Wednesday, 1 February 2023

जनसंख्या को दुधारू गाय बनाना जरूरी: मुफ्तखोरी उत्पादकता पर भारी



पहले श्रीलंका और अब पाकिस्तान में जरूरी चीजों की किल्लत के साथ ही अर्थव्यवस्था औंधे मुंह गिरने से हालात बेकाबू नजर आ रहे हैं।।श्रीलंका में तो राष्ट्रपति को देश छोड़कर भागना तक पड़ा और जनता राष्ट्रपति भवन में घुस गई। विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो जाने से पेट्रोल डीजल का आयात अवरुद्ध हो गया। संकट के उस दौर में भारत ने बड़े भाई की भूमिका का निर्वहन किया जबकि श्रीलंका की सरकार चीन के प्रभाव में आकर भारत के व्यापारिक और सामरिक हितों की उपेक्षा करती  रही। ये पड़ोसी देश इस आर्थिक बदहाली से उबर पाता उसके पहले ही पाकिस्तान नामक दूसरे पड़ोसी देश में भी तकरीबन वैसे ही हालात उत्पन्न हो गए। खाने पीने की चीजों के अभाव के अलावा पेट्रोल डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं। कर्ज देने वाले  विदेशी संस्थानों के दबाव में मुद्रा का अवमूल्यन करने से विदेशी मुद्रा का संग्रह खलास होने को है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष , अमेरिका और सऊदी अरब खैरात की बजाय कड़ी शर्तों पर कर्ज देने पर अड़े हैं। इसका कारण पाकिस्तान द्वारा पिछला कर्ज समय पर न लौटाना है। उक्त दोनों देशों में राजनीतिक अस्थिरता के साथ घटिया आर्थिक प्रबंधन के कारण अर्थव्यवस्था जमीन पर आ गिरी। उनकी दशा देखकर हमारे देश में भी चिंता व्यक्त की जाने लगी है। जानकार लोगों का मानना है कि मुफ्त उपहार बांटने का सिलसिला न रुका तो कुछ वर्षों बाद सरकार के लिए आर्थिक प्रबंधन कठिन हो जायेगा। उदाहरण के लिए गत वर्ष गर्मी जल्दी शुरू होने से गेहूं का उत्पादन  कुछ कम हुआ। ऊपर से यूक्रेन और रूस में युद्ध लंबा खिंच गया जो गेहूं के सबसे बड़े निर्यातक हैं । लेकिन जंग ने उसमें बाधा उत्पन्न कर दी जिससे विश्व भर में हमारे गेंहू की मांग बढ़ गई। किसान को अच्छी कीमत और सरकार को विदेशी मुद्रा का लालच जागा । लेकिन कुछ समय  बाद ही निर्यात रोकना पड़ा क्योंकि घरेलू बाजार में आटा महंगा हो गया। साथ ही अन्य कृषि उत्पाद भी महंगे हुए। अमेरिकी नीतियों के कारण रुपए का विनिमय मूल्य भी डालर के मुकाबले कमजोर होने से व्यापार घाटा अनुमान से बढ़ गया। गत वर्ष खुले बाजार में दाम ऊंचे होने से किसानों ने अपना अनाज सरकारी खरीद के बजाय वहां बेचा जिससे  सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए किया जाने वाला भंडारण लक्ष्य से कम रहा । इस वर्ष भी रबी फसल आने से पूर्व ही ग्रामीण अंचलों से खबर आ रही है कि किसान बजाय सरकार के  खुले बाजार में अपना उत्पाद बेचेगा। इधर आटे के दामों को नीचे लाने के लिए सरकार ने अपने संग्रह में से 30 लाख टन गेहूं बाजार में बेचने की घोषणा कर डाली।  बाजार की हलचल से लगता है इस साल सरकारी खरीदी और कम रहेगी जिससे मुफ्त खाद्यान्न योजना को चलाते रहना बेहद मुश्किल होगा।  भले ही सरकार अगले तीन साल तक के अन्न भंडारण का दावा कर रही है लेकिन जो वैश्विक आसार हैं  उनके मद्देनजर उसके दावों और योजनाओं को अमली जामा पहिनाना बहुत कठिन होगा । कुछ जानकार लोग आगामी वर्षों में खाद्यान्न संकट की आशंका भी जता रहे हैं । उनका मानना है कि आगामी लोकसभा चुनाव तक तो मुफ्त खाद्यान्न योजना जारी रखना सरकार में बैठे लोगों की मजबूरी है। उसके अलावा सरकार के गैर उत्पादक खर्चे भी अर्थव्यवस्था के कंधे झुकाने में मददगार साबित हो रहे हैं।  कुछ विपक्षी राज्यों द्वारा पुरानी पेंशन  योजना लागू करने के फैसले की आलोचना विपक्ष समर्थक अर्थशास्त्री भी कर रहे हैं क्योंकि इससे सरकार का खजाना खाली हो जायेगा। जिन राज्यों में चुनाव होना है वे और केंद्र सरकार विभिन्न ऐसी योजनाएं चला रहे हैं जिनका सीधा असर उनके खजाने पर पड़ रहा है किंतु  बंद करने की बजाय  उनकी संख्या और बढ़ाकर  माल़ ए मुफ्त दिल ए बेरहम वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। बात चूंकि श्रीलंका और पाकिस्तान से शुरू हुई इसलिए हमें भी उन गलतियों से बचना चाहिए जो अर्थव्यवस्था को गर्त में डालती हैं और इसके लिए जरूरी है देश के निर्माण में सबके योगदान की। दुर्भाग्य से हम अभी इस लक्ष्य से दूर हैं। सवाल ये है कि बिना रोजगार के सभी से काम लेना कैसे मुमकिन होगा ? इस बारे में विचारणीय मुद्दा ये है कि केवल सरकारी नौकरी को रोजगार का समानार्थी मान लेना आज की दुनिया में बेमानी है और जब भारत जैसे देश में कुशल के साथ ही अकुशल श्रमिकों का भी जबर्दस्त अभाव है तब बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़ों की सत्यता पर संदेह होता है। हमारी अर्थव्यवस्था आज भी कृषि प्रधान है । लेकिन एक तरफ तो कृषि कार्य हेतु श्रमिक नहीं मिलते दूसरी तरफ काम की तलाश में ग्रामीण मजदूर शहर का रुख करते देखे जा सकते हैं। इन हालातों में सरकारों को ये देखना चाहिए कि उनकी कल्याणकारी योजनाएं आगे पाट पीछे सपाट तो साबित नहीं हो रहीं। कहा जा रहा है कारोबार के लिए सर्वत्र अनुकूल वातावरण है । सबसे बडी बात मानव संसाधनों की प्रचुरता है  , तब जनसंख्या में चीन को पीछे छोड़ने के  करीब आ चुका हमारा देश आर्थिक ढांचे में उससे आगे क्यों नहीं निकल पा रहा ये चिंता के साथ चिंतन का भी विषय है। दरअसल अधिकारों को लेकर तो बीते 75 वर्षों में लोगों में जागरूकता आई है किंतु कर्तव्य अर्थात कार्य संस्कृति के बारे में अभी भी बेहद लापरवाही भरा रवैया है। ये शोचनीय प्रश्न है कि सत्ता में आने वाली हर पार्टी रोजगार देने के वायदे पर युवाओं का समर्थन हासिल करती है किंतु उन्हें ये समझाने में विफल रहती है कि रोजगार का अर्थ शासकीय नौकरी ही नहीं अपितु अन्य कार्यों से आजीविका चलाने से है। कोरोना काल में जब लॉक डाउन की वजह से सब कुछ बंद था तब छोटे कारोबारियों विशेष रूप से रोजाना कमाने वालों ने जिस तरह वैकल्पिक रोजगार के तौर तरीके ढूंढकर घर चलाया दरअसल वही भविष्य का चित्र है। स्टार्ट अप नामक नई संस्कृति के परिणाम बहुत  संतोषजनक नहीं होने पर भी उम्मीद जगाते हैं क्योंकि इनके माध्यम से ढर्रे से हटकर आजीविका अर्जित करने की मानसिकता उत्पन्न हुई है। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों से शिक्षित होकर निकले अनेक युवाओं ने एकदम अलग तरह के काम में हाथ आजमाया और वे जल्द ही उदाहरण बनकर  उभरे। दरअसल कुछ नया करने का साहस ही उद्यमिता की पहली सीढ़ी है जिस पर चढ़े बिना युवा पीढ़ी अपना भविष्य नहीं बना सकती।  वित्तीय विशेषज्ञ भी ये मान रहे हैं कि बेरोजगारी बड़ी समस्या तो है लेकिन लाइलाज भी नहीं। और आखिर कब तक 80 करोड़ लोगों को मुफ्त में खाद्यान्न दिया जाता रहेगा। यदि हमने अपनी विशाल जनसंख्या को उत्पादन से नहीं जोड़ा तो वह ऐसी गाय बनकर रह जायेगी जो खाती तो है किंतु दूध नहीं देती। प्रति व्यक्ति आय के साथ प्रति व्यक्ति उत्पादकता पर जोर देना समय की मांग है । वर्ना वोट बैंक की राजनीति श्रमिकों की कमी और बेरोजगारी जैसे बेमेल आंकड़े पेश करती रहेगी और मुफ्त अनाज प्राप्त करने के बाद उसे किराने वाले को बेचकर शराब पीने का सिलसिला जारी रहेगा। मुफ्तखोरी के दूरगामी घातक परिणामों का आकलन करना बेहद जरूरी है।

रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 31 January 2023

राम और रामचरित मानस भारत की सांसों में है : इनका विरोध असहनीय



बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर द्वारा रामचरित मानस को नफरत फ़ैलाने वाला ग्रंथ बताकर जो विवाद पैदा किया गया वह शांत हो पाता उसके पहले उ. प्र के पूर्व मंत्री और सपा के वरिष्ट नेता स्वामीप्रसाद  मौर्य ने भी रामचरित मानस में जातिगत संबोधनों पर उंगली उठाते हुए चंद्रशेखर से मिलती जुलती बातें कहकर खुद को राजनीतिक के साथ ही कानूनी विवाद में भी फंसा लिया। उनके विरुद्ध अपराधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं। आश्चर्य की बात है कि स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने शिक्षा मंत्री के बयान पर नाराजगी जताई वहीं राजद नेता तेजस्वी ने भी समझाइश दी किंतु उनको पद से नहीं हटाया गया l बिहार के एक और मंत्री ने सवर्ण जातियों के विरुद्ध जहर उगला है। इसे लेकर जनता दल (यू) और राजद के बीच मतभेद भी उभरकर सामने आए हैं। इसी तरह उ.प्र में स्वामी प्रसाद के रामचरित मानस को लेकर दिए गए आपत्तिजनक बयान पर एतराज तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी व्यक्त किया और उनको पार्टी दफ्तर बुलाकर पूछताछ भी की। कुछ और सपा नेताओं ने भी स्वामी प्रसाद की निंदा की लेकिन अखिलेश ने दोहरा चरित्र दिखाते हुए बजाय दंडित करने के उनको राष्ट्रीय महामंत्री बनाकर उनकी गलती का इनाम दे दिया । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वैसे तो आज जो भी हैं उसी भाजपा की कृपा से हैं जिसे वे इन दिनों पानी पी पीकर कोसते हैं किंतु वैचारिक मतभेद के बाद भी उन्होंने कभी हिन्दू ग्रंथों या देवी देवताओं पर स्तरहीन टिप्पणी नहीं की । भले ही वे धार्मिक कर्मकांड से दूर रहते हों लेकिन विवादास्पद मुद्दे उठाने से भी बचते रहे। लेकिन अपने शिक्षा मंत्री के बेहद गैर जिम्मेदाराना बयान पर वे जिस तरह से लाचार नजर आए उससे लगता है वे  बूढ़े शेर की मानिंद हो गए हैं। दूसरी तरफ तेजस्वी ने भी अपनी पार्टी के शिक्षा मंत्री से असहमत होने की बात कहते हुए पल्ला झाड़ लिया। ऐसा ही दिखावटी विरोध अखिलेश ने स्वामीप्रसाद का किया और लगे हाथ उनको संगठन में राष्ट्रीय पद से नवाज दिया। देश के कुछ और हिस्सों से भी भगवान राम और तुलसीकृत रामचरित मानस के बारे में अनर्गल और घृणा फैलाने वाली बातें कतिपय राजनेता और अन्य वर्गों के लोग कर रहे हैं। इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ वोटों की लालच है । इस तरह की टिप्पणियां करने वाले सोचते हैं  कि राम , तुलसीदास और रामचरित मानस को लेकर भड़काऊ बातें कहकर वे एक वर्ग विशेष के नायक बन जायेंगे। सवर्ण जातियों के विरुद्ध घृणा फैलाकर वे पिछड़ी और दलित जातियों का समर्थन हासिल करने के सपने भी देखते हैं। अतीत में ये नुस्खा कारगर भी साबित हुआ है किंतु कालांतर में इससे नुकसान ही हुआ। वरना स्व.मुलायम  सिंह यादव और मायावती बहुत पहले प्रधानमंत्री बन गए होते। एक दौर था जब दीवारों पर तिलक तराजू और तलवार , इनको मारो जूते चार के नारे नजर आते थे। लेकिन जब इस भावना की प्रणेता बसपा को लगा कि वह कभी सत्ता हासिल नहीं कर सकेगी तो उसने हाथी नहीं गणेश है , ब्रह्मा विष्णु महेश है का नारा लगाया जिसकी वजह से मायावती को पूर्ण बहुमत मिला। ध्यान रहे मायावती के राजनीतिक उत्थान में ब्राह्मण सतीश चंद्र मिश्र का बड़ा योगदान था । लेकिन सरकार में आते ही ज्योंही मायावती ने जातिगत भेदभाव का परिचय दिया त्योंही वे अलोकप्रिय होने लगीं और अगले चुनाव में जनता ने उनको नकार दिया। यही कहानी अखिलेश के साथ दोहराई गई। उनके पिता स्व.मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम मतों की लालच में हिंदू कारसेवकों पर गोली तक चलवाने में झिझक नहीं दिखाई। लेकिन उनके जीवनकाल में ही सपा न सिर्फ उ.प्र की सत्ता से बाहर हुई अपितु छिन्न भिन्न भी हो गई। बसपा को भी मायावती की संकीर्ण सोच ले डूबी। आज वे अपने अस्तित्व के लिए हाथ पांव मार रही हैं तो अखिलेश यादव भी स्वामी प्रसाद जैसे नेताओं के सहारे अपना खोया हुआ आभामंडल दोबारा चमकाने के स्वप्न देख रहे हैं। ये वही व्यक्ति है जो पहले बसपा,  फिर भाजपा को धोखा देने के बाद सपा में आया और अपने बड़बोलेपन की वजह से खुद भी हारा और सपा की लुटिया भी डूब गई। उ.प्र और बिहार में जाति और अल्पसंख्यक गठजोड़ का प्रयोग भी लालू प्रसाद और मुलायम सिंह की सत्ता को स्थायी न बना सका। दोनों के परिवारों में यादवी संघर्ष मचा है। पिछड़ों के नाम पर  कुनबे की राजनीति होने से उसका स्वरूप विकृत होता चला गया। ऊंची जातियों के विरोध के साथ राम और उनके मंदिर का मजाक उड़ाया गया। और अब रामचरितमानस के नाम पर सामाजिक विद्वेष फैलाया जा रहा है। सनातन परंपरा के इस महान ग्रंथ पर  प्रतिबंध लगाने की मांग के अलावा उसे जलाने जैसी गतिविधियां हो रही हैं । नीतीश , तेजस्वी और अखिलेश यदि सोच रहे हैं कि चंद्रशेखर और स्वामी प्रसाद जैसे विकृत मानसिकता के साथियों की पीठ पर हाथ रखकर वे सत्ता के शिखर पर काबिज रहेंगे तो ये कहना गलत न होगा कि वे मूर्खों के संसार में विचरण कर रहे हैं । देश में जाति और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति जमीन चाट चुकी है। उ.प्र और बिहार में उसका बचा खुचा आधार भी दम तोड़ देगा यदि नीतीश , तेजस्वी और अखिलेश ने अपना रवैया नहीं बदला। इन नेताओं को कांग्रेस और बसपा के पतन से सीखना चाहिए जो वोट बैंक की हवस में साख और धाक गंवा बैठी। इसके साथ ही भाजपा के उत्थान पर भी इनको ध्यान देना चाहिए जिसे ऊंची जातियों की पार्टी का तमगा दिया जाता रहा किंतु वह  पिछड़ी और दलित जातियों में भी अपनी पैठ बनाकर राष्ट्रीय राजनीति के शिखर पर जा बैठी। और निकट भविष्य में भी उसके हटने की संभावना नहीं है । घृणा और अवसरवाद ने ही देश में  वामपंथ की जड़ें कमजोर कर दीं । समाजवादी आंदोलन भी जाति और तुष्टीकरण के फेर में फंसकर आखिरी सांसे गिन रहा है। राम और रामचरितमानस भारत की सांसों में समाहित हैं। इनका अपमान करने वालों को जनता इनके अंजाम तक पहुंचाए बिना नहीं रहेगी। इतिहास की गलतियों से जो सीख नहीं लेते उनका भविष्य चौपट होना तय है।

रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 30 January 2023

यात्रा के बाद क्या विपक्षी छत्रप राहुल का नेतृत्व स्वीकार करेंगे



कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का गत दिवस श्रीनगर में  समापन हो गया। कन्याकुमारी से कश्मीर तक की यह यात्रा विभिन्न राज्यों से गुजरी। इसमें केवल राजस्थान में ही कांग्रेस की पूर्ण सत्ता है। तमिलनाडु, केरल , कर्नाटक , तेलंगाना , महाराष्ट्र , मध्यप्रदेश, राजस्थान ,  उ प्र , दिल्ली, हरियाणा , पंजाब से होती हुई वह अपने गंतव्य श्रीनगर पहुंची। यात्रा में  उनके साथ  विभिन्न राज्यों से चुने गए कांग्रेस कार्यकर्ता  अंत तक शामिल रहे जो उल्लेखनीय है। यात्रा की समाप्ति सकुशल हुई ये राहत का विषय है क्योंकि  पंजाब और जम्मू कश्मीर सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील थे । गैर कांग्रेसी राज्यों में भी यात्रा की सुरक्षा का अच्छा ध्यान रखा गया । हालांकि इक्का दुक्का दुखद घटनाएं हुईं । कांग्रेस के एक सांसद पैदल चलते हृदयाघात से चल बसे तो पंजाब और कश्मीर में सुरक्षा प्रबंध थोड़े गड़बड़ाए भी। कांग्रेस ने इस यात्रा को  आंदोलन का नाम दिया था जिसका मकसद घृणा और धार्मिक उन्माद मिटाकर लोगों को विभाजनकारी राजनीति के विरुद्ध एकजुट करना बताया गया। इसके साथ ही श्री गांधी जिस क्षेत्र से गुजरते वहां की स्थानीय समस्या पर भी लोगों से बात करते हुए अपना दृष्टिकोण रखते। धीरे धीरे उनकी टी शर्ट और बढ़ती दाढ़ी भी चर्चा में आने लगी। उत्तर भारत की सर्दी में भी वे टी शर्ट पहने रहे।  खबर है अब गुजरात से असम तक भारत जोड़ो यात्रा का दूसरा चरण निकाला जावेगा। अपने इस प्रयास में श्री गांधी की पहली सफलता तो ये कही जायेगी कि उन्होंने कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर व्याप्त अनिश्चितता पूरी तरह खत्म करते हुए यह स्थापित कर दिया कि वे ही पार्टी के चेहरे हैं और   गांधी परिवार की विरासत के एकमात्र हकदार भी। जो लोग कुछ समय से उनकी बहिन प्रियंका वाड्रा को उनसे ज्यादा सक्षम साबित कर रहे थे उनकी बोलती इस यात्रा ने बंद कर रखी है। दूसरी बात ये कि राहुल उस आरोप से बरी हो गए  कि वे चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए राजकुमार हैं इसलिए उनका जनता से न संपर्क है और न ही संवाद। पूरी यात्रा उन्होंने पैदल की और निर्धारित दूरी प्रतिदिन तय करते हुए अपनी प्रतिबद्धता और शारीरिक क्षमता प्रदर्शित  की। लेकिन भारत जोड़ो का नाम सार्थक करने में वे कितने सफल रहे इसका आकलन आने वाले कुछ दिनों तक राजनीतिक विश्लेषकों को व्यस्त रखेगा। ये अनुमान शुरू में लगाया जा रहा था कि श्री गांधी इस यात्रा के जरिए समूचे विपक्ष को अपने साथ लाकर 2024 के लोकसभा चुनाव हेतु भाजपा के विरोध में मोर्चे को आकार दे सकेंगे किंतु कुछ फिल्मी हस्तियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अलावा केवल शिवसेना के आदित्य ठाकरे और अंत में उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के कोई बड़ा विपक्षी चेहरा उनके साथ न चला और न ही अपना समर्थन भेजा। शरद पवार , ममता बैनर्जी , के. चंद्रशेखर राव, अरविंद केजरीवाल , सुखबीर सिंह बादल  , ओमप्रकाश चौटाला , नीतीश कुमार , अखिलेश यादव , मायावती , जैसे  नेताओं ने यात्रा को अनदेखा कर दिया। ऐसा लगता है बीच बीच में श्री गांधी का ये कहना उक्त नेताओं को नहीं पचा कि कांग्रेस को धुरी बनाकर ही अगले लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता होनी चाहिए। यात्रा के समाचार माध्यम प्रभारी जयराम रमेश ने अनेक अवसरों पर दोहराया भी कि कांग्रेस को सभी राज्यों में अपनी ताकत पर लड़ने की तैयारी करनी चाहिए। हालांकि पूरी यात्रा के दौरान राहुल ने भाजपा और रास्वसंघ की आलोचना में कोई कसर नहीं छोड़ी। साथ ही हिंदू धर्मस्थलों पर जाकर  भाजपा को चिढ़ाने के अलावा  पौराणिक  प्रसंगों का उल्लेख कर अपने को अध्ययनशील प्रमाणित करने का प्रयास भी किया। फिर भी क्या पांडवों ने नोट बंदी की थी और क्या उन्होंने जीएसटी लगाया जैसे मुद्दे छेड़कर वे हंसी का पात्र भी बने।  इसी तरह बात बात में ये कहना कि वे भाजपा और संघ से नफरत नहीं करते और फिर उन्हीं के विरुद्ध पूरी यात्रा को केंद्रित रखना विरोधाभासी लगा। यात्रा के जरिए श्री गांधी की पप्पू वाली छवि को बदलने का प्रयास भी सुनियोजित तरीके से किया गया किंतु पूरी सतर्कता के बावजूद वे अनेक अवसरों पर पुरानी गलतियां दोहराने से बाज नहीं आए । भले ही कांग्रेस इस यात्रा के पीछे की सोच को किसी भी रूप में पेश करे लेकिन इसका उद्देश्य श्री गांधी को प्रधानमंत्री के समकक्ष खड़ा करते हुए शेष विपक्ष को उनका नेतृत्व स्वीकार करने हेतु बाध्य करना ही था । लेकिन अब ये कहना गलत नहीं होगा कि विपक्ष के छोटे से हिस्से को छोड़ बाकी छत्रपों ने इस यात्रा को जरा भी तवज्जो नहीं दी। और तो और इसी बीच कांग्रेस के अनेक प्रादेशिक नेता पार्टी छोड़ गए। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट को यात्रा के दौरान युद्धविराम हेतु राजी किया गया किंतु ज्योंही श्री गांधी ने राजस्थान छोड़ा दोनों में टकराव होने लगा। दरअसल यात्रा की शुरुआत में ही अपशकुन हो गया जब श्री गहलोत द्वारा गांधी परिवार की मंशा ठुकराते हुए कांग्रेस अध्यक्ष बनने से   इंकार  के साथ ही राजस्थान की गद्दी श्री पायलट को सौंपने  से मना करते हुए केंद्रीय पर्यवेक्षकों को बेइज्जत कर लौटा दिया। उसके बावजूद जब मुख्यमंत्री समर्थित विधायकों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हुई तो अजय माकन ने महामंत्री पद छोड़ दिया। और भी ऐसी घटनाएं इस दौरान हुईं जब पार्टी नेतृत्व विशेष रूप से गांधी परिवार असहाय नजर आया । संभवतः यही देखकर गैर भाजपाई  विपक्ष के नेताओं ने यात्रा से दूरी बनाकर चलने का रास्ता चुना। हालांकि  राहुल राष्ट्रीय नेता के रूप में अपनी जगह बनाने में काफी हद तक सफल रहे जो उन्हें दूसरे विपक्षी नेताओं से कुछ ऊपर रखने में सहायक होगी । दिग्विजय सिंह द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक पर संदेह व्यक्त किए जाने पर बिना देर किए उनकी बात का विरोध कर देना इसका प्रमाण था । लेकिन ये भी उतना ही सही है कि ममता, अखिलेश और केसीआर जैसे क्षेत्रीय छत्रप उनकी रहनुमाई शायद ही स्वीकार करेंगे क्योंकि कांग्रेस उनके राज्य में अपना हिस्सा मांगे बिना नहीं रहेगी जो उन्हें स्वीकार्य नहीं होगा। बावजूद इसके इतना कहा जा सकता है कि श्री गांधी ने कांग्रेस में सक्रियता बढ़ा दी है । जिस उत्साह से पार्टीजन उनकी यात्रा से जुड़े उसकी वजह से जी 23 नामक असंतुष्ट गुट पूरी तरह नेपथ्य में धकेल दिया गया। अध्यक्ष के चुनाव में मल्लिकार्जुन खड़गे की शशि थरूर पर बड़ी जीत ने भी गांधी परिवार के वर्चस्व को साबित कर दिया किंतु यात्रा के समापन के ठीक पहले केरल के कद्दावर नेता और गांधी परिवार के करीबी ए.के.एंटोनी के बेटे का कांग्रेस छोड़ना भावी खतरों की तरफ इशारा भी है। बहरहाल श्रीनगर में राष्ट्रध्वज फहराकर लौटे राहुल निश्चित रूप पहले से ज्यादा आत्मविश्वास से भरे होंगे । लेकिन इसका कितना लाभ कांग्रेस को मिलेगा ये इसी वर्ष होने जा रहे विधानसभा चुनाव के नतीजों से स्पष्ट हो जाएगा।

रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 28 January 2023

बिना तराशे हीरों की परख होने से पद्म अलंकरणों का सम्मान बढ़ा



गणतंत्र दिवस पर घोषित पद्म अलंकरण अक्सर आलोचना का शिकार होते रहे हैं। विशेष रूप से राज नेताओं और अभिनेताओं को दिए जाने वाले अलंकरणों के औचित्य पर ज्यादा उंगलियां उठती हैं। सिफारिशों के साथ ही तुष्टीकरण भी इन अलंकरणों की पृष्ठभूमि में रहता था। मोदी सरकार ने पद्म पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया को काफी सुधारा है । हालांकि उच्च स्तर पर सिफारिश और पक्षपात  पूरी तरह समाप्त हो गया ये कहना तो अतिशयोक्ति होगी । इस बार भी एक दो अलंकृत विभूतियां हैं जिनके चयन पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है । लेकिन अधिकतर निर्णय अपनी सार्थकता साबित करते हैं। विशेष रूप से पद्मश्री हेतु चयनित लोगों में ऐसे नाम ज्यादा हैं जो पद , पैसा और प्रतिष्ठा से दूर रहकर अपने  कर्मक्षेत्र में योगदान देते रहे। अन्यथा इन पुरस्कारों को लेकर ये अवधारणा स्थापित हो चुकी थी कि इसकी रेवड़ी कुछ चुने हुए तबकों के लिए ही आरक्षित है । लेकिन बीते कुछ वर्षों से इन अलंकरणों के लिए चयन प्रक्रिया का  लोकतंत्रीकरण करते हुए ऑनलाइन आवेदन के साथ ही अनुशंसा की  व्यवस्था की गई । उसका लाभ ये हुआ कि वंचित वर्ग की उन प्रतिभाओं को सम्मानित किया जाने लगा  जो चकाचौंध से दूर रहकर सेवा , समर्पण और साधना में रत रहे किंतु बदले में कभी यश , कीर्ति और धन की कामना नहीं की । आजादी के बाद जब पद्म अलंकरणों की व्यवस्था की गई तब निश्चित तौर पर इनके लिए सुयोग्य पात्रों का चयन होता रहा किंतु धीरे धीरे प्रक्रिया पर राजनीति हावी होने  से ऐसे अनेक लोग अलंकृत होने लगे जो सत्ता प्रतिष्ठान के करीब मंडराया करते थे। एक लॉबी विशेष ने साहित्य , कला और संस्कृति के क्षेत्र में अपना प्रभुत्व जमा रखा था। इन्हीं कारणों से पद्म पुरस्कारों की घोषणा होते ही  विवाद और आलोचनाओं की शुरुआत हो जाती। यहां तक कहा जाने लगा कि ये अलंकरण महत्वहीन हो चुके हैं लिहाजा इन्हें बंद कर देना चाहिए। देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान भारत रत्न तक के लिए राजनीतिक दबाव आने लगे जिससे क्षेत्रीय और भाषायी तुष्टीकरण भी उसके आधार बनने लगे। इसी तरह पद्म विभूषण और पद्म भूषण का निर्णय भी उपकृत करने के साथ ही वोट बैंक के नजरिए से होने से पद्म अलंकरणों के प्रति जनमानस में जो अदरभाव था उसमें क्षरण होने लगा। लेकिन 2014 के बाद से इनकी चयन प्रक्रिया को बजाय कुछ लोगों के हाथों में कैद रखने के सीधे आम जनता से जोड़ने का परिणाम है कि समाज के उस वर्ग तक को अलंकृत होने का सौभाग्य मिलने लगा जिनके लिए राष्ट्रपति भवन में देश के प्रथम नागरिक से सम्मानित होने की कल्पना तो दूर की बात थी , वे अपने जिले के कलेक्टर से मिलने तक से वंचित थे। कला , शिक्षा , चिकित्सा और समाजसेवा के क्षेत्र में निष्काम कर्मयोगी की तरह मौन तपस्वी की भूमिका का निर्वहन कर रहे लोगों को पद्म अलंकरण प्रदान  करने से इन नागरिक सम्मानों की विश्वसनीयता निःसंदेह बढ़ी है। मोदी सरकार इसके लिए निश्चित रूप से बधाई की हकदार है। यद्यपि  दरबारी मानसिकता के जिन लोगों ने अनेक दशकों तक पद्म अलंकरणों की बंदरबांट की उन्हें इस नई व्यवस्था से निश्चित रूप से परेशानी होती होगी किंतु ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि जब देश के सर्वोच्च सत्ताधीशों के समक्ष चलता हुआ किसी सुदूर इलाके का निर्धन व्यक्ति साधारण वस्त्रों में राष्ट्रपति के पास तक पहुंचता है तब पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक लोकतंत्र की रोशनी पहुंचने की उम्मीद को बल मिलता है। गत वर्ष तो एक दलित वर्ग की एक महिला समाज सेविका पद्मश्री प्राप्त करने आई तो उसके पांव में चप्पल तक न थी और उसके सम्मान में प्रधानमंत्री तक उठकर खड़े हो गए। एक आदिवासी महिला ने अलंकरण प्राप्त करने के बाद जब राष्ट्रपति के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया तो पूरा सभागार उस महिला की निश्छलता से अभिभूत होकर रह गया। अलंकरण हासिल करने वालों में ऐसे अनेक व्यक्ति होते हैं जिन्हें फोटोग्राफर की तरफ देखने के लिए भी स्वयं राष्ट्रपति को कहना पड़ता है। ये सब देखकर ये एहसास होता है कि कम से कम पद्म अलंकरणों में तो अंत्योदय लागू हुआ है। इस वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भी जिन लोगों को पद्म अलंकरण प्रदान किए गए उनमें से पद्मश्री श्रेणी में ज्यादातर नाम ऐसे लोगों के हैं जिनके बारे में उनके शहर , गांव या बस्ती के लोग भी कभी सोच नहीं सकते थे क्योंकि वे किसी राजनेता के कृपा पात्र नहीं हैं। म.प्र में लोक कला के लिए  पदमश्री प्राप्त एक महिला के पास तो रहने का मकान तक नहीं है और वह टपरेनुमा घर में परिवार सहित जीवन यापन करती है। आदिवासी समुदाय की इस महिला की चित्र प्रदर्शनी देश विदेश में लगने के बाद भी वह उपेक्षित ही रही। पद्मश्री की घोषणा होते ही अब सब उसे जानने के लिए आ रहे हैं। यद्यपि साहित्य और कला के लिए दिए जाने वाले अन्य सम्मानों में  पद्म अलंकरणों जैसी निष्पक्षता अभी चर्चा में नहीं आई । उसी तरह से इन विधाओं में की जाने वाली नियुक्तियों में पारदर्शिता भी पूरी तरह महसूस नहीं होती किंतु पद्म अलंकरणों के वितरण में मोदी सरकार ने वाकई शानदार काम किया है और इसके लिए अलंकृति विभूतियों के साथ वह भी बधाई की हकदार है। इसका सकारात्मक  परिणाम ये है कि अब पद्म अलंकरणों को समाप्त करने की मांग नहीं सुनाई देती और समाज का वह वर्ग भी इन अलंकरणों की उम्मीद करने लगा है जिसकी पहुंच सत्ताधीशों तक नहीं है।

रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 26 January 2023

दायित्वबोध की अनुभूति के बिना अमृतकाल की कल्पना साकार नहीं हो सकेगी



आज भारत का गणतंत्र दिवस है। 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हुआ था जिसके पश्चात हमारा देश पूर्ण सार्वभौमिक गणराज्य के रूप में विश्व मानचित्र पर उभरा। स्वाधीनता दिवस एक तरफ जहां हमें ब्रिटिश सत्ता से हजारों साल की गुलामी से मुक्ति का एहसास कराता है वही गणतंत्र दिवस हमें अपना राज्य अपनी मर्जी से चलाने की स्वाधीनता प्रदान करता है। लेकिन इसी के साथ ही यह हम सबके लिए दायित्व बोध का भी स्मरण दिवस है । हमें यह याद रखना चाहिए कि किसी भी देश या समाज को यदि सही मायने में विकसित और प्रतिष्ठित होना है तब उसे अनुशासन का पालन करना ही होता है । और इसीलिए प्रजातांत्रिक व्यवस्था में संविधान नामक व्यवस्था होती है जिसमें नागरिकों के अधिकारों के संरक्षण के साथ ही उनके कर्तव्यों अर्थात देश के कानून और व्यवस्था के पालन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का विवरण समाहित है। ये हम भारतवासियों का सौभाग्य है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने लंबे विचार विमर्श के बाद जो संविधान हमें दिया वह न सिर्फ विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है अपितु मानव अधिकारों के संरक्षक के रुप में एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का आधारस्तम्भ भी है। आजादी के 75 वर्ष का उत्सव मनाने के बाद ये गणतंत्र दिवस हमारे गणराज्य की सफलताओं और विफलताओं का आकलन करने का भी अवसर है। यद्यपि बीते 75 वर्ष में हमारे संविधान में अनेक संशोधन किए जा चुके हैं किंतु यह सुखद अनुभव है कि हमारे देश के राजनेताओं ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को कभी भी नहीं छोड़ा और यही कारण है कि बीते 72 वर्ष के बाद भी भारतीय संविधान की मूल आत्मा को  छेड़ने का दुस्साहस किसी ने नहीं किया । हालांकि एक अपवाद 1975 में श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाए जाने का है जो संविधान की आत्मा पर गहरी चोट थी किंतु देश की जनता ने अपनी  जागरूकता व्यक्त करते हुए 2 साल से कम के समय में ही आपातकाल की धज्जियां उड़ा दीं । श्रीमती गांधी की सरकार तो गई ही लेकिन वे अपना स्वयं का चुनाव भी हार गईं। उसके बाद  संसद द्वारा इस बात की पुख्ता व्यवस्था की गई कि भविष्य में कोई भी सरकार या प्रधानमंत्री चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो , संविधान में वर्णित संसदीय व्यवस्था को नष्ट करने और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हनन का दुस्साहस न कर सके। इसलिए बीते कुछ दशकों में जब राजनीतिक तौर पर देश में अनिश्चितता बनी रही तब भी संविधान के  मूलभूत ढांचे से छेड़छाड़ नहीं की जा सकी । लेकिन बीते कुछ समय से न्यायपालिका और विधायिका के बीच समन्वय की कमी जिस रूप में सामने आ रही है वह जिम्मेदार नागरिकों के लिए चिंता का विषय है। इसी के साथ ही केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों को लेकर टकराव भी अप्रिय स्थिति पैदा कर रहा है । जिसकी वजह से संघीय ढांचा डगमगाने की आशंका होने लगती है। भाषा के नाम पर  देश से अलग होने जैसी धमकी के अलावा केंद्रीय जांच एजेंसियों को राज्यों में प्रवेश से रोकने जैसी घटनाएं अच्छा उदाहरण नहीं कहा जा सकता।  संविधान निर्माताओं ने यद्यपि विधायिका , न्यायपालिका और कार्यपालिका के आधिकारों और कर्तव्यों का  न्यायसंगत निर्धारण तो किया ही , साथ ही साथ केंद्र और राज्यों के लिए भी मर्यादाऐं तय कर दी थीं। लेकिन ऐसा लगने लगा है कि हमारा गणतंत्र केवल अपने अधिकारों के लिए लड़ने का साधन बनकर रह गया है। और इस आपाधापी में हमारे जो कर्तव्य इस देश और संवैधानिक व्यवस्था के प्रति हैं उनके बारे में हम आंख मूंदे बैठे हैं। आज देश में जो कुछ नकारात्मक होता दिखता है उसके पीछे अधिकारों की  मारामारी ही है। जबकि 75 साल की आजादी के बाद हमें एक कर्तव्यनिष्ठ देश के रूप में अपनी पहिचान बनानी चाहिए थी। दुर्भाग्य से हमारे शासक वर्ग को जनता के सामने जो आदर्श पेश करना चाहिए थे उसमें वह चूक गया और उसकी देखा  सीखी समाज की मानसिकता पर अधिकारों को प्राप्त करने की जिद हावी हो गई। जिसके प्रभावस्वरूप दायित्वबोध का क्षरण होता चला गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आजादी के अमृत महोत्सव से जिस अमृत काल के शुभारंभ की घोषणा की है वह युगदृष्टा महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद की उस भविष्यवाणी पर आधारित है जिसमें 21 वीं सदी को भारत के पुनरुत्थान का काल बताया गया था।चारों तरफ से आ रहे संकेत इसकी पुष्टि भी कर रहे हैं । लेकिन  उस मुकाम पर पहुंचने के लिए हमें अपने उन दायित्वों के प्रति गंभीर होना पड़ेगा जिनकी अपेक्षा हमारे संविधान निर्माताओं ने हमसे की थी। इस बारे में स्मरण रखने वाली बात ये है कि संविधान की शुरुआत "हम भारत के लोग" जैसे वाक्य से होती है और इसलिए उसकी पवित्रता की रक्षा हमारा दायित्व है।
गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई।

रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 25 January 2023

बेहूदा बयान देने वाले से भी तो किनारा करें राहुल



कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे जाने पर उनकी चौतरफा आलोचना हुई | यद्यपि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के एक और प्रभारी जयराम रमेश ने बिना देर किये उसे उनकी निजी राय बताते हुए कांग्रेस द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन करने की बात भी कही लेकिन जब ऐसा लगा कि श्री सिंह का गैर जिम्मेदाराना बयान पार्टी के साथ तक्षक नाग की  तरह लिपट गया है जिसे अलग नहीं करने पर भारत जोड़ो यात्रा का अंतिम चरण बदनामी  में बदल जायेगा तब राहुल गांधी खुद सामने आये और उन्होंने दिग्विजय के बयान को बेहूदा बताते हुए कहा कि हालांकि उन जैसे वरिष्ट नेता के बारे में ऐसा कहना उनको बुरा लग रहा है किन्तु वे उनकी निजी राय की कद्र नहीं करते | श्री गांधी ने साथ ही ये भी कहा कि सेना अपना काम बहुत अच्छे तरीके से कर रही है और उससे सबूत मांगने की जरूरत नहीं है | लेकिन जब उनसे पूछा गया कि सेना के बारे में बेहूदा बातें कहने वाले नेता के विरूद्ध पार्टी कार्रवाई क्यों नहीं करती तब श्री गांधी ने पार्टी के भीतर  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होने की बात कहते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में बेहूदा बातें भी सामने आ ही जाती हैं | इस तरह एक तरफ तो उन्होंने श्री सिंह के बयान से होने वाले नुकसान से कांग्रेस को बचाने के लिए उनसे असहमति व्यक्त करते हुए बेहूदा जैसा शब्द उसके लिए इस्तेमाल किया लेकिन दूसरी तरफ उनके विरुद्ध कोई कदम उठाने का साहस भी वे नहीं दिखा सके | और फिर अपनी आदतानुसार भाजपा और रास्वसंघ के बारे में घिसे – पिटे आरोप लगाने लगे | राहुल की यही दुविधा कांग्रेस की वर्तमान स्थिति के लिए जिम्मेदार है | सोशल मीडिया पर इसीलिये उनकी तीखी आलोचना करते हुए लोगों ने लिखा कि ये सब पूरी तरह से प्रायोजित था जिसके अंतर्गत पहले तो दिग्विजय से सेना के बारे में आपत्तिजनक बयान दिलवाकर सनसनी पैदा की गई और उसके बाद उनकी आलोचना कर श्री गांधी ने अपनी छवि सुधारने का दांव चला | पूरे देश में थू – थू होने के बाद खुद श्री सिंह ने भी सेना के प्रति सम्मान दर्शाता हुआ ट्वीट जारी किया | लेकिन श्री गांधी द्वारा आलोचना के बावजूद उनके विरूद्ध किसी भी तरह की कार्रवाई से इंकार किये जाने से उस आरोप की पुष्टि होती है कि उनका बयान किसी रणनीति का हिस्सा ही था और यदि ये सही नहीं है तब ये कहना गलत न होगा कि श्री गांधी में कड़े निर्णय लेने की क्षमता नहीं है | माना कि औपचारिक तौर पर वे कांग्रेस संगठन में किसी महत्वपूर्ण पद पर नहीं हैं लेकिन असलियत तो यही है कि वे कुछ न होते हुए भी पार्टी के सर्वेसर्वा हैं | ऐसे में कम से कम उन्हें इतना तो करना ही था कि श्री सिंह को अपनी यात्रा से अलग करते हुए वापस जाने को कहते | श्री गांधी को ये सोचना चाहिए था जिस जम्मू कश्मीर में उनकी यात्रा का समापन होना है वह सेना के शौर्य  और कुर्बानियों के कारण ही भारत का हिस्सा है वरना कभी का पाकिस्तान उसे हथिया चुका होता | श्री गांधी की  इस यात्रा का नाम भारत जोड़ो है और ऐसे में उसके संयोजक द्वारा देश की अति सम्मानित सशस्त्र सेना के पराक्रम  का प्रमाण माँगना घोर आपत्तिजनक है | सेना द्वारा भी इस पर अपना विरोध दर्ज कराया गया है | ये देखते हुए कांग्रेस पार्टी भले ही श्री सिंह के विरुद्ध कोई कार्रवाई न करती किन्तु श्री गांधी उन्हें अपनी यात्रा से दूर कर सेना के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करते तब श्री सिंह  द्वारा संदर्भित विवादास्पद बयान को बेहूदा बताने वाली उनकी बात को प्रामाणिक माना जा सकता था | कभी – कभी तो ऐसा लगता है कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या राहुल गांधी ही  हैं जो पार्टी की पूरी निर्णय प्रक्रिया तो अपने हाथ में कैद करके रखते हैं लेकिन समय पर निर्णय नहीं करते | पंजाब इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं जहां उनके  द्वारा फैसला टालते रहने के कारण पार्टी पूरी तरह घुटनों के बल आ गई | म.प्र में उनके निकटस्थ ज्योतिरादित्य सिंधिया भी उनके अनिर्णय के कारण पार्टी छोड़ गए | यही हाल गुजरात में हार्दिक पटेल के साथ हुआ जो राहुल की कार्यशैली से खिन्न होकर भाजपा में आ गए | वहीं भारत जोड़ो यात्रा के पंजाब राज्य से गुजरते ही मनप्रीत बादल कांग्रेस से त्यागपत्र दे बैठे | असम के मौजूदा मुख्यमंत्री हिमान्ता  बिस्व सरमा ने तो कांग्रेस छोड़ते समय श्री गांधी  की  बेरुखी को ही कारण बताया था | और भी ऐसे उदाहरण हैं जिनमें उनकी लापारवाही के कारण कांग्रेस को शर्मिन्दगी झेलनी पड़ी | ऐसे  में सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगने वाले दिग्विजय सिंह की बात को बेहूदा बताने के बाद भी यदि  श्री गांधी उनको अपने साथ रखे हुए हैं तब फिर उनकी आलोचना भी महज दिखावा ही कही जायेगी |  

रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 24 January 2023

कांग्रेस की फजीहत करवाने पर आमादा हैं दिग्विजय



कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर पार्टी  की फजीहत करवाने का इंतजाम कर दिया | भारत जोड़ो यात्रा के दौरान गत दिवस जम्मू में उन्होंने पुलवामा हमले के बाद भारतीय सेना द्वारा की गयी सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार दावा करती है कि उस मुहिम में इतने पाकिस्तानी सैनिक मार गिराए गये थे किन्तु उसका प्रमाण नहीं दिया गया | संसद में इस बारे में किसी भी प्रकार की जानकारी नहीं दिए जाने पर भी उन्होंने प्रधानमंत्री को घेरने की कोशिश की | बाद में जब एक टीवी चैनल के संवाददाता ने उनसे उनके बयान के बारे में बात करनी चाही तब यात्रा के मीडिया प्रभारी जयराम रमेश ने उसका माइक अलग करते हुए अंग्रेजी में कहा कि बात को घुमाइए मत | बाद में श्री रमेश ने श्री सिंह की टिप्पणी को उनका निजी विचार बताते हुए स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रहित में सभी सैन्य कार्रवाइयों का उनकी पार्टी ने समर्थन किया है और करती रहेगी  | लेकिन श्री रमेश की कोशिश बेकार साबित हुई | श्री सिंह की टिप्पणी पर भाजपा तो स्वाभाविक तौर पर आक्रामक होकर मैदान में कूदी ही किन्तु पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वी. पी . मलिक के अलावा  सैनिकों की विधवाओं की ओर से भी कांग्रेस नेता के बयान का तीखा विरोध किया गया | यद्यपि वे  इस तरह के  गैर जिम्मेदाराना बयानों के लिए लम्बे समय से कुख्यात हैं | भगवा आतंकवाद और ओसामा जी जैसे उनके शब्दों ने अतीत में भी कांग्रेस की दुर्गति करवाई है | 2019 में जब वे भोपाल से लोकसभा चुनाव लड़े तो वे बयान ही उनकी शर्मनाक हार का कारण भी बने | उम्मीद की जाती थी कि वे उस पराजय से कुछ सबक लेंगे लेकिन ऐसा लगता है म.प्र के  पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी पार्टी का नुकसान  करते रहने  का बीड़ा उठा रखा है | भारत जोड़ो यात्रा के दौरान पहले भी उनके कुछ बयान राहुल और कांग्रेस दोनों के लिए मुंह छिपाने की स्थिति उत्पन्न कर चुके थे जिसे उनकी निजी राय बताकर पल्ला झाड़ा गया | लेकिन एक सफल  फ़ौजी अभियान पर संदेह व्यक्त कर श्री सिंह ने ये साबित कर दिया कि आयु के इस पड़ाव पर आकर भी बजाय परिपक्वता दिखाने के वे पार्टी को गर्त में डुबोने में लगे हुए हैं  |  बहरहाल उनके उक्त बयान ने भारत जोड़ो यात्रा के अंतिम चरण को भी विवादास्पद बना दिया है  | ये बात  समझ से परे है कि उनके बयानों से जबर्दस्त नुकसान उठाने के बावजूद कांग्रेस उन्हें किस कारण से ढो रही है ? जिस – जिस राज्य में उनको पार्टी ने प्रभारी बनाया उन सभी में कांग्रेस की लुटिया डूब गयी | उनके अपने गृह राज्य  म.प्र में भी पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर है | 2018 में जैसे – तैसे सरकार बनी भी तो श्री सिंह ने सिंधिया परिवार से अपनी खुन्नस के चलते पहले तो ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया और बाद में उनके राज्यसभा में जाने में अड़ंगे लगाये जिससे नाराज होकर वे भाजपा में चले गये और कमलनाथ सरकार महज 15 महीने में चलती बनी | केन्द्रीय स्तर पर भी श्री सिंह भले ही कांग्रेस संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर रहे लेकिन वे हिन्दू संगठनों के विरोध में जो ऊल जलूल बयानबाजी करते रहते हैं उससे कांग्रेस को नीचे देखने मजबूर होना पड़ता है | श्री गांधी की इस यात्रा में जयराम रमेश भी लगातार साथ रहे हैं | लेकिन वे विवादास्पद बयानबाजी से बचते हैं जबकि श्री सिंह मौका मिलते ही ऐसी  टिप्पणी कर बैठते हैं  जिसके बाद पार्टी को उनकी बात से किनारा करने मजबूर होना पड़ता है | ऐसे  में सवाल उठता है कि किसी छोटे नेता या कार्यकर्त्ता को इस तरह की बात कहने पर कारण बताओ नोटिस मिल जाता है तब श्री सिंह जैसे वरिष्ट नेता को पार्टी और विशेष रूप से गांधी परिवार ने आंय – बाँय बकने के  लिए छुट्टा क्यों छोड़ रखा है ? श्री  सिंह को भी इस बात का जवाब देना चाहिए कि जब पार्टी ने सर्जिकल स्ट्राइक को राष्ट्रहित में मानते हुए उसके समर्थन की बात कही  , तब क्या वे पार्टी के रुख के विरूद्ध खड़े होने का दुस्साहस भी करेंगे ? कांग्रेस आज की स्थिति में आजादी के बाद सबसे दयनीय स्थिति में नजर आ रही है | राहुल गांधी ने 3500 किमी की पदयात्रा निकालकर उसको वर्तमान दुरावस्था से उबारने का जो प्रयास किया उसे श्री सिंह जैसे नेता पलीता लगाने में जुटे हुए हैं | उनके विवादस्पद बयानों ने कांग्रेस को कितना नुकसान पहुँचाया इसका आकलन भी श्री गांधी को करना चाहिए वरना कांग्रेस की स्थिति में और गिरावट आना तय है क्योंकि जो काम पार्टी के दुश्मनों को करना चाहिए वह दिग्विजय सिंह जैसे लोग ही कर  रहे हैं |  

रवीन्द्र वाजपेयी