Wednesday, 5 August 2020

कारसेवक बलिदानी भाव न दिखाते तो आज भी सपना ही रहता राम मन्दिर




ऐसा लगता है मानों कल की ही बात है। 30 अक्टूबर 1990 और 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में जो हुआ वह आजाद भारत के इतिहास के नव लेखन का आधार बन गया जिसकी प्रस्तावना आज पूरी हो गई। राम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर का भूमि पूजन सदियों के संघर्ष का परिणाम है। सबसे अच्छी बात ये है कि कल तक इस समूचे अभियान का मजाक उड़ाने वाले राम की विरासत में हिस्सेदारी का दावा करने आगे आ गए हैं। राम राजनीति से परे हैं, वे तो राष्ट्रपुरुष हैं, वे इस देश की महान संस्कृति के जीवंत ध्वजवाहक हैं। जो उन्हें न मानने का दिखावा करते हैं वे भी मन ही मन राम के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं। जिसकी अभिव्यक्ति बीते कुछ दिनों से दिखाई देने लगी थी और आज खुलकर सामने आ गयी। राम को कपोल कल्पना मानकर हवा में उड़ाने वाले ये दावा कर रहे हैं कि राम तो सभी के हैं। लेकिन इस बात से इंकार तो कभी किया ही नहीं गया। भगवान के रूप में न सही किन्तु एक महामानव, आदर्श राजा और मर्यादाओं के प्रतीक के तौर पर तो श्री राम पूजनीय और अनुकरणीय हैं ही। गुलामी के दौर में हमारी सांस्कृतिक जड़ों को काटने का खूब प्रयास हुआ। मुगलों ने आतंक और जोर जबरदस्ती से तो अंग्रेजों ने चालाकी से हमारी मौलिकता को नष्ट करने का हरसंभव प्रयास किया। सतही तौर पर वे सफल भी दिखे लेकिन इस देश की सनातन संस्कृति अमरत्व का वरदान प्राप्त है। अनेकानेक संकटों के बावजूद इस देश ने अपनी जड़ों को सूखने नहीं दिया और आज अयोध्या में जो भूमिपूजन संपन्न हुआ वह उसी जिजीवषा का सुखद परिणाम है। ये अत्यंत ही संतोष का विषय है कि राम और उनके भव्य मंदिर के निर्माण के प्रति स्वीकृति और सहमति अब राजनीतिक प्रतिबद्धता के सीने पर पैर रखकर ऊंची आवाज में व्यक्त्त की जा रही है। जिन्हें राम मंदिर में राजनीति की बू आती थी वही आज उसे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक मानकर हर्षोल्लास करते दिख रहे हैं। राम को अपना आदि पुरुष मानने में जिन्हें शर्म महसूस होती थी तथा राजनीतिक पूंजी खो जाने का डर लगता था वे ही आज अपनी वंशावली में राम को अपना पूर्वज बताते घूम रहे हैं। इस प्रकार भारतीय राजनीति में ये एक बड़े चारित्रिक बदलाव का संकेत है जो हर दृष्टि से स्वागतयोग्य है। गर्व से कहो हम हिन्दू हैं के नारे से चिढ़कर गर्व से कहो हम भारतीय हैं पर जोर देने वाले ही आज ये कहते दिख रहे हैं कि हिंदुत्व किसी की बपौती नहीं है और वे भी उतने ही हिन्दू हैं जितने बाकी सब। हालाँकि ये दावे कितने दिन जारी रहेंगे ये कहना मुश्किल है क्योंकि राजनीति से जुड़े लोग बहुत ज्यादा विश्वसनीय नहीं होते किन्तु राम मंदिर का मुद्दा राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय बन गया ये परम संतोष का विषय है। भारत की एकता में श्री राम का महत्व किसी से छिपा नहीं है। करोड़ों देवताओं के अस्तित्व को स्वीकार करने वाले सनातन धर्म में जिन दो अवतारों ने आम जन के साथ अपना तादात्म्य स्थापित किया उनमें श्री राम और श्री कृष्ण ही थे। यही वजह है कि ये भारत की लोक संस्कृति के अभिन्न हिस्से हैं। अयोध्या में श्री राम की जन्मभूमि पर बने मुगलकालीन ढांचे को हटाये जाने का संघर्ष अनेक शताब्दियों से चला आ रहा था। समय के साथ उसका स्वरूप भले ही बदलता रहा  लेकिन हिन्दू समाज के मन में अपने आराध्य की जन्मस्थली पर बलात खड़ा किया वह ढांचा कील की तरह चुभता था। आखिरकार वह समय आया जब उस चुभन ने हुंकार का रूप ले लिया और फिर वह हुआ जिसकी सुखद परिणिति आज देखने मिली। मंदिर आन्दोलन से जुड़े वे सभी जाने-अनजाने लोग अभिनंदन के हकदार हैं जिन्होंने इस संघर्ष को सफलता के इस मुकाम तक पहुंचाया। इसका श्रेय लूटने की होड़ भी चल रही है। ये दावे भी हो रहे हैं कि हम ऐसा न करते तो ये हो पाना संभव नहीं था। कौन सच्चा है कौन झूठा इस झगड़े में पड़े बिना आज का दिन राष्ट्रीय स्वाभिमान के उत्कर्ष का उत्सव मनाने का है। अयोध्या अपने प्राचीन वैभव को पुन: अर्जित करे ये मनोकामना हर किसी की है क्योंकि वह रामराज्य का प्रतीक है। भव्य राम मंदिर का निर्माण उसी तरह भारत के स्वाभिमान का प्रतीक बनेगा जैसा कभी सोमनाथ का मंदिर बना था। बीते तीन दशक का घटनाचक्र आज एक बार फिर स्मृति पटल पर सजीव हो उठा है। इस ऐतिहासिक अवसर पर उन हजारों कार सेवकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना परम आवश्यक है क्योंकि वे बलिदानी भावना न दिखाते तो आज भी राममन्दिर सपना ही रहता।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 4 August 2020

भारत के पुनरुथान का ऐतिहासिक पल होगा राम मंदिर का भूमिपूजन




सदियों से चले आ रहे संघर्ष के बाद आखिरकार वह घड़ी आ ही गयी जब अयोध्या में भगवान श्री राम के जन्मस्थान पर भव्यतम मंदिर निर्माण की धार्मिक प्रक्रिया शुरू होगी। कल 5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विधिवत भूमिपूजन कर निर्माण का शुभारम्भ कर देंगे। चूँकि मंदिर में प्रयुक्त होने वाले पत्थरों की गढ़ाई बीते कई दशक से चली आ रही है इसलिए निर्माण पूरा होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। सौभाग्य से कानूनी अड़चन भी नहीं बची । केंद्र के साथ उप्र में भी मंदिर समर्थक पूर्ण बहुमत वाली सरकार होने से राजनीतिक स्तर पर भी कोई अवरोध नहीं रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दोनों राम जन्मभूमि के आंदोलन से जुड़े रहे थे। इसलिए वे दोनों न सिर्फ मंदिर के निर्माण अपितु समूचे अयोध्या क्षेत्र को भारतीय संस्कृति और आध्यात्म का विश्वस्तरीय केंद्र बनाने में व्यक्तिगत रूचि ले रहे हैं। जैसी जानकारी आई है उसके अनुसार मंदिर निर्माण के साथ ही अयोध्या में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जायेंगीं। प्रधानमन्त्री इस बारे में बेहद व्यवहारिक हैं। उनके निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में जिस तरह से उन्होंने गंगा तटों के साथ ही काशी विश्वनाथ मंदिर के चारों तरफ विकास करवाया उससे वहां का स्वरूप ही बदल गया। अयोध्या के कायाकल्प की योजना तो और भी व्यापक है। ये देखते हुए आगामी कुछ वर्षों के भीतर उप्र के इस अति पिछड़े अंचल में विकास का नया सूर्योदय दिखाई देगा। दुनिया भर से हिन्दू धर्मावलम्बी इस स्थल की यात्रा पर आयेंगे। जिस तेजी से उप्र सरकार ने अयोध्या के चतुर्मुखी विकास की शुरुवात की है उसे देखते हुए ये उम्मीद गलत न होगी कि वह आने वाले कुछ वर्षों में उत्तर भारत का सबसे बड़ा तीर्थस्थान बनेगी । लेकिन जिस तरह से राम के राज्याभिषेक के पहले मंथरा नामक एक स्त्री ने अपनी कुंठित मनोवृत्ति का परिचय दिया था , वैसी ही अनेक मंथराएं आज भी राम मन्दिर के निर्माण में अड़ंगा लगाने पर आमादा हैं। सदियों से समूचा देश जिस आकांक्षा को संजोये हुए था उसके पूरे होने की घड़ी तो राष्ट्रीय हर्षोल्लास का विषय होना चाहिए किन्तु कुछ लोग हैं जो दूध में नीबू निचोड़ने की अपनी बुरी आदत से बाज नहीं आ रहे। कोई महूर्त पर सवाल उठा रहा है तो किसी को इस बात पर ऐतराज है कि भगवान राम पर एक ही विचारधारा का कब्जा हो चला है। यद्यपि मंथरा के इन कलियुगी मानस पुत्रों के बीचे कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें राम मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय आकांक्षाओं का पूरा होना लग रहा है। सोशल मीडिया पर उनके द्वारा प्रसारित सन्देश इसका प्रमाण हैं। मप्र के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों में से एक अपने आध्यात्मिक गुरुदेव के विचारों के अनुरूप ही मुहूर्त को अशुभ बताने में जुटे हैं वहीं कुछ माह पहले ही सत्ता से बाहर हुए दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ करवाकर मंदिर निर्माण पर हर्ष व्यक्त कर रहे हैं। कुछ समय पहले तक मुस्लिम मतों के डर से मंदिर का नाम लेने से परहेज करने वाले अब ये कहते घूम रहे हैं कि हम भी मन्दिर बनवाना चाहते थे और राम पर किसी का एकाधिकार नहीं है, वे तो सभी के हैं। वैसे ये शुभ संकेत है कि राम मन्दिर के आन्दोलन को राजनीति के नजरिये से देखने वालों को अब इस सच्चाई का एहसास हो गया है कि ये देश के बहुसंख्यक हिन्दू समाज की सदियों पुरानी आकांक्षा से जुड़ा मुद्दा था। जहां तक रास्वसंघ की विचारधारा से जुड़े लोगों द्वारा उस पर कब्जा कर लेने के बात है तो ये उसके विरोधियों की ऐतिहासिक भूल का नतीजा था। आजादी के बाद ढांचे में मूर्तियाँ रखने, बरसों बाद ताला खुलवाने अथवा शिलान्यास की बात हो, सभी कांग्रेस की केन्द्रीय और प्रांतीय सत्ता रहते हुए। ऐसे में जब मंदिर निर्माण का आन्दोलन शुरू हुआ तब कांग्रेस यदि उसका समर्थन करते हुए आगे आती तब भाजपा का पुनरुद्धार इतनी जल्दी न हुआ होता। लेकिन लालकृष्ण आडवाणी की सुप्रसिद्ध राम रथ यात्रा को लालू प्रसाद यादव द्वारा रोके जाने के बाद जब भाजपा ने लालू और उप्र की मुलायम सरकार से समर्थन वापिस लिया तब कांग्रेस ने उसे और लालू दोनों को अपने समर्थन की बैसाखी प्रदान करने की जो हिमालयन गलती की उसकी वजह से उसकी छवि हिन्दू विरोधी पार्टी की बन गयी। उधर मुसलमान इसलिये उससे कटते गये क्योंकि राम मन्दिर के आन्दोलन की जमीन कांग्रेस के शासन में ही तैयार हुई। पार्टी चाहती तो बाद में भी अपनी गलती सुधार सकती थी किन्तु संघ परिवार और भाजपा के अंधे विरोध के कारण वह जनमत को पढ़ने में नाकामयाब रही। अब जबकि राम मन्दिर एक वास्तविकता बनने के कगार पर आ गया तब कांग्रेस के कुछ नेता तो परिपक्वता का परिचय दे रहे हैं लेकिन कुछ अभी भी खिसियाहट में मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग का ढोल पीटते फिर रहे हैं। मन्दिर मुद्दा यदि संघ परिवार और भाजपा के साथ जुड़ा तो इसमें सबसे बड़ी गलती कांग्रेस की है। उसके नेता ये तो कहते हैं कि स्व. राजीव गांधी भी मंदिर बनवाने के इच्छुक थे लेकिन उनके न रहने के बाद भी कभी पार्टी नेतृत्व ने इसे लेकर कोई प्रयास नहीं किया। उल्टे उसके कतिपय बड़े नेता अदालत में मुस्लिम पक्ष की तरफदारी करते दिखे। कांग्रेस चाहती तो मुस्लिम पक्ष को समझाकर न्यायालय के बाहर दोनों में समझौता करवा सकती थी लेकिन उसमें साहस का अभाव था। इतिहास हर किसी को अपनी गलती सुधारने का अवसर देता है। कांग्रेस के पास तो तुरुप के सारे पत्ते थे लेकिन वह उनका सही उपयोग नहीं कर सकी और हिन्दुओं के साथ ही मुसलमानों का भरोसा भी गंवा बैठी। जानकार बताते हैं कि स्व.राजीव गांधी ने प्रयाग में संत समाज द्वारा जन्मभूमि को लेकर जो फैसले किये उनके दबाव में आकर शिलान्यास का फैसला किया जिसमें स्व. नारायण दत्त तिवारी की भी भूमिका थी। लेकिन बाद में कारसेवकों पर गोली चलवाने वाली मुलायम सरकार का समर्थन करने के कारण कांग्रेस हिन्दुओं की नजर में खलनायक बन गयी लेकिन उसे मुस्लिम मतों का घाटा भी हो गया जिनको मुलायम सिंह ले उड़े। आज जबकि वह ऐतिहासिक क्षण आ गया है जब भारत की पहिचान कहे जाने भगवान राम के जन्मस्थान पर भव्यतम मंदिर बनाने की शुरुवात हो रही है तब भी कांग्रेस के कतिपय विघ्नसंतोषी अपने बयानों से ऐसा आभास करवा रहे हैं जैसे राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनर्स्थापना का यह गौरवशाली अवसर उनके लिए दु:ख का विषय है। बावजूद इसके लगभग सभी पार्टियाँ ये समझ गई हैं कि राम और हिन्दुत्व से दूर रहकर राजनीति संभव नहीं रही। भाजपा विरोधी माने जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी एक ताजा चर्चा में स्वीकार किया कि ये हिंदुत्व का युग है। उन्होंने ये भी स्वीकारा कि मंदिर निर्माण को लेकर कांग्रेस ने हाथ आये अवसरों को नासमझी के कारण गंवाया जिसकी वजह से भाजपा हर तरह की बाधा दौड़ में सफल होती हुई असम्भव को संभव बनाने का कारनामा दिखा सकी। बीते साल 5 अगस्त को जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया था और इस वर्ष राम मन्दिर का भूमि पूजन किया जा रहा है। इन दोनों मुद्दों पर एक लंबा संघर्ष चला और न जाने कितने साधारण और असाधारण लोगों ने अपने जीवन को खफा दिया। लेकिन कहना गलत नहीं होगा कि नियति ने नरेंद्र मोदी को ये इतिहास रचने का अवसर प्रदान किया। लेकिन जिस तरह अनुच्छेद 370 को हटाते समय स्व. डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का स्मरण स्वाभाविक रूप से हो आया ठीक वैसे ही राम मन्दिर के भूमिपूजन पर विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे स्व. अशोक सिंघल के भगीरथी प्रयासों की अनगिनत स्मृतियाँ सजीव हो रही हैं, जिन्होंने पूरी तरह बिखरे संत समाज को मंदिर आन्दोलन से जोड़कर उसे नैतिक शक्ति प्रदान की। निश्चित रूप से वह एक ऐतिहासिक पल होगा जब अयोध्या में श्री मोदी राम मन्दिर की आधारशिला रखेंगे। न सिर्फ भारत अपितु पूरे विश्व में ये भारत के उस पुनरुत्थान का उद्घोष होगा जिसकी भविष्यवाणी महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद बहुत पहले कर गए थे।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 August 2020

टैक्स और ब्याज दरें न घटीं तो आपदा बजाय अवसर के अवसाद बन जाएगी मध्यमवर्गीय नौकरपेशा और कारोबारी राहत से वंचित


 


 

भारतीय अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के दावे होने लगे हैं | जीएसटी का संग्रहण यद्यपि बीते साल की तुलना में 14 फीसदी कम जरूर है लेकिन अभी भी उद्योग - व्यापार में असली रंगत नहीं आई है | इस वजह से राजस्व वसूली में कमी आना स्वाभाविक ही है | गत दिवस केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ये दावा किया कि देश में मोबाईल फोन के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि होने जा रही हैं | आगामी पाँच  सालों में तकरीबन 12 लाख करोड़ के मोबाइल और उनके पुर्जे बनने लगेंगे | इनसे प्रत्यक्ष  और परोक्ष रूप से 12  लाख नये  रोजगार सृजित होंगे | केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में शुरू किये गये प्रोडक्शन लिंक इंसेटिव प्रोग्राम के अंतर्गत दुनिया की प्रमुख 22 मोबाइल निर्माता कंपनियों ने भारत  में रूचि दिखाई है |  हालांकि अभी भी  भारत मोबाइल उत्पादन में अग्रणी देशों की  कतार में है लेकिन चीनी कम्पनियां अपना दबदबा बनाये हुये थीं जो अपना कारोबार समटने के  संकेत दे रही हैं | एपल और सैमसंग जैसे बड़े ब्रांड भारत में जब अपना उत्पादन बढ़ाएंगे तब निश्चित रूप से वैश्विक बाजारों में मेड इन इंडिया की धाक बढ़ेगी | उत्पादन का बड़ा हिस्सा निर्यात होने की उम्मीद और भी अच्छा संकेत है | पहले आर्थिक मंदी और उसके बाद ही कोरोना संकट आ जाने से अर्थव्यवस्था की कमर टूट गयी | लेकिन बीते दो महीनों में जिस तेजी से वापिसी हुई वह निश्चित तौर पर उत्साह जगाने वाली है | हालांकि ऑटोमोबाइल के अलावा फार्मा सेक्टर भी बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहा है लेकिन अभी तक उद्योग व्यापार पूरी तरह से रंगत पर नहीं आया तो उसका कारण सरकार की वित्तीय नीतियों में कुछ कमियाँ  है | कोरोना संकट के इस दौर में देश में  सैनिटाईजर का उत्पादन आश्चर्यजनक तौर पर बढ़ा | लेकिन उस पर 18 फीसदी जीएसटी लगाना किसी भी दृष्टि  से उचित नहीं कहा जा सकता | भारत इस समय जिस आर्थिक दौर से गुजर रहा है उसमें उत्पादक और उपभोक्ता दोनों के हितों का संरक्षण करने की जरूरत है | ये बात बिलकुल सही है कि संकट के इस दौर में सरकार को भी राजस्व की बेहद जरूरत है किन्तु उसे अपने कर ढाँचे को व्यावहारिक  बनाना चाहिए | 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज को लेकर तरह - तरह के मजाक चले | फिर भी सरकार की सोच को दूरगामी मानकर उसे नजरअंदाज कर दिया गया | लेकिन अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये रखने वाले मध्यमवर्गीय नौकरपेशा वर्ग के लिये अब तक कुछ नहीं किया गया | बैंक के कर्जे  चुकाने के लिए जो मोह्लत मिली वह निश्चित रूप से एक बड़ी राहत है लेकिन उस अवधि में ब्याज का पहिया तो बिना रुके अपनी गति से घूम ही रहा है | और जिस दिन वह मोहलत खत्म होगी उसी दिन से बैंक वाले वसूली का दबाव बनाने लगेंगे | आपदा को  अवसर में बदलने का जो आह्वान प्रधानमन्त्री द्वारा किया गया उसके औचित्य और आवश्यकता को हर कोई स्वीकार कर रहा है | आत्मनिर्भर  भारत के संकल्प पर भी जिस तरह  की उत्साहजनक प्रतिक्रिया उपभोक्ता और विक्रेता दोनों की तरफ से आई वह निश्चित रूप से शुभ संकेत है और ये दर्शाती है कि संकट के  इस दौर में भी समाज का हर वर्ग सरकार और राष्ट्रीय नेतृत्व की आवाज में अपनी आवाज मिलाने के लिए प्रतिबद्ध है | रविशंकर प्रसाद ने गत दिवस देश में उत्पादन बढ़ाने और औद्योगिक क्षेत्र में भारी निवेश आने की जो बात कही उसकी सत्यता पर संदेह करना किसी भी तरह से अनुचित होगा लेकिन विचार  करने वाली बात ये भी है कि जब मजदूर , नौकरपेशा , व्यापारी , उद्योगपति सभी की  कमाई घटी तब सरकार अपनी  कमाई में से एक पाई तक छोड़ने राजी नहीं है | बैंकों ने ब्याज नहीं घटाया , बिजली विभाग जबरिया वसूली करने  पर आमादा है , आयकर ,जीएसटी और नगरीय प्रशासन से जुडी संस्थाएं भी अपना कर एकत्र करने में जुटे हैं | लेकिन जब मध्यमवर्ग की नौकरी चली गई या वेतन कम हो गया तथा व्यापारी और उद्योगपति की आय में जबरदस्त कमी आ गई तब उस पर दबाव बनाकर करों की उगाही कम से कम फिलहाल तो टालना चाहिए | यदि सरकार आपदा को वाकई अवसर में बदलना चाह रही है तो उसे अपने कर ढांचे को नये सिरे से ऐसा बनाना होगा जिससे कर अपवंचन रुक सके तथा सरकार के पास ज्यादा राजस्व आये | जीएसटी की दरें कम होने की उम्मीद   उसे नियंत्रित करने वाली कौंसिल  की हर बैठक के  पहले की जाती है लेकिन राहत के नाम पर ऊँट के मुंह में जीरा ही मिलता है | रिजर्व बैंक द्वारा समय - समय पर घटाई जाने वाली ब्याज दर भी इतनी मामूली होती है कि उसका ज्यादा लाभ नहीं हो पता | बेहतर हो सरकार अब ऐसा कोई पैकेज लेकर आये जिससे नौकरपेशा मध्यमवर्ग और छोटे तथा मध्यम व्यापारी और उद्योगपतियों को सांस लेने का अवसर मिले | एक हाथ से दी गयी राहत पेट्रोल - डीजल की जरिये  वसूल करने की नीति आपदा को  अवसर की बजाय अवसाद  में बदलने का कारण बन जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये | 


Saturday, 1 August 2020

नई शिक्षा नीति में कई सवालों के जवाब नजर नहीं आ रहे शिक्षा को महत्व और शिक्षक के सम्मान का संस्कार आवश्यक





 
उम्मीद है शिक्षा क्षेत्र में रूचि रखने वालों ने नई शिक्षा नीति का विस्तृत न सही किन्तु सरसरी तौर पर अध्ययन अवश्य कर लिया होगा | इसे बेहद क्रांतिकारी एवं दूरगामी सोच पर आधारित बताया जा रहा है | प्राथमिक से लेकर तो उच्च  शिक्षा  और उसी के साथ शोध आदि पर इस नीति में काफी बारीकी से ध्यान दिया गया है | भारतीय शिक्षा प्रणाली को वैश्विक मापदंडों के अनुरूप ढालने का भगीरथी प्रयास इस नीति के जरिये दिखाई देता है | शिक्षा पर केन्द्रीय बजट के अंशदान में वृद्धि की बात भी आशान्वित करती है | वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन करने का जो इरादा नई नीति में परिलक्षित होता है वह निश्चित रूप से साहसिक है | मातृभाषा  में प्राथमिक शिक्षा और विषय चयन में विज्ञान , कला और वाणिज्य संकाय की विभाजन रेखा समाप्त करना भारतीय परिप्रेक्ष्य में निसंदेह एक अभिनव प्रयोग होगा | लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न जो शिक्षा जगत के भीतर से ही उठाया जा रहा है कि समूची शिक्षा प्रणाली को सिरे से बदल देने के लिए प्रशासनिक और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े  प्रशिक्षित व्यक्ति कहाँ से आयेंगे ? ये वाकई  यक्ष प्रश्न है क्योंकि आर्थिक संसाधन उपलब्ध करवाने मात्र से अत्याधुनिक शिक्षा संस्थान तो खड़े किये जा सकते हैं लेकिन बिना सक्षम और समर्पित शिक्षकों के उनका समुचित उपयोग नहीं हो पाता | 

उदहारण के लिए मप्र सरकार ने शहडोल , छिंदवाड़ा, सागर और दतिया जैसे छोटे जिलों में मेडीकल कालेज तो खोल दिए | छिंदवाड़ा का कालेज तो बेहद उच्चस्तरीय  बना है लेकिन समस्या फिर वही शिक्षकों की आ रही है |  जबलपुर , भोपाल , रीवा , इंदौर और ग्वालियर आदि बड़े शहरों से जिस शिक्षक को वहाँ भेजा जाता है वह या तो  छुट्टी लेकर बैठ जाता है या फिर पूरे समय अपना स्थानान्तरण करवाने की जुगत भिड़ाया करता है |

ये बात विद्यालय और महाविद्यालयों पर भी लागू होती है | बीते कुछ सालों से संविदा पर पढ़ाने वाले रखने का जो तरीका निकला गया उसने शिक्षा को भी ठेकेदारी जैसा बना दिया | विश्वविद्यालयों में  इस प्रथा का  प्रचलन होने से शिक्षा का स्तर भी जैसा देव वैसी पूजा वाली उक्ति चरितार्थ करने लगा है | ऐसे में सरकार नई नीति के अंतर्गत शिक्षा में आमूल बदलाव करने की जो इच्छाशक्ति दिखा रही है वह पर्याप्त संख्या में योग्य और विधिवत प्रशिक्षित शिक्षकों के बिना कैसे सफलीभूत होगी इसका जवाब किसी के पास फ़िलहाल तो नहीं है |

मैं पूर्व में भी लिख चुका हूँ कि शिक्षा रूपी इमारत जिस नींव पर टिकी होती है वह है प्राथमिक स्तर की शिक्षा | और ये बताने वाली बात नहीं है कि निजी क्षेत्र को छोड़ दें तो देश की  अधिकतर सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक शालाएं दुर्दशा का  पर्याय हैं | नई नीति में जिस बदलाव का सपना दिखाया जा रहा है उसमें तो माध्यमिक कक्षा में ही व्यावसायिक शिक्षा की शुरुवात करते हुए बच्चों को बाकायदे मैदानी प्रशिक्षण देने की बात भी है |  इसकी दशा भी मध्यान्ह भोजन जैसी न हो जाए ये डर अभी से जताया जा रहा है |

इस विषय में एक बात ध्यान देने वाली है कि जब तक प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर आज जैसे सरकारी शिक्षक रहेंगे तब तक कितनी भी नीतियाँ बना ली जाएं लेकिन शिक्षा की बदहाली दूर नहीं की जा सकेगी | इसलिए बेहतर होगा कि सरकार नीति के क्रियान्वयन के पहले चरण में शिक्षकों का ऐसा समूह तैयार करे जो नये परिवेश में विद्यार्थियों को शिक्षा दे सकें | ये बात स्वयंसिद्ध है कि पैसे से सड़क , पुल , बाँध , फ्लायओवर जैसे काम तो कराये  जा सकते हैं | विद्यालय , महाविद्यालय और विश्वविद्यालय की इमारतें भी  निर्मित हो सकती हैं लेकिन बिना सक्षम शिक्षकों के शिक्षा में  गुणवत्ता नहीं आ सकती |

इस बारे में ये कहना गलत न होगा कि सीमेंट  ईंट और पत्थर से हुए घटिया निर्माण की तो मरम्मत सम्भव भी है किन्तु यदि विद्यार्थी के निर्माण में किसी भी तरह की कमी रह जाती है तो उस क्षति को पूरा करना संभव नहीं रहता | और यहीं आकर न सिर्फ योग्य वरन  प्रतिबद्ध शिक्षकों की अनिवार्यता महसूस होती है | उस दृष्टि से नई नीति को लागू करने के लिए वैसे शिक्षक कहाँ से आएंगे ये ऐसा सवाल है जिसका उत्तर तत्काल मिलना चाहिये वरना ये नीति ऊँची दूकान का फीका पकवान साबित होने का खतरा है |

अमेरिका जैसे देश में विश्वविद्यालयों के पास शोध कार्य से प्राप्त ज्ञान के पेटेंट से खूब धन आता है | उस दृष्टि से हमारे देश में आईआईटी छोड़कर उच्चशिक्षा के अधिकतर संस्थान सफेद हाथी बने हुए हैं | और इसीलिये उनकी दशा , दुर्दशा का प्रतिरूप होकर रह गयी | देश में एम्स और पीजीआई के अलावा   सैकड़ों सरकारी और  निजी मेडिकल कालेज हैं | इनमें चिकित्सा क्षेत्र को लेकर शोध किये जाने  के दावे तो बहुत होते हैं लेकिन उनमें से कितने विश्वस्तर पर मान्यता प्राप्त करने के बाद आर्थिक लाभ का आधार बनते हैं , ये पता नहीं चलता | इसी तरह निजी क्षेत्र के हजारों अस्पतालों के नाम के साथ रिसर्च सेंटर नामक पुछल्ला जुड़ा होने के बाद भी वे कितनी रिसर्च कर  पाए इसका खुलासा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि रिसर्च के नाम पर ये सरकार से मशीनों और उपकरणों के आयात में भारी रियायत हासिल करते हैं | ऐसे ही  निजी शिक्षा संस्थानों को आयकर से मिलने वाली छूट का लाभ  लेने के लिए कागजी शिक्षा समिति बनाई जाती हैं लेकिन परदे के पीछे से  शिक्षा माफिया काम  करता रहता है |

यद्यपि इसका मतलब ये कदापि नहीं कि नई नीति की सफलता को पूरी तरह संदिग्ध मानकर निराश हुआ जाए | लेकिन केंद्र और राज्य सरकार दोनों को पहले ये तय करना चाहिए कि क्या वे शिक्षा को देश के विकास का सबसे महत्वपूर्ण साधन मानती हैं या नहीं ? यदि हाँ , तो फिर केवल शिक्षा का बजट बढ़ाने से काम नहीं चलने वाला | शिक्षकों की सेवा को एक स्थायित्व देना बहुत जरूरी है | अपने भविष्य के लिए दिन रात चिंतित रहने  वाला शिक्षक विद्यार्थियों के भविष्य को  संवारने में कितना ध्यान दे सकेगा ये किसी से छिपा नहीं है | यहाँ शिक्षक से आशय केवल विद्यालयीन नहीं अपितु महाविद्यालय और विश्वविद्यालय सभी में पढ़ाने वालों से है |

दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि विभिन्न स्तरों पर शिक्षकों  के वेतनमान और सेवा शर्तों में बहुत ज्यादा अंतर भी नहीं होना चाहिए | ऐसा  इसलिए जिससे प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक में एक समान गुणवत्ता रहे | ये बात पूरी तरह सत्य है कि भारत यदि 21 वीं सदी में विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनना चाहता है  तो उसे शिक्षा क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता , प्रोत्साहन और संरक्षण देना होगा | 

स्मरणीय है स्व. अटलबिहारी  वाजपेयी ने प्रधानमन्त्री रहते हुए देश में विश्वस्तरीय राजमार्ग के साथ ही ग्रामीण सड़क योजना प्रारम्भ की | वह बहुत ही क्रांतिकारी कदम था | उसके कारण देश में सड़क परिवहन के साथ ही ऑटोमोबाइल उद्योग का भी मानो स्वर्णयुग आ गया | ग्रामीण इलाकों में  आधुनिकता एवं विकास का दौर पक्की बारह मासी सड़क बनने के बाद तेजी से आया |

नई शिक्षा नीति भी उसी  तरह विकास के द्वार खोल सकती है , बशर्ते सरकार में बैठे महानुभाव शिक्षा का महत्व और शिक्षक का सम्मान करने का संस्कार अपनी कार्यप्रणाली  में विकसित करें | एक जमाना था जब वेतन भले कम था लेकिन शिक्षक का सम्मान बहुत था | कालान्तर में वेतनमान बढ़ा तो सम्मान का अवमूल्यन होता गया | धीरे - धीरे ये स्थिति बनी कि शिक्षक सम्मान के साथ वेतनमान से भी वंचित कर दिया गया | ये कहने का अर्थ  कदापि न लगाया जाए कि समूचा शिक्षक समुदाय बहुत ही कर्तव्यनिष्ठ हो गया हो | अपवाद स्वरुप कुछ को छोड़ दें तो बाकी महज नौकरपेशा बनकर रह गए हैं | निजी संस्थानों में तो शोषण की पराकाष्ठा ही है | लेकिन सरकार ने भी शिक्षा और शिक्षकों  की जिस तरह उपेक्षा की वह एक दर्दनाक पहलू है |

 ये सब देखते हुए जरूरी  है कि नई शिक्षा नीति के अमल में पूरी तरह ईमानदारी रहे | वैसे इस बात को लेकर ये नीति मौन है कि क्या आगे भी शिक्षक वर्ग को पढ़ाने का  काम छोड़कर समय - समय पर सरकार की बेगारी करनी होगी ?

Friday, 31 July 2020

निचली अदालत में 20 साल लगे तब सर्वोच्च तक तो पीढ़ी बीत जायेगी



एक समय था जब जया जेटली का नाम सार्वजनिक तौर पर चर्चा में रहा करता था। वैसे वे राजनेता नहीं रहीं लेकिन पूर्व रक्षा मंत्री स्व. जॉर्ज फर्नांडीज की महिला मित्र के तौर पर जगह बनाने में कामयाब हुईं और समता पार्टी की अध्यक्ष तक बन गईं। दिलचस्प बात ये है कि उनके पति अशोक जेटली , जॉर्ज साहब के निजी सचिव हुआ करते थे। बाद में संभवत: उनका पति से अलगाव हो गया। श्रीमती जेटली की बेटी अदिति प्रख्यात क्रिकेटर अजय जडेजा की पत्नी हैं। जॉर्ज से उनकी निकटता इस हद तक बढ़ी कि वे उनके मंत्री वाले बंगले में ही रहने लगीं। उस समय जॉर्ज की पत्नी लैला कबीर उनसे अलग हो चुकी थीं। लेकिन बाद में जब वे अल्जाइमर से पीडि़त हो गये तब वे लौट आईं और अन्तिम समय में जया को उनसे मिलने तक नहीं दिया जिसे लेकर वे अदालत तक गईं। स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की तरह से ही स्व. फर्नांडीज भी लम्बे समय तक गम्भीर रूप से अस्वस्थ रहने की वजह से सार्वजनिक चर्चाओं से दूर थे। और पत्नी लैला के लौट आने के बाद जया भी समाचारों से अलग हो गईं। गत दिवस अचानक एक बार फिर उनका नाम सामने आया और उसमें भी स्व. फर्नांडीज ही संदर्भ बने। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि 2001 में तहलका नामक वेब पोर्टल ने एक स्टिंग आपरेशन किया जिसमें जया और उनके करीबी गोपाल पचरेवाल के अलावा मेजर जनरल रह चुके एसपी मुरगई को रक्षा सौदे में घूस लेते कैमरे में कैद किया गया। ब्रिटेन की एक काल्पनिक कम्पनी के प्रतिनिधि बनकर आये तहलका के पत्रकारों ने वह स्टिंग किया था। उसके बाद जॉर्ज को वाजपेयी सरकार का रक्षा मंत्री पद छोड़ना पड़ा। मामला सीबीआई को गया जिसने जांच के बाद 2006 में आरोप पत्र दाखिल किया और तकरीबन 14 -15 साल की लंबी न्यायालयीन प्रक्रिया के बाद गत दिवस दिल्ली की एक अदालत ने जया और उनके उक्त दोनों साथियों सहित तीन अन्य को चार-चार साल की सजा के अलावा एक - एक लाख का अर्थदंड लगाया। जया के पक्ष में देश के सबसे महंगे वकीलों में से एक मुकुल रोहतगी खड़े हुए और शाम होने के पहले ही दिल्ली उच्च न्यायालय ने सजा पर स्थगन देते हुए फिलहाल श्रीमती जेटली को जेल जाने से बचा लिया। उनकी आयु 78 वर्ष की है। सीबीआई तो 7 साल की सजा चाहती थी किन्तु अदालत ने रहम करते हुए मात्र 4 वर्ष तक जेल में रखने का फैसला किया। इस तरह 2001 से शुरू हुआ मामला तकरीबन दो दशक बाद जाकर अंजाम तक भले ही पहुँच गया लगता है किन्तु उस काण्ड में सजा दिए जाने में इतना विलम्ब भारतीय न्याय और दंड प्रक्रिया दोनों पर नये सिरे से सवाल खड़े करता है। अव्वल तो सीबीआई ने ही आरोप पत्र प्रस्तुत करने में पांच साल का समय खर्च किया और फिर अदालत ने 14-15 साल खा लिए। अब मामला उच्च और फिर सर्वोच्च न्यायालय तक जाएगा और तब तक कितने आरोपी जीवित बचेंगे ये कह पाना मुश्किल है। जॉर्ज साहब की गिनती देश के अत्यंत ईमानदार और सादगी पसंद नेताओं में होती थी। बिना कलफ के कपड़े पहिनने और रक्षा मंत्री रहते हुए अपने बंगले के प्रवेश द्वार को सदैव खुला रखने वाले उस नेता पर कभी कोई तोहमत नहीं लगी। लोहिया युग के समाजवादी फक्कड़पन के वे अंतिम प्रतिनिधि थे लेकिन उनके सान्निध्य में रहने वाली जया जेटली की वजह से उनके निजी और पारिवारिक जीवन पर तो छींटे पड़े ही लेकिन तहलका के उस स्टिंग ने जॉर्ज की जीवन भर की प्रतिष्ठा और पुण्याई को बहुत बड़ा नुकसान पहुँचाया। वैसे जॉर्ज को भले ही उस काण्ड के परिप्रेक्ष्य में मंत्री पद छोड़ना पड़ा लेकिन उन पर घूस खाने जैसा कोई आरोप नहीं लगा।  लेकिन जया जेटली ने उनके घर में रहते हुए ही जो किया वह राजनेताओं के निकटवर्ती लोगों द्वारा किये जाने वाले भ्रष्टाचार का एक और उदाहरण है। आगे ये सिलसिला रुक जाएगा ऐसा नहीं लगता क्योंकि बीते बीस बरस बाद आज की राजनीति पूरी तरह से कारपोरेट संस्कृति से प्रेरित और प्रभावित है। लेकिन इससे हटकर बात भारतीय न्याय प्रणाली की करें तो भ्रष्टाचार के उच्च स्तरीय मामले के पहले चरण का फैसला आरोप पत्र दाखिल होने के 15 साल बाद आना और श्रीमती जेटली को तुरन्त सजा पर स्थगन मिल जाना ये स्पष्ट करता है कि न्याय पालिका की कार्यप्रणाली में न जाने कितने झोल हैं। आज के दौर में परिवर्तन इतनी तेजी से होने लगे हैं कि घटनाओं को याद रख पाना मुश्किल हो गया है। ऐसे में जॉर्ज, जया और उस स्टिंग के बारे में आम जनता को शायद ही कुछ याद होगा। जाँच एजेंसी के पास भी काम का अम्बार है और फिर उस पर भी वीआईपी नामक मानसिक बोझ रहता है। फिर भी इतने लम्बे समय बाद पहले पायदान का फैसला देखकर भ्रष्टाचारियों के हौसले और बुलंद ही होंगे। पता नहीं न्यायपालिका को ये देरी महसूस होती है या नहीं लेकिन यदि इस ढर्रे को नहीं सुधारा जा सका तो कहना गलत नहीं होगा कि सत्ता प्रतिष्ठान की नाक के नीचे चलने वाली लूटपाट को रोकने के प्रयास कभी सफल नहीं होंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 July 2020

फ़िल्मी दुनिया का असली चेहरा सामने आने लगा है सुशांत की मौत के साथ ही माफिया के धन का पर्दाफाश जरूरी




फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु का प्रकरण भी फ़िल्मी पटकथा की तरह नए  - नए घुमाव ले रहा है | मुम्बई पुलिस की जाँच से असंतुष्ट सुशांत के पिता ने पटना में उसकी महिला मित्र रिया चक्रवर्ती , जिससे उसकी शादी होने की खबर थी , के विरुद्ध पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई | जिसके अनुसार रिया ने धोखे से उसके बैंक खाते से 15 करोड़ निकलवा दिए तथा उसे आत्महत्या के लिये  प्रेरित किया | इसके पहले खुद रिया  मुम्बई में सुशांत की मौत की जांच कराए जाने की मांग पुलिस से कर चुकी थी | इस बारे में अभी तक ये कहा जा रहा था कि फिल्म उद्योग में चल रहे परिवारवाद की वजह से उद्योग में जमे कुछ परिवारों के लड़के - लड़कियों को ही काम मिलता है | बाहरी दायरे से आई  नवोदित प्रतिभाओं को निरुत्साहित ही नहीं अपितु अपमानित और उपेक्षित करते हुए उनका भविष्य चौपट करने का षडयंत्र रचा जाता है | इसके चपेट में अभिनेता और अभिनेत्रियाँ ही नहीं  अपितु  गायक और संगीतकार भी आये बिना नहीं रहते |

चर्चा शुरू होते ही अनेक अभिनेता और अभिनेत्रियों के साथ ही ए.आर रहमान जैसे संगीतकार ने  ये माना कि उनसे भी काम छीनने की हरकतें हुई | फिल्म उद्योग के अनेक नामचीन निर्माताओं और  निर्देशकों के अलावा कुछ बड़े प्रोडक्शन हाउस इसे लेकर निशाने पर हैं | देखते - देखते एक बड़ा वर्ग ऐसा खड़ा  हो गया जिसके  अनुसार सुशांत की मौत स्वाभाविक नहीं थी ,  या तो उसे आत्महत्या के लिए प्रेरित किया गया अथवा उसकी हत्या की गयी | कुछ सफल फिल्मों के बाद उसे जिस तरह से काम मिलना बंद हो गया था उससे वह परेशान होकर अवसाद की स्थिति में चला गया और उसकी वह दवाएं भी लेता था |

चूँकि उसने कोई पत्र नहीं छोड़ा था इसलिए प्रथम दृष्टया पुलिस ने उसे आत्मह्त्या  का साधारण  मामला समझकर बंद करना चाहा किन्तु जब चौतरफा हल्ला मचा तब एक विशेष जांच दल बनाकर बात आगे बढ़ाई गयी | सुशांत के सचिव और रिया  के साथ ही  फिल्म उद्योग के अनेक ऐसे लोगों  से घंटों पूछताछ की गई जिन पर सुशांत से काम छीनने की तोहमत फ़िल्मी जमात के भीतर से ही  लगाई गई  | 

इसी बीच सीबीआई जांच की गुहार दिवंगत अभिनेता के परिवारजनों द्वारा लगाये जाने के बाद भी महाराष्ट्र सरकार इसके लिए राजी नहीं हुई | उसके बाद ही उसके पिता ने पटना में रिपोर्ट दर्ज करवाई जिस पर वहां की  पुलिस ने फ़ौरन मामला  कायम  करते हुई मुम्बई कूच कर  दिया | इधर बिहार पुलिस के हाथों   गिरफ्तार होने से बचने के लिए रिया चक्रवर्ती सर्वोच्च न्यायालय जा पहुंची | उसकी अर्जी है कि मामला मुम्बई में ही चले | सुशांत के पिता का मुम्बई और रिया के बिहार पुलिस पर अविश्वास के बीच महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने सीबीआई जाँच की फिर  मांग ठुकरा दी | वहीं  बिहार सरकार भी रिया की याचिका का विरोध करने सर्वोच्च न्यायालय जा पहुंची है | चूँकि सीबीआई से जाँच करवाना या न करवाना राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार की बात है इसलिए न्यायालय इस बारे में आदेश नहीं देता | लेकिन अब यह मामला बिहार की राजनीति का विषय बन गया है | बिहार सरकार के साथ ही राजग नेता तेजस्वी यादव भी  महाराष्ट्र पुलिस की जांच से असंतुष्ट हैं | भाजपा भी सीबीआई जाँच की  मांग  उठा चुकी है | कहा जा रहा है बिहार विधानसभा चुनाव में भी  सुशांत की मौत मुद्दा बनने जा रही है | स्मरणीय है वह पटना का रहने  वाला था |

रिया चक्रवर्ती इस मामले में कितनी दोषी  हैं ये कहना मुश्किल है किन्तु  बिहार पुलिस  से बचने का उसका प्रयास संदेह पैदा करता है | लेकिन उससे भी ज्यादा बड़ा मुद्दा फिल्म उद्योग के वे बड़े चेहरे  हैं जिन पर परिवारवाद के कारण फ़िल्मी दायरे के बाहर से आकर संघर्ष से सफलता हासिल करने वाले कलाकारों को हतोत्साहित करने का आरोप है | सुशांत का परिवार तो शोक संतप्त है किन्तु जब फ़िल्मी दुनिया के अनेक कलाकारों ने खुलकर इस तरह का आरोप लगाया तब तो मामला जांच योग्य बनता ही है | बात केवल फिल्मों तक सीमित न रहकर टीवी धारावाहिकों से कलाकारों की अचानक छुट्टी  किये जाने तक भी जा पहुंची | फिल्म और टीवी की दुनिया में अभिनेत्रियों के  शोषण के किस्से  तो आम थे | अनेक नामी गिरामी हस्तियों पर खुलकर आरोप लगे भी लेकिन परिवारवाद के कारण नई  प्रतिभाओं को काम मिलने में अड़ंगेबाजी पहली बार सुनाई दे रही  है | हालाँकि कंगना रनौत नामक अभिनेत्री ने काफी पहले से इसके विरुद्ध आवाज उठानी शुरु कर  दी थी लेकिन उसे उसका व्यक्तिगत झगड़ा मानकर उपेक्षित कर  दिया गया | सुशांत की मौत के बाद से कंगना और  आक्रामक हो उठी हैं |

वैसे इस मामले में दो बातें काफी  अहम हैं | पहली तो शिवसेना के साथ फ़िल्मी दिग्गजों के निकट रिश्ते | शिव  उद्योग सेना के वार्षिक जलसे में पूरी फिल्मी  दुनिया निःशुल्क मंचीय कार्यक्रम देकर ठाकरे परिवार से अभयदान प्राप्त करती रही है | इसी तरह मुम्बई पुलिस भी हर साल एक बड़ा आयोजन करती है जिसमें पूरी फ़िल्मी बिरादरी मुफ्त नाच  गाना  तो करती ही है मुम्बई पुलिस को खुले हाथ से दान भी देती है | उक्त दो कारणों से सुशांत की मौत के मामले पर पर्दा डाले जाने का संदेह यदि व्यक्त किया जा रहा है तो उसे पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं  किया जा सकता | उद्धव ठाकरे सरकार द्वारा सीबीआई जाँच से इंकार करना भी ये साबित करता है कि मुम्बई पुलिस के जरिये किसी न किसी को बचाने की कोशिश की जा सकती है |

लेकिन बीती शाम एक टीवी चैनल पर अभिनेता , टीवी एंकर और कुछ समय के लिए राजनीति कर चुके शेखर सुमन ने सुशांत की मृत्यु को साधारण आत्महत्या मानने से इंकार करते  हुए एक तरफ तो जहाँ सीबीआई जांच की जरुरत बताते हुए फ़िल्मी दुनिया में कुछ परिवारों की गिरोहबंदी का आरोप लगाकर कहा  कि उस कारण न जाने कितनी प्रतिभाओं को उभरने के पहले ही बाहर करवा दिया गया | लेकिन शेखर ने उससे भी बड़ा  आरोप ये लगाया कि फिल्मों के निर्माण में लगने वाला अनाप - शनाप पैसा कहाँ से आता है , इसकी जांच होनी चाहिए | और ये वाकई बहुत ही सामयिक मुद्दा है |

फिल्म उद्योग में काले धन का  उपयोग शुरू  से होता आया है | एक ज़माने में आयकर वाले फिल्मी  कलाकारों के यहाँ खूब छापे मारते थे | लेकिन बाद में बड़ी ही चतुराई से फ़िल्मी कलाकरों ने राजनीति में पदार्पण कर लिया | शुरुवात पृथ्वीराज कपूर और नर्गिस दत्त जैसों को राज्यसभा में मनोनीत किये जाने से हुई लेकिन बाद में तो दक्षिण भारत से प्रेरित होकर अमिताभ  बच्चन ,  सुनील दत्त , शत्रुघ्न सिन्हा , विनोद खन्ना , जयाप्रदा , धर्मेन्द्र , गोविंदा , हेमा मालिनी और सनी देओल जैसे कलाकार लोकसभा में जा पहुंचे | सुनील दत्त , विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा तो मंत्री भी बने | जो सीधे राजनीति में नहीं है वे किसी न किसी पार्टी का चुनाव प्रचार कर उस पर एहसान लाद देते हैं |  इस चलन के कारण शासन - प्रशासन में फ़िल्मी दुनिया की  प्रभावशाली  उपस्थिति नजर आने लगी | राज्यसभा में भी जावेद  अख्तर , शबाना आजमी और जया बच्चन ने लम्बी परियां खेलीं | सलमान खान  के पिता सलीम खान भी उच्च सदन में जगह पा गये | गईं तो लता मंगेशकर और रेखा भी लेकिन वे महज औपचारिकता बनकर रह गईं |

इस वजह से ये देखने में आया कि सरकार किसी की भी हो लेकिन फ़िल्मी दुनिया के हित सुरक्षित रहने लगे | और यही वजह है कि दाउद इब्राहीम के फ़िल्मी हस्तियों से ऐलानिया रिश्ते उजागर होने के बाद भी किसी का बाल बांका नहीं हुआ | शेखर  सुमन खुद फ़िल्मी दुनिया में कई दशक से हैं इसलिए उनके द्वारा फिल्मों में लगने वाले धन के रहस्यमय स्रोतों का जो उल्लेख किया गया उसकी जांच तो केन्द्रीय एजेंसियों द्वारा की ही जानी चाहिए | लेकिन ऐसा होना आसान नहीं है | क्योंकि संसद के दोनों सदनों में में  फ़िल्मी दुनिया के अनेक वजनदार लोग जमे बैठे हैं |

ज्यादा न सही लेकिन फ़िल्मी कलाकारों के बार - बार दुबई जाने और वहां सम्पत्ति में निवेश की जाँच हो जाये तो अनेक चमकते चेहरों का मेकअप उतर जायेगा | सुशांत की  मौत से उठे सवालों और विवादों को केवल व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता न मानकर समग्र जांच होनी चाहिए | कंगना रनौत  तो परिवारवाद के अलावा मूवी माफिया जैसे विशेषण का भी उपयोग लगातार कर रही हैं | वे इस समय फिल्मों में सफलता के शिखर पर हैं इसलिए उन्हें असफल या कुंठित कहकर खारिज करना भी ठीक नहीं होगा  |

सुशांत की मौत से निकलकर सामने आये सवालों का जवाब तलाशने का इससे अच्छा अवसर  शायद ही मिले क्योंकि मायानगरी की चकाचौंध के पीछे का अन्धेरा  खुलकर सामने आया है | और इस काम में वहां के लोग ही बिना डरे साथ दे रहे हैं |

प्राथमिक शिक्षा को विवि जैसा महत्व दिए बिना नई शिक्षा नीति निरर्थक



केंद्र सरकार ने 34 साल बाद नई शिक्षा नीति के ऐलान के साथ ही मानव संसाधन मंत्रालय का नाम बदलकर फिर से शिक्षा मंत्रालय करने का निर्णय किया। 10 + 2 प्रणाली के स्थान पर 5 + 3 + 3 + 4 करने के साथ ही इंजीनियरिंग जैसे विषय की पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले विद्यार्थियों को उनके द्वारा बिताये गये वर्षों के आधार पर प्रमाणपत्र या डिप्लोमा देने का प्रावधान भी किया गया। सबसे अच्छी बात ये है कि प्राथमिक शिक्षा के माध्यम के रूप में विद्यार्थी चाहे तो क्षेत्रीय भाषा का चयन भी कर सकेगा। उसे अन्य भाषाएँ सीखने का विकल्प भी रहेगा। निचली कक्षाओं में अंग्रेजी माध्यम की अनिवार्यता खत्म करना बड़ा कदम कहा जा सकता है। इसी तरह विषयों के चयन में चले आ रहे ढर्रे को बदलने का साहस भी नीति में दिखाई देता है। भौतिक शास्त्र के साथ योग, फैशन और रसायन शास्त्र के संग संगीत तथा दर्शन जैसे विषय का अध्ययन भी सम्भव होगा। अर्थात विद्यार्थी चाहे तो विज्ञान संकाय के विषय के साथ वाणिज्य और कला के विषय भी ले सकेगा। खेल और संस्कृति के साथ संवैधानिक मूल्य जैसे विषय पाठ्यक्रम का हिस्सा होंगे। 2040 तक उच्च शिक्षा के सभी संस्थानों को बहु विषय संस्थान बनाना होगा जिसमें 3000 से ज्यादा छात्र होंगे। साथ ही वे ऑन लाइन और डिस्टेंस लर्निग कोर्स का विकल्प भी दे सकेंगे। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को अधिक स्वायत्तता देने की योजना भी इस नीति में है। 2050 तक कम से कम 50 फीसदी छात्रों को व्यावसायिक शिक्षा देने का सपना भी दिखाया गया है। 12 वीं उत्तीर्ण कर चुके हर छात्र के पास कोई न कोई करोबारी योग्यता होगी। प्रारंभिक स्तर से ही इसकी शुरुवात अच्छी सोच है। 10 वीं और 12 में अनुत्तीर्ण होने के बाद पढ़ाई छोड़ चुके विद्यर्थियों को दोबारा परीक्षा का अवसर दिया जाएगा। पूरे देश के लिए एक ही शिक्षा नीति होगी। बीएड कालेज बंद कर दिए जायेंगे तथा उसकी शिक्षा सामान्य महाविद्यालय से ली जा सकेगी। नौकरी करने वाले को 3 और शोध के इच्छुक छात्रों को 4 वर्ष में डिग्री मिलेगी। सरकार की मानें तो शिक्षा का नेटवर्क बढ़ाने पर भी जोर दिया जाएगा। सतही तौर पर देखें तो ये बड़ी ही क्रांतिकारी नीति है। प्रसिद्ध विदेशी विश्वविद्यालय भारत में अपने कैम्पस खोल सकेंगे। इस नीति को लागू करने के पहले देश भर से सुझाव मांगे जाने का दावा भी किया गया है। 2035 तक उच्च शिक्षा में 50 फीसदी छात्रों को शामिल करने के लक्ष्य के साथ ही शोध छात्रों के लिए भी अनेक बदलाव नीति का हिस्सा हैं। कुल मिलाकर देखें तो प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है जैसे केन्द्र सरकार ने शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन करने का प्रयास किया है। भारतीय शिक्षा प्रणाली और शैक्षणिक संस्थानों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खड़े रहने के लिए सक्षम बनाने के साथ ही उच्च शिक्षा हेतु विदेश जाने वाले छात्रों को देश में रहकर ही अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा मिलना निश्चित तौर पर प्रतिभा पलायन को रोकने में सहायक बनेगा। और भी ऐसे प्रावधान हैं जो इस बात का संकेत दे रहे हैं कि आने वाले कुछ सालों में भारतीय शिक्षा प्रणाली बदलते समय की जरूरतों के अनुरूप अपने को ढालने में कामयाब हो जायेगी। लेकिन ढेर सारे हसीन सपनों के बावजूद ये सवाल उठता है कि प्राथमिक स्तर की गुणवत्तायुक्त शिक्षा क्या देश के उन लाखों गरीब परिवारों के बच्चों को नसीब हो पायेगी जो केवल दोपहर का मुफ्त भोजन करने सरकारी शाला में आते हैं और वह भी ऐसा जिसमें भ्रष्टाचार बिलबिलाता रहता है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार के शिक्षा मंत्री मनीष सिसौदिया ने महज पांच साल में सरकारी विद्यालयों का जैसा कायाकल्प कर दिखाया, वैसा करने के लिए इस शिक्षा नीति में क्या है, ये स्पष्ट नहीं किया गया है। कहते हैं अमेरिका में बच्चों को अपने घर से एक निश्चित दूरी के बाहर के विद्यालय में पढ़ने की अनुमति नहीं होती। लेकिन वहां हमारे देश की तरह सरकारी और निजी शाला के स्तर में फर्क नहीं होता और शिक्षा की गुणवत्ता भी एक समान रहती है। इसलिए शिक्षा नीति चाहे कितनी भी अच्छी हो लेकिन जब तक दिल्ली जैसी विद्यालयीन शिक्षा ख़ास तौर पर प्राथमिक स्तर पर उपलब्ध न हो तब तक नीति लागू भले हो जाए लेकिन अपने लक्ष्य से दूर ही रहेगी। इसलिए बेहतर होगा कि केंद्र सरकार नीति को ऊपर से लागू करने के पहले प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त ऊँच - नीच के माहौल को खत्म करे। आम पब्लिक के लिए चलाये जा रहे सरकारी विद्यालयों में अध्ययनरत छात्र और महंगे निजी पब्लिक स्कूल के विद्यार्थी के बीच हीनता और श्रेष्ठता का भाव मिटाए बिना देश में शिक्षा का लोकव्यापीकरण करने की बात सोचना भी बेकार है। कोरोना काल में शिक्षा व्यवस्था का एक नया रूप सामने आया है। ऑन लाइन पढ़ाई के कारण बाजार में मोबाईल फोन और लैपटॉप की बिक्री आसमान छू गयी। लेकिन ऐसे लाखों परिवार होंगे जिनके पास मोबाईल और लैपटॉप तो क्या स्टेशनरी तक के लिए पैसे नहीं होते। यदि सरकार चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हुए केवल साक्षर नहीं अपितु उच्च शिक्षा में भी जाएँ तो उसे प्राथमिक स्तर की शिक्षा को भी विश्वविद्यालय के बराबर महत्त्व देना होगा। वरना ये देश बीते सात दशक से न जाने कितनी नीतियाँ देख चुका है जिनके अंतर्गत एक तरफ तो शिक्षा के पांच सितारा संस्थान खुल गये वहीं दूसरी तरफ ऐसे लाखों सरकारी विद्यालय हैं जिनमें बैठने के लिये टाट पट्टी तक नहीं है। यदि सरकार ने इस तरफ ध्यान दिया तो निश्चित रूप से उसकी ये कोशिश ईमानदार कही जायेगी अन्यथा ले देकर वही ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ होती रहेगी। काश, नीति में कहीं इस बात का संकल्प भी होता कि अब श्रीकृष्ण और सुदामा को एक साथ पढ़ने का अवसर दोबारा मिल सकेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी