Monday, 2 January 2023

नोटबंदी पर कानूनी मोहर की बाद उसकी ईमानदार समीक्षा जरूरी



आखिरकार  सर्वोच्च न्यायालय ने भी मान  लिया कि 8 नवम्बर 2016 की रात लागू की गई नोटबंदी  नियमानुसार थी और केंद्र सरकार ने  वह निर्णय रिजर्व बैंक से सलाह के उपरांत लिया था | जिसका उद्देश्य काले धन की समाप्ति  , नगदी रहित लेन देन को बढ़ावा  , नकली मुद्रा को रोकना और नक्सलियों सहित आतंकवादी संगठनों की आर्थिक आपूर्ति बंद करना था | हालाँकि उस फैसले को उचित बताने  वाले  भी मानते हैं कि  वह कदम बिना पर्याप्त तैयारी के उठाया गया जिससे जनता को अकल्पनीय परेशानी उठाना पड़ी | बैंकों के सामने लगी लाइनों के चित्र खूब प्रचारित हुए | 500 और 1000 के पुराने नोट तो बंद कर दिए गये लेकिन बैंकों में नई मुद्रा उपलब्ध न होने से  विकट स्थिति आ खड़ी हुई | उस दौरान बैंकों में भ्रष्टाचार की शिकायतें भी खूब आईं | पेट्रोल पम्प के अलावा , सरकारी देनदारी के भुगतान में प्रतिबंधित मुद्रा स्वीकार किये जाने की छूट ने नोटबंदी के लाभ को काफी कम  किया क्योंकि  लोगों ने अपना काला धन उसके जरिये ठिकाने लगा दिया | प्रधानमंत्री ने रात्रि 8 बजे ज्योंही टीवी पर उक्त निर्णय की जानकारी दी , पूरे देश में हड़कम्प  मच गया | आभूषणों की दुकानों में रात 12 बजे तक  भारी भीड़ उमड़ी | उस निर्णय को इस हद तक गोपनीय रखा गया था कि मंत्रीमंडल के कुछ को छोड़कर शेष सदस्य तक भौचक रह गए | बैंकों की लाइन में कुछ लोगों की मृत्यु होने से विपक्ष को बड़ा मुद्दा मिल गया | यद्यपि  फरवरी 2017 में उ.प्र के विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार जीत ने उस फैसले पर जनता की मोहर लगवा दी | प्रधानमंत्री ने उस चुनाव में नोटबंदी को मुद्दा बनाते हुए ये बात कही  कि वह काला  धन रखने वालों के विरुद्ध थी न कि आम जनता के | उनकी बात लोगों के गले भी उतरी | हालांकि काले धन की समस्या उससे कितनी हल हुई ये स्पष्ट नहीं हो सका क्योंकि 500 और 1000 के जितने नोट चलन में थे उससे ज्यादा बैंकों में लौट आने की बात विपक्ष सहित अन्य लोगों द्वारा उठाई जाती रही | इससे ये अवधारणा फैली कि नकली नोट भी बैंकों में पहुंच गए | रिजर्व बैंक आज तक इस बारे में ठोस स्पष्टीकरण नहीं  दे पाया | यद्यपि उसने कुछ सीलबंद जानकारी सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी है | नोटबंदी के विरुद्ध दर्जनों याचिकाएँ सर्वोच्च न्यायालय में आईं जिनमें सरकार के निर्णय को रिजर्व बैंक के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण बताते हुए कहा गया था कि मुद्रा के चलन की व्यवस्था रिजर्व बैंक द्वारा की जाती है लिहाजा नोटबंदी का अधिकार उसे था न कि प्रधानमंत्री को | मामला चूंकि पेचीदा था इसलिए उसे संविधान पीठ को सौंपा गया | सुनवाई के दौरान पीठ ने अनेक बार सरकार को लताड़ लगाते हुए पूरी प्रक्रिया का ब्यौरा पेश करने कहा | उसके इस दावे से भी पीठ ने असहमति जताई कि उसे  सुनवाई का अधिकार नहीं है | आज अपना फैसले में न्यायालय ने सभी याचिकाओं को रद्द कर नोटबंदी को कानून सम्मत मानते हुए कह दिया कि  उसे लागू करने की पहल रिजर्व बैंक के निदेशक मंडल की ओर से  हुई थी तथा अंतिम निर्णय के पूर्व सरकार और उसके बीच विधिवत चर्चा भी हुई | यद्यपि पांच में से एक न्यायाधीश ने नोटबंदी को गैर कानूनी बताया किन्तु शेष ने उसके पक्ष में अपनी राय व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार को  दबाव मुक्त कर दिया | इस फैसले से  नोटबंदी की वैधानिकता पर मंडराते बादल तो दूर हो जायेंगे किन्तु उसका  जो नकारात्मक परिणाम है उसका भी  ईमानादारी से  विश्लेषण किया जाना जरूरी है | ये मान लेना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है कि जो हुआ सब अच्छा ही था | एक अच्छे निर्णय के क्रियान्वयन में हुई गलतियों को जानने - समझने पर उनके दोहराव से बचा जा सकता है | हालाँकि उस फैसले के जो उद्देश्य थे वे काफी हद तक पूरे हुए हैं | मसलन नक्सलियों और आतंकवादियों का अर्थतंत्र कमजोर हुआ और डिजिटल लेनदेन भी लगातार  बढ़ रहा है | लेकिन काले धन की  समस्या यथावत है | जिसका प्रमाण 2 हजार के नोटों का बाजार से गायब होता जाना है | दरअसल नोटबंदी के पीछे जो सोच थी उसे  आधा   -अधूरा लागू किया गया | 2 हजार का नोट जारी करना औचित्यहीन था | इससे काला धन जमा करने वालों को आसानी हो गयी | होना तो ये चाहिए कि 100 रु.के नोट से बड़ी मुद्रा रहे ही नहीं | जब तक बड़े नोट रहेंगे काला धन तिजोरियों में बंद होता रहेगा | कुछ दिन से सुनने में आ रहा है कि 1 हजार का नोट फिर से चलन में आएगा और 2 हजार के बैंकों में वापस लिए जायेंगे | इस बारे मे ये कहना गलत नहीं है कि 2 हजार का नोट बंद करना तो उचित रहेगा लेकिन 1 हजार को दोबारा लाना गैर जरूरी है | वैसे भी मुद्रा संबंधी बदलाव जल्दी – जल्दी होने से सरकार की छवि खराब होती है | सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने  सरकार की नीति और नीयत दोनों को सही ठहरा दिया है | इसके बाद  जरूरत इस बात की है कि नोटबंदी के फायदे और नुकसान का आकलन करते हुए भविष्य की रूपरेखा बनाई जावे क्योंकि  उसके बाद  आई मंदी किसी न किसी रूप में जारी है | जिसे दूर करने के बारे में ठोस कदम उठाये जाने चाहिए | मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का अंतिम पूर्ण बजट अगले माह पेश होना है | उम्मीद की जा सकती है कि उसमें राहत का पिटारा खुलेगा | प्रत्यक्ष करों के साथ ही जीएसटी संग्रह उम्मीद से ज्यादा होने से ऐसा करना सरकार के लिए मुश्किल नहीं है | अब तक उसके द्वारा किये गए सख्त फैसलों को जनता ने तकलीफ सहकर भी समर्थन दिया है | बदले में यदि वह  कुछ राहत चाहती है तो उसमें गलत कुछ  भी नहीं है | 


रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 31 December 2022

प्रधानमंत्री का आचरण सत्ताधारी राजनेताओं के लिए सन्देश



गत दिवस प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की वयोवृद्ध माताजी का निधन हो गया | वे दिल्ली से अहमदाबाद पहुंचे और बिना किसी  तामझाम के उनका अंतिम संस्कार किया | नगर निगम के शव वाहन में माँ  के पार्थिव शरीर के साथ बैठकर वे श्मशान भूमि गए | वहां भी बिना भीड़ एकत्र किये उन्होंने माँ को मुखाग्नि दी और  लौटकर राजभवन में आभासी माध्यम से कोलकाता में आयोजित पूर्व  निर्धारित कार्यक्रमों में सम्मिलित हुए जिसके लिए उन्हें वहां जाना था | प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने प्रधानमंत्री की  माँ  को अपनी माँ बताते हुए उन्हें आराम करने की सलाह भी दी किन्तु श्री मोदी ने  शोक की घड़ी में भी  कर्तव्य के निर्वहन को प्राथमिकता दी और शाम दिल्ली लौट गए | प्रचार माध्यमों में उनकी इस सोच के प्रति प्रशंसात्मक भाव व्यक्त किये जाने लगे | साधारण सी अर्थी कंधे पर लिए अपने भाई के साथ  चलते प्रधानमंत्री के चित्र देखते - देखते दुनिया भर में प्रसारित हो गये | शोक संदेशों की बाढ़ आ गयी | ऐसे अवसरों पर राजनीतिक मतभेद भूलकर  सांत्वना और संवेदना  व्यक्त करने का जो शिष्टाचार है उसका भी विधिवत पालन होता दिखा जो निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है | लेकिन कुछ घंटों के बाद ही छींटाकशी का सिलसिला शुरू हो  गया | कुछ लोगों को प्रधानमंत्री द्वारा माँ की चिता ठंडी होने के पहले ही काम में लग जाना बुरा लगा तो किसी ये बात नागवार गुजरी कि उन्होंने बजाय शोकाकुल होकर बैठने के कोलकाता में वन्दे भारत ट्रेन के शुभारम्भ के साथ ही कुछ और विकास योजनाओं की शुरुआत की , जिन्हें या तो स्थगित किया जा सकता था या फिर  कोई और उस कार्य को कर देता | साधारण तौर पर हमारी सामाजिक व्यवस्था में शोकग्रस्त  व्यक्ति सब काम छोड़कर निर्धारित कर्मकांड में उलझकर रह जाता है | लेकिन  प्रधानमंत्री का एक - एक  क्षण पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार उपयोग होता है | उनके किसी भी आयोजन की तैयारियां अग्रिम रूप से की जाती हैं जिन पर भारी खर्च होता है | शासन – प्रशासन के साथ ही आम जनता भी ऐसे  आयोजन से प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जुड़ जाती है | ऐसे में उसका रद्द होना लोगों को तो निराश करता ही है , सरकारी पैसे की बर्बादी भी होती है | ये देखते हुए श्री मोदी ने निजी दुःख को दरकिनार रखते हुए  समाज को जो सन्देश दिया वह महत्वपूर्ण है | हमारे देश में  वीआईपी संस्कृति के कारण  पद , प्रतिष्ठा और पैसे के भौंड़े  प्रदर्शन की प्रतिस्पर्धा चल पड़ी | शादी – विवाह ही नहीं अपितु शोक प्रसंगों  में भी वैभव और हैसियत का दिखावा होने लगा | उस दृष्टि से प्रधानमंत्री ने अपनी माताजी के अंतिम संस्कार में जिस सादगी का परिचय दिया वह कम से कम राजनीतिक जगत के लिये तो सन्देश है ही | वे चाहते तो पार्थिव शरीर को जनता के दर्शनार्थ रख सकते थे | देश भर से नेता और अन्य विशिष्ट जन श्रद्धांजलि देने के लिए लाइन लगाकर खड़े रहते जिसका सीधा प्रसारण होता परन्तु उन्होंने इन सबसे बचते हुए अंतिम संस्कार की  पूरी प्रक्रिया साधारण तरीके से संपन्न करने  के उपरांत प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी जिम्मेदारी को महसूस करते हुए दिनचर्या जारी रखी | सत्ता में बैठे लोगों को इस बात से ये समझना चाहिए कि वे भले ही वीआईपी  शिष्टाचार और सम्मान से जुड़ी सुविधाओं और सम्मान के हकदार हों लेकिन उनका पूरा कुनबा उसे अपना अधिकार समझे ये अनुचित है | श्री मोदी की माता जी निश्चित रूप से उनके और परिजनों के लिए पूज्य थीं किन्तु थीं तो एक साधारण नागरिक ही जो अपने छोटे बेटे के साथ रहती थीं | प्रधानमंत्री अक्सर उनसे मिलने जाया करते थे किन्तु परिजनों को उन्होंने किसी भी प्रकार की  सुविधाओं से उपकृत नहीं किया | पूर्व राष्ट्रपति स्व. एपीजे कलाम ने भी  राष्ट्रपति भवन में अपने भाईयों सहित अन्य परिजनों को नहीं रखा | और न ही रामेश्वरम स्थित पुश्तैनी घर में किसी भी प्रकार का सरकारी इंतजाम किया | मोदी जी की राजनीतिक विचारधारा का विरोध चाहे जितना होता हो लेकिन बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने कार्य संस्कृति और दायित्व बोध के जो नये मापदंड स्थापित किये वे लोकतान्त्रिक व्यवस्था की आड़ में पैर जमा चुके नव सामंतवाद को खत्म करने में सहायक होंगे  | गत दिवस गुजरात के मुख्यमंत्री को छोड़कर भाजपा के नेताओं की गैर मौजूदगी इस बात का सन्देश है कि सरकारी हैसियत से परिवार को महिमामंडित और लाभान्वित करना जनतांत्रिक सोच के विरुद्ध है | प्रधानमंत्री के इस कदम में भी जिन्हें आलोचना के बिंदु दिख गये वे वैसा करने के लिए स्वतंत्र हैं | लेकिन जनता के मन में राजनेताओं और राजनीति के प्रति बढ़ती वितृष्णा रोकने में  इस तरह के उदाहरण सहायक हो सकते हैं | महात्मा गांधी ने आजादी के बाद राष्ट्रपति के लिए  वायसराय हाउस ( राष्ट्रपति भवन ) की जगह छोटे बंगले की व्यवस्था करने का सुझाव दिया था जिसे अनसुना कर दिया गया | उसी का परिणाम है कि समाज में सत्ताधीशों ने पूर्व राजा  – महाराजाओं जैसी हैसियत अर्जित कर ली | उससे भी बड़ी बात  ये हुई कि उनके परिजन भी खुद को राज परिवार का हिस्सा समझने लगे | प्रधानमंत्री ने गत दिवस जिस तरह की सादगी दिखाई उसे अगर उनकी पार्टी के अन्य नेतागण ही  अपनाने लगें तो राजनीति की छवि में कुछ सुधार हो सकता है | गांधी , लोहिया और दीनदयाल ने जो  राजनीतिक संस्कार दिए थे उनका गुणगान तो खूब होता है लेकिन आचरण में उनका लेशमात्र पालन करने की मानसिकता खत्म हो चुकी है | किसी शोकग्रस्त व्यक्ति को बधाई देना तो बेहूदगी होगी लेकिन प्रधानमंत्री ने जिस दायित्वबोध का परिचय दिया उसकी प्रशंसा राजनीति से ऊपर उठकर होनी चाहिए |


रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 30 December 2022

फ़ुटबाल के निर्विवाद सर्वकालीन महानायक पेले



जिस तरह सर डॉन ब्रेडमेन क्रिकेट और  मेजर ध्यानचंद हॉकी के सर्वकालीन महान खिलाड़ी माने जाते हैं ठीक उसी तरह ब्राजील के पेले को निर्विवाद रूप से फुटबाल का  महानतम खिलाड़ी कहना गलत नहीं होगा | 82 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया | 10 नम्बर की जर्सी पहनकर मैदान में जब वे उतरते तो दर्शकों का उत्साह देखने लायक होता था | अपने कलात्मक खेल के बदौलत उन्होंने ब्राजील को तीन विश्व कप जितवाए थे | एक दौर ऐसा था जब फ़ुटबाल और ब्राजील समानार्थी हो गए थे जिसका श्रेय काफी हद तक उनको दिया जा सकता है | यही नहीं तो फ़ुटबाल पर यूरोपीय देशों की बादशाहत खत्म करते हुए उसे लैटिन अमेरिकी देशों में राष्ट्रीय खेल के रूप में स्थापित करने में पेले का योगदान इस खेल के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया है | जिस तरह ब्रेडमेन और ध्यानचंद को उनके नैसर्गिक खेल के लिए याद किया जाता है ठीक वैसे ही पेले के पांवों की  चपलता को दैवीय उपहार माना गया था | अपने लंबे खेल जीवन में वे  साफ़ सुथरे खेल के लिए ही जाने गए इसीलिये  उनका खेल आनन्दित करने वाला होता था | 128 अंतर्राष्ट्रीय गोल का  रिकॉर्ड उनके  नाम पर अंकित है | 1958 में महज 17 साल की उम्र में स्वीडन के  विरुद्ध विश्व कप के फायनल मैच में  2 गोल मारने वाले पेले वह कारनामा करने वाले सबसे कम के उम्र के खिलाड़ी बने | उनकी महानता के मद्देनजर उन्हें ब्राजील का खेल मंत्री  भी बनाया गया था | वे  पेशेवर खिलाड़ी भी रहे और उन्होंने फुटबाल से पैसा भी खूब कमाया किन्तु आम आदमी के इस मैदानी खेल को उनका योगदान साफ़ – सुथरा और कलात्मक प्रदर्शन रहा | आजकल इस खेल के जो अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं उनकी ख्याति उन्हें मिलने वाली पारिश्रमिक की राशि से होती है जबकि पेले की लोकप्रियता उनके व्यक्तित्व और खिलाड़ी भावना के कारण बढ़ी | क्लब फ़ुटबाल सहित अपने कैरियर में 1000 गोल करने वाले पेले ने ब्राजील के साथ ही अन्य लैटिन अमेरिकी देश अर्जेंटीना , चिली , कोलंबिया , क्यूबा आदि में फुटबाल के प्रति जो दीवानगी उत्पन्न की वह अभूतपूर्व है | सबसे बड़ी बात ये है कि वे कभी विवादास्पद नहीं हुए | लैटिन अमेरिका में पैसा और प्रसिद्धि प्राप्त  करने के बाद अनेक खिलाड़ी नशीली दवाओं के फेर में पड़कर अपना स्वास्थ्य और सम्मान गँवा बैठे | अर्जेंटीना के सुपर स्टार रहे डिएगो मैराडोना इसके उदाहरण हैं | वैसे भी दुनिया का ये हिस्सा नशे के कारोबार के लिए कुख्यात है | लेकिन पेले इससे दूर रहे | और यही वजह थी कि संरासंघ ने उनको पारस्थितिकी और पर्यावरण के लिए अपना राजदूत बनाया | पेले के प्रति ब्राजील की जनता के मन में कितना प्यार था ये उस समय देखने मिला जब उनके सन्यास लेने पर लोग फूट - फूटकर रोये | किसी खिलाड़ी के लिए इस तरह के सम्मान का दूसरा उदाहरण खेलों के इतिहास में दुर्लभ है | उनके मैदान से दूर हो जाने के बाद के दौर में फुटबाल और लोकप्रिय हुई है | कतर में हाल ही में संम्पन्न विश्व कप में अनेक छोटे – छोटे देशों ने दिग्गज टीमों को जिस  तरह मात दी उससे लग गया कि इस खेल की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ी है |  हालाँकि पेले के बाद इस खेल में एक से एक बड़े सितारा खिलाड़ी आये जिन्होंने अपने खेल से फ़ुटबाल प्रेमियों का दिल जीत लिया लेकिन उन सब में कहीं न  कहीं पेले जैसा बनने की इच्छा   है | किंग ऑफ फ़ुटबाल और ब्लैक पर्ल जैसे नामों से जाने गए पेले को 20 वीं सदी का महानतम फुटबालर कहा गया | लेकिन जिस शैली का खेल वे खेलते थे उसमें जीत का जूनून होने के साथ ही खेल की आत्मा समाहित थी | और इसीलिये उन्हें भूतो न भविष्यति जैसे विशेषण से सम्बोधित करना गलत न होगा | खेल , शौक और मनोरंजन से आगे निकलकर अब व्यवसाय का रूप ले चुके हैं | किसी सितारा खिलाड़ी के रेकॉर्ड के साथ ही उसके द्वारा कमाई गई दौलत भी उसकी सफलता का मापदंड मानी जाती है | खिलाड़ी मैदान में बैठे हजारों दर्शकों के अलावा टीवी पर मैच देख रहे असंख्य खेल प्रेमियों  को आनंदित करता है | लेकिन सच्चा खिलाड़ी वही होता है जो अपने खेल से स्वयं आनंदित होकर उसमें डूब जाए  | पेले उसी श्रेणी के खिलाड़ी थे इसलिए उनका नाम लेते ही फ़ुटबाल में रूचि रखने वाले व्यक्ति को सुखद एहसास होने लगता है | अपने साफ़ सुथरे खेल और शालीन आचरण से फ़ुटबाल प्रेमियों के दिल में बसे इस महान खिलाड़ी को विनम्र श्रद्धांजलि |  

रवीन्द्र वाजपेयी 



Thursday, 29 December 2022

कोरोना से डरने की जरूरत नहीं लेकिन लापरवाही महंगी पड़ सकती है



एक बात पूरी तरह साफ है कि भारत में कोरोना नए रूप में आ चुका है | चीन में हालात भयावह हो जाने के बाद हमारे देश में भी दहशत का माहौल बनने  लगा था | केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को भेजी गयी निर्देशिका और उसके बाद  चिकित्सा प्रबंधों को लेकर की गई माकड्रिल के कारण आम जनता के साथ ही व्यापार जगत में भी भय व्याप्त  होने लगा | 2020 और 21 की डरावनी यादों  ने लॉक डाउन की वापसी की आशंका पैदा कर दी | इक्का – दुक्का लोग मास्क लगाये भी नजर आने लगे | भीड़ भाड़ वाली जगहों में जाने से बचने की सलाह दी जाने लगी | माकड्रिल  के दौरान ये बात भी उजागर हुई कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान लगाये गए अधिकतर आक्सीजन संयंत्र बंद पड़े थे | बहरहाल एक बात अच्छी है कि कोरोना के दो हमलों के दौरान चिकित्सा प्रबंधों में जो कमियाँ देखने मिली उन्हें समय रहते दुस्स्त करने की अक्लमंदी सरकार दिखा रही है | उससे भी अच्छी बात ये है कि जनसाधारण को भी कोरोना से बचाव के तौर - तरीके पता हैं | लेकिन इस जानकारी की वजह से भय का भूत खड़ा करने के बजाय सतर्कता ज्यादा जरूरी है | सबसे बड़ी बात है उद्योग – व्यापार जगत में घबराहट फैलने से रोकना क्योंकि बीते दो सालों में अर्थव्यवस्था को जो झटके लगे उससे वह काफी कुछ उबर चुकी है | अनेक क्षेत्रों में तो कोरोना पूर्व से भी अच्छी स्थिति नजर आने लगी है | चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा दी जा रही जानकारी के अनुसार कोरोना नए रूप में एक बार फिर सक्रिय हो उठा है | लेकिन वह पहले जैसा घातक नहीं होने से संक्रमित व्यक्ति अस्पताल में दाखिल हुए बिना भी साधारण इलाज से ठीक हो सकता है | अभी तक देश में जितने भी नए मामले कोरोना के आये  वे सब कुछ ही दिनों में ही  संक्रमण मुक्त हो गए | इक्का दुक्का को ही अस्पताल में भर्ती होने लायक समझा गया | हालाँकि इसी वायरस के कारण चीन में स्थितियां भयावह रूप ले चुकी हैं | अस्पतालों में बिस्तर कम पड़ने से अफरातफरी का माहौल है | दवाओं की आपूर्ति नहीं होने से उनकी कालाबाजारी होने की खबरें भी आ रही हैं जो साम्यवादी शासन प्रणाली वाले देश में चौंकाने वाली बात है | लेकिन भारत में चूंकि टीकाकरण समय पर और पर्याप्त संख्या में होने के बाद बूस्टर डोज भी ज्यादातार लोगों को लग चुका है इसलिए कोरोना का प्रकोप पूर्वापेक्षा गंभीर शायद नहीं होगा | लेकिन वैक्सीन लगने के बाद व्यक्ति कोरोना से स्थायी तौर पर सुरक्षित रहेगा ये खुशफहमी भी जानलेवा हो सकती है | इसलिए भयाक्रांत हुए बिना साधारण सतर्कता बरतने मात्र से इस संकट से बचा जा सकता है | बीते कुछ दिनों में ही पूरे देश में हजारों लोगों के संक्रमित होने के बाद चिकित्सा विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि जनवरी माह से संक्रमण में तेजी आयेगी  | विदेशों से आने वाले यात्रियों की जाँच से भी नए मामले सामने आ रहे हैं | ये सब देखते हुए हर किसी को चाहिए वह अपना  और अपने परिवार का ध्यान रखे | व्यक्तिगत दायित्वबोध ही अंततः सामूहिक संस्कार बन जाता है | कोरोना के पिछले दोनों हमलों में भारत की जनता ने अद्वितीय अनुशासन और धैर्य का जो परिचय दिया उसका ही परिणाम था कि भारत ने अमेरिका , ब्रिटेन और इटली जैसे बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं वाले देशों की तुलना में अच्छा प्रदर्शन किया | इसलिए हमें घबराने की जरूरत तो नहीं है किन्तु ये मानकर भी नहीं बैठना चाहिए कि वायरस जितना आज कमजोर नजर आ रहा है उतना ही आगे भी बना रहेगा | इसलिए जनवरी महीने में उसका फैलाव  होने के पहले ही यदि सामूहिक तौर पर सावधानी रखी जाए तो इस कथित तीसरी लहर से भी आसानी से निपटा जा सकेगा | पिछले अनुभवों ने हमें काफी कुछ सिखाया है जिसकी वजह से कोरोना का सामना करने के प्रति हमारा आत्मविश्वास प्रबल है लेकिन जरा सी लापरवाही नुकसानदेह हो सकती है | कोरोना के इस दौर में हमें केवल लोगों की जान की नहीं अपितु अर्थव्यवस्था की चिंता भी करनी होगी | सरकार ने इसीलिये कहा है कि वह अपनी तरफ से किसी भी प्रकार के प्रतिबंध नहीं लगाएगी | ऐसे में जनता की जिम्मेदारी और  भी ज्यादा बढ़ जाती है | कोरोना की ये लहर कब तक चलेगी ये तो पक्के  पर कोई भी नहीं बता सकता | ये भी हो सकता है कि वह थोड़े अन्तराल के बाद नए - नए रूप में लौटकर आता रहे | हालाँकि कोई भी महामारी एक सीमा के बाद अपनी तीव्रता खो बैठती है लेकिन कोरोना के उदय के प्रति ये आशंका शुरू से ही व्यक्त की जाती रही है कि वह मानव निर्मित है | यदि ऐसा है तब तो सारे अनुमान हवा – हवाई साबित होते रहेंगे | इसलिये नए साल का जश्न मनाते समय इस बात का ध्यान रखना होगा कि रंग में भंग वाली स्थिति  न बने | मकर संक्रांति से शादियों  का मौसम शुरू हो जाएगा | साल के अंत में देश भर के पर्यटन केन्द्रों में भारी भीड़ की खबरें हैं | इसीलिए जनवरी में संक्रमण के बढ़ने की बात कही जा रही है | सरकार ने अपनी तरफ से लोगों को सतर्क कर दिया है | चिकित्सा  विशेषज्ञ भी लगातार नवीनतम जानकारियाँ दे रहे हैं | अब ये जनता के ऊपर है कि वह अपने स्तर पर कितनी जिम्मेदारी का परिचय देती है | 


: रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 28 December 2022

बेलगाम : समय रहते विवाद न सुलझाने का दुष्परिणाम



किसी विवाद को अक्सर इसलिए टाला जाता है कि फैसला करने पर एक पक्ष नाराज हो जाएगा | लेकिन कालांतर में वह  और जटिल हो जाता है तब उसका हल तलाशना बेहद कठिन होता है | हमारा देश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है | ताजा सन्दर्भ महाराष्ट्र  और कर्नाटक के बीच बेलगावी जिसका प्रचलित नाम बेलगाम है , को लेकर चले आ रहे विवाद का है | 1956 में भाषावार प्रान्तों की रचना के समय बेलगाम नामक मराठी भाषी जिला कर्नाटक में मिला दिया गया था | इसे लेकर शुरू से दोनों के बीच झगड़ा चला आ रहा है | हिंसक आन्दोलन और संघर्ष भी देखने मिले | राजनीतिक स्तर पर विवाद सुलझाने के प्रयास अनेक मर्तबा उस समय भी हुए जब केंद्र के साथ ही दोनों राज्यों  में एक ही दल सता में था और केन्द्रीय नेतृत्व भी  काफी ताकतवर था | लेकिन इच्छाशक्ति और दृढ़ता की कमी के कारण मामला अनसुलझा रह गया | फिलहाल प्रकरण सर्वोच्च न्यायालय के अधीन है | उसका जो भी फैसला  आएगा वह दोनों राज्यों पर बंधनकारी होगा | लेकिन बीते कुछ दिनॉ से ये विबाद एक बार फिर जमीन पर उतर आया है | इसकी वजह निकट भविष्य में होने जा रहे कर्नाटक विधानसभा के चुनाव हैं | उसकी  विधानसभा में एक प्रस्ताव गत सप्ताह पारित किया गया जिसके  अनुसार महाराष्ट्र को बेलगाम की थोड़ी सी भी जमीन नहीं दी जावेगी | जवाब में गत दिवस महाराष्ट्र विधानसभा  और विधानपरिषद ने बेलगाम के साथ ही उन 800 ग्रामों पर अपना हक जताने विषयक प्रस्ताव स्वीकृत कर दिया जहां मराठी भाषी लोगों का बाहुल्य है | गौरतलब है केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दोनों को इस बात के लिए राजी कर लिया था कि वे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय  की प्रतीक्षा करेंगे किन्तु चुनाव करीब होने के कारण कर्नाटक सरकार ने जनता की नाराजगी से बचने विधानसभा में प्रस्ताव पारित करवा लिया | दूसरी तरफ महाराष्ट्र में शिवसेना इस मुद्दे पर राज्य सरकार को घेरने में लग गयी | संयोगवश कर्नाटक और महाराष्ट्र दोनों राज्यों  में भाजपा सत्तासीन है और केन्द्र में भी उसकी सरकार है | 1956 में भाषावार प्रान्तों की रचना करते समय बेलगाम के साथ ही कुछ मराठी भाषी इलाके कर्नाटक में क्यों और कैसे  चले गए ये वाकई विश्लेषण का  विषय है | लेकिन ऐसा और भी राज्यों में हुआ जिनकी सीमा वाले जिलों में मिश्रित आबादी रहती है | उदाहरण के लिए म.प्र के अनेक इलाके ऐसे हैं जहाँ महाराष्ट्र की झलक मिलती है | हालाँकि वे मराठीभाषी नहीं हैं | इसी तरह मालवा और मध्यभारत के अनेक जिलों में क्रमशः गुजरात और राजस्थान का प्रभाव साफ़ झलकता है |  लगभग सात दशक में बेलगाम की  कम से कम दो पीढ़िया तो बदल ही गईं हैं | दरअसल मुद्दा ये बनाया जाता है कि दूसरी भाषा बोलने वालों के साथ अन्याय होता है जो  कुछ हद तक ये सही भी  है किन्तु  इस तरह के विवाद राजनीतिक कारणों से ही उत्पन्न किये जाते हैं जिनका उद्देश्य अपनी रोटी सेकना ही है | देश की राजधानी दिल्ली में सुदूर दक्षिण से नौकरी करने आये लाखों लोग वहीं के होकर रह गए जिन्हें लेकर कोई विवाद सामने नहीं आया | एक समय था जब शिवसेना उत्तर भारतीयों के विरुद्ध बेहद आक्रामक रहती थी | छठ पूजा तक का विरोध किया जाता था | लेकिन अब उसे भी समझ में आ चुका है कि उ.प्र और बिहार से आये लोगों के साथ आत्मीयता कायम करना ही बुद्धिमत्ता है | महाराष्ट्र और कर्नाटक दोनों राज्यों के नेताओं को ये बात समझनी चाहिए कि जब मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है तब बेकार की रस्साकशी से कुछ  हासिल होने वाला नहीं है | अभी तक इस विवाद में अनेक  लोग हिंसा का शिकार हो चुके हैं वहीं  करोड़ों की संपत्ति नष्ट की जा चुकी है | समय - समय  पर हुए आंदोलनों में काम धंधे बंद रहने से हुआ  नुकसान अलग है | ये सब अनिर्णय की प्रवृत्ति से बंधे रहने का ही  दुष्परिणाम है | अव्वल तो भाषावार प्रान्तों की रचना ही ऐतिहासिक भूल थी जिसने देश को बेकार के विवाद में फंसा दिया | तमिलनाडु में भाषा के नाम पर ही  अलगाववाद को बढ़ावा मिला | हाल ही में पूर्व केन्द्रीय मंत्री और द्रमुक नेता डी . राजा ने यहाँ तक धमकी दे डाली कि हिंदी लादने की कोशिश होने पर तमिलनाडु देश से अलग हो सकता है | आजादी के  75 साल बाद देश जब विश्वशक्ति बनने की राह पर तेजी से कदम बढ़ा रहा हो तब दो राज्यों के बीच भाषा के नाम पर कुछ इलाकों को लेकर शत्रुता का भाव बना रहे इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी ?  बेलगाम को लेकर लड़ रहे दोनों राज्यों में एक ही दल के आधिपत्य वाली सरकार होने के बाद भी इस तरह की बचकानी राजनीति से क्षणिक राजनीतिक स्वार्थ भले ही सिद्ध हो जाएँ लेकिन देश कमजोर होता है | इसी तरह का विवाद चंडीगढ़ को लेकर है | पंजाब को विभाजित कर हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बने तब चंडीगढ़ को दोनों की राजधानी बनाकर केंद्र शासित  बना दिया गया | दशकों बाद भी वे  इसके लिए लड़ने मरने तैयार रहते हैं | जबकि इतने लम्बे समय में वे  चाहते तो चंडीगढ़ से बेहतर राजधानी बना सकते थे |  उल्लेखनीय है आंध्र प्रदेश से तेलंगाना को अलग करते समय ही तय कर लिया गया कि हैदराबाद निश्चित समय तक दोनों की राजधानी रहेगी | आंध्र प्रदेश अमरावती नामक अपनी राजधानी विकसित कर रहा है | बेलगाम को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आने तक महाराष्ट्र और कर्नाटक दोनों को संयम रखना चाहिए | दुर्भाग्यवश कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है का नारा केवल दीवारों तक ही सिमटकर रह गया है नेताओं  के दिल पर अंकित नहीं हो सका |

रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 27 December 2022

हर साल होने वाले चुनाव निर्णय प्रक्रिया में बाधक



वर्ष 2023 में देश की अर्थव्यवस्था क्या रूप लेगी, विकास दर का आंकड़ा किस ऊंचाई को छुएगा, बेरोजगारी की मौजूदा स्थिति में सुधार होगा अथवा नहीं, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कितनी घटेगी, चीन में कोरोना की वापसी से हमारे विदेशी व्यापार को कितना लाभ होगा और सीमा पर चीन तथा पाकिस्तान द्वारा पैदा किए जाने संकट का मुकाबला हम किस तरह करेंगे, जैसे अनेक मुद्दों पर राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में व्यापक विचार विमर्श की जरूरत है। आखिरकार इन सबका असर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से आम जनता के जीवन पर पड़ता है। लेकिन इन सबसे हटकर जहां देखो इस बात की चर्चा है कि 2023 में जिन 10 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं वहां की राजनीति किस करवट बैठेगी ? इन राज्यों में देश के उत्तर, दक्षिणी, पूर्वोत्तर, मध्य और पश्चिम के राज्य हैं। इस प्रकार ये एक तरह के लघु आम चुनाव जैसा होगा। हालांकि विभिन्न राज्यों के चुनाव अलग अलग महीनों में होंगे किंतु लगभग पूरे साल न सिर्फ  चुनाव आयोग और राजनीतिक दल वरन समाचार माध्यम, विश्लेषक एवं संबंधित राज्यों के प्रशासन सहित केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां सब छोड़कर चुनाव के इर्द गिर्द केंद्रित हो जायेंगी। जाहिर है आम जनता के लिए भी चुनाव चौराहे से लेकर काफी हाउस तक की चर्चा का विषय बन जाते हैं। और बनें भी तो क्यों नहीं आखिर जनतंत्र है ही जनता से जुड़ा तंत्र जिसे चलाते रहने के लिए चुनाव नामक प्रणाली का सृजन किया गया किंतु भारत जैसे विकासशील देश में हर समय चुनाव का माहौल बना रहने से एक तो राजनीति का अतिरेक हो गया है दूसरा इसका दुष्प्रभाव हमारी विकास योजनाओं पर भी पड़ता है। चुनाव जीतने के लिए सभी राजनीतिक दल तात्कालिक लाभ देने वाले जो वायदे करते हैं उनका अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है। विभिन्न राज्यों के खाली खजाने इसका प्रमाण हैं। चुनाव जीतने के लिए क्षेत्रीय दल जो वायदे करते हैं वे अक्सर राष्ट्रीय हितों से मेल नहीं खाते। और फिर अलग-अलग राज्यों के चुनाव की समय सारिणी अलग-अलग होने से क्षेत्रीय भावनाएं भड़काकर वोट बटोरने का दांव चला जाता है। कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच बेलगाम का विवाद दशकों से चला आ रहा है। हाल ही में इसे लेकर दोनों राज्यों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ। एक दूसरे के वाहनों की आवाजाही रोक दी गई। तोडफ़ोड़ और आगजनी भी देखने मिली। दोनों तरफ के नेताओं के बयानों से लगा जैसे दो शत्रु राष्ट्र आमने सामने हों। इस विवाद के भड़कने के पीछे कुछ महीने बाद होने वाले कर्नाटक विधानसभा के चुनाव ही हैं। जम्मू कश्मीर के अलावा त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम और नागालैंड जैसे राज्यों में भी चुनाव की रणभेरी सुनाई दे रही है। ये राज्य सीमावर्ती होने से विशेष प्रकार की समस्याओं से जूझ रहे हैं। तेलंगाना, छत्तीसगढ़, राजस्थान और म. प्र में भी 2023 में विधानसभा चुनाव होने हैं। वहां की मौजूदा सरकार और विपक्षी दल सब काम छोड़ चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं । भले ही चुनाव राज्यों की सत्ता के लिए हो रहे हों लेकिन केंद्र सरकार भी उसमें पूरी ताकत से कूदेगी। इसकी वजह 2024 में होने वाला लोकसभा चुनाव है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर होगी। चूंकि भाजपा राज्यों के चुनाव में भी श्री मोदी को ही चेहरा बनाती है इसलिए वह विधानसभा चुनाव में भी उनको अग्रिम मोर्चे पर रखती है। 2022 में हुए 7 विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 5 जीतकर अपना विजय अभियान जारी रखा है । हारे हुए राज्य में पंजाब तो खैर, कांग्रेस के पास था जिसमें आम आदमी पार्टी ने फतह हासिल की किंतु हिमाचल प्रदेश में जरूर उसे झटका लगा क्योंकि ये उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का गृह राज्य है किंतु गुजरात में धमाकेदार जीत ने प्रधानमंत्री का रुतबा बरकरार रखा। लेकिन दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भाजपा की हार उसके लिए विचारणीय है। इसीलिए 2023 में होने वाले 10 विधानसभा चुनावों में भाजपा पूरी ताकत लगायेगी। जाहिर है केंद्र सरकार की भी इन राज्यों में अप्रत्यक्ष रूप से मौजूदगी नजऱ आयेगी। आशय ये है कि इन चुनावों के कारण एक तो केंद्रीय स्तर पर नीतिगत ठहराव बना रहेगा वहीं दूसरी तरफ  राज्यों में काबिज सरकारें खजाना खाली करने में जुटेंगी। राजनीतिक दल भी बिना सोचे समझे अव्यवहारिक वायदों के साथ मतदाताओं को लुभाने की कोशिश करेंगे। ये लघु आम चुनाव आगामी लोकसभा चुनाव का पूर्वाभ्यास होने से केंद्र सरकार नीतिगत निर्णय लेने से बचेगी जिनसे राज्यों के चुनाव में भाजपा को नुकसान न पहुंचे। लेकिन इस सबसे ऊपर विचारणीय मुद्दा ये है कि लोकसभा चुनाव के पूर्व ही देश में इतनी बड़ी चुनावी हलचल से केन्द्र सहित राज्यों का प्रशासनिक कार्य प्रभावित होगा। बजट जैसे महत्वपूर्ण कार्यों पर भी राजनीति हावी रहेगी। हर वर्ष कहीं न कहीं चुनाव होते रहने से अनेक समस्याओं को हल करने का साहस केन्द्र और राज्य सरकारें नहीं कर पा रहीं। सत्ता और विपक्ष कुछ विषयों पर सहमत होने के बाद भी एक साथ नहीं खड़े हो पाता क्योंकि चुनाव आड़े आ जाते हैं। बेहतर हो सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग इस बारे में अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए आम चुनाव की पुरानी परंपरा वापस लाने हेतु राजनीतिक दलों को इस हेतु प्रेरित करें। चुनाव लोकतंत्र के लिये प्राणवायु हैं किन्तु देश के हितों का ध्यान में रखकर व्यवस्था में समयानुकूल परिवर्तन भी जरूरी है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 26 December 2022

नेपाल में माओवादी गठबंधन की सरकार भारत के लिए सिरदर्द बनेगी



नेपाल एक स्वतंत्र देश है | इसलिये वहां कौन  प्रधानमंत्री बने ये उसका आंतरिक मामला है | लेकिन  निकटस्थ पड़ोसी होने के साथ ही ये पहाड़ी देश भावनात्मक तौर पर भारत के बेहद करीब  है | हिन्दू बहुल होने से दोनों में  सांस्कृतिक रिश्ते सदियों से कायम  हैं | कुछ दशक पहले तक नेपाल विश्व का एकमात्र हिन्दू देश था किन्तु चीन की कुटिल रणनीति के प्रभावस्वरूप वहां राजतन्त्र समाप्त होकर  लोकतंत्र तो आया लेकिन उस पर चीन की छाया होने से भारत विरोधी भावना बलवती होने लगी | यद्यपि  बीच  – बीच में ऐसी सरकारें भी आईं जिन्होंने अच्छे रिश्ते बनाये परन्तु  घूम फिरकर चीन समर्थक माओवादी ही सत्ता में आते रहे जिससे  भारत के साथ तल्खी बढ़ते – बढ़ते सीमा विवाद तक आ पहुँची | 2021 में जब चीन के साथ भारत गलवान में उलझा हुआ था तभी नेपाल की  के.पी शर्मा ओली की सरकार ने हमारे कुछ हिस्सों पर दावा ठोककर युद्ध के हालात बना दिए | उस समय वहां  पूरी तरह से चीन के निर्देशों पर काम हो  रहा था | यहाँ तक कि प्रधानमंत्री कार्यालय तक में चीन  की राजदूत  दखल देने लेगी थीं | हालाँकि चीनी हस्तक्षेप के विरुद्ध जनता सडकों पर भी उतरी | बाद में वह सरकार चलती बनी और भारत से  रिश्तों में कुछ सुधार हुआ लेकिन 2022 के आखिर में  सम्पन्न चुनाव हमारे लिए चिंता का नया नया कारण हैं  | चुनाव में माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड और भारत समर्थक शेर बहादुर देउबा के बीच गठबंधन था | लेकिन परिणाम के बाद उनके बीच विवाद होने से प्रचंड ने चीन के पिट्ठू  पूर्व प्रधानमंत्री के.पी शर्मा ओली से हाथ मिलाकर  पहले ढाई साल तक प्रधानमंत्री बनने का समझौता कर लिया | वे पहले भी प्रधानमंत्री रह चुके हैं और चीन समर्थक भी  किन्तु बाद के वर्षों में उनका वामपंथियों से मतभेद हो गया | ये भी कहा जाने लगा कि वे माओवादी विचारधारा से दूर जा चुके हैं | चुनाव में भारत समर्थक देउबा के साथ गठबंधन से इस अवधारणा की पुष्टि भी हुई किन्तु नतीजे आने के  बाद प्रचंड ने चीन समर्थक ओली के साथ ढाई  – ढ़ाई साल तक प्रधानमंत्री बनने का जो समझौता किया वह भारत के लिए शुभ संकेत नहीं है | भले ही प्रचंड का माओवाद पहले जैसा न रहा हो और ओली के साथ जुगलबंदी महज अवसरवाद  हो लेकिन भारत के लिए ये  गठजोड़ करेला और नीम चढ़ा वाली कहावत  जैसा है | दरअसल  प्रचंड प्रधानमंत्री बनने के बावजूद रहेंगे ओली के नियन्त्रण में ही जिससे सरकार पर  चीन का शिकंजा सुनिश्चित है | बीते दो साल में चीन ने भारतीय सीमा पर  सैन्य तनाव उत्पन्न करते रहने की जो नीति अपनाई है वह  किसी दूरगामी योजना का हिस्सा है | नेपाल ने भी उसी के बहकावे में आकर भारत के साथ विवाद को सेना की तैनाती तक बढ़ा दिया था | इसी तरह सीमावर्ती तराई क्षेत्र में बसे भारतीय मूल के मधेसियों के प्रति भेदभाव और दमनकारी रवैये के अलावा  नेपाल में कार्यरत भारतीय व्यापारियों पर हमले की  वारदातों में वृद्धि के पीछे  चीन का हाथ सर्वविदित है | इस सबके बीच उम्मीद की एक किरण ये है कि नेपाल में  जनता के बीच से चीन का विरोध उभर रहा है | एक बड़ा वर्ग जिसमें युवा भी  हैं उसके बढ़ते दखल से चिंतित है | उन्हें  आशंका  है कि देर सवेर उनके देश का हश्र भी तिब्बत जैसा हो सकता है  | सबसे बड़ी बात ये है कि प्रचंड  सहित अनेक माओवादी नेता  राजतन्त्र के विरुद्ध संघर्ष के दौरान निर्वासन के दौरान भारत में रहे थे | हमारे देश के वामपंथी उनकी मिजाजपुर्सी करते रहे  | कुछ साल पहले जब प्रचंड का अन्य माओवादियों के साथ विवाद बढ़ा था तब भारत से सीपीएम नेता सीताराम येचुरी बीच बचाव करने भी गये थे | लेकिन भारत  के मार्क्सवादी नेताओं ने  नेपाल के माओवादी नेताओं को भारत का विरोध करने से रोका हो ऐसा देखने और सुनने में नहीं आया | बहरहाल नेपाल में हुए   ताजा सत्ता परिवर्तन पर भारत को पैनी निगाह रखनी होगी | अरुणाचल में चीन के  साथ हुई हालिया झड़प  के बाद ही काठमांडू में माओवादियों का सत्ता पर कब्ज़ा कर लेना भारत के लिए परेशानी का बड़ा कारण हो सकता  है | चीन जिस तरह की  आंतरिक उथलपुथल से जूझ रहा है उसके चलते वह भारत से  सीधे न टकराते हुए नेपाल के कंधे पर रखकर बन्दूक चला सकता है | इसलिए  अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत है | कूटनीतिक सूत्रों के जरिये नेपाल की जनता के मन में भरी गई भारत विरोधी भावनाओं को दूर करना भी जरूरी  है | ऐसा करना बहुत कठिन भी नहीं है क्योंकि वहां ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो भारत के साथ सांस्कृतिक ,  सामाजिक , आर्थिक और पारिवारिक तौर पर जुड़े हैं | भारत में लाखों नेपाली कार्यरत हैं | भारतीय सेना में नेपाली जवानों की भर्ती होती है | मधेसी लोग तो शादी तक बिहार और पूर्वी उ.प्र में करते हैं | नेपाल के प्रमुख परिवारों के भारत में रोटी - बेटी के रिश्ते हैं | ऐसे में वहां चीन के प्रभाव को  कम किया जा सकता है | लेकिन इसके लिए एक ठोस और दूरगामी नीति बनाकर  नेपाली जनता को ये समझाये जाने की जरूरत है कि चीन की  उस पर  गिद्ध दृष्टि है और उसकी ओर से आने वाले किसी भी संकट के समय भारत ही उसका मददगार साबित होगा | भूटान इसका जीवंत प्रमाण है जो भारतीय सेना की मुस्तैदी के कारण ही अब तक सुरक्षित है वरना उसका अस्तित्व काफी पहले खत्म हो चुका होता | 

: रवीन्द्र वाजपेयी