Friday, 5 August 2022

जब कुछ गलत नहीं किया तो ईडी की जांच पर हाय तौबा क्यों



आजकल सब जगह ईडी (प्रवर्तन निदेशालय ) चर्चा में है | 1956 में बनी इस एजेंसी का काम पहले केवल विदेशी मुद्रा कानूनों और आर्थिक अपराधों की जांच करना था | लेकिन बाद में वित्तीय धोखाधड़ी और मनी लाऊंड्रिंग के मामले भी इसके क्षेत्राधिकार में आ गये | 2005 में इसे गिरफ्तारी , संपत्ति की जप्ती , नेताओं और अधिकारियों को तलब करने के अलावा बिना सरकार की अनुमति के मुकदमा चलाने का अधिकार भी मिल गया जिसे पीएमएलए कहा जाता है | उस समय पी. चिदम्बरम वित्त मंत्री हुआ करते थे | बीते सप्ताह तमाम विपक्षी दलों ने पीएमएलए को वापिस लिये जाने की मांग भी उठाई |  गैर भाजपा पार्टियाँ इसे लेकर श्री चिदम्बरम को कोसते हुए कह रही हैं कि उन्होंने अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा कृत्य किया | ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि ईडी ने कोलकाता में ममता सरकार के वरिष्ट मंत्री पार्थ चटर्जी की महिला मित्र अर्पिता मुखर्जी के दो आवास पर छापेमारी के दौरान लगभग 50 करोड़ नगद और कई किलो सोना जप्त किया | उसके बाद शिवसेना के मुंहफट सांसद संजय राउत को हिरासत में ले लिया | इधर दिल्ली में कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके सांसद पुत्र राहुल गांधी से भी ईडी द्वारा लगातार कई दिनों तक घंटों पूछताछ की गई | पार्थ वाले मामले में तो सीधे – सीधे भ्रष्टाचार सामने आ गया , वहीं श्री  राउत की पत्नी के खाते में आया पैसा उनके विरुद्ध बड़ा सबूत है  | रही बात श्रीमती गांधी और राहुल गांधी  की तो नेशनल हेराल्ड का सौदा जिस तरह से कांग्रेस के पैसे से करते हुए उसका 76 फीसदी स्वामित्व इन दोनों के पास आया उसे लेकर डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने मामला दर्ज किया था जो बढ़ते – बढ़ते यहाँ तक आ पहुंचा | तीनों प्रकरणों में विपक्ष का आरोप है कि सरकार  बदले की भावना से काम  कर रही है | ईडी के जरिये विपक्ष को भयभीत किये जाने के आरोप भी लग रहे हैं | महाराष्ट्र की पिछली उद्धव सरकार के दो वरिष्ट मंत्री नवाब मलिक और अनिल देशमुख  तो मंत्री रहते हुए ईडी द्वारा गिरफ्तार किए गए थे और अभी तक  जेल में हैं |  हालाँकि सबसे ज्यादा होहल्ला कांग्रेस मचा रही है क्योंकि गांधी परिवार और पार्टी समानार्थी जो हैं | सोनिया जी तो ज्यादा नहीं बोलीं लेकिन राहुल लगातार उसी तरह के बयान दे रहे हैं जैसे गिरफ्तार होने के पूर्व श्री राउत दिया करते थे | मसलन हम डरते नहीं , सरकार चाहे जो कर ले वगैरह – वगैरह | हालाँकि विपक्ष के नेताओं से इसी तरह की प्रतिक्रया अपेक्षित रहती  है किन्तु  उक्त तीनों मामलों में प्रथम दृष्टया अपराध साफ झलकता है | पार्थ के मामले में तो नोटों के बण्डल ही अपने आप में काफी हैं , वहीं श्री राउत के विरुद्ध मिले दस्तावेजी प्रमाण काफी वजनदार हैं | जहां तक बात नेशनल हेराल्ड सौदे की है तो इसमें भी कांग्रेस पार्टी के पैसे से उक्त संस्थान का तीन चौथाई स्वामित्व अपने नाम करने का कारनामा सोनिया जी और राहुल के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य है | इन मामलों के अलावा भी ईडी द्वारा अनेक अन्य राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों के आर्थिक अपराधों की जाँच जारी है | लेकिन सबसे ज्यादा चिल्ल - पुकार गांधी परिवार और कांग्रेस द्वारा  की जा  रही है  | राहुल जिस तरह गुस्से में नजर आ रहे हैं वह उनकी बौखलाहट को दर्शाता है | सवाल ये है कि अगर नेशनल हेराल्ड का सौदा पूरी तरह पाक - साफ है तब गांधी परिवार से की जा रही पूछताछ पर इतनी हाय तौबा  की क्या जरूरत है  ? डा.स्वामी की अर्जी पर यह मामला अदालत में है जहां से श्रीमती गांधी और राहुल  सामान्य प्रक्रिया के तहत जमानत पर हैं  | ऐसे में ईडी की जांच यदि राजनीतिक बदले के लिए की जा रही है और उसे ऐसा कुछ भी हाथ नहीं लगा जिससे अपराध साबित हो सके तो अदालत में उसका आरोप पत्र टिक नहीं पायेगा | लेकिन जांच को लेकर आसमान सिर पर उठा लेना गांधी परिवार के मन में छिपे डर को ही व्यक्त कर रहा है | कांग्रेस पार्टी को भी ये सोचना चाहिए कि वह कब तक एक परिवार की निजी जागीर बनी रहेगी | नेशनल हेराल्ड की अरबों की अचल संपत्ति का तीन चौथाई स्वामित्व पार्टी के पैसे से अपने नाम करवाने के पूर्व उसकी मालिक एजेएल ( एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड ) के  अंशधारकों की स्वीकृति ली जाती तो वह सही कदम होता | लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और नेहरु परिवार के बेहद निकट रहे मार्कंडेय काटजू के अलावा देश के पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने भी  सार्वजनिक तौर पर ये खुलासा किया कि उनके पास भी  उक्त कम्पनी के अंश हैं तो नेशनल हेराल्ड का स्वामित्व किसी और को स्थानांतरित करने के पूर्व कम्पनी नियमों के अनुसार अंशधारकों की स्वीकृति ली जानी चाहिए थी , जो नहीं ली गई | उल्लेखनीय है देश भर में एजेएल के अंशधारकों की बड़ी संख्या है | डा. स्वामी की शिकायत में मूल मुद्दा यही था जिसकी परतें खुलते – खुलते बात हवाला तक आ पहुंची है | ये देखते हुए गांधी परिवार और कांग्रेस दोनों को जांच पूरी होने और अदालती फैसले तक धैर्य रखना चाहिए | यदि वे बेकसूर हैं तो अदालत उन्हें दोषमुक्त होने का प्रमाणपत्र देगी और उस स्थिति में कांग्रेस और गांधी परिवार दोनों को राजनीतिक लाभ मिलना तय है | लेकिन उनकी तरफ से जिस तरह का विरोध सामने आ रहा है उससे दाल में कुछ काला होने का संदेह बढ़  रहा है | वैसे भी  ये पहला मौका नहीं है जब किसी राजनेता के विरुद्ध ऐसे प्रकरणों में जांच हो रही हो | भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए नितिन गडकरी के यहाँ भी आयकर का छापा पड़ा था | तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री स्व. जयललिता को जेल में सजा काटनी पड़ी | लालू प्रसाद यादव अभी भी कैद में हैं | हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला भी जेल की हवा खा रहे हैं | ईडी के गिरफ्तार करने के अधिकार को सर्वोच्च न्यायालय  ने भी हाल ही में पूरी तरह सही मानते हुए कहा कि गिरफ्तारी के समय बताया गया आधार पर्याप्त है | कुल मिलाकर इस विवाद में गांधी परिवार को अहंकारी सोच  से  बाहर निकलना होगा |  सोनिया जी और राहुल बेक़सूर हैं और नेशनल हेराल्ड का मालिकाना बदला जाना पूरी तरह वैधानिक है ,  इसका फैसला तो अदालत ही करेगी क्योंकि ईडी महज एक जांच एजेंसी है |  

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 4 August 2022

मुफ्तखोरी रोकने सर्वोच्च न्यायालय को ही कुछ करना होगा



क्या होगा , क्या नहीं ये तो फिलहाल कह पाना कठिन है लेकिन संतोष का विषय है कि चाहे – अनचाहे ही सही ,  मुफ्त उपहारों के चुनावी वायदों का औचित्य कम से कम राष्ट्रीय विमर्श का विषय तो बनने लगा है | गत दिवस इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत याचिका पर हुई बहस के दौरान जो कुछ  सुनने मिला उससे तो लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय और सरकार दोनों चाह रहे हैं कि चुनावों के दौरान किये जाने वाले मुफ्तखोरी के ऐसे वायदों पर रोक लगे जिनकी वजह से राजनीतिक दलों की झोली तो वोटों से भर जाती है लेकिन सरकारी खजाना खाली हो जाता है | आज केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों पर असाधारण कर्ज का बोझ है | उसका ब्याज चुकाने के लिए भी नया कर्ज लेने की मजबूरी बन जाती है | ऐसे में अर्थव्यवस्था का जो राजनीतिकरण हुआ उसकी वजह से चिंताजनक स्थितियाँ पैदा हो गई हैं | उल्लेखनीय बात ये है कि न्यायालय और केंद्र सरकार दोनों चाहते हैं कि चुनाव आयोग इस प्रवृत्ति पर रोक लगाए | इस याचिका में राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल , सालिसिटर जनरल तुषार मेहता और याचिका की सुनवाई कर रही प्रधान न्यायाधीश की अगुआई वाली पीठ ने संसद में इस मुद्दे पर विचार की बात कही | लेकिन न्यायालय ने ही ये सवाल कर दिया कि क्या आपको लगता है कि संसद में इस विषय पर चर्चा होगी क्योंकि आज हर कोई मुफ्त में कुछ पाना चाहता है और जहाँ तक बात गरीबों के कल्याण की है तो  इसकी भी सीमा होनी चाहिए | न्यायालय ने तल्ख़ लहजे में कहा कि चुनाव आयोग समय रहते  कदम उठा लेता तो ये नौबत न आती |  इसके बाद उसने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह इस मुद्दे पर  नीति आयोग , वित्त आयोग , रिजर्व बैंक , विधि आयोग एवं विभिन्न राजनीतिक दलों की बैठक बुलाए | निश्चित रूप से ये बहुत ही सामयिक  किन्तु संवेदनशील मुद्दा बनता जा रहा है | राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव के दौरान किये जाने वाले मुफ्तखोरी के वायदों का एकमात्र उद्देश्य येन केन प्रकारेण चुनाव जीतना होता है | लेकिन  उनको अमल में लाने  के लिए आर्थिक संसाधन कहाँ से  आयेंगे इसका उत्तर किसी के पास नहीं रहता | इस बारे में एक बात अच्छी हो रही है कि राजनीतिक नेताओं को कठघरे में खड़ा करने की मुहिम जनता के बीच चल रही है | मसलन सरकार द्वारा रेल गाड़ियों में वरिष्ट नागरिकों को दी जाने वाली रियायत दोबारा शुरू न किये जाने के ऐलान के बाद सोशल मीडिया पर सांसदों और विधायकों की मुफ्त यात्रा पर भी रोक लगाने की मांग जोर पकड़ने लगी | इसी तरह उनको मिलने वाली पेंशन का भी जमकर विरोध होने लगा है | इसलिये  सर्वोच्च न्यायालय को भी ऐसे मसलों पर असमजंस त्यागकर कड़ा फैसला करना चाहिए | उदाहरण के लिए चुनावी वायदों को कानूनी शपथ पत्र मानकर उन्हें पूरा न किये जाने पर सम्बंधित राजनीतिक दल की मान्यता खत्म करने जैसा प्रावधान किया जावे  | ये सवाल भी उठ रहा है कि क्या खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत मिलने वाला मुफ्त अनाज भी बंद किया जाना चाहिए तो इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने ही वर्ष 2010 में केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि अनाज को सरकारी गोदामों में सड़ाने की बजाय गरीबों में बाँट देना चाहिए | इस पर जब तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने संसद में ना - नुकुर की तब सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर कहा कि वह उसका आदेश है , सुझाव नहीं | लेकिन गत दिवस संदर्भित याचिका पर विचार करते हुए उसने कहा कि गरीबों के कल्याण के कार्यक्रमों की भी सीमा होनी चाहिए | उसका ये कहना भले ही सांकेतिक लगता हो लेकिन ये एक तरह से नीति - निर्देशक बन सकता है | मुफ्त अनाज वितरण का आदेश देते हुए न्यायालय ने ये भी कहा था कि उसे सड़ाने  से अच्छा है गरीबों को दे दिया जाए | अर्थात ये अतिरिक्त  उत्पादन और भंडारण की स्थिति पर निर्भर है |  गरीबों को दी जाने वाली सुविधाओं के साथ ये भी देखा जाना चाहिए कि उससे उनमें उद्यमी प्रवृत्ति तो खत्म नहीं हो रही | देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देने वाले कृषि क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं लेकिन मजदूरों की कमी के कारण कृषि का रकबा कम होता जा रहा है | दूसरी तरफ इस बात को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ रही है | यह विरोधाभास जिस तरह स्थापित सत्य बना  दिया गया वह  सही मायनों में चिंता का विषय है | चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा दिखाई जाने वाली दरियादिली ने समाज के एक बड़े हिस्से को निकम्मा बनाकर रख दिया | निजी क्षेत्र में भले ही स्थायी रोजगार और ज्यादा सुविधाओं की गुंजाइश न हो लेकिन  कोई व्यक्ति काम करना चाहे तो उसके सामने पेट भरने की समस्या नहीं हो सकती | बेहतर हो मुफ्तखोरी के वायदों पर रोक लगाने पर विचार करते समय केवल सरकारी खजाने पर बढ़ने वाले बोझ को ही न देखा जाये , अपितु उसके कारण  कार्य संस्कृति के लुप्त होने पर भी ध्यान दिया जाए | ये बात सौ फीसदी सही है कि आज के माहौल में मुफ्त चुनावी घोषणाओं पर रोक लगाने की मांग किसी भी दल के लिए शेर के दांत गिनने जैसा आत्मघाती कदम होगा | इसलिए समस्या का समाधान सर्वोच्च न्यायालय को ही आदेशात्मक लहजे में निकालना होगा क्योंकि जिस तरह की राजनीतिक शैली देश में विकसित होती जा रही है वह धीरे – धीरे  अजगर करे न चाकरी , पंछी करे न काम | दास मलूका कह गए सबके दाता राम | वाली सोच को और पक्का बना रही है | लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था में शिक्षा और स्वास्थ्य निश्चित रूप से मुफ्त और सस्ता होना चाहिए लेकिन बिना कुछ किये खाने मिलता रहे तो निकम्मों की जो फ़ौज खड़ी होगी  वह समाज में नए किस्म के वर्ग संघर्ष का कारण बने बिना नहीं रहेगी |  आर्थिक और सामाजिक विषमता को समाप्त करने के लिए जरूरी है कि शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ हर व्यक्ति कुछ न कुछ काम करे | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 August 2022

छिपाने से कम नहीं होगी महंगाई : करों का बोझ कम करना जरूरी



संसद में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने आश्वस्त किया कि बड़े देशों की तुलना में भारत की  अर्थव्यवस्था अच्छी हालत में है और वैश्विक मंदी का असर भी हमारे यहाँ शायद ही पड़े | उनके दावे की पुष्टि अनेक अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा भी की गई है | उनके  साथ ही पूर्व वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने तो विपक्ष द्वारा महंगाई पर किये जा रहे हल्ले का मखौल उड़ाते हुए ये तंज तक कस दिया कि महंगाई ढूढने पर भी नहीं दिखाई देती | दूसरी तरफ विपक्ष के अलावा आर्थिक मामलों के अनेक जानकारों का कहना है कि न सिर्फ महंगाई चरम पर है अपितु आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था  खतरनाक स्थिति में पहुँच सकती है | कच्चे तेल की बढ़ती और रूपये की गिरती कीमत के अलावा  विदेशी मुद्रा भण्डार में आ रही कमी के मद्देनजर आने वाले दिनों में गम्भीर  आर्थिक संकट की भविष्यवाणी की जा रही है | वहीं सरकार की सुनें तो महंगाई का हल्ला राजनीतिक लाभ लेने के लिए मचाया जा रहा है जबकि विपक्ष के दावे इसके सर्वथा विरुद्ध हैं | अर्थशास्त्रियों के बीच जरूर मिश्रित राय है लेकिन जहां तक मंहगाई की बात है तो उसे हवा में उड़ा देना सच्चाई से आंखें मूँद लेना है | सरकार उसे इसलिए स्वीकार नहीं कर रही क्योंकि इससे उसके  आर्थिक प्रबंधन  पर उंगलियाँ उठने लगेंगीं | हालाँकि ये भी उतना ही सही है कि कोरोना काल के बाद उत्पन्न  आर्थिक समस्याओं पर भारत ने जल्द ही विजय हासिल कर ली थी किन्तु बीते कुछ महीनों में यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध के कारण जो हालात उत्पन्न हुए उनकी वजह से अर्थव्यवस्था पर ऐसा संकट आ गया जो दिखता भले न हो लेकिन उसका असर काफी गहरा है | वो तो अच्छा हुआ भारत ने रूस से सस्ती दरों पर कच्चे तेल और गैस का सौदा कर लिया , वरना हालात और बिगड़ चुके होते | लेकिन विदेशी निवेश का भारतीय मुद्रा बाजार से तेजी से निकलना शुभ  संकेत नहीं  है | यदि  ये अस्थायी दौर है तब तो चिंता का बड़ा  कारण नहीं | लेकिन आयात आधारित अर्थव्यवस्था में  विदेशी मुद्रा भण्डार में कमी होने से रूपये की कीमत गिर रही है जिसका दुष्परिणाम महंगाई के रूप में सामने आ रहा है | इस बारे में कहना गलत न होगा कि जब महंगाई नहीं है तब केंद्र और  राज्यों की सरकारें कर्मचारियों और पेंशनरों का महंगाई  भत्ता क्यों बढ़ा रही हैं ?  प्रतिमाह जीएसटी संग्रह बढ़ने का श्रेय भी अर्थशास्त्री महंगाई को ही दे  रहे हैं | इस बारे में ये सवाल भी उठ रहा है कि अर्थव्यवस्था यदि मजबूत स्थिति में है और लगातार चौथे माह भी जीएसटी का संग्रह 1 लाख 40 हजार करोड़ के पार जा रहा है तब भी सरकार नई – नई चीजों पर जीएसटी  क्यों थोप रही है ?  लोगों का विरोध गेंहू , चावल , आटा जैसी चीजों पर जीएसटी लगाने पर ज्यादा है | पारदर्शिता का तकाजा है कि सरकार महंगाई  के बारे में ईमानदारी दिखाते हुए जनता को  बताये कि वे कौन सी परिस्थितियां हैं जिनकी वजह से दैनिक उपयोग की चीजों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं | इस बारे में रास्वसंघ के महासचिव दत्तात्रय होसबोले ने भी हाल ही में आगाह किया कि लोगों को सस्ता खाद्यान्न मिलना चाहिए | उनकी ये टिप्पणी आटा , दही , दूध जैसी चीजों पर जीएसटी आरोपित करने के बाद आई | वैसे उनका बयान बौद्धिक ज्यादा था लेकिन उसे एक तरह से सरकार को दिए गए संकेत के रूप में देखा गया | लेकिन उसके बाद भी सरकार ने किसी भी तरह की राहत नहीं दी | हालाँकि प्रधानमंत्री बीते कुछ दिनों में अनेक बार सार्वजनिक तौर पर मुफ्तखोरी को विकास में बाधक बताकर उसे रोकने का इशारा कर चुके हैं और उनकी  बात को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मुफ्त सौगातों पर उठाये गये सवालों से बल भी मिला | लेकिन इस पर अमल करना आज के माहौल में बहुत कठिन लगता है क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल पहले से दी जा रही मुफ्त सुविधाएँ वापिस लेने का जोखिम मोल नहीं ले सकेगा | उदहारण के तौर पर नरेंद्र मोदी 80 करोड़ लोगों से मुफ्त खाद्यान्न की सुविधा वापस लेने के बाद  क्या 2024 में इस  तबके का वोट हासिल कर सकेंगे ? इसी तरह नई राजनीति की  पैरोकार आम आदमी पार्टी मुफ्त बिजली और पानी की योजना बंद कर दे तो दिल्ली में ही उसे अगला चुनाव जीतना कठिन हो जाएगा | बेहतर हो सरकार बीच का रास्ता निकाले |  अर्थात आर्थिक तौर पर  कमजोर वर्ग को समुचित सहायता और संरक्षण जारी रखा  जावे किन्तु उसके भार से दूसरे नागरिकों की कमर न टूट जाये ये देखना भी जरूरी है | और इसके लिए गृहस्थी के संचालन में प्रयुक्त होने वाली रोजमर्रे की चीजों के दाम अनियंत्रित न हों ये देखना उसका दायित्व है | जिसके लिए उसे जीएसटी के ढांचे का युक्तियुक्तकरण करना चाहिए | ये शोचनीय मुद्दा है कि पांच साल बाद भी इसे  लेकर अनिश्चितता बरकरार है |  मोदी सरकार ने विभिन्न मोर्चों पर बेशक शानदार काम  किया है | लेकिन पेट्रोल , डीजल और रसोई गैस के दामों को लेकर उसकी नीति पर सवाल उठते रहे हैं | ये ठीक है  कि विकास और जन कल्याण के कामों के लिए सरकार को पैसा चाहिए और वह करों के जरिये ही आता है | लेकिन अर्थशास्त्र का ये स्थापित सत्य है कि अधिक कर उसकी चोरी हेतु प्रेरित करता है | इसीलिये ये माँग शुरू से उठती आ रही है कि जीएसटी की चार दरों के स्थान पर केवल एक दर 12 फीसदी की हो या फिर 8 और 12 फीसदी की दो दरें   | ऐसा होने पर उपभोक्ता मांग बढ़ेगी जिसका लाभ अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को करों के रूप में मिलता रहेगा | कहने का आशय महज इतना ही है कि करों की कम दरें महंगाई पर नियंत्रण के जरिये जनता को राहत देती हैं वहीं उपभोक्ता बाजार में खरीददार बढ़ने से सरकार को ज्यादा राजस्व मिलने के साथ ही उद्योग – व्यापार में भी प्रगति होती है | अब जबकि मोदी सरकार को आठ साल चुके हैं तब ये अपेक्षा करना गलत न होगा कि वह सबका साथ , सबका विकास जैसे नारे की सार्थकता साबित करे | इसमें दो मत नहीं है कि विपरीत हालातों में भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपने पैर मजबूती से जमाये रखे हैं और इसका बड़ा कारण जनता द्वारा किया गया सहयोग है | लेकिन इसके पहले कि मूल्यवृद्धि आम लोगों के लिए असहनीय बन जाए सरकार को कुछ न कुछ करना चाहिए अन्यथा जनता के मन में बढता जा रहा असंतोष गुस्से में बदल जाएगा | और ये गुस्सा कैसा होता है इसका ताजा उदाहरण पड़ोसी देश  श्रीलंका में देखने मिल चुका है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 2 August 2022

अस्पताल में आग : प्रशासन की आपराधिक उदासीनता का दुष्परिणाम



 जबलपुर के न्यू लाइफ मल्टी स्पेशियलिटी नामक  निजी अस्पताल में आग लगने से 8 लोगों की मौत वैसे तो एक दुर्घटना है जिसका कारण शार्ट सर्किट बताया जा रहा है लेकिन आवासीय इलाके में बने इस अस्पताल में निकलने का दूसरा रास्ता न होने  और आग बुझाने के समुचित इंतजामों के अभाव की वजह से इसे  आपराधिक लापरवाही मानकर जो भी जिम्मेदार हैं उनको कड़े से कड़ा दंड दिया जाना चाहिए | हालाँकि पुलिस ने आग में झुलसे कुछ लोगों के बयानों के आधार पर अस्पताल के संचालकों तथा प्रबंधकों के विरुद्ध गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज कर गिरफ्तारियाँ भी की हैं किन्तु अभी तक उन सरकारी लोगों के गिरेबान पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं दिखाई जिनकी अनदेखी और काफी हद तक घूसखोरी की वजह से 8 निरपराध लोग ज़िंदा जलकर जान गँवा बैठे | घटना की विस्तृत जांच के बाद और भी बहुत कुछ निकलकर आयेगा | लेकिन इस हादसे ने प्रशासनिक मशीनरी के निकम्मेपन को एक बार फिर उजागर कर दिया है | गत वर्ष नवम्बर माह में म.प्र की राजधानी भोपाल के सबसे बड़े सरकारी हमीदिया अस्पताल में बच्चों के वार्ड में लगी आग से 4 बच्चों की मौत के बाद खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सख्ती दिखाते हुए प्रदेश भर के अस्पतालों सहित  बहुमंजिला इमारतों का फायर ऑडिट करवाने के आदेश दिए थे |  उसके बाद कुछ दिनों तक प्रशासन और स्थानीय निकायों के अग्निशमन विभाग ने सक्रियता दिखाते हुए कर्तव्यनिष्ठा का दिखावा किया लेकिन  बाद में मुख्यमंत्री के निर्देश को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया | जबलपुर के जिस अस्पताल में गत दिवस दर्दनाक अग्नि दुर्घटना हुई उसका सबसे बड़ा कारण उसमें अग्निशमन संबंधी व्यवस्था न होना था | नियमानुसार  किसी अस्पताल के संचालन की अनुमति देने के पहले संबंधित विभाग और अधिकारी को ये देखना चाहिए कि आपातकाल की स्थिति में वहां से निकलने का वैकल्पिक रास्ता है या नहीं | फायर ब्रिगेड के आने-जाने की पर्याप्त जगह भी होनी चाहिए | सबसे बड़ी बात ये है कि आवासीय इलाकों में खुलते जा रहे अस्पताल , होटल और शिक्षण  संस्थानों में इस तरह की स्थिति में सुरक्षा के इंतजाम हैं या नहीं, ये देखने वाले आँख पर पट्टी बंधे बैठे हैं तो इसका  कारण या तो राजनीतिक दबाव  होता है या फिर पैसे का प्रभाव | ऐसे में जितना दोष संदर्भित अस्पताल संचालकों  का है उससे कहीं ज्यादा उस सरकारी मशीनरी का है जिसकी अनदेखी की वजह से इस तरह के जानलेवा हादसों की पुनरावृत्ति होती रहती है | आजकल शहरों में बहुमंजिला इमारतों का चलन है | इनमें केवल आवासीय ही नहीं वरन व्यवसायिक काम्प्लेक्स  भी हैं | शापिंग मॉल्स में एक साथ सैकड़ों लोग खरीदी करने के साथ ही  मल्टीप्लेक्स में सिनेमा देखते हैं | बहुमंजिला इमारतों में लिफ्ट का इंतजाम होता है लेकिन उनकी गुणवत्ता कोई नहीं जांचता | बिजली गुल होते ही लिफ्ट  रुक जाती है और उस स्थिति में भीतर फंसे लोगों की गुहार कोई नहीं सुनता | ये विसंगति केवल निजी भवनों  या संस्थानों तक ही सीमित नहीं है  वरन सरकारी अस्पताल  और दफ्तरों में भी अग्निशमन आदि के प्रबंध या तो हैं ही नहीं या फिर अपर्याप्त हैं | ये स्थिति निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है | निश्चित तौर पर भवन बनाने वाले के साथ ही उनमें किसी व्यवसाय का संचालन करने वालों का ये दायित्व है कि उसमें न सिर्फ आग बुझाने बल्कि अन्य किसी भी दुर्घटना के समय बचाव की समुचित व्यवस्था रहे | लेकिन उससे भी ज्यादा सरकार की जो एजेंसियां  इन बातों की जाँच के लिए बनाई गई हैं उनका दायित्व सबसे ज्यादा है क्योंकि किसी भी कारोबार का लायसेंस देते समय सरकार के विभिन्न विभागों से अनुमति या अनापत्ति ली जाती है | जिसका सही समय ;पर नवीनीकरण  जरूरी है | इसके अलावा संबंधित एजेंसी को समय – समय पर आकस्मिक निरीक्षण भी करना चाहिए , लेकिन ऐसा होता नहीं है | न समय पर नवीनीकरण होता है और न ही जांच | ज़ाहिर हैं इसके पीछे सरकारी अमले का सिर से पाँव तक भ्रष्ट होना है | जबलपुर के जिस अस्पताल में गत दिवस आग लगने की घटना हुई उसकी फायर आडिट अनापत्ति कई माह पूर्व समाप्त होने के बावजूद  किसी भी सरकारी विभाग ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया | इसलिए जितने कसूरवार अस्पताल के संचालक हैं उनसे भी बड़े अपराधी वे सरकारी अधिकारी और उनके मातहत हैं जो  समय पर फायर ऑडिट कर लेते तब शायद 8 मानवीय जिंदगियां बच जातीं  |  इस हादसे के बाद एक बार फिर चिर – परिचित सरकारी कर्मकांड देखने मिलेगा | यदि भोपाल के हमीदिया अस्पताल में हुए अग्निकांड के बाद मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए कड़े  निर्देशों का ईमानदारी से पालन किया जाता तब उक्त हादसा न हुआ होता | इस घटना के बाद मृतकों के परिजनों और घायलों को मुआवजा देने की परम्परा का निर्वहन किया जायेगा | नेता जाकर संतप्त परिवारों के घावों पर दिखावटी मरहम लगायेंगे और कुछ दिनों के शोर – शराबे के बाद सब कुछ पहले जैसा होकर रह जायेगा | इस बारे में ये कहना गलत  न होगा कि बिल्डरों  और अस्पताल संचालकों का प्रशासन के साथ जो अपवित्र गठजोड़ है उसकी वजह से इंसानी जिंदगियाँ आये दिन  खतरे में पड़ जाती है | प्रदेश सरकार के लिए भी ये घटना अग्निपरीक्षा है क्योंकि उसका जो अमला इस हादसे में सह - अभियुक्त है वही जब इसकी जांच करेगा तब उसके  अपने संगी - साथी जाँच की आग में से सुरक्षित निकल ही आयेंगे ये सुनिश्चित है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 1 August 2022

उनकी प्रशंसा राजनीति में मेरी आलोचना होती है?



एक बड़े राजनीतिक झंझावात से महाराष्ट्र बाहर निकल कर आया ही है। सरकार की त्रिमूर्ति भंग होकर भाजपा-शिवसेना के पुराने स्वरूप में आ गई है। विधानसभा के आम चुनाव में भाजपा और शिवसेना ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। जनता ने उन्हें सरकार बनाकर महाराष्ट्र विकास की जिम्मेदारी सौंपी थी। राजनीतिक महत्वाकांक्षा और त्याग की कमी के कारण एक बेजोड़ गठबंधन की सरकार लंबे समय तक महाराष्ट्र में चलती रही। गठजोड़ में सेंधमारी शिवसेना की ओर से ही हुई और उसकी परिणिति के रूप में आज एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में भाजपा के सहयोग से संयुक्त सरकार चल रही है। यह एक विषय है कि महाराष्ट्र में दलबदल और तोड़फोड़ को जायज माना जाए या न माना जाए? लेकिन दूसरी बात यह है कि महाराष्ट्र में जनादेश की अवज्ञा का दौर खत्म हुआ और वह सरकार बनी है जिसकी जनमत ने स्वीकृति दी थी। हम सब ने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की जिद को भी देखा और उनके साथ बगावत करके सरकार के गिरने और बनने के घटनाक्रम को भी देखा। यह घटनाक्रम राजनीतिक रूप से कई संदेश देने वाला रहा है। यदि सबकी बात नहीं भी की जाए तो यह ठाकरे परिवार का सत्ता के प्रति अत्यधिक प्रेम और बाद में चुपचाप अपने घर चले जाने का रोमांचक दृष्टांत पेश करता है। हालांकि राजनीतिक रूप से सभी के मन में यह विचार था  कि चुपचाप मातोश्री जाने वाला उद्धव ठाकरे राजनीतिक पराजय मानकर घर बैठने वाला नहीं है। इसलिए महाराष्ट्र के ताजा घटनाक्रम में उनके मुंह से वही जहर भरे तीर निकले हैं जिनके लिए आमतौर पर शिवसेना जानी पहचानी जाती है। महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने एक आयोजन में आर्थिक विशेषताओं की व्याख्या क्या कर दी वे सभी राजनीतिक पार्टियों की आलोचना के केंद्र में आ गए? राज्यपाल ने गुजराती और मारवाड़ी व्यापारियों के व्यवसायिक योगदान की चर्चा करते हुए उनकी प्रशंसा कर दी। कुछ आगे बढ़कर राज्यपाल ने यह भी कह दिया कि यदि गुजरातियों एवं राजस्थानियों को निकाल दिया जाए तो मुंबई एवं पुणे में पैसा-टका नहीं बचेगा। इस प्रकार का कथन इसी उक्ति को प्रमाणित करता है कि किसी की प्रशंसा किए जाने से मेरी आलोचना खुद ही हो जाती है। राजनीति करने वालों ने महामहिम राज्यपाल के इस बयान को मराठा विरोधी मानसिकता करार देने में तनिक भी विलंब नहीं किया। जिससे राजनैतिक बमबाजी तेजी से होने लग गया। राज्यपाल के मंतव्य और वक्तव्य की सभी राजनीतिक पार्टियों ने आलोचना की।  मराठा अविश्वास पैदा न हो जाए इसलिए भाजपा ने ही अपने दल के राज्यपाल के बयान को अनुचित करार दे दिया। राज्यपाल ने सफाई देकर हालांकि मामले को शांत करने का प्रयास किया है फिर भी राजनीति यदि इतना जल्दी शांत हो जाए तब वह राजनीति कैसे हो सकती है? राज्यपाल के बयान की आलोचना करने वालों में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए सरकार जाने की हताशा का जमकर प्रदर्शन कर दिया। उन्होंने राज्यपाल के विरुद्ध बोलते हुए यहां तक कह दिया कि इन्हें कोल्हापुर का जोड़ा दिखाना चाहिए। यह कथन न तो राजनीतिक रूप से परिपक्वता दर्शाता है और ना ही राज्यपाल जैसे गरिमा पूर्व पद के लिए सम्मानजनक ही कहा जा सकता है ।इसलिए राज्यपाल के बयान के राजनीतिक रूप से निकाले गए निहितार्थ के बाद भी उद्धव ठाकरे का कथन उससे भी अधिक आपत्तिजनक और शर्मनाक है।यह विचार करने का प्रश्न है कि राज्यपाल नाम की संवैधानिक संस्था राजनीतिक अखाड़े में हमेशा विवादित दांवपेच का शिकार क्यों हो जाती है? हालांकि ऐसा भी नहीं है कि राज्यपाल विवादों के जनक नहीं होते। लेकिन राजनीतिक लाभ-हानि के लिए उनकी प्रत्येक बात का निहितार्थ निकालकर विवाद का केंद्र बनाया जाता है। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी का यह बयान किसी समुदाय के अपमान करने के लिए दिया गया हो यह कहीं से भी प्रमाणित होता दिखाई नहीं देता। जबकि यह तो व्यवसाय करने वाले गुजराती एवं राजस्थानी व्यापारियों के पक्ष में दिया गया बयान है। इसमें इतना जरूर कहा जा सकता है कि किसी और की प्रशंसा मेरी आलोचना है। इस स्थिति का लाभ उठाकर आलोचना करने वाले राजनीतिक दलों की कतार कुछ लंबी हो गई। इस कतार में अलग दिखने की आड़ में उद्धव ठाकरे अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए पकड़े गए। जिसकी निंदा की जा सकती है।

Friday, 29 July 2022

पायलटों की मौत परिवार के साथ देश का भी नुकसान : वायुसेना से पुराने विमानों की छुट्टी जरूरी


 
वायुसेना का एक मिग 21 प्रशिक्षक विमान गत दिवस राजस्थान के बाड़मेर में दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें सवार दोनों पायलट मारे गए | रूस में निर्मित यह लड़ाकू विमान एक ज़माने में भारतीय वायुसेना की असली ताकत हुआ करता था | बाद में इसकी असेम्बलिंग भारत में भी होने लगी | 1985 से इसका निर्माण बंद कर दिया गया | हालाँकि रूस की मदद से इन विमानों का  तकनीकी उन्नयन किये जाने से ये उपयोग लायक बने रहे | उनका उपयोग ज्यादातर प्रशिक्षण के तौर पर ही किया जा रहा है | गत दिवस दुर्घटनाग्रस्त हुआ विमान भी उसी कार्य हेतु था | मार्च 2019  में विंग कमांडर अभिनंदन के जिस विमान को पाकिस्तान ने  मार गिराया था वह भी मिग 21 ही था | इस श्रृंखला के विमानों में मिग 27 भी थे | लेकिन इनके बाद सुखोई जैसे उन्नत लड़ाकू विमान आ आने से मिग पुराने समझे जाने लगे | बावजूद इसके वायुसेना में इसकी मौजूदगी बनी रही | चूंकि सेना संबंधी मामले सार्वजनिक विमर्श में कम ही आते हैं इसलिए इन पर लोगों का ध्यान नहीं जाता | सेना का काम देश की सुरक्षा करना होता है इसलिए उसकी जरूरतें पूरी करना आवश्यक होता है | लेकिन ये दुर्भाग्य है कि इस बारे में राजनीतिक नेतृत्व लम्बे समय तक उदासीन बना रहा जिसके कारण सेना के तीनों अंगों के पास साजो – सामान की कमी होने लगी | विशेष रूप से डा. मानमोहन सिंह की सरकार के दौरान सैन्य खरीदी काफी कम हुई जिसे लेकर तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष द्वारा प्रधानमन्त्री को लिखा गया पत्र काफी चर्चित हुआ था | हालाँकि बीते आठ साल में सेना को हर दृष्टि से सुसज्जित बनाने का प्रयास हुआ लेकिन उसके बाद भी ये विचारणीय है कि आखिरकार क्या कारण है कि मिग 21 जैसे विमान जो आधुनिक सैन्य मापदंडों  के लिहाज से बाबा आदम के ज़माने के माने  जाते हैं , आज भी वायुसेना में बने हुए हैं | उनकी तकनीकी उत्कृष्टता और मारक क्षमता निश्चित रूप से अच्छी रही होगी लेकिन जिस तरह से लगातार ये विमान दुर्घटनाग्रस्त होते रहते हैं उसे देखते हुए इनका उपयोग सवाल खड़े करता है | इस बारे में जो जानकारी आती है उसके मुताबिक विदेशों से जिन अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों के सौदे हाल के वर्षों में किये गये उनकी  आपूर्ति में अभी समय लगेगा | कोरोना के कारण भी इसमें व्यवधान आया है | इसी तरह रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हो जाने से भी भारत को होने वाली  सैन्य सामग्री की आपूर्ति पर असर पड़ा है |  तकरीबन हर साल वायुसेना के अनेक मिग 21 विमान प्रशिक्षण या अन्य उद्देश्यों से की  जाने वाली उड़ानों के दौरान दुर्घटना का शिकार होते हैं | उससे होने वाला आर्थिक नुकसान तो अपनी जगह है लेकिन उसकी वजह से जो पायलट मारे जाते हैं वह कहीं ज्यादा बड़ा नुकसान  हैं | ये देखते हुए केंद्र सरकार को इस बारे में गंभीरता से विचार करते हुए बूढ़े हो चुके  विमानों को वायुसेना  से अलग करने का फैसला कर लेना चाहिए | हालाँकि इस बारे में वायुसेना की आवश्यकताओं के अलावा मारक क्षमता का ध्यान  भी रखना होगा लेकिन मिग 21 श्रृंखला के लड़ाकू विमानों का दौर खत्म हो चुका है | जब हमारे देश के सत्ताधारी नेताओं के लिये नए – नए अत्याधुनिक विमान , हेलीकाप्टर और शानदार कारें खरीदने में विलम्ब नहीं किया जाता तब सेना से सम्बन्धित खरीद में देर क्यों होती है , ये सवाल बेहद महत्वपूर्ण है | इस बारे में उल्लेखनीय है कि वाजपेयी सरकार के समय रक्षा मंत्री रहे जार्ज फर्नांडीज जब सियाचिन दर्रे के दौरे पर गए तब उन्हें बताया गया कि बर्फ पर चलने वाले स्कूटरों की आपूर्ति लंबे समय से रक्षा मंत्रालय के दफ्तर में अटकी पडी है | तब उन्होंने दिल्ली आकर अधिकारियों को फटकार लगते हुए अविलम्ब खरीदी करने का  आदेश देने के साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों को दो सप्ताह तक सियाचिन में तैनात करने का फरमान भी जारी किया जिससे उनको एहसास  हो सके कि  विषम परिस्थितियों में हमारे जवान किस तरह रहते हैं ? मिग 21 विमानों को वायुसेना से मुक्त करने के बारे में काफी पहले निर्णय हो जाता तो अनेक होनहार पायलटों की ज़िन्दगी बच जाती | इस बारे में सोचने लायक बात ये है कि विमान तो पैसों से खरीदा जा सकता है किन्तु वायुसेना को एक पायलट तैयार करने में बरसों लग जाते है | और फिर यात्री उड़ानों के लिए तो विदेशी व्यवसायिक पायलटों की सेवाएं भी ली जाती हैं किन्तु वायुसेना में ऐसा संभव नहीं होने से एक – एक पायलट अमूल्य है | ये भी शोचनीय है कि बीते 75 साल के  दौरान भले ही हमारी सेना ने अनेक युद्धों में शत्रु को परास्त किया हो लेकिन सैन्य सामग्री के उत्पादन और उसमें होने वाले तकनीकी उन्नयन के मामले में हमारी प्रगति संतोषजनक नहीं है | बताया जा रहा है कि मिग 21 की पहली खरीद 1961 में की गई थी जबकि दिसम्बर 2019 में मिग 27 को भी वायुसेना से छुट्टी दे दी गई किन्तु उसके बाद भी मिग 21 विमान का उपयोग चौंकाने वाला है | जिस विमान के साथ गत दिवस हादसा हुआ हालाँकि वह प्रशिक्षण हेतु उपयोग होता था लेकिन इस बात की जाँच गहराई से होनी चाहिए कि  वह तकनीकी तौर पर उपयोग करने लायक था भी या नहीं ? मोदी सरकार  आने के बाद रक्षा खरीदी का काम काफी तेजी से चल रहा है और यही वजह है कि हम चीन से निपटने में  डरते नहीं हैं लेकिन थोड़े – थोड़े अन्तराल से वायुसेना के विमानों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनाओं से सेना का मनोबल गिरता है | भले ही उनमें मारे जाने वाले सैनिकों या पायलटों के परिवारों को सरकार हर तरह की मदद देती हो लेकिन राजनेताओं को ये बात समझनी चाहिए कि एक सैनिक की मौत  केवल उसके परिवार नहीं वरन पूरे देश का नुकसान  होती है |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 July 2022

पार्थ : भ्रष्टाचार हुआ तभी तो करोड़ों निकल रहे हैं



प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपने  राजनीतिक जीवन में तरह – तरह के संकट झेले हैं | वाममोर्चे की सरकार के दौर में उन्होंने न जाने कितने अत्याचार सहे | लेकिन अपनी सादगी और संघर्षशीलता की वजह से वे जनता का समर्थन और सहानुभूति अर्जित करते – करते  सत्ता के शिखर पर आ पहुंची | वामपंथी दुर्ग को ध्वस्त करने का जो कारनामा स्व. इंदिरा गांधी और स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज तक न कर सके वह उन्होंने कर दिखाया | यद्यपि उनकी तुनकमिजाजी और अनिश्चित स्वभाव उनके राष्ट्रीय परिदृश्य पर स्थापित होने में सबसे बड़ा बाधक है | बावजूद उसके जिस तरह नरेंद्र मोदी ने गुजराती अस्मिता की भावना बुलंद करते हुए उस राज्य में लगातार 12 साल तक ठस्से के साथ राज किया ठीक वही तरीका अपनाते हुए ममता ने माँ , माटी और मानुष रूपी नारा देकर बंगाली जनमानस की भावनाओं को मतदान में तब्दील कर दिया | हालांकि वे अपने राज्य में भाजपा के उभार को नहीं रोक पा रहीं किन्तु  कांग्रेस और वाम मोर्चे को चारों खाने चित्त करने का करतब जरूर दिखा दिया  | प. बंगाल में लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीतने का उनका करिश्मा वाकई काबिले गौर है | लेकिन दूसरी तरफ 2014 और 2019 के लोकसभा और 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन भी किसी चमत्कार से कम नहीं कहा जा सकता | यद्यपि तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता ने जिस आक्रामक शैली में भाजपा में तोड़फोड़ कर डाली उससे लगने लगा था कि भाजपा को जो कुछ करना था कर चुकी और अब ढलान पर आती जायेगी | लेकिन बीते कुछ दिनों के भीतर ही ममता के तेवर ढीले पड़ने लगे हैं | शारदा घोटाले का शोर विधानसभा चुनाव में उनकी शानदार जीत के बाद थम सा गया था परन्तु  पिछले कुछ दिनों  में ही ऐसा कुछ घट गया जिसने ममता को रक्षात्मक होने के लिए बाध्य कर दिया | उनके मंत्रीमंडल के वरिष्ट मंत्री पार्थ चटर्जी के विरूद्ध शिक्षा मंत्री रहते हुए शिक्षकों की भर्ती में घोटाले का आरोप लंबे समय से लगता आ रहा था | बीते सप्ताह ईडी ने उनकी बेहद करीबी अर्पिता मुखर्जी के घर पर छापा मारा तो 21 करोड़ की नगद राशि बरामद हुई | परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर ईडी ने पार्थ और नगदी बरामद होने के कारण अर्पिता को  गिरफ्तार कर लिया | इसके बाद हमेशा ईडी पर दाना - पानी लेकर चढ़ाई करने वाली ममता बैनर्जी को ये कहना पड़ा  कि भ्रष्ट व्यक्ति का बचाव नहीं करेंगी और भ्रष्टाचार करने वाले को दंड मिलना ही चाहिए | कहा जा रहा  हैं उन्होंने पार्थ के फोन भी नहीं सुने | हालाँकि वे ईडी और सीबीआई सहित केंद्र सरकार पर हमलावर भी रहीं लेकिन उपराष्ट्रपति के चुनाव से दूरी बनाने का जो  निर्णय तृणमूल कांग्रेस पार्टी द्वारा लिया गया उससे पहली बार लगा कि ममता दबाव में हैं | हालाँकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उन्होंने पार्थ को मंत्रीमंडल से हटाया नहीं था | कहा जा रहा है विपक्ष के साथ ही तृणमूल के भीतर भी पार्थ से मंत्री पद छीनने का दबाव  पड़ने की वजह से आज हो रही मंत्रीमंडल की बैठक में शायद वे हटा दिए जावेंगे लेकिन इस देरी से ममता की काफ़ी किरकिरी हो गयी | दरअसल  अपने सबसे ताकतवर और नजदीकी मंत्री को गिरफ्तार होने के बाद तत्काल मंत्री पद से हटाने से वे क्यों कतराती रहीं इसका जवाब उन्हें देना चाहिए |  इस बीच गत दिवस ईडी ने फिर अर्पिता को घेरा और इस बार भी उसे उनके घर से लगभग 28 करोड़ नगद और बड़ी मात्रा में जेवरात मिले | इस स्थिति में ममता और तृणमूल कांग्रेस दोनों के लिए मुंह छिपाने लायक जगह नहीं बची |  जानकारी मिली है कि अर्पिता ने गत दिवस ईडी को बताया  कि पार्थ उनके निवास को मिनी बैंक की तरह इस्तेमाल करते थे और उनके आदमी पैसा लाकर रखते थे | अर्पिता यदि उक्त कथन पर कायम रहीं तब पत्रकारों के सामने स्तीफा क्यों दूं जैसी अकड़ दिखाने वाले पार्थ का घिरना तय है | लेकिन इस बात पर आश्चर्य होता  है कि ममता जैसी अनुभवी और  तेजतर्रार मुख्यमंत्री का दाहिना हाथ  कहा जाने वाला मंत्री इतना बड़ा घोटाला करता रहा और वे बेखबर बने रहीं | इस घोटाले की जानकारी उन्हें थी या नहीं और क्या इस काण्ड में  उनकी लिप्तता है अथवा नहीं , इस प्रश्न का उत्तर भी देर - सवेर मिल ही जावेगा | लेकिन इन छापों में मिली अकूत नगदी के बाद  सुश्री बैनर्जी को ये तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि उनके राज में शिक्षकों की भर्ती  में जबरदस्त भ्रष्टाचार किया गया और अर्पिता के घर से बरामद राशि पार्थ की ही है | जिस दिन राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आ रहे थे उसी दिन ममता ने कोलकाता में एक बड़ी रैली में आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अपनी जांच एजेंसियों के जरिये विपक्ष की आवाज दबा रही है | लेकिन जब उन्हें ज्ञात हुआ कि अर्पिता के यहाँ मिला नोटों का जखीरा इतना बड़ा है तब उन्होंने केंद्र सरकार के  अलावा समाचार माध्यमों के बारे में वैसी ही टिप्पणी करनी शुरू कर दी जो जल्द सेवा निवृत्त होने जा रहे देश के प्रधान न्यायाधीश आजकल कह रहे हैं | कुल मिलाकर ममता के सियासी जीवन का ये दौर बेहद मुश्किलों से भरा हुआ है | वे समझ चुकी हैं कि अर्पिता के घर से मिले नोटों के बण्डल दरअसल पार्थ द्वारा की गई काली कमाई ही है | और इसीलिये वे ईडी पर दबाव बनाने की रणनीति पर चलते हुए पार्थ के बारे में ज्यादा बोलने से बच रही हैं  | हालाँकि आज उनसे मंत्री पद छीने जाने की सम्भावना है लेकिन मंत्री की कुर्सी जाते ही अर्पिता की तरह अगर पार्थ ने इस कांड में ममता को भी घसीटने का साहस किया तब तृणमूल के भीतर  भूचाल आ सकता है  |  ममता के भतीजे अभिषेक और उनकी पत्नी भी कोयला घोटाले में फंसी हैं | अपने विरोधी पर हावी हो जाना ममता का ब्रह्मास्त्र है लेकिन शिक्षक भर्ती घोटाले  पर पड़ा पर्दा हट जाने के कारण उनकी छवि तार – तार हुई है | इसे संयोग ही कहेंगे कि जिस तरह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहते हुए उद्धव ठाकरे प्रधानमंत्री और केंद्र सरकर पर ज़हर बुझे तीर छोड़ा करते थे वैसी ही हेकड़ी ममता बैनर्जी भी दिखाती रहीं  | पिछले विधानसभा चुनाव की जीत के बाद तो उन्हें जागते हुए भी प्रधानमंत्री बनने के सपने आने लगे थे किन्तु पार्थ और अर्पिता पर ईडी का कहर जिस तरह टूटा उसके बाद से ममता की राह में नए – नए कांटे बिछते जायेंगे | सबसे बड़ी बात ये हो रही है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनमानस में ममता की  छवि को बहुत बट्टा लगा है | सबसे बड़ी बात ये होगी कि  मोदी विरोधी विपक्ष का  संभावित गठबंधन जन्म लेने के पहले ही दम तोड़ बैठेगा | ताजा खबर के नुसार 2024 के लोकसभा चुनाव हेतु विपक्ष का गठबंधन बनाने की जो कोशिशें हो रही हैं उसका नेतृत्व बजाय उनके तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी. राव को सौंपा जाएगा |

- रवीन्द्र वाजपेयी