Saturday, 27 February 2021

कृषि प्रधान की बजाय चुनाव प्रधान देश बनकर रह गया भारत



भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता रहा है। यहाँ की अर्थव्यवस्था के साथ ही  लोक संस्कृति और जीवन शैली पर भी ग्रामीण प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। आधुनिकता के रंग में ढले लोग भी ग्रामीण परिवेश को जीने के लिए पांच सितारा होटलों के साथ ही रिसार्ट जाते हैं। भारत की राजनीति भी ग्रामीण इलाकों से प्रभावित होती है जिसके कारण हर राजनीतिक दल खेती और किसानी के हित की बात किया करता है। देश के किसान नए कृषि संशोधन कानूनों को लेकर जो आन्दोलन कर रहे हैं उसने पूरे देश ही नहीं अपितु दुनिया का भी ध्यान खींचा है। लेकिन इस सबसे अलग हटकर देखें तो भारत को कृषि  प्रधान देश कहना अब सही नहीं रहा। इसका कारण राजनीति का अतिरेक है जिसने पूरे राष्ट्रीय परिदृश्य को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। गत दिवस ही चुनाव आयोग ने बंगाल, असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी और केरल की विधानसभा का चुनाव कार्यक्रम घोषित किया। मार्च के अंतिम सप्ताह से ये सिलसिला शुरू होकर मई महीने के प्रथम सप्ताह में पूरा हो सकेगा। हालांकि इसकी तैयारी महीनों पहले से चल रही थीं। खासकर बंगाल में भाजपा और तृणमूल के बीच चल रहा मुकाबला साधारण राजनीतिक विरोध तक सीमित न रहकर हिंसात्मक घटनाओं तक जा पहुंचा जिसके कारण राजनीतिक सहिष्णुता बंगाल की  खाड़ी में गहराई तक डूब चुकी है। असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी और  केरल में भी राजनीतिक खींचातानी चरम पर है। पिछली सर्दियों में बिहार के चुनाव होते ही इन राज्यों में मोर्चेबंदी शुरू हो गई थी। भारत की जनता के लिए ये सब रोजमर्रे की बातें हो चली  हैं क्योंकि देश के किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहने से समाचार माध्यमों के जरिये वहां के समाचार छाये रहते हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि राज्यों के चुनाव अब केवल राज्यों तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय परिदृश्य को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए बंगाल के चुनाव में भाजपा का पूरा केन्द्रीय नेतृत्व कमर कसकर डटा हुआ है। वहीं कांग्रेस के वरिष्ट नेता राहुल गांधी ने केरल में खूंटा ठोंक  रखा है। रोचक बात ये भी है कि कांग्रेस जिस वाम मोर्चे के विरुद्ध केरल के मैदान में है उसी के साथ बंगाल में उसका चुनावी गठबंधन है। तमिलनाडु में लगभग चार दशकों के बाद करुणानिधि और जयललिता के बिना चुनावी जंग लड़ी जा रही है जिसका असर पुडुचेरी पर भी पड़ता है। असम में नागरिकता कानून को लकर विवाद अपने चरम पर हैं। राजनीतिक मुकबले का ये दौर खत्म होते ही उप्र, उत्तराखंड, मणिपुर, पंजाब और गोवा के चुनाव की हलचल शुरू हो जायेगी जहां 2022 में विधानसभा चुनाव होंगे। उसके बाद बारी आयेगी कर्नाटक और गुजरात की और फिर मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनावी बिगुल बज उठेगा जिसके बाद आ जायेंगे 2024 के लोकसभा चुनाव। ये देखते हुए कहा जा सकता है कि चुनाव भारत का राष्ट्रीय उद्योग बन गया  है। लोकतंत्र और चुनाव में चोली दामन का रिश्ता है लेकिन हमारे देश में चुनावी कार्यक्रम इस तरह गड़बड़ा गया है कि राष्ट्रीय महत्व के तमाम मुद्दे गौण हो जाते हैं तथा समूची निर्णय प्रक्रिया चुनावी लाभ - हानि की दृष्टि से लिये गये तात्कालिक निर्णयों पर आकर टिक जाती है। गत दिवस चुनाव आयोग द्वारा चुनाव कार्यक्रम घोषित किये जाने के कुछ देर पहले तक विभिन्न राज्यों ने अनेक फैसले करते हुए मतदाताओं के समक्ष दाना डालने का प्रयास किया। हालाँकि बीते कुछ समय से भी ये सिलसिला चला आ रहा है। अब घोषणापत्रों में मुफ्त उपहारों की झड़ी लगेगी। ममता ने सस्ते भोजन में अंडा देने की पेशकश की तो भाजपा ने  मछली देने का लालच दे डाला। कोई मजदूरी बढ़ा रहा है तो कोई नई नौकरियां देने के वायदे के साथ मैदान में है। भाजपा की केंद्र सरकार चुनावी राज्यों को नयी-नयी सौगातें  बांटने में आगे-आगे है। प्रधानमन्त्री खुद प्रधान सेनापति की भूमिका में हैं। इस सबके कारण देश की विकास प्रक्रिया पर विपरीत असर होता है। सबसे बड़ी बात चुनावी खर्च में हो रही  बेतहाशा वृद्धि है जिससे चन्दा उद्योग जोर पकड़ता है जिसका अंतिम परिणाम भ्रष्टाचार के रूप में सामने आता है। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने एक देश एक चुनाव का जो मुद्दा उछाला उसे बौद्धिक स्तर पर तो अच्छा समर्थन मिला लेकिन राजनीतिक दल उसे लेकर पूरी तरह उदासीन हैं। स्मरणीय है 1967 तक देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते रहे। लेकिन 1971 में  लोकसभा के मध्यावधि चुनाव के साथ ही चुनावी  कार्यक्रम अस्त-व्यस्त होकर रह गया। इस स्थिति को कैसे सुधारा जा सकता है ये बड़ा सवाल है क्योंकि इसके लिए राष्ट्रीय पार्टियों को तो कम से कम एकमत होना पड़ेगा। चुनावी राजनीति पर क्षेत्रवाद और जातिगत समीकरणों के प्रभाव का कारण भी अलग-अलग चुनाव ही हैं । समय आ गया है जब इस बारे में गम्भीरता और जिम्मेदारी के साथ विमर्श हो। वरना अर्थव्यवस्था पर चुनावी खर्च का दुष्प्रभाव पड़ता रहेगा। ये कहना गलत न होगा कि एक देश एक चुनाव की व्यवस्था विकास दर में कम से कम दो से तीन फीसदी की बढ़ोतरी करने में सहायक होगी। उससे भी बड़ी बात है कि इससे राजनीतिक कटुता भी घटेगी और जनता को राजनीति से हटकर राष्ट्रीय महत्व के अन्य विषयों पर सोचने का अवसर मिलेगा। 2004 से केन्द्र की सरकार को लेकर तो स्थायित्व बना हुआ है लेकिन प्रदेश के फुटकर चुनाव समूचे वातावारण में  अस्थिरता बनाये रखते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि केंद्र सरकार  नीतियों का सही तरीके से क्रियान्वयन नहीं कर पाती क्योंकि प्रधानमन्त्री पर हर समय चुनाव जिताने का दबाव जो बना रहता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 26 February 2021

गोडसे पूजक को शामिल कर खुद को कठघरे में खड़ा कर लिया कमलनाथ ने



मप्र में हिन्दू महासभा के एक नेता द्वारा गत दिवस कांग्रेस की सदस्यता लिए जाने पर राजनीतिक बवाल मचा है। उक्त नेता द्वारा कुछ साल पहले महात्मा गांधी के हत्यारे नथूराम गोडसे की मूर्ति की पूजा किये जाने के चित्र सोशल मीडिया के जरिये प्रसारित होते ही टिप्पणियों की बाढ़ आ गई। कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से ये बहुत बड़े असमंजस की घड़ी है। अतीत में भाजपा के अनेक नेता भी उसका दामन थाम चुके हैं लेकिन गोडसे की पूजा करने वाले व्यक्ति को पार्टी में शामिल किये जाने का फैसला मप्र के पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव को ही रास नहीं आया जिसका प्रमाण उनका वह ट्वीट  है जिसमें उन्होंने तंज  कसा कि गांधी हम शर्मिन्दा हैं ...। चूंकि उक्त कृत्य  प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की मौजूदगी में हुआ इसलिए पार्टी के बाकी नेता न थूक पा रहे हैं और न ही निगलने की स्थिति में हैं। वहीं  भाजपा को बैठे-बिठाये एक मुद्दा मिल गया कांग्रेस पर हमलावर होने का। एक तरह से ये भी कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने अपने इस  निर्णय से भाजपा को क्लीन चिट दे दी। वैसे बाबूलाल चौरसिया नामक उक्त नेता का दावा है कि वे जन्मजात कांग्रेसी हैं और पिछले नगर निगम चुनाव में कांग्रेस द्वारा टिकिट काट दिए जाने से हिन्दू महासभा में चले गये थे। हालांकि वे गोडसे की मूर्ति की पूजा वाले कार्यक्रम का हिस्सा न बने होते तब शायद इतना हल्ला नहीं मचता। कांग्रेस के अनेक नेताओं ने भी कांग्रेस में इस नए सदस्य के आगमन पर नाक सिकोड़ी है। वह पहले कांग्रेसी था या नहीं ये बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि आजकल कौन कब किस पार्टी से निकलकर दूसरी में चला  जाए और फिर लौटकर घर वापिसी का राग अलापे ये कहना मुश्किल है। नवजोत सिंह सिद्धू ने भाजपा में रहते हुए राहुल गांधी और डा. मनमोहन सिंह पर जितने तीखे कटाक्ष किये उनके मद्देनजर उन्हें कांग्रेस  में बर्दाश्त किया जाना नाकाबिले बर्दाशत था। इसी तरह विगत लोकसभा चुनाव में मायावती ने उन मुलायम सिंह यादव का प्रचार किया जो गेस्ट हाउस  काण्ड के बाद उनके लिए दुशासन से कम न थे। और भी ऐसे अनगिनत वाकये हैं जो सिद्धांतविहीन दलबदल के उदाहरण के तौर पर जाने जाते हैं लेकिन गोडसे पूजक का कांग्रेस प्रवेश निश्चित रूप से चौंकाने वाला है। ऐसा नहीं है कि भाजपा भी इस मामले में दूध की धुली हो। कुछ बरस पहले बाहुबली नेता कहे जाने वाले डीपी यादव को उसने अपना सदस्य बनाया था लेकिन चौतरफा फजीहत के बाद शाम होते-होते उनकी छुट्टी कर दी गयी। अपराधी नेताओं से भी किसी पार्टी को परहेज नहीं रहा। लेकिन आज भी भारतीय राजनीति में गांधी जी के नाम पर थोड़ी बहुत लोकलाज  बची हुई है। उनके वैचारिक विरोधी भी उनका  नाम आदर से लेते हैं।  उस दृष्टि से बाबूलाल चौरासिया को सदस्यता देकर कांग्रेस ने अपने हाथों से अपने चेहरे पर कालिख पोत ली है। इस बारे में  शोचनीय बात ये है कि उक्त नेता का इतना आभामंडल भी  नहीं है जिससे वह कांग्रेस के लिए बड़ा जनसमर्थन जुटा सके। मान लीजिये ऐसा है तब भी जितने वोट वे दिलवाएंगे उससे ज्यादा गोडसे पूजक की उनकी तस्वीर नुकसान करवा देगी। कमलनाथ बहुत ही अनुभवी नेता हैं जिनकी राजनीतिक समझ पर संदेह नहीं किया जाता किन्तु बाबूलाल चौरासिया जैसे  महत्वहीन व्यक्ति को अपनी मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता देकर उन्होंने अपना अवमूल्यन करवा लिया। वैसे भी  वर्तमान में कांग्रेस बिना राजा की फौज जैसी होती जा रही है। बजाय भाजपा से लड़ने के उसके शीर्ष नेता आपस में लड़ने में अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं। राहुल गांधी द्वारा दक्षिण भारत के मतदाताओं को अपेक्षाकृत अधिक परिपक्व बताये जाने पर जिस तरह से उत्तर भारत  के अनेक कांग्रेस नेताओं ने खुलकर नाराजगी जताई उससे ये बात खुलकर सामने आई है कि पार्टी में नीतिगत एकता नहीं रही और सब उसे अपने ढंग से चलाना चाह रहे हैं। मप्र में कमलनाथ की सरकार के गिरने के पीछे भी व्यक्तिगत खींचातानी ही रही। ऐसे समय जब श्री गांधी दक्षिण भारत के दौरे पर हैं तब पुडुचेरी की सरकार गिर गयी लेकिन ऐसा लगा ही नहीं कि कांग्रेस के उच्च नेतृत्व को उससे कोई  फर्क पड़ा हो। इसका एक कारण ये भी है कि कांग्रेस में राज्य और स्थानीय स्तर पर जनाधार वाले नेताओं को किनारे बिठाकर दरबारी  संस्कृति को बढ़ावा दिया गया जिससे वास्तविक स्थिति से शीर्ष नेतृत्व अनभिज्ञ रहता है। फिलहाल पार्टी के पास राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ की सरकार है जबकि  महाराष्ट्र में वह शिवसेना और राकांपा  की जूनियर पार्टनर है। लेकिन उसके कब्जे वाले उक्त तीनों राज्यों में सिर्फ छत्तीसगढ़ में राजनीतिक शांति है लेकिन पंजाब में अमरिंदर और सिद्धू के बीच तलवारें चल रही हैं तो राजस्थान में गहलोत और पायलट में सांप और नेवले जैसा बैर किसी से छिपा नहीं है। मप्र में भी कमलनाथ की उनके करीबी रहे दिग्विजय सिंह के साथ पहले जैसी नहीं पट रही। बाबूलाल चौरसिया सरीखे मामूली व्यक्ति को सदस्य बनाकर कमलनाथ ने कांग्रेस के माथे पर व्यर्थ में बदनामी पोत दी। अब किस मुंह से पार्टी गांधी के हत्यारों को गाली देगी ये बड़ा सवाल है। भाजपा की देखासीखी राम भक्ति का दिखावा करने के बाद श्री नाथ ने गोडसे की पूजा कर चुके व्यक्ति को पार्टी में जगह देकर खुद को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 25 February 2021

खेल के मैदान से भी आती है तरक्की : अहमदाबाद का अनुसरण बाकी राज्य भी करें



अहमदाबाद में विश्व के सबसे बड़े क्रिकेट मैदान का  शुभारम्भ होने के साथ ही विश्वस्तरीय खेल काम्पलेक्स की भी घोषणा  हुई। इसके साथ ही ये संभावना भी व्यक्त्त की जाने लगी कि इसके बन  जाने के बाद  भारत छह महीने के भीतर ओलम्पिक करवा सकेगा। ये दावा भी किया जा रहा है कि  अहमदाबाद भारत की  खेल राजधानी के रूप में जाना जाएगा। स्टेडियम के नामकरण को लेकर राजनीतिक विवाद भी उत्पन्न हो गये हैं जो हमारे देश के लिए नई बात नहीं है। ये बात भी उठेगी कि बड़े प्रकल्प गुजरात ही ले जाए जा रहे हैं। मसलन बुलेट ट्रेन मुम्बई से अहमदाबाद चलेगी। हाल ही में प्रधानमंत्री ने समुद्र जल यातायात की शुरुवात भी सूरत के पास ही की। सरदार सरोवर के पास सरदार पटेल की जो मूर्ति लगवाई गयी वह विश्व में सबसे ऊंची होने से पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। हाल ही में उस स्थान के लिए 9 नई  रेलगाड़ियां भी शुरू की गईं। हालाँकि एक जमाने में पंजाब और हरियाणा में खेलों के विकास के लिए अनेक केंद्र विकसित हुए किन्तु अहमदाबाद के इस प्रस्तावित काम्प्लेक्स के बनने के बाद खिलाड़ी इसकी तरफ आकर्षित होंगे। भारत जैसे देश में जहाँ गरीबी , बेरोजगारी , बेघरबारी और भुखमरी जैसी  समस्याएं हैं वहां खेल सुविधाओं पर मोटी रकम खर्च करने के औचित्य पर सवाल उठ सकते हैं। लेकिन इस बारे में चीन का उदाहरण सबके सामने है जिसने आर्थिक विकास के समानंतर खुद को खेलों के क्षेत्र में भी विकसित देशों के मुकाबले बराबरी से खड़ा कर लिया। ओलम्पिक की पदक तालिका में चीन अग्रणी देशों की  कतार में आ गया है। ओलम्पिक की मेजबानी कर उसने अपनी  प्रबंधन क्षमता से भी विश्व बिरादरी को प्रभावित किया। उस दृष्टि से भारत बहुत पीछे है। क्रिकेट, बैडमिन्टन , कुश्ती और बॉक्सिंग को छोडकर बाकी  खेलों में हमारी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। इसका कारण विश्वस्तरीय सुविधाओं के साथ प्रशिक्षण का अभाव है। वैसे बीते एक-डेढ़ दशक  में  छोटे शहरों से जैसी खेल प्रतिभाएं निकलीं उनसे आशा बंधी है लेकिन अच्छा प्रशिक्षण और सुविधाएँ मिल सकें तो बड़ी बात नहीं  135   करोड़ की आबादी वाले देश में ओलम्पिक पदक जीतने वालों की संख्या में सम्मानजनक वृद्धि हो सके। अहमदाबाद में बनने वाला कामप्लेक्स भारत को खेलों के क्षेत्र में विश्वस्तर पर ला खड़ा करेगा ये उम्मीद पूरी तरह सही है। इस बारे में ध्यान रखने वाली बात ये है कि खेल भी अब उद्योगों की शक्ल  ले चुके हैं। आईपीएल ने इंग्लिश काउंटी के साथ ही ऑस्ट्रेलिया के क्लब क्रिकेट की रंगत फीकी कर दी और वह बहुत बड़ा ब्रांड बन गया जिसके कारण भारतीय क्रिकेट नियन्त्रण मंडल को अकल्पनीय कमाई होने लगी। खेलों से पैसा कमाने की शुरुवात ऑस्ट्रेलिया के कैरी  पैकर नामक टीवी चैनल मालिक ने की थी। उसने दुनिया भर के क्रिकेटरों को मोटी रकम देकर जो विश्व श्रृंखला करवाई उसने एकदिवसीय और बाद में  टी - 20 क्रिकेट की शुरुवात की। उसी के बाद से क्रिकेट  विश्व कप प्रारम्भ हुआ। फुटबाल विश्व कप के अलावा यूरोप के फुटबाल क्लब  अपने आप में एक उद्योग हैं। आजकल खेलों से केवल खिलाड़ी , प्रशिक्षक और प्रायोजक  ही नहीं कमाते अपितु ये बड़ी संख्या में रोजगार प्रदान करने का माध्यम भी हैं। भारत के ऐसे अनेक गुमनाम क्रिकेटर आईपीएल के बाद करोड़पति हो गए जिन्हें भारतीय टीम में खेलने का अवसर शायद कभी नहीं मिलता। अहमदाबाद का खेल काम्प्लेक्स उस लिहाज से पूरे देश के लिए दिशासूचक बन सकता है। वैसे क्रिकेट नियन्त्रण मंडल देश भर में स्टेडियम बनाने हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करता है जिसके अच्छे परिणाम निकले हैं। गुजरात में विश्व के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम के बाद  विशाल खेल प्रशाल बनाने की योजना वाकई उत्साह जगाने वाली है। इस क्षेत्र में निजी निवेश भी मिलने की प्रबल सम्भावना है। बेहतर हो अन्य राज्य सरकारें  भी अहमदाबाद की तर्ज पर खेल काम्पलेक्स बनाने की तरफ ध्यान दें। अच्छे स्टेडियम और खेल प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था भी अर्थव्यस्था को मजबूती प्रदान करने में सहायक होती हैं। भारत एक दिवसीय  और टी-20  क्रिकेट विश्वकप के अलावा राष्ट्रमंडल और एशियाड की मेजबानी सफलतापूर्वक कर चुका है किन्तु विश्व ओलम्पिक के आयोजन के उसके दावे को अब तक स्वीकार नहीं किया जा सका क्योंकि उसके लिए जरूरी खेल संबंधी संरचना का अभी भी अभाव है। जिस तरह राजमार्ग , हवाई अड्डे, बंदरगाह , फ्लाय ओवर, गगनचुम्बी इमारतें , तेज गति की रेलगाड़ियाँ और वायु सेवा विकास के प्रतीक हैं वैसे ही खेल संबंधी सुविधाएँ भी मौजूदा विश्व में विकास का मापदंड मानी जाती हैं। खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। अमेरिका  में कहा जाता है कि विकास अच्छी सड़कों पर चलकर आता है लेकिन 21 वीं सदी में खेल के मैदान भी मुल्क की तरक्की का पैमाना बन गये हैं।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 24 February 2021

मंत्री टूटे-फूटे बंगलों में न रहें लेकिन जनता के धन पर ऐश औचित्यहीन



मप्र की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। राज्य सरकार लगातार कर्ज लेने को मजबूर है। सरकारी भुगतान रुके पड़े हैं। विकास कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। कोरोना काल में सरकारी राजस्व भी घट गया जिसकी भरपाई होना मुश्किल है। ऊपर से लॉक डाउन के दौरान गरीबों को राहत देने पर अतिरिक्त व्यय हुआ।  इस सबके बावजूद शिवराज सिंह चौहान की सरकार के कतिपय मंत्रियों के आवास की साज-सज्जा पर करोड़ों रूपये खर्च किया जाना ये दर्शाता है कि सत्ता में आने के बाद जनता के सेवक बने रहने का ढोंग रचने वाले जनप्रतिनिधि किस तरह से सरकारी  धन की होली खेलते हैं। गत दिवस राज्य विधानसभा में एक प्रश्न के जवाब में  दी गई  जानकारी से जो आंकड़े सामने आये वे ये साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि सत्ता में आते ही चाल, चरित्र और चेहरे की सारी बातें भोपाल के ताल में डूब जाती हैं। मुख्यमंत्री सहित अनेक मंत्रियों के सरकारी आवास की साज-सज्जा पर खर्च हुए करोड़ों रुपयों का क्या औचित्य था ये समझ से परे है। लोक निर्माण मंत्री गोपाल भार्गव ने अकेले ही 56 लाख का काम अपने आवास  पर करवा लिया। वहीं गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने 44 लाख फुंकवा दिए। मुख्यमंत्री के पास शामला हिल के साथ ही एक और बँगला है। दोनों में मिलाकर 32 लाख के करीब का काम हुआ। अन्य मंत्रियों के नाम भी इस सूची में हैं। हमारे देश में इस तरह की शाही फिजूलखर्ची चूँकि सत्ता की पहिचान बन गई हुई इसलिए किसी को न ऐतराज होता है और न ही  आश्चर्य किन्तु जनता के नजरिये से देखें तो इस अय्याशी का बोझ आखिरकार उसी के कन्धों पर पड़ता है। पिछली सरकार के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी मुख्यमंत्री आवास में जाने के पहले बड़े पैमाने पर सुधार और साज-सज्जा करवाई थी। हालांकि ऐसा करने वाला मप्र अकेला राज्य नहीं है। केंद्र सरकार के मंत्री भी इस बारे में पीछे नहीं हैं। मनमोहन सरकार में मंत्री बने शशि शरूर तो कई महीनों पञ्च सितारा होटल में रहे क्योंकि उन्हें आवंटित सरकारी बंगले की  साज-सज्जा उनके मुताबिक बहुत ही निम्न स्तर की थी। सवाल ये है कि सरकार बदलते ही मंत्रियों के बंगलों को नए सिरे से सजाने का औचित्य क्या है ? आखिरकार उनके पूर्ववर्ती मंत्री भी तो सरकारी खर्च  पर ऐशो-आराम से ही रहते होंगे। व्यक्तिगत रूचि अथवा आवश्यकता के अनुसार छोटे-मोटे सुधार करवाना तो लाजमी है लेकिन बेरहमी के साथ लाखों रूपये फूंक देना जनता के धन की लूटपाट नहीं तो और क्या है ? भाजपा खुद को स्व.दीनदयाल उपाध्याय से प्रेरित बताती है, लेकिन सत्ता में आते ही उसके मंत्री गण पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े उस आम नागरिक की परेशानियों  को भूल जाते हैं जिसकी  चिंता करने का उपदेश दीनदयाल जी ने दिया था। मप्र की मौजूदा सरकार के पहले बनी कमलनाथ सरकार 15 महीने में ही गिर गई थी। उसके मंत्रियों ने भी अपने बंगलों पर बेतहाशा खर्च किया था। महज 15 महीनों बाद ही उन्हीं बंगलों पर दोबारा लाखों रूपये लुटा देना जनता के धन की  बर्बादी नहीं तो और क्या है? हालाँकि ऐसी बातें हमारे देश में जल्द ही भुला दी जाती हैं लेकिन अब जबकि सरकारी खर्च चलाने के लिए पेट्रोल-डीजल पर अनाप-शनाप कर थोपा जा रहा है तब इस तरह की फिजूलखर्ची को जनता के  साथ धोखा ही कहा जाना चाहिए। मंत्री गण टूटे-फूटे घरों में रहें ये कोई नहीं चाहेगा। उनके आवास पर सैकड़ों लोग मिलने आते हैं। निर्वाचन क्षेत्र से आने-जाने वालों को ठहराने की व्यवस्था भी उन्हें करनी होती है। बावजूद इसके सत्ता  बदलते ही सरकारी आवास पर किया जाने वाला भारी-भरकम खर्च जन अपेक्षाओं के पूरी तरह विपरीत है। शिवराज सिंह जनता से जुड़े नेता हैं तथा  हमेशा गाँव और गरीब की बात करते हैं। आम लोगों के दु:ख-दर्द में शामिल  होकर अपनी संवेदनशीलता साबित करने  में भी पीछे नहीं रहते, परन्तु  उनकी सरकार उस सादगी को अपनाने के  प्रति पूरी तरह लापरवाह है जिसका उदाहरण मप्र में भाजपा के पितृ पुरूष रहे स्व. कुशाभाऊ ठाकरे और स्व.प्यारेलाल खंडेलवाल जैसे नेताओं ने प्रस्तुत किया था। हालाँकि समय  के साथ बहुत  कुछ बदलता है और उस लिहाज  से  भाजपा भी पार्टी विथ डिफऱेंस का कितना भी दावा करे किन्तु सत्ता में आने के बाद नेताओं के आचरण में बदलाव तो आता ही है। लेकिन रास्वसंघ की पाठशाला से निकले स्वयंसेवक भी जब सत्ता रूपी मेनका के मोहपाश में फंसते हैं तब उनके समर्थक भी ये कहने को बाध्य हो जाते हैं कि हमाम में जाने के बाद सभी एक जैसे हो जाते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 23 February 2021

पुडुचेरी : कांग्रेस के हाथ से एक राज्य और खिसक गया




दक्षिण भारत में कांग्रेस का एकमात्र दुर्ग भी ढह गया। केंद्र शासित  पुडुचेरी की विधानसभा सदस्य संख्या 33 है। उनमें से एक कांग्रेस  विधायक अयोग्य ठहराया जा चुका था। उसके बाद नाटकीय घटनाक्रम में छह कांग्रेस विधायकों ने सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। एक द्रमुक विधायक ने भी वही राह पकड़ ली। इस कारण सरकार अल्पमत में आ गई। बजाय बहुमत साबित करने के मुख्यमंत्री वी. नारायणसामी ने अपना इस्तीफा उपराज्यपाल को सौंप दिया। विपक्ष ने चूँकि सरकार बनाने से इंकार कर दिया है इसलिए राष्ट्रपति शासन ही एकमात्र विकल्प बच रहता है। उल्लेखनीय है आगामी अप्रैल-मई में विधानसभा के चुनाव होना हैं। हाल ही में उपराज्यपाल पद से किरण बेदी को हटाकर तमिलनाडु के राज्यपाल को ही पुडुचेरी का जिम्मा सौंपा गया था। इसके पीछे मुख्यमंत्री के साथ श्रीमती बेदी के तनावपूर्ण रिश्ते बताये जाते थे। श्री सामी ने राष्ट्रपति से मिलकर उनकी शिकायत भी की थी। गत दिवस त्यागपत्र देने के बाद उन्होंने केंद्र सरकार और श्रीमती बेदी पर राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करने का आरोप भी लगाया। वैसे इस राज्य में ये नई बात नहीं है। अब तक यहाँ बनी दस में से केवल चार सरकारें ही अपना कार्यकल पूरा कर सकी हैं। यह राज्य वैसे तो तमिलनाडु की राजनीतिक संस्कृति का पालन करते हुए द्रमुक और अन्नाद्रमुक के कब्जे में ही रहा लेकिन अधिकतर सरकारें गठबंधन की रहने से राजनीतिक अस्थिरता बनी रही। यद्यपि  श्री नारायणसामी ने बीते पांच साल ठीक-ठाक ही  काटे। बावजूद इसके कि श्रीमती बेदी के उपराज्यपाल बनने के बाद से सरकार और राजभवन में टकराव शुरु हो गया। इस बारे में मुख्यमंत्री के आरोपों को पूरी तरह से नकारना गलत  होगा क्योंकि भाजपा का मौजूदा नेतृत्व साम, दाम, दंड, भेद की नीति पर चलने में तनिक भी संकोच नहीं करता जिसकी वजह से गैर भाजपा राज्य सरकारों के साथ राज्यपालों के रिश्ते तल्खी भरे हो  जाते हैं। श्रीमती बेदी ने भी पुडुचेरी में नियुक्त होते ही मुख्यमंत्री के समानांतर अपनी गतिविधियां शुरू कर दी थीं जो उनकी पहिचान रही है। वैसे भी केंद्र शासित राज्य की सरकार उपराज्यपाल के नियन्त्रण में कार्य करने के लिए मजबूर रहती है। लेकिन ताजा मामले में पूरा ठीकरा उपराज्यपाल और केंद्र सरकार पर फोड़ना  भी  उचित नहीं होगा। मुख्यमंत्री अनुभवी राजनेता हैं। ऐसे में उनका दायित्व था कि वे अपने विधायकों के बीच पनप रहे असंतोष को सही समय पर पढ़ते हुए उसे दूर करने का समुचित प्रयास करते। कांग्रेस का आला नेतृत्व भी इस राज्य में हो रही उठापटक से पूरी तरह अनजान बना रहा अथवा उसने जानबूझकर आँख  - कान बंद कर रखे ये तो वही जाने लेकिन दक्षिण की अपनी एकमात्र सरकार को बचा पाने में उसकी विफलता नेतृत्व की कमजोरी ही कही जायेगी। जहां तक भाजपा का सवाल है तो दक्षिण में अभी तक वह कर्नाटक से आगे नहीं बढ़ पाई है और आंध्र और तेलंगाना में भी  सत्ता से वंचित ही है। केरल में अवश्य रास्वसंघ के बलबूते उसने अपनी पहिचान बनाई है लेकिन तमिलनाडु और पुडुचेरी में पैर जमाना उसके लिए टेढ़ी खीर है। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ द्रमुक के साथ उसका गठबंधन तो है लेकिन वहां की राजनीति में उसका आभामंडल प्रभावित नहीं करता। यद्यपि करूणानिधि और जयललिता के न रहने के बाद स्थानीय राजनीति में जो शून्य उत्पन्न हुआ उसमें भाजपा अपने लिए जगह तलाशने में जुटी हुई है । उसे  उम्मीद है कि तमिलनाडु और पुडुचेरी की द्रविड़ आन्दोलन प्रभावित राजनीति में हिन्दू धर्म के प्रति असंदिग्ध आस्था रखने वाला वर्ग अंतत: उसके प्रति आकर्षित होगा। पुडुचेरी के ताजा नाटकीय राजनीतिक घटनाक्रम के पीछे भी भाजपा की वही रणनीति हो सकती है जो उसने जम्मू-कश्मीर में अपनाई थी। हालाँकि अभी तक उसका खुलासा नहीं हुआ लेकिन कांग्रेस के घटते प्रभाव के मद्देनजर भाजपा उसका स्थान लेते हुए खुद को राष्ट्रीय पार्टी के रूप में स्थापित करती जा रही है जो उसकी दूरगामी रणनीति का हिस्सा है जिसकी सफलता पूर्वोत्तर राज्यों में देखी जा चुकी है। उस आधार पर पुडुचेरी का ताजा राजनीतिक घटनाक्रम जऱा भी आश्चर्यचकित नहीं करता। मुख्यमंत्री श्री सामी द्वारा केंद्र सरकार और उपराज्यपाल पर लगाये गए आरोपों के बावजूद कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व के साथ आलाकमान की कमजोरी भी इस मामले में उजागर हुई है। कर्नाटक, मप्र और अब पुडुचेरी में जो कुछ भी  हुआ उससे भाजपा की  सत्ता लिप्सा भले सामने आई लेकिन कांग्रेस की अपने लोगों पर ढीली होती पकड़ भी प्रमाणित होती जा रही है। पार्टी के लिए ये चिंतन के साथ ही  चिंता का भी विषय  है कि आखिर उसके अपने लोग ही उसे छोड़-छोड़कर क्यों भाग रहे हैं ?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 22 February 2021

पेट्रोल-डीजल की कीमतों को बेलगाम छोड़ना समझ से परे



कोरोना काल में केंद्र और राज्य दोनों की आर्थिक स्थिति खराब हो जाने से राजस्व  में जबरदस्त कमी आई। उद्योग-व्यापार बंद हो  गये और लोगों की आवाजाही भी रुक गयी। निश्चित रूप से उन हालातों में देश और प्रदेश चलाना बहुत बड़ी समस्या थी किन्तु किसी तरह से गाड़ी खींची जाती रही। प्रत्यत्क्ष करों से होने वाली आय में भी जबर्दस्त गिरावट देखी गई। लेकिन ज्योंही लॉक डाउन हटा त्योंही स्थितियां सामान्य होने लगीं।  उस दौरान अर्थव्यवस्था को लगा  झटका  मामूली नहीं था। उत्पादन शुरू होने के बाद भी बाजारों में मांग नहीं होने से कर की उगाही लक्ष्य के अनुसार नहीं हो पा रही थी। लॉक डाउन हटने के कुछ महीने बाद तक जीएसटी की वसूली भी अपर्याप्त थी। ऐसे में केंद्र और राज्य  सरकार को  राजस्व वसूली का सबसे आसान स्रोत समझ आया पेट्रोल और डीजल। भले ही सरकार ये दावा करती हो कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय उतार-चढ़ाव पर निर्भर हैं लेकिन भारत में केंद्र और राज्यों द्वारा पेट्रोलियम पदार्थों पर जितना कर लगाया जाता हैं वह विकसित देशों को तो छोड़ दें भारत से आकार और आर्थिक दृष्टि से कमजोर छोटे-छोटे देशों तक की तुलना में बहुत ज्यादा है जिसके आंकड़े किसी से छिपे नहीं हैं। सरकारी करों की विसंगति का प्रमाण ही है कि विभिन्न राज्यों में पेट्रोल डीजल के दाम अलग-अलग हैं। उदहारण के तौर पर उप्र और मप्र में पेट्रोल डीजल की कीमतों में तकरीबन 8 रूपये प्रति लिटर का अंतर है। मप्र उन राज्यों में है जो पेट्रोल-डीजल पर सबसे जयादा कर लगाते हैं। एक समय था जब देश में पेट्रोल 70-75 रु. प्रति लिटर के स्तर पर था तब गोवा में स्व. मनोहर पार्रिकर की सरकार ने उसे 50-52 रु. प्रति लिटर पर रोके रखा। देखने वाली बात ये हैं कि अनेक अवसरों पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में गिरावट आने पर राज्य सरकारों ने कर बढ़ाकर उपभोक्ता को उसके लाभ से वंचित कर दिया। निश्चित रूप से विलासिता की कुछ वस्तुएं ऐसी हैं जिन पर सरकारें बेतहाशा कर  थोपकर अपना खजाना भर सकती है किन्तु पेट्रोल-डीजल को उस श्रेणी में रखा जाना औचित्यहीन है क्योंकि वह आम जनता की  रोजमर्रे की आवश्यकता  बन चुके हैं। यहाँ  तक कि निम्न मध्यमवर्गीय उपभोक्ता भी उसके खरीददार हैं। लॉक डाउन हटने के बाद से पेट्रोल- डीजल और रसोई गैस की कीमतों में जिस तरह से वृद्धि होती जा रही है वह चौंकाने वाली है। यद्यपि इसके लिए सऊदी अरब द्वारा कच्चे तेल के उत्पादन में कमी किया जाना बड़ा कारण बताया जाता है किन्तु भारत में केंद्र और राज्य सरकारें  इस बारे में काफी हद तक  मुनाफाखोरों जैसा आचरण कर रही हैं। सरकार एक तरफ तो उद्योगों, किसानों और  नौकरपेशा के हित के लिए राहत के पैकेज घोषित किया करती हैं  लेकिन जिन पेट्रोल और डीजल की कीमतें समूची अर्थव्यवस्था को प्राथमिक स्तर से ही  प्रभावित करती हैं उनके बारे में वह बेहद असम्वेदनशील है। आम तौर पर तो इसके लिए केंद्र सरकार को कसूरवार ठहराया जाता है किन्तु ये कहना  गलत न होगा कि राज्य सरकारें भी इस बारे में कम बेरहम नहीं  हैं। यही कारण है कि पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के अंतर्गत लाने के लिए कोई राज्य सरकार तैयार नहीं है। अब जबकि पेट्रोल-डीजल के दाम शतक बनाने की स्थिति में आ गए हैं और केंद्र सरकार ने अपना पल्ला  झाड़कर मामला पेट्रोलियम कम्पनियों पर छोड़ दिया है तब इस बात का भी विश्लेषण होना चाहिए कि लम्बे लॉक डाउन के बाद भी इन कम्पनियों ने आखिर जबरदस्त मुनाफा कैसे कमाया? और यदि कमा भी लिया तब अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के साथ ही उन्हें दाम घटाकर जनता को राहत देने की उदारता दिखानी चाहिए। लेकिन जिस तरह से रोजाना कीमतें बढ़ रही हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारें चुपचाप उनसे होने वाले लाभ को उदरस्थ करती जा रही हैं , वह लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के विरुद्ध है। मोदी सरकार ने कोरोना काल में जनता को जमकर राहतें बांटी लेकिन पेट्रोल-डीजल की कीमतों ने सारी कसर पूरी कर दी। इसका असर महंगाई बढ़ने  के रूप में सामने आया है। परिवहन का खर्च बढ़ने से हर चीज की कीमतें बढ़ती हैं। ये जानने के लिए किसी विशेषज्ञ की जरूरत नहीं है। हालांकि केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गत दिवस इस बारे में अपनी चिंता व्यक्त करते हुए राज्यों से भी इस बारे में उपाय करने कहा है। लेकिन जिस आर्थिक समस्या से केंद्र जूझ  रहा है वही तो राज्यों के सामने है। ऐसे में जरूरी हैं कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों के बारे में ऐसा कोई फैसला लिया जाए जिससे कि वे न्यायोचित ठहरायी जा सकें। मौजूदा स्थिति में तो क्या हो रहा है किसी को समझ में नहीं आ रहा। सर्वोत्तम तरीका तो यही होगा कि पेट्रोलियम चीजों को भी जीएसटी के अंतर्गत लाते हुए मूल्यों को युक्तियुक्त बनाया जावे। सरकार विभिन्न मदों में जो राहत जनता को देती है वह पेट्रोल-डीजल की कीमतों के जरिये वापिस भी ले लेती है। भले ही प्रधानमन्त्री की लोकप्रियता बनी हुई है और केंन्द्र  सरकार के प्रति आम धारणा  भी सकारात्मक है लेकिन इसे स्थायी मान लेना सही नहीं होगा । आखिर खाने-पीने की चीजों के बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतें ही आम जनता को सबसे ज्यादा खुश या नाराज करती हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 20 February 2021

फसल जलाने का सुझाव हर दृष्टि से अनुचित




दो दिन पहले किसान आन्दोलन के अंतर्गत रेलें रोकने का जो प्रयास  गया वह  पंजाब , हरियाणा , राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही  आम तौर पर सीमित रहा | किसान नेता खास तौर पर राकेश टिकैत  अब दिल्ली के धरना स्थल को छोड़कर किसान पंचायतें करने बाहर घूम रहे हैं | इस कारण दिल्ली की सीमा पर  जमावड़ा पहले  जैसा नहीं रहा |  नेताओं के बयानों में  भले ही अभी भी सख्ती नजर आ रही हो लेकिन कहीं न कहीं हताशा और उससे उत्पन्न गुस्सा भी महसूस होने लगा है | विगत दिवस श्री टिकैत ने धमकी भरे अंदाज में कहा कि किसान  अपनी फसल भले जला देंगे लेकिन धरना स्थल छोड़कर नहीं जायेंगे | इसी तरह गुरनाम सिंह चढूनी ने 26 जनवरी की हिंसा के आरोपी किसानों को सलाह दी कि पुलिस वाले  उनके घर आयें तो उन्हें  रोककर रखें लेकिन  दुर्व्यवहार न करें | एक किसान पंचायत में श्री टिकैत ने कहा कि जो भी भाजपा नेता को बुलाएगा उसे 100 लोगों को भोजन देना पड़ेगा | इसी के साथ अब दिल्ली के निकट  गाजीपुर , टिकरी और सिंघु नमक स्थान पर बीते 86 दिनों से चले आ रहे धरने में उपस्थिति लगातार घट रही है | युवाओं का हुजूम भी पहले जैसा नहीं है | भले ही किसान नेता पक्के शौचालय बनवाने के साथ गर्मियीं में कूलर और एयर कंडीशनर लगवाने जैसे प्रलोभन दे रहे हैं लेकिन किसान अब और नुकसान झेलने से बच रहे हैं | ये स्थिति आन्दोलन में आ रहे ठहराव को दर्शाती है | जिसका सबसे बड़ा कारण गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रीय राजधानी में हुआ उपद्रव था जिसने शांतिपूर्ण आन्दोलन पर हिंसा  रूपी धब्बा लगा दिया | बची - खुसी कसर किसान नेताओं के बीच आन्दोलन पर वर्चस्व कायम रखने के लिए चली खींचातानी ने पूरी कर दी | विशेष रूप से श्री टिकैत ने जिस तरह आंदोलन को गाजीपुर में  केन्द्रित करने का दांव चला उसने नेताओं के बीच सामंजस्य का अभाव उत्पन्न कर दिया | श्री टिकैत द्वारा फसल जलाने जैसी बात कहना बहुत ही खतरनाक संकेत है | बड़े किसान भले ही ऐसा कदम उठाने में सक्षम हों लेकिन छोटे और मध्यम श्रेणी के किसान के लिए ये आत्मघाती होगा | श्री टिकैत को ये नहीं भूलना चाहिए कि नेताओं के भड़काऊ बयानों की वजह से ही भावावेश में अनेक किसानों ने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया | किसी भी आन्दोलन में जोश की अपनी भूमिका होती है लेकिन होश उससे भी ज्यादा जरूरी है | फसल जलाने जैसा कदम  न सिर्फ किसान अपितु समूचे देश की क्षति होगी | 

-रवीन्द्र वाजपेयी