाल की तो वहां राजशाही का अंत होते ही जो साम्यवादी सरकार बनी वह चीन द्वारा प्रायोजित थी | पाकिस्तान तो खैर उसका दत्तक पुत्र जैसा  है | जिनपिंग को लगता था कि वे नरेन्द्र मोदी के साथ याराना कायम कर अपनी वन बेल्ट वन रोड परियोजना को पूरा कर लेंगे | लेकिन ऐसा नहीं हुआ | भारत ने चीन के इस महत्वाकांक्षी अभियान में शामिल होने से  इंकार कर दिया | और तो और जिस अक्साई चिन से वह गुजरने वाली है उसे अपना भूभाग बताकर विरोध भी जता दिया | इस कारण वन बेल्ट वन रोड प्रकल्प चीन के गले की हड्डी बन गया है |  

इस तरह भारत उसकी आँखों में चुभ रहा था | चीन से सटी सीमा पर सड़क , पुल , हवाई पट्टी आदि के विकास के अलावा मोदी सरकार ने बीते छह सालों में सेना के लिए जिस बड़े पैमाने पर अस्त्र - शस्त्र , तोपें , रडार प्रणाली , हेलीकाप्टर , लड़ाकू विमान खरीदे उसके कारण भी उसे भारत में अपना प्रतिद्वंदी नजर आने लगा |  इसलिए वह राजनयिक और व्यापारिक सम्बन्धों को बनाये रखते हुए भी भारत की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करता रहा | डोकलाम जैसी हरकतें तो आये दिन होती रही हैं |

दरअसल चीन कोरोना काल में कुछ ज्यादा ही उड़ने लगा और उसने आपदा के इस दौर में अमेरिका के भीतर अश्वेत समुदाय के अफ्रो - अमेरिकन लोगों को भड़काकर भयंकर दंगे करवा दिए | अमेरिका में कार्यरत चीनी कम्पनियों द्वारा  कतिपय वामपंथी उग्रवादियों के जरिये दंगाइयों को भरपूर मदद की गयी | जिससे अमेरिका में गृह युद्ध के हालात  बन गये | स्मरणीय है वामपंथियों द्वारा ऐसी ही स्थिति भारत में भी नागरिकता संशोधन कानून और जनसँख्या रजिस्टर के विरोध में उत्पन्न कर दी गई थी | दिल्ली स्थित शाहीन बाग़ में चला धरना इसका बड़ा उदाहरण था |

चीन को भारत का अमेरिका के करीब जाने का पैंतरा भी घोर आपत्तिजनक लगता है | कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने  के साथ ही लद्दाख को केंद्र शासित राज्य बनाये जाने से भी उसके पेट में जबरदस्त मरोड़ उठा | इसे संरासंघ में उठाने की कोशिश भी उसने की किन्तु  पाकिस्तान के अलावा उसे मलेशिया और टर्की भर का  समर्थन मिला | यहाँ तक कि प्रमुख अरब देशों तक ने भारत का साथ दिया |

 
कोरोना के कारण विश्व बिरादरी में पूरी तरह अलग थलग पड़ चुके चीन की सबसे बड़ी नाराजगी अमेरिका द्वारा भारत को जी 7 देशों की बैठक में बुलाये जाने पर है | उसने भारत पर `अमेरिका की चाल में फंसने का आरोप लगते हुए परिणाम भुगतने की चेतावनी तक दे डाली | नरेंद्र मोदी द्वारा आस्ट्रेलिया के साथ प्रशांत  महासागर में संयुक्त सैन्य अभ्यास की तैयारी भी उसे नागवार गुजर रही है |

 जब उसे ये लगा कि एक तो भारत उसकी किसी भी  आपत्ति को भाव नहीं दे रहा और उलटे पाक अधिकृत कश्मीर के गिलगित , बाल्टिस्तान और चीन  के कब्जे वाले अक्साई चिन को हासिल करने इरादा खुले आम व्यक्त कर रहा है तो वह बौखला उठा | लगभग दो महीने से भारतीय सीमा पर अचानक सैन्य गतिविधियाँ बढ़ाने के पीछे उसका मकसद किसी न किसी तरह भारत को घुटनाटेक करवाकर अमेरिका से दूर करना था | परन्तु भारत ने  जबरदस्त मोर्चेबंदी करते हुए बराबरी की  टक्कर की स्थितियां पैदा कर दीं | बीते  15 जून को गलवान  घाटी में हुई मुठभेड़ से जहाँ चीन का छिछोरापन जाहिर हुआ  वहीं  उसे भारत की सामरिक शक्ति और आत्मविश्वास का भी एहसास हो गया |

संभवतः  कोरोना के कारण तमाम शक्तिशाली और सम्पन्न देशों की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा जाने से उत्साहित चीन  को ये लगने लगा कि अब वह कुछ भी कर सकता है | लेकिन कहावत है कि होशियार कौआ भी कभी - कभी गलत जगह बैठ जाता है | आज  जिनपिंग की भी स्थिति वैसी ही है | एक साथ ही हांगकांग , ताईवान , अमेरिका , भारत , वियतनाम और आस्ट्रेलिया आदि से एक साथ पंगा लेने के बाद अब वह बुरी तरह फंस गया है | उसका आर्थिक ढांचा अन्य देशों के सामान का उत्पादन करने पर टिका हुआ है | कोरोना के बाद अनेक बड़े ब्रांड वहां से कारखाना समेटकर वियतनाम , इंडोनेशिया , थाईलेंड , भारत आदि जाने की तैयारी कर रहे हैं | अमेरिका ने भी अपने सभी समर्थक देशों से चीन में किये  निवेश को वापिस लेने कह दिया है | जापान ने तो चीन छोड़ने वाली   कम्पनियों को भारी प्रोत्साहन राशि देने का आश्वासन दिया है |

इधर भारत में जिस तरह से जनता में चीन विरोधी  भावनाएं जोर पकड़ रही हैं उनसे चीन भी परेशान है | तभी वह बातचीत के जरिये विवाद सुलझाने की बात कर रहा है किन्तु गलवान में जो कुछ हुआ और भारत ने जिस तरह उस पर कड़क रवैया अख्तियार किया उसके बाद से चीन बुरी तरह फंस गया है |

उसे ये लगता था कि कोरोना संकट से घिरा होने से विश्व भारत के साथ खड़े होने लायक नहीं रहेगा | और वह खुद भी इस महामारी के कारण सीमा पर अपेक्षित ताकत नहीं  दिखा सकेगा । लेकिन उसे निराशा हाथ लगी |
इस प्रकार कोरोना के कारण हलाकान हुई दुनिया को अपनी मर्जी से हांकने का जिनपिंग का इरादा चीन के लिए मुसीबत का सबब बन गया है |  हांगकांग के साथ ही ताईवान को हड़पने की उसकी चाल के विरुद्ध दुनिया भर लामबंद हो रही है । वहीं  तिब्बत की आजादी भी एक बार फिर विश्व राजनीति में चर्चा का विषय बन रही  है | अमेरिका ने हांगकांग के अलावा चीन में  उईगर  मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों का मामला उठाकर भी जिनपिंग की चिंता बढ़ा दी है |

कुल मिलाकर कोरोना में उलझी दुनिया पर अपना झंडा फहराने के फेर में चीन गहरे दलदल में जाकर फंस गया है | अभी तक उसकी आर्थिक तरक्की से प्रभावित देशों को उसकी धूर्तता समझ में आते ही सभी उससे दूर रहने की मानसिकता पाल बैठे हैं | बड़ी बात नहीं दुनिया पर राज करने की जल्दबाजी  में जिनपिंग अपने देश में ही सत्ता से हाथ न धो बैठें | 

एक साथ सभी मोर्चे खोलने के कारण वे भी हिटलर वाली गलती दोहरा बैठे हैं |

-रवीन्द्र वाजपेयी

सुरक्षा में सियासत राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध




आज प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी विपक्षी दलों के चुनिन्दा नेताओं से चर्चा करते हुए सीमा पर उत्पन्न हालातों की जानकारी देंगे। काफी समय से विपक्ष सरकार से मांग कर रहा था कि उसे भी इस बारे में अवगत करवाया जाए। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के अलावा उनकी माताश्री सोनिया गांधी तो लगातार सरकार पर सवाल दागते रहे । प्रधानमन्त्री की चुप्पी पर भी तंज कसे गए। 15 जून की घटना को लेकर भी कांग्रेस सरकार पर हमला करने से नहीं चूकी। लद्दाख में चीनी सेना की भारतीय भूभाग में घुसपैठ के अलावा नेपाल द्वारा भारत के कुछ सीमावर्ती गाँवों पर अपना कब्जा दिखाते हुए उन्हें अपने नक़्शे में शामिल किये जाने पर भी मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाये जाने लगे। लेकिन राहुल गांधी द्वारा पूछे जाने वाले सवाल उन्हीं के गले पड़ गए। गत दिवस उनके इस प्रश्न की खूब भद्द पिटी कि 15 जून को हुई हिंसक मुठभेड़ में शामिल हुए भारतीय सैनिकों को निहत्था क्यों भेजा गया? जवाब में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बताया कि चीन के साथ संधि के कारण सीमा पर चूँकि अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग वर्जित है इसलिए अपनी पोस्ट से निकलते समय पास में हथियार रखने के बावजूद हमारे सैनिकों ने उनका प्रयोग नहीं किया। 15 जून की घटना का विस्तृत विवरण अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ है। ऐसे मामलों में सेना और सरकार दोनों ही काफी संभलकर बयान देते हैं क्योंकि उनका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संज्ञान लिया जाता है। एक शब्द भी इधर का उधर होने से कूटनीतिक जगत में उसका असर होता है। चीन ने पहले ही भारतीय सेना पर वास्तविक नियन्त्रण रेखा पार कर भड़काऊ कार्रवाई करने का आरोप लगाते हुए सरकार को उसे काबू में रखने की समझाइश दे डाली। उक्त घटना में चीनी सेना के बहशियाना तौर-तरीकों के साक्ष्य जुटाना भी कठिन कार्य है। क्योंकि साधारण धक्का - मुक्की के तो वीडियो बन जाते हैं किन्तु जहाँ लाशें गिर रही हों और बर्फीली नदी में कमर तक डूबे हुए शत्रुओं से लड़ाई चल रही हो तब उसकी शूटिंग भला कौन करता? उक्त हादसे में घायल सैनिकों के इलाज के साथ ही उनसे विस्तृत जानकारी लिए बिना सार्वजनिक तौर पर कुछ बोलना गैर जिम्मेदाराना होता। इसीलिये सेना और सरकार दोनों ने बहुत ही संयम के साथ जानकारी और प्रतिक्रिया व्यक्त की। ऐसे में बेहतर होता राहुल गांधी सही समय की प्रतीक्षा करते। लेकिन वे भूल गए कि भारत और चीन के बीच एलएसी पर शस्त्रों का उपयोग नहीं करने की संधि कांग्रेस की केंद्र सरकार के दौर में ही हुई थी। जिस सैन्य टुकड़ी के साथ चीनी सैनिकों की झड़प हुई वह शस्त्र लेकर निकली या निहत्थी थी ये मौके पर तैनात सैन्य अधिकारी ने तय किया होगा। केंन्द्र सरकार सेना के दैनिक प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं करती। जिस कमांडिंग आधिकारी की अगुआई में सैन्य दल गश्त पर निकला और चीनी सैनिकों से पीछे हटने के लिए बातचीत कर रहा था वह चूँकि मुठभेड़ में मारा गया इसलिए बहुत सारी बातें उसी के साथ चली गईं। जो सैनिक घायल हैं उनसे भी सेना अपने ढंग से पूछताछ कर रही होगे। केंद्र सरकार, रक्षा और विदेश मंत्रालय ऐसे अवसरों पर अतिरिक्त दबाव में काम करते हैं। चूँकि स्थिति बेहद नाजुक है और जिस इलाके में सैन्य गतिविधियां हो रही हैं वह भारत के लिए बेहद सामरिक महत्त्व का है इसलिए चीन भी हर तरह से दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। ये सब देखते हुए विपक्ष विशेष रूप से राहुल को थोड़ा  धैर्य और जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। अत्यंत विषम परिस्थितियों में सेना और सरकार दोनों अपना काम कर रहे है। निश्चित तौर पर राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही बनती है लेकिन उसके लिए भी उपयुक्त समय देखना चाहिए। गलवान घाटी की घटना में भले ही दोनों देशों के सैनिक आपस में भिड़े तथा दोनों तरफ से दर्जनों मौतें भी हुई लेकिन फिर भी उसे युद्ध नहीं माना जायेगा। इसीलिये प्रधानमंत्री के बयान का कोई औचित्य नहीं था। और फिर सेना के प्रवक्ता ने जानकारी दे ही दी थी। संभवत: सरकारी बयान में देरी के पीछे पहला कारण तो ये था कि 16 जून की सुबह से ही सैन्य कमांडरों की बातचीत शुरू हो गई थी और दूसरा मृतकों एवं घायलों की गणना के साथ ही कुछ सैनिकों के लापता होने से ये आशंका पैदा हो गयी कि वे चीनी सेना के कब्जे में न हों। अब जबकि सैन्य , कूटनीति और राजनीतिक स्तर पर समूची जानकारी आ चुकी है और सरकार ने जो हुआ और जो आगे संभावित है उसको लेकर अपनी तैयारी कर ली तब प्रधानमन्त्री विपक्ष से मुखातिब हो रहे हैं। और यही सही तरीका है। बीते दो - तीन दिनों में श्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के कुछ चित्र सोशल मीडिया पर खूब छाये रहे। उनका उद्देश्य विदेश नीति की विफलता को उजागर करना था। लेकिन गत दिवस सोनिया गांधी और राहुल के चीनी हस्तियों के साथ चित्र भी प्रसारित होने लगे। इस तरह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े बेहद संवेदनशील गम्भीर मुद्दे पर भी दलगत राजनीति रूपी कालिख पुत गई। गलवान घाटी में हमारे 20 सैनिकों की मौत निश्चित तौर पर राष्ट्रीय क्षति है लेकिन लगे हाथ इस बात का भी जमकर प्रचार होना चाहिए कि हमारे सैनकों ने अपने से पांच गुना ज्यादा होने पर भी चीनी सेना को जबरदस्त नुकसान पहुंचाते हुए उनके 40 से भी ज्यादा मार गिराए। भारतीय सेना के इस पराक्रमी प्रदर्शन का जितना ज्यादा प्रचार होगा देश का मनोबल उतना ही बढेगा। उस लिहाज से राहुल और उनके निकटस्थ नेतागण थोड़ा संयम तथा जिम्मेदारी का परिचय दें तो उनकी साख बढ़ने के साथ ही देश की एकता का भी प्रदर्शन होगा। लद्दाख सहित चीन से सटी समूची सीमा पर बीते कुछ सालों में जिस तरह का शानदार निर्माण कार्य हुआ उसकी प्रशंसा और चर्चा देश भर में होना चाहिए। जिससे देशवासी आश्वस्त हो सकें। और यही चीन की नाराजगी की मुख्य वजह भी है। राजनीतिक हित बेशक किसी नेता की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है किन्तु जहां राष्ट्रहित सामने हो वहां बाकी सारा कुछ महत्वहीन हो जाता है। विशेष रूप से सुरक्षा संबंधी मामलों में तो सियासत की कोई गुंजाइश ही नहीं होती। इस सत्य को राहुल और उन जैसे अन्य नेता जितनी जल्दी समझ जाएं उतना अच्छा। सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट अभियान पर सवाल उठाने का दुष्परिणाम उन्हें याद रखना चाहिए। विपक्ष की अहमियत भी तभी स्वीकार्य होती है जब वह दायित्वबोध का पालन करता हो अन्यथा वह जनता का विश्वास अर्जित करने में विफल रहता है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 18 June 2020

दूसरे की लकीर काटने से बेहतर है बड़ी लकीर खींचना भारतीय उद्योगों के पुनर्जीवित होने का स्वर्णिम अवसर





भारत और चीन के बीच का अंतर  खुलकर सामने आ गया है | एक तरफ हमने अपने शहीदों के नाम - पते जगजाहिर कर दिए और उनके ससम्मान किये गये अंतिम संस्कार के दृश्य भी प्रसारित हुए |  लेकिन दूसरी तरफ चीन गलवान घाटी में हुए खूनी  संघर्ष में मारे गए उसके  सैनिकों की संख्या या नाम पूछे जाने पर भी नहीं बता रहा | मुठभेड़ के विवरण को सार्वजनिक  करने में भी उसे तकलीफ हो रही है | दूसरी तरफ भारत में विपक्ष और समाचार माध्यम  सरकार पर बिना डरे गोले दागते हुए वह सब जानना चाहते हैं जो अब तक संभवतः सुरक्षा के मद्देनजर जाहिर नहीं किया गया | 

लेकिन इस बहाने चीन से रिश्तों को  लेकर देश में जो बहस जनता के स्तर पर चल पड़ी है वह शुभ संकेत है | नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत और चीन के रिश्तों में  आई मजबूती के मद्देनजर उन पर कूटनीतिक विफलता के आरोप खुलकर लग रहे हैं  | चीन  के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ झूला झूलने और महाबलीपुरम के समुद्र तट पर स्थित मन्दिरों में घूमने वाले चित्र भी  खूब प्रसारित हुए | लेकिन चीन में इसे लेकर वही सामने आया जो  या तो सरकारी प्रवक्ता ने बताया या फिर सत्ता नियंत्रित मुखपत्र में प्रकाशित हुआ | चीन में चूंकि विपक्ष नहीं होता इसलिए भारत सरीखी राजनीतिक बयानबाजी तो कल्पना से परे है | जनता तो अपनी राय सार्वजनिक तौर पर व्यक्त कर  ही नहीं सकती | ये भी तब है जब चीन पूरी तरह पूंजी के खेल में शामिल हो चुका है | 

आज के चीन में साम्यवाद केवल सत्ता के केन्द्रीकरण और विरोध का गला घोंटने तक सीमित  है | चीन की बड़ी - बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अमेरिका सहित समूची दुनिया में पूंजी निवेश करने में अग्रणी हैं | और भारत भी उनका बड़ा केंद्र है | चीनी उत्पाद यहाँ आयात भी होते हैं और मेक इन इंडिया नीति के अंतर्गत उनका उत्पादन यहीं होता भी है |विश्व व्यापार संगठन से जुड़ने के बाद चीन और भारत के बीच व्यापार में अकल्पनीय तेजी आई | सस्त्ती उपभोक्ता चीनी वस्तुओं से भारत के लगभग  बाजार लबालब हो गये | सुई से लेकर बड़े - बड़े उपकरण तक चीन से आने लगे | 

इसके साथ ही वहां की  कम्पनियों ने भारत में पूंजी निवेश करते हुए यहाँ के व्यापार में  भी कदम बढ़ाया  | ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिसमें चीनी कम्पनियां काम न कर रही हों | वैश्विक अर्थव्यवस्था और उदारवाद के चलते ये असामान्य नहीं है | लेकिन दुष्परिणाम ये हुआ कि भारत में उत्पादन इकाइयों का व्यवसाय चौपट हो गया | चीन में बना कौन सा  सामान भारत नहीं आता ये बता पाना कठिन है | भारतीय उद्योगों को इससे जबर्दस्त नुकसान हुआ और अधिकाँश में ताले लटक गए | नौबत यहाँ तक आ गई कि भारत के देवी - देवताओं के चित्र और घरों में पूजी जाने वाली मूर्तियाँ तक मेड इन चायना आने लगीं | दीपावली पर जलाये जाने वाले दिये और चीनी आतिशबाजी भी भारत के बाजारों में छा गई |

और तो और अमेरिका जैसे देश की कम्पनी के सामानों पर भी मेड इन चायना की सील लगने लगी क्योंकि उनका उत्पादन वहां होता है | कहने का आशय ये कि चीनी सामान के बिना रोकटोक आयात ने भारत के व्यापारी को तो खूब कमाई करवाई | आम जनता को भी सस्ते दामों पर अपनी जरूरत का हर सामान सुलभ हो गया | लेकिन इसकी वजह से उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करने वाली इकाइयों का भट्टा बैठ गया | इस वजह से बेरोजगारी भी बढ़ी | साथ ही साथ इसका दूरगामी असर सरकारी कम्पनियों पर भी हुआ | बड़े - बड़े ठेकों में चीनी कम्पनियों ने सरकारी क्षेत्र के उद्यमों को बाहर कर दिया | इन्फ्रास्ट्रक्चर और  बड़े सरकारी निर्माण प्रकल्पों में चीनी कम्पनियों ने जबरदस्त प्रतिस्पर्धा उत्पन्न  करते हुए भारत सरकार के अपने संस्थानों का काम तक छीन लिया |

कालान्तर में ज्योंही वैश्वीकरण और उदारवाद का हनीमून काल पूरा हुआ  तब समझ  में आया कि चीन  के साथ उन्मुक्त व्यापार की  कितनी महंगी कीमत भारत को चुकाना  पड़ी | लेकिन रातों - रात इस स्थिति को बदलना सम्भव नहीं था |  लिहाजा सब कुछ जानते हुए भी न सरकार कुछ कर सकी और न ही पीड़ित  भारतीय औद्योगिक इकाइयाँ | और फिर भारत और चीन  के बीच व्यापार का संतुलन पूरी तरह इकतरफा हो गया | इसके विरोध में जब भी स्वदेशी की मांग उठी  उसे अव्यवहारिक मानकर मजाक का पात्र बना दिया गया | लेकिन कोरोना के आते ही  आम धारणा ये बन गई कि कोरोना वायरस चीन द्वारा फैलाई गयी महामारी है | जिसके जरिये वह समूचे विश्व की  अर्थव्यवस्था को चौपट करते हुए अपना आर्थिक साम्राज्य स्थापित करना चाह रहा है  |

ऐसे में भारत के प्रधानमन्त्री द्वारा आत्मनिर्भरता के आह्वान के साथ जब ग्लोबल ब्रांड की बजाय लोकल ब्रांड को प्रोत्साहित करने जैसी बात कही तब उसे सीधे - सीधे चीन पर साधा गया निशाना समझा गया | भारतीय सूक्ष्म , लघु और मध्यम उद्योगों ( MSME )  को बढ़ावा देने के लिए जिस पैकेज का ऐलान हुआ,  उसे भी भारतीय  बाजारों से मेड इन चायना उत्पादों को बाहर करने की योजना से जोड़ा गया | इसी बीच सीमा पर चीन द्वारा शुरू  की गईं सैन्य गतिविधियों ने आग में घी का काम किया | और रही - सही कसर पूरी कर दी बीते 15 जून को गलवान घाटी में हुई हिंसक मुठभेड़ ने | उसके  बाद से देश में चीनी सामान के बहिष्कार का एक स्वप्रेरित आंदोलन खुलकर सामने आ गया | केंद्र सरकार ने भी  बीएसएनएल में 4 जी प्रणाली हेतु चल रहे काम में चीनी सामान के उपयोग को रोक दिया | रेलवे ने एक चीनी कम्पनी से करार रद्द कर दिया | 200 करोड़ से कम के टेंडर में विदेशी कम्पनियों को हिस्सा लेने से रोकने का फैसला भी हो गया | सरकारी खरीद में मेड इन इण्डिया को प्राथमिकता के निर्देश जारी हो गये | इस सबके पीछे सतही उद्देश्य तो चीन पर  दबाव  बनाते हुए  भारत विरोधी रवैया छोड़ना कहा जा सकता है लेकिन ये पूर्ण सत्य नहीं है |

यदि गलवान प्ररकरण न हुआ होता तब भी ये होने वाला ही था | लेकिन इसके जरिये चीन को नुकसान पहुँचाने की सोच नकारात्मक है | चीन के बहिष्कार का सकारात्मक पक्ष भारत के छोटे और मध्यम आकार के उद्योगों को पुनर्जीवित करना है | 

इसे दूसरे की लकीर को काटने की बजाय स्वयं उससे बड़ी लकीर खींचना भी कहा जा सकता है , और इसमें गलत  कुछ भी नहीं | ठोकर खाकर सीखने या जब जागे तब सवेरा जैसी कहावत जैसी कहावतें भी यहाँ प्रासंगिक हो जाती हैं | हालांकि स्वदेशी के नाम पर चीनी वस्तुओं के बहिष्कार को जल्दबाजी में उठाया जाने वाला कदम बताने वाले भी कम नहीं हैं  | ऐसे लोगों का मानना है कि घरेलू उद्योग अभी लोगों की जरूरतों को पूरा कर पाने में अक्षम हैं और चीन से आयात को रोका गया तब भारतीय बाजारों में जरूरी चीजों का अभाव हो जाएगा | सबसे बड़ी समस्या दवाइयों में प्रयुक्त होने वाले कच्चे माल की होगी | इलेक्ट्रानिक्स , ऑटोमोबाइल , कम्प्यूटर , मोबाईल , निर्माण सामग्री जैसी अनगिनत चीजों के लिए चीन पर हमारी निर्भरता स्वदेशी को पूर्ण रूप से अपनाने की राह में बड़ी बाधा बन सकती है | लेकिन ये भी सही है कि जब तक सस्ता चीनी सामान आता रहेगा  भारतीय उद्योग नहीं पनप सकेंगे |

बेहतर होगा  कोरोना नामक आपदा में अवसर तलाशने की सोच को हौसले के पंख दिए जाएँ | ये लक्ष्य कभी न कभी तो हासिल करना ही पड़ेगा | लेकिन इसके पहले कि वह असंभव हो जाये हमें उसकी तरफ कदम बढ़ा देना चाहिए | मंगल और चन्द्रमा की सतह को छूने के अभियान  , दौलत बेग ओल्डी बेग में दुनिया की सबसे ऊँचाई पर हवाई पट्टी का निर्माण  , गलवाल घाटी जैसी दुर्गम जगह सड़क बनाने जैसे चमत्कार भी कभी व्यर्थ और असम्भव लगते थे  | लेकिन अब वे हमारी गौरव गाथा के अध्याय हैं |

 दरअसल स्वदेशी कोई प्रतिक्रियावादी कदम नहीं वरन भारत को सही मायनों में वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने का आधार बनेगा | बेहतर हो इसे रचनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए न कि किसी को चिढ़ाने  या हानि  पहुँचाने के | जहाँ तक बात चीन की हेकड़ी दूर करने की है तो उसके लिए हमारी सरकार और सेना पूरी तरह सक्षम हैं | और जब देश का सवाल आता है तब राजनीतिक मतभेद भी महत्वहीन हो जाते हैं |

चीन ने हमारी सीमा पर जिस ओछी सोच का परिचय दिया वह एक सुअवसर है , अपनी सोयी हुई  शक्ति को जाग्रत करने का | यदि इसका लाभ न लिया जा सका तो फिर उसके लिए किसी और को दोष देना गलत होगा |

चीनी सामान:सरकार आगे बढ़े जनता साथ है



बीते सोमवार को लद्दाख क्षेत्र में हुए खूनी संघर्ष के बाद भारत और चीन के बीच मेजर जनरल स्तर की बातचीत बेनतीजा रही। चीन की तरफ  से गलवान घाटी को अपना हिस्सा बताने के साथ ही दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की फोन पर हुई बातचीत में भी आरोपों का आदान-प्रदान ही हुआ। जब ये साफ  हो गया कि चीन को हिंसक मुठभेड़ का कोई अफसोस नहीं और उलटे वह भारत को ही कठघरे में खड़ा करने पर आमादा है तब फिर प्रधानमंत्री का बयान आया जिसमें उन्होंने शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाने के अलावा उकसाए जाने पर माकूल जवाब देने की बात कही। उस बयान के बाद  ही सीमा पर सेना की तैनाती और सतर्कता और बढ़ा दी गयी। चीनी घुसपैठ की आशंका वाले सीमावर्ती गांवों को खाली करवाया जा रहा है। चीन के सरकारी मीडिया द्वारा भारत को पाकिस्तान और नेपाल की तरफ  से भी सैनिक प्रतिरोध का सामना करने के चेतावनी दिये जाने से स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान द्वारा लगातार युद्धविराम के उल्लंघन के अलावा नेपाल की तरफ  से पैदा किये गये नक्शा विवाद के पीछे भी चीन की ही रणनीति काम कर रही है। बहरहाल सीमा पर चौकसी बढ़ाए जाने के साथ ही केंद्र सरकार ने गत दिवस एक बड़ा निर्णय लेते हुए बीएसएनएल (भारत संचार निगम लिमिटेड) में 4 जी संबंधी चीनी उपकरणों के उपयोग पर रोक लगा निजी कंपनियों को भी वैसा ही करने के निर्देश दिए। दो दिन पहले ही मेरठ के निकट बनने वाली सड़क का ठेका एक चीनी कंपनी को मिलने की तीखी आलोचना के बाद उसे रद्द करने की सम्भावना भी दिखाई दे रही है। सरकारी  सूत्रों के अनुसार देश में  कार्यरत अनेक चीनी उपक्रमों को भी निकाल बाहर करने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं। हालाँकि इसमें कितनी सफलता मिलेगी ये कहना कठिन है किन्तु देश की  जनता लम्बे समय से ये कहती आ  रही थी कि उससे तो स्वदेशी अपनाने की अपेक्षा की जाती है किन्तु सरकार विश्व व्यापार संगठन के साथ समझौते की आड़ लेकर खुद चीनी सामान के देश में बेरोकटोक आयात को सुलभ बनाती है। वैसे बीते कुछ समय से केंद्र  सरकार ने चीन  से आने वाली  अनेक वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाकर घरेलू उत्पादकों और व्यापरियों को राहत पहुँचाने का प्रयास किया है। लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा जबसे आत्मनिर्भरता का नारा दिया तब से देश ये अपेक्षा कर रहा था कि जनता के साथ ही सरकार भी इस दिशा में पहल करे। यद्यपि आज के हालात में चीन से आयात को पूरी तरह रोक पाना न तो संभव है और न ही व्यवहारिक किन्तु शुरुवात तो करनी ही होगी। 4जी संबंधी निर्णय के साथ ही दूसरे सरकारी संस्थानों से भी चीनी वस्तुओं की खरीदी पर रोक लगाने की खबरें आ रही हैं। ऐसा होने पर न सिर्फ निजी क्षेत्र के उद्योग-व्यापार को लाभ होगा अपितु सरकार के अपने उपक्रमों को भी पुनर्जीवन मिल सकेगा जो चीन  के साथ प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पाने के कारण अस्तित्व बचाने के लिए संघर्षरत थे। उस दृष्टि से अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है लेकिन शुरुवात के तौर पर 4 जी को लेकर लिया गया निर्णय भले ही सांकेतिक हो लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक असर आम जनता पर पड़े बिना नहीं रहेगा। जैसी कि खबर आ रही है भारत में तेजी से लोकप्रिय हुए चीनी ब्रांड्स के विज्ञापन प्रसारित करने से मीडिया भी परहेज करेगा और सितारों से भी उम्मीद की जा रही है कि वे उनका प्रचार न करें। यदि ऐसा हो सके तो निश्चित  रूप से घरेलू उद्योगों को जबरदस्त लाभ हो सकता है। लेकिन ये स्थायी तभी होगा जब हमारे देश में बनने वाली चीजें गुणवत्ता के साथ कीमतों में भी प्रतिस्पर्धात्मक रहें। क्योंकि चीन किसी अन्य देश के नाम से भी अपने उत्पाद भारत के बाजारों में भेज सकता है। बहरहाल भारत सरकार का ताजा निर्णय स्वागतयोग्य है। ये मुहिम निरंतर जारी रहना चाहिये। वैश्वीकरण के इस दौर में यद्यपि आयात को रोक पाना असंभव है लेकिन आयात शुल्क बढ़ाने जैसे उपायों से भी स्वदेशी के उद्देश्य को काफी हद तक पूरा किया जा सकता है। चीन की मौजूदा नाराजगी के पीछे भारत द्वारा आर्थिक क्षेत्र में लिए जा रहे निर्णय भी हैं। लेकिन उससे विचलित हुए बिना तेजी से आगे बढ़ना जरूरी है। जनता चीनी सामान के बहिष्कार को लेकर काफी मुखर है। यदि केंद्र सरकार इसका लाभ उठा सके तो चीन की अकड़ काफी हद तक कम की जा सकती है। यूँ भी आजकल के युद्ध जंग के मैदान से ज्यादा आर्थिक मोर्चे पर लड़े जाते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 17 June 2020

चीन के साथ सीमा का निर्धारण न होना बन गया नासूर वीर भोग्या वसुंधरा की प्रासंगिकता आज भी यथावत





चीन  के साथ चल रहे विवाद में बार - बार  एलएसी का जिक्र होता है | इसका हिन्दी में अर्थ वास्तविक नियन्त्रण रेखा होता है | इसका आशय ये है कि चीन के साथ  हमारी तीन हजार किलोमीटर से ज्यादा लम्बी सीमा का विधिवत निर्धारण नहीं होने से जो इलाका जिसके कब्जे में है वह उसी तक सीमित रहेगा | इसके अलावा कुछ स्थान ऐसे भी हैं जिनके आधिपत्य को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से उन्हें नो मैन्स लैंड का दर्जा दिया गया है | इस पर दोनों देशों की सैन्य टुकड़ियां गश्त करते हुए इस बात को देखती हैं कि कहीं दूसरा पक्ष वहां कब्ज़ा न जमा ले  |

मौजूदा विवाद के पीछे भी यही मुख्य कारण है | लद्दाख  स्थित गलवान घाटी में चीन द्वारा अपने शिविर लगाने  की भनक लगते ही भारत ने भी अपनी सेना तैनात कर दी | बीते डेढ़ महीने से दोनों के गश्ती दलों के बीच हाथापाई की अनेक वारदातें हुईं , जो आम बात है  | लेकिन इस बार चीन का ऐतराज भारत द्वारा वास्तविक नियन्त्रण रेखा के भी कई किलोमीटर भीतर बनाई गयी सड़क को लेकर था | इसका निर्माण शुरू तो 2001 में हुआ लेकिन बीच में काम बंद हो गया | बीते कुछ सालों में फिर  काम तेज हुआ और हाल ही में अग्रिम चौकी तक भारत की सड़क बन गयी | पूरी सीमा पर भारत द्वारा इन्फ्रा स्ट्रक्चर का विकास करना चीन को कभी सहन नहीं हुआ | 2016 में भूटान के पास डोकलाम में भी चीन ने एक  महीने से ज्यादा डटे रहकार  जबरन  कब्जे की कोशिश की लेकिन भारतीय सेना ने उन्हें रोके रखा |

लेकिन इस बार गलवान घाटी में उसकी घुसपैठ को रोकने की भारतीय  सैन्य टुकड़ी की कोशिश हिंसक झड़प में बदल गई | बीते सोमवार को आठ  घंटे तक  बिना अस्त्र शस्त्र के हुई हाथापाई में पत्थर , डंडे , कंटीले तारों का उपयोग करते हुए चीनी सेना ने हमारे 20 जवान मार  डाले | जवाबी कार्र्वाई में उसके भी तीन दर्जन फौजी मारे गये , वहीं अनेक घायल हुए | पहले खबर आई कि एक कर्नल सहित भारत के तीन और चीन के पांच सैनिक मारे गये | लेकिन कुछ देर बाद ज्योंही 20 भारतीय जवानों के मारे जाने की  जानकारी आई तो पूरे देश में गुस्से की लहर दौड़ गयी | यद्यपि  बाद में चीन के अधिक  सैनिक मरने की जानकारी आने पर भले ही शर्मिंदगी कुछ कम हुई हो लेकिन ये प्रश्न हर जुबान पर था कि जब दोनों देशों के बीच सशस्त्र संघर्ष न करने का समझौता 45 वर्ष से चला आ रहा है तब इन जवानों को  जान क्यों गंवाना पड़ी ? यद्यपि धीरे - धीरे पूरा विवरण सामने आता गया जिससे चीनी सैनिकों द्वारा धोखे से किये गये वार की जानकारी मिली | लेकिन जनमानस में इस बात पर गुस्सा है कि चीन की हिम्मत ऐसा करने की हुई कैसे ?

 और यही सवाल इस समस्या के उस पहलू  की तरफ ध्यान खींचता है जिसकी उपेक्षा के कारण आज हमें अपनी ही जमीन को अपना साबित करने के लिए जवानों का खून बहाना पड़ रहा है | उल्लेखनीय है 1962 में भी चीन ने गलवान घाटी से ही हमले की शुरुवात करते हुए हमारे 33 फ़ौजी मार डाले थे | युद्धविराम के बाद हालाँकि वह पुरानी  जगह लौट तो गया | लेकिन जैसा बताया जाता है वह दबे पाँव इस क्षेत्र में अपना कब्जा बढ़ाता  चला गया | चूंकि पूरी घाटी निर्जन और दुर्गम है इसलिए वहां सतत निगरानी काफी कठिन थी | वैसे भी चीन  अक्साई चिन का कुछ इलाका तो 62  में ही कब्जा चुका था  वहीं कुछ पाकिस्तान ने उसे तोहफे में दे दिया | लेकिन गलवान घाटी पर उसका पूरा कब्जा नहीं होने से सियाचिन में भारत की मौजूदगी को रोकने  में वह सफल नहीं हो सका | पर इस बार उसकी कोशिश कुछ ज्यादा तैयारी के साथ लग रही है | भारत द्वारा दौलत बेग ओल्डी नामक सीमान्त क्षेत्र तक सड़क बनाये जाने से उसे अपने लिए खतरा महसूस हुआ और उसने गलवान घाटी को पूरी तरह हासिल करने के लिए मौजूदा हालात पैदा कर दिए | 

सोमवार के खूनी संघर्ष के बाद भारत के विरोध पर उसने उलटे हमें ही कसूरवार ठहराते हुए भारतीय  सेना द्वारा उसकी सीमा में घुसपैठ का आरोप लगा दिया | साथ ही दो टूक कहा कि  गलवान घाटी उसका हिस्सा है | 

हॉलांकि उसके पास इस बात का जवाब नहीं है कि फिर 1962 की जंग के बाद वह इस इलाके से वापिस क्यों लौटा ?

और इसी सवाल के साथ दर्जनों सवाल हमारे अपने ऊपर भी उठते हैं | चीन के साथ लगी  सीमा पर यूँ तो अधिकतर जगह कुछ  न कुछ विवाद है | लेकिन लद्दाख और अरुणाचल उसके प्रमुख निशाने पर हैं | ब्रिटिश शासन के समय तिब्बत के साथ हुए सीमा समझौते के अंतर्गत तय हुई मैकमोहन रेखा को भी उसने ये कहते हुए अमान्य कर दिया कि वह उस समझौते में शामिल नहीं था | अरुणाचल को तो वह तिब्बत का हिस्सा ही मानता है | यदि तिब्बत पर उसका कब्जा न  होता तब भारत को चीन से लेशमात्र परेशानी न होती | लेकिन इसे चीन की विस्तारवादी सोच के साथ ही दूरंदेशी कहना पड़ेगा कि 1 अक्टूबर 1949 को  माओ के नेतृत्व में कम्युनिस्ट शासन आते ही उसने 1950 में ही तिब्बत पर हमला करते हुए कब्जा जमा लिया | भारत उस समय नया - नया आजाद हुआ था | लेकिन उसने चीन की नीयत को समझे बिना तिब्बत पर उसके अवैध कब्जे को मान्यता देकर अपने लिए मुसीबत पैदा कर दी | बाद में 1959 में वहां के बौद्ध शासक दलाई लामा चीनी दमन से जान बचाने सड़क मार्ग से भारत आये तो उन्हें भी शरण दे दी गयी | उन सहित  उनके हजारों  तिब्बती अनुयायियों को  हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहने की जगह दी गयी जो तिब्बत की निर्वासित सरकार की राजधानी है | चीन को  भारत का ये कदम नागवार गुजरा | लेकिन तत्कालीन प्रधान मंत्री पं नेहरु चीन के मोहपाश में थे | 

1960 आते तक चीन ने भारत के साथ भी सीमा विवाद शुरू कर दिया  किन्तु नेहरु जी तब भी कुछ न समझ सके और 20 अक्टूबर 1962 को चीन ने इसी गलवान घाटी पर हमला कर नेहरु जी को जबरदस्त धक्का दिया | भारत बुरी तरह हारा | युद्धविराम के बाद चीन  कुछ पीछे तो हटा लेकिन हजारों वर्ग किमी जमीन उसने कब्जा ली | जानकारों के मुताबिक तबसे वह अघोषित तौर पर लद्दाख क्षेत्र में सैकड़ों वर्ग किमी भूमि और दबा चुका है | चूंकि वहां नजर रखना  बेहद कठिन था इसलिए जब तक हमें पता चलता देर हो चुकी होती |

 कहने का आशय ये है कि चीन ने जहां साम्यवादी शासन कायम करते ही अपनी सीमाओं का विस्तार करने की कोशिशें तेज कर दीं वहीं देश के दो टुकड़े होने के बाद भी हम अपनी सरहदों को लेकर उतने सतर्क नहीं रहे | आजादी के बाद सात दशक बीत गए | 1962 के बाद से आज तक चीन से किसी भी तरह का औपचारिक युद्ध नहीं हुआ | बावजूद उसके सीमा विवाद को स्थायी रूप से हल करने में सभी सरकारें विफल रहीं | 1962 में चीन द्वारा कब्जाई जमीन वापिस लेने का भारतीय संसद का सर्वसम्मत प्रस्ताव कहीं धूल खा रहा होगा | अनेक प्रधानमन्त्री चीन गये और उसके नेता भी भारत  आये | सीमा विवाद सुलझाने के लिए उच्च स्तरीय कार्यदल भी बने लेकिन नतीजा शून्य ही रहा |

वैसे इस तरह के विवाद दो ही तरह से सुलझते  हैं | या तो दोनों देशों के बीच आपसी समझौता  हो जाए या फिर सैन्य बल के जरिये अपनी जमीन छीन  ली जाए | कुछ मामलों में तीसरे पक्ष की सहायता से भी सहमति बनाई जाती है | लेकिन भारत और चीन के बीच 1962 की लड़ाई के 58 वर्ष बाद भी सीमा विवाद सुलझना तो दूर और उलझता जा रहा है | इसके लिए `चीन पूर्णतः दोषी  है क्योंकि वह इंच भर भी कब्जाई जमीन छोड़ने की बजाय और हड़पने की फिराक में लगा रहता है | ताजा विवाद इसीलिये आश्चर्यचकित नहीं करता | 

यद्यपि इसके पीछे और भी अनेक कारण हैं | सीमावर्ती इलाकों में भारत द्वारा सड़कें , पुल , हवाई  पट्टी जैसी सुविधाओं का विकास किये जाने के अलावा चीन के अन्य महत्वाकांक्षी प्रकल्पों से दूर बने  रहना , अमेरिका , जापान , ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ रणनीतिक नजदीकी बढ़ाना और कोरोना वायरस को लेकर चीन की घेराबंदी में शामिल होने जैसे कदम हैं | विश्व स्वास्थ्य संगठन का नेतृत्व हासिल होते ही ताईवान को उसमें प्रवेश  दिलवाने की कोशिश भी एक वजह बन गई | प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भरता का नारा देकर अप्रत्यक्ष तौर पर चीन पर जो प्रहार किया उससे भी वह बौखलाया है |

लेकिन इस सबके मूल में सीमाओं  को लेकर व्याप्त अस्पष्टता ही है | प्रधानमन्त्री ने हाल में अक्साई चिन पर भारत के आधिपत्य की बात क्या कही चीन गलवान घाटी पर कब्जा जमाने आ गया | इस विवाद का क्या हल निकलता है ये अनिश्चित  है | हो सकता है बातचीत  के बाद चीन अपने कदम पीछे ले जाए लेकिन उससे भी कुछ हासिल नहीं होने वाला | यदि 1962 के बाद से इस विवाद को हल करने की प्रतिबद्धता होती तो ले - देकर ही सही , बात बनती तो | 

दरअसल ये हमारी चारित्रिक कमजोरी रही कि राष्ट्रीय समस्याओं के बारे में दूरदर्शिता की जगह सदैव तदर्थवाद का  सहारा लिया गया | इसी वजह से बहादुर फ़ौज होने के बाद भी हमारी सीमाएं सुरक्षित नहीं हैं | चीन के साथ तो निश्चित ही  नहीं हैं | ये देखकर निराशा के साथ गुस्सा भी आता है | न जाने क्यों सरकार में बैठे लोग दुश्मन को दुश्मन मानकर नीति निर्धारित करने से बचते रहे हैं ?

वर्तमान स्थिति में बड़े युद्ध की सम्भावना से भले ही इंकार किया जाए लेकिन चीन ने जो दबाव बनाया उसका स्थायी प्रतिकार किये बिना ये समस्या कुछ समय बाद फिर उठ खड़ी होगी | चीन का एजेंडा पूरी तरह निश्चित है | बेहतर हो हम भी अपनी नीति और निर्णय की दिशा निश्चित करते हुए कदम बढ़ाएं | यदि युद्ध लड़ने का हौसला है तब सेना को छूट दे दी जाए | जनता ऐसे समय सरकार और सेना के साथ है | चीन बेशक ताकतवर और सम्पन्न है लेकिन भारतीय सेना विश्व की सबसे पेशेवर सैन्य शक्ति है | और फिर बिना युद्ध के सैनिकों की शहादत से अच्छा है उन्हें पराक्रम दिखाने  का अवसर दिया जावे  ।

चीन सदैव झगड़ा झूठा , कब्जा सच्चा जैसी देसी कहावत से प्रेरित होकर कार्य करता रहा है।

वैसे भी वीर भोग्या वसुंधरा की प्रासंगिकता आज भी यथावत है |