Thursday, 3 September 2020

पहली बार चीन को उसी की भाषा में जवाब दे रहा भारत



लद्दाख से अरुणाचल तक चीन से लगी सीमा पर भारत द्वारा बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती युद्ध पूर्व के संकेत दे रही है। बीते तीन - चार दिनों में भारतीय सेना ने पेंगांग झील के निकट स्थित पहाड़ियों में अनेक ऐसी जगहों पर अपना डेरा जमा लिया जिन्हें रणनीतिक महत्व का माना जा रहा है। ये संभवत: पहला अवसर होगा जब भारतीय सेना ने वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर आक्रामक रुख अपनाते हुए आगे बढ़कर कब्जे का साहस किया। अन्यथा हमेशा यही सुनने मिलता था कि चीनी सैनिक हमारे भूभाग में घुस आये और हमारे सैनिक उन्हें पीछे धकेलने में जुटे हैं। राजनयिक स्तर पर भी हम विरोध करते थे जिसके जवाब में चीन सदैव उपेक्षापूर्ण रवैया दिखाता था। ये भी सुनने में आया है कि लद्दाख के पहाड़ी अंचल में सीमा का विधिवत निर्धारण न होने से चीन चुपचाप आगे बढ़ता जाता था और 1962 के बाद भी धीरे - धीरे उसने हमारे सैकड़ों किलोमीटर भूभाग पर कब्जा कर लिया। सही बात ये है कि चीन के साथ भले ही 1962 के बाद औपचारिक रूप से युद्ध नहीं हुआ लेकिन चीन ने पूरे सीमा क्षेत्र में जिस तरह का विकास किया उसकी तुलना में भारत बहुत पीछे रहा। लेकिन मोदी सरकार ने बीते छह साल में वास्तविक नियन्त्रण रेखा तक सड़क, पुल, हवाई अड्डा बनाने के बाद मिसाइलें, राडार, टैंक आदि तैनात कर दिए। बीते जून माह में हुए तनाव के बाद बड़े पैमाने पर सैन्य बटालियनें वहां भेजी गईं जिनमें पहाड़ों पर जंग लडऩे के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिक दस्ते भी हैं। इस बार भारत ने सर्दियों में भी पर्याप्त सैन्यबल की मौजूदगी सुनिश्चित कर दी है जिससे बर्फबारी का लाभ लेकर चीन घुसपैठ न कर सके। चीन के साथ तनाव के चलते ये पहला मौका है जब भारत के उच्च सैन्य अधिकारी खुले आम कह रहे हैं कि यदि चीन की हरकतें नहीं रुकीं तो भारत युद्ध का विकल्प चुनने से भी नहीं हिचकेगा। हालाँकि दोनों तरफ के सैन्य अधिकारी निरंतर बातचीत भी कर रहे हैं किन्तु चीन अपनी सेना को दबे पाँव भारतीय भूभाग में अतिक्रमण करने के लिए भी भेजता रहता है। लेकिन हाल ही में उसकी ऐसी ही कोशिश को हमारे सैनिकों द्वारा विफल करते हुए सैन्य महत्व की चीन के कब्जे वाली पहाड़ियों पर अपना आधिपत्य जमा लिया। उसके बाद चीन के विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया में एक तरफ  तो 1962 से भी गम्भीर नतीजों की धमकी थी लेकिन दूसरी तरफ बातचीत के जरिये विवाद सुलझाने की अपील के साथ भारतीय सेना द्वारा की गई आक्रामक कार्र्वाई की शिकायत भी। जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार अभी तक चीन झगड़ा झूठा कब्जा सच्चा वाली नीति पर चलते हुए वार्ता की टेबिल पर अपनी शर्तें मनवाने की स्थिति में रहा करता था लेकिन बीते कुछ समय से भारत की तरफ से राजनयिक और सैन्य अधिकारियों के बीच वार्ता के अलावा सैन्य मोर्चे पर भी जिस तरह से कड़ा रवैया अख्तियार किया गया उससे हमारी सेना का मनोबल तो बढ़ा ही लगे हाथ विश्व बिरादरी में भी भारत की दृढ़ता का खासा प्रचार हुआ। दुनिया की सभी बड़ी शक्तियां जिस तरह से हमारे साथ खड़ी दिखाई दे रही हैं उससे भी हमारा साहस बढ़ा है। आर्थिक मोर्चे पर भी कल एक बार फिर भारत ने जोरदार हमला बोलते हुए सौ से ज्यादा चीनी एप प्रतिबंधित कर दिए जिनमें बेहद लोकप्रिय पबजी भी है। ये एक तरह का सन्देश है कि भारत अब उसकी प्रत्येक हरकत का उसी की शैली में उत्तर देने में संकोच नहीं करेगा। इसमें दो राय नहीं है कि मौजूदा स्थिति बहुत ही नाजुक है। कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है लेकिन भारत ने जिस मुस्तैदी से सेना को सुसज्जित करने का काम किया वह विश्वशक्ति बनने की दिशा में बड़ा कदम है। चीन के सामने आर्थिक और सैनिक दृष्टि से कमजोर होने की अवधारणा को पूरी तरह तथ्यहीन साबित करते हुए भारत ने आँख में आँख डालकर बात करने का जो हौसला दिखाया उसी का परिणाम है कि व्यापार और उद्योग जगत ने भी अपने मुनाफे को दरकिनार करते हुए स्वदेशी उत्पादन बढ़ाने की तरफ  कदम बढ़ा दिए। सीमा से आ रही खबरों के कारण आम देशवासी का आत्मविश्वास प्रबल हुआ है। हालांकि युद्ध से जितना बचा जा सके उतना अच्छा किन्तु यदि देश की सुरक्षा और सम्मान के लिए वह आवश्यक हो जाए तब पीछे हटने के बजाय आगे बढ़कर दुश्मन पर हमला करना ही ठीक होता है। प्रधानमंत्री ने अग्रिम मोर्चे पर जाकर चीन की विस्तारवादी नीति के दिन लदने की बात कही थी। रक्षामंत्री और सेना के सभी वरिष्ठतम अधिकारी निरंतर मोर्चे पर जाकर सेना का मनोबल बढ़ा रहे हैं। सर्दियों में भी पूरी चौकसी का इंतजाम कर दिया गया है। चीन को लगातार ये जताया जा रहा कि याचना नहीं अब रण होगा, संग्राम बड़ा भीषण होगा। जैसे संकेत आ रहे हैं उनके अनुसार चीन के भीतर राष्ट्रपति जिनपिंग की राजनीतिक स्थिति पहले जैसी नहीं रही। दक्षिणी चीनी समुद्र में अमेरिका, जापान, भारत और आस्ट्रेलिया की संयुक्त मोर्चेबंदी से उन पर दबाव बढ़ा है। अभी तक दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन में भारत सदैव चीन के सामने आने से बचता रहा लेकिन पहली बार ये देखने मिल रहा है कि भारत ने उसके साथ उसी की जुबान में बात करने का साहस दिखाया जिसकी वजह से दक्षिण एशिया के कूटनीतिक समीकरण भी तेजी से बदल रहे हैं। अपने आर्थिक स्वार्थवश जिस अमेरिका और उसके साथ पश्चिम के विकसित देशों ने चीन को आर्थिक महाशक्ति बनाने में सहायता की वे सब अपने निर्णय पर पछताते हुए कदम पीछे खींचने लगे हैं। भारत के लिए यह शुभ संकेत हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 2 September 2020

पहली तिमाही की निराशा के बावजूद उम्मीदें खत्म नहीं हुईं



कोरोना काल में पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल छा गये हैं। जिन देशों में संक्रमण ढलान पर आने के बाद कारोबार पटरी पर आता दिख रहा था वहां कोरोना का दूसरा हमला होने से स्थितियां फिर गड़बड़ा गईं। जहाँ तक भारत का सवाल है तो यहाँ अभी तक कोरोना का चरम नहीं आया जिसकी वजह से पक्के तौर पर ये अनुमान लगाना कठिन है कि उस पर नियंत्रण कब तक हो सकेगा ? हालाँकि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने भरोसा दिलवाया है कि दीपावली अर्थात नवम्बर मध्य तक हालात काबू में आ जायेंगे। वहीं दूसरी तरफ दिसम्बर तक भारतीय और विदेशी वैक्सीन उपलब्ध होने की संभावना से भी उम्मीदें बनी हुई हैं। लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो अर्थव्यवस्था के वर्तमान आंकड़े और भविष्य को लेकर लगाये जा रहे अनुमान आर्थिक विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही अर्थात अप्रैल से जून में जीडीपी (सकल घरेलू उत्पादन) के जो आंकड़े जारी हुए उनके मुताबिक बीते वर्ष की तुलना में लगभग 24 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी। नया वित्तीय वर्ष चूँकि लॉक डाउन से ही शुरू हुआ तथा दो महीने तक उद्योग-व्यवसाय कुछ अपवादों को छोड़कर ठप्प ही रहा इसलिए सकल घरेलू उत्पादन में गिरावट आना अवश्यम्भावी था लेकिन 24 फीसदी गिरावट की खबर आते ही सर्वत्र चिंता का वातावरण बन गया। विपक्ष सरकार पर चढ़ बैठा। आर्थिक विशेषज्ञ भी संभल- संभलकर बोल रहे हैं लेकिन ये बात भी कही जा रही है कि पूरी तरह से लॉक डाउन रहने से ये आंकड़ा स्वाभाविक ही है। इसी के साथ विभिन्न अनुमानों में ये कहा जा रहा है कि दूसरी, तीसरी और अंतिम तिमाही में सकल घरेलू उत्पादन में निरंतर वृद्धि होगी। लेकिन अंत में पूरे वर्ष का औसत निकालने पर आंकड़ा तकरीबन 11 फीसदी की गिरावट पर रुकेगा। दूसरी तरफ  कुछ क्षेत्रों में चौंकाने वाले समाचार मिल रहे हैं। निराशाजनक स्थिति के बावजूद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लगातार बढ़ता जा रहा है और विदेशी मुद्रा का भंडार भी सर्वकालीन उच्चतम स्तर पर बना हुआ है। यही नहीं तो अमेरिकी डालर के मुकाबले भारतीय रुपया मजबूत हो रहा है। बीते माह में दो पहिया और चार पहिया वाहनों की बिक्री ने गत वर्ष के आंकड़ों को भी पीछे छोड़ दिया। इसके पहले ट्रैक्टरों की बिक्री भी  जबरदस्त रही। बीते कुछ महीनों में मोबाईल, लैपटॉप और टैबलेट आदि की आशातीत बिक्री ने भी अर्थव्यवस्था के पुन: गतिशील होने का प्रमाण दिया। ये खबर भी आ रही है कि देश का विनिर्माण (मैन्युफेक्चरिंग) सेक्टर भी तेजी से पुरानी रंगत पर लौट चला है। लेकिन अभी भी पर्यटन और परिवहन के क्षेत्र में सुस्ती बनी हुई है। कोरोना के कारण चिकित्सा सुविधाओं में अप्रत्याशित वृद्धि की वजह से सरकार के पास धन की कमी आ गयी है । कारोबार ठंडा रहने से राजस्व की आय भी अनुमान से बहुत पीछे बनी हुई है। इसका असर विकास कार्यों पर भी देखा जा सकता है जिसके परिणामस्वरूप बाजार में मांग और रोजगार दोनों में गिरावट देखी जा रही है। लेकिन कुछ लोगों का अनुमान है कि पहली तिमाही जरूर पूरी तरह से निराशाजनक रही लेकिन 135 करोड़ से भी ज्यादा आबादी वाले देश में उपभोक्ताओं की विशाल संख्या अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने में बहुत सहायक होगी। दुनिया के अनेक विकसित देश भी भारत की विशाल आबादी में अपने लिए संभावनाएं तलाश रहे हैं। सबसे अच्छी बात ये हुई कि इस बहाने आत्मनिर्भरता के प्रति रूचि जागी है। कोरोना को लेकर चीन के संदिग्ध हो जाने के कारण उसके सामान के प्रति अरुचि सीमा पर तनाव की वजह से और बढ़ गई। इसे देखते हुए भारतीय उद्योगों को संजीवनी मिलने के आसार बढ़ गये हैं। लेकिन इसके लिये सरकार को थोड़ी दरियादिली दिखानी होगी। घरेलू कारोबार तभी उन्नति करता है जब उसे राज्याश्रय मिले। हालांकि केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारें इस समय तंगी में हैं लेकिन यही समय है जब कारोबारी जगत को अधिकतम संरक्षण देकर रोजगार की स्थिति को सुधारा जावे। ऐसा होने पर बाजारों में मांग बढ़ेगी और सरकार का राजस्व भी अपेक्षित स्तर पर पहुंचेगा। मौजूदा स्थिति में तो राजकोषीय घाटा वर्ष भर के अनुमान के करीब जा पहुंचा है। दीपावली सीजन के पहले से बाजारों में जो चहल-पहल बढ़ती है वह इस साल शायद न दिखे। लॉक डाउन में लगातार शिथिलता के बावजूद चूंकि शीतकालीन पर्यटन की संभावना काफी कम हैं इसलिए अर्थव्यवस्था का एक बड़ा सेक्टर तीसरी तिमाही में भी उबर नहीं सकेगा। फिर भी शादी-विवाह में लोगों की उपस्थिति पर लगी सीमा को बढ़ा देने का असर तो होगा ही। यूँ भी बरसात के बाद बाजार उठते हैं। संयोगवश इस वर्ष मानसून ठीक चल रहा है। और खेती का क्षेत्र भी अच्छी खबरें दे रहा है। ये सब देखते हुए कह सकते हैं कि अर्थव्यवस्था सघन चिकित्सा कक्ष से बाहर आने के बाद भी अभी आंशिक स्वस्थ होने की स्थिति में ही है। फिर भी उसे लेकर निराशाजनक चित्र प्रस्तुत करना ठीक नहीं है। भारत ने ऐसे अवसरों पर सदैव आश्चर्यजनक वापिसी की है। राजनीतिक स्थिरता की वजह से भी निर्णय प्रक्रिया काफी अच्छी है। इस सबके कारण ये सोचना गलत न होगा कि वित्तीय वर्ष समाप्त होते तक भारतीय अर्थव्यवस्था संतोषजनक स्थिति में आ जायेगी। यद्यपि उसकी सेहत सुधरने में अभी एक वर्ष और लगेगा किन्तु कोरोना कई मामलों में वरदान भी साबित हुआ है क्योंकि इसकी वजह से देश की सोई हुई उद्यमशीलता जाग्रत हो सकी, जो बड़ी उपलब्धि है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 1 September 2020

प्रणब दा : देश अभी उनसे बहुत कुछ सुनना चाहता था




यूँ तो मृत्यु उपरांत हर किसी के बारे में अच्छी-अच्छी बातें कही जाती हैं लेकिन बीती शाम दिवंगत हुए पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बारे में जो कुछ कहा और सुना जा रहा है वह महज औपचरिकता न होकर सच्चाई है। स्व. मुखर्जी राजनीति में न  आते तब भी अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण जिस क्षेत्र में जाते उसका शिखर स्पर्श किये बिना  नहीं रहते। उन्हें महानता विरासत में नहीं  मिली और न उन पर थोपी गई अपितु उन्होंने अपनी मेधा और मेहनत से उसे अर्जित किया था। साधारण परिस्थिति से निकलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद और सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न तक की उनकी यात्रा में उनकी योग्यता और क्षमता पर उनके वैचारिक विरोधी भी सवाल नहीं उठा सके। स्व. अटल जी की तरह से ही प्रणब बाबू भी दलीय सीमाओं से परे जाकर अपनी विद्वता और ज्ञान के कारण सम्मानित हुए। भारतीय राजनीति के जिस दौर में वे उसका हिस्सा बने तब उनके बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं थी। जिस बंगाल से वे आये वह वामपंथ का मजबूत किला था और वे कोई जननेता भी नहीं थे। उनकी बौद्धिक प्रतिभा और पैनी नजर के कारण ही राजनीति उन्हें खींचकर लाई वरना दादा शिक्षविद बने रहते। लेकिन एक बार जब वे आ गये तब उन्होने एक कुशल राजनीतिक नेता की भूमिका का बड़े  ही प्रभावशाली तरीके से निर्वहन किया। उनका पुरुषार्थ कई  बार उन्हें प्रधानमंत्री पद के निकट ले गया लेकिन प्रारब्ध ने अवरोध  उत्पन्न कर दिए। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि यदि डा. मनमोहन सिंह की जगह स्व. मुखर्जी प्रधानमंत्री बने होते तब कांग्रेस आज जिस दुरावस्था का शिकार है,  शायद उससे बच जाती। आशय डा. सिंह की योग्यता को कमतर आंकना नहीं अपितु प्रणब दा के संवाद कौशल और साहसिक फैसले लेने की क्षमता को स्वीकार करना है। एक समय ऐसा भी आया जब प्रणब दा को कांग्रेस से बाहर आकर  अपनी अलग पार्टी बनानी पड़ी लेकिन अंत में कांग्रेस को उन्हें वापिस लाना पड़ा और धीरे-धीरे वे उसके विघ्नहर्ता की भूमिका में आ गये। प्रणब मुखर्जी उन गिने चुने राजनेताओं में थे जिनकी अध्ययन और अध्यापन में रूचि अंतत: तक बनी रही और इसीलिये चाहे संसद में हो या अन्यत्र कहीं , उनके भाषण सदैव विषय केन्द्रित और तथ्यपूर्ण होते थे । उनके न रहने से राजनीति में बौद्धिकता की एक और कड़ी टूट गई। एक जमाना था जब बंगाल ज्ञान, विज्ञान, कला, संस्कृति और  आध्यात्म के साथ ही क्रांतिकारी सोच के लिए प्रसिद्ध था। उक्त सभी क्षेत्रों में  एक से एक विभूतियों की गौरवगाथा से बंग भूमि का इतिहास सुशोभित है। उस भद्रलोक की परम्परा को राजनीति में भी प्रणब बाबू ने जिस शालीनता से निभाया उसमें रवीन्द्र संगीत की मधुरता के साथ ही बंगाल के अभिजात्य स्वभाव का भी मिश्रण था। दादा ने एक लम्बी पारी खेली। इंदिरा जी से लेकर राहुल गांधी तक के साथ उन्होंने काम किया। सार्वजानिक जीवन में अनेक दायित्वों का निर्वहन करते हुए वे रायसीना पहाड़ी पर स्थित उस  भव्य प्रासाद तक पहुंचे  जो किसी भी  राजनेता के लिए सन्यास की राह प्रशस्त करता है। उनके कार्यकाल में नरेंद्र मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री का दायित्व ग्रहण किया और बिना संकोच ये स्वीकार किया कि दिल्ली में आने के बाद वे उनके मार्गदर्शक बने। श्री मोदी द्वारा प्रणब दा के चरण स्पर्श करना ये साबित कर गया कि विद्वता का सम्मान करने के हमारे संस्कार आज भी जीवित हैं। उस लिहाज से दादा का चला जाना एक रिक्तता पैदा कर गया। राष्ट्रपति  पद से निवृत्त होने के बाद उन्होने खुद को राजनीति से ऊपर कर  लिया था। सही  मायनों में वे उपदेशक की भूमिका में आ गये थे। रास्वसंघ के आमन्त्रण पर नागपुर जाकर स्वयंसेवकों को संबोधित करने के उनके कदम को लेकर तरह-तरह की टिप्पणियाँ हुईं । लेकिन उस अवसर पर उनका भाषण भारत  के इतिहास और संस्कृति पर एक शोध पत्र के वाचन जैसा था। उनके संस्मरण आत्मकथा के रूप में आ चुके थे पर  अभी देश  उनसे बहुत कुछ और भी सुनना चाहता था। लेकिन उनकी यात्रा का अंत हो गया।  प्रणब मुखर्जी  इंदिरा युग से लेकर 2020  तक राष्ट्रीय परिदृश्य पर पूरी वजनदारी से छाये रहे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी दादा का अवसान एक राष्ट्रीय क्षति है क्योंकि सार्वजनिक जीवन में बढ़ते जा रहे प्रदूषण के बीच वे उस सुगन्धित फूल की तरह थे जिसका सान्निध्य हर किसी को पसंद था।
विनम्र श्रद्धांजलि।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 31 August 2020

अर्थव्यवस्था खेल नहीं लेकिन खिलौने अर्थव्यवस्था का हिस्सा जरूर हैं



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत दिवस रेडियो पर मन की बात के दौरान भारतीय खिलौना उद्योग को विकसित करने का जो आह्वान किया वह दिखने में छोटा लेकिन अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ही आधारभूत उपाय है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हालाँकि इसका मजाक उड़ाया है लेकिन आम हिन्दुस्तानी घटिया किस्म के चीनी खिलौने खरीदते समय उस दौर को जरूर याद करता है जब अपने देश में भी खिलौनों का उत्पादन हुआ करता था। यद्यपि भारतीय बाजार में चीनी घुसपैठ के पहले भी जापानी खिलौने आया करते थे किन्तु वे अपेक्षाकृत महंगे होने से साधारण लोगों की पहुँच से बाहर थे। चीन ने जब सस्ते खिलौनों की भरमार भारतीय बाजारों में कर दी तब टिकाऊ न होने के बाद भी भारतीय उपभोक्ताओं ने तात्कालिक लाभ की दृष्टि से उन्हें खरीदना शुरू किया और देखते - देखते भारतीय खिलौना उद्योग भी टूटे हुए खिलौने की तरह होकर रह गया। प्रधानमंत्री ने कोरोना काल के दौरान आपदा को अवसर में बदलने का मंत्र देते हुए आत्मनिर्भर भारत का जो नारा दिया वह भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का बहुत ही महत्वाकांक्षी कदम है। रक्षा क्षेत्र के 100 से अधिक सामान भारत में बनाने का सरकार का फैसला दिशासूचक है। निजी क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता के लिए नये सिरे से प्रयास प्रारम्भ हो गये हैं। खास तौर पर दवा निर्माताओं ने कच्चे माल के भारत में उत्पादन का अभियान छेड़ दिया है। रही बात खिलौनों की तो इनको बनाने में कोई बहुत बड़ी तकनीक नहीं लगती। लेकिन इनके जरिये बच्चों के मानसिक विकास की नींव जरूर डाली जा सकती है। भारत में स्थानीय स्तर पर बनने वाले खिलौने भले ही आज के दौर में अप्रासंगिक मान लिए जाएँ लेकिन आधुनिक खिलौनों का उत्पादन करने लायक तकनीकी ज्ञान और अनुभव तो भारत के पास है ही। प्रधानमंत्री ने कम्प्यूटर  इंजीनियरों से भारतीय इतिहास और हालात को ध्यान रखते हुए कम्यूटर गेम्स बनाने की जो अपील की, उसका उद्देश्य आत्मनिर्भरता के साथ ही वैश्वीकरण के कारण खतरे में आई भारतीयता को सुरक्षित रखते हुए मजबूती प्रदान करना है। ये बात पूरी तरह सही है कि विदेशों में विकसित हुए कम्प्यूटर गेम्स में उलझकर भारतीय बच्चे और किशोर मशीनी सोच से प्रभावित होते जा रहे हैं। उनमें उद्दंडता और उच्छ्श्रंखलता जिस तरह बढ़ रही है उसका व्यापक प्रभाव समाज में देखा जा सकता है। बाल अपराध बढ़ने के लिए भी मनोवैज्ञानिक विदेशी कम्प्यूटर गेम्स को काफ़ी हद तक जिम्मेदार मानते हैं । वॉल्ट डिज्नी द्वारा सृजित मिकी-माउस पूरी दुनिया के बच्चों के मन पर छाया हुआ है। उसके जवाब में जब भारतीय निर्माताओं द्वारा गणेश जी, हनुमान जी और ऐसे ही अन्य भारतीय पौराणिक चरित्रों पर टीवी एनीमेशन धारावाहिक बनाए गये तो उसका भारत के बच्चों पर बहुत ही सकारात्मक असर हुआ। मोगली नामक एनीमेशन को भी आशातीत सफलता मिली। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि नब्बे के दशक में टीवी पर रामायण और महाभारत के बतौर धारावाहिक प्रसारण ने भारतीय समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित किया और उसी के बाद पौराणिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित दर्जनों धारावाहिक और फि़ल्में बनीं और सफल भी रहीं। कोरोना के आते ही लॉक डाउन के दौरान दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत का प्रसारण दशकों बाद फिर से किया गया। और उन्हें मिली सफलता से ये साफ हो गया कि भारतीय समाज क्या चाहता है ? प्रधानमंत्री ने तो गूगल, फेसबुक और ट्विटर के स्वदेशी संस्करण के विकास की अपील भी युवा कम्प्यूटर इंजीनियरों से की जो भारत को सही मायनों में विश्वशक्ति बनाने के लिए मूलभूत आवश्यकता है। बात खिलौना उद्योग के पुनर्जीवित करने से शुरू हुई थी और श्री मोदी ने भारत में कुत्तों की उन नस्लों का जिक्र भी कर दिया जो किसी भी पैमाने पर महंगे विदेशी नस्ल के कुत्तों से कम नहीं होते। यूँ तो इस बात का भी मजाक उड़ाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री कुत्तों की नस्ल का जिक्र राष्ट्र के नाम संबोधन में करें लेकिन उनकी समूची चर्चा का आधार चूँकि स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत था इसलिए उन्होंने ऐसा कहा। मन की बात के ताजा संस्करण में खिलौनों से बात शुरू करना निश्चित रूप से जनसाधारण के मन को छूने का प्रयास था। अर्थव्यवस्था बेशक खेल नहीं है लेकिन ये बात भी सच है कि 135 करोड़ की आबादी वाले मुल्क में खिलौने भी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ता प्रदान कर सकते हैं। चीन इसका सबसे सटीक उदाहराण है। जिसे खेल - खेल में चुनौती देने का श्री मोदी का ये अंदाज वाकई दूरदृष्टता है। लेकिन इसके साथ ही सरकार को खिलौना और कम्प्यूटर गेम्स बनाने वालों को विशेष छूट और प्रोत्साहन देना पड़ेगा जिससे वे अतिरिक्त उत्साह और सक्रियता दिखा सकें।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 29 August 2020

हमारे देश के बीमार नेता शिंजो आबे जैसा उदाहरण कब पेश करेंगे




जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। वे जापान के सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमन्त्री रहे। त्यागपत्र का कारण राजनीतिक न होकर खऱाब स्वास्थ्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपना कार्यकाल पूरा होने के एक वर्ष पहले ही पद छोड़ रहे हैं क्योंकि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है और ऐसे में जब देश कोरोना से जूझ रहा है तब वे नेतृत्व के स्तर पर शून्यता की स्थिति बनाए रखने के पक्ष में नहीं हैं। जापान एक विकसित देश है। वहां चिकित्सा सुविधाएँ भी विश्वस्तरीय हैं। प्रधानमन्त्री आबे चाहते तो पद पर रहते हुए किसी कार्यकारी के जरिये भी सरकार का संचालन कर सकते थे। जापान की जनता में भी उनका विरोध नहीं था। इस पद पर कार्य करने का उनके पास पर्याप्त अनुभव भी था। श्री आबे ने देश को राजनीतिक स्थायित्व देने के साथ ही आर्थिक मजबूती भी दी। पिछली आर्थिक मंदी के दौरान जापान की अर्थव्यवस्था को डगमगाने से बचाने में उनकी भूमिका सराहना का पात्र बनी। यहाँ तक कि अनेक अवसरों पर जापान ने अमेरिका के अर्थतंत्र को भी सहारा दिया। विश्व बिरादरी में भी उनकी गिनती अनुभवी और प्रभावशाली नेता के तौर पर होती रही। भारत और जापान के बीच निकट सम्बन्ध स्थापित होने में श्री आबे का योगदान उल्लेखनीय है। खास तौर पर नरेंद्र मोदी के साथ उनका व्यक्तिगत सामंजस्य बहुत ही अच्छा  रहा। लेकिन इस सबसे हटकर उनके त्यागपत्र को भारतीय संदर्भों में देखने पर मन में स्वाभाविक रूप से ये प्रश्न उठता है कि हमारे देश में बीमारी के बावजूद सरकारी पदों पर बैठे महानुभाव इस तरह का उदाहरण पेश क्यों नहीं करते ? मात्र 65 साल के आयु में पद त्याग करने वाले श्री आबे एक वर्ष का शेष कार्यकाल आसानी से पूरा कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा करने की जगह गद्दी छोड़ने का फैसला किया। भारत में सत्ता में बैठे अनेक वयोवृद्ध राजनेता असाध्य रोगों से ग्रसित होने के बाद भी पद से हटने की बजाय सरकारी खर्च पर मुफ्त इलाज करवाते हैं। अनेक तो ऐसे हैं जो लम्बे समय तक विदेश में इलाजरत रहे। आज भी कुछ हैं जो दफ्तर में कम और अस्पताल में ज्यादा रहते हैं। लेकिन सत्ता से हटने का ख्याल उन्हें सपने में भी नहीं आता। राज्यपाल पद पर बिठाये जाने वाले अधिकतर नेताओं के काफी बुजुर्ग होने से तरह-तरह की बीमारियाँ उनके साथ जुड़ी होती हैं। महामहिम बनते ही वे प्राचीन समय के राजा-महाराजा की तरह बन जाते हैं। मप्र के अनेक पूर्व राज्यपाल पद पर आने के पहले ही बीमार थे, इस कारण उनका अधिकतर कार्यकाल अस्पतालों में ही बीता। इलाज पर हुआ करोड़ों का खर्च भी सरकारी खजाने से किया गया। सत्ता से अलग होने के बाद भी मुफ्त इलाज की बात अपनी जगह है लेकिन पद पर रहते हुए जब राजनेता बीमार होते हैं तो उसका असर उनके सरकारी काम पर पड़ता है। 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले स्व. अरुण जेटली और स्व. सुषमा स्वराज ने चुनावी राजनीति से खुद को दूर कर लिया। पिछली सरकार में मंत्री रहते हुए ही उनकी तबियत काफी खराब रही। किडनी और हृदय की शल्यक्रिया भी हुई और उस कारण वे लम्बे समय तक मंत्री पद का दायित्व नहीं निभा सके। श्री जेटली पहली मोदी सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए खड़े रहकर बजट भाषण तक नहीं पढ़ पाते थे। उस सरकार का आखिरी बजट तो उनकी जगह पियूष गोयल ने पेश किया। दुर्भाग्य से चुनाव के बाद वे दोनों ही दिवंगत हो गये। लेकिन चुनावों से दूर होने जैसा निर्णय लेने में बीमार नेताओं को तकलीफ  होती है। प्रधानमंत्री बनने के बाद श्री मोदी ने भाजपा में 75 वर्ष की जो आयु सीमा निर्धारित की उसकी वजह से बहुत से नेता सक्रिय राजनीति से तो अलग हो गये लेकिन राजभवन में उनका पुनर्वास अभी भी जारी है। केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान लम्बे समय से अस्वस्थ हैं। लन्दन में भी इलाज करवाकर आ चुके हैं। हाल ही में फिर अस्पताल में भर्ती हो गये। ऐसे मंत्रीगण अपने मंत्रालय को ठीक तरह से नहीं चला पाने के बावजूद खराब स्वास्थ्य के कारण पद छोड़ने की सौजन्यता क्यों नहीं दिखाते, ये बड़ा सवाल है। जापान के प्रधानमन्त्री द्वारा बीमारी के कारण महज 65 साल की उम्र में सत्ता त्याग देने जैसी बात हमारे देश में मूर्खता की श्रेणी में रखी जायेगी। चुनाव आयोग ने नामांकन पत्र में तरह-तरह की जानकारियाँ देने का प्रावधान किया है। इसके कारण प्रत्याशी की आय, चल-अचल सम्पत्ति, अपराधिक प्रकरण, शैक्षणिक योग्यता आदि की जानकारी जनता के संज्ञान में आ जाती है। बेहतर हो आगे से नामांकन पत्र के साथ ही प्रत्याशी के स्वास्थ्य संबंधी विवरण देना भी अनिवार्य किया जाए। हो सकता है कुछ लोग इसे लेकर निजता का सवाल खड़ा करें लेकिन जब स्वस्थ भारत की बात होती है तो फिर नेताओं का स्वस्थ होना भी एक मुद्दा होना चाहिए। सुशांत राजपूत, कोरोना और राजनीतिक रस्साकशी के कारण हमारे देश में जापान के प्रधानमंत्री द्वारा स्वास्थ्य संबंधी कारण से पद त्याग देने जैसी खबर का शायद ही संज्ञान लिया जाए लेकिन यदि लोकतंत्र को जवाबदेह बनाना है तो उसे बीमार नेताओं से बचाना भी समय की मांग है। 1945 में परमाणु हमले के कारण तबाह होने के बाद मात्र 75 बरस में जापान विश्व की आर्थिक महाशक्ति बन बैठा जबकि दूसरे महायुद्ध की विभीषिका से दूर रहकर 1947 में आजाद होने के बाद भारत में आज भी बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहने को बाध्य है। कारण श्री आबे के त्यागपत्र से समझा जा सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 28 August 2020

असली पिक्चर अभी बाकी है : नशे के खुलासे से मामला उलझा



गत दिवस एक टीवी समाचार चैनल के वरिष्ठ संपादक द्वारा अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर संदेह के घेरे में बताई जा रहीं उनकी महिला मित्र और अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती का जो साक्षात्कार लिया गया उसके प्रसारण के बाद सोशल मीडिया पर उक्त संपादक के साथ चैनल की भी जमकर आलोचना हुई। रिया का सुशांत की मौत में हाथ है या नहीं ये तो जाँच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा लेकिन जिन रहस्यमय परिस्थितियों में वह सुशांत को छोडकर गई और उससे जुड़ी बाकी जानकारी सामने आ रही है उससे लगता है कि भले ही वह उसकी मृत्यु के समय उसके घर में नहीं रही लेकिन उसके पहले और बाद के घटनाक्रम से मिल रहे संकेतों के मुताबिक इस कांड के बारे में उससे काफी कुछ पता चल सकता है। सबसे बड़ी बात जो उक्त साक्षात्कार में उसने बताई वह ये कि सुशांत नशीली दवाएं ( ड्रग्स ) लेता था। हालाँकि उसने इस बात से साफ़  इंकार किया कि उसने सुशांत को इसकी लत डाली। बकौल रिया उसे विमान में बैठने से डर लगता था और किसी चिकित्सक के कहने पर उसने उड़ान से पहले नशीली दवाई लेना शुरू किया, जो लत बन गई। रिया ने ये भी कहा कि उसने सुशांत को रोकने की काफी कोशिश की लेकिन वह अपने फैसलों को लेकर बहुत ही दृढ़ था। नशीली दवाओं के नाम भी उसने साक्षात्कार के दौरान खुलकर बताये। लेकिन उसके जो व्हाट्स एप सन्देश जाँच एजेंसियों ने ढूढ़ निकाले उनसे स्पष्ट होता है कि वह नशीली दवाइयां मंगवाने में शामिल थी और उसकी आपूर्ति करने वालों को प्रत्यक्ष न सही लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से जानती थी। हो सकता है वह सुशांत की मांग पूरी करने के लिए ऐसा करती रही लेकिन जब उसने ये माना कि वे दोनों दंपत्ति की तरह रहते थे और सुशांत को नशीली दवाएं देने में उसकी कोई भूमिका नहीं थी तब जिस इन्सान से वह विवाह रचाने जा रही थी क्या उसकी नशे की लत छुड़वाने के लिए उसे ज़रूरी कदम नहीं उठाना चाहिये थे ? जिस आत्मविश्वास के साथ उसने साक्षात्कार दिया उससे एक बात तो साफ़ हो गई कि रिया बहुत ही दबंग महिला है। लेकिन अपने होने वाले पति को नशीली दवाईयों से मुक्त करने के लिए उसका कुछ न किया जाना ये साबित करता है कि सुशांत की जिस मानसिक बीमारी (अवसाद) का ढिंढोरा पीटा जा रहा था वह जैसा रिया ने बताया नशीली दवाइयों की लत थी। उसने ये भी बताया कि सुशांत के साथ उसके जुड़ने के पहले से ही वह नशे की गिरफ्त में आ चुका था। रिया चूंकि उसके साथ लिव इन में रह रही थी और जैसा उसी ने बताया उसके भाई के सुशांत के साथ बहुत ही आत्मीय सम्बन्ध थे। यहाँ तक कि जब वे दोनों  छुट्टियाँ मनाने यूरोप गए तब भी सुशांत , रिया के भाई को साथ ले गया। सवाल ये है कि एक युवती ये जानते हुए भी कि वह जिस शख्स के साथ बिना शादी किये पत्नी की तरह रह रही हो और जल्द उसके साथ विवाह करने वाली हो , वह उसके नशे में डूबे होने की बात को किस कारण छुपाती रही , और उसने इस बारे में नशा मुक्ति केंद्र या प्रशासन को क्यों नहीं बताया ? उसके फोन से मिली जानकारी के अनुसार वह खुद नशीली दावा के आपूर्तिकर्ता से संपर्क किया करती थी। इस बारे में नारकोटिक्स विभाग भी सक्रिय हो गया है जिससे कि सुशांत के नशैलची होने वाली कहानी का सच सामने आने की उम्मीद बढ़ चली है। इस जानकारी के बाद फिल्मी दुनिया में नशे के चलन की तह में जाना जरूरी है। कुछ समय पहले एक युवा फिल्म निर्माता जो इन दिनों भतीजावाद के कारण काफी विवादित हो चले हैं , के घर हुई सितारों की अन्तरंग पार्टी का जो वीडियो प्रसारित हुआ था उसमें अनेक अभिनेता और अभिनेत्रियाँ नशा ( ड्रग्स ) करते दिखाई दिए थे। शराब तो खैर फिल्मी पार्टियों में पानी की तरह बहती है । लेकिन नशीली दवाओं का चलन भी तेजी से फैलने की बात अब खुलकर सामने आने लगी है। काफी पहले संजय दत्त इसके शिकार हुए थे जिनका इलाज उनके पिता स्व. सुनील दत्त ने अमेरिका ले जाकर करवाया। लेकिन सुशांत के मामले में जैसा रिया ने बताया और उसके फोन से पता चला कि नशीली दवाइयां फिल्मी कलाकारों को आसानी से उपलब्ध होती हैं। हालाँकि जाँच शुरू तो इस बात के लिए हुई थी कि सुशांत ने आत्महत्या की या उसकी हत्या हुई लेकिन नशे के कारोबार के सामने आने के बाद अब उसका दायरा काफी विस्तृत हो गया है। जाँच एजेंसियों को चमक-दमक भरी फिल्मी दुनिया की गन्दगी को सबके सामने लाने का इससे बेहतर अवसर नहीं मिलेगा क्योंकि परिवारवाद से पीड़ित अनेक छोटे बड़े कलाकार अपनी बिरादरी की पोल खोलने के लिए तैयार बैठे हैं। कंगना रनौत नामक अभिनेत्री तो नशे के कारोबार का पर्दाफाश करने के लिए सरकार से सुरक्षा मांग रही है। सीबीआई और नारकोटिक्स विभाग मिलकर सुशांत की मौत के साथ ही नशीली दवाइयों की आपूर्ति के स्रोतों का पता लगाकर उसके संचालकों की गर्दन में फंदा डाल सकें तो अनेक ऐसे राज खुल जायेंगे जिन पर अभी तक पर्दा पड़ा हुआ है। ये बात भी जगजाहिर है कि फिल्मी दुनिया में पैसे का जो अनवरत प्रवाह है, उसका एक स्रोत माफिया भी है। और जहां माफिया होता है वहां नशा (ड्रग्स), व्यभिचार और अन्य अपराध स्वाभाविक तौर पर अपनी जगह बना लेते हैं। ये देखते हुए लगता है कि सुशांत की मौत का असली सच जो अब तक बताया जा रहा है, उससे अलग हटकर भी हो सकता है। फिल्मी अंदाज में कहें तो पिक्चर अभी बाकी है ...।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 27 August 2020

कांग्रेस मुक्त भारत की बजाय गांधी परिवार मुक्त कांग्रेस की मुहिम



2014 के लोकसभा चुनाव के पहले जब नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा उछाला तब तरह-तरह की बातें हुईं। मोदी विरोधियों ने उसे अतिरेक भी बताया। चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस जब पचास से नीचे उतर आई तब ऐसा लगा कि वह बात सही होने को आई। लेकिन अगले पांच सालों में उसने पंजाब, मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपने दम पर सत्ता हासिल की वहीं अनेक राज्यों में दूसरी पार्टियों के साथ मिलकर भाजपा का विजय रथ रोका। ऐसा लगने लगा था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस वापिसी करेगी। 2018 के अंत में तीन प्रमुख राज्य जिस तरह से भाजपा के हाथ से खिसके और उसके पहले गुजरात में वह घुटनों के बल चलकर जीत पाई उससे कांग्रेस का आत्मविश्वास काफी बढ़ा और उसी कारण राहुल गांधी ने जबर्रदस्त आक्रामक रुख अख्त्तियार किया। हिन्दू विरोधी छवि को बदलने के लिए मंदिरों और मठों में भी मत्था टेका। उनके जनेऊ धारण करने जैसे शिगूफे भी छोड़े गए किन्तु 2019 के लोकसभा चुनाव ने कांग्रेस की तमाम उम्मीदों को धूल - धूसरित कर दिया। पराजय की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल ने अध्यक्ष पद त्याग दिया। लेकिन उनका स्तीफा मंजूर करने में ही पार्टी ने कई महीने लगा दिए और फिर सोनिया गांधी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर पार्टी की बागडोर परिवार के ही पास रखी। एक वर्ष गुजर जाने के बाद भी पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं चुने जाने से पार्टी की दिशा तय नहीं हो पा रही थी। श्रीमती गांधी का स्वास्थ्य इस भार को सहन करने लायक नहीं होने से संगठन संबंधी जरूरी फैसले अटके पड़े रहने का ही दुष्परिणाम मप्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत के तौर पर देखने मिला। उसकी पुनरावृत्ति राजस्थान में भी होने जा रही थी लेकिन सचिन पायलट संख्या नहीं बटोर सके। हालाँकि खतरे के बादल कब बरस जाएं कहा नहीं जा सकता। इस सबके पीछे का कारण पार्टी के शीर्ष नेतृत्त्व में व्याप्त शून्यता ही है। जिन 23 वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया जी को पत्र लिखकर पार्टी संगठन को तदर्थवाद से निकालकर सक्रिय बनाने का अनुरोध किया वे गांधी परिवार के विरोधी हैं या नहीं ये तो स्पष्ट नहीं हुआ किन्तु उनकी मुहिम थी तो पार्टी के हित में ही। यदि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में उस पत्र की मंशानुसार श्रीमती गांधी अपनी जगह किसी और को अध्यक्ष बना देतीं तो मामला आसानी से निपट जाता लेकिन पत्र लिखने वालों की वफादारी पर ही सवाल उठाकर आग में घी डाल दिया गया। सोनिया जी तो शांत रहीं लेकिन राहुल और प्रियंका ने चिट्ठी लिखने वालों पर जिस तरह की टिप्पणियाँ कीं और उनके समर्थकों ने भी उनकी हाँ में हाँ मिलाई वह चिट्ठी भेजने वालों को अपना अपमान लगा और उनकी तरफ  से भी तीखी जवाबी प्रतिक्रिया आने लगी। हालाँकि बाद में भूल जाओ और माफ़ करो की औपचारिकता का निर्वहन करते हुए सब कुछ शांत होता दिखाने की कोशिश भी की गई और श्रीमती गांधी ने कुछ नाराज नेताओं को फोन करते हुए मनाने का प्रयास भी  किया लेकिन कपिल सिब्बल के अलावा चिट्ठी भेजने वाले और नेता भी लगातार अपने पत्र के औचित्य को साबित कर रहे हैं जिससे लगता है आग अभी तक ठंडी नहीं हुई। जिस तरह सोनिया जी को आगामी छह महीने तक कार्यकारी बने रहने का फैसला करवाते हुए नये अध्यक्ष के चुनाव को टाल दिया गया उससे पत्र भेजने वाले खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह जैसे नेता खुलकर कह रहे हैं कि उसे सार्वजनिक करना पार्टी विरोधी कृत्य था। इससे लगता है कि सोनिया जी द्वारा मामला ठंडा करने की कोशिशों को पलीता लगाने के समानांतर प्रयास भी चल रहे हैं। ये सब देखते हुए कहा जा सकता है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े दो दर्जन नेताओं ने कांग्रेस को गांधी परिवार के शिकंजे से आजाद करवाने का दुस्साहसिक कदम उठा लिया है और ऐसा करते समय वे इतना आगे बढ़ गए कि लौटना आत्मघाती होगा। वहीं दूसरी तरफ  गांधी परिवार का भरोसा दोबारा हासिल करने के रास्ते भी बंद हो चुके हैं। ऐसे में इन नेताओं के पास सीमित विकल्प बच रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी परेशानी ये है कि वे बड़े नेता कहलाने के बावजूद अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखते। और यही कमजोरी गांधी परिवार समझता है। लेकिन इस घटनाक्रम से कांग्रेस की द्वितीय पंक्ति में भी पशोपेश की स्थिति है। जिन 23 नेताओं ने चिट्ठी भेजने की हिमाकत की उनमें से अधिकांश ने तो राजनीति में बहुत कुछ हासिल कर लिया लेकिन उनके समर्थक यदि उनके साथ खड़े होने की हिम्मत दिखाते हैं तब उनके हाथ खाली ही रहेंगे। वैसे भी इस तरह का मोर्चा खोल देने के बाद आर-पार की लड़ाई लड़ना जरूरी हो जाता है। इस प्रकार श्री मोदी द्वारा कांग्रेस मुक्त भारत की बजाय बात अब गांधी परिवार मुक्त कांग्रेस की तरफ  घूमने लगी है। विवादित पत्र भेजने वाले नेताओं को यदि कांग्रेस निकाल दे तब उसके पास भी चेहरों का अभाव हो जाएगा। इसलिए फिलहाल शीतयुद्ध के हालात बने रहेंगे किन्तु अगले छह महीने गांधी परिवार के लिए बेहद चुनौती भरे होंगे। हाल ही में हुई कार्यसमिति की  चर्चित बैठक में भले ही विरोध की आवाज को दबा दिया गया परन्तु उसके बाद भी चिट्ठी लिखने वालों की बैठकें और बयान जारी हैं। सोनिया गांधी के साथ सबसे बड़ी परेशानी ये है कि न तो उनमें इंदिरा जी जैसा राजनीतिक कौशल है और न ही राहुल गांधी में संजय गांधी सरीखा साहस। रही प्रियंका वाड्रा तो वे शाही परिवार की राजकुमारी से ज्यादा कुछ नहीं हैं। आजादी से पहले और बाद में कांग्रेस ने अनेक बार बगावत और विभाजन झेले हैं लेकिन मौजूदा स्थिति थोड़ी अलग है क्योंकि इसमें नेतृत्व को अपने लिए उतना खतरा नहीं लग रहा लेकिन उसके साथ अब तक जुड़े रहे कुनबे में अपने भविष्य को लेकर जबरदस्त चिंता है। क्या पता डूबते जहाज से चूहों के कूदने वाली कहावत ऐसे ही हालातों के संदर्भ में बनाई गई हो।

-रवीन्द्र वाजपेयी