Wednesday, 7 December 2022

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत भाजपा के लिए सबक, कांग्रेस की नाउम्मीदी जारी



 
दिल्ली नगर निगम के चुनाव परिणाम आ गये  हैं | इन पक्तियों के लिखने तक आई खबरों के अनुसार आम आदमी पार्टी  भाजपा से स्थानीय निकाय भी छीनने जा रही  है  | उल्लेखनीय है दिल्ली में तीन नगर निगम थीं जिन्हें मिलाकर एक कर दिया गया | इसके कारण पार्षदों की कुल संख्या 272 से  घटकर 250 पर आ गयी | ऐसा करने के पीछे जो भी सोच रही हो लेकिन ये  मान  लेना गलत न होगा कि तीन निकायों को घटाकर एक करने का फायदा आम आदमी पार्टी को मिल गया  है | हालाँकि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का वह दावा तो हवा – हवाई होता नजर आ रहा है कि उनकी पार्टी 220 सीटें जीतेगी और भाजपा महज 20 पर सिमट जायेगी | इसी तरह एक्जिट पोल के अनुमान भी पूरी तरह सही होते नहीं लग रहे क्योंकि दिल्ली विधानसभा जैसी स्थिति नगर निगम में  बनती नहीं दिख रही |  भाजपा अगर 100 पार्षद भी जीत गई  तब विपक्ष काफी मजबूत होगा जिससे महापौर उस तरह काम नहीं कर सकेंगे जैसा मुख्यमंत्री के रूप में श्री केजरीवाल कर लेते हैं | और फिर ये भी देखने वाली बात है कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली  और पंजाब में विधानसभा चुनाव जिस बड़े बहुमत के साथ जीता संभवतः उसी कारण राजनीतिक प्रेक्षकों को लग रहा होगा कि दिल्ली नगरपालिका में भी  वह प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आयेगी | लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि वह अधिकतम 135 का आंकड़ा ही छू सकेगी और उस स्थिति में भाजपा 100 से ऊपर  आ सकती है | बहरहाल  बहुत बड़ा उलटफेर न हुआ तब ये माना  जा सकता है कि 15 साल बाद दिल्ली में स्थानीय निकाय से भाजपा का दबदबा खत्म कर आम आदमी पार्टी ने अपना  परचम लहरा दिया है । यद्यपि जैसा अब तक सामने आया है उसके अनुसार भाजपा ने अपना वोट बैंक बरक़रार रखा है लेकिन उसके लिए चिंता का कारण ये है कि सातों लोकसभा सीटें हाथ में होने के बावजूद वह स्थानीय स्तर के चुनाव में सत्ता खोने जा रही है | इन नतीजों पर वह ये कहकर अपने समर्थकों को बहला सकती है कि 15 साल तक नगर निगम चलाने  के कारण व्यवस्था विरोधी भावना का असर होना स्वाभाविक है लेकिन ये सही सोच नहीं है | भाजपा को स्वीकार करना चाहिए कि दिल्ली की जनता से नगर निगम के जरिये जो सीधा जुडाव उसे बना लेना चाहिए था उसमें वह विफल रही वहीं  दिल्ली विधानसभा जीतकर आम आदमी पार्टी ने राष्ट्रीय राजधानी के जनमानस में अपनी पैठ मजबूत कर ली | ऐसे में भाजपा कुछ भी कहे लेकिन 15 साल के बाद यदि वह नगर निगम पर अपना आधिपत्य गँवा रही है तब उसे आत्मविश्लेषण करना चाहिए | जहाँ तक बात आम आदमी पार्टी की है तो उसे भी  राजधानी की जनता ने एक तरह से झटका दिया है | चुनाव प्रचार के दौरान श्री केजरीवाल द्वारा 220 सीटें जीतने के दावे को मतदाताओं ने पूरा न कर ये संकेत दे दिया कि दिल्ली सरकार के कामों से भी वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं है | निश्चित रूप से मुख्यमंत्री की लोकप्रियता और छवि अन्य स्थानीय नेताओं के मुकाबले बेहतर है लेकिन पहले कार्यकाल की अपेक्षा दूसरा अवसर मिलने पर आम आदमी पार्टी की प्रदेश सरकार उतना अच्छा काम नहीं कर सकी | वरना नगर निगम में भी उसे 200 सीटें मिलनी चाहिए थीं  | भाजपा के हाथ से सत्ता छीन लेने के बाद भी जनता ने उसे विधानसभा की तरह नकारा नहीं है जिससे ये एहसास किया जा सकता है कि वह आम आदमी पार्टी को भी पूरी तरह स्वछन्द होने देना नहीं चाहती | विधानसभा चुनाव की अपेक्षा उसके 10 से 12 फीसदी मत घटना ये  दिखाता है कि सत्ता विरोधी रुझान उसे भी झेलना पड़ा | दोपहर  एक बजे तक के रुझान में आम आदमी पार्टी का स्पष्ट बहुमत तय हो गया है और भाजपा 100 के आसपास सीमित रहेगी | लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस 10 के आसपास सिमट गयी है | जो राष्ट्रीय राजनीति में उसका विकल्प बनने के आम आदमी पार्टी के दावे को मजबूत करता है | दरअसल श्री केजरीवाल  ये जानते हैं कि भाजपा का विकल्प बनना फ़िलहाल संभव नहीं है लेकिन यदि उनकी पार्टी कांग्रेस को पीछे छोड़ देती है तब उसका भविष्य उज्ज्वल होगा और भाजपा विरोधी जनमानस  उनमें सम्भावना तलाशेगा | पंजाब में सफलता के बाद गुजरात में भी पार्टी की रणनीति कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेलने की रही जिसका परिणाम कल के नतीजे से स्पष्ट हो जाएगा | दिल्ली नगर निगम के चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए वाकई चिंता पैदा करने वाले हैं क्योंकि लोकसभा और  विधानसभा के बाद स्थानीय निकाय के चुनाव में भी वह जिस तरह औंधे मुंह गिरी उसके बाद भविष्य में उसको उम्मीदवार मिलना  मुश्किल हो जाए तो आश्चर्य नहीं  होगा | सबसे बड़ी बात ये है कि उसने इस चुनाव को जीतने के लिए कुछ किया ही नहीं जिससे लगता है हार  को वह नियति मान बैठी है | आम आदमी पार्टी को विधानसभा चुनाव से 10 फीसदी मत कम मिलना दर्शाता  है कि सत्ता विरोधी रुझान उसे भी झेलना पडा | दोपहर  एक बजे तक के रुझान में आम आदमी पार्टी का स्पष्ट बहुमत तय हो गया था और भाजपा 100 के आसपास झूल रही थी | लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस 10 के आसपास सिमट गयी है | जो राष्ट्रीय राजनीति में उसका विकल्प बनने के आम आदमी पार्टी के दावे को मजबूत करता है | दरअसल श्री केजरीवाल  ये जानते हैं कि भाजपा का विकल्प बनना फ़िलहाल संभव नहीं है लेकिन यदि उनकी पार्टी कांग्रेस को पीछे छोड़ देती है तब उसका भविष्य उज्ज्वल होगा और भाजपा विरोधी जनमानस  उनमें सम्भावना तलाशेगा | पंजाब में सफलता के बाद गुजरात में भी पार्टी की रणनीति कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेलने की रही जिसका परिणाम कल के नतीजे से स्पष्ट हो जाएगा | दिल्ली नगर निगम के चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए वाकई चिंता पैदा करने वाले हैं क्योंकि लोकसभा और  विधानसभा के बाद स्थानीय निकाय के चुनाव में भी वह जिस तरह औंधे मुंह गिरी उसके बाद भविष्य में उसको उम्मीदवार मिलना  मुश्किल हो जाए तो आश्चर्य नहीं  होगा | सबसे बड़ी बात ये है कि उसने इस चुनाव को जीतने के लिए कुछ किया ही नहीं जिससे लगता है हार  को वह नियति मान बैठी है | आम आदमी पार्टी को मिली सफलता भाजपा विरोधी उन मतों पर ही टिकी है जिन पर कांग्रेस का कब्जा था | इस प्रकार दिल्ली के ताजे नतीजे कांग्रेस के लिए निराशाजनक ही  नहीं अपितु अपमानजनक भी है | गुजरात में तो उसकी संभावना वैसे ही नहीं है और यदि हिमाचल में भी वह भाजपा से सत्ता नहीं छीन सकी तब राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का बेअसर साबित होना तय है | हालांकि एक स्थानीय निकाय के चुनाव से राष्ट्रीय राजनीति के भविष्य का आकलन करना जल्दबाजी होगी किन्त्तु आम आदमी पार्टी को सफलता मिलने के बावजूद भाजपा का 15 साल बाद भी अपना जनाधार बनाये रखना मायने रखता है वहीं कांग्रेस के लिए ये एक और झटका है | इसके बाद भी उसे समझ आयेगी ऐसा नहीं लग रहा | वरना प्रधानमंत्री का चेहरा कहे जाने वाले राहुल इन चुनावों से भागकर यात्रा न निकाल रहे होते | आम आदमी पार्टी निश्चित रूप से बधाई की पात्र है | वहीं भाजपा को भी ये नसीहत  दिल्ली की जनता ने दे दी है कि हर चुनाव प्रधानमंत्री के नाम पर नहीं जीता जा सकता और ये भी कि मतदाता लकीर का फ़कीर नहीं है जो हर चुनाव में  अलग तरह से निर्णय करता है | जहां तक कांग्रेस की बात है तो उसकी बची खुची उम्मीद अब केवल हिमाचल पर टिकी हैं किन्तु उस छोटे से राज्य की राजनीति देश को प्रभावित नहीं करती | 

: रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 6 December 2022

धर्मान्तरण रोकने के लिए समाज को भी आगे आना होगा



ये बात यदि कोई और कहे तो धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदारों के पेट में मरोड़ होने लगता है परन्तु सर्वोच्च न्यायालय धर्मांतरण पर जो टिप्पणियाँ कर रहा है वे इस बात का प्रमाण हैं कि भोले – भाले लोगों की अज्ञानता और अभावों का लाभ उठाते हुए विदेशी धन से बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन योजनाबद्ध ढंग से किया गया | बीते दिनों न्यायालय ने ये कहकर सनसनी मचा दी थी कि मतान्तरण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता  है | इसी सिलसिले में गत दिवस इस बारे में पेश की गईं याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय  ने टिप्पणी की कि जरूरतमंद को दवाई और अनाज देना तो परोपकार है लेकिन यदि उसका मकसद  धर्म  परिवर्तन करवाना हो तो वह एक  गम्भीर मसला है जो संविधान के बुनियादी ढांचे के विरुद्ध है | यद्यपि अभी न्यायालय का अन्त्तिम फैसला नहीं आया परन्तु आजादी के 75 साल बाद ही सही किन्तु देश के भीतर अब ये समझ पैदा होने लगी है कि गरीबों की बस्तियों सहित  आदिवासियों के गावों और जंगलों में मिशनरियों द्वारा विद्यालय और अस्पताल जैसे संस्थान खोलने के पीछे सुनियोजित षडयंत्र था | उल्लेखनीय है  परोपकार के नाम पर चलाये जा रहे इन प्रकल्पों में विदेशी धन का उपयोग किया जाता रहा है | अमेरिका सहित यूरोप के ईसाई बहुल देशों में धर्म के प्रचार – प्रसार हेतु लोग अपनी आय का जो  भाग चर्चों को दान में देते हैं वह भारत जैसे देशों में मिशनरियों के जरिये धर्म परिवर्तन के लिए उपयोग किया जाता रहा है | इस धर्म का प्रचार करने वाले जानते थे कि गरीबों की बस्तियों और आदिवासी इलाकों में रहने वाले इतने शिक्षित नहीं हैं जो प्रवचन और धर्म ग्रंथों से प्रभावित होकर अपना धर्म छोड़ दें | लेकिन उनकी मौलिक जरूरतों को पूरा करने के बाद उन्हें उसके लिए प्रेरित किया जा सकता है | अतीत में अफ्रीका में इसी तरीके को आजमाकर ईसाई मिशनरियां ये काम सफलतापूर्वक कर चुकी थीं | ब्रिटिश राज के दौरान ही भारत में धर्म परिवर्तन की दूरगामी योजना तैयार की गई थी  | उसी के अंतर्गत शहरों में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय खोले गए ताकि ब्रिटिश सत्ता के प्रति भक्तिभाव रखने वाले नौकरशाह तैयार हों | गरीब बस्तियों में चर्च बनाकर खाने - पीने का सामान बाँटने के साथ मतान्तरण की बुनियाद रखी गयी | आदिवासी बहुल क्षेत्रों में मिशनरियों ने विशेष ध्यान दिया क्योंकि उनमें रहने वाले अलग तरह की ज़िन्दगी जीते  थे | जल , जंगल और जमीन ही उनकी दुनिया थी | शहरी सभ्यता से दूर सीधे – सादे आदिवासी ईसाई मिशनरियों के निशाने में आसानी से आ गये | देश का पूर्वोत्तर इलाका उनको खुले मैदान के तौर पर मिला | हालाँकि मिशनरियों के प्रसार में सनातन धर्म के धर्माचार्यों का आदिवासियों के प्रति उपेक्षा भाव भी  कम जिम्मेदार नहीं है |  जाति के नाम पर खड़ी की गईं दीवारें भी धर्मान्तरण में सहायक साबित हुई. | आज आदिवासी और दलित समुदाय को मुख्य धारा के विरुद्ध भड़काने का जो काम चल रहा है उसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मिशनरियों का हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता | ये शुभ संकेत है कि शासन – प्रशासन के साथ ही सनातनी धर्माचार्य और अब न्यायपालिका भी धर्मांतरण के जरिये भारत के सामाजिक ढांचे में दरार पैदा करने के खेल को समझ चुकी है | कुछ राज्यों में लालच और दबाव में किये जाने वाले धर्मान्तरण को गैर कानूनी बना दिया गया है | अनेक साधु – सन्यासी और धार्मिक संगठन भी ईसाई बन  चुके आदिवासियों को वापस लाने प्रयासरत हैं | एकल विद्यालय जैसे प्रकल्पों के जरिये आदिवासियों के बच्चों को भारतीय संस्कृति में ढालने का कार्य चल रहा है | लेकिन नेताओं का एक तबका है जो ऐसे   प्रयासों में भी राजनीति देखता है | उस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा  की गईं टिप्पणियां काफी अर्थपूर्ण हैं | लालच और दबाववश किये जाने वाले धर्म परिवर्तन को राष्ट्रीय सुरक्षा और संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ मानने की बात चूंकि न्याय की सर्वोच्च आसंदी द्वारा कही गयी इसलिए उस पर नाक सिकोड़ने वाले खुलकर सामने नहीं आ रहे | लेकिन इनके कारण  धर्मान्तरण का असली उद्देश्य उजागर हो रहा  है |  ऐसे अनेक प्रकरण हैं जिनमें व्यक्ति को पता ही नहीं चला और उसका धर्म बदल दिया गया | बड़ी संख्या में ऐसे लोग  भी हैं जिनकी जीवन शैली और संस्कृति में कोई बदलाव नहीं आया लेकिन भौतिक आकर्षणों के कारण वे  ईसाई बन गये जिसके धार्मिक पक्ष से उनका कोई वास्ता नहीं  है | उन  लोगों की भी संख्या कम नहीं है जिन्हें मिशनरियों ने पूरी तरह मुख्यधारा से काट दिया है | इस वजह से वे देश विरोधी ताकतों के जाल में फंस गये | नक्सलवादी  और पूर्वोत्तर की  अलगाववादी गतिविधियों से आदिवासी समुदाय के जुड़ाव में धर्मांतरण की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता | ये अच्छी बात है कि सर्वोच्च न्यायालय धर्म परिवर्तन के कारोबार का संज्ञान ले रहा है | लेकिन इसके साथ ही सनातन धर्म के धर्माचार्यों का भी ये दायित्व है कि वे   दलितों और आदिवासी समुदाय को मुख्य धारा में शामिल करने आगे आयें  | केवल ईसाई मिशनरियों को दोष देने और धर्मांतरण विरोधी कानून बना देने मात्र से उसे रोक पाना संभव नहीं होगा | शिक्षा , स्वास्थ्य सहित  मूलभूत जरूरतें पूरी करना जरूरी है | इस बारे में केवल सरकार से अपेक्षा करना उचित नहीं है क्योंकि धर्मान्तरण के लिए सामाजिक विषमता और कुरीतियाँ भी उत्तरदायी हैं | सरकार और कानून तो अपना काम करेंगे ही लेकिन समाज को भी इस बात की चिंता करनी चाहिए कि उसका एक हिस्सा अपनी आस्था में परिवर्तन क्यों करता है ? 

: रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 5 December 2022

जे.एन.यू में लिखे नारे देश तोड़ने की साजिश का हिस्सा



दिल्ली का बहुचर्चित जे.एन.यू ( जवाहरलाल नेहरु विश्व विद्यालय ) फिर  सुर्खियों में है | उसके परिसर की कुछ दीवारों पर ब्राह्मणों  और बनियों को भारत और विवि छोड़ने के साथ ही रक्तपात और बदला लेने की धमकी वाले नारे लिखे जाने की राष्ट्रव्यापी प्रतिक्रिया हुई है | सोशल मीडिया पर उक्त जातियों के लोग विरोध  व्यक्त कर रहे हैं | विख्यात  गीतकार मनोज मुन्तशिर शुक्ला द्वारा ब्राह्मणों के गौरवशाली इतिहास और योगदान पर रचित एक कविता का  वीडियो तेजी से प्रसारित हो रहा है | कुछ  लोग इसे गुजरात और दिल्ली नगर निगम के चुनाव को प्रभावित करने वाली चाल भी  बता रहे हैं | ये आशंका भी है कि विवि पर अपना नियंत्रण खत्म होता देख वामपंथी निम्नस्तरीय हरकतों पर उतर आये हैं | जातिगत वैमनस्य बढाकर संस्थान की शांति भंग करने का मकसद भी इसके पीछे हो सकता है | हालाँकि ये पहला अवसर नहीं है जब वहां  इस तरह की गंदी हरकत हुई हो | महिषासुर जयन्ती के अलावा हिन्दू देवी – देवताओं के आपत्तिजनक चित्र और टिप्पणियाँ किये जाने की शरारत  अतीत में  भी होती रही है | यहाँ के छात्र और शिक्षक संघ पर लम्बे समय तक  वामपंथी प्रभाव  रहने से  देश और समाजविरोधी गतिविधियाँ बेरोकटोक चलती रहीं | कश्मीर की आजादी के जो नारे लगाये जाते रहे वे किसी से छिपे नहीं हैं | लेकिन बीते कुछ वर्षों से  माहौल थोड़ा बदला है | छात्र और शिक्षक संगठनों में राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रवेश होने के बाद पहले जैसी अराजकता नहीं रही | उच्च पदों पर  शिक्षा जगत से जुड़े सुलझे हुए व्यक्तियों की नियुक्ति से परिसर का वातावरण काफी सुधरा है | शहरी नक्सली कहलाने वाले तत्व इससे खीझ उठे हैं जिसके कारण उन्होंने जाति के नाम पर जहर फैलाने का षडयंत्र रचा | वैसे भी देश में इस समय अनेक ऐसे चेहरे उभर रहे हैं जो जाति के नाम पर समाज में  संघर्ष के हालात पैदा करने की कोशिश में  हैं | दुर्भाग्य से राजनीतिक दलों का समर्थन मिलने से इनके हौसले मजबूत होते हैं | यद्यपि सभी जातियों में सकारात्मक सोच रखने वाले लोग हैं किन्तु समाज को बांटने वाली मानसिकता मौका पाते ही सिर उठाने लगती है | देश के अनेक हिस्सों में जातिगत आरक्षण की मांग को लेकर हिंसात्मक आन्दोलन भी हुए हैं | महाराष्ट्र और राजस्थान में जातिगत संघर्ष भी देखने मिले | इनके पीछे वोट बैंक की राजनीति के अलावा उन्हीं राष्ट्रविरोधी लोगों की भूमिका रही जो जे.एन.यू में समय – समय पर दिखाई दे जाती है  | ये वही संस्थान है जहां  भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे लगाने का दुस्साहस खुले आम होता रहा | दुःख का विषय ये है कि वैसा करने वालों को समर्थन देने के लिए देश के अनेक राजनीतिक नेता , बुद्धिजीवी  और पत्रकार जा  पहुंचे | उस दौर के छात्र नेताओं में से एक कन्हैया कुमार सीपीआई के साथ आने के बाद कांग्रेस में चले गये और वर्तमान में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के साथ हैं | वैसे भी पंडित नेहरु के ज़माने से ही वामपंथियों ने शिक्षा , कला और संस्कृति  से जुड़ी संस्थाओं में अपनी जड़ें जमा ली थीं | कांग्रेस को ये तबका इसलिए पसंद रहा क्योंकि वह राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोध में बौद्धिक स्तर पर मोर्चेबंदी किया करता था | लेकिन इसकी वजह से उसका अपना जनाधार कमजोर होता गया | इंदिरा जी जब सत्ता में आईं और उन्हें पार्टी के भीतर वरिष्ट नेताओं का विरोध झेलना पड़ा तब वामपंथी उनकी बैसाखी बन गये जिसकी कीमत भी उन्होंने भरपूर वसूली | जे.एन.यू सरीखे संस्थानों पर कब्ज़ा उसी का परिणाम है | हालाँकि 1975 में आपातकाल लगाये जाने के समय सीपीआई श्रीमती गांधी के साथ खड़ी हुई जबकि सीपीएम ने विरोध का रास्ता पकड़ा किन्तु उसके बाद की राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथियों ने रा.स्व.संघ और भाजपा के विरोध में कांग्रेस का समर्थन किया | इसी वजह से ममता बैनर्जी ने कांग्रेस छोड़ अपनी अलग पार्टी बना ली | धीरे – धीरे जब वामपंथी राजनीति ढलान पर आने लगी तब शहरी नक्सली वाला रूप धरकर वे देश को अंदर से कमजोर करने में जुट गए | जे.एन.यू में हुई संदर्भित शरारत उसी का हिस्सा है | हालाँकि यह षडयंत्र इसलिए नाकामयाब हो गया क्योंकि ब्राहमण और बनिया समुदाय की ओर से सामने आये विरोध में किसी जाति के विरुद्ध कुछ नहीं कहा गया | लेकिन  राजनीतिक दलों का इस मामले में मौन  अच्छा संकेत नहीं है | उल्लेखनीय है भारत तेरे टुकड़े होंगे वाली नारेबाजी के बाद कन्हैया और उमर खालिद आदि की गिरफ्तारी  हुई तब कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी विवि  परिसर में उक्त छात्र नेताओं को समर्थन देने पहुंचे थे | भारत जोड़ो यात्रा के दौरान वे और कन्हैया कुमार नित्य प्रति रा.स्व.संघ  और भाजपा को घेरते रहते हैं लेकिन जे.एन.यू की दीवारों पर लिखे समाज को तोड़ने वाले नारों पर उनकी चुप्पी सवाल खड़े करती है | अन्य विपक्षी नेता और असहिष्णुता का हल्ला मचाने वाले लोग  भी मुंह खोलने का साहस नहीं कर रहे | संभवतः उनकी सोच वोट बैंक के नफे - नुकसान पर टिकी होगी | लेकिन समाज के व्यापक हितों की दृष्टि से देश की राजधानी में स्थित अंतर्राष्ट्रीय स्तर के शिक्षा संस्थान में इस तरह की हरकत  का राजनीति से  ऊपर उठकर विरोध होना जरूरी है | हालाँकि आज भी हिन्दू समाज अपनी सहिष्णुता को बनाये रखे है जिसके चलते ऐसे  मंसूबे सफल नहीं हो पा रहे | उ.प्र जैसे  राज्य में जाति और समुदाय की राजनीति को जिस तरह जनता ने नकारा उससे देशविरोधी ताकतें बौखलाहट में आकर दलित और आदिवासी समुदाय को  मुख्य धारा से अलग करने के प्रयास में जुटी हैं | जे.एन.यू की दीवारों पर ब्राह्मण  और बनिया विरोधी नारे उसी का हिस्सा है | देश हित के लिए जरूरी है सभी राजनीतिक दल इस षडयंत्र के विरुद्ध आवाज उठायें | यदि वे ऐसा नहीं करते तो ये मानना गलत न होगा कि वे भी समाज को तोड़ने वाली ताकतों  के साथ हैं |

: रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 3 December 2022

राहुल खुद जय सियाराम का नारा क्यों नहीं लगाते .....



कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो यात्रा में जितना समय रास्वसंघ और भाजपा को कोसने में लगा रहे हैं उतना  अपनी पार्टी की विचारधारा और उसकी सरकारों द्वारा किये गए कार्यों के प्रचार में खर्च करें तो उन्हें और कांग्रेस दोनों को लाभ हो सकता है | लेकिन दिग्विजय सिंह जैसे सलाहकार चूंकि उनके साथ चल रहे हैं इसलिए वे घूम - फिरकर वही गलती दोहरा  बैठते हैं जो अतीत में भी नुकसानदेह साबित हो चुकी है | मसलन गत दिवस वे हे राम , जय सियाराम और जय श्री राम की व्याख्या करते हुए भाजपा को समझाइश दे बैठे  कि वह जय सियाराम और हे राम भी कहे | हालाँकि इस बात के लिए श्री गांधी की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने ये भी बता दिया कि ये बातें उन्हें यात्रा में मिले एक पंडित जी ने बताई थीं | वैसे श्री गांधी ने जो व्याख्या की वह इतनी सतही है कि उनके समर्थक भी  ठीक से समझ नहीं सके | लेकिन इससे हटकर सवाल ये है कि भाजपा के हिंदुत्व से असहमति रखने और उसकी देखासीखी मंदिरों में जाकर साष्टांग करने वाले राहुल और उनकी पार्टी को जय सियाराम और हे राम बोलने से किसने रोक रखा है ? गांधी जी की प्रार्थना सभा में  ईश्वर अल्ला तेरो नाम , सबको सन्मति दे भगवान की गूँज सुनाई देती थी किन्त्तु उनकी समाधि पर हे राम लिखा गया जिस पर किसी ने ये नहीं कहा कि उससे हिंदुत्व का भाव सामने आता है | कांग्रेस को इस बात पर ऐतराज है कि भाजपा केवल जय श्री राम बोलती है ,  जय सियाराम और हे राम नहीं | बेहतर हो श्री गांधी अपनी इस यात्रा में सायंकाल बापू की तरह भजन संध्या शुरू करें और अपने समर्थकों को इस बात के लिए प्रेरित करें कि वे जय सियाराम और हे राम के नारे लगाया करें |  लेकिन मंदिर और  मठों में दंडवत करने के बावजूद  किसी ने श्री गांधी के मुख से जय सियाराम या हे राम नहीं सुना होगा | यात्रा में मिले किसी पंडित जी ने यदि  उक्त ज्ञान न दिया होता तब शायद ही वे राम नाम की व्याख्या करने का कष्ट उठाते | दरअसल राहुल और कांग्रेस दोनों लम्बे समय से उहापोह में हैं | वैचारिक अस्पष्टता और अस्थिरता की वजह से पार्टी की पहिचान ही खत्म होती जा रही है | भाजपा ने जब राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दे को उठाकर सत्ता हासिल कर ली तब कांग्रेस को धर्मनिरपेक्षता पर खतरा नजर आ रहा था | और उसी धुन में वह अखिलेश , लालू और वामपंथियों से हाथ मिलाती रही | हिंदुत्व के मामले में भाजपा से ज्यादा कट्टर शिवसेना के साथ सरकार बना लेने का उसका निर्णय भी अधकचरी सोच का नतीजा था | जिस आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और पंजाब से कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ कर दिया उसकी पहली सरकार दिल्ली में कांग्रेस के समर्थन से ही बनी थी | राम भक्तों पर गोलियां चलवाने वाले स्व.मुलायाम सिंह यादव और लालकृष्ण आडवाणी की राम रथ यात्रा रोककर उनको गिरफ्तार करने वाले लालू प्रसाद यादव की सरकारों को स्व. राजीव गांधी ने टेका लगाने की जो गलती की उसके परिणामस्वरूप उ.प्र और बिहार में कांग्रेस घुटनों के बल आ गयी | यदि उसी समय कांग्रेस को राम नाम की महिमा समझ आ गई होती तो आज उसे ये दुर्दिन न देखने पड़ते | राहुल को चाहिए वे कांग्रेस की  नीतिगत अस्पष्टता को खत्म करने के प्रयास करें | भाजपा से ज्यादा हिन्दू बनने के फेर में वे खुद हंसी का पात्र बनते रहे हैं | 2017 के गुजरात चुनाव के दौरान अचानक उनकी पार्टी के प्रवक्ता ने श्री गांधी की जाति , गोत्र और उनके जनेऊ धारी होने का शिगूफा छोड़ दिया | उसके पहले उ.प्र  चुनाव में उन्होंने कांग्रेस का प्रचार अयोध्या स्थित हनुमान गढ़ी से किया लेकिन वहां पार्टी का सफाया हो गया | गुजरात चुनाव में वे सोमनाथ जा पहुंचे |  उसके बाद शिवभक्त बनाकर मानसरोवर भी गये | लेकिन  तमाम कोशिशों का कोई लाभ न उन्हें मिला न पार्टी को | यहाँ तक कि वे अपनी पुश्तैनी सीट अमेठी में ही  हार गए | भारत जोड़ो यात्रा पर नजर रख रहे अनेक  प्रेक्षक मान रहे हैं कि इससे कांग्रेस की तो नहीं लेकिन श्री गांधी के छवि में कुछ न कुछ सुधार होगा |  लेकिन इसके लिए जरूरी है वे भाजपा द्वारा खींची लकीर को काटने के बजाय उससे बड़ी लकीर खींचे | बीते कुछ सालों में साबित हो गया है कि कांग्रेस को धर्मनिरपेक्षता से कुछ भी लगाव नहीं है | जिन मुस्लिम मतों की खातिर वह उसे ढो रही थी ,उनको पहले मुलायम – लालू , ममता और अब ओवैसी ले भागे | इसी तरह दलित और पिछड़ी जातियां भी उससे छिटक गईं जिसका कारण उसका नीतिगत असमंजस ही है | राममंदिर बनाने का श्रेय भाजपा से छीनने के लिये वह दावा करती है कि उसका शिलान्यास तो स्व.राजीव गांधी के प्रधानमन्त्री और स्व. नारायण दत्त तिवारी के उ.प्र के मुख्यमंत्री रहते हुआ था | लेकिन जब बाबरी ढांचा गिरा तब कांग्रेस के प्रधानमंत्री स्व. पीवी . नरसिम्हाराव ने उसे दोबारा खड़ा करने का वायदा करने की मूर्खता कर डाली | लेकिन न कांग्रेस की सरकारें राम  मंदिर बनवा सकीं  और न ही बाबरी ढांचा दोबारा खड़ा हो सका | हालाँकि  भाजपा की  राजनीति  हिन्दुओं पर टिकी होने पर भी उसे उनके  पूरे  मत नहीं मिलते | बावजूद इसके उसने उ.प्र में सपा और बसपा की जातिगत गोलबंदी को तोडने में जो कामयाबी हासिल की वह कांग्रेस नहीं कर पा रही तो उसके लिए वह खुद दोषी है और पार्टी का अभिभावक रहने के कारण गांधी परिवार को उसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिये जिससे वह बचता है | ऐसे में राहुल  कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन उनके मुंह में  राम और हिन्दू जैसे शब्द ठूंसे हुए लगते हैं | अपने आपको शिवभक्त कहने वाले श्री गांधी ने ज्ञानवापी  मुद्दे पर एक शब्द तक नहीं कहा | यही वजह है कि आज न हिन्दू समाज कांग्रेस के साथ बचा और न ही मुस्लिम उस पर पहले जैसा भरोसा कर पा रहे हैं |

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 2 December 2022

गुजरात में मतदाताओं की उदासीनता राजनीतिक दलों की विफलता



आर्थिक मोर्चे से लगातार अच्छी खबरें आ रही हैं | नवंबर महीने का जीएसटी संग्रह 1.45 लाख करोड़ रहना इस बात का प्रमाण है कि अर्थव्यवस्था का पहिया रफ्तार पकड़ चुका है | ऑटोमोबाइल उद्योग में भी मांग तेजी से बढ़ती जा रही है |  कोरोना काल के बाद आम उपभोक्ता में भविष्य को लेकर जो असुरक्षा का भाव था वह काफी कुछ दूर हुआ  है जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण पर्यटन उद्योग में उछाल है | इसी तरह   शादी – विवाह पर होने वाले खर्च में जो कटौती हुई थी वह भी अब समाप्त हो चली है | इसकी वजह से होटल , रिसार्ट , मैरिज गार्डन और कैटरिंग के अलावा उससे जुड़े  परम्परागत कारोबार में भी खासी वृद्धि देखी जा रही है | राजनीतिक कारणों से ही सही किन्तु केंद्र सरकार गरीबों को खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत जो मुफ्त अनाज दे रही है वह भी अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ होने का सबूत है | कोरोना के  कारण लगाये गए लॉक डाउन के दौरान जब सब कुछ बंद था तब भी देश के किसानों ने खेतों में पसीना बहाकर अन्न भंडारों को भरने का पुख्ता इंतजाम किया | उसकी वजह से कहीं भी अराजकता देखने नहीं मिली | यद्यपि जरूरी चीजों के दाम बीते दो ढाई सालों में अप्रत्याशित तौर पर बढ़े किन्तु उन परिस्थितियों में वैसा होना पूरी तरह स्वाभाविक था | सबसे बड़ी बात  ये रही कि किसी भी चीज की कमी नहीं रही तथा आपूर्ति लगातार जारी रहने से उत्पादक और उपभोक्ता दोनों का काम चला | उस समय पूरी दुनिया के साथ ही भारत भी एक ऐसे दौर से गुजरा जिसमें मौत हर कदम पर सामने थी और ऐसा लगता था कि सब कुछ बर्बाद हो जायेगा | लेकिन शासन , प्रशासन और जनता के बेहतर समन्वय और अनुशासन का पालन होने से आपदा अवसर बन गयी | और एक नया भारत विश्व पटल पर उभरकर सामने आया जो पहले से ज्यादा आत्मविश्वास से भरा हुआ है जिसमें विश्व का नेतृत्व करने की इच्छाशक्ति है | ताजा आंकड़ों के अनुसार महंगाई भी उतार पर है | वैश्विक बाजारों से खबर आ रही है कि कच्चे तेल की कीमतें भी गिर रही हैं | इससे ये उम्मीद की जाने लगी है कि भारत में पेट्रोल – डीजल की कीमतों में भारी कमी हो सकती है | पहले  अनुमान था कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव के पहले केंद्र  सरकार इनकी कीमतें घटा देगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ | इसका एक कारण शायद ये भी हो सकता है कि  भाजपा को दोनों राज्यों में अपनी जीत का विश्वास है | लेकिन देखने वाली बात ये है कि प्रधानमत्री और गृहमंत्री के घरेलू राज्य गुजरात में कल हुए प्रथम  चरण के मतदान का प्रतिशत 2017 की तुलना में कम रहा | राजनीति के पंडित ये मानते हैं कि कम मतदान यथास्थिति बनाये रखने का संकेत होता है | स्मरणीय है पिछली मर्तबा गुजरात में ज्यादा मतदान हुआ तब कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया था | हालाँकि  वह सत्ता की देहलीज पर आकर ठहर गयी लेकिन  भाजपा को सर्दी में भी गर्मी का एहसास हो गया था | इस बार तो वहां  त्रिकोणीय संघर्ष है | भाजपा और कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी ने मैदान में उतरकर मुकाबले को बेहद कड़ा और रोचक बना दिया है | ऐसे में ये सोचना पूरी तरह सही था कि गुजरात में मतदाता उत्साहपूर्वक मतदान करने निकलेंगे किन्तु पिछले चुनाव की तुलना में कम मतदान इस बात का संकेत है कि जनता के मन में नाराजगी भले न हो किन्तु वैसा उत्साह भी नहीं है जो उन्हें मतदान केंद्र तक खींच लाता | यदि कम मतदान  कांग्रेस की खस्ता हालत का संकेत है तो फिर ये मान लेना गलत न होगा कि वह अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं का हौसला बढ़ाने में विफल रही | आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और पंजाब की तरह से मुफ्त बिजली और शिक्षा का जो लालच दिया उसके बाद भी यदि 40 फीसदी मतदाता घर से नहीं निकले तो ये कहीं न कहीं राजनीति के प्रति अविश्वास का ही परिचायक है | इस बात को अर्थव्यस्था से जोड़ना अटपटा लग सकता है क्योंकि 2016 में की गई नोटबंदी के  बाद भी  भाजपा ने 2017 में उत्तरप्रदेश का चुनाव धमाकेदार अंदाज में जीता | लेकिन गुजरात जो कि उद्योग – व्यवसाय का गढ़ है वहां उसके  पसीने छूट गये और कर्नाटक में भी वह बहुमत पाने में विफल रही | इससे   साफ़ है कि मतदाता की सोच काफी अलग हो गई है | भाजपा के लिये भी ये शोचनीय है कि कांग्रेस का जहाज डूबता नजर आने से उसके प्रति मतदाताओं का रुझान घटा है लेकिन उसका भरपूर लाभ भाजपा को न मिलना भी काफी कुछ कह जाता है | गुजरात में ढाई दशक से भी ज्यादा समय से उसका राज है |  फिर भी कल मतदान का प्रतिशत गिरना दर्शाता है कि कहीं न कहीं ये अवधारणा बरकरार है कि कोई – जीते या हारे लेकिन हमारी दशा नहीं सुधरने वाली तो क्यों जाएँ मतदान करने ? ऐसे में इस सवाल  का जवाब प्रत्येक राजनीतिक दल को तलाशना चाहिए कि उनके धुआंधार प्रचार के बावजूद 40 फीसदी मतदाता घर बैठा रहा  तो इसकी वजह क्या है ?  गौरतलब है कि गुजरात का  साधारण से साधारण व्यक्ति आर्थिक मामलों में जबरदस्त रूचि रखता है | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो इसे सार्वजानिक रूप से कहते भी हैं | ऐसे में  गुजरात में मतदान का कम प्रतिशत इस बात का इशारा है कि लोग नाराज भले न हों लेकिन अभी भी खुशी उनके जीवन में नहीं लौट सकी है | जीएसटी के बढ़ते आंकड़े  सुनने में तो अच्छे लगते हैं लेकिन उनका सीधा फायदा जनता को नहीं मिलता तब तक उसका बड़ा हिस्सा व्यवस्था के प्रति उदासीन बना रहेगा | गुजरात में औसतन 60 फीसदी मतदान उसी का परिचायक है | ध्यान देने वाली बात ये है कि लोकतंत्र एक जीवंत व्यवस्था है जिसमें जनता की प्रसन्नता और नाराजगी दोनों किसी न किसी तरह लाभदायक होती हैं लेकिन उदासीनता सदैव नुकसान का कारण बनती है |

-रवीन्द्र वाजपेयी

 

Thursday, 1 December 2022

जी - 20 साख बढ़ाने और धाक जमाने का सुअवसर




यद्यपि आम जनता को इससे कुछ भी  लेना - देना नहीं है लेकिन जी - 20 नामक समूह की अध्यक्षता प्राप्त होना भारत के लिए कूटनीतिक महत्व के साथ ही सम्मान का विषय है | हालाँकि सं.रा.संघ जैसी मान्यता इसे नहीं है  लेकिन जिस समूह में अमेरिका ,  कैनेडा , ब्रिटेन , फ्रांस ,ऑस्ट्रेलिया , चीन , जर्मनी , रूस , सऊदी अरब, ब्राजील , इटली , जापान , दक्षिण कोरिया , यूरोपीय यूनियन , अर्जेंटीना , इंडोनेशिया और मेक्सिको जैसे देश शामिल हों उसे  एक तरह से विश्व समुदाय की आवाज कहना गलत न होगा | पर्यावरण , व्यापार , आपसी सम्बन्ध जैसे मुद्दों पर यह समूह बीते कुछ समय से तेजी से उभरा है | इसकी अध्यक्षता हर साल किसी नए देश को मिलती है और उस दृष्टि से ये भारत का साल है | आज से यह कार्यकाल शुरू हो रहा है | यद्यपि अतीत में भारत गुट निरपेक्ष और सार्क जैसे संगठनों की अध्यक्षता कर चुका है लेकिन उनकी अपेक्षा जी – 20 एक बड़ा समूह है जिसमें विश्व की लगभग सभी आर्थिक और सैन्य शक्तियां शामिल हैं | उससे भी महत्वपूर्ण ये है कि इसमें अमेरिका और रूस जैसे देश हैं जिनके बीच रिश्ते अच्छे नहीं हैं | इसी तरह चीन के साथ जापान और आस्ट्रेलिया के रिश्ते भी बेहद तनावपूर्ण हैं | बावजूद इसके इन सबका एक साथ रहना इस बात का संकेत  है कि आज की दुनिया में आपसी मतभेदों के बावजूद एक साझा मंच पर आना वैश्विक शांति के साथ दुनिया के लोगों के बेहतर जीवन के लिए कितना जरूरी है | हालाँकि ये सवाल भी उठता है कि जब सं.रा. संघ जैसा संगठन विश्व समुदाय का सबसे बड़ा मंच है तब  सीमित संख्या वाले इस समूह की क्या जरूरत है ? लेकिन  सं.रा.संघ का गठन दूसरे विश्व युद्ध के उपरांत उत्पन्न परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में हुआ था जिसका मुख्य उद्देश्य युद्ध से मानवता को बचाना था | वह उस मकसद में कामयाब तो हुआ लेकिन ये कहना भी  गलत न होगा कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य उस पर हावी हो गये हैं जिससे विश्व शांति के लिए आवश्यक अनेक फैसले लंबित पड़े रहते हैं | ये स्वीकार करने में कुछ भी गलत नहीं है कि इस विश्व संगठन ने दुनिया के गरीब देशों की मदद हेतु यूनेस्को और यूनीसेफ जैसे संगठन बनाकर सराहनीय कार्य किया लेकिन आतंकवाद  पर उसकी लाचारी खुलकर सामने आती रही है | पाकिस्तान जैसे  देश पर नकेल कसने में भी उसकी भूमिका प्रभावहीन  है | इसके अलावा आर्थिक विषमता को दूर करने में भी सं.रा.संघ की उपयोगिता लगभग न के बराबर रही है | इसका सबसे बड़ा कारण वे पांच देश हैं जिनके पास वीटो का अधिकार होने से वे अपने हितों के विरुद्ध होने वाले किसी भी फैसले में रूकावट बन जाते हैं | सबसे बड़ी बात ये है कि अब दुनिया आर्थिक विकास के प्रति ज्यादा चिन्त्तित  हो चली है | विश्व व्यापार संगठन ने दुनिया को एक बड़ी मंडी  बना दिया  जिसमें छोटे – बड़े सभी देश या तो व्यापारी बनकर आते हैं या खरीददार | सं.रा.संघ का जो ढांचा है उसमें  व्यापार और आपसी रिश्तों के बारे में वह ज्यादा कुछ नहीं कर पाता | और इसीलिये जी - 8 और जी – 20 जैसे संगठन अस्तित्व में आये | ब्रिक्स और सार्क भी इसी श्रेणी के हैं | क्वाड भी हाल ही में प्रकाश  में आया | इनके अलावा भी अनेक क्षेत्रीय संगठन हैं किन्तु आज की स्थिति में जी – 20 को यदि विश्व का सबसे ताकतवर संगठन कहें तो गलत न होगा जो  न सिर्फ शान्ति वरन व्यापार की दृष्टि से भी विश्व का नेतृत्व करने की पात्रता रखता है | ये देखते हुए भारत को उसकी अध्यक्षता करने का जो अवसर मिला है वह इसलिये काबिले गौर है क्योंकि मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितयों में एक ऐसे नेतृत्व की  जरूरत दुनिया को है जो संतुलन बनाकर चलने की सामर्थ्य रखता हो और जिसमें महाशक्ति कहलाने वाले देशों के सामने सिर ऊंचा रखने का साहस हो | कोरोना संकट के समय भारत ने मानवता की रक्षा के लिए जो योगदान दिया उसका लोहा पूरी दुनिया ने माना | उसके बाद आई आर्थिक मंदी से भी भारत जिस तरह से निपट रहा है उसकी वजह से उसकी तरफ दुनिया आकर्षित है | यूक्रेन संकट ने तीसरे विश्व युद्ध का जो खतरा पैदा कर दिया है | सं.रा.संघ की  भूमिका इस संकट को रोकने के प्रति बेहद लचर साबित हुई है | लेकिन भारत ने तटस्थ रहने के बाद भी जिस तरह से युद्ध रोकने की अपील दोनों पक्षों से की वह साधारण बात नहीं है | सबसे महत्वपूर्ण ये रहा कि इस हमले का समर्थन न करने पर भी रूस के साथ भारत के आर्थिक और सैन्य संबंध बने हुए हैं और यूक्रेन ने भी हजारों भारतीय छात्रों को सुरक्षित निकलने में भरपूर सहायता दी | आतंकवाद से लड़ने के हमारे प्रयास पूरे विश्व में प्रशंसित हुए हैं | यूक्रेन के बाद अब ताइवान पर वैसा ही हमला चीन द्वारा किये जाने की आशंका है | दूसरी तरफ कोरोना के बाद वैश्विक स्तर पर आर्थिक उथल - पुथल मची है | अनेक संपन्न  देशों का अर्थतंत्र डगमगा गया है | चीन की आंतरिक स्थिति किसी बड़े घटनाचक्र का संकेत दे रही है | पाकिस्तान भी अंदरूनी तौर पर जर्जर है | ये सब देखते हुए जी  – 20 की अध्यक्षता भारत के लिए अपनी नेतृत्व क्षमता और कूटनीतिक कौशल के प्रदर्शन का  एक स्वर्णिम अवसर है। आर्थिक मोर्चे से आ रही खबरों से ये साबित हो रहा है कि जब यूरोप के अनेक विकसित देश मंदी के शिकार हो चुके हैं तब भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत पांवों पर खडी है | राजनीतिक स्थायित्व भी उसके प्रभाव को बढाने में सहायक है | इस आधार पर ये उम्मीद करना गलत न होगा कि जी – 20 की अध्यक्षता भारत के लिए एक सुअवसर है वैश्विक बिरादरी में अपनी साख बढ़ाने  और धाक जमाने का | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 30 November 2022

गुजरात में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की लड़ाई से भाजपा को फायदा



 गुजरात विधानसभा चुनाव हेतु पहले चरण का मतदान कल 1 दिसम्बर को होने जा रहा है | आख़िरी दौर में सभी प्रमुख प्रतिद्वन्दियों ने पूरी ताकत झोंक दी है | भाजपा के स्टार प्रचारक खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं जबकि गृहमंत्री अमित शाह भी धुँआधार प्रचार में जुटे हुए हैं | राहुल  गांधी की भारत जोड़ो यात्रा म.प्र से निकलते हुए राजस्थान में प्रविष्ट होगी लेकिन उसका गुजरात न आना राजनीतिक दृष्टि से बेहद चौंकाने वाला  रहा | हालाँकि श्री गांधी बीच में आकर एक – दो सभाएं कर आये परन्तु पूरे प्रचार के दौरान उनकी गैर मौजूदगी से कांग्रेसजनों के मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ा और यही  कारण है कि आम आदमी पार्टी भाजपा विरोधी मतों का बड़ा हिस्सा खींचने की तरफ बढ़ रही है| म.प्र और राजस्थान की तरह गुजरात में भी भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होता आया है परन्तु इस बार ऐसा लगता है कांग्रेस पराजयबोध से ग्रसित होने के कारण बुझे मन से मैदान में उतरी | आम आदमी पार्टी भी समझ चुकी है कि उसे स्पष्ट बहुमत मिलना तो दूर रहा लेकिन वह इस प्रयास में है कि किसी तरह कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन  करते हुए मुख्य विपक्षी दल बन जाए ताकि  भविष्य में भाजपा का विकल्प बन सके | इसी वजह से जितने भी  सर्वे आये वे सभी कांग्रेस  और आम आदमी पार्टी के बीच दूसरे और तीसरे स्थान के  लिए मुकाबला बताते हुए भाजपा की सरकार  बनने के संकेत दे रहे हैं | यद्यपि  अरविन्द केजरीवाल तो खुले आम अपनी सरकार बनाने के दावे कर रहे हैं किन्तु गुजरात में  उनकी बात पर विश्वास करने वाले कम ही होंगे | वहीं कांग्रेस के लिए चिंता का विषय ये भी  है कि 2017 के चुनाव तक साथ  रहे  प्रतिबद्ध मतदाता भी उससे बिदक रहे हैं | इसमें दो मत नहीं कि पांच साल पहले हुए चुनाव में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए भाजपा को सांस फूलने वाली स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया था | अगर श्री  शाह ने  अंतिम दौर में सूरत की 16 सीटों को न संभाला होता तो बड़ी बात नहीं कांग्रेस बाजी पलट देती | लेकिन उसके बाद बीते पांच साल में और उस पर भी अहमद पटेल के न रहने के बाद से वह  दिशाहीन होकर रह गई है | और इसी शून्य को भरने की कोशिश में आम आदमी पार्टी है | वह अपने मकसद में कितनी कामयाब होती है ये तो 8 दिसम्बर की दोपहर तक स्पष्ट हो जाएगा लेकिन गुजरात पर नजर रखने वाले अधिकतर पत्रकारों और सर्वेक्षण एजेंसियों का मानना है कि आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के लिए बड़ा गड्ढा खोद दिया है | यद्यपि ये आशंका भी है कि वह खुद भी उसी में गिर सकती किन्तु त्रिकोणीय मुकाबले के कारण भाजपा को स्वाभाविक बढ़त नजर आ रही है | बावजूद इसके मोदी और शाह की  जोड़ी किसी मुगालते में नहीं दिख रही और भाजपा ने अन्य प्रान्तों से भी अपने दिग्गज बुलाकर मजबूत मोर्चेबंदी कर रखी है | हालाँकि हार्दिक पटेल के आने से पटेल मतों की नाराजगी का खतरा उतना नहीं रहा परन्तु  महंगाई का मुद्दा भाजपा को रक्षात्मक बनाने के लिए पर्याप्त है | इसीलिये प्रधानमंत्री गुजरात के प्रतीक पुरुष बनकर मतदाता को रिझाने में लगे हैं और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे का ताजा बयान उनके लिए उपहार की तरह हो गया जिसमें उन्होंने श्री मोदी की तुलना रावण से कर डाली | इतने वरिष्ट नेता होते हुए भी कांग्रेस अध्यक्ष वही  गलती कर बैठे जो सोनिया गांधी ने अतीत में  उनको मौत का सौदागर कहकर की थी | मतदान के महज पहले आई इस टिप्पणी को भाजपा के प्रचारतंत्र ने सीधे गुजरात के अपमान से जोड़ दिया | ऐसे में श्री खडगे का ये बयान कांग्रेस के लिए दूबरे में दो आसाढ वाली स्थिति पैदा कर सकता है | रही बात आम आदमी पार्टी की तो उसके लिए ये चुनाव खुद को राष्ट्रीय पार्टी की हैसियत दिलवाने पर केन्द्रित है | यदि पार्टी गुजरात में कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए मजबूत विपक्ष  बनने में कामयाब हो जाती है तब आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्ष द्वारा बनये  जाने वाले किसी भी मोर्चे ,में उसकी उपस्थिति अनिवार्य होगी | लेकिन जैसी संभावना अनेक सर्वे बता रहे हैं वह कांग्रेस से भी पीछे रहते हुए 10 -15 सीटों तक सिमट गई तब जरूर श्री केजरीवाल का राष्ट्रीय नेता बनने का सपना चूर हो सकता है | कुल मिलाकर कोई बड़ा उलटफेर न हुआ तब गुजरात में भाजपा ने  जो हिंदुत्व की प्रयोगशाला स्थापित की थी वह काम करती रहेगी | इसके साथ ही कांग्रेस के लिए ये अवसर है अपनी खोई साख वापस हासिल करने का | अगर वह 2017 के प्रदर्शन के आसपास भी पहुंच सकी तब उसके पास ये कहने का अवसर होगा कि बिना राहुल गांधी के  भी उसने अपना आधार बनाये रखा |  भाजपा की आंतरिक राजनीति में भी गुजरात के चुनाव नतीजे बड़े परिवर्तन का कारण बनेंगे | यदि चुनाव विशेषज्ञों द्वारा जताई जा रही संभावनाओं के अनुसार ही परिणाम आये और भाजपा अपने इस दुर्ग पर कब्ज़ा बरकरार रख सकी तब प्रधानमंत्री निश्चित रूप से और मजबूत हो जायेंगे | वैसे भी हाल - फ़िलहाल सत्ता और संगठन में उन्हें चुनौती देने वाला नजर नहीं आ रहा |

-रवीन्द्र वाजपेयी