Thursday, 7 July 2022

काली के हाथ में समलैंगिकता के प्रतीक का क्या औचित्य



जब नूपुर शर्मा द्वारा  मो. पैगम्बर के बारे में की गई टिप्पणी पर विवाद हुआ तब प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी भी उनके विरुद्ध खड़ी होकर  मांग करने लगीं कि नूपुर की गिरफ्तारी की जाए | बाद में उदयपुर की घटना हो गई और फिर जानकारी आई कि महाराष्ट्र के अमरावती शहर में भी नूपुर समर्थक एक हिन्दू की कट्टरपंथी मुसलमानों ने हत्या कर दी थी | इन हत्याओं की ममता ने कितनी निंदा की ये तो पता नहीं  चला लेकिन कैनेडा में रह रहीं फिल्म निर्माता लीना मणिमेकलई द्वारा बनाये गए वृत्त चित्र काली का एक पोस्टर जारी होने पर मचे विवाद में उनकी अपनी पार्टी की सांसद महुआ मोइत्रा ने आग में घी डाल दिया | उस पोस्टर में हिन्दुओं की आराध्य काली माता को  एक हाथ में सिगरेट के साथ ही दूसरे हाथ में एलजीबीटी ( लेस्बियन, गे, बायो सेक्सुअल और ट्रांस जेंडर ) समुदाय का झंडा लिए दिखाया गया है | कैनेडा में बने उस वृत्त चित्र के पोस्टर की जानकारी जैसे ही मिली भारत में हिन्दू समाज आक्रोशित हो उठा | भले ही  सिर तन से जुदा जैसी बातें सुनने नहीं मिलीं लेकिन हिन्दू धर्माचार्यों के अलावा सामाजिक क्षेत्र से भी मणिमेकलई के विरुद्ध  मामला दर्ज करने की मांग उठी |  ये मुद्दा जिस तेजी से गरमाया उसके पीछे एक वजह नूपुर शर्मा विवाद में मुस्लिम समुदाय की उग्र प्रतिक्रिया भी थी  जिसके कारण दंगे और हत्या जैसी घटनाओं को अंजाम दिया गया और धमकियों का दौर अब तक जारी है | इस विवाद में गैर भाजपा राजनीतिक दल भी खुलकर मुस्लिम समुदाय के साथ खड़े हो गये जिससे उनका हौसला और बुलंद हुआ | इसी संदर्भ में ममता भी नूपुर की गिरफ्तारी की रट लगाये हुए हैं | लेकिन दो दिन पहले जैसे ही काली वाले पोस्टर को लेकर हल्ला मचा और उसकी गूँज देवी भक्त्त बंगाल में भी सुनाई देने लगी त्योंही सुश्री बैनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सदस्य महुआ मोइत्रा ने मणिमेकलई का बचाव करते हुए काली माता के हाथ में सिगरेट होने के विरोध  को निराधार बताते हुए यहाँ तक कह दिया कि उन्हें एक व्यक्ति के रूप में  काली माता को  मांस और मदिरा का सेवन करने वाला मानने का पूरा अधिकार है और हर व्यक्ति के अनुष्ठान का तरीका अलग होता है | लिहाजा संदर्भित पोस्टर में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है | उनके इस बयान की दुर्गा भक्त प. बंगाल में भी तीखी प्रतिक्रिया हुई और राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने बिना देर किये उस बयान से पल्ला झाड़कर उसकी निंदा भी कर डाली | लेकिन ममता सरकार ने उन पर धार्मिक भावनाएं भड़काने के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की | हालाँकि  अनेक राज्यों में महुआ के विरुद्ध मामले दर्ज हो चुके हैं लेकिन उन्होंने अपना बयान वापिस लेने से इंकार करते हुए कहा वे अदालत में जवाब देंगी | उल्लेखनीय है महुआ संसद में जैन धर्म के विरुद्ध भी आपत्तिजनक बातें कह चुकी हैं | देश के किसी भी राजनीतिक दल ने उनका समर्थन करने का साहस नहीं किया लेकिन कांग्रेस सांसद शशि थरूर जरूर ये कहते हुए बचाव करते दिखे कि जो महुआ ने कहा वह पूरा देश जानता है | सवाल ये है कि एक तरफ तो ममता बैनर्जी  नूपुर शर्मा द्वारा अपना बयान वापिस लिए जाने के बाद भी उनकी गिरफ्तारी की मांग पर अड़ी हुई हैं लेकिन उनकी अपनी पार्टी की लोकसभा सदस्य द्वारा हिन्दुओं की आराध्य काली माता के बारे में की गई आपत्तिजनक टिप्पणी के विरुद्ध  गिरफ्तारी जैसा कदम उठाने के बारे में मौन हैं | महुआ ने अपने ट्विटर हैंडिल  से तृणमूल कांग्रेस का चिन्ह  तो हटा दिया लेकिन वे अभी भी सुश्री बैनर्जी को फालो कर रही हैं | कांग्रेस ने भी अब तक श्री  थरूर के बयान के बारे में कुछ नहीं कहा जबकि उसे स्पष्ट करना चाहिए कि वह उनसे सहमत है या नहीं ? लेकिन मणिमेकलई द्वारा काली का जो पोस्टर जारी किया गया उसमें उनके हाथ में सिगरेट के अलावा एलज़ीबीटी समुदाय का जो ध्वज दिखाया गया है उसका काली जी से क्या सम्बन्ध है ये न तो मणिमेकलई ने स्पष्ट किया और न ही महुआ और श्री  थरूर इस बारे में कुछ बोलने का साहस दिखा रहे हैं | महुआ एक मुखर सांसद हैं वहीं श्री थरूर उच्च शिक्षित और बहुत ही अध्ययनशील राजनेता माने जाते हैं | लेकिन इन दोनों को ये बताना चाहिए कि काली के हाथ में समलैंगिक और उभयलिंगी मानसिकता वाले लोगों के सांकेतिक चिन्ह का क्या औचित्य है और क्या ये सरासर हिन्दुओं की धार्मिक आस्था का अपमान नहीं है | ऐसा लगता है इस देश में धर्म निरपेक्षता के बंधन केवल हिन्दू समाज के लिए रह गये हैं | तभी तो उसके आराध्य देवी – देवताओं के बारे में जिसे देखो आपत्तिजनक पेंटिंग और फिल्म बना देता है | हिन्दू देवियों के नग्न चित्र बनाने वाले मकबूल फ़िदा हुसैन का जब विरोध हुआ तब वही  तबका उनके बचाव में सामने आ गया जिसे असहिष्णु होने के कारण ये देश  असुरक्षित लगता है | न केवल हिन्दू देवी – देवाताओं अपितु ऐतिहासिक चरित्रों के बारे में भी निराधार बातें प्रचारित करने का चलन है | बेहतर हो इस बारे में एक समान सोच विकसित की जाए | अन्यथा कोई भी ऐरा – गैरा कुछ भी अनर्गल बकवास करते हुए समाज में  आपसी विद्वेष फैलाने का प्रयास करता रहेगा | महुआ और श्री थरूर दोनों संसद  सदस्य हैं | ऐसे में उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे धर्म जैसे मामले में बोलते समय केवल  अपना ज्ञान न बघारें अपितु मर्यादा की सीमा रेखा का पालन करें | ये भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिन्दुओं के भीतर ही ऐसे लोग हैं जो अपने धर्म के बारे में फैलाई जा रही अनर्गल बातों की निंदा करने के बजाय उसका समर्थन करते हैं | तृणमूल कांग्रेस ने तो महुआ के बयान से किनारा कर  लिया लेकिन कांग्रेस श्री थरूर के बारे में क्या करती है इस पर सभी की निगाहें लगी रहेंगी | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 6 July 2022

हवाई यात्रा : घटती सुविधाएँ , बढ़ती असुरक्षा



हवाई यात्रा : घटती सुविधाएँ , बढ़ती असुरक्षा

भारत में उड्डयन व्यवसाय  का विस्तार काफी तेजी से हो रहा है | एक जमाना था जब गिने चुने शहर ही हवाई सेवा से जुड़े  थे और केवल संपन्न वर्ग ही उसका लाभ उठाता था या फिर वे  जिन्हें मुफ्त में उड़ान की सुविधा प्राप्त है | लेकिन उदारीकरण के बाद जब एयर इण्डिया और इन्डियन एयर लाइंस का एकाधिकार समाप्त होने के बाद निजी क्षेत्र की अनेक विमानन कम्पनियाँ इस व्यवसाय में उतरीं तब ये सवाल  भी उठाया गया कि गरीब समझे जाने वाले भारत सदृश देश में  हवाई सेवा का विस्तार कारगर होगा या नहीं ? लेकिन समय के साथ ज्यों – ज्यों वायु सेवा और हवाई अड्डे विकसित होते गए त्यों  – त्यों तमाम आशंकाएं दरकिनार होती चली गईं | आज ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि बीते  दो दशक के दौरान  भारत में एक नया उच्च मध्यम आय  वर्ग उत्पन्न हुआ जिसने हवाई सेवा के उपयोग पर संपन्न वर्ग के एकाधिकार को समाप्त कर  दिया | ये समाज की सोच में आये उस बदलाव का प्रमाण है जिसके अंतर्गत कमाई होने पर उसे खर्च करने की प्रवृत्ति का भी विकास हुआ जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में उपभोक्तावाद कहा जाता है | इसका एक कारण ये भी है कि बीते दो दशक में महानगरों के अलावा मध्यम श्रेणी के शहरों में भी हवाई अड्डे विकसित किये गए | उसके कारण निकटवर्ती क्षेत्रों के रहवासियों को इनका उपयोग करने की सुविधा मिली | और फिर सूचना तकनीक ( आई .टी ) सेक्टर कहे जाने वाले क्षेत्र में कार्यरत युवाओं द्वारा  हवाई यात्रा को प्राथमिकता दिए जाने से भी इस व्यवसाय में निजी कंपनियों का पदार्पण तेजी से हुआ | उन्होंने भी इस बात को समझा कि यदि हवाई यात्रा को लोकप्रिय बनाना है तो उसके प्रति समाज की अवधारणा बदलते हुए ये मानसिकता विकसित करनी होगी कि हवाई जहाज में बैठना अब केवल अमीरों की बात नहीं रही | इस दिशा में  हुए प्रयासों का ही नतीजा रहा कि विमानन कंपनियों ने मध्यम वर्ग  के अनुकूल  टिकिट दरें रखीं | मध्यम दर्जे के शहरों तक वायु सेवा पहुंचने से इन कम्पनियों को एक नया यात्री वर्ग तो मिला ही परन्तु  सबसे बड़ा लाभ ये हुआ कि एक विमान को दिन में कई फेरे लगाने का अवसर मिलने लगा जिससे कि उससे होने वाली आय में भी अप्रत्याशित वृद्धि हुई | और यही वजह है कि निजी क्षेत्र की अनेक एयर लाइंस ने अपना कारोबार शुरू करते हुए उड्डयन व्यवसाय को नई ऊंचाई प्रदान की | अनेक उपभोक्ता सर्वेक्षण संस्थाओं के अध्ययन में ये बात निकलकर आई कि रेल गाड़ी के वतानुकूलित प्रथम और द्वितीय श्रेणी में सफर करने वाले यात्री हवाई यात्रा की तरफ तेजी से उन्मुख हुए | किराया थोड़ा ज्यादा होने पर भी समय की बचत ने उन्हें बजाय रेल के विमान यात्रा की ओर आकर्षित किया | निश्चित रूप से ये एक  क्रांति कही जा  सकती है क्योंकि दस साल पहले तक ये किसी कल्पना से कम न था | लेकिन तमाम उपलब्धियों के बीच कुछ ऐसी चीजें भी हुईं और हो रही हैं जो हवाई यात्रा के साथ जुड़े खुशनुमा एहसास को ठेस पहुंचाती हैं | मसलन उड़ान में विलम्ब की समय रहते सूचना न देना और हवाई अड्डे पर आ चुके यात्रियों की सुविधा के प्रति लापरवाही , उड़ान रद्द हने पर वैकल्पिक व्यवस्था में अड़ंगेबाजी , विमान में  इकानामी श्रेणी की सीटों  को  असुविधाजनक बनाये जाने के साथ ही यात्रियों को मिलने वाले चाय – नाश्ते में कटौती के अलावा हवाई अड्डों पर एयर लाइंस के जो काउन्टर होते हैं उनमें बैठने वाले कर्मचारियों का असंन्तोषनक व्यवहार जैसी शिकायतें निरंतर बढ़ती जा रही हैं | एक ही परिवार द्वारा एक ही टिकिट पर यात्रा करने के बाद  भी सभी को अलग – अलग सीटें देना और साथ बैठने के लिए अतिरिक्त शुल्क की मांग जैसी बातों से हवाई यात्रियों के मन में गुस्सा बढ़ रहा है | शिकायत करने पर उसका निराकरण भी सरकारी तरीके से किया जाने लगा है | लेकिन सबसे चिंताजनक बात ये है कि ज्यादा  से ज्यादा फेरे लगाने के चक्कर में विमानों  का समुचित रखरखाव नहीं होने से उड़ानों में विलम्ब के अलावा उनके चाहे जब रद्द होने और उड़ान के बीच खराबी के कारण आपातकालीन लैंडिंग जैसी घटनायें बढ़ रही हैं | बीते कुछ दिनों में ही अनेक विमानों को तकनीकी खराबी के कारण उड़ान भरने के बाद उतारना पडा | ऐसे में उड्डयन मंत्रालय का ये दायित्व है कि वह न सिर्फ यात्री सुविधाओं में आ रही कमी पर ध्यान दे अपितु एयर लाइंस के विमानों में आने वाली  तकनीकी खराबियों के प्रति भी गम्भीर हो | उदाहरण के त्तौर पर एयर इण्डिया की सहयोगी एलायंस एयर लाइंस द्वारा    उपयोग किये जा रहे विमान काफी पुराने हो चुके हैं , जिन्हें विदा देने की जरूरत है | हवाई उड़ानों में सबसे महत्वपूर्ण बात होती है विमान का हर दृष्टि से दुरुस्त होना क्योंकि जरा सी तकनीकी खामी उसमें सवार लोगों की ज़िन्दगी खतरे में डाल सकती है | एयर इण्डिया को हुए भारी घाटे की वजह से सरकार  ने  उसे बेच दिया | उसके नए मालिक टाटा ने उसकी व्यवस्था में सुधार की शुरुवात भी कर दी | लेकिन खबर है अनेक निजी कंपनियां घाटे का शिकार होने जा रही हैं | ये देखते हुए सरकार को इस बारे में बेहद सतर्क रहना  होगा | एयर पोर्ट अथारिटी ऑफ़ इडिया द्वारा जिस बड़े पैमाने पर हवाई अडडे विकसित किये जा रहे हैं उनमें किये निवेश की वापिसी तभी संभव होगी जब हवाई यात्रा में लगातार वृद्धि के साथ ही वह सुविधा, समयबद्धता और सुरक्षा के पैमाने पर पूरी तरह सही और संतोषजनक हो | उस दृष्टि से भारत के उड्डयन व्यवसाय में और प्रतिस्पर्धा के साथ ही पेशेवर कार्यशैली की आवश्यकता है | सरकार द्वारा इस क्षेत्र से अपना हाथ  खींच लेने के बाद होना ये चाहिए कि देश के हवाई यात्रियों को भी विश्वस्तरीय सेवा का लाभ मिले | अब तो विदेशी कम्पनियां भी भारत में अपनी सेवाएं देने तत्पर हैं लेकिन सस्ती के नाम पर सुविधाओं और सुरक्षा की उपेक्षा करना हवाई यात्रा के आकर्षण में कमी ला सकता है | इस बारे में एक बात और भी ध्यान रखने योग्य है कि राजमार्गों को विश्वस्तरीय बनाये जाने से देश में सड़क यात्रा करने वाले तेजी से बढ़ रहे हैं | वाहनों की तकनीकी श्रेष्ठता भी इसमें सहायक हो रही है | बावजूद इसके  हवाई यात्रा में बचने वाला समय उसके प्रति रुझान पैदा करता है | निजी एयर लाइंस को चाहिए वे सरकारी ढर्रे की बजाय यात्रियों के संतोष के प्रति पूरी तरह सतर्क रहें जो हवाई यात्रा की पहली आवश्यकता है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 5 July 2022

तमिलनाडु को अलग देश बनाने की धमकी राष्ट्रद्रोह नहीं तो और क्या है



तमिलनाडु में रामास्वामी पेरियार ने न सिर्फ दलित उत्थान का आन्दोलन शुरु किया अपितु वे पृथक तमिल राष्ट्र के पैरोकार बनकर भी उभरे | तमिलनाडु की राजनीति में उनका नीतिगत प्रभाव आज भी है | वे आर्य संस्कृति के भी घोर विरोधी थे | उच्च जातियों के विरुद्ध उनका संघर्ष तमिल राजनीति की पहिचान बन गई | यद्यपि जब पेरियार ने अपने से 40 वर्ष छोटी निजी सचिव से दूसरा विवाह कर उसे अपना उत्तराधिकारी बनाया तब उनका विरोध होने लगा और उनके सबसे प्रमुख शिष्य अन्ना दोरई ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ( द्रमुक ) नामक पार्टी बनाकर अलग रास्ता पकड़ा | यद्यपि वह पार्टी भी तमिल भाषा और द्रविड़ संस्कृति के नाम पर उत्तर भारत के विरोध के रास्ते पर चली किन्तु पृथक तमिल राष्ट्र की मांग से उसने पल्ला झाड़ लिया | हालाँकि अन्ना के निधन के बाद उनके उत्तराधिकारी बने करुणानिधि और तमिल फिल्मों के सबसे बड़े नायक एमजी रामचंद्रन ( एमजीआर ) के बीच मतभेद होने पर अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ( अद्रमुक ) बनाई गई | एमजीआर के जीवनकाल में ही उनकी महिला मित्र रहीं अभिनेत्री जे.जयललिता अद्रमुक की सर्वेसर्वा बन बैठीं | वहीं करुणानिधि के अवसान के बाद उनकी चार पत्नियों की अनेक संतानों के बीच चले सत्ता संघर्ष के बाद पार्टी की कमान उनके बेटे स्टालिन के हाथ आई जो तमिलनाडु के वर्तमान मुख्यमंत्री हैं | पेरियार नास्तिक थे और उनकी  नास्तिकता समाज पर  ब्राह्मणों के वर्चस्व के विरोध की वजह से पनपी | हालाँकि बाद में दोनों द्रविड़ पार्टियाँ इस बारे में ज्यादा मुखर नहीं रहीं किन्तु देश में सबसे ज्यादा आरक्षण देने वाले राज्य के रूप में तमिलनाडु ने दलित और पिछड़ी जातियों के बड़े  वोट बैंक को द्रमुक और अद्रमुक के साथ इतनी मजबूती से जोड़ा कि 1967 से वहां इन दोनों का ही शासन बारी – बारी से चला आ रहा है } यद्यपि कांग्रेस बतौर राष्ट्रीय पार्टी मौजूद रही लेकिन उसे भी समय – समय पर उनमें से किसी एक के साथ गठबंधन करना पड़ा | भाजपा  बीते दो दशक से वहां पैर ज़माने की कोशिश कर रही है और उसे  कभी जयललिता और कभी  करूणानिधि की बैसाखी थामने मजबूर होना पड़ा | इस प्रकार  तमिलनाडु देश के उन राज्यों में है जो उत्तर पूर्व की कबीलाई संस्कृति वाले राज्यों से अलग मुख्यधारा में होने के बाद भी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहिचान बनाए रखने के प्रति सदैव सतर्क रहा और उसका हिन्दी  विरोध ज़िद की हद तक कायम है | इसका प्रमाण हाल ही में चेन्नई के उस समारोह से मिला जिसमें मुख्यमंत्री स्टालिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी के सामने ही कहा कि तमिलनाडु पर हिन्दी लादने की जुर्रत न की जावे | दरअसल उसके पहले गृहमंत्री अमित शाह ने हिन्दी को सरकारी कामकाज की भाषा बनाने की बात कही थी | इसी तरह भले ही पृथक तमिल राष्ट्र की मांग खुले तौर पर न की जाती रही लेकिन द्रमुक नेता करूणानिधि गाहे – बगाहे इसके संकेत देते रहे | और जब लिट्टे द्वारा श्रीलंका में  तमिल इलम के नाम से अलग देश बनाने का आन्दोलन गृहयुद्ध में बदल गया तब करूणानिधि भी  वृहत्तर तमिल देश का सपना संजोने लगे थे जिसमें श्रीलंका के उत्तरी हिस्से और तमिलनाडु को शामिल करने की कल्पना थी | भगवान राम को कपोल - कल्पित और रामचरित मानस को एक अच्छी काव्यकृति  बताते हुए  उन्होंने रामसेतु को तोड़कर समुद्री मार्ग विकसित करने का प्रयास भी  किया था | जब राजीव गांधी की हत्या हुई तब उसमें भी द्रमुक की भूमिका का संदेह जताया गया था | लेकिन राजनीतिक मजबूरी के चलते कांग्रेस ने द्रमुक के साथ गठबंधन किया जो आज भी जारी है | इसका परिणाम ये हुआ कि बीते 55 साल से तमिलनाडु में  सत्ता में चाहे द्रमुक रही या अद्रमुक , हिन्दी और उत्तर भारत के प्रति विरोध यथावत है | हालाँकि  दूसरे राज्यों के नागरिकों के विरुद्ध आन्दोलन जैसी बात देखने नहीं मिली और ये भी कि द्रविड आन्दोलन के जबरदस्त प्रभाव के बावजूद न तो इस राज्य से धार्मिकता समाप्त हुई और न ही सांस्कृतिक तौर पर उसे देश से अलग किया जा सका | लेकिन ऐसा लगता है मौजूदा राजनेता एक बार फिर तमिलनाडु को विवादग्रस्त बनाने की राह पर बढ़ रहे हैं | हिन्दी का विरोध भले ही राजनीतिक औजार के रूप में प्रयुक्त्त होता हो लेकिन उसमें पहले जैसी धार नहीं रही और न ही उत्तर भारत के प्रति आम जनता में किसी भी तरह का विरोध है | इसका कारण लाखों तमिल भाषियों का नौकरी के  सिलसिले में बाहर निकलना है | देश की राजधानी दिल्ली सहित ऐसा कोई बड़ा शहर नहीं होगा जहाँ तमिल भाषी न रहते हों | लेकिन गत दिवस द्रमुक नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री डी . राजा ने अपनी पार्टी के नेताओं के बीच दिये भाषण में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से मांग कर डाली कि वे तमिलनाडु को स्वयात्तता प्रदान करें अन्यथा द्रमुक पृथक तमिलनाडु राष्ट्र की  मांग करने बाध्य हो जायेगी | उनके ऐसा कहते समय राज्य के मुख्यमंत्री स्टालिन भी उपस्थित थे | इस बयान के बाद राजनीतिक पैंतरेबाजी शुरू हो गई | लेकिन मुख्य रूप से भाजपा ही हमलावर बनकर सामने आई है | यद्यपि द्रमुक के एक नेता ने भाजपा की आलोचना को ख़ारिज करते हुए कहा कि राज्य सरकार को स्वतंत्र होकर काम नहीं करने दिया जा रहा | विधानसभा द्वारा पारित अनेक प्रस्ताव राज्यपाल ने स्वीकृति हेतु रोक रखे हैं ,  जिससे विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं | लेकिन मुख्यमंत्री स्टालिन ने न तो श्री राजा को पृथक तमिल राष्ट्र की मांग करते समय रोका और न ही बाद में उनके बयान की आलोचना की जबकि मुख्यमंत्री पद ग्रहण करते समय उन्होंने देश की  अखंडता और एकता अक्षुण्ण रखने की  शपथ भारतीय संविधान के अंतर्गत ली थी | ऐसे  में उनके सामने यदि उन्हीं की पार्टी के वरिष्ट नेता ने  तमिलनाडु को भारत से अलग कर पृथक देश बनाने की मांग कर डाली तब   उनका चुप रहना उस शपथ का खुले आम उल्लंघन है | और  ये मान  लेना गलत न होगा कि श्री राजा की मांग को स्टालिन का भी समर्थन है | ऐसे में सवाल ये है कि ये राष्ट्रद्रोह नहीं तो क्या है ? कश्मीर में इसी तरह की आवाज को अनसुना करने का परिणाम देश भुगत चुका  है | अब देश के दक्षिणी राज्य से उठी अलगाववादी मांग पर केंद्र सरकार के साथ बाकी राजनीतिक दलों को अपना विरोध खुलकर व्यक्त करना चाहिए | खास तौर पर कांग्रेस को जो स्टालिन की पार्टी के साथ गठजोड़ कर सत्ता में हिस्सेदारी कर रही है | उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि श्री लंका में  पृथक तमिल राष्ट्र के आन्दोलन  ने ही राजीव गांधी की जान ली थी | 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 4 July 2022

ऐसा क्या और कैसे हो गया कि पंच परमेश्वरों पर भी उँगलियाँ उठने लगीं



न्यायाधीशों के फैसलों को लेकर होने वाली चर्चा तो स्वाभाविक होती है लेकिन आजकल न्यायाधीश अपनी बातों से चर्चा का विषय बने हुए हैं | इसकी शुरुवात प्रधान न्यायाधीश  एन. वी. रमणा द्वारा अमेरिका में दिये  एक भाषण में  की गई उस  टिप्पणी से हुई जिसमें उन्होंने भारत के राजनीतिक दलों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उनके बीच ये गलत धारणा है कि न्यायपालिका को उनके कार्यों का समर्थन करते हुए उनके एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहिए | उन्होंने आजादी के अमृत महोत्सव का जिक्र करते हुए कहा कि हमारा गणतंत्र 72 वर्ष का हो गया है किन्तु हमारे संस्थानों ने संविधान द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारियों और भूमिका की सराहना करना नहीं सीखा | आगे वे ये भी बोल गए कि सत्ताधारी दल का मानना है कि प्रत्येक सरकारी काम को न्यायिक समर्थन मिलना  चाहिए , वहीं  विपक्ष में बैठे दल न्यायपालिका से अपने राजनीतिक कारणों को आगे बढाने की उम्मीद रखते हैं | और इस प्रकार की विचार प्रक्रिया संविधान और लोकतंत्र की समझ की कमी से पैदा होती है | श्री रमणा ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका संविधान के प्रति उत्तरदायी है न कि किसी राजनीतिक दल के | प्रधान न्यायाधीश के उक्त विचार पूरी तरह सही हैं | न्यायपालिका एक स्वतंत्र इकाई है जिसकी स्वायत्तता लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है | उसका झुकाव  किसी राजनीतिक दल विशेष के प्रति  होने से तो वह अपनी निष्पक्षता खो देगी जो न्याय शब्द को ही अस्वीकार करने जैसा होगा | उस दृष्टि से श्री रमणा ने  जो कहा उससे असहमति रखने का प्रश्न ही नहीं है | लेकिन इस बात पर जरूर सवाल उठेंगे कि ये कहने के लिए उन्होंने अमेरिका को ही क्यों चुना ? और वह भी तब जब उनकी सेवा निवृत्ति अगले महीने की 26 तारीख को होने जा रही है |  आम तौर पर सेवा काल समाप्त होने के समय ही न्यायपालिका के उच्च आसन पर बैठे माननीय इस तरह की बातें करने लगते हैं | श्री रमणा बीते आठ साल से सर्वोच्च न्यायालय में हैं | लेकिन इसके पहले उनसे इस तरह की बातें सार्वजनिक रूप से शायद ही किसी ने सुनी होंगी | यदि उन पर किसी सत्ताधारी या विपक्षी दल ने उसके मनमाफिक फैसला देने का दबाव डाला  तब उन्हें तत्काल उपयुक्त कार्रवाई करनी चाहिये थी | कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों ने बाकायदे पत्रकारों से बात करते हुए   न्यायपालिका में व्याप्त विसंगतियों को उजागर कर एक नई परिपाटी को जन्म दे ही दिया | लेकिन श्री रमणा से इस आशय की बात कभी सुनने नहीं मिली | अदालती बहस के दौरान आजकल जिस तरह से न्यायाधीश गण डांट – फटकार लगाने लगे हैं वैसा भी कुछ श्री रमणा ने नहीं किया तब सात समंदर पर जाकर  ऐसा कहने से हमारी न्यायापालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेक्रर  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आलोचनात्मक टिप्पणियों का रास्ता खुल गया है | इसी तरह की कुछ बातें बीते सप्ताह नूपुर शर्मा की याचिका को ख़ारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय की अवकाश कालीन खंडपीठ में बैठे हुए न्यायाधीशों द्वारा कहे जाने  पर विवाद खड़ा हो गया है | याचिका से जुड़े मुद्दे से इतर जिस तरह की अप्रासंगिक और अनावश्यक टिप्पणियाँ न्यायाधीशों द्वारा की गईं उनका उल्लेख  फैसले में कहीं नहीं था |  चूंकि याचिका में की गई याचना से भी उन कटाक्षों का दूर - दराज तक कोई सम्बन्ध नहीं है इसीलिए उनके विरुद्ध न्यायपालिका से जुड़े रहे लोगों के साथ ही अन्य वर्गों से भी विरोध और आलोचना के स्वर सुनाई दे रहे हैं |  एक न्यायाधीश महोदय ने सोशल मीडिया पर लगाम लगाये जाने की वकालत करते हुए  न्यायाधीशों पर व्यक्तिगत  हमलों पर ऐतराज करते हुए कहा कि फैसले जनमत के प्रभाव में  नहीं होते | यद्यपि वे इस बात को भूल गए कि नूपुर की याचिका को रद्द करने संबंधी उनके फैसले पर किसी ने आपत्ति नहीं जताई | लेकिन  सुनवाई  के दौरान की गई उन टिप्पणियों की वजह से वे आलोचना के पात्र बने जिनका संदर्भित याचिका से सम्बन्ध नहीं था | अपनी आलोचना से विचलित होना स्वाभाविक है परन्तु  नूपुर शर्मा के बारे में जिस तरह की बातें सुनवाई के दौरान कही गईं क्या वे उचित थीं ? यदि , हाँ , तो फिर वे रिकॉर्ड में क्यों नहीं ली गईं और नहीं तो फिर वे औचित्यहीन ही कही जायेंगीं क्योंकि उनमें तो  नूपुर को दोषी ही मान लिया गया था | इस प्रकार यदि  श्री रमणा और फिर इन दो न्यायाधीशों की टिप्पणियों को निजी राय माना जावे तो फिर उनकी व्यक्तिगत आलोचना को नहीं रोका जा सकता और वे अधिकृत हैं तो उनके बारे में उनकी जवाबदेही भी बनती है | मसलन श्री रमणा को स्पष्ट   करना चाहिए कि राजनीतिक दलों द्वारा न्यायपालिका को प्रभावित करने की बात किस आधार पर उन्होंने कही और यदि उन पर कभी कोई दबाव आया तो उन्होंने तत्काल उसके विरुद्ध क्या कदम उठाया ? इसी तरह नूपुर की याचिका पर टिप्पणी करने के बाद हो रही अपनी आलोचना को व्यक्तिगत हमला मानने वाले माननीय को भी इस बात की सफाई देनी चाहिए कि न्याय की आसंदी पर बैठकर उन्होंने याचिकाकर्ता  के बारे में जिस तरह की बातें कहीं क्या वे व्यक्तिगत हमला नहीं थीं ? सवाल ये भी है कि कालेजियम नामक  चयन प्रणाली पर आधारित न्यायपालिका का वर्तमान ढांचा  क्या  प्रतिभाओं को मौके देने के बारे में निष्पक्ष है ? जब संसद ने न्यायाधीशों के चयन हेतु संघ लोक सेवा आयोग जैसी पारदर्शी व्यवस्था की  तब सर्वोच्च न्यायालय ने उसे जिन कारणों से रद्द कर दिया उनका औचित्य आज तक साबित नहीं हो सका, सिवाय इसके कि मौजूदा व्यवस्था न्यायपालिका  में परिवारवाद को जारी रखने में सहायक है | बेहतर होगा  माननीय न्यायाधीश भी अपनी बातों  को न्यायिक प्रक्रिया की जरूरतों तक ही सीमित रखें | यदि उन्हें व्यक्तिगत हमले नापंसद हैं तब उनको भी अदालती कार्रवाई के दौरान  छींटाकशी से बचते हुए अपनी गरिमा को बनाये रखना चाहिए | प्रधान न्यायाधीश ने राजनीतिक  दलों पर तो टिप्पणी कर दी किन्तु उन न्यायाधीशों पर कुछ नहीं बोले जो सेवा निवृत्त होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाते हैं या आयोग जैसे किसी अन्य पद के लिए राजनेताओं के चक्कर काटते हैं ताकि बंगला , गाड़ी और अन्य सुविधाएँ जारी रहें | न्यायाधीशों के लिए यह सोचने का भी समय आ गया है कि ऐसा क्या और क्यों हो गया कि उस  देश में उनके निर्णयों पर उँगलियाँ उठने लगीं जहां पंच को परमेश्वर कहा जाता रहा |  


- रवीन्द्र वाजपेयी

 

Saturday, 2 July 2022

टीवी चैनलों पर होने वाली बहस की सार्थकता पर सवाल



सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने  भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के बारे में गत दिवस जो टिप्पणियाँ कीं उनके बाद टीवी चैनलों पर आयोजित की जाने वाली बहसों की सार्थकता पर बहस शुरू हो गई है | दरअसल जिस चैनल पर नूपुर ने विवादास्पद बयान दिया उसकी भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए थी | कहा  जाता है बहस में बैठे मौलाना के उकसाने पर सुश्री शर्मा आपा खो बैठीं और उन्होंने भी उसी शैली में जवाब दिया तो भारत सहित अनेक इस्लामी देशों में बवाल मच गया | मामले की गंभीरता को देखते हुए भाजपा ने नूपुर को पार्टी से निलम्बित कर दिया  वहीं उनके समर्थन में आये दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता का निष्कासन कर डाला | मुस्लिम देशों की नाराजगी दूर करने के लिए उठाये गए कूटनीतिक क़दमों का माकूल असर हुआ और कुछ ही दिनों में उनका   गुस्सा  ठंडा पड़ गया |  लेकिन हमारे देश में राजनीतिक कारणों से विरोध की चिंगारी भड़काई जाती रही | कानपुर के साथ ही देश के अनेक शहरों में मुस्लिम समुदाय ने जुमे की नमाज के बाद जिस तरह का उपद्रव मचाया उसकी वजह से उत्तेजना और बढ़ी जिसका चरमोत्कर्ष उदयपुर में कन्हैया नमक दर्जी की नृशंस हत्या के रूप में सामने आया | इस वारदात से पूरे देश में गुस्सा है | जाँच एजेंसियों ने  जो संकेत दिए उनके अनुसार कन्हैया की हत्या केवल धार्मिक उत्तेजना नहीं वरन आतंकवादी षडयंत्र का परिणाम थी , जिसके तार पाकिस्तान से जुड़े पाए गये हैं | इसके बाद देश के अनेक शहरों से उसी तरह की धमकियां दिए जाने की  खबरें आने लगीं जैसी कन्हैया को दी गई थी | बकौल सर्वोच्च न्यायालय इस सबका कारण नूपुर का वह बयान था जिसके लिए उनके द्वारा माँगी गयी माफी सशर्त होने के कारण घमंड का एहसास करवाती है | न्यायालय ने उनको टीवी पर आकर माफी मांगने की नसीहत भी दी और उनकी गिरफ्तारी न होने पर भी ऐतराज जताया | लेकिन उसकी इस आपत्ति पर लोगों का ज्यादा ध्यान नहीं गया  कि जब ज्ञानवापी मस्जिद का प्रकरण अदालत में लंबित था तब टीवी चैनल ने उस पर बहस क्यों करवाई ? नूपुर के वकील के ये कहने पर कि उन्हें बहस के दौरान उकसाया गया तो न्यायाधीश ने कहा कि उनको टीवी एंकर के विरुद्ध शिकायत दर्ज करानी चाहिए थी | न्यायालय की टिप्पणी के बाद टीवी चैनलों की कार्यप्रणाली पर विचार करने की जरूरत है | बीते काफी समय से ये देखा जा रहा है कि समाचार चैंनलों की दर्शक संख्या में तेजी से कमी आती जा रही है और ये भी कि उनके द्वारा आयोजित बहस की प्रमाणिकता को लेकर संदेह बढ़ता जा रहा है | ये भी आम चर्चा है कि मुख्य रूप से हिन्दू – मुस्लिम  से जुड़े किसी भी विषय पर जिन मेहमानों को बुलाया जाता है उन्हें उसके लिए पैसे दिए जाने के साथ ही पूरी बहस की पटकथा पहले तय कर ली जाती है | जो लोग टीवी के परदे पर एक दूसरे पर हमला करने तक का दिखावा करते हैं वे बहस खत्म होने के बाद एक साथ बैठकर चाय पीते और अक्सर एक ही वाहन से जाते हुए दिखाई देते हैं | सच्चाई जो भी हो लेकिन तकनीक के कन्धों पर बैठकर आई टीवी पत्रकारिता ने बहस और विमर्श दोनों को जिस तरह बाजारू बना दिया उसके कारण यह माध्यम अपनी प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता  गंवाता जा रहा है | नूपुर प्रकरण पर गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अदालत में लंबित मामलों पर बहस कराये जाने पर जिस प्रकार का सवाल उठाया उसका संज्ञान लेते हुए  चैनलों में दिखाई जाने वाली सामग्री को लेकर भी आचार संहिता लागू करने का समय आ चुका है | राजनेताओं , विशेष तौर पर सत्ता में बैठे लोगों का ये दायित्व बनता है कि वे इलेक्ट्रानिक मीडिया को अतिरिक्त महत्व देना बंद करें | जो दिखता है वह बिकता है , वाली धारणा को त्यागकर जो दिखाया जाए वह प्रामाणिक हो , वाली मानसिकता विकसित करनी होगी | कल खंडपीठ द्वारा जो टिप्पणियाँ नूपुर के बारे में की गईं उनको वापिस लिए जाने संबंधी याचिका प्रधान न्यायाधीश के समक्ष लगाते हुए एक सामाजिक कार्यकर्ता ने नूपुर को निष्पक्ष सुनवाई का अवसर दिए जाने का आग्रह किया है | ये सवाल भी उठ रहा है कि नूपुर को उकसाने वाले मौलवी पर शिकंजा क्यों नहीं कसा गया ? कुल मिलाकर इस मामले में जो निष्कर्ष सामने आ रहा है उसके अनुसार टीवी चैनलों का विशुद्ध व्यवसायिक रवैया देश में अनेक विवादों का कारण बनता रहा है | उस दृष्टि से देखें तो दूरदर्शन और लोकसभा टीवी पर होने वाली चर्चाओं में कहीं ज्यादा गंभीर और तथ्यात्मक बातें सुनने मिलती हैं | उनके एंकर खुद कम बोलते हैं और मेहमानों को ज्यादा अवसर दिया जाता है | लेकिन निजी चैनल विशुद्ध व्यवसायिक दृष्टिकोण से बहस आदि का आयोजन करवाते हैं | उनका मुख्य उद्देश्य दर्शकों को व्यर्थ की बातों में उलझाकर ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन बटोरना है  जिसके लिए  सनसनी फैलाना आवश्यक होता है | संदर्भित प्रकरण के पीछे भी यही वजह समझ में आती है | उस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने जितनी लताड़ नूपुर को लगाई उससे ज्यादा जरूरी उस चैनल के प्रति भी थी जिसने इस बवाल की जमीन तैयार की | अच्छा होगा कि टीवी चैनल आपसी प्रतिस्पर्धा के बावजूद इस तरह के विवादों को रोकने के बारे में आत्मानुशासन का उदाहरण पेश करें क्योंकि सरकार इस बारे में कडाई करेगी तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन और असहिष्णुता का रोना शुरू हो जायेगा | यदि चैनल वाले खुद होकर सुधारवादी तरीके नहीं अपनाते तो सरकार या अदालत जो करेगी वह तो अलग है लेकिन दर्शक उनसे विमुख होते चले जायेंगे क्योंकि अधिकाँश दर्शक टीवी चैनलों के समाचार और निष्कर्षहीन बहसों से ऊबने लगे हैं | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 1 July 2022

सत्ता के बाद उद्धव से हिंदुत्व का मुद्दा छीनने की रणनीति



दस दिन तक महाराष्ट्र में चला घटनाचक्र कल शाम  ठहर तो गया लेकिन उसका अंत जिस नाटकीय तरीके से हुआ वह राजनीतिक पंडितों को हतप्रभ कर गया | हर घटना की नब्ज पर हाथ रखने वाले पत्रकारों और  टीवी समाचार चैनलों के अनुमान धरे रह गये | यहाँ तक कि भाजपा के वे नेता जो देवेन्द्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री मानकर मुंह मीठा करवा रहे थे , आश्चर्यचकित रह गये जब  पत्रकार वार्ता में श्री फड़नवीस ने एकनाथ के सिर पर ताज रखे जाने और खुद सरकार से बाहर रहने की जानकारी दी | उसके पहले तक  कयास लगाए जा रहे थे कि एकनाथ उपमुख्यमंत्री बनेंगे | लेकिन सब उलट – पलट हो गया | स्मरणीय है 1989 में चौधरी देवीलाल का नाम प्रधानमंत्री हेतु तय हो जाने के बाद अगले ही पल विश्वनाथ प्रताप सिंह को आगे कर दिया गया था | उसी तरह 2004 में सोनिया गांधी ने जब डा.मनमोहन सिंह का नाम प्रधानमंत्री हेतु उजागर किया तब भी सब आश्चर्यचकित रह गए थे | उक्त फैसलों के पीछे की राजनीति आज तक रहस्यों के घेरे में है | उसी तरह का एहसास गत दिवस एकनाथ की ताजपोशी से हुआ | देवीलाल उपप्रधानमंत्री बनकर संतुष्ट हो गये थे और श्रीमती गांधी ने सत्ता  संचालन का रिमोट अपने हाथ में रखा |  देवेन्द्र ने जब सरकार से बाहर रहने का ऐलान किया तब ये अंदाज लगाया गया कि उनको केंद्र सरकार में जगह दे जावेगी किन्तु  प्रधानमंत्री , अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष के दबाव के बाद वे उपमुख्यमंत्री बनने राजी हुए | वैसे तो इस लघुकथा को यहीं खत्म हो जाना चाहिए था लेकिन एकनाथ की ताजपोशी एक नई पटकथा की शुरुवात है | अटल – आडवाणी के दौर से सर्वथा अलग मोदी – शाह के युग की भाजपा ज्यादा आक्रामक है | अपने प्रतिद्वंदी को केवल शह देकर छोड़ने की बजाय ये जोड़ी मात देने तक हार नहीं मानती | इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज भाजपा का राष्ट्रीय स्तर पर जैसा  विस्तार हुआ वह निश्चित रूप से मोदी – शाह की लक्ष्य केन्द्रित रणनीति का ही परिणाम है | महाराष्ट्र में  जिस तरह की राजनीति भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने दिखाई उसने शरद पवार जैसे महारथी तक को अचम्भे में डाल दिया | हालाँकि एकनाथ को उद्धव के विरुद्ध बगावत करने के लिए तैयार करने में श्री फड़नवीस का बहुत बड़ा योगदान है | लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया जाता तो वह साधारण सत्ता परिवर्तन होता जैसा म.प्र में दो  साल पहले हुआ था | तब ज्योतिरादित्य सिंधिया केंद्र में मंत्री बनकर अपने समर्थकों को राज्य में सत्ता दिलवाने से संतुष्ट हो गये थे परन्तु एकनाथ के साथ ऐसा सम्भव नहीं था | और फिर भाजपा सत्ता की लालची होने  के आरोप से भी बचना चाह रही थी |  उससे भी आगे   पार्टी नेतृत्व की सोच ये रही कि उनके  साथ आये विधायकों को साथ रखने की जिम्मेदारी श्री शिंदे के कन्धों पर ही रहे और दूसरा शिवसेना से मुकाबला करने के लिए उसी के पूर्व सेनापति को कमान दी जाए | असम और त्रिपुरा के बाद महाराष्ट्र वह राज्य बन गया  जहां दूसरी पार्टी से आये व्यक्ति को भाजपा ने मुख्यमंत्री बना दिया | यद्यपि  एकनाथ भाजपा में नहीं आये अपितु अपने को बाला साहेब ठाकरे का अनुयायी बताकर असली शिवसैनिक होने का दावा कर रहे हैं | भाजपा उनको  पार्टी में लाने की इच्छुक भी नहीं है क्योंकि उसका असली निशाना शिवसेना  से सत्ता छीनना ही नहीं बल्कि उसके प्रभाव को फीका करते हुए हिंदुत्व की दावेदारी छीनना है।और ये काम कोई ऐसा कट्टर शिवसैनिक ही कर सकता है जिसका अपना जनधार हो | उस दृष्टि से श्री शिंदे को उद्धव का विकल्प  बनाने की रणनीति भाजपा ने बनाई | जब उसने देखा कि वे दो तिहाई विधायकों को तोड़ने में सफल हो गये तब उसे महसूस हुआ कि शिवसैनिकों वाली कट्टरता उनमें है | विद्रोह करते समय एकनाथ ने शिवसेना द्वारा  शरद पवार , कांग्रेस और सपा जैसी पार्टियों से गठबंधन करने को नीतिगत पलायन बताते हुए शर्त रखी कि उद्धव वापिस भाजपा के साथ जुड़ें | हालाँकि वे जानते थे कि ऐसा होना संभव नहीं है क्योंकि श्री ठाकरे और उनके प्रवक्ता संजय राउत प्रधानमंत्री और अमित शाह के विरूद्ध इतना मुंह चला चुके थे कि भाजपा के साथ आना उनके लिए कठिन था | भाजपा भी बालासाहेब के न रहने  के बाद  ठाकरे परिवार की दादागिरी  खत्म करने की रणनीति पर चल रही थी | उसे ये नागवार गुजरता था कि हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना अपनी श्रेष्ठता लादने का प्रयास करती थी | इसमें संदेह नहीं है कि शिवसेना ने उग्र हिंदुत्व के नाम पर अपना एक वोटबैंक बना रखा है | भाजपा चाहकर भी उसमें सेंध नहीं लगा पा रही थी क्योंकि केंद्र की सरकार चलाते समय वैश्विक परिस्थितियों का भी ध्यान रखना जरूरी होता है | नूपुर शर्मा के मामले से ये बात प्रमाणित भी हो चुकी है | ऐसे में शिवसेना रूपी किले में सेंध लगाने के लिए उसी के घर का कोई व्यक्ति जरूरी था |  ये भी सुनने आया है कि एकनाथ और श्री फड़नवीस के बीच काफी दोस्ताना  है | ऐसे में उद्धव से मिल रही उपेक्षा का दर्द जब उन्होंने बयान किया  तब देवेन्द्र ने उनकी दुखती रग पर हाथ रखा | बीते दस दिनों में जो घटनाचक्र देखने मिला उसकी तैयारी बीते ढाई साल से चल रही थी | लेकिन गत दिवस भाजपा ने जो पैंतरा चला वह पूरी तरह अप्रत्याशित है | हालाँकि बीते आठ साल में  भाजपा इस तरह के चौंकाने वाले निर्णय करती रही है | लेकिन कल जो कुछ हुआ वह अकल्पनीय था | भाजपा ने इसके जरिये न सिर्फ उद्धव से सत्ता छीनी अपितु अब वह शिवसेना भी छीनना चाहती है | वैसे भी श्री ठाकरे अपनी ठसक खो चुके हैं | शिवसेना में जो नेता और कार्यकर्ता सत्ता के  दबदबे के चलते उनके साथ रहे , उनका मन भी डोलने लगा है | इसी के साथ ही कांग्रेस  और राकांपा में भी एक तबका है जिसके मुंह से एकनाथ की ताजपोशी देखकर लार टपकने लगी है | ये देखते हुए आगामी चुनाव के पहले अनेक नेता भाजपा के करीब आ सकते हैं | नारायण राणे और एकनाथ शिंदे के शिवसेना से निकल आने से उसकी मैदानी ताकत घटी है | अभी तक शिवसेना के जो नेता उद्धव से नाराज होने के बाद भी विकल्प के अभाव में उनके साथ चिपके हैं वे भी एकनाथ के साथ आ जाएँ तो अचरज नहीं होगा  |   भाजपा ने अपना आधा लक्ष्य  प्राप्त कर लिया परन्तु  उसकी कार्ययोजना का असली उद्देश्य शिवसेना को इतना कमजोर कर देना है जिससे वह अपने पैरों पर खड़ी न हो सके | हालाँकि  एक हिन्दुत्ववादी पार्टी को तोड़ने के आरोप से बचने के लिए उसने श्री शिंदे के सिर पर हाथ रख दिया जिन्होंने उद्धव पर हिन्दुत्व के रास्ते से भटकने का आरोप लगाकर भाजपा का मकसद सीमित हद तक तक तो पूरा कर दिया और बचा – खुचा वह उनको सिंहासन पर बिठाकर करवायेगी | वैसे भी  एकनाथ के पास पीछे लौटने की गुंजाइश नहीं है और अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने के लिए उन्हें उद्धव के हाथ से पार्टी छीननी पड़ेगी | और यही भाजपा का भी उद्देश्य है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 June 2022

बिना पद के भी पिता अभूतपूर्व थे किन्तु सत्ता पाकर भी बेटा भूतपूर्व रह गया




शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने कभी मंत्री , सांसद , विधायक बनने की नहीं सोची | इसीलिये वे सत्ता में  आये बिना भी अभूतपूर्व बने रहे और आज भी विरोधी तक उनका लोहा मानते हैं | लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद से कल रात  हटने मजबूर हुए उनके बेटे उद्धव ठाकरे केवल भूतपूर्व ही रहेंगे | जब उन्होंने राकांपा और कांग्रेस के साथ बेमेल गठबंधन कर मुख्यमंत्री पद हासिल किया तब  लग रहा था कि पिता की तेजस्विता के अनुरूप वे सत्ता चलाएंगे लेकिन अपने ही सैनिकों से हारकर सत्ता छोड़ते समय उद्धव जिस तरह निरीह नजर आये उसे देखकर किसी को नहीं लगा कि उनमें अपने स्वर्गीय पिता का कोई भी गुण है | जब एकनाथ शिंदे ने बगावत का बिगुल बजाया तब शुरुवात में उद्धव और उनके बड़बोले प्रवक्ता संजय राउत पहले तो बागियों से बात करने की गुजारिश करते दिखे | संजय को ये कहते तक सुना गया कि न एकनाथ , शिवसेना  को छोड़ेंगे और न ही शिवसेना , एकनाथ को | इसके बाद जब बागियों का कुनबा सूरत से गुवाहाटी जा पहुंचा तब श्री राउत ने उन्हें मुम्बई आकर श्री ठाकरे के सामने बैठकर शिकवे – शिकायत करने की समझाइश देते हुए ये आश्वासन तक दे डाला कि यदि बागी चाहेंगे तो शिवसेना राकांपा और कांग्रेस के साथ गठबंधन से अलग हटने राजी है | इसी के साथ उद्धव ने भी अत्यंत विनम्रता पूर्वक बागियों को सन्देश दिया कि वे चाहेंगे तो मुख्यमंत्री पद छोड़ दूंगा | लेकिन उसके बाद श्री राउत बदजुबानी पर उतर आये और श्री शिंदे के साथ गुवाहाटी में बैठे विधायकों को मुर्दा बताते हुए मुम्बई आने पर पोस्ट मार्टम करवाने जैसी बात कर बैठे | उन्होंने यहाँ तक कहा कि शिवसैनिक भड़क गये तो आग लग जायेगी | उधर उद्धव के बेटे आदित्य ने बागी विधायकों को ये कहकर डराया कि मुम्बई हवाई अड्डे से आने पर उनको वरली और बांद्रा इलाके से गुजरना होगा जो उनके प्रभाव वाले माने जाते हैं | यह भी एक तरह की धमकी ही थी | लेकिन इस सबके बावजूद उद्धव  , बाल ठाकरे वाले  रुतबे को कायम नहीं रख पाए और  उन शरद पवार की चरण वंदना करते रहे जिनको बाला साहेब , दाउद  इब्राहीम का संरक्षक मानते थे | जिस कांग्रेस और सोनिया गांधी के प्रति गत दिवस उद्धव ने आभार जताया उनके बारे में भी अपने  पिता के विचारों को उन्होंने भुला दिया | कुल मिलाकर महाराष्ट्र में बीते ढाई साल में जो अप्राकृतिक  गठबंधन सरकार में रहा  वह ठीक उसी तरह का था जैसा भाजपा और पीडीपी ने जम्मू कश्मीर में बनाया था | यद्यपि उस सरकार को गिराने के बाद धारा 370 को विलोपित करने और जम्मू कश्मीर से  लद्दाख को अलग करने जैसे निर्णयों से भाजपा ने अपने उस कदम  को रणनीति का नाम देकर अपना पाप धो लिया । लेकिन बाला साहेब की इच्छाओं के विरूद्ध श्री पवार और सोनिया गांधी का सहारा लेकर उद्धव ने सरकार क्यों बनाई इसका कोई ठोस कारण उनके पास नहीं है, सिवाय इसके कि येन - केन – प्रकारेण मुख्यमंत्री बनना था चाहे इसके लिए पार्टी के मौलिक सिद्धांतों से समझौता ही किया जाए | यदि उद्धव राकांपा और कांग्रेस को अपनी नीतियों में ढालते तब यह प्रयोग उनकी राजनीतिक सफलता माना जाता लेकिन मुख्यमंत्री रहने के बाद भी शिवसेना अपने मूल एजेंडे को रत्ती भर भी लागू नहीं कर  सकी | परिणाम ये निकला कि उद्धव नाममात्र के मुख्यमंत्री बने रहे लेकिन सत्ता का असली संचालन श्री पवार के द्वारा किया जाता रहा और यही एकनाथ शिंदे की नाराजगी की वजह बना | उससे भी बड़ी बात ये रही कि उद्धव में मुख्यमंत्री बनने का कोई गुण था ही नहीं | वे अपने बेटे आदित्य को उस कुर्सी पर बिठाकर बालासाहेब की भूमिका में रहना चाहते थे लेकिन श्री पवार और कांग्रेस उस हेतु तैयार नहीं थे लिहाजा उन्हें वह पद ग्रहण करना पड़ा | उनकी कार्यप्रणाली में भी ये देखने मिला जब पूरे कार्यकाल में वे राज्य सचिवालय में कभी – कभार ही गए | उनके लिए अच्छा होता यदि  वे एकनाथ की बगावत को रोकने के लिए शिवसेना को महाविकास अगाड़ी नामक गठबंधन से बाहर निकालकर भाजपा से दोबारा रिश्ता जोड़ते और खुद बाल साहेब की तरह  किंग मेकर की भूमिका में रहते | ऐसा करने से पार्टी की टूटन भी बचती और सरकार के साथ शिवसेना का नाम भी जुड़ा रहता | लेकिन बीते ढाई साल में ये साबित हो गया कि उद्धव बिना रीढ़ वाले नेता हैं जो ठोस दृष्टिकोण नहीं होने से श्री पवार और श्री राउत द्वारा चले गये पांसों पर दांव लगाते गए और आखिर में बड़े बे आबरू होकर  कूचे से बाहर निकलने  मजबूर हो गए | एकनाथ शिंदे को चाहे गद्दार कहा जाए या अवसरवादी लेकिन उनहोंने जो मुद्दे उठाये उनका समुचित जवाब न उद्धव और आदित्य दे सके और न ही संजय राउत | शिवसेना ने भाजपा के बड़ी   पार्टी होने के बावजूद उसका साथ छोड़कर अपने जन्मजात विरोधी शरद पवार और कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी जैसी मुस्लिम परस्त पार्टी के समर्थन से अपना  मुख्यमंत्री बनवाने की जिद क्यों पकड़ी इसका कोई वाजिब कारण आज तक वह स्पष्ट नहीं कर सकी | उल्लेखनीय है महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के साथ ही श्री राउत ने ये कहना शुरू कर दिया था कि उनके पास और भी विकल्प हैं | बाला साहेब और प्रमोद  महाजन के बीच दोनों दलों का गठबंधन होते समय ही ये तय हो चुका था कि राज्य में जिसके पास ज्यादा सीटें होंगी मुख्यमंत्री पद भी उसी के पास रहेगा | इसी के तहत जब तक शिवसेना बड़ी पार्टी रही सरकार का नेतृत्व उसे मिला | लेकिन 2014 में जब अलग – अलग लड़ने के बाद  भाजपा आगे  निकल गई तब शुरुवात में तो शिवसेना ने नखरे दिखाए किन्तु बाद में वह देवेन्द्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री स्वीकार कर सरकार में आ गयी | लेकिन उसकी तल्खी बनी रही जिसे श्री राउत जैसे नेता हवा देते रहे | अंततः 2019 के चुनाव के बाद गठबंधन टूटा और शिवसेना एनडीए से भी अलग हट गई जिससे केंद्र सरकार में उसके मंत्री ने भी इस्तीफ़ा दे दिया | और फिर  शरद पवार द्वारा फेंके गए जाल में उद्धव फंस गये जिसका नतीजा ये निकला कि आज न उनके हाथ सरकार रही और न ही सिद्धांतों की पूंजी | यदि वह सरकार से बाहर रहकर भी भाजपा के साथ खड़े रहते तो उसका हिंदुत्व के प्रति आग्रह प्रमाणित होता | जाहिर है जाते – जाते उद्धव को अपराधबोध का एहसास हुआ और  उन्होंने औरंगाबाद का नाम संभाजी नगर और उस्मानाबाद का धाराशिव कर दिया जिससे नाराज होकर मुस्लिम मंत्री बैठक से बाहर आ गये और सपा विधायक अबू आजमी ने भी उद्धव को आढे हाथ लिया | इस्तीफे का ऐलान करते समय उन्होंने बड़े ही कातर भाव से कहा कि सत्ता भले चली गई किन्तु  उनके पास शिवसेना है और वे विधान परिषद की सदस्यता त्यागकर शिवसेना कार्यालय में बैठेंगे | लेकिन उन्हें ये याद रखना चाहिए कि अब न तो वह शिवसेना बची जिसके वे बेताज बादशाह हुआ हुआ करते थे और न ही उनकी आवाज में हिंदुत्व की हुंकार | 

-रवीन्द्र वाजपेयी