Wednesday, 6 October 2021

पेट्रोल – डीजल को जीएसटी में लाना सबसे बड़ा दीपावली उपहार होगा



 कल नवरात्रि से त्यौहारी मौसम का शुभारम्भ होने जा रहा  है | वर्षाकाल की समाप्ति के बाद आने वाली शारदेय नवरात्रि का महोत्सव पूरे देश में अलग – अलग तरीके से मनाया जाता है | इसके बाद ही दीपावली आती है | भारतीय पर्व परम्परा में दीपावली को व्यवसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इस दौरान छोटे – बड़े सभी अपनी हैसियत के मुताबिक खरीदी करते हैं | गत वर्ष भी नवरात्रि और दीपावली मनाई गयी किन्तु कोरोना का साया होने से बाजार में अपेक्षानुरूप रौनक नजर नहीं आई | सौभाग्य से इस वर्ष स्थिति सामान्य हो चली है | यद्यपि कोरोना के अंश अभी शेष हैं लेकिन तीसरी लहर को  लेकर जैसी  आशंकाएँ व्यक्त  की जा रही थीं वैसा नहीं हुआ | इसीलिये ये आशा की जा रही है कि दीपावली के दौरान ग्राहक खरीदी करने  बाजार में निकलेंगे | वैसे भी  बीते दो – तीन महीनों से कारोबारी जगत से अच्छे संकेत आने से भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में अंतर्राष्ट्रीय आकलन में भी सुधार हुआ है | औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों के गति पकड़ने का सबसे पारदर्शी  मापदंड है जीएसटी , जिसके संग्रह में लगातार वृद्धि होना ये दर्शाता है कि उत्पादक और उपभोक्ता दोनों  में उत्साह लौटा है | कोरोना संकट के समय कृषि जगत ने  शानदार प्रदर्शन किया जिससे देश में खाद्यान्न संकट की स्थिति नहीं बनी | उसी की वजह से सरकार 80 करोड़  लोगों को  मुफ्त अनाज देखर भूखे रहने से बचाने में  कामयाब रही किन्तु उद्योग और व्यापार बहुत  बुरे दौर से गुजरे | लम्बे – लम्बे दो लॉक डाउन की वजह से सब कुछ ठहर सा गया था | कोरोना के दूसरे हमले ने लोगों को जिस तरह भयभीत किया उसका असर बाजार पर भी प्रत्यक्ष दिखाई दिया | लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं | उत्पादन बढ़ने से एक तरफ जहां  कच्चे माल की खपत बढ़ रही है वहीं रोजगार के अवसर भी लौट रहे हैं | सबसे बड़ी बात ये देखने में आ रही है कि भारत के औद्योगिक उत्पाद अब  निर्यात किये जा रहे हैं | इससे व्यापार घाटा कम होने के साथ ही भारत के बारे में वैश्विक धारणा में सकारात्मक बदलाव आ रहा है | विदेशी निवेशकों द्वारा भारत में जिस बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है वह निश्चित तौर पर उत्साहित करने वाला है लेकिन इस सबके बीच पेट्रोल – डीजल की कीमतों का फिर से बढ़ने  लगना चिंता का कारण बन रहा है | खबर है कि कच्चे तेल के दाम 125 डॉलर प्रति बैरल की सर्वकालिक ऊँचाई को छूने वाले हैं | ऐसा होने पर भारत में इनकी कीमतों के 150 रु. प्रति लिटर तक पहुँचने की  आशंका है | चूँकि हमारा देश बैटरी चालित वाहनों के दौर में कदम रख ही रहा है इसलिए आने वाले एक दशक तक पेट्रोल और डीजल के बिना हमारी परिवहन व्यवस्था चल नहीं सकेगी | इनकी कीमतों का असर समूची अर्थव्यवस्था पर पड़ने से बाकी चीजों के दाम भी प्रभावित होते हैं | कोरोना काल के बाद भारत में महंगाई जिस तेजी से बढ़ी उसमें पेट्रोल – डीजल की कीमतों का भी योगदान है | बीते महीने जीएसटी कौंसिल की  बैठक में पेट्रोलियम पदार्थों को भी उस दायरे में लाने की चर्चा चली लेकिन राज्यों के बीच  सर्वसम्मति न बन पाने से  बात नहीं बनी | लेकिन अर्थव्यवस्था को  जनोन्मुखी बनाना है तो केंद्र सरकार को राज्यों से बात कर उनको पेट्रोलियम पदार्थों को भी जीएसटी के अंतर्गत लाने के लिये राजी करना चाहिए | इस बारे में व्यवहरिक नजरिये से देखें तो पेट्रोल – डीजल जैसी चीजें सस्ती होने से बाकी सबकी कीमतें भी उसी अनुपात में घटेंगी जिससे बाजार में मांग बढ़ने के फलस्वरूप सरकार के पास आने वाला जीएसटी उतना ही रहेगा | दीपावली के अवसर पर सरकार जनता को तरह – तरह की राहतें बतौर उपहार देती है | इस वर्ष यदि पेट्रोल – डीजल आदि को जीएसटी के दायरे में ले आया जाए तो वह उपभोक्ता  और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए अच्छा कहा जाएगा | कोरोना काल में सरकार द्वारा अपनाई गई नीति का औचित्य तो साबित किया जा सकता है किन्तु अब जबकि गाड़ी पटरी पर आती दिख रही है और उससे प्रभावित होकर सरकार भी आर्थिक सुधार लागू करने के बारे में साहसिक कदम उठाने का हौसला  दिखा रही है तब पेट्रोल - डीजल को भी जीएसटी की सूची में शामिल किया जाए तो वह मौजूदा हालात में सबसे बड़ा आर्थिक सुधार होगा | हालाँकि आर्थिक विषयों पर सुझाव देना बड़ा आसान होता है किन्तु जहां तक सवाल पेट्रोल – डीजल का है तो उनको जीएसटी के अंतर्गत लाने में जिस तरह की रुकावटें बताई जाती हैं वे व्यर्थ के बहाने हैं | केंद्र सरकार के सामने दीपावली एक अवसर है | उसे चाहिए वह जीएसटी कौंसिल की बैठक अविलम्ब बुलाकर पेट्रोल – डीजल को भी उसके दायरे में लाने हेतु अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए राज्यों को नुकसान की भरपाई हेतु आश्वस्त करे तो उसका अर्थव्यवस्था पर अनुकूल असर पड़ना तय है | पैसा जितनी बार घूमेगा सरकार को उतना कर मिलेगा | सरकार के सलाहकार उसे इतनी आसान बात नहीं समझा पा रहे ये आश्चर्य का विषय है |

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 5 October 2021

लखीमपुर और जालंधर के संकेत : किसान नेताओं के हाथ से निकल रहा आन्दोलन



उ.प्र के लखीमपुर खीरी जिले में बीते रविवार हुई घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण थी जिसमें चार किसानों सहित तीन भाजपा कार्यकर्ता और एक वाहन  चालक मारे गये | प्रथम दृष्टया ये माना जा रहा है कि केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्र के बेटे ने उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के काफिले को रोक रहे किसानों पर अपना वाहन चढ़ा दिया जिससे चार किसान मारे गये | उस पर  नाराज किसानों के झुण्ड ने कुछ  वाहनों में आग लगाने के साथ ही  तीन भाजपा कार्यकर्ताओं तथा  एक चालक को पीट – पीटकर मार डाला | बताया जाता है श्री मौर्य को लखीमपुर खीरी के साथ ही श्री मिश्र के ग्राम बनवीरपुर जाना था | पहले उनके आने का कार्यक्रम हेलीकॉप्टर से था किन्तु किसानों ने हेलीपैड पर कब्जा कर लिया | इस पर श्री मौर्य सड़क मार्ग से आ रहे थे तब उनका रास्ता रोककर  किसान खड़े हो गये | दरअसल श्री मिश्र द्वारा कुछ दिनों पहले  दिए गये कथित धमकी भरे बयान से स्थानीय किसानों में काफी नाराजगी थी | उक्त घटना की खबर आते ही राजनीति शुरू हो गई | राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के नेतागण लखीमपुर खीरी जाने के लिए बेताब हो उठे | त्यागपत्र मांगे जाने की औपचारिकता का निर्वहन होने लगा | इसके पीछे किसानों से हमदर्दी कम और उ.प्र विधानसभा के आगामी चुनाव में वोटों की फसल काटने का मंसूबा ज्यादा था | लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 24 घंटे के भीतर किसानों की नाराजगी दूर करते हुए मृतकों के परिवारों लिए आर्थिक क्षतिपूर्ति और  आश्रित को सरकारी नौकरी के अलावा घायलों को भी समुचित मदद की व्यवस्था करवाकर आग में तेल डालने वालों की कोशिशों को नाकाम कर दिया | किसान नेताओं के अलावा बाकी को घटनास्थल तक आने से रोकने हेतु जरूरी कदम भी उठाये | घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप लखनऊ में भी पुलिस के वाहन जलाये गये  | अब विवाद का मुद्दा श्री मिश्रा को मंत्री पद से हटाये जाने और किसानों को कुचलने के आरोपी उनके बेटे को सजा दिलाना है | पुलिस ने उसके विरुद्ध मामला दर्ज करने के साथ ही अनेक लोगों पर बलवे का आरोप भी लगाया है | वीडियो फुटेज से ये बात भी सामने आई है कि आन्दोलनकारियों के हाथ में लाठियां थीं | यही नहीं उनमें शामिल कुछ सिख युवक जरनैल सिंह भिंडरावाले के चित्र वाली शर्ट भी पहने हुए थे | किसानों से हमदर्दी रखने वालों का तर्क है कि उनके चार साथियों को मंत्री पुत्र द्वारा बेरहमी से कुचलकर मार दिए जाने के बाद  तीन भाजपा कार्यकर्ताओं सहित एक वाहन चालक को बुरी तरह पीटकर मार डालने की घटना क्रिया की प्रतिक्रिया थी | उ.प्र सरकार की तत्परता से भले ही लखीमपुर खीरी में फिलहाल शांति नजर आ रही हो लेकिन इस घटना के बाद किसान आन्दोलन के भटकने  का खतरा बढ़ रहा है | ऐसा लगता है आंदोलन का नेतृत्व करने वाले नेताओं का उस पर नियन्त्रण खत्म हो चुका है | रविवार को घटनास्थल पर उपस्थित रमन कश्यप नामक पत्रकार किसानों की भीड़ द्वारा पीटे जाने पर बुरी तरह घायल  हो गया था , जिसकी गत दिवस मृत्यु हो गयी | कल वहां गये पत्रकारों के साथ भी दुर्व्यवहार करते हुए उनको खदेड़ दिया गया |  राज्य सरकार ने घटना की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिये हैं | किसानों को अपनी मांगों के लिए धरना प्रदर्शन किये जाने का पूरा अधिकार है | कोई मंत्री पुत्र यदि सता के नशे में चूर होकर उन्हें वाहन से कुचलने जैसा जघन्य कृत्य करे तो उसे कठोर दंड मिलना चाहिए | लेकिन हत्या तो हत्या है , चाहे किसी को हो | इसलिए इस घटना का एकतरफा विश्लेषण सही नहीं है | किसानों द्वारा हेलीपैड पर कब्जा करना कहाँ तक जायज था इसका जवाब भी मिलना चाहिए | क्रिया की प्रतिक्रिया के नाम पर जिन लोगों को मार दिया गया , यदि उनके परिजन भी वैसी ही प्रतिक्रिया व्यक्त करने को तैयार हो गये तब क्या उनके कृत्य को भी सही ठहराया जाएगा ? किसानों का समर्थन करने वाले राजनीतिक दलों को ये समझ में आ जाना चाहिए कि आन्दोलन को भड़काकर वे शेर की पीठ पर सवार होने की हिमाकत तो कर बैठे किन्तु अब उनसे उतरते नहीं बन रहा | पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह किसान आन्दोलन की आग को भड़काने में अग्रणी थे  | लेकिन आखिर में वे भी परेशान  होकर कहने लगे कि आन्दोलन से पंजाब के विकास पर बुरा असर पड़ रहा है | गत दिवस पंजाब के जालंधर में कांग्रेस विधायक बलविन्दर सिंह लाडी को एक धार्मिक समागम में जाने पर मौजूद किसानों के विरोध का सामना करना पड़ा | किसानों ने उन पर पत्थर और बर्तन फेंके जिसके  बाद उनको गुरुद्वारे में छिपकर जान बचानी पड़ी | लखीमपुर खीरी में एक पत्रकार की हत्या और दूसरे दिन वहां दौरे पर गये पत्रकारों को धमकाकर भगाना , किसान आन्दोलन के अराजक होने का साक्षात प्रमाण है | इसके पहले भी राजनीतिक नेतागण किसानों के धरने  और सभाओं में जाते रहे | भले ही उनको मंच नहीं दिया गया किन्तु उनके साथ दुर्व्यवहार भी नहीं हुआ | पत्रकारों ने भी शुरू  से ही आन्दोलन को सुर्ख़ियों में रखा | लेकिन जिस तरह के संकेत  अब मिलने लगे हैं उससे  किसान नेताओं के साथ ही राजनीतिक नेताओं को भी सावधान हो जाना चाहिए | चुनाव और राजनीति अपनी जगह हैं लेकिन आन्दोलन के नाम पर अराजकता को स्वीकार नहीं किया जा सकता | गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने भी किसान आन्दोलन के जारी रहने  पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब उसने कृषि कानूनों पर रोक लगा रखी है और मामला उसके विचाराधीन है , तब प्रदर्शन क्यों किया जा रहा है ? सवाल और भी हैं लेकिन आन्दोलन के दिशा से भटकने के कारण जवाबदेही किसकी है ये तय कर पाना कठिन है |  सर्वोच्च न्यायालय ने भी ये सवाल उठाया  है | बेहतर होगा किसान आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले कथित नेता और उसका समर्थन कर रहे राजनीतिक दल इस बात का गम्भीरता से  संज्ञान लें कि उसे दिशाहीन होने से किस तरह बचाया जावे ? देश का आम किसान आन्दोलन की विधाओं में न तो पारंगत है और न ही अभ्यस्त | इस कारण ये  आशंका बढ़ती जा रही है कि उनके नाम पर उपद्रवी तत्व ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर देंगे जिनसे किसानों की न्यायोचित मांगें भी दम तोड़ बैठें | लखीमपुर खीरी की घटना के जिम्मेदार लोगों को कड़ा दंड मिलना चाहिए फिर  चाहे वह मंत्री पुत्र हो या दूसरे उपद्रवी | क्रिया की प्रतिक्रिया का उल्लेख किस सन्दर्भ में जायज है ये भी समझना जरूरी है , वरना जंगल राज को रोकना कठिन हो जाएगा | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 October 2021

बिना मेकअप वाला चेहरा एक बार फिर उजागर



यदि इस मामले में शाहरुख़ खान का बेटा शामिल नहीं होता तब शायद ये साधारण सी खबर से ज्यादा कुछ नहीं  थी | ड्रग्स और रेव पार्टी धनकुबेरों और भ्रष्ट नौकरशाहों की बिगड़ैल औलादों के बीच आम होती जा रही हैं | इस जमात में अब नव धनाड्यों के बेटे – बेटियाँ भी शामिल होने लगे हैं | ऐसी पार्टियों में क्या होता है ये सर्वविदित है | लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि फिल्मी दुनिया के नामी – गिरामी सितारों द्वारा  ड्रग्स के उपयोग के साथ उसके कारोबार से जुड़े होने के मामले लगातार सामने आने से  लगने लगा है कि उसकी सतही चमक – दमक के नीचे  कितनी कालिमा है ? सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के साथ भी ड्रग्स का जुड़ाव उजागर हुआ था | अनेक अभिनेता और अभिनेत्रियाँ पूछताछ के घेरे में आये  | उन तक नशीली दवाएं पहुँचाने वालों की भी धरपकड़ हुई | करन जौहर नामक  निर्माता के घर हुई एक पार्टी का  वीडियो सामने आने के बाद उसमें ड्रग्स के सेवन का हल्ला मचा था | धीरे – धीरे ये बात सामान्य रूप से मान ली गई है कि फिल्म उद्योग में शराब पार्टियाँ अब पुराने दौर की बात हो चली हैं और नई पीढ़ी में ड्रग्स की लत बढ़ती जा रही है | लेकिन बात अब इससे भी आगे बढ़ते हुए फ़िल्मी कलाकारों के बेटे – बेटियों तक आ गई है | कई दशक पहले सुनील दत्त जैसे प्रतिष्ठित अभिनेता के पुत्र संजय दत्त को ड्रग्स की लत लग गई थी |  उनका अमेरिका में इलाज करवाया गया |  बाद में वे अवैध हथियार रखने के अपराध में जेल भी गये | फ़ीरोज खान के बेटे फरदीन खान भी ड्रग्स के कारण अभिनय की दुनिया से बाहर हो गये |  बीते शनिवार की रात मुम्बई से गोवा के लिए रवाना हुए एक क्रूज में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने छापा मारकर रेव पार्टी में ड्रग्स  के उपयोग का पर्दाफाश  करते हुए उसमें शामिल कुछ लोगों के पास से ड्रग्स जप्त भी किये | उन्हीं  लोगों में शाहरुख खान के बेटे आर्यन भी शामिल थे जिन्हें ब्यूरो ने पूछ्ताछ के बाद गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया जहाँ से उन्हें और उनके दो साथियों को एक दिन के लिए उसकी अभिरक्षा में भेज दिया गया | आर्यन ने ड्रग्स का सेवन किया या उसके पास से ड्रग्स जप्त हुए इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई किन्तु एक बात साफ़ है कि वे  उस पार्टी में शामिल थे | उनके अधिवक्ता ने बचाव में दावा किया कि आर्यन अति विशिष्ट अतिथि के रूप में पार्टी में आमंत्रित थे | उनसे क्रूज़ की टिकिट और पार्टी की फीस भी नहीं ली गई | कहा जा रहा है उक्त पार्टी का आयोजन करने वाली इवेंट मैनेजमेंट कम्पनी ने आर्यन को आमंत्रित किया था ताकि उनके नाम से आकर्षित होकर ज्यादा से ज्यादा लोग पार्टी में आयें | लेकिन ये बात भी सामने आई है कि अरबाज नामक युवक के पास से ड्रग्स मिले हैँ | दिल्ली के किसी संपन्न परिवार से जुड़े अरबाज से आर्यन की घनिष्ठता है | बहरहाल आर्यन की गिरफ्तारी ने इस प्रकरण को देश – विदेश में चर्चित कर दिया | सबसे बड़ी बात उसके  द्वारा दिए गये इस बयान  में निहित है कि अब्बू ( पिताजी ) ने  आगाह करते हुए कहा था कि नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो वाले इस समय चारों तरफ हैं | इसलिए कहीं भी जाना तो सोच – समझकर जाना और बचकर रहना | उसके इस खुलासे से ये संदेह होना स्वाभाविक है कि शाहरुख को पार्टी में ड्रग्स के इस्तेमाल का अंदेशा था | इसीलिए उन्होंने बेटे को सावधान  करते हुए बचकर रहने की समझाइश दी | एक पिता द्वारा घर से बाहर जाते समय अपने बेटे को सतर्क  रहने की सलाह दिया जाना आम बात  है | लेकिन नारकोटिक्स कंट्रोल  ब्यूरो के चारों  तरफ होने  जैसी चेतावनी से लगता है शाहरुख़ को या तो आर्यन को  ड्रग्स  की लत लग जाने की जानकारी थी या फिर वे पार्टी में होने वाले क्रियाकलापों से अवगत थे | ये भी सम्भव है जिस पेशेवर इवेंट मैनेजमेंट कम्पनी  ने वह आलीशान पार्टी आयोजित की उसके द्वारा आर्यन को मुफ्त में  विशेष मेहमान बनाकर बुलाया जाना भी शाहरुख की जानकारी में हुआ व्यवसायिक सौदा हो क्योंकि फ़िल्मी दुनिया में ऐसा होता   है | सबसे बड़ी बात ये है कि आर्यन को जिस तरह की चेतावनियाँ  शाहरुख द्वारा दी गईं उनके बाद उसे पार्टी में जाने देना भी  अटपटा था | लेकिन फ़िल्मी हस्तियों की निजी ज़िन्दगी परदे पर दिखने वाली भूमिका से सर्वथा अलग होती है | फ़िल्मी पार्टियों में जो कुछ होता है उस पर तो फिल्म भी बन चुकी है | लेकिन जिस तेजी से वहां प्रतिबंधित नशीली  दवाइयों के उपयोग की खबरें आने लगी हैं और दिग्गजों की संतानों के साथ ही नवोदित अभिनेता और अभिनेत्रियाँ  इस बुराई में लिप्त हो रही हैं उससे  अपराध भी  बढ़ रहे हैं  | रहस्यमय आत्महत्याएँ और यौन शोषण की शिकायतें अब चौकाती नहीं | जिस पार्टी से आर्यन को पकड़ा गया उसका आयोजन बड़े ही व्यवस्थित और गोपनीय तरीके से किया गया था | जाहिर है उसमें शरीक लोग आम हैसियत वाले तो होंगे नहीं | इसलिए उनको बचाने के लिए बड़े – बड़े वकील खड़े किये जायेंगे | उक्त प्रकरण में 8 - 10 लोग गिरफ्तार किये जा चुके हैं | हो सकता है आर्यन को दो दिन बाद जमानत भी मिल जाये | लेकिन उसकी पार्टी में मौजूदगी तो अकाट्य सत्य है और ये भी कहना पूरी तरह गलत नहीं  लगता कि शाहरुख को भी क्रूज की उस पार्टी के बारे में पूरी तरह न सही किन्तु हल्का – हल्का पता तो था | सच्चाई जो भी हो लेकिन इस मामले ने एक बार फिर फिल्मी दुनिया के चमकदार चेहरे का मेकअप उतारकर रख दिया है | बीते एक दो साल में फिल्म जगत ड्रग्स के शिकंजे में जिस तरह फंसता नजर आया है उसके कारण उसे लेकर उड़ने वाली अफवाहों को सच मान लेने का दिल करता है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 2 October 2021

जनता को परेशान करने वाले आन्दोलन सहानुभूति खो बैठते हैं



 सर्वोच्च न्यायालय ने संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा दिल्ली के प्रवेश मार्गों पर दिए जा रहे  धरने के कारण आवागमन में हो रही परेशानियों पर जिस तरह नाराजगी व्यक्त की वह पूरी तरह न्यायोचित और जनहितकारी है | अनेक महीनों से दिल्ली आने – जाने वाले लाखों लोगों को किसानों द्वारा व्यस्त मार्गों पर अपना डेरा जमाये जाने से प्रतिदिन मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा  है | दूध और सब्जियों जैसी  आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित होने के साथ ही दफ्तर जाने – आने वालों को लम्बे रास्ते का उपयोग करना पड़ता है जिससे उनके समय और ईंधन दोनों का अपव्यय होता है | केंद्र के अलावा हरियाणा और उ.प्र की सरकार चाहतीं  तो बलपूर्वक आन्दोलनकारियों  को खदेड़ सकती थीं किन्तु  वैसा करने से हिंसा पनप सकती थी  | और फिर पुलिस द्वारा की जाने वाली कार्रवाई में निर्दोष लोग भी लपेटे में आ जाते हैं | धरना स्थल से उठाये जाने वाले आन्दोलनकारी लौटते समय रास्ते  में उत्पात मचाते इस बात का भी डर था | गणतंत्र दिवस पर  दिल्ली में शांतिपूर्ण आन्दोलन के नाम पर जो तांडव किया गया उसके मद्देनजर भी सरकार और पुलिस फूंक – फूंककर कदम रखते रहे | किसानों के नाम पर उपद्रव करने वाले अपने मंसूबों में कामयाब न हो जाएँ ये चिंता भी सरकारी एजेंसियों को सताती रही | यही कारण था कि आन्दोलनकारी किसानों पर किसी भी तरह के बलप्रयोग को टाला गया  | यद्यपि इससे सरकार की कमजोरी भी सामने आती रही | ऐसा ही शाहीन बाग़ में मुस्लिम समुदाय द्वारा बीच सड़क पर दिए गये धरने में देखने मिला था | यदि कोरोना न आया होता तब शाहीन बाग का धरना भी क्या पता अनिश्चितकालीन जारी रहता क्योंकि जिस नागरिकता संशोधन क़ानून के विरुद्ध वह आन्दोलन किया गया उसे वापिस लेने के प्रति केंद्र  सरकार ने लेशमात्र भी रूचि नहीं दिखाई और न ही आन्दोलनकारियों से बातचीत ही की गई | सर्वोच्च न्यायालय के सामने वह विषय भी आया था जिस पर उसने वार्ताकार भी नियुक्त किये  | बाद में कोरोना के कारण शाहीन बाग़ खाली कारवाया गया | ज़ाहिर है संयुक्त किसान  मोर्चा के कर्ताधर्ताओं को भी उसी से सड़क घेरकर दबाव बनाने की प्रेरणा मिली | ये बात भी सही है कि जो तबका शाहीन बाग़ में सड़क कब्जाकर बैठने वालों को उकसाता रहा वही किसान आन्दोलन में घुस आया | लेकिन इस बार मामला लम्बा खिंच गया | शुरुवात में तो किसानों को अन्नदाता मानकर जनता ने तकलीफों को सहा भी किन्तु जब लोगों को लगा कि आन्दोलन में राजनीति घुस आई है तो समाज के बड़े वर्ग में उसे लेकर उदासीनता आ गई | और फिर जब उसमें खलिस्तानी और नक्सली तत्वों की  घुसपैठ का खुलासा होने लगा तब लोगों में गुस्सा बढ़ने लगा | लेकिन संतोष का विषय ये रहा कि कोई विवाद नहीं हुआ | समस्या बढ़ती देख कुछ लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ाई दिखाते हुए  संयुक्त किसान  मोर्चे से तीखे सवाल करते हुए उनके तर्कों को बेमानी ठहराया | इस बारे में अंतिम फैसला अब देश की सबसे बड़ी अदालत को करना है किन्तु जैसा होता आया है उस आधार पर देखें तो न्यायपालिका अंततः कार्यपालिका ( सरकार ) पर ही आन्दोलन से निपटने की जिम्मेदारी डाल देगी क्योंकि कानून व्यवस्था बनाये रखना उसकी जिम्मेदारी है | किसानों का कहना है उनको दिल्ली के भीतर स्थित जंतर मंतर पर धरने की अनुमति दी जाए | लेकिन सरकार को अंदेशा है कि ऐसा करने से राजधानी की व्यवस्था चौपट हो जायेगी | चूँकि केंद्र सरकार और संयुक्त किसान मोर्चा के बीच संवाद प्रक्रिया पूरी तरह रुकी हुई है  इसलिए आन्दोलन खत्म नहीं  किया जा रहा | हालाँकि सरकार इस बात से मन ही  मन खुश है कि उसकी धार दिन ब दिन कमजोर होती जा रही है | वहीं किसान नेताओं को भी ये पता है कि एक बार धरना समेट लिया गया तो दोबारा किसानों को बुलाना असम्भव हो जाएगा | इसीलिए वे आन्दोलन को किसी न किसी तरह जीवित तो  रखे हुए हैं किन्तु उसके कारण जनजीवन पर जो बुरा असर पड़ रहा है वह चिंता का विषय है | हमारे देश में सड़क बनाई  तो चलने के लिये जाती है लेकिन उस पर चका जाम जैसे आयोजन भी धड़ल्ले से होते  हैं जिसके लिए अपराध भी पंजीबद्ध किया जाता है लेकिन सजा अपवादस्वरूप ही किसी को मिली होगी | दिल्ली में चल रहे किसानों के धरने के विरुद्ध कोई मामला दर्ज हुआ या नहीं ये तो पता नहीं लेकिन हुआ  हो तो भी अब तक किसी पर कार्रवाई नहीं होने से ये लगता है कि कानून – व्यवस्था लागू करने वाले भी भीड़ के दबाव के आगे लाचार होकर रह जाते हैं | सबसे बड़ी बात ये है कि ऐसे धरने आदि से चूँकि केवल जनता को परेशानी होती है इसलिए पुलिस और प्रशासन भी ढील दिए रहता है | लेकिन जिस रास्ते से वीआईपी तबका निकलता है उस पर किसी भी प्रकार की बाधा खड़ी करने वालों को बिना देर किये बलपूर्वक हटा दिया जाता है | शाहीन बाग़ के धरने को संचार माध्यमों के साथ ही एक वर्ग विशेष द्वारा जिस तरह से महिमामंडित किया गया उससे इस तरह के आयोजनों को प्रोत्साहन मिला वरना किसान आन्दोलन के नेता उसका अनुसरण नहीं करते | सर्वोच्च न्यायालय ने आन्दोलनकारियों को जिस तरह से लताड़ लगाई उससे तो यही  संकेत मिला है कि वह सड़क घेरकर जनता के लिए परेशानी पैदा करने के तरीके पर स्थयी रूप से रोक लगा देगा | हालाँकि इसके लिए भी वह केंद्र सरकार को ही आदेश जारी करेगा किन्त्तु राजनीतिक दलों के साथ ही जनता से जुड़े संगठनों का भी ये फर्ज है कि वे अपनी मांगों के  लिए किये जाने वाले आंदोलनों में आम जनता की परेशानियों का भी ध्यान रखें वरना वे  जन समर्थन और सहानुभूति  खो बैठते हैं | किसान आन्दोलन के साथ  भी वैसा ही हो रहा है |


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 1 October 2021

बशर्ते अपनी बात खुद ही न भूल जाएं दिग्विजय



म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह रास्वसंघ और भाजपा के कटु आलोचक हैं | राजनीति के जानकारों के अनुसार उनके बयानों से भाजपा को फायदा ही मिलता है क्योंकि वे  हिन्दू मतों के  ध्रुवीकरण में सहायक बन जाते  हैं | लेकिन गत दिवस उन्होंने न सिर्फ संघ वरन केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह की  भी तारीफ सार्वजनिक मंच से कर डाली | यद्यपि वह एक गैर  राजनीतिक कार्यक्रम था जिसमें 2018 के विधान सभा चुनाव के पूर्व उनके द्वारा सपत्नीक की गयी नर्मदा परिक्रमा पर लिखित पुस्तक का विमोचन किया गया | दिग्विजय ने यात्रा के दौरान गुजरात में श्री शाह द्वारा उनकी समुचित व्यवस्था हेतु शासकीय अधिकारियों को निर्देश दिए जाने के लिए उनकी  प्रशंसा करते हुए कहा कि वे उनके सबसे बड़े आलोचक होने के बावजूद भी उनकी उस सदाशयता से प्रभावित हुए  और आमने - सामने मुलाकात न होने पर भी उन्हें इस हेतु आभार प्रेषित किया | इसी के साथ ही श्री सिंह ने रास्वसंघ की तारीफ़ करते हुए कहा कि उसके स्वयंसेवक यात्रा के दौरान उनसे मिलने आते रहे और अनेक स्थानों पर उन्होंने  उनके लिए व्यवस्था भी की , जिसके लिए उन्हें संगठन द्वारा  निर्देशित किया गया था | हालाँकि संघ के कार्यकर्ताओं की कर्मठता की प्रशंसा के बावजूद श्री सिंह ने इस हिन्दू संगठन की नीतियों से अपनी असहमति और विरोध को नहीं छिपाया किन्तु साफ – साफ़ शब्दों में कहा कि गुजरात के जंगली इलाकों में जब वे मुश्किल में फंसे थे तब वन विभाग के एक अधिकारी ने उनके पास आकर कहा कि श्री शाह के स्पष्ट निर्देश हैं कि उनको कोई परेशानी नहीं  होनी चाहिए | कांग्रेस नेता ने ये भी बताया कि वे संघ द्वारा संचालित एक धर्मशाला में भी रुके जहाँ उसके संस्थापाक डा. हेडगेवार और द्वितीय संघप्रमुख माधव राव सदाशिवराव गोलवलकर के चित्र लगे थे | लेकिन इन सबके बीच श्री सिंह की ये टिप्पणी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रही कि ये राजनीतिक सामंजस्य का वह उदाहरण है जिसे हम कभी – कभी भूल जाते हैं | स्मरणीय है हाल ही में उन्होंने रास्वसंघ की तुलना तालिबान से की थी | संघ विचारधरा से प्रेरित सरस्वती शिशु मंदिर के बारे में उन्होंने कहा कि वहां साम्प्रदायिकता के बीज बोये जाते हैं | बीच – बीच में अपने पूजापाठी सनातनी हिन्दू होने के दावे भी वे करते  हैं | उनकी नर्मदा परिक्रमा  को  2018 के विधानसभा चुनाव में हिन्दू विरोधी छवि से उबरने की कोशिश से भी जोड़ा गया था | उस यात्रा वृतांत पर आधारित पुस्तक के विमोचन पर वे गैर राजनीतिक चर्चा करते हुए अपने अनुभव श्रोताओं से साझा कर लोगों को तत्संबंधी सुझाव भी दे सकते थे लेकिन उन्होंने श्री शाह और रास्वसंघ की प्रशंसा कर सुर्खियाँ बटोर लीं | बतौर राजनेता उनकी इन बातों में भी राजनीतिक संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं | म.प्र में होने जा रहे कुछ उपचुनावों के ठीक पहले उनके द्वारा संघ की प्रशंसा के पीछे भी किसी राजनीतिक मंतव्य से इंकार नहीं किया जा सकता | लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है कि राजनीति  में दिन ब दिन बढ़ती कड़वाहट के बीच सार्वजानिक तौर पर इस तरह की बातें ताजी हवा के झोंके समान प्रतीत होती हैं | भले ही श्री सिंह ने  नर्मदा परिक्रमा के दौरान केन्द्रीय गृह मंत्री और रास्वसंघ से मिले सहयोग की प्रशंसा करने के बावजूद उनसे अपने वैचारिक मतभेदों को भी अभिव्यक्त किया किन्तु राजनीतिक सामंजस्य को याद रखने की उनकी समझाइश इस बात का संकेत है कि सैद्धांतिक विरोध के बावजूद सौजन्यता और सदाशयता को बरकरार रखा जाना चाहिए | दुर्भाग्य से आज की  भारतीय राजनीति में वे दोनों ढलान पर हैं | कड़वाहट पैदा करने वालों में खुद दिग्विजय सिंह भी सबसे आगे रहते हैं | जिस संघ को वे तालिबान जैसा मानते हुए उस पर देश तोड़ने का आरोप लगाया करते हैं उसी के कार्यकर्ता उनकी सहायता और व्यवस्था में जुटे रहे और श्री सिंह ने भी उससे परहेज नहीं किया | निश्चित रूप से इस तरह की बातों से एक – दूसरे को समझने में सहायता मिलती है | केन्द्रीय गृह मंत्री ने जो सौजन्यता दिखाई वह दरअसल एक राजनेता द्वारा  दूसरे के  प्रति प्रदर्शित सद्भाव था जो लोकतंत्र की मूल भावना को पोषित करती है | इसी तरह संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा श्री सिंह को प्रदत्त सहयोग एक हिन्दू नर्मदा भक्त के लिए था न कि कांग्रेस के दिग्गज नेता को खुश करने का प्रयास | वैसे इस बात के लिए उनकी तारीफ की जानी चाहिए कि उन्हें  अपने घोर विरोधी नेता और संगठन में कुछ तो अच्छाई नजर आई | बीते स्वाधीनता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से आजाद भारत के निर्माण में पंडित जवाहरलाल नेहरु के योगदान का उल्लेख करते हुए सबको  चौंका दिया था | भाजपा विरोधी अनेक नेता भी स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक सौजन्यता के लिए उनकी प्रशंसा करते हैं | एक दौर वह भी था जब संसद में सत्ता पक्ष  और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक के बावजूद व्यक्तिगत सम्बन्ध बेहद सहज और आत्मीयता भरे होते थे | लेकिन बीते दो दशक में राजनीतिक सौजन्यता गहराई में दफन हो गयी | इसके लिए कौन दोषी है ये तय कर पाना बेहद कठिन है किन्तु दिग्विजय सिंह द्वारा राजनीतिक सामंजस्य को भूल जाने की जो बात कही गई उसे वे खुद नहीं भूलें तो ये माना जाएगा कि उनका मन साफ़ है | केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने एक बार कहा था कि यदि कोई साम्यवादी मिलता है तो वे उसे विशेष सम्मान देते हैं क्योंकि वह  वैचारिक तौर पर प्रतिबद्ध है | उनकी बात अनुकरणीय है क्योंकि जो भी अपनी विचारधारा के प्रति समर्पित होता है उसकी सैद्धांतिक ईमानदारी का सम्मान किया जाना चाहिए |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 September 2021

कांग्रेस के हाथ से उड़ता पंजाब



 पंजाब ही नहीं बाकी और भी राज्यों में जो हो रहा है उससे कांग्रेस की अंतर्कलह  सामने आने के साथ ही शीर्ष नेतृत्व के घटते असर का भी अंदाज लग रहा है | पंजाब में नवजोत सिद्धू को जिस तरह खुला हाथ देकर राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा ने कैप्टेन अमरिंदर सिंह को हटवाया उसका दुष्परिणाम इतनी जल्दी सामने आने लगेगा ये किसी ने नहीं सोचा था | अमरिंदर द्वारा बगावत की आशंका तो स्वाभाविक ही थी लेकिन सिद्धू और उनके समर्थित मुख्यमंत्री चरनजीत सिंह चन्नी के बीच इतनी जल्दी तलवारें खिंच जायेंगी ये देखकर आश्चर्य हो रहा है | दो दिन पूर्व ज्योंहीं सिद्धू द्वारा प्रदेश अध्यक्ष पद छोड़ने की खबर आई त्योंही ये साफ़ हो गया कि पंजाब में मुख्यमंत्री बदलने का दांव उल्टा पड़ गया | इंदिरा गांधी के दौर में जब इस तरह कांग्रेस शासित  राज्यों में सत्ता परिवर्तन किया जाता था तब आलाकमान उसी तरह ताकतवर हुआ करता था जैसे आज भाजपा में है | लेकिन जब राहुल गांधी के नेतृत्व पर पार्टी के भीतर ही सवाल उठ रहे थे और पंजाब के ही वरिष्ठ नेता सिद्धू को जबरन लादे जाने के विरुद्ध खुलकर बोल चुके थे  तब उन्हें सर्वाधिकार संपन्न बनाने का निर्णय राजनीतिक अपरिपक्वता ही थी  | बतौर सांसद और विधायक भले ही उनका राजनीतिक जीवन दो दशक पुराना हो और वाकपटुता के कारण वे हर जगह छा जाते हों लेकिन संगठन चलाने का उनका अनुभव शून्य था | भाजपा से निकलने के बाद कांग्रेस ने उन्हें अपनी गोद  में बिठाकर एक तरह से उनका राजनीतिक पुनर्वास ही किया था |  उसके पहले वे अरविन्द केजरीवाल से सौदेबाजी करते रहे किन्तु मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बनाये जाने के कारण आम आदमी पार्टी में नहीं गये | कांग्रेस ने उनकी मंशा पहिचानने में  भूल की या उनकी क्षमता का जरूरत से ज्यादा आकलन कर लिया ये विश्लेषण का विषय हो सकता है लेकिन सिद्धू को गांधी परिवार ने जिस तरह आगे बढ़ाया वह राजनीतिक चातुर्य की दृष्टि से बहुत ही कमजोर  कदम था | कैप्टेन  अमरिंदर सिंह बहुत अच्छी सरकार चला रहे हों ऐसा नहीं था  किन्तु  वे राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी जरूर हैं |  उस आधार पर राहुल और प्रियंका को चाहिए था  कि विधानसभा चुनाव हो जाने के बाद मुख्यमंत्री पद का फैसला करवाते लेकिन  सिद्धू की महत्वाकांक्षा के सामने वे लाचार नजर आये |  उनको ये तक समझ नहीं आया कि अमरिंदर विरोधी खेमा भी सिद्धू को बतौर विकल्प स्वीकार नहीं करेगा | विधायक दल की बैठक में सिद्धू को खास समर्थन नहीं मिलने के बाद भी उनके दबाव में  दलित मुख्यमंत्री  के नाम पर चन्नी की ताजपोशी को भले ही राजनीतिक तौर पर तुरुप का पत्ता प्रचारित किया गया किन्तु चुनाव के ठीक पहले एक कमजोर मुख्यमंत्री को लादने का जो नुकसान आशंकित था वह चार दिनों में ही सामने आ गया | सिद्धू ने कठपुतली की तरह चन्नी को नचाना चाहा किन्तु राजनीति में जैसा होता आया है  उन्होंने सिद्धू को उनकी सीमाएं बता दीं | बाकी  कांग्रेस नेता भी नवजोत  को उनकी औकात बताने के लिए आपसी मतभेद भुलाकर एक साथ आ गये वरना चन्नी इतनी जल्दी सिद्धू से कन्नी नहीं काट पाते | सिद्धू द्वारा  दिए गए इस्तीफे के बाद वे पूरी तरह अकेले पड़ गये बताये जाते हैं | राहुल और प्रियंका भी उनकी  इस अप्रत्याशित हरकत से अपराधबोध से ग्रसित होकर चुप बैठ गये हैं | उनको मनाने का काम चन्नी पर छोड़ने का निर्णय दरअसल अपनी गलती पर पानी डालने जैसा है | पार्टी में उत्पन्न संकट के बीच राहुल का केरल के दौरे पर चला जाना उनके लापरवाह स्वभाव का ताजा उदाहरण  है | सिद्धू द्वारा आम आदमी पार्टी से सम्पर्क किये जाने की खबर भी आ रही है , वहीं कैप्टेन ने केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी | इन दोनों का अगला राजनीतिक कदम क्या होगा ये एक दो दिन में स्पष्ट हो जाएगा लेकिन कांग्रेस अमरिंदर की नाराजगी से होने वाले नुकसान का आकलन कर पाती उसके पूर्व ही सिद्धू रूपी नई मुसीबत गले पड़ गयी | हाल ही  में आये कुछ चुनाव सर्वेक्षण ये बता रहे थे कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस को जबरदस्त टक्कर तो देगी लेकिन उसके बाद भी वह अपनी  सरकार  बचा ले जायेगी | दलित मुख्यमंत्री के रूप में किया गया प्रयोग भी काम कर सकता था किन्तु बीते दो दिन में बाजी पूरी तरह पलटती दिखने लगी है | पहली नजर में तो ये लगता है कि कांग्रेस की अंतर्कलह का सीधा लाभ आम आदमी पार्टी के खाते में जाएगा लेकिन अमरिंदर यदि भाजपा के साथ आते हैं तब मामला त्रिशंकु का बन जाए तो आश्चर्य नहीं होना  चाहिए | लेकिन समूचे घटनाक्रम में कांग्रेस हाईकमान माने जाने वाले गांधी परिवार विशेष तौर पर राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता और कार्यप्रणाली को लेकर पार्टी के भीतर जो खींचातानी हो रही है उसका असर अन्य राज्यों पर भी साफ़ दिख रहा है | छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जैसी  टांग खिचौवल चल रही है उसे देखते हुए वहां भी पंजाब की पटकथा दोहराई जा सकती है  | स्मरणीय है 2017 में  विधानसभा चुनाव के पहले पंजाब में नशे के कारोबार का पर्दाफाश करने वाली  फिल्म उड़ता पंजाब प्रदर्शित हुई थी | उस फिल्म ने बादल सरकार की छवि बहुत खराब की और  वह सत्ता से बाहर हो गई | अमरिंदर सरकार पर वैसा कोई बड़ा आरोप नहीं था | सत्ता विरोधी रुझान को भी कैप्टेन ने किसान आन्दोलन को भड़काकर  ठंडा कर दिया था परन्तु सिद्धू को पंजाब में संगठन का मुखिया बनाकर बंदर के हाथ उस्तरा देने वाली कहावत चरितार्थ किये जाने के कारण कांग्रेस के हाथ से पंजाब उड़ता नजर आने लगा है | इस घटनाक्रम से मुख्य धारा की राजनीतिक पार्टियों की उथली सोच का भी प्रमाण मिल रहा हैं जो नए नवेले प्रवासियों को घर की चाभी सौंप देती हैं | 


-रवीन्द्र वाजपेयी
 

Wednesday, 29 September 2021

कन्हैया डूबती नाव छोड़कर डूबते जहाज पर आये



कन्हैया कुमार का  राजनीति में आकर  वामपंथी दल से जुड़ना तय था क्योंकि दिल्ली की जिस जेएनयू में वे शिक्षित हुए वह साम्यवाद की नर्सरी कहलाती है  | लेकिन कन्हैया तब चर्चा में आये जब संसद पर हमले के आरोपी अफज़ल गुरु की  फांसी के विरोध में फरवरी 2016  में जेएनयू प्रांगण में छात्रों की भीड़ में  देश विरोधी नारेबाजी हुई तथा कन्हैया ने भड़काऊ भाषण दिया | उनको देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया किन्तु बाद में वे दोषमुक्त हो गये | उस घटना के बाद जेएनयू विपक्षी  मोर्चेबंदी का अड्डा बन गया | राहुल गांधी सहित  सभी विपक्षी नेता उसका फेरा लगाने लगे | मोदी विरोधी  कतिपय पत्रकारों को भी कन्हैया में युवा ह्रदय सम्राट नजर आने लगा | गुजरात में हार्दिक पटेल को भी इसी तरह उभारा गया था किन्तु  कन्हैया को राजधानी दिल्ली में होने का लाभ मिला | डाक्टरेट की उपाधि ग्रहण करने के बाद  वे  उम्मीद के मुताबिक सीपीआई ( भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ) के सदस्य बने और जल्द ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उनको शामिल कर लिया गया | राष्ट्रीय राजनीति में हाशिये पर खिसक चुकी सीपीआई को कन्हैया में अपना भविष्य नजर आने लगा था | उनके साक्षात्कार टीवी चैनलों और  सोशल मीडिया  पर छा  गए | देश भर में कन्हैया को युवाओं के जलसे में बुलाया जाने लगा |  सीपीआई को भी लगा कि उनकी डूबती नैया  को ये युवा कप्तान किनारे तक ले जाएगा | इसी वजह से उनको 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार की बेगुसराय सीट से उम्मीदवार बनाया गया |  उनके विरूद्ध भाजपा के केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह मैदान में थे | देश भर से साम्यवादी कार्यकर्ता , वामपंथी रुझान वाले एनजीओ , प्रगतिशील लेखक – विचारक ,  अभिनेता  और पत्रकार बेगुसराय में कन्हैया को जिताने पहुंचे किन्तु वे बुरी तरह हारे |  युवा नेता के तौर पर उनके तेज उभार पर अचानक विराम सा लग गया | और वे  केवल सीपीआई की संगठनात्मक गतिविधियों तक सीमित होकर रह गये | सीपीआई के राष्ट्रीय नेताओं के साथ बैठने का अवसर कन्हैया को वाकई बहुत जल्दी मिला | वरना ऐसे संगठनों में इतनी जल्दी  किसी  को प्रथम पंक्ति में शायद ही जगह दी जाती है  | दरअसल  सोवियत संघ के विघटन के बाद से सीपीआई अनाथ जैसी होती जा रही है | एक दौर था जब युवाओं में साम्यवाद के प्रति सहज आकर्षण होता था | लेकिन जब चीन भी पूंजीवादी व्यवस्था के मोहपाश में जकड़ गया तब युवाओं में भी साम्यवाद  का आकर्षण  घटने लगा  | ऐसे में कन्हैया को ये लगा कि जीवन भर संघर्ष करते रहने की बजाय वे उस धारा के साथ जुड़ें जिसमें प्रवाह हो |  भाजपा में वे जा नहीं सकते थे और क्षेत्रीय दलों में उन्हें प्रादेशिक नेताओं का दुमछल्ला बनकर रहना होता | ऐसे में उनको कांग्रेस में ही संभावनाएं नजर आईं जो इन दिनों युवा नेताओं के अभाव से ग्रसित है | पार्टी के वरिष्ठ नेता किनारे होते जा रहे हैं और नई पीढ़ी भी कांग्रेस को लेकर पहले जैसी उत्साहित नहीं है | राहुल गांधी ने शुरुवात तो युवा नेता के तौर पर की थी लेकिन सही समय पर निर्णय न ले पाने और पार्टी को परिवार के भीतर केन्द्रित रखने के कारण वे अपनी चमक खोते जा रहे है | बीते तकरीबन दो साल से कांग्रेस बिना पूर्णकालिक अध्यक्ष के ही चल रही है | राजस्थान , पंजाब और छत्तीसगढ़ में उसकी सत्ता होने के बाद भी अंदरूनी झगड़े समस्या बनते जा रहे हैं | ऐसे में कन्हैया जैसे आक्रामक व्यक्ति के कांग्रेस में प्रवेश से वैसी ही समस्या पैदा हो सकती है जैसी नवजोत सिंह सिद्धू के कारण पंजाब में बन गई है | पंजाब के कांग्रेसी सांसद मनीष तिवारी ने  जो प्रतिक्रिया दी वह इस बात का संकेत है कि कन्हैया का  आना स्थापित छत्रपों को रास नहीं आयेगा | सीपीआई के महासचिव डी. राजा ने कन्हैया के बारे में कहा कि वे मजदूर हित की नीतियों से विमुख हो चले थे और विचारधारा में उनका विश्वास नहीं रहा | वहीं कन्हैया ने कांग्रेस को सबसे पुरानी पार्टी बताते हुए कहा कि बड़ा जहाज डूब गया तो छोटी – छोटी किश्तियाँ भी नहीं बचेंगी | इस तरह उन्होंने कांग्रेस को डूबता जहाज माने जाने की अवधारणा को बल दे दिया | हालाँकि सीपीआई और कांग्रेस की राजनीतिक लिव इन रिलेशनशिप आजादी के बाद से ही  चली आ रही है | पंडित नेहरु के सोवियत संघ से प्रभावित होने के कारण वीके कृष्णा मेनन और डीपी धर जैसे साम्यवादी रुझान वाले उनके निकटस्थ रहे | सत्तर के दशक में इंदिरा जी जब राजनीतिक संकट में फंसी तब भी स्व. श्रीपाद अमृत डांगे की अगुआई में सीपीआई ने उनका खुलकर साथ दिया | बैंकों का  राष्ट्रीयकरण जैसे कदम भी उसी समय  उठाये गये थे | 1975 में इंदिरा जी द्वारा लगाये गये आपातकाल का जहाँ सीपीएम ने विरोध किया था वहीं  सीपीआई खुलकर उसके समर्थन में आई और इसीलिये उसे चमचा पार्टी आफ इण्डिया कहा जाने लगा | नब्बे के दशक में भाजपा के उभार  के बाद  सीपीएम भी मुद्दों पर कांग्रेस का साथ देने लगी | जिसका सबसे बड़ा उदाहरण 2003 में डा. मनमोहन  सिंह जैसे पूंजीवाद समर्थक प्रधानमंत्री की सरकार को टेका लगाने के लिए सीपीएम महसचिव स्व. हरिकिशन सुरजीत का आगे आना था | बहरहाल उसके बाद से कांग्रेस और वामपंथ के सम्बन्ध कभी नरम तो कभी गरम चलते रहे | बंगाल में दोनों मिलकर लड़ते हैं लेकिन केरल में एक दूसरे के खिलाफ  हैं | वैसे भी राहुल गांधी के कमान सँभालने के बाद से कांग्रेस वैचारिक भटकाव के शिखर पर जा पहुँची है | उसकी सैद्धांतिक पहिचान तो कभी की नष्ट हो चुकी थी | आज की स्थिति में वह तदर्थवाद के आधार पर चल रही है | उ.प्र  में  अखिलेश यादव और महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठजोड़ करना उसकी मजबूरी को दर्शाता है | राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी उसकी मौजूदगी कुछ को छोड़कर शेष राज्यों में नाममात्र की रह गई है | सिद्धू , हार्दिक और अब कन्हैया जैसों को साथ लेकर उसने ये स्पष्ट  कर दिया कि पार्टी की ये दशा आखिर क्यों बन गई ? कन्हैया कहें कुछ भी किन्तु वे अपनी उन अतृप्त महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए आये हैं जो सीपीआई में संभव नहीं थी | कहा जा रहा है है वे बिहार में कांग्रेस का चेहरा बनाये जाएंगे जहां पार्टी घुटनों के बल चल रही है | लेकिन क्या लालू पुत्र तेजस्वी  यादव , कन्हैया को बर्दाश्त करेंगे ? हो सकता है उ.प्र के आगामी चुनाव में भी कन्हैया को सितारा प्रचारक बनाया जाए | लेकिन उनके कांग्रेस में प्रवेश से पार्टी को लाभ  कम और हानि ज्यादा होने की सम्भावना है क्योंकि जेएनयू में आजादी का नारा लगाने वाले कन्हैया के  टुकड़े – टुकड़े गैंग से जुड़े होने की बात जनता भूली नहीं है | उससे तो अच्छा होता कांग्रेस  मिलिंद देवड़ा , सचिन पायलट , रणदीप हुड्डा और उन जैसे बाकी युवा नेताओं को नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में शामिल करती जिनको पार्टी की नीतियों का भलीभाँति ज्ञान है | कहना गलत न होगा कि कन्हैया का कांग्रेस में प्रवेश डूबती नाव के नाविक का डूबते जहाज में चढ़ आने जैसा ही है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी