Wednesday, 30 September 2020

राम जन्मभूमि फैसले के बाद ये प्रकरण महत्वहीन हो चुका था



आखिऱकार 28 साल बाद फैसला आ ही गया। 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में बाबरी ढांचा ढहाए जाने के आरोप में वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, डा.मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमाश्री भारती, विनय कटियार सहित विश्व हिन्दू परिषद के अनेक पदाधिकारियों और साध्वी ऋतम्भरा , आचार्य  धर्मेन्द्र , महंत नृत्यगोपाल  दास आदि 32 लोगों पर  अपराधिक षडयंत्र रचने का मुकदमा मामला सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा ख़ारिज करते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया। विशेष अदालत के न्यायाधीश  एसके यादव आज शाम सेवा निवृत्त हो जायेंगे। उन्हें गत वर्ष एक साल की सेवा वृद्धि दी गई थी। राम जन्मभूमि विवाद का फैसला करते समय सर्वोच्च  न्यायालय ने  ढांचा गिराए जाने पर अपराधिक प्रकरण जारी रखने की बात कहते हुए 30 सितम्बर तक उसका निपटारा करने का निर्देश दिया था। उस दृष्टि से श्री यादव को आज ही फैसला देना था। इस प्रकरण में कुल 48 आरोपी थे जिनमें 16 नहीं रहे। जो जीवित हैं उनमें भी अनेक बेहद वयोवृद्ध हो चुके हैं। ऐसे में इस फैसले का कानूनी स्तर भी बौद्धिक महत्व  रह गया था। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रामजन्म भूमि हिन्दुओं को सौंपने के फैसले के बाद ढांचा गिराए जाने का मामला अधमरा सा था। इसीलिये बाबरी मस्जिद के पक्षकार रहे इकबाल अंसारी ने उक्त प्रकरण वापिस लेने की मांग भी की थी । खैर, अदालत के फैसले से अब ज्यादा  कुछ कहने की गुंजाईश नहीं बची। हालाँकि बाबरी मामले से जुड़े मुस्लिम पक्ष के कुछ लोगों ने आज के फैसले से असहमति व्यक्त करते हुए उच्च न्ययालय जाने की बात भी कही है। लेकिन व्यवहारिक और वैधानिक दोनों आधारों पर अब इस प्रकरण को खींचने का कोई लाभ नहीं होगा। फैसले  में श्री यादव ने सीबीआई द्वारा लगाये गये आरोपों को अपर्याप्त मानते हुए कहा कि ढांचा गिराए जाने की घटना आकस्मिक थी जिसके पीछे किसी षड्यंत्र  की योजना की बात गलत है। इसे कारसेवकों के उन्माद का परिणाम माना गया  जिन पर आरोप साबित करना किसी  के लिए भी  सम्भव नहीं है। वैसे भी 28 वर्ष के लम्बे कालखंड में जबकि केंन्द्र और उप्र में अनेक सरकारें बदल गईं हों , ऐसे किसी मामले को अंजाम तक ले जाना बहुत ही कठिन  था। सैकड़ों गवाहियों के बयान और भावनाओं के बीच घिरे किसी भी ऐसे मामले की  तह तक जाने की राह में इतने अवरोध और पेचीदगियां आती हैं कि अभियोजन पक्ष भी आखिर - आखिर में थक जाता है। यदि राजनेता आरोपी न होते तब शायद फैसले को इतना महत्व  भी न मिला होता। और उस पर भी भाजपा के दिग्गज नेता रहे श्री आडवाणी  और डॉ. जोशी के अलावा जितने भी शेष चेहरे हैं वे सभी देश की वर्तमान केंद्र सरकार के समर्थक माने  जाते हैं। इसलिए यदि फैसला उनके विरुद्ध जाता तब भाजपा और विहिप के साथ ही मोदी  सरकार के लिए भी बड़ी ही  विचित्र स्थिति बन  जाती और तब राम जन्मभूमि  पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले पर भी नए  सिरे से सवाल उठते। लेकिन आज के बाद केंद्र  सरकार सहित समूचे संघ परिवार ने राहत की सांस ली होगी। हालाँकि श्री आडवाणी और डॉ. जोशी को कोई पद न दिए जाने के लिए प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को आलोचना का शिकार होना पड़ा लेकिन कुछ जानकार ये भी मानते हैं कि उसके पीछे इस प्रकरण का भी हाथ था। जो भी हो एक बहुप्रतीक्षित मामले का पटाक्षेप आज हो गया। आगे इसे घसीटने का कोई लाभ मुस्लिम पक्ष को नहीं  होगा। हिन्दू संगठनों को भी इस फैसले को न्यायिक प्रक्रिया के पूर्ण होने के तौर पर लेना चाहिए, न कि हार या जीत के रूप में। वैसे लगभग तीन दशक  तक चला ये मामला हमारी न्याय प्रणाली पर भी सवाल उठाता है। ये कहने में कुछ भी गलत न होगा कि जाँच एजेंसियों के लिए ऐसे प्रकरणों की  जाँच किसी सिरदर्द से कम नहीं होती। सरकारें बदल जाने से भी उनके काम पर असर पड़ता है।  जिस न्यायाधीश ने अपने कार्यकाल के अंतिम  दिन फैसला दिया उस पर भी उँगलियाँ उठने लगें तो आश्चर्य नहीं होगा। इस सबके बाद भी आज देश  राहत महसूस कर  रहा है। अयोध्या विवाद से जुड़े सभी मामले एक-एक करते हुए परिणाम  तक पहुँच गए और  राम मंदिर का निर्माण भी शुरू हो चुका है। ऐसे में अब जरूरत है सौहार्द्र बनाये रखने की क्योंकि वर्तमान हालात में देश किसी नए विवाद में उलझने के स्थिति में नहीं है। भले ही ओवैसी ब्रांड नेता अपना मुंह चलाने लगे हैं लेकिन उन्हें ज्यादा भाव न दिया जाए यही अच्छा होगा। 

Tuesday, 29 September 2020

राजनीतिक दलों के मकडज़ाल से बाहर निकलें किसान



केंद्र सरकार द्वारा लाये गये कृषि सुधार कानूनों को बेअसर करने हेतु गैर भाजपा शासित राज्यों की सरकारों द्वारा अपने कानून बनाये जाने की चर्चा के पीछे राजनीतिक मतभेद ही हैं। लेकिन  केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक मतभिन्नता यदि संघीय ढांचे की व्यवस्था को नुकसान पहुँचाने लगे तब ये बहुत ही खतरनाक परिपाटी होगी। हालाँकि संविधान में कानूनों को लेकर तीन सूचियाँ बनाई गई हैं। इनके अनुसार कुछ कानून ऐसे हैं जो पूरे देश पर लागू होते हैं जबकि कुछ ऐसे हैं जो  राज्यों के लिए ऐच्छिक होते हैं, वहीं कुछ विषय ऐसे हैं जिन पर कानून बनाना राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है। किसानों के हित में बनाये गए हालिया कानूनों के दायरे में यदि पूरा देश नहीं आया तब उनका मूल उद्देश्य ही पूरा नहीं होगा। गत दिवस ही पंजाब में अपना अनाज बेचने गये उप्र के किसानों को वहां के किसानों ने रोक दिया। यदि गैर भाजपा शासित राज्यों द्वारा केन्द्रीय कानूनों को अपने यहाँ प्रभावशील होने से रोका गया तो विभिन्न राज्यों के किसानों और व्यापारियों के बीच टकराहट होने के आसार बढ़ जायेंगे। उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ से किसान यदि धान मप्र के बालाघाट जिले की चावल मिल में लेकर आना चाहे जो  नजदीक होने के वजह से सुविधाजनक है, लेकिन उसे मप्र के किसान या सरकार रोके तो इससे किस तरह की स्थिति बनेगी ये विचारणीय प्रश्न है। कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक भारत एक है जैसे नारे क्या निरर्थक होकर नहीं रह जायेंगे? संसद द्वारा पारित किसी कानून के नफे-नुकसान का आकलन करना राज्य का अधिकार है। लेकिन बीते कुछ समय से देखने में आ रहा है कि केंद्र सरकार से वैचारिक मतभेद रखने वाली राज्य सरकारें संसद द्वारा पारित कानूनों को लागू करने से इंकार करने का खुला ऐलान करने लगी हैं। नागरिकता संशोधन, शिक्षा नीति और अब कृषि सुधार कानून को लेकर जिस तरह का विरोध करते हुए विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अपने अलग कानून बनाने की घोषणाएं आये दिन हो रही हैं उन्हें देखते हुए आने वाले दिनों में देश नई समस्या में उलझ सकता है। अधिकतर गैर भाजपा पार्टियाँ नहीं चाहती थीं कि कृषि सुधार विधेयक पारित हो और इसीलिये वे उसे प्रवर समिति के विचार हेतु भेजने की मांग पर अड़ी थीं। जबकि केद्र सरकार अपनी निर्धारित कार्ययोजना के अनुसार उनको पारित करने में किसी भी प्रकार के विलम्ब की पक्षधर नहीं थी। दरअसल विपक्ष भी ऐसे अवसरों पर अपनी नीति बदलता रहता है। कांग्रेस ने तीन तलाक कानून पर लोकसभा में सरकार का साथ दिया किन्तु राज्यसभा में वह उसके विरोध में अड़ गई। कृषि कानूनों को लेकर कई महीनों पहले जब अध्यादेश जारी हुआ था तब मंत्रीमंडल में शामिल अकाली दल की प्रतिनिधि हरसिमरत कौर ने उसके पक्ष में बयान देते हुए कांग्रेस पर किसानों को भड़काने का आरोप लगाया था। लेकिन जब संसद में उसका विधेयक आया तब वे विरोध में आ गईं। इससे ये लगता है कि विरोध के पीछे भी कोई तर्कसंगत बातें न होकर महज राजनीतिक हित साधना है। यदि अध्यादेश जारी होने के बाद से ही विपक्षी दलों द्वारा किसानों को संगठित कर नई व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर किया जाता तो देश को उनकी बात समझ में आती। इसी तरह सत्ता पक्ष को भी चाहिए था कि वह इस समय का इस्तेमाल किसानों को आश्वस्त करने में करता। लेकिन न विपक्ष ने अपना दायित्व निभाया और न सता पक्ष ने अपना। अभी तक जो समझ में आया है उसके अनुसार विरोध कर रहे किसानों के मन में ये बात बैठ गई या बिठा दी गई है कि क़ानून लागू होते ही न्यूनतम समर्थन मूल्य रूपी व्यवस्था खत्म हो जायेगी जिससे किसान पूंजीपतियों और व्यापारियों के शिकंजे में फंसकर रह जाएगा। और भी अनेक बातें हैं जिन्हें आधार बनाकर किसानों को आंदोलित किया जा रहा है। हालाँकि भाजपा शासित राज्यों में भी नये कानूनों के विरोध में आंदोलन हो रहे हैं लेकिन वे पंजाब और हरियाणा जैसे उग्र नहीं हैं। केंद्र सरकार को चाहिए वह नये कानूनों के बारे में किसानों के मन में व्याप्त आशंकाओं का समाधान करे। और यदि ये लगता है कि उनका भरोसा जीतने के लिए कुछ और करने की जरूरत हो तो बिना प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाये जरूरी कदम उठाये जाएँ। इसी तरह विपक्ष को भी चाहिए कि वह किसानों का अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए उपयोग करने की बजाय उनके संघर्ष को दिशाहीन होने से बचाए। रही बात राज्यों द्वारा जवाबी कानून बनाने की तो ये कोई इलाज नहीं है और देश के संघीय ढाँचे में अनावश्यक दरारें उत्पन्न करने का खतरा बढ़ाएगा। किसान संगठनों की भी ये जिम्मेदारी है कि वे सत्ता और विपक्ष में से किसी के भी मोहरे न बनते हुए अपने हितों के बारे में सोचें। समय आ गया है जब किसानों को अपने बीच में से ऐसा नेतृत्व तैयार करना चाहिए जो बिना राजनीतिक प्रतिबद्धता के उनकी बात सत्ता और समाज दोनों के सामने रख सके। इसके साथ ही किसानों को थोड़ा जिम्मेदार भी होना पड़ेगा। यदि रेल रोको और तोड़फ़ोड़ जैसे तरीके अपनाये जाते रहे तो वे जनता की सहानुभूति से वंचित हो जाएंगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 28 September 2020

सिद्धांत और विचारधारा भी उपभोक्ता वस्तु बनकर रह गये



राजनीति में सिद्धांत और विचारधारा उस उपभोक्ता वस्तु जैसे होकर रह गये हैं जिसका विज्ञापन करने वाले अभिनेता, खिलाड़ी या पेशेवर मॉडल स्वयं उसका उपयोग नहीं करते। दो दिन पहले महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस और शिवसेना के मुख्य प्रवक्ता संजय राउत के बीच किसी पांच सितारा होटल में हुई मुलाकात के बाद ये कयास लगाये जाने लगे कि शिवसेना और भाजपा फिर से नजदीक आने को तैयार हैं। इसके पीछे अनेक कारण बताये जा रहे हैं। महाराष्ट्र की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले मानते हैं कि शिवसेना ने भाजपा से खुन्नस के चलते भले ही शरद पवार की राकांपा और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली और उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री की कुर्सी भी हासिल हो गई किन्तु उन्हें समर्थन दे रही दोनों  सहयोगी पार्टियां सरकार का जमकर दुरूपयोग कर रही हैं। उद्धव नाममात्र के मुख्यमंत्री रह गये हैं जबकि शासन और प्रशासन का रिमोट कंट्रोल शरद पवार के हाथ में है। अपनी हिन्दुत्ववादी छवि को हो रहे नुकसान को लेकर भी शिवसेना बेहद परेशान है। राममंदिर के शिलान्यास का श्रेय अकेले भाजपा उठा ले गई। इसी के साथ वीर सावरकर के बारे में राहुल गांधी सहित कुछ अन्य कांग्रेस नेताओं के बयानों को लेकर भी शिवसेना असमंजस में फंसकर रह गई। उसका अपना जो जनाधार है वह राकांपा और कांग्रेस से किसी भी तरह से सामंजस्य नहीं बिठा पा रहा। और फिर महाराष्ट्र में कोरोना का फैलाव जिस व्यापक पैमाने पर हुआ और बड़ी संख्या में मौतें हुईं उसकी बदनामी भी उद्धव के खाते में आई। भाजपा के साथ शिवसेना की तल्खी इतनी ज्यादा बढ़ चुकी थी कि केंद्र से मदद मांगने में भी मुख्यमंत्री के पाँव ठिठकते रहे। सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद श्री ठाकरे के पुत्र आदित्य ठाकरे के दामन पर आये छींटे भी उसके लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। सुशांत की पूर्व सचिव दिशा सालियान द्वारा आत्महत्या किये जाने की गुत्थी अभी तक सुलझी नहीं है। ऐसा कहा जाता रहा है कि एक अभिनेता द्वारा दी गई पार्टी में दिशा के साथ आपत्तिजनक कृत्य हुआ जिसके बाद ग्लानिवश उसने आत्महत्या की। उस पार्टी में आदित्य ठाकरे की उपस्थिति की चर्चा जमकर होती आई है। चूँकि वह मामला मुम्बई पुलिस के पास था इसलिए उसमें लीपापोती किये जाने के आरोप उद्धव ठाकरे सरकार पर लगते रहे। सुशांत की मौत को भी दिशा की आत्महत्या से जोड़ा गया। उसके बाद जबसे नशीली चीजों के खुल्लमखुल्ला उपयोग का खुलासा हुआ तबसे लोगों का ध्यान दिशा और सुशांत की मौत से हटकर उस तरफ चला गया और फिर बीच में कंगना रनौत के आरोपों और शिवसेना नियंत्रित बीएमसी द्वारा उसके दफ्तर में की गई तोड़फ़ोड़ ने नया मोड़ ले लिया। कंगना ने मुम्बई से मनाली लौटकर एक बार बिना नाम लिए ये आरोप लगाया कि  उन्होंने एक बड़े नेता के पुत्र को इस घटनाक्रम से जुड़ा  बताया इसलिए उनके विरुद्ध बदले की कार्रवाई की गई। चूँकि केंद्र सरकार खुलकर कंगना के पीछे खड़ी हो गई इसलिए शिवसेना को ये सोचने को मजबूर होना पड़ा कि वह इस मुसीबत से कैसे छुटकारा पाए ? तोड़फ़ोड़ के मामले में जिस तरह शरद पवार ने बीएमसी को लताड़ा और मुम्बई उच्च न्यायालय ने भी तीखी टिप्पणियाँ कीं उनसे शिवसेना के कान खड़े हो गए। उसे इस बात का भय सता रहा है कि दिशा और सुशांत की मौत और उसके बाद नशे के कारोबार में फि़ल्मी बिरादरी के अनेक नाम शामिल होने के बीच यदि किसी ने धोखे से भी आदित्य ठाकरे का नाम ले लिया तो उसके लिए मुंह छिपाने की जगह नहीं बचेगी। यही सब सोचकर शायद उसने दोबारा भाजपा के साथ अपने पुराने रिश्ते को पुनर्जीवित करने के बारे में सोचा हो। यद्यपि श्री फड़नवीस और श्री राउत ने संदर्भित मुलकात के बारे में जो बयान दिए उनसे तो लगता है मानों वह एक सौजन्य भेंट थी। पूर्व मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि श्री राउत बिहार चुनाव के बारे में सामना अख़बार के लिए उनका साक्षात्कार लेना चाहते थे जिसके लिए उनकी शर्त थी कि उसे बिना कांट - छांट के प्रकाशित किया जाना चाहिए। वहीं श्री राउत ने इसे एक साधारण भेंट बताए हुए कहा कि हम वैचारिक विरोधी तो हैं किन्तु  शत्रु नहीं। लेकिन अचानक दोनों पांच सितारा होटल में मिले , साथ भोजन किया और दो घंटे बिताये तो इसे महज सौजन्य भेंट नहीं माना जा सकता। इसलिए ये सोचना गलत नहीं है कि इस मुलाकत के पीछे हालिया राजनीतिक घटनाक्रम ही है। श्री राउत की भूमिका इसमें उद्धव ठाकरे के दूत की रही होगी। यदि इस मुलाकात के बाद भाजपा की तरफ से सकारात्मक संकेत दिये गये तो बिहार चुनाव के पहले ही महाराष्ट्र में भाजपा - शिवसेना दोबारा मिलकर सरकार बना सकते हैं। लेकिन केवल इन दोनों को इसके लिए कठघरे में खड़ा किया जाना उचित नहीं होगा क्योंकि मिलने और बिछड़ऩे का ये सिलसिला भारतीय राजनीति में आवश्यक बुराई के रूप में शामिल हो चुका है। बिहार में आरएलएसपी नेता उपेन्द्र कुशवाहा लालू परिवार के महागठबंधन को छोड़कर वापिस एनडीए में आ गए। जीतनराम मांझी तो पहले ही आ चुके थे। सुना है कांग्रेस भी राजग के अड़ियल रवैये से नाराज होकर अकेले चुनाव लड़ने की सोच रही है। गठबंधन में शामिल होने और निकलने के पीछे कोई सिद्धांत हो तो वह समझ में आता है। लेकिन जिन कारणों से पार्टियां या नेता किसी के साथ जुड़ते या अलग होते हैं उनका आधार महज स्वार्थ होते हैं। शिवसेना और भाजपा का गठबंधन हिंदुत्व के नाम पर बना , लेकिन टूटा मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए। इसी तरह उपेंद्र कुशवाहा ने मोदी सरकार का मंत्री पद छोड़कर अपनी पार्टी को एनडीए से बाहर निकालकर राजग का साथ पकड़ा। लोकसभा चुनाव में भट्टा बैठ जाने के बाद वापिस वहीं आ गये जहाँ से निकले थे। रामविलास पासवान ने अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार से इस कारण इस्तीफा दे दिया था क्योंकि गुजरात दंगों के बाद भाजपा ने नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री पद से नहीं हटाया था। लेकिन 2014 में वे उन्हीं मोदी के झंडे तले आ गये। ऐसे अनगिनत उदाहरण भरे पड़े हैं। लेकिन क्या इन नेताओं और पार्टियों द्वारा जनता को ये नहीं बताया जाना चाहिए कि उनके इन कदमों के पीछे कौन सा सिद्धांत या विचार होता है ? उससे भी बड़ी बात ये है कि शीर्ष पर बैठे नेता अपने मान - सम्मान की चिंता तो करते हैं लेकिन वे कार्यकर्ताओं के बारे में नहीं सोचते जिन्हें ऐसे अवसरवादी फैसलों के लिए आम लोगों के कटाक्ष झेलने पड़ते हैं। महाराष्ट्र में यदि शिवसेना और भाजपा दोबारा साथ आते हैं तो उनकी विचारधारा के लिए ये फायदेमंद रहेगा लेकिन सवाल ये उठेगा कि फिर अलग क्यों हुए थे? अगर भाजपा श्री ठाकरे को ही मुख्यमंत्री स्वीकार करती है तो ये निर्णय पहले क्यों नहीं किया गया और शिवसेना इस पद का दावा छोड़कर छोटे भाई की भूमिका से संतुष्ट हो जाती है तब उसकी पिछली जिद पर सवाल उठेंगे। और क्या समझौता होने के बाद भाजपा दिशा की मौत से शुरू हुए घटनाक्रम को रद्दी की टोकरी में फेंककर शिवसेना और ठाकरे परिवार को चरित्र प्रमाणपत्र जारी कर देगी ? सवाल और भी हैं लेकिन जब समूची सियासत केवल और केवल सत्ता के गुणा-भाग में उलझकर रह गई हो तब शर्मो - हया और जवाबदेही की अहमियत ही कहां बच रहती हैं ?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 26 September 2020

किसानों के दम पर बने ढेर नेता : फिर भी वह नेतृत्वविहीन




भाजपा के बौद्धिक पूर्वज पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने गत दिवस पार्टी कार्यकर्ताओं को अपने संबोधन में नए किसान कानूनों के विरोध को निरर्थक ठहराते हुए विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह किसानों को बरगला रहा है। उन्होंने नए कानूनों को किसानों के हित में लिया गया ऐतिहासिक निर्णय बताते हुए कहा कि इससे छोटे किसान सबसे ज्यादा लाभान्वित होंगे जिनकी संख्या 85 फीसदी है। प्रधानमन्त्री ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया जिससे ये लगता कि उनकी सरकार इस मामले में कदम पीछे खींचने को तैयार है। बल्कि उन्होंने पार्टी कायकर्ताओं का आह्वान किया कि वे किसानों के बीच जाकर उनकी गलतफहमी दूर करें। दूसरी तरफ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो किसानों से इन कानूनों का विरोध करने के लिए आजादी के आन्दोलन जैसा संघर्ष करने कहा है। यूँ भी नए कानूनों का जैसा विरोध पंजाब और हरियाणा में हो रहा है, वैसा अन्य राज्यों में नजर नहीं आया। कल आयोजित बंद में भी प. उत्तरप्रदेश के किसानों ने आम तौर पर शान्ति बनाये रखी। जबकि इस क्षेत्र को किसान आन्दोलन की जमीन माना जाता है। लेकिन जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार गैर भाजपा शासित राज्यों की सरकारें नए कानून को लागू नहीं करने के संकेत दे रही हैं। पंजाब सरकार तो पूरे प्रदेश को एक मंडी बनाने जैसे कानून पर विचार कर रही है जिससे उसे मिलने वाला टैक्स यथावत रहे। छतीसगढ़ में भी ऐसी ही चर्चाएँ सुनने में आ रही हैं। हालाँकि किसान को यदि अखिल भारतीय स्तर पर अपना उत्पादन बेचकर ज्यादा दाम मिलने की सम्भावना होगी तब वह राज्य स्तर पर लगाई जाने वाली बंदिशों को शायद ही स्वीकार करेगा। लेकिन भाजपा, कांग्रेस अथवा अन्य पार्टियां किसानों से सीधा संवाद करने की क्षमता खो चुकी हैं। देश में कहने को तो किसानों के स्वयंभू नेता अनगिनत हैं लेकिन सही मायनों में वे नेतृत्वविहीन हैं। पंजाब में अनेक स्थानों पर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को आन्दोलनकारी किसानों ने खदेड़ दिया। एक जमाना था जब महेंद्र सिंह टिकैत ने प. उत्तरप्रदेश में बड़े किसान आन्दोलन की नींव रखी थी। लेकिन कालान्तर में वह प्रयोग अपनी मौत मरता गया। प्रधानमंत्री की कुर्सी तक जा पहुंचे स्व. चौधरी चरण सिंह और एचडी देवगौड़ा खुद को किसान कहते रहे लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत किसी किसान की बजाय उनके बेटे और पोतों के हाथ में आई जिनका दूरदराज तक गाँव, खेत और किसान से कोई सम्बन्ध नहीं रहा। और यही किसानों के साथ हुआ सबसे बड़ा मजाक है। पंजाब और हरियाणा के किसान जिस बैनर के तले आन्दोलनरत हैं वह राष्ट्रीय स्तर पर कितना प्रभावशाली है ये कल के आन्दोलन से सामने आ गया। कांग्रेस के साथ अन्य विपक्षी पार्टियाँ यदि पीछे से साथ न दें तो किसानों के अपने संगठन उतने दमदार नहीं रहे जो सरकार तक अपनी बात पहुंचा सकें। सही बात तो ये है कि राजनीतिक दलों ने बड़ी ही कुटिलता से किसानों के बीच गैर राजनीतिक नेतृत्व पनपने ही नहीं दिया। एक जमाने में वामपंथी पार्टियां मजदूरों और किसानों की हितचिन्तक होने का दावा किया करती थीं । लेकिन उदारीकरण के बाद अव्वल तो श्रमिक संगठन अप्रासंगिक होते जा रहे हैं वहीं किसानों के बीच वामपंथी प्रभाव बहुत ज्यादा कभी नहीं रहा। सही बात तो ये है कि जिस दिन सीपीएम के तत्कालीन महासचिव स्व. हरिकिशन सिंह सुरजीत ने साम्प्रदायिकता के विरोध का बहाना लेते हुए डा. मनमोहन सिंह की सरकार को टेका लगाया उसी दिन से वामपंथी अपनी सैद्धांतिक पहिचान खो बैठे जिसका प्रमाण बंगाल में उनका मजबूत किला धराशायी होने के रूप में सामने आया। आज के माहौल में किसानों के दम (वोट) पर बने नेता तो ढेर सारे हैं लेकिन फिर भी किसानों का कोई नेता नहीं है। ऐसे में मौजूदा आन्दोलन भी या तो हिंसक होने के बाद अपराधबोध का शिकार होकर हाँफने लगेगा या दिशाहीन होने से भटकाव का शिकार बनकर रह जाएगा। देश की दोनों प्रमुख पार्टियों के दो बड़े नेताओं ने गत दिवस जो आह्वान किये उनके सन्दर्भ में ये कहना गलत न होगा कि न तो भाजपा में अब ऐसे कार्यकर्ता हैं जो प्रधानमन्त्री के आह्वान पर गाँव-गाँव घूमकर किसानों को नए कानूनों के फायदे समझाएं और न ही राहुल में गांधी जी जैसी क्षमता है जो स्वाधीनता संग्राम जैसा आन्दोलन खड़ा कर सकें। वास्तविकता तो ये है कि राजनीतिक दलों में जब मिशनरी भाव से काम करने वाले नेता ही नहीं रहे तब कार्यकर्ताओं से अपेक्षा करना बेमानी ही है। हालांकि भाजपा और काँग्रेस दोनों ने किसानों के बीच काम करने हेतु अपने-अपने प्रकोष्ठ बना रखे हैं। लेकिन वे सब नेतागिरी चमकाने के मंच बनकर रह गए। ऐसी स्थिति में किसानों को नए कानूनों के फायदे और नुकसान बताने वाला तंत्र राजनीतिक दलों में लगभग समाप्त हो चुका है। ऐसे में प्रधानमन्त्री को चाहिए वे इन कानूनों पर सीधे किसानों से टीवी के माध्यम से मुखातिब होकर अपनी बात रखें। केंद्र सरकार के छह मंत्री पत्रकार वार्ता के जरिये किसानों के मन में व्याप्त आशंकाओं को दूर करने आगे आये। बाद में कृषि मंत्री ने भी मोर्चा संभाला लेकिन पंजाब और हरियाणा के किसानों ने उनके आश्वासनों को तवज्जो नहीं दी। पंजाब में भाजपा का जनाधार उतना अच्छा नहीं है लेकिन हरियाणा में तो उसकी अपनी सरकार है। फिर भी यदि वहां के किसान सड़कों पर हैं तब ये कहना गलत नहीं होगा कि अधिकतर राजनीतिक नेता जनसंवाद की कला भूल चुके हैं। सोशल मीडिया के जरिये सियासत करने वाले नेताओं से पसीना बहाने की उम्मीद करना वैसे भी व्यर्थ है।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 25 September 2020

नशे का कारोबार : मुम्बई पुलिस की भी सीबीआई जाँच हो




मुम्बई फिल्म उद्योग में कोरोना के कारण काम पूरी तरह ठप्प हो गया था। इसी दौरान सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने उसके लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी। उससे उबरने के पूर्व ही प्रतिबंधित नशीली चीजों के उपयोग की सुगबुगाहट ने उसकी छवि को तार-तार कर दिया। सुशांत की महिला मित्र रिया चक्रवर्ती से हुई पूछताछ के बाद ये पता चला कि वह सुशांत के लिए गांजा और उस जैसी अन्य अवैध चीजों की खरीदी करती थी। फिर क्या था, जाँच का दायरा बढ़ा और नशीली चीजें फिल्मी हस्तियों तक पहुँचाने वालों से मिली जानकारी के आधार पर नारकोटिक्स नियन्त्रण ब्यूरो ने अनेक अभिनेत्रियों तथा अन्य लोगों को पूछताछ हेतु बुलावा भेज दिया। जाँच का परिणाम क्या होगा ये तो कोई नहीं जानता लेकिन जिस तरह से फिल्म जगत से जुड़े लोग ही सार्वजानिक रूप से ये कह रहे हैं कि ग्लैमर की दुनिया में नशीली चीजों का इस्तेमाल बेहद सामान्य बात है, उससे तो लगता है कि ये डोर लम्बी है। हालाँकि ऐसा कहने वालों से भी ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि उन्हें इस अवैध कारोबार के बारे में जानकारी थी तब वे इतने दिनों शांत क्यों रहे? जैसी चर्चा है प्रतिबंधित नशीली चीजों का चलन फिल्मी दुनिया में इतना आम हो चला कि पुरुष वर्ग तो दूर नामी-गिरामी अभिनेत्रियाँ तक इसकी लत का शिकार हैं। ये दावा भी किया जा रहा है कि जाँच सही तरीके से की गई तो न जाने कितने इज्जतदार बेपर्दा नजर आयेंगे। चूँकि जाँच का जिम्मा नारकोटिक्स नियन्त्रण ब्यूरो के पास है और सीबीआई भी सुशांत कांड की जांच से जुड़ी हुई है इसलिए ये माना जा सकता है कि अब तक छिपे तमाम ऐसे रहस्य खुलेंगे जो पैसे और ग्लैमर के आवरण से ढंके हुए थे। लेकिन फिल्मी दुनिया के सितारों के साथ ही ये मामला मुम्बई की उस पुलिस पर भी उँगलियाँ उठाने के कारण उत्पन्न कर रहा है जिसे विश्व का सबसे पेशेवर पुलिस बल प्रचारित किया जाता रहा है। सुशांत की मौत की जांच जब सीबीआई से करवाने का अनुरोध उसके परिवार द्वारा किया गया तब महाराष्ट्र सरकार विशेष रूप से शिवसेना ने उसका जबरदस्त विरोध करते हुए मुम्बई पुलिस को पूर्णरूपेण पेशेवर और सक्षम बताया। बिहार पुलिस के जांच दल को उस मामले से जुड़े दस्तावेजों की प्रतिलिपि देने तक से इंकार कर दिया तथा अनेक महत्वपूर्ण दस्तावेज कम्प्यूटर से उड़ा देने जैसी शरारत भी हुई। उस सबसे लगा था कि शायद सुशांत की मौत और उससे पूर्व बनी परिस्थितियों में कोई ऐसा शख्स परिदृश्य में था जिसका नाम उजागर होने से उद्धव ठाकरे का परिवार और सरकार दोनों मुसीबत में फंस सकते थे। लेकिन धीरे-धीरे जांच जब सुशांत की मौत से आगे निकलकर नशे के अवैध धंधे तक जा पहुंची तब ये जिज्ञासा और मजबूती से उभरी कि मुम्बई में जब राह चलते नशीली चीजों की खरीद-फरोख्त आसानी से सम्भव है तब वहां की पेशेवर पुलिस क्या आँखों में पट्टी बांधकर बैठी रहती है ? सवालों का शिकंजा केवल मौजूदा राज्य सरकार के इर्दगिर्द ही नहीं वरन पिछली सरकार पर भी कसा जायेगा जिसमें भाजपा और शिवसेना दोनों की भागीदारी थी। जिन वहाट्स एप बातचीतों के आधार पर नशीली चीजों की आपूर्ति का आरोप फि़ल्मी सितारों पर लगाया जा रहा है उनमें अनेक पिछली सरकार के समय की भी हैं। इसलिए जाँच केवल नशीली चीजें बेचने और उनका उपयोग करने वालों की ही नहीं बल्कि मुम्बई पुलिस की भी होनी चाहिए जो खुद को जेम्स बांड का भारतीय संस्करण बताते नहीं थकती किन्तु मुम्बई में नशीली दवाओं की सुलभ उपलब्धता की भनक तक उसे नहीं लगी। यहाँ ये उल्लेखनीय है कि मुम्बई पुलिस प्रतिवर्ष एक बड़ा सांस्कृतिक आयोजन करती है जिसमें फिल्मी सितारे मुफ्त में अपनी कला का प्रदर्शन करने के साथ ही मोटी रकम भी पुलिस सहायता कोष में मंच से ही घोषित करते हैं। उनका ये उपकार मुम्बई पुलिस पर एक बोझ जैसा होता है जिसका बदला वह जिस रूप में चुकाती है उसकी कुछ-कुछ बानगी फिल्मी दुनिया में प्रतिबंधित नशीली चीजों की मुक्त खरीदी से मिलती है। नारकोटिक्स नियन्त्रण ब्यूरो की जांच से क्या-क्या सामने आता है ये तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा। लेकिन जिस तरह से परतें खुल रही हैं उससे ये लगने लगा है कि मुम्बई फिल्म उद्योग का जो चेहरा सामने आने वाला होगा वह पूरी तरह बदरंग हो सकता है। इसलिए सीबीआई को मुम्बई पुलिस की भूमिका की भी जांच बारीकी से करनी चाहिए जिसकी नाक के नीचे जहर का कारोबार चलता रहा। बड़ी बात नहीं इसमें अनेक दिग्गज राजनेताओं की भी भूमिका हो। अतीत में भी कुख्यात तस्करों को राजनेताओं के संरक्षण की बात सामने आ चुकी है। संजय दत्त जैसे नामी कलाकार अवैध रूप से हथियार रखने के आरोप में सजा तक काट आये हैं। उसके बाद भी उन्हें फिल्मी दुनिया जिस तरह से सिर पर उठाये फिरती है उससे ये बात साबित हो चुकी है कि उसमें पैसे के लिए पागलपन इस हद तक है कि अच्छे और बुरे का भेद ही नहीं रहा। अत: संदर्भित मामले में सच्चाई का सामने आना निहायत जरूरी है। इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि जिन नेताओं और अभिनेताओं में समाज अपना रोल मॉडल देखता है उनमें से अधिकतर अंतत: निराश करते हैं। इसीलिये भारतीय फिल्मों में नेता, अपराधी और पुलिस का गठजोड़ खुलकर दिखाये जाने के बाद भी कोई उसका खंडन या विरोध नहीं करता।

रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 24 September 2020

नीतीश : परिवार से परहेज पर जातिवाद नहीं मिटा पाए

भारतीय राजनीति में बिहार वह राज्य है जहाँ विषमताओं और समस्याओं का भंडार होने के बाद भी राजनीतिक चेतना अपने चरम पर देखी जा सकती है। समाजवादी आन्दोलन के बीज यहाँ की धरती में आजादी के पहले से जमे हुए थे। इस राज्य से शुरू जनांदोलन देश भर में बड़े राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन का आधार बने। 1974 का छात्र आन्दोलन बाद में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रांति के आह्वान में बदल गया जिसकी परिणिति 1977 में हुए सत्ता परिवर्तन के रूप में हुई तथा पहली बार कांग्रेस केंद्र की सत्ता गंवा बैठी। 1989 में केंद्र में दोबारा हुए सत्ता परिवर्तन के बाद बिहार से निकली मंडल आयोग की सिफारिश को विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने लागू किया जो देश में बहुत बड़े सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का सूत्रधार तो बनी किन्तु  इसी की वजह से जातिवादी दबाव समूह और लालू यादव ब्रांड राजनीति की शुरुवात भी हुई। जो पहले तो पुराने समाजवादियों द्वारा बनाई गई पारिवारिक पार्टियों की पहिचान बनी किन्तु धीरे-धीरे सभी दलों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) पर ध्यान देना पड़ा। आज के माहौल में बिहार की राजनीति में विचारधारा पूरी तरह तिरोहित हो चुकी है और केवल जाति ही वहां की मानसिकता पर हावी है। अक्टूबर - नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजते ही जिस तरह की खबरें सामने आ रही हैं उनसे लगता है कि भले ही नीतीश कुमार खुद को लालू की तरह पिछड़े वर्ग के नेता के रूप में प्रस्तुत न करते हों लेकिन वे भी राजनीति को जातिगत समीकरणों से बाहर नहीं निकाल सके। बीते कुछ समय से चुनावी बिसात बिछते ही जिस तरह की उछलकूद वहां दिखाई दे रही है उसके पीछे केवल और केवल जातिवादी सोच है। लालू यादव के पुत्रों की वजह से राजद के नेतृत्व में बना महागठबंधन लगातार बिखराव का शिकार हो रहा है। जीतनराम मांझी ने पहले ही किनारा कर लिया और मृत्यु के कुछ दिन पहले रघुवंश प्रसाद सिंह ने भी लालू को पत्र लिखकर अलग होने का ऐलान कर दिया था। ताजा खबर के अनुसार अब उपेन्द्र कुशवाहा अपनी आरएलएसपी को महागठबंधन से बाहर निकालने की राह पर बढ़ रहे हैं। उनका कहना है कि वरिष्ठता के कारण उन्हें बतौर मुख्यमंत्री प्रत्याशी पेश किया जावे जिसके लिए लालू के बेटे तैयार नहीं हैं। जब रघुवंश बाबू ने राजद के उपाध्यक्ष पद से स्तीफा दिया था तब कचरा साफ होने जैसी टिप्पणी करते हुए उनका मजाक उड़ाया गया था। इसी तरह उपेन्द्र कुशवाहा को लेकर तेजस्वी ने कह दिया कि जिसे जाना हो जाए। दूसरी तरफ  जदयू और भाजपा के सत्तारूढ़ गठबंधन में रामविलास पासवान की लोजपा अनुसूचित जातियों की ठेकेदार बनकर दबाव बनाने में जुटी है। पासवान जी खुद तो अस्वस्थ होकर अस्पताल में हैं और पार्टी की कमान बेटे चिराग के हाथ दे दी हैं जिनकी महत्वाकांक्षा भी परवान चढ़ रही है। लेकिन उनकी काट के तौर पर नीतीश ने जीतनराम मांझी के रूप में महादलित चेहरा अपने साथ जोड़कर दबाव को बेअसर करने की चाल चल दी है। भाजपा भले ही जातिवादी राजनीति से दूर रहने का दावा करती हो लेकिन उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी भी पिछड़ी जाति से ही हैं। यद्यपि कायस्थ, ब्राह्मण, क्षत्रिय और भूमिहारों में भाजपा की अच्छी पकड़ है लेकिन वह भी पिछड़े और दलित समीकरण से टकराने का साहस नहीं कर सकती। 2015 में रास्वसंघ प्रमुख डा. मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा सम्बन्धी जो सुझाव दिया था उसे लालू यादव ने जमकर उछाला जिसके कारण भाजपा को बहुत नुकसान हुआ। इसीलिये इस बार वह नीतीश कुमार को ही आगे रखकर चुनावी समर जीतना चाह रही है। बिहार में कहने को बाढ़ और कोरोना से लड़ने में नीतीश सरकार की विफलताओं के अलावा भ्रष्टाचार और पिछड़ापन बड़े मुद्दे हैं लेकिन चुनाव लड़ने जा रहे महारथी जानते हैं कि अंतत: जातिगत जोड़तोड़ ही काम आयेगा। वैसे तो प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की छवि आम तौर पर विकास पुरुष और दमदार नेता की है लेकिन वे भी चुनाव के मौके पर किसी न किसी तरह से अपनी पिछड़ी जाति का ढोल पीटने का अवसर तलाश लेते हैं। हालाँकि बीते कुछ दिनों से वे बिहार में विकास कार्यों के लिए धन वर्षा कर रहे हैं लेकिन उन्हें याद होगा कि बीते चुनाव में उन्होंने बिहार के लिये खजाना खोल देने की जो घोषणाएं कीं वे बेकार साबित हुईं। नीतीश अनुभवी राजनेता हैं। 2015 का चुनाव लालू के साथ मिलकर जीतने के बाद उन्होंने जल्द ही उनसे पिंड छुड़ाकर भाजपा से दोबारा याराना कायम कर लिया। इसका लाभ उन्हें लोकसभा चुनाव में भी मिला। केंन्द्र सरकार में उनकी पार्टी का कोई प्रतिनिधि नहीं है लेकिन राज्यसभा के उपाध्यक्ष पद हेतु नीतीश ने मना नहीं किया। कुल मिलाकर जो बिहार कभी देश को राजनीतिक और सामाजिक बदलाव की प्रेरणा देता था वह आज स्वयं यथास्थितिवाद में उलझकर रह गया है। पिछले चुनाव में प्रशांत किशोर नामक चुनाव विशेषज्ञ ने बिहार में बहार है, नीतिशै कुमार है का नारा देकर भाजपा को नि:शस्त्र कर दिया था। लेकिन इस बार भाजपा ने बिना शर्त नीतीश को नेता मान लिया। रही कांग्रेस तो वह अपने संगठन में शीर्ष स्तर पर मची उठापटक के कारण लड़ाई में कहीं नजर नहीं आ रही। नीतीश कुमार को सुशासन बाबू और विकास पुरुष के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन बिहार का आगामी चुनाव भी अंतत: जातीय समीकरणों के आधार पर ही लड़ा जाएगा। हालांकि एक बात का श्रेय उनको देना पड़ेगा कि उन्होंने लालू और शरद यादव के अलावा रामविलास पासवान आदि को हाशिये पर ला खड़ा किया। परिवारवाद से परहेज भी उनकी बड़ी उपलब्धि है। जैसी कि संभावना है यदि फिर सरकार बना ले गये तो  बिहार में वे चुनौतीविहीन हो जायेंगे। लालू के दोनों बेटे बाप कमाई के घमंड में चूर हैं वहीं चिराग पासवान और उपेंन्द्र कुशवाहा का जनाधार सीमित है। जहाँ तक भाजपा का सवाल है तो वह अभी देखो और इन्तजार करो की नीति पर चल रही है।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 23 September 2020

सुरक्षा परिषद : भारत की स्थायी सदस्यता के बिना चीन पर नियन्त्रण असंभव




संरासंघ महासभा का वार्षिक अधिवेशन प्रतिवर्ष सितम्बर में होता है। वैसे तो यह एक औपचारिकता है जिसका उद्देश्य सदस्य देशों को ये एहसास कराना है कि इस विश्व संस्था का मंच उन सभी को अपनी बात कहने का अवसर प्रदान करता है। लेकिन कोरोना नामक महामारी ने इस वर्ष महासभा के अधिवेशन की चमक फीकी कर दी। संरासंघ की 75 वीं सालगिरह पर इस साल दुनिया भर से राष्ट्राध्यक्ष अपने सन्देश वीडियो के माध्यम से भेज रहे हैं। गत दिवस भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दोनों के वीडियो भाषण महासभा में प्रसारित किये गये। चीनी राष्ट्रपति ने कोरोना वायरस फैलाने संबंधी आरोप का खंडन करते हुए ये भी कहा कि चीन किसी से न शीतयुद्ध चाहता है और न ही गर्म युद्ध। उन्होंने भारत के साथ चल रहे सीमा विवाद को स्वाभाविक बताते हुए बातचीत से हल निकालने की बात भी कही। दूसरी तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन को कोरोना फैलाने के लिए कठघरे में खड़ा करते हुए मांग की कि उसे इसके लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। ट्रंप ने कोरोना को एक बार फिर चीनी वायरस कहकर उस पर सीधा हमला किया। लेकिन श्री मोदी ने संरासंघ पर मंडरा रहे विश्वास के संकट का जो जिक्र किया वह बेहद प्रासंगिक है। उन्होंने खुले शब्दों में पूरी दुनिया को ये बता दिया कि इस विश्व संगठन के मौजूदा ढांचे में आमूल परिवर्तन की जरूरत है जिसके बिना दुनिया के सामने विद्यमान चुनौतियों का सामना करने में वह असमर्थ है। हालाँकि उन्होंने इसे स्पष्ट नहीं किया किन्तु कूटनीतिक वक्तव्यों में संकेतों का बड़ा महत्व होता है। उस दृष्टि से प्रधानमंत्री ने सुरक्षा परिषद के पुनर्गठन का सवाल उठाते हुए स्थायी सदस्य के तौर पर भारत की दावेदारी एक बार फिर पेश कर दी। उल्लेखनीय है दूसरे विश्व युद्ध के उपरान्त लीग ऑफ  नेशन्स के स्थान पर संरासंघ की स्थापना की गयी जिसका मुख्यालय जिनेवा से हटाकर अमेरिका की आर्थिक राजधानी न्यूयॉर्क ले जाया गया। दो महायुद्धों की विभीषिका से त्रस्त अधिकतर देश इस संस्था से जुड़ते चले गये। लेकिन विश्वयुद्ध विजेता के तौर पर उभरे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और ताईवान को विशेष अधिकार संपन्न बनाते हुए सुरक्षा परिषद नामक एक संस्था संरसंघ के भीतर ही बनाई गई। उसमें उक्त देश स्थायी सदस्य बन बैठे जिन्होंने वीटो नामक ब्रह्मास्त्र अपने पास रखा। हालाँकि परिषद में अनेक अस्थायी सदस्य भी होते हैं जो एक निश्चित समयावधि के लिए चुने जाते हैं । लेकिन वीटो से वंचित रहने के कारण अपनी बात को लागू करवाने के लिए उनको स्थायी सदस्यों के रहमो - करम पर निर्भर रहना होता है। अस्सी के दशक में जब चीन को संरासंघ की सदस्यता दी गयी तब ताईवान की जगह उसे सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाकर वीटो से सुसज्जित कर दिया गया। कूटनीतिक जगत में ये बात अक्सर चर्चा में आती रही है कि विश्व की बड़ी ताकतें भारत को परिषद में स्थायी सदस्य के तौर पर स्थापित करना चाहती थीं लेकिन हमारे विदेश नीति निर्धारकों ने चीन के पक्ष में अपना दावा छोड़ दिया। देश आजाद होते ही कश्मीर का मसला उलझ गया जिसे पंडित नेहरू लॉर्ड माउन्टबेटन की सलाह पर संरासंघ ले गए। वहां अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश भारत के विरोध में अपने वीटो का उपयोग करते रहे। जबकि रूस हमारे  समर्थन में खड़ा रहा वरना कश्मीर पर पाकिस्तान का पक्ष मजबूत हो जाता। लेकिन चीन को वीटो मिल जाने के बाद भारत की चिंताएं और बढ़ गईं। बीते कुछ वर्षों में आतंकवाद और कश्मीर जैसे अनेक मसलों पर चीन ने जिस प्रकार भारत के विरोध में वीटो का उपयोग किया उसके कारण उनका औचित्य सामने आ गया। इसी कमी को दूर करने के लिए ही भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन कर स्थायी सदस्यता हासिल करने की मुहिम चला रहा है जिसे विश्व बिरादरी में काफी समर्थन भी मिलने लगा है। बाजारवादी वैश्विक अर्थव्यवस्था के उदय के उपरान्त पश्चिमी देशों को भी भारत की अहमियत महसूस होने लगी है। विशेष रूप से चीन के आर्थिक महाशक्ति बन जाने से एशिया में उसको टक्कर देने में भारत की क्षमता को अमेरिका और उसके समर्थक देश समझने लगे हैं। श्री मोदी ने गत दिवस संरासंघ  के विश्वास के संकट से गुजरने की चर्चा के साथ मौजूदा ढांचे में सुधार के बिना वर्तमान वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में असमर्थता का जो जिक्र किया वह सुरक्षा परिषद की  स्थायी सदस्यता के दावे को दोहराने का प्रयास ही है। कोरोना के बाद वैश्विक शक्ति संतुलन नये सिरे से होने की संभावनाएं है क्योंकि विश्व व्यापार संगठन बना तो अमेरिका और उसके समर्थक देशों के लाभ के लिये था किन्तु उसका सर्वाधिक लाभ चीन ने उठाया। लेकिन कोरोना ने पूरी दुनिया को ये अवसर दे दिया कि चीन की ताकत के असीमित विस्तार पर रोक लगाई जाए। 2020 की शुरुवात में ये बात असंभव दिखती थी लेकिन बीते आठ - नौ महीने के भीतर अब चीन को घेरने की नीति वैश्विक स्तर पर विचाराधीन है और इसके लिए संरासंघ और उसके ढांचे में बदलाव या सुधार भी निकट भविष्य में किए जा सकते हैं। मौजूदा स्थिति में भारत के महत्व को दुनिया ने बिना लागलपेट के स्वीकार किया है। शायद इसीलिये प्रधानमंत्री ने संरासंघ महासभा को प्रेषित संबोधन मे सीधे-सपाट शब्दों में उसके मौजूदा ढांचे को कालातीत बताते हुए पुनर्गठन पर बल दिया। कोरोना काल के बाद की दुनिया में भारत की भूमिका के मद्देनजर श्री मोदी ने जो कूटनीतिक दांव चला वह हमारे बढ़ते हुए आत्मविश्वास का परिचायक है। सौभाग्यवश इस मुद्दे पर देश में किसी भी प्रकार का राजनीतिक मतभेद नहीं है। पिछली सरकार भी ऐसा ही करती रही हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी