Tuesday, 14 July 2020

20 साल बाद अचानक कैसे नजर आ गया प्यारे मियाँ का अवैध निर्माण ? पत्रकारिता अपना घर खुद साफ़ करे वरना .......




भोपाल में प्यारे मियाँ नामक एक पत्रकार नाबालिग बालिका  के साथ दुराचार के मामले में फंसकर फरार हो गया | आरोप है कि बीते दो साल से वह  और उसका  एक रिश्तेदार  उस बालिका के साथ दुष्कृत्य कर  रहे  थे  | वैसे खबर बनाने वाले पत्रकार भी आजकल खबर बनने लगे  हैं | पैसे के बल पर अपने काले कारनामे छिपाने के लिए अखबार और टीवी चैनल खोलने वाले अनेक सफेदपोशों का पर्दाफाश भी आये दिन होता रहता है | कमलनाथ   सरकार के दौर में इंदौर के जीतू सोनी नामक अख़बार मालिक के आर्थिक साम्राज्य को तहस नहस किया गया क्योंकि वह हनी ट्रैप मामले का सूत्रधार था और प्रदेश के अनेक राजनेताओं के साथ ही बड़े नौकरशाहों के नंगेपन के सचित्र प्रमाण उसके पास थे | हाल ही में एक और अख़बार मालिक की करतूतें सामने आईं जो गुटका व्यवसाय में कर चोरी करते पकड़ा गया  | और अब प्यारे मियाँ का घिनौना कृत्य सामने आ गया | मामला प्रकाश में आने के बाद प्यारे मियाँ फरार हो गये | पुलिस उन्हें तलाश रही है | ईनाम भी दस से बढ़ाकर 30 हजार रु. कर दिया गया है | गत दिवस उनके मैरिज हॉल को अवैध मानकर प्रशासन ने जमींदोज कर दिया  | कहा जा रहा है उक्त हॉल 20 साल पहले बना था | उसके लिए आवश्यक अनुमति भी नहीं ली गई तथा स्वामित्व सम्बन्धी कोई प्रमाण भी नहीं हैं | अचानक सरकार को ये भी ज्ञात हो गया कि नजूल रिकॉर्ड में वह आबादी एरिया है  | मुख्यमंत्री ने सिंह गर्जना करते हुए बेटियों के विरूद्ध अपराध करने वालों पर कहर बरसाने का ऐलान कर पूरे प्रदेश में सफेदपोशों के विरुद्ध अभियान चलाने के निर्देश भी दे दिए |

यदि वे ईमानदारी से ऐसा करते हैं तब उसे व्यापक जनसमर्थन मिलेगा | कमलनाथ सरकार के ऐसे अभियान को भी लोगों ने पसंद किया था | लेकिन कुछ दिन चलने के बाद वह अपनी मौत मर गया जिसका कारण सर्वविदित है | शासन और प्रशासन में ऐसी मर्दानगी तभी आती है जब उसके मुंह पर तमाचा पड़ता है | कानपुर वाले विकास दुबे के लम्बे आपराधिक इतिहास के बावजूद उसका घर गिराने का पराक्रम तब जाकर दिखाया गया जब सरकार ने  ये तय कर लिया कि उसे ठिकाने लगाना है | शिवराज सरकार ने प्यारे मियाँ का मैरिज हॉल गिरवाकर ये तो दिखा दिया कि बेटियों के साथ दुष्कर्म करने वाले  के प्रति वह बेहद  कठोर है , फिर चाहे वह पत्रकार ही क्यों न हो ? लेकिन क्या भोपाल में बैठे सत्ताधीश  और सत्ता संचालन के सबसे बड़े औजार नौकरशाह इस बात का जवाब देंगे कि प्यारे मियाँ का अवैध निर्माण तोड़ने की प्रेरणा उन्हें अचानक कहाँ से मिल गयी ? 20 वर्ष पहले बिना अनुमति के बने जिस निर्माण के  स्वामित्व का भी अता - पता  न हो उस पर सरकारी अमले की नजर अब तक क्यों नहीं गयी ? नजूल को भी अचानक दिव्य ज्ञान हो गया कि मैरिज हॉल जिस जगह बना था वह आबादी क्षेत्र के  रूप में दर्ज है | प्यारे मियाँ कल तक  अधिमान्य पत्रकार थे | शासकीय आवास भी उन्हें मिला हुआ था | गत दिवस मान्यता और आवंटन रद्द कर दिए गए | हालाँकि इतनी त्वरित कार्रवाई ऐसे ही किसी मामले में फँसे किसी नेता या अधिकारी के विरुद्ध हुई  हो ये किसी को याद नहीं होगा |

प्यारे मियाँ वरिष्ठ पत्रकार कहे  जाते हैं | एक बड़े समूह के उर्दू अख़बार से भी जुड़े रहे | एक  पूर्व मुख्यमंत्री सहित अनेक विशिष्टजनों के साथ उनका दोस्ताना भी अब चर्चा में आ रहा है | अपराध साबित होने पर उन्हें निश्चित तौर पर कठोरतम दंड दिया जाना चाहिये | लेकिन प्रदेश सरकार के मुख्यालय में एक पत्रकार इस तरह की गतिविधियों में लिप्त होकर  अवैध निर्माण कर पैसे कमा रहा हो किन्तु पुलिस और प्रशासन उससे बेखबर बने रहे तो क्या वे भी किसी  न किसी स्तर पर कसूरवार नहीं हैं ? भोपाल के जिला प्रशासन के लिये तो ये शर्म  से डूब मरने जैसी बात है कि उसकी नाक के नीचे एक अवैध निर्माण 20 साल तक इसलिए कायम  रह सका क्योंकि वह एक पत्रकार का था | यदि प्यारे मियाँ अपना कुकर्म उजागर होने के बाद फरार न हुए होते तब क्या मुख्यमंत्री और उनका अमला उस निर्माण की एक ईंट भी खिसकाने की हिम्मत जुटा पाता ? ऐसे ही और भी सवाल हैं |

लेकिन लौट फिरकर बात फिर पत्रकारों पर ही घूम जाती है | वे अपनी बिरादरी में घुस आई बुराइयों के प्रति जिस तरह से आंखें  मूंदे बैठे हैं उसका ही परिणाम है कि अब इस पेशे के प्रति व्याप्त सम्मान दिन ब दिन घटता जा रहा है |

कुछ समय पूर्व संस्कारधानी जबलपुर के पत्रकारों ने फर्जी पत्रकारों की पहिचान करते हुए उनके पर्दाफाश की मुहिम  शुरू की थी | उस दौरान ये बात सामने आई कि पत्रकारों के  नाम पर बनाये गये स्वयंभू संगठन पैसा लेकर सदस्य बनाते हैं , सदस्य को कार्ड भी दिया जाता है | भोपाल में तो शासन के जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी किये जाने वाले अधिमान्यता कार्ड से मिलता - जुलता परिचय पत्र भी मोटी रकम लेकर देने वाले अनेक संगठन कार्यरत पाए गये | इस तरह प्यारे मियाँ के और भी संस्करण भोपाल से लेकर प्रदेश के कोने - कोने में मिल जायेंगे | दायरे को और फैलाएं तो पूरे देश में ये बुराई व्याप्त  है | 

टीवी पत्रकारिता आने के बाद न जाने कहाँ - कहाँ के चैनलों के  नाम वाले माइक लेकर पत्रकार वार्ताओं में भीड़ मचाने वाले  पैदा हो गये हैं | राजनेता और प्रशासन इनकी असलियत जानने के बाद भी इनसे पंगा लेने से बचते हैं | जिसका लाभ उठाकर ये लोग पत्रकारिता को कलंकित कर रहे हैं | इस वजह  से असली और नकली पत्रकार की पहिचान करना भी मुश्किल हो गया है |

सही बात तो ये है कि हमारे देश में राजनीति और पत्रकारिता दो ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें न किसी औपचारिक शिक्षा की जरूरत होती है और न ही व्यावसायिक अनुभव की | चरित्र प्रमाणपत्र भी स्वयं ही  जारी कर  लिया जाता है | सबसे बड़ी बात ये है कि नेता और पत्रकार की वरिष्ठ्ता कौन तय करता  है ये भी किसी को नहीं मालूम |

ये बात पूरी तरह सही है कि चंद अपवाद छोड़कर प्रजातंत्र का चौथा स्तम्भ कही  जाने वाली पत्रकारिता शेष तीन स्तम्भों के कारनामों का अनुसरण करने में शर्म के बजाय गर्व का अनुभव करने लगी है | और उसी के कारण ऐसे लोग इस क्षेत्र में घुस आये जिनके संदर्भ में ये आलेख लिखने की आवश्यकता पड़ी | सरकार प्यारे मियाँ या उन जैसों की करतूतों  को  भले ही देखकर भी अनदेखा करती रही किन्तु खोजी पत्रकारों की लम्बी - चौड़ी  फौज भी तो अपने बीच बैठे इस तरह के गंदे लोगों को बेनकाब करने के प्रति उदासीन रही | 

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जो गुस्सा गत दिवस दिखाया उसकी  एक्सपायरी  डेट कब तक है ये देखने वाली बात होगी | राजनीतिक नेता और अधिकारी वर्ग उनके इस अभियान में सहयोग देगा इस पर भी संशय है और अपराधी , माफिया , अतिक्रमणधारियों , अवैध शराब कारोबारी तथा चिटफंड की आड़ में धोखाधड़ी करने वालों के सफाये की मुहिम तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक नेता और नौकरशाह उनके सिर से अपना हाथ हटा नहीं लेते | 

दरअसल उक्त तबका ही तो इनकी कमाई का स्रोत है | और फिर मुख्यमंत्री ने मीडिया माफिया को छोड़ दिया जो बीते कुछ वर्षों के भीतर तेजी से पैर फैला चुका है | बेहतर हो पत्रकार बिरादरी खुद होकर अपने  बीच बैठे अपराधी तत्वों को बेनकाब करें | जिन अख़बार मालिकों ने पत्रकारिता की आड़ में अपना काला कारोबार खड़ा किया उनके यहाँ  नौकरी करने वाले पत्रकार भी क्या कम दोषी हैं ? प्रदेश के कितने पत्रकार संगठन  प्यारे मियाँ के विरुद्ध आवाज उठाते हैं इसका इन्तजार रहेगा |

उल्लेखनीय  बात ये है कि आजकल शासन और प्रशासन भी ऐसे अवसरों को लपकने के लिए  तैयार रहता है जिससे पत्रकारों  को एहसास करवाया जा सके कि ज्यादा मुंह मत चलाया करो ,  हो तो तुम भी हम जैसे ही !

Monday, 13 July 2020

सिंधिया पर निर्भरता कम करने में जुटे शिवराज



बीते मार्च में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा बमुश्किल आज सुबह मप्र मंत्रीमंडल को आकार दे सकी। ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत से कमलनाथ सरकार आसानी से गिर तो गयी लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराज सिंह चौहान को पहली बार ये समझ में आया कि मजबूरी क्या होती है। श्री सिंधिया द्वारा अपने समर्थकों को मनमाफिक विभाग देने की जिद के सामने अंतत: भाजपा को झुकना पड़ा। इस तरह से सत्ता के अब दो केंद्र होंगे। भाजपा में ये मानने वाले काफी हैं कि ये सरकार ठीक तरह से नहीं चल सकेगी और आये दिन हितों की टकराहट देखने मिलेगी। क्योंकि ज्योतिरादित्य के साथ आये विधायकों की वफादारी निश्चित तौर पर बजाय श्री चौहान के अपने नेता के प्रति रहेगी। लेकिन प्रदेश की राजनीति में अभी अनेक मोड़ आने बाकी हैं। आगामी सितम्बर में संभावित विधानसभा के दो दर्जन चुनावों में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आये कितने विधायक दोबारा जीतकर आते हैं ये कहना कठिन है। हालाँकि शिवराज और ज्योतिरादित्य के एक साथ आने से निश्चित तौर पर भाजपा का पलड़ा भारी नजर आता है लेकिन भाजपा के भीतर एक वर्ग ऐसा है जो इन दलबदलुओं को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा। जो भाजपा विधायक मंत्री नहीं बन सके वे तो रुष्ट हैं ही लेकिन जहां भी उपचुनाव होने वाले हैं वहां 2018 के चुनाव में हारे हुए भाजपा नेता इस बात को सहन नहीं कर पा रहे कि उनकी राजनीतिक जमीन पर किसी और को मकान बनाने की अनुमति दी जा रही है। यद्यपि सत्ता और संगठन के दबाव के कारण वे एक हद के आगे नाराजगी व्यक्त नहीं कर सकेंगे क्योंकि ऐसा करना उनके लिये आत्मघाती होगा। रामकृष्ण कुसमारिया जैसे नेता का हश्र सबके सामने है। लेकिन इसके बावजूद पूरे के पूरे उपचुनाव भाजपा जीत जाए ये जरूरी नहीं है। कुछ में उसके नाराज नेता-कार्यकर्ता तो कुछ में जनता ठिकाने लगायेगी। वैसे भाजपा की सोच इस मामले में बहुत ही साफ है। यदि आधे उपचुनाव भी जीते गये तब भी सरकार के पास बहुमत बना रहेगा। निर्दलीय, सपा और बसपा के विधायकों को निगम आदि का अध्यक्ष बनाकर सत्ता का स्वाद चखाने का काम भी गत दिवस शुरू कर दिया गया। बुन्देलखण्ड क्षेत्र की बड़ा मलहरा सीट के कांग्रेस विधायक प्रद्युम्न सिंह लोधी ने गत दिवस पार्टी छोड़ते हुए भाजपा का दामन थाम लिया। विधायकी से उनका त्यागपत्र भी आनन फानन में मंजूर करवा दिया गया। भाजपा ने बिना देर किये उनको राज्य नागरिक आपूर्ति निगम का अध्यक्ष बनाकर उपकृत कर दिया। कमलनाथ सरकार के पाले से कूदकर आये निर्दलीय प्रदीप जायसवाल को मंत्री पद नहीं मिल सका तो उन्हें खनिज निगम का अध्यक्ष बना दिया। दोनों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दे दिया गया। इस तरह भाजपा ने सिंधिया गुट को भी ये संकेत दे दिया कि वह स्वतंत्र होकर निर्णय करने में सक्षम हैं। कल के घटनाक्रम से ये अंदाज भी लग रहा है कि सिंधिया गुट के दबाव को कम करने के लिए श्री चौहान और भाजपा अभी अपने स्तर पर कांग्रेस के कुछ और विधायक तोड़ेंगे। गत दिवस आये प्रद्युम्न सिंह लोधी पूर्व मुख्यमंत्री उमाश्री भारती से मिलने के बाद भाजपा में आये। पार्टी सूत्रों की मानें तो राजनीतिक सूखे से बचने के लिए कुछ और कांग्रेस विधायक भी पाला बदल सकते हैं। मुख्यमंत्री और भाजपा दोनों को ये समझ में आ गया है कि सभी को मंत्री पद देना नामुमकिन है। इसलिए अब पिछले दरवाजे से सत्ता का प्रसाद बांटने की तरकीब आजमाई जायेगी। ये भी खबर है कि कांग्रेस छोड़कर आने वाले विधायकों में से कुछ को उपचुनाव नहीं लड़ने के लिए भी मनाया जाएगा जिससे भाजपा में असंतोष न फैले। विधायक न रहते हुए भी उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी देकर कांग्रेस को कमजोर करने की रणनीति इस तरह तैयार की जा रही है जिससे कमलनाथ कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन सरकार अस्थिर न हो सके। शिवराज सिंह को भाजपा हाईकमान के समक्ष ये भी साबित करना है कि उनके बिना प्रदेश सरकार चलाना सम्भव नहीं होगा। कुल मिलाकर मंत्रियों के विभागों के बंटवारे रूपी एक बाधा पार करने के बाद भी मुख्यमंत्री के लिए नई चुनौतियां आती रहेंगीं। कांग्रेस से आये मंत्रियों की कार्यसंस्कृति पूरी तरह भिन्न होने से भी समस्याएँ आयेंगीं। श्री चौहान के लिए सबसे बड़ी समस्या ये होगी कि ज्योतिरादित्य किसी भी मसले पर उन्हें दरकिनार करते हुए सीधे हाईकमान से बात करते हैं। उनकी उपयोगिता को देखते हुए भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व भी उन्हें अतिरिक्त महत्व देने में कंजूसी नहीं कर रहा। राजस्थान में यदि सचिन पायलट की बगावत कारगर हो गयी तब भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में महाराज की हैसियत शिवराज से भी ऊंची हो जायेगी। कांग्रेस में राहुल ब्रिगेड के कुछ और उभरते हुए युवा नेताओं को तोड़ने के अभियान में भाजपा को ज्योतिरादित्य से बड़ी मदद मिलने की उम्मीद जो है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 11 July 2020

श्मसान में पति की लाश के पास खड़ी पत्नी का साक्षात्कार ? पत्रकारिता के मौलिक सिद्धांतों का अंतिम संस्कार !





वर्ष 2002 में जुलाई महीने की 28 तारीख थी | एक दिन पहले उस समय के उपराष्ट्रपति कृष्णकांत का निधन हो गया था | उनके दिल्ली स्थित आवास पर विशिष्ट जनों का आना - जाना लगा था | अंतिम यात्रा की तैयारियां चल रही थीं | अखबारी संवाददाताओं के अलावा  टीवी चैनलों के रिपोर्टर आँखों देखा हाल देश और दुनिया तक पहुँचाने के लिए कैमरामैन के साथ जुटे थे । और वहां आती  जा रही  विशिष्ट हस्तियों द्वारा  दिवंगत उपराष्ट्रपति के प्रति व्यक्त की जा रही श्रद्धांजलि को प्रसारित करते जा रहे थे | इसी दौरान एक चैनल के एंकर ने स्टूडियो से अपने रिपोर्टर को कहा जरा हमारे दर्शकों  को ये भी दिखलाइये कि वहां का माहौल कैसा है ? और रिपोर्टर ने भी कैमरा घुमा - घुमाकर उदास चेहरे दिखलाते हुए बताया कि सभी लोग ग़मगीन हैं | 
बात आई - गई हो गई | 

लेकिन उसके बाद जनसत्ता नामक अखबार के प्रधान संपादक स्व. प्रभाष जोशी ने अपने साप्ताहिक  स्तंभ कागद कारे में उक्त टीवी चैनल के एंकर की जबरदस्त खिंचाई करते हुए कटाक्ष किया कि जिस घर में किसी की लाश रखी हो और अंतिम यात्रा की तैयारियां चल रही हों वहां का माहौल कैसा होगा , ये भी क्या पूछने की चीज है ?  प्रभाष जी किसी  भी विषय पर अपनी  बात बहुत ही दबंगी से रखते थे | उस दौर में अखबार और टीवी समाचार चैनलों में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो चुकी थी | ऐसे में प्रथम दृष्टया ये माना गया कि जोशी जी ने उस बहाने टीवी पत्रकारिता पर प्रहार किया जो कि व्यावसायिक प्रतिद्वन्दिता का  हिस्सा कहा जा सकता था | लेकिन कालान्तर में ये बात खुलकर सामने आ गई कि टीवी पत्रकारिता के आने के बाद समाचारों के संकलन और प्रस्तुतीकरण में दायित्वबोध  और सम्वेदनशीलता का अभाव होने लगा है | सबसे पहले और केवल हमारे चैनल या पत्र में  जैसे दावों के बीच समाचार को भी बाजार की वस्तु बना दिया गया है |

ये कहना भी गलत नहीं  होगा कि जिस तरह  फिल्म निर्माता बॉक्स आफिस पर हिट होने के लिए फिल्म में अश्लीलता , हिंसा और सनसनी का सहारा लेते हैं , उसी तरह अब समाचार माध्यम विशेष रूप से टीवी समाचार चैनल भी समाचार के जरिये अपनी टीआरपी बढ़ाने का प्रयास करने लगे हैं | देखा - सीखी अख़बार जगत के भी सरोकार बदलते जा रहे हैं |

गत दिवस इसका एक और उदाहरण सामने आया | हुआ यूं कि कानपुर के कुख्यात गुंडे विकास दुबे की एनकाउंटर में हुई मौत के बाद उसका अंतिम संस्कार हो रहा था | श्मसान भूमि में विकास की पत्नी भी मौजूद थी | पत्रकारगण भी वहां फोटोग्राफरों के साथ जा पहुंचे | विकास दुबे के मारे जाने के बाद उसका क्रियाकर्म विशुद्ध पारिवारिक विधि थी | यदि वह कोई विशिष्ट व्यक्ति  होता जिसकी  अंत्येष्ठि राजकीय सम्मान के साथ हो रही होती तब वह समाचार की दृष्टि से महत्वपूर्ण था  | लेकिन न जाने किस उद्देश्य से समाचार जगत के लोग श्मसान भूमि में अंतिम संस्कार वाली  जगह पर झुण्ड बनाकर खड़े हो गये | जब विकास की  पत्नी ने उनसे जाने के लिए कहा तब उसे  सामने आकर अपनी शिकायत बताने जैसी बातें कही गईं , जिस पर वह बिफर उठी  और उसके बाद उसने तेज आवाज में जमकर खरी - खोटी सुनाई जिसमें अनेक ऐसी बातें हैं जिनका उल्लेख  शोभा  नहीं  देता |  वैसे  विभिन्न चैनलों पर उसके वीडियो मौजूद हैं |

मुझे लगता है उस महिला ने जो कहा , उस हालात में कोई दूसरा भी होता तो समाचार संकलन करने गए लोगों को हो सकता है उससे भी तीखी जुबान में झिड़कता | 

विकास दुबे को लेकर बीते दिनों जो भी घटनाक्रम घटित हुआ उसकी वजह से उप्र की योगी सरकार , राज्य की पुलिस - प्रशासन और  राजनीतिक बिरादरी तो सवालों के घेरे में है ही लेकिन अनायास समाचार माध्यम भी आलोचनाओं  का शिकार हो गये जिनके प्रतिनिधि अति उत्साह में  श्मसान पत्रकारिता करने जा पहुंचे और बेइज्जत होकर लौटे | विकास की  पत्नी से बातचीत कतई गलत नहीं थी |  परन्तु उसके लिए क्या इन्तेजार नहीं  किया जाना चाहिए था ?  ज्यादा न सही कम से कम उसके घर लौटने तक तो रुका ही जा सकता था |

गत वर्ष एक प्रसिद्ध टीवी चैनल की तेज तर्रार एंकर अपनी टीम लेकर पटना के एक बड़े  सरकारी अस्पताल के आईसीयू वार्ड में घुसकर वहां व्याप्त अव्यवस्था को लाइव दिखाते हुए एक चिकित्सा कर्मी से उलझ  गईं  | उसने कहा भी कि कृपया डाक्टर से बात करें लेकिन रिपोर्टर ने रौब झाड़ना जारी रखा | उल्लेखनीय है उस समय चमकी बुखार नामक संक्रामक बीमारी के कारण सैकड़ों मरीज वहां भर्ती थे | और बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित था । बाद में उक्त रिपोर्टर की बिना अनुमति आईसीयू वार्ड में कैमरामैन सहित घुसने के लिए काफी आलोचना हुई |

लेकिन संभवतः  भारतीय पत्रकारिता में ये पहला उदाहरण होगा जब श्मसान भूमि में अपने पति की लाश के बगल में खड़ी उसकी पत्नी से अपेक्षा की  जा रही थी कि वह संवाददाताओं से मुखातिब होकर कैमरों के समक्ष  पति की  एनकाउंटर में हुई मौत के बारे में बतियाए | उसने गुस्से में उन सबको वहां  से जाने के लिए कहा भी किन्तु उसके बाद भी कोई टस से मस नहीं हुआ |

 
पत्रकारिता के अपने अनुभव और वरिष्ठों से मिले ज्ञान के आधार पर मुझे लगता है कि पत्रकारिता के भीतर घुस आई जबरिया मानसिकता का भी एनकाउंटर किया जाना जरूरी है | पैपराजी कहलाने  वाली  फ़ोटोग्राफ़रों की एक प्रजाति पूरी दुनिया में है | इनका काम विशिष्ट हस्तियों के निजी  जीवन में ताकझाँक करना होता है | टेनिस खिलाड़ी स्टेफी ग्राफ अपने बहुमंजिला निवास की छत पर बने स्वीमिंग पूल के किनारे कम कपड़ों में धूप  ले रही थी | पैपराजी समूह ने हेलीकाप्टर किराये पर लेकर उनके चित्र खींचकर महंगे दाम में बेचे |  कहा जाता है ब्रिटेन के युवराज चार्ल्स की पहली पत्नी डायना अपने पुरुष मित्र के साथ कार में जा रही थीं |  पैपराजी उसके पीछे अपनी कार दौड़ा रहे थे क्योंकि वह फोटो उनके लिए लिए सोने का अंडा होती | उनसे बचने की लिए डायना के ड्रायवर ने कार की गति बढ़ाई | नतीजा कार दुर्घटना और डायना के मित्र सहित मारे जाने के रूप में सामने आया | 

आज भारत में भी पैपराजी संस्कृति की पत्रकारिता ने  पदार्पण कर लिया है | जिसमें किसी की भी निजता में अतिक्रमण करना अपना अधिकार मान लिया जाता  है।

समय के   साथ वाकई बहुत कुछ बदलता है | मर्यादाएं भी नए सिरे से परिभाषित होती हैं | लेकिन पत्रकारिता के जो मौलिक सिद्धांत हैं उनको यदि तिलांजलि  दे दी गई तब वह अपनी उपयोगिता और सार्थकता दोनों खो बैठेगी | उसकी प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता तो पहले से ही  सवालों के घेरे में आ चुकी हैं  | ऐसे में विकास दुबे के अंत्येष्ठि स्थल पर जाकर उसकी पत्नी से बात करने की कोशिश में जो फजीहत हुई वह रोजमर्रे की बात बनते देर नहीं लगेगी |

 बेहतर हो पत्रकारिता आत्मावलोकन करे कि  खुद को पेशेवर साबित करने के लिए किसी के शोक का व्यवसायीकरण करना कहाँ तक उचित है ?

सौर ऊर्जा : सस्ती और प्रदूषण रहित



आधी सदी से भी ज्यादा का समय बीत गया। उस दौर की एक फिल्म हरिश्चंद्र तारामती के गीत का मुखड़ा था : - जगत भर की रोशनी के लिए, करोड़ों की जि़न्दगी के लिए, सूरज रे जलते रहना...। कविवर स्व. प्रदीप की वह रचना यूँ तो फिल्मी पटकथा को ध्यान में रखते हुए लिखी गई थी किन्त्तु उक्त पक्तियों में जो गूढ़ अर्थ छिपा हुआ था वह अधिकतर लोगों की समझ में नहीं आया। लेकिन गीतकार ने सूर्य की आराधना करते हुए जगत भर की रोशनी और करोड़ों की जि़न्दगी के लिए सूरज से जलते रहने की जो प्रार्थना है उसमें कहीं न कहीं वैज्ञानिकता का पुट भी महसूस होता है। भारतीय संस्कृति में सूर्य को तेजस्विता का अधिष्ठाता मानकर पूजा जाता है। सूर्य का उदय पृथ्वी पर रहने वाले अनगिनत जीव-जंतुओं की दिनचर्या का आधार है। उसकी किरणों से निकलने वाला प्रकाश ऊर्जा का अनंत स्रोत होने के साथ ही जीवन के लिए एक जरूरी तत्व भी है। हमारे पूर्वजों ने समूचे ब्रह्माण्ड को आलोकित करने वाले इस गृह को देवतुल्य मानकर इसकी आराधना करने का जो संस्कार दिया उसमें कितनी दूरदर्शिता थी ये तब जाकर लोगों की समझ में आई जब पूरी दुनिया ने ऊर्जा के सबसे भरोसेमंद और सस्ते वैकल्पिक स्रोत के रूप में सौर ऊर्जा की तरफ  ध्यान देना शुरू किया। कोयला, पानी, तेल और आण्विक उर्जा के दुष्परिणामों और उनके कारण प्रकृति तथा पर्यावरण को होने वाली क्षति को देखते हुए विश्व भर ने एक स्वर से सौर ऊर्जा को बतौर विकल्प स्वीकार किया और देखते ही देखते वह सर्वत्र लोकप्रिय हो गई। लेकिन सूर्य की पूजा करने वाले भारत में इस दिशा में बहुत देर से कदम बढ़ाये गये और जब सौर उर्जा को वैकल्पिक की बजाय मुख्य स्रोत बनाने की कोशिशें शूरू हुईं तो उपकरणों का अभाव सामने आकर खड़ा हो गया। उनका आयात करने में प्रारंभिक लागत ज्यादा होने के कारण जन साधारण के दिमाग में सौर उर्जा रूपी विकल्प जगह नहीं बना सका। हालाँकि सरकार ने इस पर अनुदान भी दिया किन्तु अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके। सबसे पहले सौर ऊर्जा का कुकर आया जिसमें सूर्य की रोशनी से खाना पकाने की व्यवस्था है। उसके बाद घरों की छत पर पानी गर्म करने के लिए सौर उर्जा गीजर लगाने की शुरुवात हुई। पहले-पहल इनका चलन होटलों के साथ ही व्यवसायिक भवनों में दिखाई दिया लेकिन धीरे-धीरे मध्यमवर्गीय लोगों ने भी इसका महत्व समझा और अब तो शहरों के ज्यादातर नये मकानों की छत पर सोलर गीजर नजर आने लगे हैं। हालाँकि बेहद उपयोगी और बचत देने वाले सोलर कुकर को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। लेकिन सौर उर्जा से विद्युत उत्पादन करने के बारे में भारत ने भी रूचि दिखाई और धीरे-धीरे ही सही इस बारे में तेजी से प्रगति होने लगी। सबसे उल्लेखनीय बात ये है कि देश में ही सौर ऊर्जा संबंधी साजो-सामान का उत्पादन शुरू होने से आयात घटा और लागत कम हुई। अब तो घरों की छतों पर भी सोलर पैनल से बिजली उत्पादन का चलन जोर पकड़नेलगा है। ये बहुत ही शुभ संकेत है जो भविष्य में भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में सहायक तो होगा ही हमारे प्राकृतिक संसाधनों को बचाकर पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक बनेगा। इस क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों के प्रतीक के तौर पर गत दिवस मप्र के रीवा में 750 मेगावाट क्षमता के सौर ऊर्जा संयंत्र का लोकार्पण प्रधानमन्त्री द्वारा किया गया। ये देश का सबसे बड़ा सौर ऊर्जा संयंत्र है। इससे उत्पन्न बिजली ग्रीन एनर्जी कहलायेगी। जैसा बताया गया इसके कारण 15.7 लाख टन कार्बन डाय आक्साइड का उत्सर्जन कम होगा जिसे रोकने के लिए ढाई लाख से भी ज्यादा वृक्षों की जरूरत होती। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने सौर उर्जा को श्योर, सीक्योर और प्योर बताकर जो व्याख्या की वह पूरी तरह से सही है। भारत जैसे देश में जहाँ अधिकतर हिस्सों में पूरे साल सूर्य का प्रकाश भरपूर मात्रा में मिलता हो वहां सूर्य की किरणों से उत्पन्न बिजली वैकल्पिक नहीं वरन मुख्य उर्जा होनी चाहिए। दुर्भाग्य से हम इसमें वैश्विक लिहाज से पिछड़ गए लेकिन देर से ही सही सौर ऊर्जा का महत्व और जरूरत भारत को समझ आ चुकी है। देश के अनेक हिस्सों में ऐसे और संयंत्र बन रहे हैं। रेलवे ने अपने फाटकों पर सौर ऊर्जा पैनल लगाकर बिजली बनाने की शुरुवात पहले ही कर दी थी। अन्य शासकीय संस्थान भी अपने भवनों की छतों पर सौर उर्जा पैनल लगवा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में सिचाई पम्प एवं स्ट्रीट लाइटों में सौर उर्जा का इस्तेमाल बढ़ना भी शुभ संकेत है। लेकिन निजी आवासों में सौर ऊर्जा पैनल लगाने वाले उपभोक्ताओं को बिजली विभाग से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलना कष्टदायी है। हालांकि अभी भी इसमें शुरुवाती लागत तुलनात्मक दृष्टि से ज्यादा है लेकिन अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति जागरूक नागरिक महंगा होने के बावजूद पर्यावरण संरक्षण के लिए सौर उर्जा पैनल लगवा रहे हैं। बेहतर हो शासन और प्रशासन ऐसे लोगों की सहायता हेतु भी सिंगल विंडो प्रणाली लागू करे। यही नहीं तो ऐसे भवन स्वामियों के नाम और पते प्रचारित भी करे जिससे औरों को भी प्रेरणा मिल सके। रीवा में लोकार्पित सौर ऊर्जा संयंत्र निश्चित तौर पर एक गौरवशाली उपलब्धि है। देश के औद्योगिक विकास में सौर ऊर्जा की भूमिका बहुत ही क्रांतिकारी होगी क्योंकि यह सस्ती बिजली के साथ ही पर्यावरण की रक्षा में भी बहुत ही मददगार है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 10 July 2020

सियासी शतरंज के बड़े मोहरे बचाने पैदल की कुर्बानी विकास के संरक्षकों का पर्दाफाश भी जरूरी




कोरोना को लेकर जो सरकारी विज्ञापन हम सभी को मोबाईल फोन पर जबरन सुनना पड़ता  है उसमें  एक पंक्ति है हमें बीमारी से लड़ना है बीमार से  नहीं | निश्चित रूप से इसमें एक सन्देश छिपा हुआ है | बीते दो दिनों तक  ये देश कोरोना और चीन जैसी समस्याओं से परे हटकर कानपुर वाले विकास दुबे की  जीवनगाथा सुनने में  उलझा रहा | 9 दिन पहले कानपुर के चौबेपुर थाने से पुलिस की एक टुकड़ी विकास को पकड़ने रात के समय  उसके गांव स्थित घर पहुँची  | थाने में बैठे उसके शुभचिंतक ने इसकी सूचना पहले ही उसे दे दी जिसके  कारण विकास ने भी जबरदस्त मोर्चेबंदी कर  डाली | पुलिस टुकड़ी उसे पकड़ने में कामयाब हो पाती उसके पहले ही उसके 8 लोगों को विकास के घर से चली  गोलियों ने भूनकर रख दिया और वह खुद भाग निकला | उप्र की पूरी पुलिस उसे ढूंढती रह गई | उसके कुछ सह्योगियों को मार भी गिराया गया  | विकास अतीत में भी हत्याएं  करता रहा था किन्तु गवाहों के अभाव में बचता गया | शासन और प्रशासन किसी भी  दल का रहा हो लेकिन विकास के हौसले निरन्तर विकसित होते गये | वह भाजपा और  बसपा से होते हुए वर्तमान में सपा से जुड़ा बताया जा रहा था  | और प्रशासन में तो उसका दखल नीचे से लेकर ऊपर तक था ही | वरना 2001 में एक मंत्री स्तर के व्यक्ति की पुलिस थाने में हत्या करने के बाद वह 19 साल तक जीवित न बना रहता | इस दौरान उसका हृदय परिवर्तन हो गया हो ऐसा नहीं था | दर्जनों अपराधिक प्रकरणों में वह आरोपी था | बीच - बीच में जेल आना - जाना भी लगा रहा | वह और उसकी पत्नी स्थानीय निकाय के चुनाव में भी जीते |

उस रात पुलिस का दल उसके घर आया तब विकास चाहता  तो पहले ही निकल भागता किन्तु जब थाने में ही उसके खैरख्वांह बैठे रहे तब उसका हौसला बुलंद होना स्वाभाविक था | लेकिन यहीं वह गलती कर बैठा | एक साथ आठ पुलिस वालों की  नृशंस हत्या की वजह से उप्र सरकार  पर जो चौतरफा हमले हुए उनके बाद विकास दुबे को मिलने वाले राजनीतिक संरक्षण पर सवाल उठने के अलावा  दिवंगत थाना प्रभारी द्वारा कुछ समय पूर्व उच्च अधिकारी को लिखी गई चिट्ठी का हल्ला मच जाने से पुलिस महकमे को भी विकास से नजदीकी नुकसान का सौदा लगने लगी | और आखिर में  वही हुआ जिसकी  जानकारी आज सुबह - सुबह मिली |

उज्जैन में पकड़े जाने के बाद कानपुर लाये जाने के दौरान कुछ किलोमीटर पहले हुए एक नाटकीय घटनाक्रम में विकास का अंत हो गया | उसके बाद से पुलिस की कार्रवाई संदेह और सवालों के घेरे  में आ गई है | पुलिस चाहे गर्म तवे  पर बैठकर भी  ये कहे कि विकास भागने की कोशिश में मारा गया , तब भी कोई विश्वास नहीं  करेगा क्योंकि खाकी वर्दी वालों की विश्वसनीयता इस देश में सबसे निचले स्तर पर मानी  जाती है | विकास ने यदि 8 साधारण लोगों की हत्या की  होती तब वह शायद इस तरह न मारा जाता |

उप्र पुलिस उसको इस तरह निपटा देगी ये मानने वाले 99 फीसदी रहे होंगे | इसलिए जब सुबह खबर आई तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ | और तो और अधिकतर लोग खुश भी हुए | यद्यपि एक वर्ग विशेष है जिसे पुलिस का ये तरीका रास नहीं आया | उसे भय है कि पुलिस को ऐसा करने की छूट मिल गयी तो वह एक तरह से स्वयंभू न्यायपालिका बन सकती है , जो बेहद खतरनाक होगा | और ऐसा सोचना  काफी हद तक सही भी है | लेकिन अनेक लोगों ने इस घटना के संदर्भ में  न्यायपालिका की अक्षमता पर भी निशाना साधा |  

वैसे ये पहला अवसर नहीं है जब पुलिस पर एनकाउंटर को लेकर संदेह उत्पन्न हुआ हो | ऐसी अधिकतर घटनाओं को योजनाबद्ध माना जाता है | जांच भी होती है लेकिन नतीजा शून्य ही रहता आया है | और वैसा ही इस घटना के बारे में होना तय है | लेकिन पूरे देश में ये बात भी तेजी से उठ खड़ी हुई है कि  विकास के अपराधिक कारोबार को बढ़ावा देने वाले उसके अदृश्य  संरक्षक राजनीतिक नेता और अफसरों पर गाज कब गिरगी ? कोई  माने या न माने लेकिन दो दशक से भी ज्यादा समय से अपराध का इतना बड़ा जाल फैलाने के बाद भी उसका निडर होकर घूमना बगैर राजनीतिक और प्रशासनिक सरपरस्ती के  नामुमकिन था | योगी आदित्यनाथ की सरकार को विपक्षी दल एनकाउंटर की सरकार कहते रहे हैं | लेकिन बीते तीन साल में वह भी विकास दुबे को ठिकाने नहीं लगा सकी तो इसका साफ मतलब है कि उसे शासन - प्रशासन से अभयदान हासिल था |

सवाल ये है कि अपराधी गिरोहों का सफाया करने के दावों के बावजूद अपराध घटने की बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं और इसका कारण ये है कि हमारा पूरा फोकस अपराधी को मिटाने पर टिक गया है जबकि प्रयास अपराधों की जड़ पर प्रहार करने का  होना चाहिए | जिस तरह कोरोना के विज्ञापन में बीमार के बजाय बीमारी से लड़ने की  समझाइश है उसी तरह अपराधी रूपी बीमार को रास्ते से हटाने से समस्या हल नहीं होने वाली | दरअसल अपराधी  होना भी  एक मानसिक स्थिति है | लेकिन विकास दुबे समान जहरीले पौधे को खाद पानी देकर वृक्ष बनाने वाली सोच को जब तक  समूल नष्ट नहीं किया जाता तब तक भविष्य में  अपराधियों के मारे जाने के बाद भी अपराधों की  नई फसल आती रहेगी |

विकास के पकड़े जाते ही पुलिस प्रशासन और राजनेताओं से उसके रिश्तों के खुलासे की चर्चा जोर पकड़ने लगी थी  और उसी के साथ उसके खात्मे के आशंका भी | और जैसे ही उसके मारे जाने की खबर आई वैसे ही उससे खुश होने वाले भी इस बात को लेकर निराशा से भर उठे कि एनकाउंटर में केवल विकास नहीं मारा गया बल्कि उसके साथ अपराधों को पाल - पोसकर रखने वाला नेता और नौकरशाहों का पूरा काला चिट्ठा भी  काल के गाल में समा गया | जहां तक विकास की बात है तो उसके मार दिए जाने से भले ही पुलिस ने अपने दावे के मुताबिक अपने 8 शहीदों की मौत का भरपूर बदला तो ले लिया किन्तु जिस तरह शतरंज के खेल में बादशाह और वजीर के साथ बाकी मोहरों को बचाने के लिए पैदल की बलि दे दी जाती है ठीक वैसे ही इस मामले में भी बड़े मोहरे बचा लिए गए |

 विकास भले ही कितना भी बड़ा सूरमा रहा हो लेकिन जब सरकारी व्यवस्था ने उसके सफाये की ठान ली तब उसे आसानी से ठिकाने लगा दिया गया | लेकिन असली सवाल तो ये है कि उप्र की पुलिस में इतना साहस तब जाकर ही क्यों आया जब उसे लगा कि विकास उसके साथ ही राज्य की राजनीति से जुड़े तमाम कद्दावर नेताओं के विनाश का कारण बनने जा रहा है |  इस घटना के बाद भी शासन , प्रशासन और राजनीति का अपराधियों से स्थायी गठबंधन समाप्त हो जायेगा , ये मान लेने से बड़ी मूर्खता दूसरी नहीं होगी | लेकिन यदि इस गठजोड़ का  बेरहमी से खात्मा नहीं  किया गया तो अपराध रूपी गाजर घास कभी मिटने का नाम नहीं लेगी |

विकास भले मारा जा चुका  हो लेकिन उसके मोबाईल में छिपे राज यदि सामने लाये जा सकें तो योगी सरकार को एक नये युग के सूत्रपात का श्रेय हासिल हो सकेगा | 

हालाँकि इसकी उम्मीद न के बराबर है |

विकास दुबे का मरना तो तय था लेकिन ...



कल सुबह से देर रात तक खबरों में छाया रहा विकास दुबे आज सुबह से फिर खबर बना हुआ है। लेकिन बीते 24 घंटों में फर्क ये पड़ा कि कल वह जीवित था लेकिन आज मृतकों की सूची में शामिल हो गया। उज्जैन के महाकाल मन्दिर प्रांगण में उसकी नाटकीय गिरफ्तारी या प्रायोजित सरेंडर की दास्तान अभी बेनकाब हुई ही नहीं थी कि सुबह-सुबह खबर आ गई कि सड़क मार्ग से उसे ले जाते समय कानपुर के समीप पुलिस वाहन पलट गया। उसके बाद विकास दुबे ने पुलिस वाले की पिस्तौल छीनकर भागने की कोशिश की और उस दौरान उसका काम तमाम कर दिया गया, जिसे पुलिसिया भाषा में एनकाऊंटर कहा जाता है। इस तरह बीते 24 घंटे से चले आ रहे नाटकीय घटनाक्रम का फिल्मी अंत हो गया। कल दिन भर जो उप्र पुलिस अपनी नाकामी के लिए दोषारोपित होती रही आज वह दूसरे कारणों से कठघरे में है। विकास कौन था और उसका अपराध क्या था ये बताने की जरूरत नहीं रही। समाचार माध्यमों ने उसकी पूरी कर्मपत्री पहले ही खोलकर रख दी थी। इसलिए उसके मरने का शायद ही किसी को अफसोस हो। उलटे जिन 8 पुलिस वालों की उसने हत्या की थी उनमें से कुछ के परिवारजन तो टीवी चैनल पर उप्र पुलिस और योगी सरकार को धन्यवाद देते दिखाई दिए। समाज का बड़ा वर्ग ऐसा है जो देश की लचर न्याय प्रणाली के मद्देनजर अपराधियों के इस तरह से खात्मे की तरफदारी करता है। स्मरणीय है गत 6 दिसम्बर 2019 को हैदराबाद में एक महिला पशु चिकित्सक के साथ दरिंदगी करने वाले चार बलात्कारियों को भी सुबह-सुबह मौका ए वारदात पर ले जाकर घटनाक्रम की जांच के दौरान उन सभी को पुलिस से हथियार छीनकर भागने के बाद एनकाऊंटर कर दिया गया था। ज्योंही उसकी खबर फैली पूरे देश से हैदराबाद पुलिस को बधाइयां दी गईं। यद्यपि एक वर्ग ऐसा भी था जिसने पुलिस कार्रवाई को साजिश बताते हुए घटना की सत्यता पर संदेह जताया। ऐसे लोगों का कहना था कि पुलिस को यदि इस तरह की स्वछंदता दे दी गई तब वह न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र में अतिक्रमण करने लगेगी। हालांकि ये बात भी  पूरी तरह सच है कि किसी भी अपराधी को उसके किये की सजा मिलने में इतना लंबा समय लगता है कि अपराध करने वाले बेख़ौफ़  हो जाते हैं। सख्त सजा देने वाले न्ययाधीश भी निष्पक्षता दिखाने के लिए अपराधी को बचाव के इतने अवसर देते हैं कि आम जनता को गुस्सा आने लगता है। आतंकवादी याकूब मेमन और निर्भया काण्ड के बलात्कारी दरिंदों की फांसी टलवाने के लिए जिस तरह देर रात देश का सर्वोच्च न्यायालय खोलकर सुनवाई की गयी उससे भले ही न्यायपालिका ने न्यायशास्त्र के इस सिद्धांत का पालन किया हो कि चाहे सौ अपराधी छूट जाएं किन्तु किसी बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन उसी न्यायशास्त्र से ही ये बात भी निकलकर आई कि न्याय में विलम्ब उससे इंकार करना है। उस लिहाज से विकास दुबे की मौत समाज के बड़े वर्ग को जहां राहत पहुंचा रही है वहीं ये कहने वाले भी बड़ी संख्या में है कि एनकाऊंटर के नाम पर पुलिस अपने ही पापों पर पर्दा डाल देती है। ये स्थिति दरअसल समाज में व्याप्त उस स्थिति को स्पष्ट करती है जिसमें एक अपराधी को पहले तो संरक्षण देते हुए महिमामंडित किया जाता है लेकिन ज्योंही वह शासन और प्रशासन के लिए बोझ बनता है, उसे रास्ते से हटा दिया जाता है। 2001 में पुलिस थाने के भीतर घुसकर उप्र सरकार में मंत्री का दर्जा प्राप्त नेता की हत्या करने के बाद विकास दुबे महज इसलिए बरी हो गया क्योंकि उस हत्या के प्रत्यक्षदर्शी पुलिस वालों ने अदालत में कुछ न देखने जैसे बयान दे डाले। मौजूदा प्रकरण में भी विकास को 8 पुलिस वालों की हत्या करते किसी ने नहीं देखा था। घटना के समय गाँव की बिजली बंद कर दी गई थी। उसको पकड़ने पुलिस टीम के जाने की पूर्व सूचना उसे थाने से ही मिल चुकी थी। मारे गए पुलिस वालों के शवों को पेट्रोल से जलाकार खाक करने की भी उसकी तैयारी थी। सवाल ये है कि 2001 में भाजपा के मंत्री पद का दर्जा प्राप्त नेता को थाने में घुसकर मारने के बाद निचली अदालत से जब उसे बरी किया गया तब उस फैसले के विरुद्ध अपील क्यों नहीं हुई? विकास को संरक्षण देने वालों में भाजपा, सपा और बसपा सभी के नेताओं के नाम आ रहे हैं। पुलिस और प्रशासन से उसका याराना तो साबित हो ही चुका है। ऐसे में जब किसी पुलिस अधिकारी ने उसकी गर्दन पर हाथ डालने की जुर्रत की तो विकास ने लाशें बिछा दीं। उप्र और बिहार में इस तरह के अपराधी भरे पड़े हैं। राजनेताओं के साथ ही वे पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारियों से भी निकट सम्बन्ध रखते हैं जिसके पीछे आर्थिक हिस्सेदारी ही आधार होता है। विकास के सियासी हस्तियों और नौकरशाहों से रिश्तों की पोल खोलने का समय ज्योंहीं आया त्योंहीं उसका खात्मा हो गया। आज हुआ एनकाऊंटर सही था या सुनियोजित ये शायद ही पता चल सके क्योंकि हैदराबाद की तरह से ही यहाँ भी देखने वाले केवल पुलिस वाले ही थे। लेकिन उप्र की पुलिस इस आरोप से तो नहीं बच सकती कि विकास जबरदस्त नाकेबंदी के बाद भी कानपुर से निकलकर फरीदाबाद होते हुए मप्र के उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर में दर्शनार्थी बनकर आ पहुंचा। उसकी गिरफ्तारी को लेकर भी संदेह बना रहा। एक बात तो सच है कि उप्र पुलिस के हत्थे चढ़ने पर अपना अंजाम मालूम होने के कारण ही उसने मप्र में गिरफ्तार होना पसन्द किया। लेकिन वह भूल गया कि अपराध की दुनिया का याराना भी स्वार्थों के आदान प्रदान पर निर्भर करता है। और हालिया घटनाक्रम के बाद वह शासन-प्रशासन के लिए खतरा बन गया था। इस तरह विकास की कहानी तो खत्म हो गई जिस पर अनेक फिल्म बनाने वालों ने पटकथा लिखना भी शुरू कर दिया होगा किन्तु हत्या के संदेहों में घिरी उसकी मौत से जहाँ अनेक कहानियां अनकही रह गईं वहीं कुछ नई कहानियों का जन्म भी हो सकता है। उप्र पुलिस विभाग के सैकड़ों लोग विकास से निकटता से जुड़े थे। उनकी जानकारी मिल चुकी है। कुछ तो गिरफ्तार भी हो चुके हैं। हो सकता है उनमें से कुछ कानून के शिकंजे में फंस भी जाएं किन्तु असली दोषी तो वे राजनेता हैं जो विकास जैसे मामूली गुंडे को अपराध की दुनिया का बादशाह बना देते है। उप्र की योगी सरकार ने तीन साल पहले सत्ता सँभालते ही दर्जनों अपराधियों के ठिकाने लगा दिया। बीते एक सप्ताह में विकास के अनेक सहयोगी भी चटका दिये गये। आम जनता में मुख्यमंत्री की दबंग छवि भी इस कारण से बनी किन्तु ये भी सही है कि योगी महाराज ने अभी तक अपराधियों को संरक्षण देने वाले एक भी राजनेता को सीखचों में नहीं पहुंचाया। और यही वजह रही कि विकास दुबे द्वारा किये गये हत्याकांड से लेकर आज उसकी मौत तक के समूचे घटनाक्रम में पुलिस और प्रशासन के तो कई चेहरे अनावृत्त होने को आ गये लेकिन नेता नामक प्राणी बचे हुए हैं। विकास जीवित रहता तो अनेक सफेदपोशों की असलियत सामने आ जाती। दरअसल विकास महज एक व्यक्ति नहीं अपितु एक प्रवृत्ति है जो हमारी शासन व्यवस्था पर पूरी तरह से हावी है। इसलिए जब तक जड़ों में मठा डालने जैसी बुद्धिमत्ता नहीं दिखाई जाती तब तक विकास जैसी नई टहनियां निकलती रहेंगीं। लेकिन सवाल ये है कि ये दुस्साहस करेगा कौन?

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 9 July 2020

कांग्रेस और गांधी परिवार पर जवाबदेही का दबाव



1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद स्व. अर्जुन सिंह ने सोनिया गांधी को कांग्रेस की  बागडोर संभालने के लिए काफी मनाया था | लेकिन उस समय वे अपने पति की की दर्दनाक मौत के बाद परिवार की सुरक्षा के लिए ज्यादा चिंतित थीं | लिहाजा पार्टी की बागडोर स्व. पीवी  नरसिम्हाराव और फिर स्व. सीताराम केसरी जैसों के हाथ में आ गयी | इस दौरान न सिर्फ स्व. अर्जुन  सिंह और स्व. नारायण दत्त तिवारी अपितु गांधी परिवार के निकटस्थ पी. चिदम्बरम और स्व. माधवराव सिन्धिया तक ने कांग्रेस छोड़कर अलग पार्टी बनाई | कुछ समय तक ऐसा लगने लगा था कि कांग्रेस और गांधी परिवार का नाता खत्म हो चला था किन्तु बाद में राजनीति ने फिर पलटा खाया और श्री सिंह की योजना के चलते श्री केसरी  को उठाकर कांग्रेस मुख्यालय से बाहर करते हुए श्रीमती गांधी को बागडोर सौंप दी गई | इस फैसले पर किसी को न आश्चर्य   हुआ और न ही आपत्ति | अतीत में नेहरू जी के दौर में ही उनके बेटी स्व. इंदिरा गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनाकर मुख्य धारा में स्थापित  कर दिया गया था | इंदिरा जी की उसके पहले कांग्रेस संगठन में कौन सी महत्वपूर्ण भूमिका में रही ये विश्लेषण का विषय है | स्व. अर्जुन सिंह ने सोनिया गांधी को कांग्रेस की कमान सौपते समय उठे सवालों के जवाब में कहा था कि गांधी परिवार कांग्रेस को एकसूत्र में बांधे रखने वाली  शक्ति है | 2004 में कांग्रेस की सत्ता में वापिसी से सोनिया जी के चयन की सार्थकता स्वयंसिद्ध हो गयी | लेकिन अंततः परिवार की परम्परा का निर्वहन करते हुए उन्होंने भी पंडित नेहरु और इंदिरा जी की तरह अपने बेटे राहुल और बेटी प्रियंका को कांग्रेस संगठन के शीर्ष पदों पर स्थापित कर दिया | नेहरु जी  और इंदिरा जी के समय तो फिर भी पार्टी में असहमति के दो - चार स्वर सुनाई दे जाते थे लेकिन आज की कांग्रेस पूरी तरह से गांधी परिवार की गिरफ्त में है | 2019 के लोकसभा चुनाव की पराजय  का दायित्व लेते हुए जब राहुल ने पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ते हुए संकेत दिया कि कोई गांधी इस पद पर नहीं  आएगा तब ये आशा बंधी थी कि पार्टी में  आन्तरिक लोकतंत्र का जो वायदा उन्होंने शुरुवात में किया था उसे वे पूरा करेंगे किन्तु अनेक महीनों की  अनिश्चितता के बाद भी कांग्रेस को कोई अध्यक्ष लायक नहीं मिला और ले देकर सोनिया जी ही कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर फिर मुखिया  बन बैठीं | उनकी पुत्री प्रियंका वाड्रा भी महासचिव पद पर कायम हैं | जबकि कुछ न रहते हुए भी राहुल ही पार्टी  के चेहरे बने हुए हैं | उससे भी बड़ी बात ये है कि गांधी परिवार ये स्वीकार नहीं कर पा रहा कि देश की सत्ता उनके हाथ में नहीं है | उनकी पूरी राजनीति में जो राजशाही अंदाज झलकता है वही उनके और कांग्रेस दोनों के लिए समस्या पैदा कर  रहा है | बतौर विपक्षी नेता सरकार पर तीखा हमला करना गांधी परिवार का फर्ज भी है और अधिकार भी , किन्तु उनकी  शान में कोई गुस्ताखी न हो , ये सोचना गैर प्रजातांत्रिक है | ताजा प्रसंग इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट , राजीव गांधी फाउंडेशन और राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट की जाँच का है | बीते कुछ समय से गांधी परिवार मोदी सरकार के विरुद्ध बेहद आक्रामक और  मुखर हो उठा था | लद्दाख में चीनी घुसपैठ को बड़ा मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री को घेरने का अभियान जैसा चलाया  जा रहा था | बतौर विपक्षी उनका ऐसा करना स्वाभाविक माना जा सकता था किन्तु राष्ट्रीय सुरक्षा जब दांव पर लगी हो तब विपक्ष भी जिस जिम्मेदारी का परिचय अतीत में देता रहा वह गांधी परिवार भुला बैठा | और इसी झोंक में राहुल ने प्रधानमंत्री के नाम का मजाक बनाते हुए उन्हें सरेंडर मोदी कहकर सम्बोधित किया | इसके अलावा श्री मोदी पर लगातार ये आरोप लगाया  जाता रहा कि वे चीन से डरते हैं और इसीलिये पूरे विवाद के दौरान उन्होंने न उसका नाम लिया न ही वहां के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का | लेकिन जब श्री गांधी ने प्रधानमंत्री को सरेंडर मोदी कहा तब भाजपा ने भी तुरुप का पत्ता निकालकर गांधी परिवार और कांग्रेस के चीन से मधुर रिश्तों का पिटारा खोलते हुए पलटवार कर दिया | सामने आये भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश  नड्डा | उन्होंने कांग्रेस पार्टी के चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) का खुलासा करते हुए राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन सरकार तथा चीनी दूतावास से धन मिलने की बात सार्वजनिक की  | इसके साथ ही प्रधानमंत्री राष्ट्रीय आपदा कोष से भी  फाउंडेशन को धन दिये  जाने की बात सामने लाई गई | डोकलाम विवाद के समय राहुल के दिल्ली स्थित चीनी दूतावास में जाने के  साथ ही  जिनपिंग सहित दूसरे चीनी नेताओं के साथ राहुल और श्रीमती गांधी की निजी मुलाकातों पर भी सवाल दागे गए | और गत दिवस उक्त सभी संस्थानों की जाँच हेतु केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा विभिन्न मंत्रालयों को मिलाकर एक  समिति बना दी गयी जो उनको चीन और अन्य विदेशी स्रोतों से मिले धन की जाँच करेगी | इस पर राहुल ने गुस्से से भरा एक ट्वीट किया जिसमें प्रधानमन्त्री पर तीखे कटाक्ष किये गये | उक्त सभी संस्थान कहने को तो सार्वजनिक न्यास हैं लेकिन वस्तुतः उन पर गांधी परिवार का  ही पूरा नियन्त्रण है | इनकी गतिविधियों से वैसे तो किसी को सरोकार नहीं  रहा लेकिन कांग्रेस पार्टी की पूरी तरह विपरीत  विचारधारा वाली चीन की कम्यनिस्ट पार्टी के साथ जुगलबन्दी और फिर राजीव गांधी के नाम से बने फाउंडेशन को चीन से मिले अनुदान के अलावा मिली अन्य विदेशी आर्थिक  सहायता के कारण  संदेह और गहरा गये | इसमें दो राय नहीं है कि भाजपा अध्यक्ष  द्वारा किया गया हमला विशुद्ध राजनीतिक पैंतरा था और सरकार द्वारा गत दिवस बिठाई गई जांच को भी कांग्रेस तथा गांधी परिवार को घेरने का प्रयास कहा जा सकता है | लेकिन फाउंडेशन द्वारा अपनी वार्षिक  जाँच रिपोर्ट में चीन से मिले धन के साथ प्रधानमंत्री राष्ट्रीय आपदा कोष से हासिल अनुदान का विवरण देने के बावजूद उनका औचित्य साबित करने में कांग्रेस और गांधी परिवार अब तक तो विफल रहे हैं | नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर चल रहे राहुल और श्रीमती गांधी पर इस जाँच में भी अपराधिक प्रकरण बनेगा या नहीं  ये कहना जल्दबाजी होगी लेकिन इससे उनका नैतिक पक्ष कमजोर हुआ है | अभी तक श्री गांधी ने चीनी दूतावास जाने , चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से सम्झौता ज्ञापन हस्ताक्षरित करने और फाउंडेशन को चीनी अनुदान के बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं  दिया  | सरकारी जांच तो अपनी गति से चलेगी और उसके पीछे के निहित उद्देश्य से भी इंकार नहीं  किया जा सकता किन्तु कांग्रेस और गांधी परिवार   केवल सियासी प्रतिशोध का आरोप  लगाकर खुद को सहानुभूति का पात्र नहीं  बना सकते | उसके लिए जरूरी है वह राजपरिवार वाली श्रेष्ठता की मानसिकता से बाहर निकलकर जनता के बीच उक्त प्रश्नों का जवाब दे क्योंकि बाकी सब बातें तो अपनी  जगह हैं किन्तु कांग्रेस और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच समझौता और राजीव गांधी के नाम से बने संस्थान को चीन  सरकार से प्राप्त  धन के बारे में तो जनता को साफ़ - साफ़ बताना ही चाहिये | फ़िलहाल तो गांधी परिवार और उसके साथ ही कांग्रेस के लिए कठिन स्थितियां बनती जा रही हैं | यदि इनसे ठीक तरह से नहीं निपटा गया तो पार्टी में टूटन की आशंका और मजबूत हो जायेगी | और बकौल स्व. अर्जुन सिंह जो गांधी परिवार कांग्रेस की एकजुटता का आधार रहा वही उसके बिखराव की वजह बन सकता है |

-रवीन्द्र वाजपेयी