Wednesday, 31 March 2021

धार्मिक ध्रुवीकरण : पहला पत्थर वो मारे जिसने कभी अपराध न किया हो



बंगाल के चुनाव में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि भाजपा  हिन्दुओं का ध्रुवीकरण करते हुए चुनावी वैतरणी पार करना चाह रही है | वहां जय श्री राम का नारा भाजपा की पहिचान बन गया है | चुनाव सर्वेक्षण करने वाले भी  जब किसी  भाजपा समर्थक से परिणामों के बारे में पूछते हैं  तो वह कहता है इस बार जय श्री राम जीतेगा | ममता बैनर्जी के सामने इस नारे को लगाने वाले उनकी नाराजगी का शिकार हुए तो ये उन्हें चिढ़ाने का जरिया बन गया | ये कहने वाले भी कम नहीं हैं कि बंगाल में धार्मिक आधार पर मतदाताओं को गोलबंद करने का ये प्रथम  प्रयास है | चूँकि भाजपा पहली बार बंगाल के राजनीतिक नक़्शे में अपनी जगह बनाती दिख रही है इसलिए चुनावी लड़ाई का पूरा फोकस   तृणमूल कांग्रेस  और भाजपा पर  है | ममता ने भी ये मान लिया है कि उनका मुकाबला भाजपा से है | ये चौंकाने वाली बात है कि बंगाल पर  तीन दशक से ज्यादा राज करने वाली वामपंथी पार्टियों में अपने बल पर चुनाव लड़ने की ताकत नहीं बची और वे कांग्रेस  के अलावा भडकाऊ भाषणों की लिए कुख्यात  फुरफुरा शरीफ नामक मुस्लिम धार्मिक केन्द्र के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के साथ गठबंधन करने बाध्य हो गये |  इस चुनाव में तृणमूल सरकार की वापिसी के पक्ष में सबसे बड़ा आधार  30 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं का एकमुश्त समर्थन माना जा रहा है | राज्य की सबसे चर्चित सीट नंदीग्राम में ममता की विजय की सम्भावना का प्रमुख कारण वहां के लगभग 65 हजार मुस्लिम मतदाता हैं जिनका 80 फीसदी हिस्सा  तृणमूल को मिलने  के दावे किये जा रहे हैं | ममता समर्थक ये मानते हैं कि भाजपा द्वारा हिंदू मतों के ध्रुवीकरण  की जोरदार कोशिशों के बावजूद ममता को उनका 40  प्रतिशत तो मिलेगा ही और इस आधार पर उनकी जीत सुनिश्चित है | ये बात भी तेजी से प्रचारित की जा रही है कि फुरफुरा शरीफ के अनुयायी भी संयुक्त मोर्चे की बजाय तृणमूल को मत देंगे ताकि   मुस्लिम मतों का बंटवारा रोका जा सके | उल्लेखनीय है बिहार  में असदुद्दीन ओवैसी द्वारा मुस्लिम मतदाताओं में बंटवारा किये जाने पर  तेजस्वी यादव के हाथ आते - आते सत्ता खिसक गई थी | उसके बाद ओवैसी ने बंगाल में भी आमद दर्ज कराई लेकिन अब्बास सिद्दीकी के कारण वे ठन्डे हो गये | हालाँकि कॉंग्रेस और वामपंथियों को फुरफुरा शरीफ के पीरजादा से हाथ मिलाने पर काफ़ी आलोचना झेलनी पड़ी | जैसा कहा जा रहा है कि संयुक्त मोर्चे की रणनीति मुस्लिम मतों में विभाजन करवाकर त्रिशंकु विधानसभा बनवाने की है ताकि ममता से सौदेबाजी की जा सके | ये कितनी कामयाब होती है ये तो 2 मई को ज्ञात होगा परन्तु  हिन्दू ध्रुवीकरण पर चिंता जताने वाले मुस्लिम मतों को ममता के पक्ष में गोलबंद होने की संभावना से खुश हैं | हालांकि  इस बात का जवाब कोई नहीं दे रहा कि आखिर  बंगाल की राजनीति में हिन्दू कार्ड खेलने की गुंजाईश किसने पैदा की ? इस बारे में एक वामपंथी ने खुलकर ये कहा कि  वाममोर्चे ने दशकों तक बंगाल पर राज किया लेकिन हिन्दुओं को ये महसूस नहीं होने दिया कि उनकी उपेक्षा करते हुए मुस्लिम तुष्टीकरण किया जा रहा हैं | जबकि ममता ने महज दस साल में हिन्दुओं के बीच नाराजगी बढ़ा दी | ऐसे में हिन्दू मतों को गोलबंद करते हुए बंगाल में कमल खिलाने की कोशिश क्रिया की प्रतिक्रया ही है | जो तबका मुस्लिमों के थोक में भाजपा के विरुद्ध मत करने की संभावना को धर्मनिरपेक्षता मान रहा है उसे हिन्दुओं के भाजपा के पक्ष में लामबंद होने के दावों में साम्प्रदायिकता नजर आना दोहरा मापदंड है | इस बारे में अब ये बात  तेजी से चल रही है कि  देश में धार्मिक आधार पर पहले मुस्लिमों का  ध्रुवीकरण हुआ | इसकी शुरुवात कांग्रेस ने की लेकिन बाद में लालू - मुलायम सरीखे क्षेत्रीय नेता इस वोट बैंक को ले उड़े जो उप्र और बिहार में कांग्रेस की दयनीय स्थिति का कारण बना | भाजपा ने तो 1989 से खुलकर हिन्दू कार्ड खेलना  शुरू किया जिसका उसे लाभ हुआ और 25 साल के भीतर देश की सत्ता पर काबिज हो गई और वह भी अपने दम पर | उसके इस पैंतरे के बाद बाकी पार्टियां किसी तरह मुस्लिम मतों का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करने में जुट गई जिनमें तृणमूल भी अग्रणी कही जायेगी | अब जबकि जवाब में हिन्दू मतों को एकजुट करने की कोशिश भाजपा ने शुरू  की तो धर्मनिरपेक्षता के लिए खतरे का ढोल पीटा जाने लगा | मुस्लिम मतों का पूरा हिस्सा  साथ होने का दावा करने वाले किस मुंह से ये कहते हैं कि हिन्दू धार्मिक आधार पर थोक के भाव किसी पार्टी के साथ नहीं जायेंगे | चुनावी पंडित भी जब किसी पार्टी या उम्मीदवार के जीतने का अनुमान लगते समय मुस्लिम  मतों के  सामूहिक समर्थन की बात करते है तब क्या वे हिन्दू मतदाताओं को एकजुट होने के लिए प्रेरित नहीं करते ? सांप्रदायिक आधार पर मतदाताओं को गोलबंद करना आदर्श स्थिति नहीं है लेकिन मुस्लिम मतदाताओं को ऐलानिया किसी पार्टी का पक्षधर बताये जाने वाले दूसरे धर्म के मतदाताओं से धार्मिक आधार पर मतदान न  किये जाने की अपेक्षा करें तो ये सिवाय पाखंड के और क्या है ? ईसा मसीह का एक प्रसिद्ध कथन  है कि किसी अपराधी को पहला पत्थर वो मारे जिसने कभी  अपराध न किया हो | मुस्लिम ध्रुवीकरण के जन्मदाताओं को हिन्दू ध्रुवीकरण पर उँगलियाँ उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए | वैसे हिन्दू मतों का महत्व ममता को भी समझ आ चुका है | चंडीपाठ और मंदिर दर्शन के बाद गत दिवस उन्होंने अपना गोत्र भी सार्वजनिक कर दिया | चुनाव जो न करवाए थोड़ा है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 27 March 2021

ढाका यात्रा में निहित हैं चीन और पाकिस्तान के लिए संदेश



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लम्बे अंतराल के बाद विदेश यात्रा पर गत दिवस बांग्लादेश पहुंचे | कोरोना के कारण  बीते एक साल से भी ज्यादा से वे देश से बाहर नहीं गए थे | इस यात्रा के लिए बांग्लादेश का चयन बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इस वर्ष वह अपनी स्थापना की आधी सदी पूरी कर रहा है | ये भी सुखद संयोग है कि वहां प्रधानमंत्री पद पर बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर्रहमान की बेटी शेख हसीना विराजमान हैं जिनके शासनकाल में दोनों देशों के रिश्ते काफी मधुर हुए | अन्यथा 1975 में  शेख साहब की हत्या के बाद वहां जिस तरह का फ़ौजी शासन आया उसके कार्यकाल में दोनों देशों के बीच  सम्बन्ध  काफी तनावपूर्ण हो गये | एक समय ऐसा भी आया जब पाकिस्तान प्रवर्तित आतंकवादी संगठन बांग्लादेश की धरती से भारत विरोधी षडयन्त्र रचने लगे | लेकिन जबसे शेख हसीना का राज आया और भारत में  श्री मोदी सत्ता में आये तबसे न सिर्फ कूटनीतिक वरन व्यापारिक और सांस्कृतिक रिश्तों में  काफी सुधार आया है | हालाँकि आज भी इस्लामिक कट्टरपंथ इस देश में जड़ें जमाये हुए है जिसके चलते वहां रहने वाले हिन्दुओं और उनके धार्मिक स्थलों पर हमले होते रहते हैं | बीच - बीच  में सीमा विवाद  और शरणार्थी समस्या को लेकर बांग्लादेश नाराज भी हुआ जिसका लाभ लेकर चीन ने वहां अपना प्रभाव बढ़ाने की काफी कोशिश की परन्तु  मौजूदा स्थिति में ढाका और नई दिल्ली के बीच संवाद और संपर्क पूरी तरह से सौजन्यतापूर्ण बना हुआ है | रोहिंग्या मुस्लिमों की वापिसी  के  अलावा नागरिकता संशोधन कानून को लेकर बांग्लादेश में कुछ नाराजगी देखी गई किन्तु कोरोना काल  में भारत  ने जिस दरियादिली से अपने इस पड़ोसी की चिंता की उससे छोटे - छोटे विवाद गौण होकर रह गए | वैसे भी  बांग्लादेश के निर्माण में भारत की ऐतिहसिक भूमिका को देखते हुए अन्य किसी देश के राजप्रमुख का वहां जाना उतना प्रासंगिक नहीं होता | अपनी स्थापना  के समय दुनिया के सबसे गरीब देश के तौर पर जाना जाने वाला ये देश आज विकास की तेज रफ्तार के लिए प्रसिद्ध  हो रहा है | उसकी सीमा का बड़ा हिस्सा भारत से मिलता है जिससे होते हुए घुसपैठिये आते रहे हैं जिनके कारण असम , बंगाल और बिहार के बड़े हिस्सों में जनसंख्या का संतुलन बिगड़ चुका है | असम में तो घुसपैठियों की वापिसी बड़ा राजनीतिक मुद्दा है | पिछली सरकारों ने चुनावी फायदे के मद्देनजर इन घुसपैठियों को मतदाता बनाकर अपना उल्लू तो सीधा कर लिया किन्तु देश के सामने बड़ी समस्या पैदा कर दी | इन घुसपैठियों की पहिचान और उसके बाद वापिसी ऐसा मुद्दा है जिसका कोई हल दूरदराज तक नजर नहीं आता | यद्यपि सीमा पर तार लगाने से घुसपैठ काफी कम हुई है लेकिन आज भी बड़ी संख्या में पशुधन की तस्करी होती है | सीमावर्ती कुछ इलाकों का विनिमय कर विवादों को हल करने की समझदारी भी दोनों देश दिखा चुके हैं | लेकिन साझा  भाषायी और सांस्कृतिक विरासत के बावजूद बीत पांच दशक में भारत और बांग्लादेश उतने करीब नहीं आ सके जितनी प्रारंभ में अपेक्षा थी |  इसका बड़ा कारण हमारी विदेश नीति में कमी रही जिसके कारण नेपाल की तरह से बांग्लादेश में भी  भारत को लेकर ये संदेह बना रहा कि वह  उस पर काबिज हो जाएगा | नेपाल के साथ तो  रिश्तों में सरकारी  न सही लेकिन  जनता के स्तर  पर फिर भी  काफी सहजता बनी रही जिसका कारण उसका हिन्दू राष्ट्र  होना था किन्तु शेख  मुजीब के मारे जाते ही बांग्लादेश भी  पाकिस्तान की तरह इस्लामिक कट्टरपंथ की ओर अग्रसर होता गया | हालांकि 1971 में स्व. इंदिरा गांधी  चाहतीं तो बांग्लादेश से वैसी ही सैन्य सुरक्षा संधि कर सकती थीं जैसी दूसरे महायुद्ध के बाद अमेरिका ने प. जर्मनी , जापान और द. कोरिया के साथ की थी | यदि वह हो जाती  तब शायद शेख मुजीब की हत्या और तख्ता पलट न हो पाता और लम्बे समय तक भारत के साथ उसके रिश्तों में शत्रुता का भाव न बना रहता | बांग्लादेश के बंदरगाह भारत के लिए दक्षिण एशिया में व्यापार बढाने के लिए उपयोगी हो सकते हैं |  इसके अलावा उसकी सैन्य जरूरतों को भारत पूरा कर सकता है | सॉफ्टवेयर और अन्तरिक्ष कार्यक्रमों में भी बांग्लादेश भारत की मदद ले सकता है | दोनों देशों का रहन - सहन  , खान - पान , पहिनावा और सांस्कृतिक समानताएं भी  रिश्तों में मजबूती ला सकती हैं | लेकिन इसके लिए विश्वास पैदा करना जरूरी है | बांग्लादेश को इस्लामी कट्टरवाद से दूर रखना भारत के लिए जरूरी है जिसके लिए उसके मन में समाई इस धारणा को दूर करना जरूरी है कि भारत उसको हड़पना चाहता है | श्री मोदी ने इसके पहले भी इस देश की यात्रा की थी जिसके काफ़ी सकारात्मक परिणाम आये | कोरोना काल के बाद से चीन की साख और धाक दोनों में जबरदस्त कमी आने से पड़ोसी देश भारत की तरफ देखने लगे हैं | श्री लंका इसके संकेत दे ही चुका है और अब नेपाल भी चीन की चाल में फंसने से बचने के फिराक में है | श्री  मोदी की ये यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब पाकिस्तान भी भारत से रिश्ते सुधारने की इच्छा जता रहा है | पिछली गर्मियों में चीन के साथ हुए सीमा विवाद के दौरान  भारत ने जिस साहस और कूटनीतिक दृढ़ता का परिचय दिया उससे न सिर्फ पड़ोसी अपितु दुनिया की बड़ी शक्तियां तक उसके प्रभाव को स्वीकार कर रही हैं | पाकिस्तान की तरफ से बढ़ाए गये दोस्ती के हाथ को थामने के पहले श्री मोदी की ढाका यात्रा में बिना कहे ही चीन और पाकिस्तान के लिए अनेक सन्देश निहित हैं | बांग्लादेश की प्रधानमन्त्री शेख हसीना व्यक्तिगत तौर पर चूँकि भारत के प्रति बहुत ही संवेदनशील हैं इसलिए ये उम्मीद की जा सकती है कि ये यात्रा रिश्तों को और मजबूत बनायेगी | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 26 March 2021

बंगाल के परिणाम राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाले होंगे



पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की धूम है | 27 मार्च को असम और बंगाल में पहले चरण का मतदान होगा | केरल , तमिलनाडु , पुडुचेरी भी चुनाव प्रक्रिया से गुजर रहे हैं लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा बंगाल को लेकर है जहां 294 विधानसभा सीटें हैं | हालाँकि तमिलनाडु में  भी  234 सीटें हैं लेकिन वहां की राजनीति  दो  क्षेत्रीय दलों के बीच ही मुख्यतः सीमित है इसलिए राष्ट्रीय परिदृश्य पर वह उतना चर्चित नहीं हो पाता | पुडुचेरी केंद्र शासित छोटा सा राज्य है जबकि  केरल की विधानसभा में 140 और  असम में 126 सीटें ही हैं | लेकिन बंगाल इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में है क्योंकि वहां  तृणमूल कांग्रेस नामक क्षेत्रीय दल के 10 वर्षीय शासन के विरुद्ध  भाजपा ने जोरदार मुकाबले की स्थिति पेश कर दी है | तीन दशक से ज्यादा तक यहाँ वाममोर्चे की सरकार रही जिसे 2011 में ममता बैनर्जी के उखाड़ फेंका | वाममोर्चे के पहले बंगाल में  भी कांग्रेस का शासन था किन्तु केंद्र में सत्तारूढ़ रहने के बाद भी वह वाममोर्चे के किले में सेंध नहीं लगा सकी | ममता बैनर्जी ने कांग्रेस पर सीपीएम की बी टीम होने का आरोप लगाते हुए तृणमूल कांग्रेस बनाई और कुछ सालों तक संघर्ष करने के बाद् अंततः वाममोर्चे को सत्ता से बाहर कर दिया | भारतीय राजनीति में वह बहुत बड़ा बदलाव था क्योंकि बंगाल साम्यवाद के अभेद्य दुर्ग में तब्दील हो चुका था और यहीं  नक्सलवाद का जन्म हुआ | एक समय वह भी था जब कोलकाता की दीवारों पर चेयरमैन माओ जिंदाबाद के नारे दिखाई देते थे | बंगाल की तर्ज पर त्रिपुरा पर  भी वाममोर्चे की जबर्दस्त पकड़ हो गई | लेकिन बीते 10 सालों के भीतर इन दोनों राज्यों में बड़ा  राजनीतिक परिवर्तन हुआ | बंगाल में  ममता और त्रिपुरा में भाजपा ने वामपंथी आधिपत्य समाप्त कर दिया |  इस समूची प्रक्रिया में कांग्रेस पूरी तरह हाशिये पर सरकती गई |  हालांकि  ममता  ने वामपंथियों  के शासन को तो उखाड़ फेंका लेकिन वे उनकी शासन करने की संस्कृति को नहीं मिटा पाईं जिसके कारण राजनीतिक हत्याएं और  गुंडागर्दी का आलम जस का तस बना रहा | कांग्रेस चाहती तो वह अपने लिए फिर  जगह बना सकती थी लेकिन  राहल गांधी के उदय के बाद वह  अपनी संघर्ष क्षमता खोती जा रही है जिसका लाभ उठाते हुए भाजपा ने पहले पूर्वोत्तर राज्यों में  पैर जमाये और इस चुनाव में वह तृणमूल के विकल्प के तौर पर मैदान में है | हालाँकि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी  मोदी लहर ने बंगाल में भी  अपना असर दिखाया किन्तु 2016 के विधानसभा चुनाव में उसे महज 3 सीटें मिलने से ये अवधारणा बन गई कि बंगाल की जनता नरेंद्र मोदी से तो प्रभावित है किन्तु राज्य में भाजपा के पास कोई दमदार नेता नहीं होने से प्रदेश की सत्ता उसे सौंपने में वह हिचकती है | भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने इस कमी को समझकर तृणमूल सहित अन्य पार्टियों में तोड़फोड़ मचाते हुए जबरदस्त भर्ती  अभियान चलाया और पार्टी में नये - नये आये नेताओं को उम्मीदवार बनाकर स्थानीयता के अभाव को दूर कर दिया | हालाँकि उसका ये दाँव कितना कारगर होगा और वह लोकसभा चुनाव के परिणामों से बेहतर प्रदर्शन करते हुए ममता के किले को ध्वस्त कर सकेगी , इस बात की   पूरे देश में चर्चा है | राजनीतिक पंडित , टीवी चैनलों के रिपोर्टेर और तमाम सर्वेक्षण एजेंसियां बंगाल चुनाव के परिणामों का आकलन करने में जुटी हुई हैं | यद्यपि अभी तक आये अधिकाँश सर्वे  ममता की वापिसी को लेकर आश्वस्त हैं वहीं उनका ये भी  कहना है कि इस बार तृणमूल को चुनौती कांग्रेस और वामपंथियों का मोर्चा नहीं वरन भाजपा दे रही है जिसे 100 से ज्यादा सीटें मिलने की उम्मीद लगाई  जा रही है | लेकिन प्रथम चरण के मतदान के तीन दिन पहले आये कुछ सर्वेक्षणों में भाजपा के बहुमत का अनुमान लगाये जाने से बाजी उलटने की उम्मीद बढ़ गई है | और यदि ऐसा होता है तब ये राष्ट्रीय राजनीति में बहुत बड़ी घटना होगी | 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले अगर भाजपा ने बंगाल फतह कर लिया तो ये विपक्ष खास तौर पर कांग्रेस के लिए चिंता  का बड़ा कारण होगा और वह विपक्षी एकता की सूत्रधार बनने की हैसियत भी  खो बैठेगी | इस प्रकार जिन  पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं उनमें बंगाल के नतीजे भावी राष्ट्रीय राजनीति को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले होंगे | यदि भाजपा वहां सरकार नहीं  बना सकी किन्तु उसकी सीटें 125 के आसपास रहीं तब भी ये बड़ी बात होगी क्योंकि वामपंथ के गढ़ रहे  इस राज्य में उसका वैकल्पिक ताकत बन जाना मामूली बात नहीं होगी   | उसे ये  पता है कि पूर्वोत्तर के छोटे  - छोटे राज्यों में उसकी  जीत बिना बंगाल हासिल किये अधूरी रहेगी |   लेकिन ममता बैनर्जी अपनी सरकार बचाने  में सफल हो गईं तब  वे विपक्षी राजनीति की धुरी बन सकती हैं जो  राहुल गांधी के लिए बड़ा धक्का होगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 25 March 2021

एक साल पहले तो अनजान थे लेकिन अब तो पूरी जानकारी है



एक साल आज ही के दिन देश में लॉक डाउन लागू हुआ था | शुरुवात में 21 दिन की अवधि के लिए समूचे देश में लोगों को घरों में रहने की बंदिश लगाई गयी | ऐसी  उम्मीद की जा रही थी कि तीन सप्ताह में संक्रमण की  श्रृंखला को तोड़ दिया जाएगा | लेकिन जैसे - जैसे समय बढ़ता गया वैसे - वैसे लॉक डाउन  में  वृद्धि की जाती रही | जून के पहले हफ्ते से कुछ  ढील देने की शुरुवात हुई लेकिन पूरी तरह से सामान्य स्थिति आते - आते पूरा साल बीत गया | और तब तक संक्रमण में कमी के साथ ही देश में निर्मित टीके की आपूर्ति भी सुनिश्चित हो गई | ऐसा लगने लगा कि भारत ने कोरोना के विरुद्ध जंग जीत ली है और तो और  टीके का निर्यात  दुनिया के अनेक देशों  को करते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी साख और धाक दोनों जमाई | प्रथम पंक्ति में रहकर कोरोना के विरुद्ध लड़ रहे वर्ग को सबसे पहले टीका लगाने के अभियान के बाद 1 मार्च से वरिष्ठ नागरिकों का टीकाकरण प्रारम्भ किया गया |  आगामी  1 अप्रैल से 45 वर्ष से ऊपर की आयु वालों के  भी  टीकाकरण की शुरुवात होने जा रही है |  भारत का कोरोना टीकाकरण अभियान विश्व में  सबसे बड़ा है  | सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क और निजी अस्पतालों में 250 रु. में टीकाकरण हो रहा है | जिसमें  अस्पताल का 100 रु. शुल्क भी शामिल है | वैसे  कुछ निजी चिकित्सालय टीके की मूल कीमत 150 रु. ही ले रहे हैं | इस प्रकार लाखों लोगों को प्रतिदिन टीका लगाया जा रहा है | अभी तक कुछ अपवाद छोड़कर  टीकाकरण को  लेकर सकारात्मक खबरें ही आ रही हैं जिससे लोगों   के मन में  व्याप्त शंकाएँ भी दूर होने लगी हैं |  लेकिन जैसे ही टीका लगना  शुरू हुआ  वैसे ही कोरोना की वापिसी की खबरें भी आने लगीं | बीते कुछ सप्ताह में ऐसा लगने लगा कि घूम - फिरकर हालात पिछले साल जैसे ही बनने लगे हैं | प्रति दिन का आंकड़ा 50 हजार को पार कर चुका  है | अनेक शहरों में रात्रिकालीन कर्फ्यू लागू  के बाद साप्ताहिक लॉक डाउन करना पडा और जब उससे भी बात नहीं  बनी तब लम्बे लॉक डाउन का निर्णय लिया गया  | नागपुर , पुणे , नासिक, मुम्बई , अहमदाबाद , इंदौर और भोपाल के अलावा अनेक शहर हैं जहां कोरोना ने पूरी ताकत से पलटवार किया है | ये स्थिति चिंता में डालने वाली है |  बड़ी मुश्किल से अर्थव्यवस्था के साथ ही जन  जीवन भी तेजी से सामान्य  होने लगा था लेकिन बीत कुछ सप्ताहों ने  मानों घड़ी की सुइयों को पीछे घुमा दिया |  सवाल ये है कि कोरोना पर विजय हासिल करने के करीब पहुचंने के बाद आखिरकार ये हालात क्यों और कैसे बन गये ? इसके यूँ तो अनेक जवाब हो सकते हैं किन्तु सीधा और सपाट उत्तर है लोगों की  लापरवाही | केवल मास्क का ही उपयोग किया जाता रहे तो भी कोरोना से काफी हद तक बचा जा सकता है | इस बारे में ये कहना पूरी तरह सही होगा कि न केवल  अशिक्षित और अल्प शिक्षित वरन पूरी तरह से शिक्षित वर्ग में भी कोरोना संबंधी अनुशासन तोड़ने की होड़ सी  लग गई |  ये बात काफी पहले ही   साफ हो चुकी थी  कि ब्रिटेन और अमेरिका जैसे विकसित देशों तक में कोरोना की दूसरी और तीसरी लहर आ चुकी है जिसके लक्षण तो अलग हैं ही , ये पहले से ज्यादा खतरनाक है | बावजूद इसके  जैसा एक साल पहले सोचा जा रहा था कि भारत का मौसम और लोगों की रोग प्रतिरोधक् क्षमता के कारण  कोरोना यहाँ पांव नहीं जमा सकेगा ठीक  उसी तर्ज पर दूसरी लहर को लेकर बेफिक्री का परिचय दिया गया जिसके परिणामस्वरूप संक्रमण पूरी ताकत से आ धमका और एक साल पहले  जैसी स्थिति उत्पन्न होने लगी |  शिक्षण संस्थान , होटल , रेस्टारेंट , क्लब , धार्मिक स्थल , आदि में आवाजाही पर फिर से रोक लगाने की जरूरत आ गयी | त्यौहारों के आयोजन में भी इस कारण से प्रतिबन्ध लगाये जा रहे हैं | साप्ताहिक के साथ ही लम्बे लॉक डाउन की नौबत भी आ गई | टीकाकरण के समानांतर कोरोना का फैलाव वाकई विचित्र स्थिति का परिचायक है | लेकिन उसी के साथ ये परीक्षा की घड़ी भी है क्योंकि बीते एक साल में हुए  नुकसान की भरपाई होने के पहले ही एक बार फिर अर्थव्यवस्था पर  अनिश्चितता  के बादल मंडराने लगे हैं | ये देखते हुए अब ये नागरिकों का कर्तव्य है कि वे कोरोना से जुड़े अनुशासन का कडाई से पालन करें | मास्क न पहिनने पर पुलिस को लोगों का चालान करना पड़े ये बहुत ही शोचनीय स्थिति है | 135 करोड़ की आबादी वाले देश में टीकाकरण अभियान सम्पन्न करवाना वाकई कठिन कार्य है | और फिर टीका लगने के बाद भी मास्क जैसे बचाव के साधन का उपयोग जरुरी होगा | इसलिए ये मान लेना ही बुद्धिमत्ता होगी कि आने वाले एक से दो साल तक कोरोना हमारे  इर्द - गिर्द मंडराता रहेगा और ज़रा सी असावधानी में हम उसके शिकार  हो जायेंगे | लॉक डाउन की पहली सालगिरह दरअसल इस बात के चिन्तन का अवसर है कि कोरोना के दूसरे हमले को कैसे बेअसर किया जाए | एक साल पहले तो हम ही नहीं लगभग पूरी दुनिया इस अदृश्य शत्रु से अनजान थी लेकिन अब तो उसकी चाल और चरित्र दोनों पता चल चुके हैं | ऐसे में अब उसके शिकंजे में फंसना हमारी अपनी गलती होगी | सावधानी हटी और दुर्घटना घटी जैसे नारे सिर्फ पढने की ही नहीं समझने की भी चीज है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 24 March 2021

पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने में ज्यादा देर न की जाए



 केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने गत दिवस कहा कि यदि राज्य जीएसटी  काउंसिल की अगली बैठक में पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने को राजी हो तो केंद्र भी  उस पर विचार को तैयार है | उनका कहना था कि चूंकि इन चीजों पर केंद्र के साथ ही राज्य भी कर लगाते हैं लिहाजा उनको भी रियायत के लिए आगे आना चाहिए | वित्त मंत्री ने लगे हाथ ये भी बता दिया कि केंद्र को मिलने वाले प्रति 100 रु. के कर में राज्यों को 41 रु. मिलते हैं | ऐसा लगता है पांच राज्यों में  होने जा रहे विधानसभा चुनावों में पेट्रोल - डीजल की कीमतों के आसमान छूने पर केंद्र सरकार की  जो आलोचना हो रही है  उसके मद्देनजर श्रीमती सीतारमण ने उक्त  बयान दिया | वरना कुछ दिन पहले ही उन्हें कहते सुना गया था कि इन चीजों को जीएसटी के दायरे में लाने का कोई इरादा केंद्र सरकार का नहीं है | ये बात भी सही है कि केंद्र सरकार जीएसटी काउंसिल  पर दबाव नहीं डाल सकती और उसके सभी फैसले  सर्वसम्मति से होते आये हैं | अब तक किसी भी राज्य ने पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के अंतर्गत लाने की पहल नहीं की क्योंकि ये उनके लिए दुधारू गाय जैसे  हैं |  जिस दिन पेट्रोल - डीजल भी जीएसटी के दायरे में आ जायेंगे उस दिन से राज्यों को होने वाली नगद आमदनी में व्यवधान आ जायेगा क्योंकि तब उन्हें अपने हिस्से के कर के लिए केंद्र की मर्जी पर निर्भर रहना होगा | कोरोना काल में अर्थाभाव की वजह से केंद्र सरकार राज्यों को उनके हिस्से के जीएसटी का भुगतान करने में विफल रही जिससे वे इन चीजों से होने वाली नियमित आय केंद्र के  जरिये हासिल करने से कतराने लगे | लेकिन ये बात भी सही है कि बीते कुछ महीनों से जिस तरह से पेट्रोल  - डीजल के दाम बढ़ते गए उससे केंन्द्र  के साथ ही राज्यों की बदनीयती भी उजागर हो गयी | मूल्य वृद्धि होने पर राज्य के टैक्स बजाय  निश्चित करने के  आनुपातिक आधार पर लगाये जाने से  जनता पर दोहरी मार पड़ती है जबकि राज्यों को बैठे बिठाये अतिरिक्त आय प्राप्त हो जाती है | पहले ये होता था कि कीमतें बढ़ने पर राज्य अपने करों में  कमी कर  उपभोक्ताओं को  राहत प्रदान करते थे लेकिन अब वैसा नहीं हो रहा | ये बात भी पुख्ता  तौर पर सामने आ चुकी है कि यदि केंद्र और राज्य पेट्रोल - डीजल पर लगाये  जाने वाले करों का सही तरीके से नियोजन करें तो वे आराम से 50 से 60 रु. प्रति लीटर की दर पर बिक सकते हैं और तब भी सरकारी खजाने में भरपूर  राजस्व जमा हो सकेगा | बीते कुछ महीनों में खुदरा और थोक दोनों स्तर पर मंहगाई बढ़ने के पीछे के कारणों में पेट्रोल -  डीजल के दामों का सर्वोच्च स्तर पर जा पहुंचना है | सरकार का ये तर्क अपनी जगह ठीक है कि इनकी कीमतों  पर उसका नियन्त्रण नहीं है लेकिन करों का आरोपण तो उसके अधिकार की विषय वस्तु है | जब जीएसटी लागू  किया गया तब ये आश्वासन मिला था कि जल्द ही पेट्रोल - डीजल भी उसके दायरे में लाये जायेंगे किन्तु साल दर साल बीतने के बावजूद इस दिशा में  एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया  जा सका | इसकी वजह केंद्र और राज्यों की तरफ से जान बूझकर  दिखाई गई उदासीनता ही है | हो सकता है कीमतों के असीमित ऊंचाई तक जा पहुंचने के कारण केन्द्रीय वित्त मंत्री को अपने हालिया बयान से हटकर राज्यों की मर्जी होने पर इन चीजों को जीएसटी के दायरे में लाने पर सहमति देने की बात कहनी पड़ी हो किन्तु जब तक ऐसा नहीं  होता तब तक केंद्र और राज्य पेट्रोल - डीजल पर आम जनता को कुछ राहत तो दे ही सकते हैं | उनको ये समझना चाहिए कि उपभोक्ता की जेब हल्की होने पर वह बाजार का रुख करेगा जिससे सरकार को घूम फिरकर उतना ही टैक्स मिल जाएगा तथा अर्थव्यवस्था भी चलायमान बनी रहेगी | ये बात सर्वविदित है कि अब पेट्रोल - डीजल विलासिता की वस्तु नहीं रह गए अपितु मोबाईल फोन की तरह आम जनता के दैनिक जीवन से अभिन्न रूप से जुड़ चुके हैं | जिस तरह बिजली के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती ठीक उसी तरह अब पेट्रोल - डीजल भी अनिवार्यता बन चुके हैं | ऐसे में उनके दामों को लेकर केवल आर्थिक  नहीं वरन व्यवहारिक और संवेदनशील रवैया अपनाया जाना चाहिये | श्रीमती सीतारमण का ताजा बयान यदि सही भावना से दिया गया तब केंद्र सरकार को चाहिए वह राज्यों के साथ अलग से बात करते हुए उन्हें इस बात के प्रति आश्वस्त करे कि इन चीजों को जीएसटी के दायरे में लाने के बाद उनका हिस्सा उन्हें समय पर मिलता रहेगा | संघीय ढांचे के अंतर्गत राज्यों को भी करारोपण का अधिकार है किन्तु जब आम जनता का व्यापक हित मुद्दा बन रहा हो तब पूरे देश की राय एक जैसी होनी चाहिए | जीएसटी काउंसिल भले ही स्वायत्त हो लेकिन उसे  जनहित को नजरअंदाज करने की खुली छूट नहीं दी जा सकती | एक तरफ केंद्र  और राज्य सरकारें जनहित के लिए दोनों हाथों से खजाना लुटाती हैं वहीं दूसरी  तरफ पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर अनाप - शनाप टैक्स लगाकर जबरिया वसूली कर लेती हैं | केन्द्रीय वित्त मंत्री द्वारा दिए गये बयान के संदर्भ में जन अपेक्षा है कि पेट्रोल - डीजल की कीमतों को भी जल्द से जल्द जीएसटी की दायरे में लाया जाएगा | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 23 March 2021

चौथी पारी : आम जनता को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाना असली चुनौती



 मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान देश के उन वरिष्ठ जननेताओं में हैं जिन्हें चौथी बार प्रदेश की सत्ता संभालने का अवसर मिला  | 2018 के चुनाव में भाजपा थोड़े से अंतर से सरकार बनाने से चूक गई किन्तु महज सवा साल के भीतर शिवराज का राजयोग फिर प्रबल हुआ और गत वर्ष आज ही के दिन एक बार फिर उनकी ताजपोशी हो गयी | आज वे उसका जश्न मना रहे हैं | अख़बारों में बड़े - बड़े इश्तहारों के जरिये सरकार की उपलब्धियों से लोगों को  परिचित कराया गया | सत्ता  गँवा चुके पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को ये सब अच्छा नहीं लग रहा जो स्वाभाविक है |  लेकिन यदि शिवराज की जगह होते तब शायद आज के दिन वे भी यही करते |  गत वर्ष जब प्रदेश में सत्ता बदलने की मुहिम चल रही थी तब कोरोना की आहट भी सुनाई देने लगी थी | श्री चौहान के शपथ लेने के बाद लॉक डाउन का लम्बा दौर शुरू हुआ जिसकी वजह से उन्हें असहज और अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में शासन चलाना पड़ा | लम्बे समय तक तो वे अकेले ही चले  | बाद में कुछ मंत्री और बनाए किन्तु सरकार पूरा आकार नहीं ले सकी | कोरोना से निपटना वाकई बड़ा काम था | लॉक डाउन की वजह से सरकारी राजस्व की आवक रुक गई | ऊपर से राहत कार्यों को चलाने की भी जिम्मेदारी किन्तु तमाम विषमताओं के बाद भी मुख्यमंत्री ने उस दौर में बेहतर कार्य किया | सबसे बड़ा दबाव था कांग्रेस छोड़कर आये दो दर्जन विधायकों को उपचुनाव में जितवाना जिसके बिना उनकी सरकार का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता | एक और मानसिक बोझ  था ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ सामंजस्य का | लेकिन श्री चौहान ने उक्त दोनों मोर्चों पर बड़ी ही कुशलता के साथ काम करते हुए ये साबित कर दिया कि वे  शासन चलाने के लिए जरूरी परिपक्वता से संपन्न हैं | यही वजह है जिसके आधार पर उन्होंने बीते एक साल में चुनावी मोर्चे पर सफलता  के साथ ही राजनीतिक सामंजस्य और प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया | इस दौरान उन्होंने अपने स्वभाव और प्रचलित छवि से अलग जिस तरह माफिया के विरुद्ध आक्रामक रुख दिखाया उसका  सकारात्मक असर भी जनमानस पर  दिखाई दे रहा है | सरकारी जमीन को रसूखदारों के अवैध कब्जे से मुक्त करवाने की उनकी मुहिम से भूमाफिया और अपराधी तत्वों में घबराहट है | लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिन पर श्री चौहान को बारीकी से ध्यान देना चाहिए | आज भी पूरे प्रदेश में खनन और शराब  माफिया  बेख़ौफ़ है | ये कहना भी गलत न होगा कि श्री चौहान की अपनी पार्टी के प्रभावशाली नेता भी इन धंधों को संरक्षण दे रहे हैं | ट्रांसफर में होने वाली सौदेबाजी भी राज्य सरकार की छवि को धूमिल करती है और सबसे मूलभूत बात जो मुख्यमंत्री से अपेक्षित है वह है निचले स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार  | हालाँकि लोकायुक्त और आर्थिक अपराध शाखा की कार्र्वाई में बड़ी संख्या में भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारी लपेटे में आये हैं लेकिन जांच और दंड प्रक्रिया इतनी धीमी है कि  अपेक्षित परिणाम नहीं आ पाते | सरकारी नियुक्तियों की प्रक्रिया में भी  पारदर्शिता के दावे गलत साबित होते रहे हैं | पिछले कार्यकाल में व्यापमं नामक घोटाले ने मप्र की राष्ट्रव्यापी बदनामी करवाई थी | ये भी कहा जा सकता है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की  सत्ता चली जाने के पीछे उस घोटाले का बड़ा हाथ था |  हालाँकि श्री चौहान  उससे उबर चुके हैं और बहुत कुछ सबक भी लिया होगा  जिसकी बानगी चौथी पारी में ताबड़तोड़ बल्लेबाजी से मिल रहा है लेकिन उन्हें ये  स्वीकार करना चाहिए कि कृषि , उद्योग , पर्यटन , शिक्षा , चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में मप्र भले ही कितना आगे बढ़ गया हो लेकिन सरकारी महकमों के भ्रष्टाचार में अभी तक कोई सुधार नहीं हुआ है | नौकरशाही की निरंकुशता भी बदस्तूर जारी है जिसके कारण आम जनता के मन में गुस्सा   है | ये कहने वाले भी कम नहीं हैं कि मप्र के सरकारी दफ्तरों में घूसखोरी चरमोत्कर्ष पर है | ग्रांम  पंचायत से लेकर सचिवालय तक यही आलम है | यदि शिवराज मप्र को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते हैं तो इसकी शुरुवात उन्हें भोपाल स्थित राज्य सचिवालय से करनी होगी जहां से चलकर  उसका विस्तार निचले स्तर तक होता है | ये बात भी बिलकुल सही है कि बड़े भ्रष्टाचार से आम जनता भले अप्रभावित रहती हो लेकिन छोटे स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार से उसका  विश्वास व्यवस्था में खंडित होता है | चौथी पारी की पहली वर्षगाँठ पर मुख्यमंत्री से अपेक्षा है कि वे अपने सिंघम अवतार से आम जनता को भ्रष्टाचार से  राहत दिलाने  वाले काम  करें | गोवा के मुख्यमंत्री रहे स्व. मनोहर पार्रिकर को आदर्श बनाकर यदि वे  आगे बढ़ें तो उनकी गिनती देश के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री  के तौर पर हो सकती है | उल्लेखनीय है गत वर्ष सत्ता सँभालते ही  कोरोना नामक जिस संकट से उनका सामना हुआ वह फिर लौट आया  है | मुख्यमंत्री और उनकी पूरी सरकार को इस मुसीबत से प्रदेश को बचाने  के लिए पूरी ताकत झोंकनी होगी | टीकाकरण अभियान चलाने के साथ ही कोरोना का संक्रमण फैलने से रोकना बहुत ही बड़ा काम है | उम्मीद की जा सकती है कि पिछले अनुभवों के आधार पर वे कोरोना के दूसरे हमले का सामना भी सफलतापूर्वक कर लेंगे |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 22 March 2021

दागदारों की भीड़ में कौन बेदाग़ है कह पाना कठिन




मुकेश अम्बानी के घर के सामने मिली एक कार में विस्फोटक सामग्री पाए जाने के बाद हुए घटनाक्रम में नाटकीय मोड़ आ रहे हैं | इसी क्रम में मुम्बई के पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह को हटाकर महत्वहीन कहे  जाने वाले पद पर भेज दिया गया | जिसके बाद उनका मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को लिखा  वह पत्र सार्वजानिक हो गया जिसमें उन्होंने  आरोप लगाया कि गृह मंत्री  अनिल देशमुख ने  संदर्भित प्रकरण में गिरफ्तार किये गए चर्चित पुलिस अधिकारी सचिन वाजे   को प्रतिमाह डांस बार , रेस्टारेंट , होटल और ऐसे ही अन्य व्यवसायों से 100 करोड़ रु.  वसूली का लक्ष्य  दिया था |  ईमेल से भेजे उक्त पत्र की वास्तविकता को लेकर संदेह था किन्तु श्री सिंह ने स्पष्ट कर दिया कि वह उन्होंने ही भेजा था | जिस कार को लेकर सारा बवाल शुरू हुआ उसके मालिक की रहस्यमय मौत के बाद उसकी पत्नी ने  वाजे पर आरोप लगा दिए इसलिए बात आगे बढ़ गई वरना लीपापोती हो जाती | और फिर विस्फोटक मिलने से जांच में एनआईए कूट पड़ी जिसके बाद ये साफ होने लगा कि सचिन  के बारे में जो सुना जा रहा था वह उससे भी बहुत आगे है | सबसे बड़ी बात ये देखने में आई कि पूरी शिवसेना उसके बचाव में खड़ी थी | यहाँ तक कि श्री ठाकरे भी तरफदारी करते दिखे | इस पर राकांपा प्रमुख शरद पवार  ने उनसे मिलकर नाराजगी भी जताई जिसके बाद परमबीर का तबादला किया गया परन्तु  उन्होंने जो धमाका किया उससे श्री पवार के लिए शर्मनाक हालात बन गये | विपक्ष ने स्वाभाविक तौर पर गृहमंत्री को  तत्काल हटाये जाने की मांग उठा दी वहीं कांग्रेस ने भी उसके सुर में सुर मिला दिया | ऐसे में जो दबाव श्री ठाकरे पर था वह घूमकर श्री पवार पर आ गया क्योंकि उनकी कृपा से गृहमंत्री बने श्री देशमुख पर लगे  आरोप  से पूरी पार्टी निशाने पर आ गई | ये कहना भी गलत नहीं होगा कि श्री पवार द्वारा बनवाये गये किसी मंत्री की इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि वह उनको नजरअंदाज करते हुए इतनी बड़ी रकम अकेले हजम कर जाए | बहरहाल अभी तक की खबरों के अनुसार श्री पवार ने मामला मुख्यमंत्री पर ढाल दिया और ये भी कह  दिया कि सचिन को निलम्बन के बाद नौकरी पर बहाल करने में परमबीर का ही हाथ था | ऐसा कहकर शायद वे श्री ठाकरे पर निशाना साधना चाहते हैं जिनका वरदहस्त वाजे  की ताकत माना  जाता रहा | उल्लेखनीय है लम्बे समय  तक निलम्बित रहने  के दौरान वह शिवसेना में बतौर प्रवक्ता कार्यरत था और नौकरी में लौटते ही उसे एक के बाद एक महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिये गये जिनकी तरफ श्री पवार ने भी  इशारा किया | इस घटनाचक्र ने महाराष्ट्र सरकार के अस्तित्व पर भी  सवाल उठा दिए हैं क्योंकि वाजे के बुरी  तरह फंस जाने के बाद श्री पवार ने शिवसेना पर दबाव बनाने की जो कोशिश की थी वह परमबीर के आरोप के बाद उल्टी पड़ गई  और  छींटे  उनके दामन पर भी पड़ने लगे  | परमबीर से भी ये पूछा जा रहा है कि उन्होंने अपने तबादले के बाद ही इतने बड़े खुलासे का सहस क्यों दिखाया ? सवाल और भी हैं जिनका जवाब जांच से मिल सकता है और शायद  न भी मिले क्योंकि मुकेश अम्बानी के घर के बाहर मिली कार के मालिक की हत्या के बाद सारा ध्यान आकर  वाजे पर केन्द्रित हो गया | जाहिर है शिवसेना का वह प्रिय पात्र रहा है वरना परमबीर की क्या औकात थी जो  अचानक उसे बेहद ताकतवर बना दिया गया | जो कुछ भी  सामने आया है उसके बाद सचिन के भ्रष्ट और शातिर दिमाग  होने के साथ ही ये भी साफ़ हो चुका  है कि वह राज्य की  वर्तमान  सत्ता का खासमखास था और पुलिस की नौकरी उसके लिए महज दिखावा थी |  श्री ठाकरे की मुसीबत ये है कि गृहमंत्री को हटाये जाने से  पूर्व पुलिस कमिश्नर की चिट्ठी में लगाये गये आरोपों की प्रथम दृष्टया पुष्टि मान ली जायेगी जो श्री पवार को शायद ही पसंद आये  | यही वजह है कि न तो श्री देशमुख ने नैतिकता के आधार पर कुर्सी छोड़ने का बड़प्पन दिखाया और न ही उनके राजनीतिक आका श्री पवार ने उन्हें ऐसा करने का निर्देश दिया | गृहमंत्री को हटाये जाने का फैसला मुख्यमंत्री पर छोड़ने की उनकी टिप्पणी के पीछे भी राजनीति है जबकि उन जैसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता से अपेक्षा थी कि वे श्री देशमुख को निर्दोष  साबित होने तक सरकार से बाहर रहने का निर्देश देते | और ऐसे में विपक्ष का ये आरोप अपने आप में संज्ञान योग्य हो जाता है कि गृह मंत्री द्वारा की जा रही  कथित वसूली में उनकी पार्टी के उच्च नेतृत्व की भी भूमिका है | आश्चर्य इस बात का है कि महाराष्ट्र की इस संयुक्त सरकार के पालक - पोषक श्री पवार ही हैं | ऐसे में उनके द्वारा गृह मंत्री को हटाये जाने का मामला श्री ठाकरे पर छोड़ा जाना एक तरह से उन  पर  दबाव बनाने का तरीका है | सबसे बड़ी बात ये है कि एक कार को रहस्यमय तरीके से श्री अम्बानी के घर के सामने विस्फोटक सामग्री के साथ छोड़ जाने के मामले में वाजे की संलिप्तता का खुलासा होने के साथ ही उसके पास मिली महंगी गाड़ियां , सबूत नष्ट किये जाने का दुस्साहस और उसके बाद मिले राजनीतिक संरक्षण से जो बातें निकलकर सामने आईं वे सब गृहमंत्री पर लगाये गये आरोप से उड़ी धूल में दबाये जाने का चिर परिचित षड्यंत्र शुरू हो चुका है | परमबीर ने श्री देशमुख को घेरकर बर्र के छत्ते में पत्थर मार दिया है | जिसके बाद उद्धव पर हावी हो रहे श्री पवार सकपकाहट में हैं | इस आरोप के बाद परमबीर खुद को दूध का धुला साबित करने के अलावा वाजे को भी निरीह बताकर उसके गुनाहों पर पर्दा डालने का दांव चल रहे हैं , जिसके पीछे शिवसेना  की रणनीति हो तो अचंभा नहीं होगा |  लेकिन एक बात  आईने की तरह साफ है कि सचिन वाजे ने जो किया वह  अकेले उसके  बूते की बात नहीं थी | जाहिर है उसे ऊपरी  संरक्षण प्राप्त था अन्यथा वह इतना बड़ा अधिकारी नहीं था जो इतनी बड़ी घटना को इस आत्मविश्वास के साथ अंजाम देता कि उसको पकड़ने वाला कौन है ? परमबीर खुद को बचाने के  लिये हरिश्चंद्र बन रहे हैं या वे भी  सचिन वाजे की तरह किसी के मोहरे  हैं और  उद्धव सरकार रहेगी या जायेगी ये उतना महत्वपूर्ण नहीं रहा जितना ये कि परमबीर द्वारा लगाये आरोप पर अभी तक गृहमंत्री श्री देशमुख ने  कोई अनुशासनात्मक  या कानूनी कार्रवाई करने की  हिम्मत नहीं दिखाई | जहां तक जनता का सवाल है तो उसे पूरा विश्वास है कि इस मामले से जुड़े जितने भी पात्र सामने आये हैं उनमें से किसी का भी दामन बेदाग नहीं है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी