Monday, 28 February 2022

युद्ध के बाद गृहयुद्ध में फंस सकता है यूक्रेन : पुतिन की हेकड़ी से रूस भी संकट में



यूक्रेन पर रूस का कब्जा हो या न हो किन्तु  बुरी तरह बर्बाद होने के बाद वह लम्बे समय तक उबरने की स्थिति में नहीं रहेगा | भले ही युद्धविराम हो जाये लेकिन रूसी राष्ट्रपति पुतिन कब्जाए इलाके खाली कर देंगे ये मान लेना जल्दबाजी होगी | पुतिन का ये कदम  सद्दाम हुसैन द्वारा कुवैत पर किये गये कब्जे जैसा ही है जो अंततः उकी मौत का कारण भी बना | यद्यपि  विश्व बिरादरी चाहकर भी   पुतिन को सद्दाम जैसे अंजाम तक नहीं पहुंचा सकती क्योंकि उस  स्थिति में विश्व  युद्ध की आशंका सही साबित हो सकती है जो शायद ही कोई चाहेगा | लेकिन इससे हटकर देखें तो अमेरिका  ने इस  विवाद  में सीधे हस्तक्षेप न करते हुए भी अपना उल्लू तो सीधा कर ही लिया | अफगानिस्तान से उसको जिस तरह से हटना पड़ा वह किसी अपमान से कम नहीं था | जिस पर रूस ने भी खुशियाँ मनाई थीं | पुतिन का सोचना  था कि अफगानिस्तान में विकास संबंधी परियोजनाओं के जरिये वे वहां रूस  की मौजूदगी बनाये रखेंगे जो मध्य और पश्चिम एशिया पर नजर रखने में सहायक होगा | हालाँकि कुछ समय बाद ही वे समझ गये कि तालिबानी मानसिकता कुत्ते की पूंछ जैसी है जिसे सीधा करना असंभव है | लेकिन इसी बीच यूक्रेन के अमेरिका के निकट जाने की सम्भावना ने उनको  विचलित कर दिया जिसका परिणाम मौजूदा युद्ध है | शुरुवात में ये लगा था कि यूक्रेन के बचाव में अमेरिका और उसके साथी आकर मोर्चा संभालेंगे लेकिन वह उम्मीद हवा – हवाई होकर रह गई | इस नीति से वैश्विक स्तर पर अमेरिका की खूब थू – थू भी हुई लेकिन कूटनीति के जानकार  समझ रहे हैं कि अफगानिस्तान से बेइज्जत होकर निकला अमेरिका इतनी जल्दी दूसरी जगह उलझना नहीं चाहता था | इसीलिये उसने शुरुवाती स्तर पर तो यूक्रेन की पीठ पर हाथ रखा किन्तु जब पुतिन ने आक्रामक कदम  उठाया तब मदद करने से पीछे हट गया | यद्यपि इस संकट की जड़ में तो अमेरिका द्वारा रूस के दरवाजे पर जाकर बैठ जाने की योजना ही थी किन्तु पुतिन ने जिस तरह जल्दबाजी में युद्ध जैसे अंतिम हथियार से ही शुरुवात की उसके कारण उनका देश जीतता दिखते हुए भी पराजय जैसी स्थिति में फंस गया है | ये युद्ध वैसे भी बेमेल है क्योंकि यूक्रेन के पास खुद का सैन्यबल इतना नहीं था  जिससे वह रूस का मुकाबला कर सके |  खबर है दोनों के बीच  वार्ता की सम्भावना बन रही है | बेलारूस या अन्य किसी जगह दोनों देशों के प्रतिनिधि मिल बैठकर युद्द को रोकने और आपसी विवाद हल करने का प्रयास करेंगे | इसका जो परिणाम सतही तौर पर समझ आ रहा है वह यूक्रेन में सत्ता परिवर्तन ही है | उसके मौजूदा राष्ट्रपति कहें कुछ भी किन्तु वे रूसी हमले का सामना करने में पूरी तरह असमर्थ साबित हो चुके हैं | रूसी सेना को रोकने की कोशिश में निरपराध यूक्रेनी नागरिकों की जान सस्ते में जा रही है | प्रारम्भ में तो  रूसी सेना  नागरिकों को मारने से बची लेकिन अब वह भी बर्बरता पर उतरकर  लूटपाट तथा निर्दोष नागरिकों  की हत्या  में लिप्त होने लगी है | दरअसल अमेरिका भी यही चाहता रहा है और इसीलिये संरासंघ सुरक्षा परिषद में रूसी वीटो के कारण उसे दबाने में असफल रहने के बाद आर्थिक प्रतिबंधों के जरिये उसकी कमर तोड़ने का दांव चल दिया गया जिसका असर दिखाई देने लगा है | इस बारे में उल्लेखनीय है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में  रूस की उपस्थिति अमेरिका जैसी कभी नहीं रही | सात दशक तक चली साम्यवादी व्यवस्था के कारण रूसी जनता भी विश्व बिरादरी में उतनी घुली मिली नहीं है |  भले ही वहां कहने को लोकतंत्र आ गया है लेकिन अब भी साम्यवादी सोच के अवशेष विद्यमान हैं जिनका प्रत्यक्ष अनुभव पुतिन के रवैये से हो रहा है | जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार यूक्रेन पर किये गये हमले के बाद रूस की जिस तरह से नाकेबंदी हो रही है उसका अंदाज शायद पुतिन नहीं लगा सके | इसीलिए बर्बादी के मंजर भले  ही यूक्रेन में  दिखाई दे रहे हों लेकिन रूस की  अर्थव्यवस्था अचानक जिस तरह संकट में आ गई है और विश्व बाजार में उसका बहिष्कार हो रहा है उसकी वजह से पुतिन यूक्रेन  पर सैन्य विजय के बावजूद अपने घर में घिरने लगे हैं | भले ही  उनके राजनीतिक प्रभुत्व को हाल – फ़िलहाल कोई खतरा न हो लेकिन रूस की वैश्विक छवि खराब होने से उसका व्यापार बुरी तरह प्रभावित होने लगा है | अमेरिका के साथ खड़े देशों ने रूस के वायुयानों को आने -- जाने से रोककर उसकी एयर लाइंस को आर्थिक नुकसान उठाने बाध्य कर दिया है | बीते तीन दशक में जिन निजी क्षेत्र की कंपनियों ने वैश्विक बाजार में अपना  कारोबार जमाया वे इन प्रतिबंधों के कारण बेकार होकर रह  गईं हैं | रूसी मुद्रा की कीमत तेजी से गिरने के कारण अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी है तथा महंगाई बढ़ने से आम रूसी नागरिक भी युद्ध के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं |  पुतिन द्वारा युद्ध विराम के लिए सहमत होने के पीछे रूसी जनमत का दबाव भी हो सकता है जो इस बात  से आशंकित है कि कहीं उनका देश यूक्रेन में  उसी तरह न फंस जाए जैसा अमेरिका साठ – सत्तर के दशक में वियतनाम में उलझा रहा | अफगानिस्तान में  टांग फ़साने का जो नुकसान रूस ने उठाया उसकी यादें भी ताजा हो उठी हैं | कुल मिलाकर यूक्रेन में भले ही पुतिन को पूरे तौर पर जीत हासिल हो जाये या  रूस वहां काबिज न होते हुए भी अपने मनमाफिक सरकार बनवाकर उसे अमेरिका के गोद में जाकर बैठने से रोक ले किन्तु  जिस तरह के प्रतिबन्ध उस पर दुनिया के अनेक देशों ने लगाये हैं यदि वे जारी रहे तब वह  विश्व बिरादरी में अलग – थलग पड़ जाएगा  | इस विवाद का सबसे बड़ा नुकसान शीत युद्ध के पुनर्जन्म के रूप में होगा | पुतिन को ये याद रखना चाहिये था कि सोवियत संघ ने दूसरे महायुद्ध के बाद अमेरिका से प्रतिस्पर्धा करने के लिए अन्तरिक्ष कार्यक्रमों और रक्षा तैयारियों  पर  तो  बेतहाशा खर्च किया लेकिन मानवीय जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी  तकनीक के विकास में असफल रहने से आर्थिक महाशक्ति न बन सका | बीते तीन दशक में वह दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने लगा था | जी – 8 और ब्रिक्स जैसे संगठनों में उसकी उपस्थिति अनिवार्य बन गई थी किन्तु उनकी इस हठधर्मिता के कारण  जिन देशों को इस  विवाद से कुछ भी लेना देना नहीं था  उनकी सहानभूति भी यूक्रेन के साथ हो गई है | अनेक  देशों की जनता संकट में फंसे यूक्रेन को आर्थिक सहायता देने आगे आ रही है | कुछ  देशों ने हथियार भी वहां  भेजे हैं | इन सबसे लगता है यदि  युद्ध जारी रहा तब रूस के सामने भी नई समस्या पैदा हो जायेगी | हो सकता है अमेरिका सहित जो देश  अब तक इस जंग से प्रत्यक्ष रूप से दूर रहे वे भी देर – सवेर अपनी भूमिका का निर्वहन करने आगे आयें | भले ही पुतिन यूक्रेन  में सत्ता परिवर्तन करवाने में कामयाब हो जाएँ लेकिन जिस तरह से उनकी सेना ने यूक्रेन में तबाही की और आम जनता  को खून के आंसू रोने मजबूर किया उसके बाद वहां बनी  रूस समर्थक सरकार जनता का कितना भरोसा जीत सकेगी ये बड़ा सवाल है ? ऐसे में ये कहा जा सकता है कि अमेरिका ने यूक्रेन को धोखा देकर उसे तो बर्बादी की राह पर धकेला ही लेकिन उसके साथ ही रूस को भी ऐसे चक्रव्यूह में फंसा दिया जिससे निकलना उसके लिए काफी कठिन होगा और उसकी बड़ी कीमत भी उसे चुकाना होगी | बड़ी बात नहीं युद्ध में परास्त होने के बाद यूक्रेन गृहयुद्ध की चपेट में फंस जाये क्योंकि अमेरिका रूस को परेशान  करने के लिए ऐसा करना पसंद करेगा | जिस तरह के हालात बीते कुछ दिनों में देखने मिले उनके मद्देनजर ये कहा जा सकता है कि  यूक्रेन को आग में झोंकने के प्रयास में पुतिन ने रूस के हाथ भी  जलवा दिए | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 26 February 2022

अमेरिका ने पहले अफगानिस्तान को मरवाया और अब यूक्रेन को



1991 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तब रूस निरीह अवस्था में था | जनता बेसहारा होकर रह गई थी | साम्यवादी शासन के अंतर्गत जीवन यापन के लिए की गई व्यवस्था एक झटके में चरमरा गई | खाली जेब लोग अपने कुत्ते – बिल्ली तक बेचने तैयार हो गये | दुनिया का बड़े शक्ति केंद्र रहे देश के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या थी कि रूसी युवतियां नाईट क्लबों में डांसर बनकर दुनिया के अनेक देशों में जाकर वेश्यावृत्ति करने से भी नहीं हिचकीं | धीरे – धीरे  हालात सुधरे और आर्थिक मोर्चे के साथ  ही कूटनीतिक और सैन्य लिहाज से रूस ने विश्व बिरादरी में दोबारा अपनी जगह बना ली | साम्यवादी दौर की जकड़न से निकली आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन होने से रूस के दरवाजे दुनिया के लिए खुल गए | एक समय  तो ऐसा आया जब  लगा कि अमेरिका और रूस दोनों के बीच शत्रुता और अविश्वास समाप्त हो चला है और  वे  दुनिया को  शांतिपूर्ण विकास हेतु सहायता देने प्रयासरत हैं | लेकिन जबसे रूस में पुतिन युग प्रारम्भ हुआ और उन्होंने अपनी पकड़ मजबूत की तभी से वह पुरानी ठसक में लौटता दिखने लगा , जिसका ताजा प्रमाण यूक्रेन  पर किया गया हमला है | पुतिन भले ही कह  रहे हैं कि रूस यूक्रेन पर कब्जा नहीं करना चाहता  किन्तु उनके इरादे किसी से छिपे नहीं हैं | लेकिन इस मामले में सबसे हास्यास्पद  स्थिति हो गई अमेरिका की , जिसके बलबूते यूक्रेन ने रूस जैसी बड़ी शक्ति से टकराने का दुस्साहस तो कर लिया किन्तु जब  जरूरत पड़ी तब अमेरिका और  उसके साथी देश  कन्नी काट गये | उधर संरासंघ में हमले  के विरुद्ध आये प्रस्ताव को रूस ने वीटो कर दिया | इस संकट की वजह नाटो नामक सैन्य संधि से यूक्रेन के जुड़ने की सम्भावना को माना जाता है , जिस पर रूस को  सख्त ऐतराज था | दूसरी तरफ अमेरिका और उसके साथी रूस को  चेतावनी देते रहे कि वह यूक्रेन को दबाने की जुर्रत न करे , अन्यथा वे उसके साथ खड़े होंगे | लेकिन जब रूस ने उस  पर विधिवत हमला कर दिया तब अमेरिका और नाटो के अन्य सदस्य ये कहते हुए दूर खड़े रहे  कि यूक्रेन इस संधि से जुड़ा नहीं है | गत दिवस यूक्रेन के राष्ट्रपति ने जिस कातर भाव से अमेरिकी रुख पर तंज कसा उसने इस विश्व महाशक्ति की धाक और साख दोनों मिट्टी में मिला दिए | इस बारे में याद रखने वाली बात ये है कि सोवियत संघ से अलग होते समय यूक्रेन के पास परमाणु अस्त्र थे किन्तु अमेरिका के दबाव में उसने परमाणु अप्रसार सन्धि पर हस्ताक्षर करने के बाद उनको धीरे – धीरे नष्ट कर दिया | यदि उसने ऐसा न किया होता तब रूस शायद ही उसकी गर्दन दबोचने की हिमाकत कर पाता | यूक्रेन का हश्र क्या होगा , ये फ़िलहाल कह पाना कठिन है क्योंकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं है | हालाँकि रूस बहुत भारी साबित हो रहा है और उसने यूक्रेन को तीन तरफ से घेर रखा है | कहते हैं राजधानी कीव तक रूसी फौजी आ चुके हैं | राष्ट्रपति के आह्वान पर जनता रूसियों से जूझने की हिम्मत भी दिखा रही है | पुतिन ये तो समझ रहे हैं कि यूक्रेन पर कब्जा करना उनके लिए उसी तरह नुकसानदायक  होगा जैसा सद्दाम हुसैन को कुवैत कब्जाने पर झेलना पडा था | इसीलिये उन्होंने कहना शुरू कर दिया है कि रूस केवल सत्ता पलटने में रूचि रखता है |  लेकिन असलियत ये है कि वे  वहां कठपुतली सरकार स्थापित करने की कोशिश में है | यद्यपि  अमेरिका के साथ जुड़े तमाम देशों द्वारा  रूस पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाए जाने  के दूरगामी नतीजों से भी  पुतिन अनभिज्ञ नहीं हैं | और इसीलिये उन्होंने  कब्जा न करने जैसी बात कही , क्योंकि जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार यूक्रेन में भी रूसी हमले के विरुद्ध जनता खड़ी हो रही है | पोलेंड ने भी युद्ध सामग्री यूक्रेन भेजना शुरू कर  दिया है | हालाँकि अभी  ये साफ़ नहीं है कि  इसके पीछे अमेरिका का हाथ हैं या नहीं लेकिन यदि ये मुहिम जारी रही तब जैसी कि आशंका शुरू से ही है ,  यूक्रेन दूसरा अफगानिस्तान बने बिना नहीं रहेगा | हो सकता है अमेरिका ने सीधे टकराने की बजाय ये विकल्प चुना हो जिससे वह रूस को लम्बे युद्ध में उलझाकर यूक्रेन में ही फंसाए रखे | वैसे  पुतिन भी अफगानिस्तान में रूसी दखल की कटु स्मृतियों से भली – भाँत्ति अवगत हैं किन्तु जिस मकसद से उन्होंने ये जोखिम मोल लिया उसे पूरा किये  बिना यूक्रेन छोड़ना  उनके लिए आत्मघाती होगा | हालात  इस हद तक  अनिश्चित हैं  कि अगले पल क्या होगा ये किसी को समझ में नहीं आ रहा किन्तु ये स्पष्ट  है कि यूक्रेन एक बार फिर रूसी हड़प नीति का शिकार हो गया | यदि पुतिन वहां कठपुतली सरकार बिठाने में सफल होते हैं तब वह रूसी उपनिवेश बनकर  रह जायेगा किन्तु लड़ाई लम्बी चली तो भी गृहयुद्ध की आग में जलने मजबूर होगा | भारतीय संदर्भ में देखें तो इस विवाद से  एक बात साफ़ हो गई कि  महाशक्तियाँ केवल अपने फायदे और नुकसान के बारे में ही सोचती हैं | ऐसे में किसी भी देश को उन पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए | अफगानिस्तान से जिस तरह अमेरिका हटा वह इसका प्रमाण है | कुछ दशक पूर्व रूस भी वहां अपने समर्थकों को तालिबानी आततायियों के सामने मरने छोड़ आया था | सोवियत संघ के विघटन के उपरान्त अलग हुए देशों के आर्थिक विकास के प्रति भी अमेरिका और उसके पिछलग्गू देशों का  सहयोगात्मक रवैया रहा हो ऐसा नहीं दिखा जबकि उनमें से कुछ ने नाटो की सदस्यता भी ले ली थी | रही बात रूस की तो वह अभी तक सोवियत संघ से अलग हुए देशों को अपनी मर्जी से हांकने की इच्छा  छोड़ नहीं पा रहा | लेकिन यूक्रेन में उसने जो किया और उस पर अमेरिका सहित पश्चिमी देशों ने  जिस दोगलेपन का परिचय दिया उससे भारत जैसे देशों को ये समझ  लेना चाहिए कि अपनी सुरक्षा के लिए खुद सक्षम होना जरूरी है | 2020 की गर्मियों में चीन द्वारा लद्दाख अंचल की गलवान घाटी को हथियाने का जो प्रयास किया गया उसे भारत ने अपने सैन्यबल पर ही न सिर्फ निष्फल किया अपितु बड़ी सख्या में चीनी सैनिकों को मार गिराने के साथ ही अग्रिम मोर्चे पर जबरदस्त मोर्चेबंदी करते हुए  ये एहसास करवा दिया कि भारत अपनी सीमाओं की सुरक्षा करने के लिए किसी बड़ी शक्ति का मोहताज नहीं है | दुर्भाग्य से सोवियत संघ से अलग होने के बाद यूक्रेन ने अमेरिका के फुसलाने पर अपने परमाणु अस्त्र तो नष्ट कर दिए किन्तु रूस के विस्तारवादी इरादों को जानने के बावजूद  अपने रक्षातन्त्र को अपेक्षित मजबूती नहीं दी | इस संकट के दौरान भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान रखकर जो नीति अपनाई वह पूरी तरह सही है | अमेरिका भले ही इससे कुछ समय तक नाराज  नजर आये लेकिन वैश्विक परिदृश्य में वह इस स्थिति में आ चुका है कि अपना रास्ता स्वतंत्र होकर चुन सके | यही कारण है कि दोनों महाशक्तियाँ भारत का समर्थन पाने लालायित नजर आ रही हैं | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 25 February 2022

यूक्रेन संकट विस्तारवाद के नये दौर की शुरुवात : अगला कदम चीन उठाएगा



यूक्रेन विवाद शीतयुद्ध को पीछे छोड़कर अब युद्ध में तब्दील हो चुका है | रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की हठधर्मिता से पूरी दुनिया विनाश की आशंका  से ग्रसित है | द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका  भोग चुका यूक्रेन एक बार फिर अपने दुर्भाग्य को ढोने बाध्य है |  जो लोग ये सोचते हैं कि ये संकट अचानक उत्पन्न हुआ वे इतिहास से अनभिज्ञ हैं | दरअसल यूक्रेन ने रूस के वर्चस्व को कभी मन से स्वीकार नहीं किया | 1917  की बोल्शेविक क्रांति के बाद रूस में जारशाही तो समाप्त हो गई किन्तु साम्यवादी साम्राज्य का नया दौर शुरू हुआ | जिसके अंतर्गत उसने अपनी सीमाओं को विस्तार देते हुए मध्य एशिया सहित निकटवर्ती तमाम छोटे – छोटे देशों को सैन्यबल से  कब्जे में ले लिया | लेकिन उस समय भी यूक्रेन ने  अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखा जो साम्यवादी क्रांति का नेतृत्व करने वाले लेनिन को नागवार गुजरा और 1920 में रूस की सेनाओं ने इस देश पर बलात कब्जा कर उसे सोवियत संघ का हिस्सा बना लिया , जिसे उपनिवेश कहना गलत न होगा | इस बारे में एक बात  ध्यान रखने योग्य है कि सोवियत संघ कभी एक संगठित देश की पहिचान न पा सका और उसमें शामिल देशों ने अपनी सांस्कृतिक और क्षेत्रीय छवि बनाये रखी | लेकिन मास्को में बैठी साम्यवादी पार्टी  की सर्वोच्च सत्ता में रूसी वर्चस्व सदैव कायम रहा | भले ही यूक्रेन में जन्मे निकिता क्रुश्चेव जैसे कुछ नेता  अन्य देशों से रहे हों परन्तु कुल मिलाकर  केन्द्रीय सत्ता रूस के हाथ ही रही | ऐसा नहीं है कि उसका विरोध न होता हो लेकिन इतिहास साक्षी है कि विरोध की हर आवाज को  हमेशा के लिए बंद कर दिया गया | जोसेफ स्टालिन द्वितीय युद्ध के समय सोवियत संघ के शासक  थे | उस दौर में  अनगिनत ऐसे  लोगों को सायबेरिया के यातना शिविरों में भेज दिया गया जिन पर साम्यवादी तानाशाही का विरोध करने का शक था  | सही कहें  तो  स्टालिन ने जितना अत्याचार किया वह हिटलर की तुलना में कम न था | केजीबी नामक गुप्तचर एजेंसी  आतंक और निरंकुशता का पर्याय बन गई थी | हालाँकि स्टालिन के बाद अनेक उदारवादी माने जाने वाले चेहरे भी सत्ता में आये लेकिन साम्यवाद में विरोध को सहन न करने की जो जन्मजात मानसिकता  है वह बदस्तूर  कायम रही | सबसे बड़ी  बात ये रही कि दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ जैसे नारे के जरिये  बहुराष्ट्रवाद की प्रवर्तक सोवियत सरकार रूस का  वर्चस्व  बनाये रखने की प्रवृत्ति को त्याग न सकी | योजनाबद्ध तरीके से संघ  में शामिल बाकी  देशों के आर्थिक और प्राकृतिक संसाधनों का  दोहन अपने हितों के लिए किये जाने के साथ ही रूसी भाषा बोलने वालों को योजनाबद्ध तरीके से उन देशों में बसाकर अपनी जड़ें मजबूत करने की दूरगामी कार्ययोजना अमल में लाई गई | हालाँकि इसके चलते अंतर्विरोध भी  पनपते रहे  , जिनका विस्फ़ोट 1991 में सामने आया |  परिणामस्वरूप सोवियत संघ नामक कृत्रिम संरचना  ध्वस्त होकर  अनेक नए देश उभरकर आ गये | हालाँकि इसके पीछे अमेरिका का हाथ माना गया किन्तु मिखाइल गोर्वाचोव नामक जिस नेता ने सोवियत संघ के विघटन का रास्ता प्रशस्त किया वह साम्यवादी घुटन से निकलना चाहता था वरना  उस व्यवस्था में परिंदा भी पर नहीं  मार सकता वाली बात पूरी तरह से लागू होती थी | सही बात ये है कि पूंजीवाद और उपनिवेशवाद के विरुद्ध खड़ा हुआ साम्यवाद जिस तरह निरंकुशता का प्रतीक बनता गया उसकी  वजह से सोवियत संघ से जुड़े अनेक देश अलग होने आतुर हो उठे थे  | पूर्वी यूरोप के चेकोस्लोवाकिया नामक देश ने भी जब सत्तर के दशक  में उसके प्रभाव से आजाद होने का साहस किया तो सोवियत फौजों ने वही किया जो आज यूक्रेन में देखने मिल रहा है | दरअसल पुतिन राष्ट्रपति बनने के पहले उसी कुख्यात केजीबी के मुखिया रहे जो विरोधियों  के दमन में  नृशंसता से परहेज नहीं करती थी | इसीलिए  उन्होंने सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचते ही अपने विरोधियों को ठिकाने लगाकर जीवनपर्यंत शासन करते रहने की व्यवस्था लागू कर दी | लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा यहाँ जाकर भी थमी नहीं |  जबसे वे क्रेमलिन में जमे तभी से रूसी प्रभुत्व की पुनर्स्थापना में जुटे हैं  और यूक्रेन की आजादी उनके आँखों में खटकती रही |  पुतिन चाहते हैं कि सोवियत संघ से अलग हुए देश अभी भी रूस की सर्वोच्चता को स्वीकार करते रहें | इसी सोच के अंतर्गत उन्होंने अनेक देशों में रूस समर्थक शासक बिठा रखे हैं | यूक्रेन में भी काफी समय तक ऐसा रहा लेकिन ज्योंही उसने मास्को के इशारों की अनदेखी करते हुए  अमेरिकी प्रभाव में जाने का इरादा जताया त्योंही रूस की त्यौरियां चढ़ गईं जिसका अंतिम परिणाम दुनिया देख रही है | इस कदम के जरिये पुतिन ने ये दिखाने की कोशिश  की है  कि दुनिया का एकमात्र शक्ति केंद्र वाशिंगटन को मान लेना गलत होगा |  ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है  कि भले ही साम्यवाद रूस में न लौटे और सोवियत संघ जैसी व्यवस्था का पुनर्जन्म भी  न हो किन्तु पुतिन के मन में समाई  केजीबी प्रमुख की मानसिकता के कारण  विस्तारवाद और निरंकुशता की साम्यवादी नीतियां नए रंग रूप में सामने आ रही हैं | चूंकि चीन भी अब  आर्थिक उपनिवेशवाद रूपी हथियार का उपयोग करने पर आमादा है इसलिए उसने बिना देर लगाये पुतिन का समर्थन कर दिया | वैसे भी   दोनों का वैचारिक और व्यवहारिक शत्रु समान ही है | यूक्रेन संकट की परिणिति रूस समर्थक कठपुतली सरकार की स्थापना ही है | लेकिन बात यहीं तक रुकने वाली नहीं है | यदि विश्व जनमत इसी तरह असहाय रहकर मूकदर्शक बना रहा तो पुतिन अपनी मुहिम जारी रखेंगे क्योंकि आज जो देश अमेरिका के दबाव में रूस के विरुद्ध खड़े नजर आ रहे हैं वे ज्यादा दिनों तक अपने आर्थिक हितों को नजरंदाज करने की स्थिति में नहीं है |  उससे भी बड़ा खतरा ये है कि पुतिन के इस कदम ने चीनी तानाशाह शी जिनपिंग का रास्ता भी साफ़ कर दिया है जो न सिर्फ ताईवान और जापान के कुछ द्वीपों को हड़पना चाह रहे हैं  अपितु भूटान , नेपाल और मंगोलिया के कुछ इलाकों पर भी उनकी बुरी नजर बनी हुई है | दक्षिण चीन के समुद्री क्षेत्र पर बलात कब्जे के साथ ही वियतनाम , दक्षिण कोरिया , इंडोनेशिया भी  उनके निशाने पर है | श्रीलंका के अर्थतंत्र को भी चीन ने तोड़कर रख दिया है | जिस तरह दूसरे महायुद्ध के बाद दुनिया में नई आर्थिक , भौगोलिक तथा कूटनीतिक संरचना देखने मिली , वैसा ही कुछ – कुछ  कोरोना काल के बाद  होता लग  रहा है | 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 24 February 2022

पुतिन और जिनपिंग का मिलन वैश्विक शक्ति संतुलन के नये युग की शुरूवात



यूक्रेन संकट जिस स्थिति में पहुंच गया है उसमें रूस का पीछे हटना सम्भव नहीं लगता। उसके दो हिस्सों को स्वतंत्र देश की मान्यता देने के बाद उसने अपनी सेना यूक्रेन में प्रविष्ट करा दी जिससे युद्ध की स्थिति बन गई है। उधर अमेरिका ने भी निकटवर्ती देशों में युद्धक विमान और मिसाइलें आदि तैनात कर दी हैं। अमेरिका सहित उसके साथी देशों ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध भी लगा दिए हैं। हालाँकि इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी बड़ा धक्का लग सकता है क्योंकि वहाँ की तमाम बड़ी कम्पनियों के रूस के साथ जो व्यवसायिक करार हैं उन पर प्रतिबंधों के कारण संकट आ खड़ा हुआ है। सर्वाधिक चर्चा रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की है जिन्होंने विश्व जनमत की अनदेखी करने की जुर्रत की। जिस तरह से उन्होंने अमेरिकी धौंस को ठेंगा दिखाते हुए यूक्रेन पर हमला कर उसके दो इलाकों को आजाद मुल्क बताकर मान्यता दे डाली उसके बाद संरासंघ पर सबकी निगाहें टिकी हुई थीं किन्तु संकट को टालने में नाकामयाबी से इस विश्व संगठन की उपयोगिता पर सवालिया चिन्ह लग रहे हैं। दरअसल पुतिन ने जिस तरह की दादागिरी दिखाई उसके पीछे सुरक्षा परिषद में प्राप्त वीटो का अधिकार है। अभी तक चीन ने भले ही तटस्थ भाव ही प्रदर्शित किया किन्तु ऐसा करना भी पुतिन का समर्थन ही है। वहीं ये संकट भारत के लिए भी कूटनीतिक असमंजस की स्थिति लेकर आया है और इसीलिये वह बातचीत के जरिये समाधान निकालने की नीति पर चल रहा है। हालाँकि अमेरिका ये धमकी दे रहा है कि वह रूस के साथ रक्षा समझौतों से पीछे हटे किन्तु भारत ने अब तक किसी की ओर झुकाव प्रदर्शित न करने का जो रुख अपना रखा है वह फिलहाल तो ठीक है लेकिन उसको अपनी भूमिका का निर्धारण बहुत ही सोच-समझकर करना होगा क्योंकि जिस तरह दो सांड़ों की लड़ाई में खेत की बाड़ को नुकसान पहुंचता है वही स्थिति महाशक्तियों के टकराने से बाकी देशों की होती है। भारत ने आजादी के बाद से ही अपने को गुट निरपेक्ष बनाकर रखा लेकिन अमेरिका की पाकिस्तान समर्थक नीति के कारण हमारा झुकाव रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) की तरफ  बना जिसने सुरक्षा परिषद में अपने वीटो से सदैव भारतीय हितों की रक्षा की। लेकिन 20 वीं सदी खत्म होते तक दुनिया की तस्वीर ही बदल गई और व्यापार तथा बाजार ने कूटनीतिक रिश्तों को नई शक्ल दे दी। चीन का माओ युगीन लौह आवरण जिस तरह टूटा और साम्यवाद के सबसे बड़े जीवित केंद्र में दुनिया भर की पूंजी आकर केन्द्रित हुई उसने शक्ति संतुलन के मापदंड बदल डाले। इसीलिए यूक्रेन के मौजूदा संकट में चीन की प्रत्यक्ष भूमिका भले न हो लेकिन पुतिन ने जिस तरह के दुस्साहस का प्रदर्शन किया वह चीनी हुक्मरान शी जिनपिंग के साथ उनकी जुगलबंदी के कारण ही संभव हो सका। बीते दिनों जब पुतिन ने ताईवान मुद्दे पर चीन को समर्थन की बात कही तभी दुनिया को हवा का रुख समझ लेना चाहिए था। सबसे बड़ी बात ये है कि आज के दौर में जहाँ पुतिन और जिनपिंग अपने-अपने देश में सर्वशक्तिमान नेता के रूप में स्थापित हो चुके है वहीं अमेरिका में महज दो साल के भीतर बाईडेन की लोकप्रियता में निरंतर कमी आती जा रही है और जिस डोनाल्ड ट्रम्प को मसखरा मानकर जनता ने हरा दिया वह तेजी से उभरने लगे हैं। गत दिवस उन्होंने जिस तरह से पुतिन की तारीफ  कर डाली उससे ये संकेत निकलकर आया है कि अमेरिका के भीतर ही विदेश नीति को लेकर एक राय नहीं है। अब तक के सूरते हाल से जो बात स्पष्ट हुई वह ये कि पुतिन पीछे नहीं हटेंगे। उनके सत्ता में आने के बाद रूस ने पुराने सोवियत गणराज्यों में जिसे जितना दबाना चाहा उसमें वे कामयाब रहे हैं। यूक्रेन  के क्रीमिया बंदरगाह पर रूस द्वारा बलपूर्वक कब्ज़ा किये जाने के बाद पूरी दुनिया जिस तरह असहाय बनी रही उसने पुतिन के हौसले बुलंद किये। उन्हें ये भी समझ में आ गया कि सोवियत संघ को पुनर्जीवित करना तो असंभव है लेकिन वैश्विक शक्ति संतुलन का पूरी तरह अमेरिका के हाथों में बना रहना भी एक ध्रुवीय दुनिया बनाने जैसा होगा। पुतिन इस बात को समझ चुके हैं कि अमेरिकी प्रभाव के कारण यूरोप के बड़े देश उनको समर्थन नहीं देंगे और इसीलिये उन्होंने बड़ी ही चालाकी और चतुराई से भारत को रक्षा प्रणाली देकर चीन पर दबाव बनाया। कोरोना काल के बाद चीन को लेकर विश्व भर में जिस अविश्वास का भाव पैदा हुआ उससे जिनपिंग भी परेशान थे। ताईवान मुद्दे पर अमेरिका के जबर्दस्त दबाव के कारण वे चाहकर भी कुछ करने में असमर्थ साबित हो रहे थे। दुनिया के बाजारों में चीनी सामान की मांग कम होने से भी उन्हें एहसास होने लगा था कि उनके देश को एक बार फिर अलग-थलग करने की सोच बन गई है। पाकिस्तान के रास्ते मध्य एशियाई देशों से होते हुए यूरोप तक पहुंचने के लिए वन बेल्ट वन रोड का महत्वाकांक्षी प्रकल्प जिस तरह झमेले में फंस गया उससे वे काफी परेशान थे। और इसीलिये चीन ने बिना देर लगाए रूस के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया। इसमें गौर करने वाली बात ये है कि पुतिन और जिनपिंग की तासीर एक जैसी है। दोनों ने अपने देश पर इस तरह शिकंजा कस लिया है जिससे वे आजीवन राष्ट्रपति बने रहेंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो ये दोनों तानशाह बन चुके हैं और इसीलिये उन्हें एक साथ खड़े होने में कोई हिचक नहीं है। वैसे भी इनके देश की अमेरिका और उसके समर्थकों से पुरानी दुश्मनी रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका और उसके मित्र राष्ट्रों द्वारा आर्थिक प्रतिबन्ध लगाकर रूस को घेरने का जो फैसला लिया गया उससे बचाव के लिए चीन उसके साथ खड़ा रहेगा जो खुद एक आर्थिक और सामरिक महाशक्ति बन बैठा है। आज की स्थिति में जहां अमेरिका खुद ही अंतर्द्वंदों में फंसा है वहीं यूरोप भी अब तक कोरोना की मार से उबर नहीं सका। इस वजह से पुतिन और जिनपिंग की जोड़ी नए विश्व नेतृत्व का चेहरा बन सकती है। अब तक ये दोनों अकेले रहने पर अलग-थलग कर दिए जाने के खतरे से जूझ रहे थे। लेकिन इस संकट के बहाने इन दोनों का करीब आना अमेरिका और यूरोपीय देशों के अलावा भारत के लिए भी चिंता का कारण बन सकता है क्योंकि चीन का समर्थन रूपी उपकार पुतिन को पाकिस्तान के प्रति नर्म रवैया अपनाने के लिए बाध्य कर सकता है। जिससे सुरक्षा परिषद में भारतीय हितों को रूसी वीटो रूपी संरक्षण खतरे में पड़ने का अंदेशा है। इस प्रकार भारत के लिए ये स्थिति बहुत ही नाजुक है क्योंकि न तो वह किसी एक खेमे में जाने का कदम उठा सकता है और न ही लम्बे समय तक निर्लिप्त बने रहना आसान होगा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की ताजा मास्को यात्रा का निहितार्थ समझना भी भारत के लिए जरूरी है क्योंकि उनका देश दिवालिया होने के कगार पर है और ऐसे में वे बिना चीनी योजना के कोई बड़ी कूटनीतिक मुहिम छेड़ने की हैसियत में नहीं हैं। यूक्रेन संकट ऐसे समय गम्भीर हुआ जब दुनिया के ताकतवर कहे जाने वाले देशों में कद्दावर नेताओं का एक तरह से अभाव नजर आ रहा है। इसीलिए पुतिन ने विश्व जनमत को लात मारने की जुर्रत की। चीन के साथ उनकी जुगलबंदी से भारत के हितों पर आंच न आये ये चिंता करना जरूरी है। रूस हमारा पुराना मित्र जरूर है लेकिन हमारे पैदायशी शत्रु के साथ उसकी निकटता किसी नए संकट का आधार बन जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 23 February 2022

पूजनीय गाय आवारा पशु कैसे बन गई : राजनीतिक दलों के लिए चिंतन का विषय



उ.प्र के चुनाव में  अनेक ऐसे मुद्दे चर्चा में हैं जो कमोबेश हर जगह  सुनाई देते हैं लेकिन आवारा पशुओं से किसानों को हो रही परेशानी जिस तरह सामने आई है उसकी वजह से भाजपा के माथे पर पसीने की बूँदें छलछलाने लगी हैं | चुनावी जंग के बीच इस आशय की खबरें आ रही हैं कि किसान समुदाय आवारा पशुओं से बहुत परेशान हैं जो  नजर चूकते ही उसकी मेहनत पर पानी फेर देते हैं | अनेक किसानों ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि उन्हें रात – रात भर जागकर खेतों में रखवाली करनी पड़ती है क्योंकि जब से गोवंश के वध पर प्रतिबंध लगाया गया है तब से गायों और साड़ों की भीड़ बढ़ गई है | अनेक किसानों ने तो खेतों की कंटीले तारों से घेराबंदी भी की जबकि कुछ पक्की दीवार बना रहे हैं जिस पर मोटी रकम खर्च होने से वह सबके बस में नहीं है  | चूंकि अब खेती में बैलों का उपयोग काफ़ी  कम हो गया है इसलिए गोपालन के प्रति आम तौर पर किसान उदासीन हो चला है | जहाँ तक बात दुग्ध उत्पादन की है तो पशुपालन पर होने वाले खर्च की तुलना में उसे दूध खरीदना ज्यादा आसान और सस्ता प्रतीत होता है | फसलों की कटाई हार्वेस्टर से होने के कारण भूसा भी अब पहले जितनी मात्रा में नहीं मिलता | इसीलिए जब गाय  दूध नहीं देती तब उसे पालने वाले भी उसे छुट्टा छोड़ देते हैं | इसका प्रमाण हाइवे पर शाम के समय बैठे उनके झुंडों  से मिलता है जो वाहन चालकों की परेशानी  के साथ ही दुर्घटनाओं का कारण भी बनते हैं | शहरों में भी ये समस्या दिनों – दिन बढ़ती जा रही है | कुछ साल पहले तक उ.प्र के किसान नील गायों से त्रस्त थे जिनके जत्थे उनकी फसल चर जाया करते थे | लेकिन जब से गोवंश के वध पर रोक लगाई गई तब से  आवारा गाय और सांड़ों द्वारा  फसल चर  जाने की घटनाएँ जिस तेजी  से बढ़ीं उनके कारण  ये चुनावी मुद्दा बन गया है | हिन्दू समुदाय में गाय चूँकि पवित्र और  पूजित है इसलिए उसे  मारने से परहेज किया जाता था | जब वह  बूढ़ी हो जाया करती थी तब उसे कसाई को बेचने का चलन था लेकिन बड़ी संख्या ऐसे लोगों की ही थी जो गाय को जीवित रहते तक बेचते नहीं थे | मरने के बाद उसके चमड़े का उपयोग बहरहाल जूते आदि बनाने में किया जाता रहा  |  गोवंश का राजनीति से भी गहरा  सम्बन्ध रहा है | भारत की 80 फीसदी आबादी चूंकि ग्रामीण थी इसलिए आजादी के बाद कांग्रेस ने अपना चिन्ह बैल जोड़ी को चुना | महात्मा गांधी भी गोरक्षा की हामी रहे | 1969 में पार्टी का विभाजन होने पर इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले धड़े ने भी गाय बछड़ा चुनाव चिन्ह चुना ,  जिससे वह खुद को गाँव और किसानों से जुड़ा साबित कर सके | आज भी देश की संसद और और विधानसभाओं में बड़ी संख्या उन जनप्रतिनिधियों की  है जिनका मुख्य व्यवसाय कृषि है और जो बात – बात में गाँव और किसानों  की चिंता जताते हैं | लेकिन समय के साथ ज्यों – ज्यों ग्रामीण क्षेत्रों से मानव संसाधन का पलायन हुआ त्यों – त्यों मानवीय श्रमिक का स्थान मशीन लेने लगी  और वहीं से कृषि कार्य में गोवंश की भूमिका कम होती गयी | जब तक गाय और बैल खेती से जुड़े रहे  तब तक किसान को  उनकी जरूरत रही किन्तु ट्रैक्टर , थ्रेशर , कल्टीवेटर और हार्वेस्टर जैसे उपकरणों के आगमन ने गाय और बैल को हाशिये पर धकेल दिया | रही सही कसर पूरी कर दी सड़क और बिजली ने | गाय और भैंस जैसे दुधारू पशुओं के गोबर से बनने वाले कंडे जहाँ ग्रामीण भारत में ईंधन का बड़ा स्रोत थे वहीं गोबर से बनी  खाद खेत की उर्वरक क्षमता बढ़ाने के काम आती थी | और फिर दूध तथा उससे बनने वाली  अन्य चीजें किसान के पोषण और अतिरिक्त आय का स्रोत हुआ  करती थीं | लेकिन तकनीक के विकास के साथ उन्नत खेती ने कृषि  का पूरा चरित्र बदल दिया जिसके कारण उसके साथ पशुपालन का जो अटूट नाता था वह छिन्न – भिन्न हो गया | मुंशी प्रेमचंद की हीरा – मोती और गोदान जैसी कालजयी कृतियां अब कल्पनालोक का एहसास कराती हैं | कहने का आशय ये हैं कि गाँव और खेती को नया रूप देते समय हमारे नीति – निर्माता  ये भूल गये कि पशुपालन ग्रामीण भारत की  अर्थव्यवस्था का ठोस  आधार रहा है | रासायनिक खाद और विषैले कीटनाशकों ने गाय और गोबर दोनों की उपयोगिता को इस हद तक घटाया कि वे बोझ लगने लगे | शहरों में भी गाय पालने का जो रिवाज था वह आधुनिकता के विकास और संयुक्त परिवारों के विघटन के कारण गुजरे ज़माने की चीज बनकर रह गया | जो जगह गाय की होती थी उसमें कार गैरेज बनने लगे | बहुमन्जिला आवासीय संस्कृति ने तो जनजीवन को पूरी तरह बदल डाला | लेकिन  अचानक लगने लगा कि ऐसा कुछ पीछे छूट गया है जिसके अभाव में विकास के साथ विनाश दबे पाँव चला आया | और तब फिर से गाय , गोबर , जैविक खेती याद आने के बाद शुरु हुआ गाय के संरक्षण और संवर्धन का सिलसिला | बेशक इसमें राजनीति भी घुसी जिसके परिणामस्वरूप गोवंश के वध पर रोक लगाने जैसे फैसले किये गये | लेकिन  गोपालन हेतु जो व्यवस्था की जानी चाहिए थी वह नहीं होने से अव्यवस्था फैलने लगी | गोशालाओं के लिए अनुदान की जो सरकारी प्रणाली  है वह ऊँट के मुंह में जीरे से भी कम है | और फिर इसमें होने वाला भ्रष्टाचार भी किसी से छिपा नहीं है | भोपाल में कुछ दिनों पहले ही ऐसी ही एक गोशाला में सैकड़ों गायों के मरने और उसके बाद उनकी दुर्गति की जो खबर आई उसने पूरा सच उगल दिया | उ.प्र में  किसान चुनाव के दौरान अपनी समस्या को लेकर सत्तारूढ़ योगी सरकार से अपनी जो नाराजगी जता रहे हैं उसे नजरंदाज करना गलत होगा | हालाँकि अब वहां के  सभी राजनीतिक दल  गोबर खरीदने के साथ ही गोपालन के लिए बेहतर सुविधाएँ  देने का वायदा करते घूम रहे हैं जिससे आवारा पशुओं की समस्या कम हो सके | जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए भी परम्परागत गोबर की खाद के उपयोग को बढ़ाने पर जोर दिया जाने लगा है | कंडों का व्यवसायिक उत्पादन  भी किया जा रहा है तथा अनेक ऑनलाइन कम्पनियाँ बाकायदा कंडे बेचने लगी हैं | सबसे बड़ी बात गाय से जुड़े अर्थशास्त्र की है | उसके दूध के औषधीय गुणों को प्रामाणिक मान लिया गया है | महानगरों में उसके दूध और उससे बने घी को ऊंचे दाम पर खरीदने वालों की अच्छी खासी  संख्या है | लेकिन इस आर्थिक पहलू को नजरंदाज कर केवल गोवध पर रोक लगाने से नई समस्या ने जन्म ले लिया | उ.प्र के चुनाव के कारण इसका  राष्ट्रव्यापी चर्चा का विषय बनना  शुभ संकेत है | वैसे भी भारत में गाय केवल एक दुधारू पशु न होकर  सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन से भी अंतरंगता से जुड़ी हुई है | माँसाहारी हिन्दू भी गोमांस का सेवन नहीं करते |  हालाँकि ये भी किसी विडंबना से कम नहीं है कि गाय के प्रति श्रद्धा रखने वाले देश से गोमांस का निर्यात बहुत बड़े पैमाने पर होता रहा है | इसके अलावा बेकार हो चुके गोवंश को अवैध रूप से बांग्लादेश भेजे जाने का कारोबार भी धड़ल्ले से चलता है | इस स्थिति के मद्देनजर अब जबकि आवारा पशु विशेष तौर पर गोवंश राजनीतिक मुद्दा बनने लगा है तब सभी  राजनीतिक दलों को चाहिये कि वे गोपालन के महत्व को आर्थिक तौर पर लोगों के मन में उतारते हुए इस बात को स्थापित करने का प्रयास करें  कि गाय जब तक जीवित है , अनुपयोगी नहीं हो सकती | लेकिन  उसके पालन और पोषण की समुचित व्यवस्था नहीं की गई तब वह उसी तरह बोझ और समस्या बनी रहगी जैसी उ.प्र से आ रही खबरें और नए बने राजमार्गों पर बैठे उनके झुण्ड बताते हैं | इसके लिए एक व्यवहारिक और ईमानदार कार्ययोजना  बनाई जानी चाहिए | गाय ऐसा पशु है जिसका दूध , गोबर , मूत्र और मरने के बाद चमड़ा तक उपयोग में आता है | राजनीति करने वालों के लिए ये चिन्तन का विषय होना  चाहिए कि पवित्र और पूजनीय मानी जाने वाली गोमाता किन कारणों से आवारा बनकर असहनीय लगने लगी | गाय के प्रति श्रद्धा का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि पूरी तरह शहरी सभ्यता में डूब चुके करोड़ों परिवारों में आज भी पहली रोटी गाय की बनाई जाती है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 22 February 2022

चाहें न चाहें किन्तु मानना तो संविधान को ही पड़ेगा क्योंकि धार्मिक आजादी उसी की देन है



कर्नाटक के शिमोगा में एक हिन्दू युवक की हत्या के बाद पैदा हुए तनाव ने सांप्रदायिक रूप ले लिया | चूंकि हत्या के आरोप में जिसे पकड़ा गया वह भी मुस्लिम है इसलिए तनाव और बढ़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता | इस घटना की पृष्ठभूमि माना  जा रहा हिजाब संबंधी  विवाद राज्य के उच्च न्यायालय में विचाराधीन है | एक  शिक्षण संस्थान की कक्षा में कुछ मुस्लिम छात्राओं द्वारा अचानक हिजाब पहिनकर आने के बाद प्रबन्धन ने उसका विरोध किया तो मामला और बढ़ गया | क्रिया की प्रतिक्रिया का असर धीरे – धीरे   देश के अन्य  हिस्सों में भी नजर आने लगा और बहस मुस्लिम परम्पराओं के पालन की  अनिवार्यता पर आकर टिक गयी | हिजाब के उपयोग के  प्रति मुस्लिम समुदाय की जो युवतियां उदासीन हो चली थीं वे भी अचानक पर्दानशीं दिखने  लगीं | जाहिर है इसके पीछे धर्मिक कट्टरपन ही है अन्यथा इस समाज की नई पीढ़ी  धर्म का पालन करते हुए भी दकियानूसीपन से बाहर  निकलने को बेताब नजर आने लगी है | लेकिन कर्नाटक में जो हुआ उसकी शुरुआत किसी धार्मिक आदेश या परंपरावश न होकर किसी ऐसे संगठन के इशारे पर हुआ जो  धार्मिक कट्टरता के फैलाव का काम कर रहा है | यही वजह थी कि कक्षा में अचानक हिजाब के  उपयोग की जिद पकड़ ली गई | पूर्व में वही छात्राएं संस्थान के नियमों के अनुसार परिसर में आने तक ही हिजाब का उपयोग करती थीं किन्तु कक्षा में उसके उपयोग का हठ उन्हें क्यों और कहाँ से सूझा इसका संतोषजनक उत्तर मिलना बहुत जरूरी है क्योंकि इसी में वह राज छिपा हुआ है जिससे बात इस हद तक बढ़ी | जहाँ तक इसके चुनाव से जुड़ने की बात है तो ध्यान देने योग्य बात ये है कि जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वे सब कर्नाटक से काफी दूर हैं | सबसे करीबी राज्य गोवा में भी मुस्लिम मत उतने प्रभावशाली नहीं हैं | लेकिन जिस तरह से हिजाब को लेकर मुस्लिम समुदाय खुलकर सामने आया और काफी हद तक उसने आक्रामक रुख प्रदर्शित किया , वह चौंकाने वाला रहा | देश भर के मुस्लिम संगठन और धर्मगुरु शरीयत के मुताबिक चलने की बात कहते हुए हिजाब के औचित्य को अधिकार की शक्ल में साबित  करने में जुट गए | इस बारे में ये कहना गलत न होगा कि मुस्लिम समाज में नई पीढ़ी की लडकियां तक अपने विचार खुलकर व्यक्त करने में डरती हैं , इसलिए उनकी इच्छा सही रूप में बाहर नहीं आ पाती | 21 वीं सदी में भी इस  समुदाय के ज्यादातर लोग मुल्ला – मौलवियों की हिदायतों को बिना जांचे – परखे मान लेने की मानसिकता वाले हैं | हालांकि नेता या नौकरशाह बने अनेक  मुस्लिमों  में आधुनिक जीवन शैली का पालन करने की प्रवृत्ति विकसित होने लगी है लेकिन बहुतायत उन्हीं की है जो शरीयत से इतर सोचने का साहस नहीं कर पा रहे | सबसे बड़ी बात ये है कि मुल्ला  – मौलवी   धार्मिक नियमों और रीति – रिवाजों का जो हवाला देते हैं  उनके बारे में भिन्न विचार व्यक्त करने वालों को खलनायक मानकर किनारे कर दिया जाता है | हिजाब को लेकर चल रहा विवाद दरअसल एक शिक्षण संस्थान के  अनुशासन को तोड़ने की  जिद पर आधारित है जिसे धार्मिक अधिकार का नाम दे दिया गया | जहाँ तक बात धर्म के पालन की स्वतंत्रता की है तो वह संस्थागत अनुशासन और देश के कानून से ऊपर नहीं हो सकती | इसीलिये सऊदी अरबी जैसे कट्टर इस्लामी देश में सड़क चौड़ी करने के लिए यदि मस्जिद हटा दी जाती है तो कोई विरोध नहीं होता | वैसे मुस्लिम समुदाय में भी मुल्ला – मौलवियों का वैसा ही प्रभाव है जैसा हिंदुओं  में साधू – सन्यासियों और ईसाइयों में पादरियों का | जैन मुनि भी अपने  धर्म को मानने वालों को प्रेरित और प्रभावित करते हैं जबकि सिखों में गुरुद्वारों से कही गयी बात का वजन होता है | इन धर्मों में भी कट्टर सोच वाले धर्माचार्य और अनुयायी न हों ऐसा सोचना सच्चाई से मुंह चुराना होगा परन्तु  ये कहना सौ फीसदी सही है कि भारत के  मुस्लिम समुदाय में सुधारवादी सोच का विकास तुलनात्मक तौर पर  धीमा होने से ये समाज शैक्षणिक और सामाजिक तौर पर मुख्यधारा में आने से वंचित है |  ये देखकर आश्चर्य होता है कि आज तक मुसलमानों को ये बात  समझ नहीं आ रही कि उनको पिछड़ा रखना बड़े षडयंत्र का हिस्सा है , जिसे रचने वाले उनके कतिपय धर्मगुरु और राजनेता हैं | इन दोनों की संगामित्ती ने इस समुदाय को वोट बैंक रूपी छोटी सी  हैसियत देकर आत्ममुग्ध  कर रखा है | बजाय हिजाब जैसी बहस में उलझने के यदि मुस्लिम समुदाय अपनी बदहाली के असली कारणों को समझकर उन्हें दूर करने के बारे में प्रयासरत हो तो वह अपने धर्म का बेहतर तरीके से पालन कर सकेगा | आज इस समुदाय की जो शैक्षणिक और सामाजिक बदहाली है उसकी वजह वही मुद्दे हैं जिनमें उलझकर उसके नौजवान भी अपने भविष्य को असुरक्षित और अनिश्चित बना रहे हैं | कर्नाटक में एक छोटे से विवाद को स्थानीय स्तर पर सुलझाने की समझदारी दिखाई जाती तब गत दिवस हुई हत्या जैसी वारदात से बचा जा सकता था | अब उसकी प्रतिक्रया में वैसी ही जघन्यता दिखाई गई तब बात और बढ़ेगी | राजनीति की अपनी कार्यशैली है जो वोट से शुरु होकर उसी पर खत्म भी हो जाती है | हिजाब विवाद के पीछे और आगे भी यही नजर आ रहा है | इसलिए बेहतर तो यही होगा कि उच्च न्यायालय के फैसले का इंतजार किया जावे | उससे असंतुष्ट पक्ष चाहे तो सर्वोच्च न्यायालय भी जा सकता है | लेकिन सड़क पर ही ऐसे मामलों को घसीटा जाता रहा  तो फिर खून – खराबे  जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ होती रहेंगी | चुनाव का मौजूदा दौर तो कुछ  दिनों के बाद खत्म हो जायेगा लेकिन ऐसी घटनाओं के घाव नहीं  भरते | मुसलमान भी इस देश के हिस्से हैं और  उनको भी जो धार्मिक आजादी प्राप्त है वह  संविधान ने ही दी है | इसलिए उन्हें अपने बीच के उन लोगों को रोकना चाहिए जो ये कहते हैं कि वे शरीयत को मानेंगे संविधान को नहीं | ऐसे लोगों को ये समझाने की जिम्मेदारी मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों के साथ सुधार के पक्षधर धर्मगुरुओं की है कि संविधान की अवहेलना करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा क्योंकि जिस धर्म निरपेक्षता का राग दिन रात अलापा जाता है वह किसी धार्मिक ग्रन्थ की नहीं अपितु  इसी संविधान की ही देन है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 21 February 2022

यूक्रेन बन रहा दूसरा अफगानिस्तान : भारत को सावधान रहना होगा



रूस और यूक्रेन के बीच छिड़ी वर्चस्व की लड़ाई में जिस तरह से अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के बड़े देश कूद रहे हैं उससे  दुनिया के सामने नया संकट पैदा हो गया है | यूक्रेन पश्चिमी यूरोप का हिस्सा है और सोवियत संघ से अलग हुए देशों में सबसे बड़ा है | रूस द्वारा यूरोपीय देशों को प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम की आपूर्ति यूक्रेन के रास्ते ही होती रही है |  सोवियत संघ टूटने  के बाद से ही उसकी नजरें यूक्रेन पर लगी हुई हैं | इसीलिये उसने वहां ऐसी अलगाववादी ताकतों को दाना – पानी देकर सक्रिय किया जो रूस के साथ विलय चाहते हैं | द्वितीय विश्व युद्ध में वह यदि सुरक्षित रह सका तो उसका कारण यूक्रेन ही रहा जिसके विशाल भूभाग में हिटलर की  सेना ऐसी फंसी कि मास्को फतह करने का उसका सपना चूर – चूर हो गया | उस महायुद्ध में मित्र देशों की विजय की शुरुआत भी रूस पर नाजी सेनाओं के कब्जे की विफलता से ही हुई | सोवियत संघ के लिए यूक्रेन एक तरह से पश्चिमी यूरोप का प्रवेश द्वार जैसा है जिसे वह हर कीमत पर अपने प्रभाव  में रखना चाहता है | हालाँकि 1917 की साम्यवादी क्रांति के बाद भी कुछ समय तक वह  स्वतंत्र देश रहा किन्तु 1920 में  सोवियत संघ का हिस्सा बन गया | 1991 में उसके बिखरने के बाद  रूस आर्थिक दृष्टि से काफी कमजोर होकर अमेरिकी मदद पर आश्रित हो चला था | कुछ समय तक तो ऐसा लगा कि वह पूरी तरह से उसके प्रभाव में आ चुका है लेकिन ब्लादिमीर पुतिन के उदय के बाद से रूसी राष्ट्रवाद फिर जागा और उसी के परिणामस्वरूप उसने यूक्रेन पर निगाहें गड़ाना शुरू किया | 2014 में कीमिया  बंदरगाह पर कब्जा उसी योजना का हिस्सा था | लेकिन ये देखते हुए यूक्रेन के शासकों ने भी  अमेरिका से सम्पर्क बढ़ाने  शुरू कर दिये  जिससे रूस के कान खड़े हो गये | पश्चिम एशिया के  सीरिया संकट में रूस का सीधा हस्तक्षेप भी इसी कारण से  था | कुल मिलाकर यूक्रेन के बहाने साठ के दशक का शीतयुद्ध फिर आकार लेता दिख रहा है | अपनी सुरक्षा के लिए खतरा देखते हुए यूक्रेन द्वारा  अमेरिका के प्रभुत्व वाले नाटो गुट में शामिल होने का इरादा व्यक्त किये जाने से पुतिन की चिंता बढ़ गई है | यूक्रेन के रास्ते अपने पेट्रोलियम उत्पाद पश्चिमी देशों विशेष रूप से जर्मनी और फ्रांस को बेचने में बाधा आने से रूस बेचैन है वहीं अमेरिका का सोचना है कि अफगानिस्तान से खाली हाथ और काफी हद तक बेइज्जत होकर निकलने के बाद रूस पर निगाह रखने के लिए उसे कोई निकटवर्ती ठिकाना चाहिए | यूक्रेन उस दृष्टि से उसे सबसे उपयुक्त लगा जो खुद भी दोबारा मास्को के प्रभाव में नहीं लौटना चाहता | रूस ने यूक्रेन में तालिबानी शैली के उग्रवादी तैयार कर गृहयुद्ध के हालात पैदा करने के बाद अपनी सेनाओं से उसे पूरी तरह घेरकर हमले का माहौल बना दिया परन्तु  अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद वह स्थिति फ़िलहाल तो रुकी हुई है | लेकिन यूक्रेन की सेना और  रूस समर्थक अलगाववादियों के बीच लड़ाई जारी है | इस विवाद में अमेरिका समर्थक अनेक पश्चिमी देश उसके विरोध में खड़े हो गये हैं जिनकी कच्चे तेल और गैस सम्बन्धी जरूरतें रूस से पूरी होती हैं | इस तरह  देखा जाए तो इस झगड़े के पीछे भी तेल का खेल ही है | जिस तरह अमेरिका पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक देशों पर शिकंजा कसते हुए वैश्विक अर्थव्यवस्था को अपने मुताबिक चलाने के मंसूबे पालते हुए युद्ध के हालात बनाये रखता है वैसी ही परिस्थिति अब वह यूक्रेन के बहाने पैदा करने की फ़िराक में है | हालांकि इस संकट के लिए रूसी राष्ट्रपति पुतिन  भी कम जिम्मेदार नहीं हैं जो अपनी सत्ता मजबूत करने के बाद अब उसी तरह का विस्तारवाद करना चाह रहे हैं जो कभी सोवियत संघ की नीति थी जिसके अंतर्गत उसने पूर्वी यूरोप में वारसा संधि के द्वारा नाटो की टक्कर में एक ऐसा गुट बना रखा था जिसके जरिये वह अपने आर्थिक हितों को भी साधता रहा | यूक्रेन को बलपूर्वक हथियाने की पुतिन की रणनीति का मकसद दरअसल सोवियत संघ के बिखरने के बाद रूस के वर्चस्व में आई कमी की भरपाई करना है | यदि अमेरिका अभी भी अफगानिस्तान में उलझा होता तब शायद वह इस आग के पास जाने की जुर्रत न करता लेकिन अफगानिस्तान और ईरान दोनों में उसे निराशा और बदनामी मिलने से वह  रूस से बदला लेने का मौका तलाश रहा है | इसके पीछे एक कारण हाल ही में पुतिन द्वारा  चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई वार्ता में ताईवान को  चीन का हिस्सा मान लेना भी है | दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभुत्व के विरुद्ध अमेरिका , जापान और आस्ट्रेलिया के साथ भारत की साझा मोर्चबंदी में भी रूस द्वारा चीन की तरफदारी ही की जा रही है | इस प्रकार जो चीन शीतयुद्ध के दौर में भी रूसी शिविर से दूर रहा अब वह भी बदलती वैश्विक परिस्थितियों में उससे जुड़ता दिख रहा है | अमेरिका ने इसीलिए रूस को उसी के निकट जाकर घेरने की बिसात बिछाई जिसमें यूक्रेन मैदान  बन गया | कुल मिलाकर बड़ी ताकतें दुनिया में शांति नहीं रहने देना चाहती | पश्चिम एशिया , अफगानिस्तान अथवा दक्षिण एशिया में तनाव बनाए रखने में सदैव इन्हीं  की भूमिका रहती है | जिस तरह से अमेरिका यूक्रेन सहित पूर्वी यूरोप के कुछ देशों को हथियार आदि दे रहा है और रूस यूक्रेन के विद्रोहियों की पीठ पर हाथ रखे है उससे पूरी कहानी समझी जा सकती है | लेकिन इस नए शीतयुद्ध से केवल यूरोप ही नहीं बल्कि भारत जैसे देश भी सीधे प्रभावित हो रहे हैं | यूक्रेन संकट की आहट मात्र से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं | रूस से उसके निर्यात में कमी होने से पश्चिमी यूरोप की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ने की  आशंका से जर्मनी और फ़्रांस जैसे देश अमेरिका के विरुद्ध खड़े नजर आने लगे,  जो बड़ा बदलाव है | भारत  अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है  , इसलिए उसे इस संकट ने  झटके देना शुरू कर दिया | अमेरिका के साथ रिश्ते सुधारने के फेर में भारत ने ईरान से सस्ता तेल खरीदने की व्यवस्था को स्थगित  कर रखा था | रूस भी सैन्य सामग्री की  आपूर्ति में हमारा बड़ा सहयोगी बना हुआ है जिसकी वजह से पश्चिमी ताकतें और अमेरिका के दबाव से हम काफी हद तक मुक्त हो सके | लेकिन यूक्रेन में  युद्ध हुआ तो   कोरोना संकट से निकलकर पुरानी रंगत में लौट रही भारत की अर्थव्यवस्था पर फिर ग्रहण लग जावेगा | इसके अलावा विदेश नीति के मोर्चे पर भी हमको अपनी भूमिका  का निर्धारण  बहुत  ही सावधानी  से करना होगा | यूक्रेन से नजदीकी का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि वहां हजारों भारतीय छात्र शिक्षारत हैं जिनको वापिस लौटने की सलाह दे दी गई है | रूस , चीन , अमेरिका और  जर्मनी के साथ ही यूक्रेन सहित मध्य एशिया के अनेक देश इस समय भारत के साथ व्यापार एवं अन्य  माध्यमों से जुड़े हैं |  युद्ध की स्थिति में इन सबके साथ समन्वय बनाए रखना बेहद कठिन होगा | वैश्विक शक्ति सन्तुलन  में भारत की भूमिका वर्तमान में बहुत ही महत्वपूर्ण हो चली है | कोरोना काल के बाद पूरे विश्व को भारत में वैसी ही संभावनाएं नजर आने लगी हैं जैसी बीती सदी के अंत तक चीन को लेकर महसूस की जा रही थीं | हालाँकि अभी भी ये सम्भावना है कि रूस और अमेरिका सीधे न टकराएँ लेकिन यदि ऐसा होता है तब भारत को अपने आर्थिक और रणनीतिक हित सुरक्षित रखने के लिए अभी से कार्ययोजना तैयार कर लेनी चाहिए क्योंकि मौजूदा हालात में हम रूस और अमेरिका दोनों के साथ काफी करीबी से जुड़े हुए हैं और उनमें से किसी से भी दूरी हमारे दूरगामी हितों के लिहाज से नुकसानदेह होगी | इस बारे में सबसे बड़ी बात ये है कि उदारीकरण के बाद बने  वैश्विक परिदृश्य में अब तटस्थ रहना बहुत कठिन है | और भारत भी अब उस हैसियत में है जब इस तरह के विवादों में अपनी भूमिका का प्रभावशाली तरीके से निर्वहन कर सके |

- रवीन्द्र वाजपेयी