Saturday, 3 June 2023

जीवन रेखा में असुरक्षित जीवन !!!



उड़ीसा में  गत दिवस हुई रेल दुर्घटना में अब तक लगभग 300 लोगों के मारे जाने की खबर आ चुकी है | घायलों की संख्या भी 1000 के करीब है | राहत और बचाव का काम जारी है | रेलमंत्री अश्विन वैष्णव घटना स्थल पहुंच चुके  हैं | 

उड़ीसा सरकार ने एक दिन का शोक घोषित कर दिया है | विभिन्न राज्य सरकारें अपने यहाँ  के यात्रियों की खोज खबर लेकर उनके इलाज आदि की व्यवस्था करने में जुटी हैं | नई वन्दे भारत एक्सप्रेस के उद्घाटन सहित अनेक सरकारी कार्यक्रम रद्द कर  दिए गए हैं | मृतकों के परिजनों और घायलों को मुआवजा दिया जावेगा | दुर्घटना की जांच करने के उपरांत ही उसका असली कारण पता चलेगा , रेल मंत्री से जवाब मांगें जाने के साथ ही नैतिकता के नाम पर इस्तीफ़ा देने की मांग भी आज नहीं तो कल उठेगी | संसद के अगले सत्र में भी इस दुर्घटना को लेकर हंगामा होगा और रेलवे के विकास को लेकर किये जाने वाले सरकारी दावों पर सवाल दागे जायेंगे | 

लेकिन कुछ दिन बाद लोग ये सब भूल जायेंगे और दुर्घटना की जाँच रिपोर्ट रेल मंत्रालय की आलमारी में बंद होकर रह जायेगी | भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक उपक्रम को देश की जीवनरेखा कहा जाता है | इसका विशाल नेटवर्क प्रतिदिन लाखों यात्रियों को यहाँ से वहां  ले जाता है | इसके साथ माल की ढुलाई के काम में भी रेलवे की महत्वपूर्ण भूमिका है जो उसकी कमाई का मुख्य स्रोत है | बीते कुछ दशकों में रेलवे का काफी विकास हुआ है | कोरोना काल में जब यात्री गाड़ियों का परिचालन पूरी तरह से रोक दिया गया था तब भी माल गाड़ियों के जरिए आपूर्ति निर्बाध जारी रही | इसके अलावा उस अवधि में रेलवे ने पटरियां बिछाने के साथ ही विद्युतीकरण और पुलों आदि की मरम्मत का काम बड़े पैमाने पर पूरा किया | 

हालात सामान्य होते ही उसने आधुनिकीकरण की दिशा में भी तेजी से कदम बढ़ाए जिसके अंतर्गत स्टेशनों को विकसित किया जा रहा है | बीते कुछ समय से वन्दे भारत नामक ट्रेन के चर्चे हैं जिसे विश्वस्तरीय कहा जा रहा  है | निकट भविष्य में  वन्दे भारत ट्रेन का निर्यात भी होगा क्योंकि अनेक देशों ने इसे खरीदने में रूचि प्रदर्शित की है | मुम्बई से अहमदाबाद के बीच चलने वाली बुलेट ट्रेन का प्रकल्प भी तेजी से तैयार हो रहा है | अपनी कार्यप्रणाली को पेशेवर बनाने के लिए रेलवे ने निजी क्षेत्र की सेवाओं को लेना भी शुरू कर दिया है | आने  वाले समय में निजी रेल गाड़ियां भी पटरियों पर भागती नजर आयेंगी | कुल मिलाकर आशय ये है कि अर्थव्यवस्था में आ रहे उछाल का असर रेलवे में भी देखा जा सकता है | 

लेकिन दो क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें अभी तक अपेक्षित परिवर्तन नहीं हो सका | उनमें पहला गाड़ियों की लेट लतीफी और दूसरा है सुरक्षा | यद्यपि इसे लेकर ये दावा किया जाता है कि  काफी  सुधार हुआ है | लेकिन जमीनी सच्चाई इससे सर्वथा अलग है | हालाँकि यात्री गाड़ियों के चलने में होने वाले विलम्ब के लिए अनेकानेक कारण होते हैं लेकिन यात्रियों का गुस्सा तब बढ़ता है जब इस बारे में सही जानकारी नहीं दी जाती | रेलवे मंत्री सहित आला अधिकारियों को ट्विटर पर शिकायत भेजने पर कई बार तो त्वरित कार्रवाई होती है लेकिन अधिकांश शिकायतें ढर्रे का शिकार होकर अपनी मौत मर जाती हैं | यदि  रेलवे का सूचना तंत्र सही जानकारी देता रहे तब यात्रियों के मन में होने वाली नाराजगी कुछ हद तक तो दूर की ही जा सकती है | इन्टरनेट के ज़माने में भी किसी यात्री गाड़ी की सही स्थिति न पता चल सके तब आधुनिकीकरण पर सवाल उठना अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता । गाड़ी सही समय पर आने की  जानकारी मिलने के बाद यात्री स्टेशन पर आ जाए और उसके आगमन में विलम्ब मिनिट से घंटा और फिर  घंटों में बदलता जाए तब लोगों में गुस्सा बढ़ना लाजमी है |  इसी तरह से गाड़ी के भीतर चोरियां हो जाने की घटनाओं के बाद रेलवे स्टाफ का रवैया पूरी तरह से गैर जिम्मेदाराना होता है वहीं  रेलवे पुलिस भी अपनी भूमिका के प्रति न्याय नहीं करती तब भी इस विशाल नेटवर्क की गुणवत्ता पर उंगलियाँ उठती हैं | 

हर साल रेलवे द्वारा दुर्घटनाओं को रोकने के  आश्वासन दिए जाते हैं | यात्रियों से इस हेतु अधिभार भी वसूला जाता है | दुर्घटनारोधी अति संवेदनशील उपकरण लगाये जाने की बातें भी सुनाई देती हैं ।वन्दे भारत गाड़ियों में ऐसी व्यवस्था भी की गई है । लेकिन उसके बाद भी दुर्घटनाओं पर रोक नहीं लग पा रही। इसका कारण कर्मचारियों की कमी है या रेलवे के प्रशासनिक ढांचे का कमजोर होना , ये विश्लेषण का विषय है किंतु उड़ीसा में गत दिवस हुईं भीषण दुर्घटना में जिस बड़े पैमाने पर जनहानि हुई उसके बाद देश के सबसे बड़े इस सार्वजनिक उपक्रम की कार्यप्रणाली एक बार फिर निशाने पर है। दुर्घटना के कारण तो तकनीकी जांच के बाद ही ज्ञात हो सकेंगे लेकिन जो हुआ वह बहुत ही दर्दनाक भी है और शर्मनाक भी। दुर्घटनाएं पूरी दुनिया में होती हैं लेकिन ये कहकर हम अपनी कमियों और गलतियों को छिपाने का प्रयास करें तो ये सुधार प्रक्रिया को पीछे लौटाने जैसा होगा। 

मौजूदा रेलमंत्री काफी योग्य और अनुभवी व्यक्ति हैं । तकनीकी और प्रशासनिक अनुभव के साथ ही उन्हें वैश्विक परिदृश्य की खासी जानकारी है।ये भी  उल्लेखनीय है कि भारतीय रेलवे अनेक देशों में रेल नेटवर्क खड़ा करने का काम कर रहा है। तकनीक का निर्यात भी होने लगा है परंतु उड़ीसा जैसी दुर्घटना उसकी शान में बट्टा लगाने का कारण बनती है। आज भी रेलयात्रा को सुविधा और सुरक्षा के मामले में जनता का विश्वास हासिल है किंतु समय - समय पर होने वाले इस तरह के हादसे आम जनता के मन में दहशत फैलाने में सहायक होते हैं।  भारतीय रेल को देश की जीवन रेखा कहना उसके प्रति विश्वास का परिचायक है। ये विश्वास तभी  बना रह सकेगा जब यात्रा करने वालों के जीवन की रक्षा असंदिग्ध रहे।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 2 June 2023

देश को नवीन और नितिन जैसे नेता चाहिए



राजस्थान में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने वाले हैं | उसी कारण से वहां के मुख्यमंत्री ताबड़तोड़ घोषणाएं करते हुए  सत्ता में वापसी का इंतजाम करने में जुटे हैं | 100 यूनिट तक मुफ्त बिजली के बाद अब उन्होंने नया उपहार जनता को ये दिया है कि 100 यूनिट से ज्यादा जितनी बिजली जलाएंगे उतने का ही पैसा  देना पड़ेगा |   अभी तक मुफ्त बिजली के साथ ये शर्त रहती थी कि मुफ्त सीमा से एक यूनिट ज्यादा होते ही पूरे का भुगतान करना होता था | लेकिन श्री गहलोत ने एक कदम आगे निकलकर ये कह दिया कि कितनी भी बिजली जलाओ लेकिन 100 यूनिट मुफ्त रहेगी | और बाकी का ही पैसा उपभोक्ता को देना पड़ेगा | 200 यूनिट खर्च करने पर शुल्क वगैरह में भी छूट रहेगी | दिल्ली में जब केजरीवाल सरकार ने मुफ्त बिजली शुरु की तब ये शर्त रखी थी कि छूट की सीमा से एक यूनिट अधिक होने पर भी पूरे का भुगतान करना होगा | अब राजस्थान सरकार ने उसके आगे की दरियादिली दिखाई है | रसोई गैस का सिलेंडर 500 रु. में देने की योजना भी 1 अप्रैल से लागू की जा चुकी है | इस पर आने वाले खर्च की राशि भी बताई गयी है | लेकिन ये खर्च आयेगा कहाँ से ये बताने की ईमानदारी हमारे सत्ताधीश नहीं दिखाते | अकेले  राजस्थान ही नहीं अपितु  देश के तकरीबन प्रत्येक राज्य में इसी तरह के मुफ्त उपहार दरियादिली से बांटे जा रहे हैं | चुनाव के कुछ महीने पहले तो मतदाता को जो मांगोगे वही मिलेगा की गुहार सुनाई पड़ती है | कर्मचारियों के भत्ते बढ़ जाते हैं , अस्थायी को स्थायी कर दिया जाता है , नई भर्तियों की बाढ़ आ जाती है , जनसमस्याओं का निवारण ,  शिविर लगाकर  किया जाता है और सबसे बड़ी बात चार साढ़े चार साल तक गुमशुदा जनप्रतिनिधि सुलभ हो जाते हैं | उनका रूखापन सौजन्यता में बदल जाता है | बीते कुछ सालों में  चुनाव के पहले  धार्मिक आयोजनों की बाढ़ आ जाती है जिसमें जनता को भंडारे के माध्यम से उदर पोषण का लाभ भी नेताजी की कृपा से मिलता है | जिन राज्यों में निकट भविष्य में चुनाव होने वाले हैं वहां के मुख्यमंत्री इन दिनों जितने उदार हैं उतने बीते सालों में नहीं रहे क्योंकि तब जनता के कल्याण की योजनाओं के लिए खजाने में पैसा नहीं  था , नई भर्ती बोझ लगती थी , अस्थायी को स्थायी करने में खजाना खाली होने का भय था | हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान में दौरे  में  गहलोत सरकार की घोषणाओं पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उन सब पर अमल किये जाने के बाद सरकारी खजाना खाली हो जाएगा | इसके जवाब में मुख्यमंत्री ने भी पलटवार करते हुए केंद्र सरकार की मुफ्त योजनाओं पर ऊंगली उठा दी | चूंकि   राजनीति नामक स्नानागार में सभी के निर्वस्त्र होने जैसी स्थिति बन चुकी है और किसी  भी कीमत पर चुनाव जीतना ही एकमात्र लक्ष्य रह गया है इसलिए किसी एक पार्टी या नेता को कठघरे में खड़ा करना न्यायोचित नहीं होगा । परन्तु इस परिदृश्य से हटकर देश के पूर्वी तट पर स्थित राज्य उड़ीसा को देखें तो पांच चुनाव लगातार जीतने के बाद भी वहां के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक लोकप्रिय बने हुए हैं | सता विरोधी रुझान जैसा शब्द  वहां मानो अर्थहीन होकर रह गया है | जनता को लुभाने के लिए श्री पटनायक भी काफी कुछ करते हैं | उनका राज्य आज भी देश के गरीब राज्यों में माना जाता है | प्राकृतिक आपदाएं भी  प्रतिवर्ष आती हैं | लेकिन नवीन बाबू अंगद  के पैर की  तरह यदि जमे हैं तब कुछ न कुछ तो ऐसा होगा ही जिसकी वजह से उनके प्रति जनता के मन में विश्वास कायम है | विधानसभा चुनाव के पूर्व उड़ीसा में खैरातों की बहार नहीं सुनाई नहीं  देती | राजनीतिक दृष्टि से  भी श्री पटनायक विवादों से दूर रहते हुए अपनी सरकार और पार्टी का संचालन कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि बीजू जनता दल और सरकार के भीतर उनके विरोधी न हों किंतु  होहल्ले से दूर रहते हुए  शांत भाव से अपना काम करने की वजह से वे जनता के बीच लोकप्रिय और सम्माननीय बने हुए हैं। बेहतर हो अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री और राजनीतिक नेतागण नवीन बाबू के काम करने के तरीकों से कुछ सीखें । चुनाव के समय खजाना खाली करने की  प्रवृत्ति निश्चित रूप से सत्ताधारी नेताओं के मन में बैठे  भय का प्रतीक है। किसी राजनेता की विश्वसनीयता उसकी कथनी और करनी में साम्यता  पर टिकती है। दुर्भाग्य से इस गुण का अभाव राजनीति में होता जा रहा है। इसी कारण चुनाव आते ही सत्तासीन नेता के साथ ही सत्ता पर काबिज होने के लिए लालायित नेताओं का रक्तचाप बढ़ जाता है जिसके परिणाम स्वरूप मतदाताओं को लॉलीपॉप देने की होड़ मचती है। केंद्र सरकार में भी वैसे तो अनेक कद्दावर मंत्री हैं किंतु परिवहन मंत्री नितिन गड़करी अपने काम के कारण जन - जन में लोकप्रिय हैं। विरोधी दलों में भी उनकी प्रशंसा होती है। सही मायनों में हमारे देश को ऐसे ही नेताओं की जरूरत है जो सत्ता का उपयोग देश के विकास और जनता के कल्याण के लिए करते हुए लोगों के दिल में अपनी स्थायी जगह बना लेते हैं। वैसे भी  मुफ्त खैरात चुनाव जीतने का कालजयी फार्मूला नहीं है । लोग भारी - भरकम टोल टैक्स देने के बाद भी हाइवे पर चलते हुए आनंदित होते हैं। एक - दो चुनाव जीतते ही अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री बनने की लालसा पाले हुए देश भर में घूमने लगे हैं किंतु पांच चुनाव जीत चुके नवीन पटनायक अपने राज्य के विकास हेतु बिना लफ्फाजी के जुटे हुए हैं । और कोई बड़ा कारण न हुआ तो छटवीं बार भी वे ही मुख्यमंत्री बनेंगे । इसी तरह ममता बैनर्जी और नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनने के लिए उठापटक करते रहते हैं वहीं श्री गड़करी में प्रधानमंत्री की संभावना और योग्यता आम जनता महसूस करती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 1 June 2023

मणिपुर को अफीम के कारोबार से मुक्त करवाना जरूरी


पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर लंबे समय से  अशांत है | बहुसंख्यक मैतेई  समुदाय को उच्च न्यायालय द्वारा अनु. जनजाति का दर्जा दिए जाने के विरोध में नगा - कुकी नामक आदिवासी  वर्ग आंदोलित हो उठा | शुरुआत में इसे जातीय हिंसा माना गया किन्तु फिर कहा गया  कि इसके पीछे जमीन के कब्जे का मुद्दा है | दरअसल मणिपुर में घाटी का जो क्षेत्र हैं उसमें मैतेई समुदाय का वर्चस्व है , वहीं पहाड़ी इलाकों में  केवल अनु.जनजाति वर्ग के रहने का नियम चला आ रहा था | ऐसे में  मैतेई को भी जनजाति मान लिए जाने से नगा – कुकी समुदाय को ये लगने लगा कि जिन पहाड़ी क्षेत्रों में वे काबिज थे उसी में मैतेई भी आकर बसेंगे और संख्याबल  ज्यादा होने से कालांतर में  भारी पड़ेंगे  | इसीलिये जब दोनों के बीच संघर्ष ने हिंसात्मक रूप ले लिया तब राज्य सरकार अपेक्षित गंभीरता नहीं   दिखा सकी | लेकिन  विवाद लम्बा खिंचने और हिंसा - आगजनी के साथ ही लोगों के मारे जाने की घटनाएँ हुईं तब लगा कि मामला उतना आसान नहीं जितना समझा गया | सेना को भी मोर्चे पर तैनात कर दिया गया | फिर भी स्थिति जब काबू नहीं की जा सकी तब ये शंका व्यक्त की जाने लगी कि इसके पीछे उग्रवदियों का हाथ है जो कि समूचे पूर्वोत्तर में अलग – अलग नामों से सक्रिय हैं और उन्हें विदेशी सहायता मिलती है | लेकिन हाल ही में राज्य के हालात पर टिप्पणी करते हुए चीफ ऑफ डिफेन्स स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने मुख्यमंत्री एन.बीरेन सिंह के बयान के विपरीत साफ़ कर दिया कि मणिपुर में हो रही हिंसा दो जातीय समुदायों के बीच का संघर्ष है जिसका उग्रवाद से लेने देना नहीं है | उनके इस बयान से मुख्यमंत्री की जमकर भद्द पिटी | गृहमंत्री अमित शाह भी मणिपुर की स्थिति का प्रत्यक्ष अवलोकन करने  वहां जा पहुंचे | हालांकि उनके वहां रहते हुए भी हिंसा होती रही | लेकिन इस सबके बीच जो नई जानकारी आई है उससे अब तक की सारी अवधारणाएं बदल सकती हैं | सूत्रों के अनुसार कुकी नामक  जनजाति मणिपुर में अफीम की खेती और व्यापार से जुड़ी है | इसके चलते ये राज्य नशे के कारोबार का बड़ा केंद्र बन गया  | म्यांमार और बांग्ला देश की सीमा पास होने से नशे के कारोबारियों को अपना जाल फ़ैलाने में काफी सहूलियत है | ये बात किसी से छिपी नहीं है कि अफगानिस्तान अफीम का सबसे बड़ा कारोबारी है और उससे होते हुए एशिया के अनेक देशों में नशे का व्यवसाय फल – फूल रहा है | चूंकि आतंकवाद की जड़ें भी इसी के पैसे से सींची जाती हैं इसलिए मुख्यमंत्री द्वारा हिंसा के पीछे उग्रवाद की भूमिका होने का संदेह पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता | लेकिन एक बात पूरी तरह सही है कि इस स्थिति के लिए मैतेई समुदाय को आरक्षण दिए जाने को ही वजह मान लेना सच्चाई से मुंह चुराने जैसा होगा | बहरहाल मणिपुर के जो हालात हैं उन पर केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से विचार करते हुए टिप्पणी कर देना गैर जिम्मेदाराना है | कुकी  समुदाय के लोगों द्वारा इस संघर्ष में ज्यादा उत्पात किये जाने की बात भी सामने आई है | इसके अलावा एनआरसी को भी एक वजह माना जा रहा है | और फिर कुकी समुदाय जिस तरह हाथियारों से लैस होकर सुरक्षा बलों से लड़ने उतारू हुआ उसके बाद से इस संघर्ष के तार म्यांमार से जुड़े होने की आशंका बढ़  गई है | ये बात भी सही है कि अफीम के कारोबार के विरुद्ध चलाये जा रहे अभियान की वजह से भी कुकी समुदाय नाराज चल रहा था | मैतेई का फैलाव पहाड़ी क्षेत्रों में होने की संभावना के चलते अफ़ीम के कारोबार में  दिक्कत आने के भय से भी कुकी समुदाय का हिंसा पर उतारू हो जाना इस विवाद का कारण माना जा रहा है | हालाँकि उच्च न्यायालय के फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतराज के बाद वह मसला तो झमेले में फंस गया लेकिन उसकी आड़ में जो खूनखराबा और नुक्सान हुआ वहा गंभीर घटना है | निश्चित तौर पर राज्य सरकार शुरुआती तौर पर हालात का सही – सही अनुमान और आकलन करने में विफल रही | ऐसे मामलों में ख़ुफ़िया तंत्र की नाकामी भी जिम्मेदार कही जायेगी | मणिपुर लम्बे समय से शांति के रास्ते  बढ़ रहा था | उग्रवाद को पीछे छोड़ते हुए समूचे पूर्वोत्तर को विकास की  मुख्यधारा में  शामिल किये जाने के  केंद्र सरकार के प्रयासों के परिणामस्वरूप ही मणिपुर भी आन्दोलन , बंद , हिंसा आदि से मुक्त हो चला था | लेकिन उच्च न्यायालय द्वारा  जल्दबाजी में जो फैसला किया  गया उसने आग भड़का दी | आज पत्रकारों के सामने गृह मंत्री अमित शाह ने इस बात को स्वीकार करने का साहस भी दिखाया | उनके वहां डेरा  ज़माने के बाद हालात सुधरने की  उम्मीद जागी है | श्री शाह ने सभी पक्षों से चर्चा करने के बाद पूरी जाँच करवाकर विवाद के कारणों को समाप्त करने की जो पहल की उसके अच्छे परिणाम आने की उम्मीद सभी कर रहे हैं | लेकिन इसके बाद भी अफीम के कारोबार से मणिपुर को मुक्त करवाने का काम सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ किया जाना चाहिए क्योंकि इससे  नशाखोरी के साथ ही तस्करी का कारोबार फैलने से विदेशी घुसपैठ की आशंका बढ़ती है |  चूंकि पूरा  उत्तर पूर्व जनजातीय समूहों से भरा है इसलिए आजादी के बाद से ही विदेशी शक्तियों ने उग्रवाद और अलगाववाद का माहौल बनाकर सशस्त्र विद्रोह की स्थितियां बनाए रखीं। लेकिन बीते कुछ सालों में स्थिति में जबर्दस्त सुधार हुआ है।उग्रवादी मुख्यधारा में शामिल होते जा रहे हैं । लेकिन मणिपुर के हालिया घटनाक्रम ने इस बात के प्रति आगाह किया है कि अभी वह समय नहीं आया कि केंद्र सरकार पूरी तरह से राज्य के भरोसे बैठी रहे । श्री शाह द्वारा मौके पर जाकर स्थितियों का जायजा लेने के बाद ऐसा कुछ किया जाना चाहिए जिससे इन हालातों की पुनरावृत्ति न हो सके क्योंकि किसी सीमावर्ती राज्य में अशांति देश की एकता और अखंडता के लिए अच्छा संकेत नहीं होता।

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 रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 31 May 2023

सुलह के बाद भी पायलट और गहलोत द्वारा लगाए आरोप यथावत हैं


राजस्थान में कांग्रेस के दो बड़े नेताओं के बीच चल रहे सियासी घमासान को अमेरिका जाने से पहले राहुल गांधी खत्म करवा गए | बैठक के बाद अशोक गहलोत और सचिन पायलट मुस्कराते हुए बाहर आये और आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत के लिए जुटने की बात कही | कुछ समय पहले तक एक दूसरे को नीचा दिखाने वाले ये नेता बीते पांच साल से लड़ते आ रहे हैं | इसका प्रमुख कारण ये है कि 2018 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने श्री पायलट के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए लड़ा था | चुनाव के पहले से ही उन्होंने काफी मेहनत की । ये कहना भी गलत न होगा कि भाजपा सरकार की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मुकाबले में जनता ने युवा सचिन को पसंद किया | ऐसे में उनको उम्मीद रही कि उन्हें मुख्यमंत्री पद हासिल होगा किन्तु बाजी मार ले गये जादूगर से राजनेता बने अशोक गहलोत । सचिन को भविष्य का हवाला देते हुए उपमुख्यमंत्री बना दिया गया | यहाँ भी श्री गहलोत ने जादूगरी दिखाई और सचिन को अपेक्षित शक्ति और महत्व नहीं दिए | इससे नाराज होकर वे 2020 में अपने समर्थक विधायकों को लेकर हरियाणा जा बैठे | जिसके बारे में कहा गया कि वह खेल भाजपा द्वारा रचा गया था | चूंकि पायलट गुट संख्या बल नहीं जुटा सका , लिहाजा वह बगावत विफल होकर रह गयी | मुख्यमंत्री की कुर्सी तो हाथ आई नहीं उलटे श्री पायलट से उपमुख्यमंत्री के साथ ही प्रदेश अध्यक्ष की गद्दी भी छिन गयी | हालाँकि इस घटनाचक्र का सबसे रोचक पहलू ये रहा कि बागी तेवर अपनाने के बाद भी न तो श्री पायलट और न ही उनके साथ गए विधायकों पर कड़ी कार्रवाई पार्टी कर सकी | ऐसा लगा था कि कांग्रेस हाई कमान फूंक – फूंककर कदम बढ़ा रहा है ताकि सचिन भी सिंधिया जैसा करतब न दिखा सकें | हालाँकि भाजपा में बैठी वसुंधरा राजे श्री पायलट के पार्टी में आने में बाधा बन गईं क्योंकि वे उनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर जाँच की मांग करते आये थे | इसीलिये श्री पायलट ने अनेक बार कहा भी कि श्री गहलोत ही वसुंधरा को बचा रहे हैं | कुछ दिन पहले ही मख्यमंत्री ने धौलपुर में सार्वजनिक मंच से कहा भी कि उनकी सरकार को गिरने से बचाने में वसुंधरा राजे की भूमिका थी | यद्यपि इसका खंडन भी हुआ किन्तु श्री पायलट ने जब एक दिवसीय धरना जयपुर में देते हुए भाजपा की पूर्व मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार की जांच कराये जाने की मांग की तब ये बात साफ़ हो गयी कि उनका निशाना श्री गहलोत के साथ ही वसुन्धरा भी हैं | उसके बाद सचिन ने अजमेर से जयपुर तक पदयात्रा करने के बाद गहलोत सरकार को 30 मई तक का समय दिया भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों की जाँच करवाए जाने का | इस दौरान दोनों के बीच बयानों के जहर बुझे तीर भी बिना रुके चलते रहे | राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा जब तक राजस्थान में रही तब तक जरूर दोनों नेताओं में युदधविराम रहा लेकिन इसके बाद से जितनी तीखी शब्दावली का प्रयोग एक दूसरे के विरुद्ध दोनों तरफ से होता रहा , वैसा तो विपक्षी पार्टी के विरुद्ध भी सामान्यतः नहीं होता | बहरहाल इस झगड़े में कांग्रेस आलाकमान की लाचारी जिस तरह उजागर हुई वह सर्वविदित है | उसकी सबसे बुरी स्थिति तो तब बनी जब कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ने से बचने के लिए श्री गहलोत ने जयपुर में नया मुख्यमंत्री तय करने आये पर्यवेक्षकों को बुरी तरह अपमानित करते हुए अपने समर्थक विधायकों से इस्तीफा दिलवाकर सरकार गिराने का दबाव बना दिया | उनके सामने आलाकमान को भी झुकना पड़ा और मल्लिकार्जुन खरगे अध्यक्ष बने | बहरहाल उस वाकये ने ये साबित कर दिया कि श्री गहलोत , सचिन को रोकने के लिए किसी भी हद तक जायेंगे | उन्होंने न जाने जाने गांधी परिवार की कौन सी नस दबा रखी है जिसकी वजह से वह चाहकर भी अपनी पसंद के नेता को राजस्थान की गद्दी न दिलवा सका | आखिर में जब उसे लगा कि 30 मई के बाद वे आम आदमी पार्टी में चले जायेंगे या फिर किसी नए विकल्प के जरिये विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जड़ें खोदेंगे तब दोनों नेताओं को बिठाकर उनके बीच सुलह करवाने का उपक्रम रचा गया | लेकिन उस समझौते के फौरन बाद से ही राजनीतिक विश्लेषक ये शंका व्यक्त करने लगे कि ये सुलह दिखावटी है और भीतर ही भीतर आग सुलगती रहेगी | उस बैठक के बाद श्री पायलट ने 30 मई के बाद किये जाने वाले धमाके से इंकार कर दिया वहीं श्री गहलोत ने भी बागी विधायकों पर भाजपा से लिए 10 करोड़ लौटाने जैसे कटाक्ष बंद कर दिए | लेकिन अजमेर से जयपुर की पदयात्रा के दौरान श्री पायलट ने जो मुद्दे उठाये थे उनके बारे में मुख्यमंत्री ने उन्हें क्या आश्वासन दिया ये उन्हें स्पष्ट करना चाहिये क्योंकि वे कांग्रेस के नहीं अपितु राजस्थान की जनता से जुड़े मुद्दे थे | इसी तरह जो विधायक श्री पायलट के साथ हरियाणा जाकर बैठ गए थे उन पर भाजपा से करोड़ों रूपये लेने का जो आरोप श्री गहलोत सार्वजनिक रूप से लगाते रहे क्या वह उनकी नजर में असत्य था ? चूंकि दोनों खेमों ने एक दूसरे के बारे में जो भी आक्षेप लगाये वे जनता के संज्ञान में हैं इसलिए आने वाले विधानसभा चुनाव में श्री गहलोत और श्री पायलट से पूछा जायेगा कि उनका क्या हुआ ? उल्लेखनीय है श्री पायलट की सभा में गहलोत मंत्रीमंडल के एक सदस्य ने इस सरकार को राजस्थान की अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार कहा था | वे मंत्री अभी तक सरकार में बने हुए हैं। इसी तरह श्री पायलट और श्री गहलोत द्वारा बीते कुछ महीनों में एक दूसरे के बारे में जो कुछ भी कहा गया वह राजस्थान की जनता महज एक बैठक के बाद मुस्कराकर बाहर आने से भूल जायेगी और भ्रष्टाचार के द्विपक्षीय आरोप अपनी मौत मर जायेंगे ये सोचना भूल होगी। जनता की याददाश्त कमजोर होती है लेकिन इतनी भी नहीं जितना राजनीतिक पार्टियां और उसके नेता समझते हैं। याद रखा जाना चाहिए कि 40 प्रतिशत कमीशन के सिर्फ एक ही मुद्दे ने कर्नाटक में भाजपा की पराजय की बुनियाद रख दी थी। राजस्थान में तो भ्रष्टाचार के आरोपों की पूरी झालर है और वह भी सत्तारूढ़ कांग्रेस के दो दिग्गज नेताओं द्वारा ही एक दूसरे पर लगाए हुए।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 30 May 2023

भारत का सम्मान और देशवासियों का आत्मविश्वास बढ़ना सबसे बड़ी उपलब्धि



नरेंद्र मोदी सरकार ने आज अपने दूसरे कार्यकाल के चार साल पूरे कर लिए | 2014 में सत्ता में आये श्री मोदी पहले ऐसे गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं जो लगातार दूसरा कार्यकाल बिना किसी बाधा के पूरा करने की  ओर बढ़ रहे हैं |अगले वर्ष चूंकि लोकसभा चुनाव होने वाला है इसलिए भाजपा इस अवसर का लाभ उठाकर केंद्र सरकार के बीते 9 वर्ष के कार्यों से जनता को अवगत करवाने का अभियान भी शुरू कर रही है | इसे एक तरह से उसके चुनाव अभियान की अनौपचारिक शुरुआत भी कहा जा सकता है | हालाँकि उसके पहले ही तेलंगाना , म.प्र , राजस्थान और  छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होंगे लेकिन देश की जो राजनीतिक परिस्थितियां हैं उन्हें देखते हुए भाजपा के रणनीतिकार बिना समय गँवाए चुनाव प्रचार में बढ़त लेने का दांव चल रहे हैं | वैसे भी भाजपा अब हर चुनाव प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व और कृतित्व के आधार पर लड़ने की आदी हो गई है | चूंकि कांग्रेस सहित बाकी विपक्षी दलों के बीच भाजपा के विरोध में गठबंधन बनाने की कवायद जोरों पर है इसलिए भी प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के 9 वर्ष पूर्ण होने पर पार्टी  संगठन को जनता के बीच जाकर उनकी सरकार की उपलब्धियों से अवगत कराते हुए 2024 के महासमर हेतु मोर्चेबंदी करने हेतु सक्रिय कर दिया है | नए संसद भवन के उद्घाटन के साथ ही सही मायने में प्रधानमंत्री ने अपना अभियान शुरू कर दिया | विपक्ष के अनेक दलों द्वारा  संसद भवन के उद्घाटन समारोह का बहिष्कार किये जाने से श्री मोदी को खाली मैदान मिल गया | जहाँ तक बात उनकी सरकार की उपलब्धियों की है तो इसे लेकर राय भिन्न हो सकती हैं जो लोकतंत्र में स्वाभाविक ही है | वैसे भी भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में जहाँ दर्जनों राजनीतिक पार्टियाँ हैं , वहां किसी एक नेता के बारे में एक जैसी राय बन जाना अस्वाभाविक तो है ही , असंभव भी है | और फिर क्षेत्रीय दलों के अलावा जातिवादी राजनीति के उभार ने समूचे परिदृश्य को बदलकर रख दिया है | ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर देश को भावनात्मक रूप से बांधे रखना आसान नहीं होता। लेकिन श्री मोदी की इस बात के लिए प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने पूरे देश में एक सुदृढ़ नेता के रूप में अपनी छवि स्थापित की है। जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें नहीं हैं उनमें भी जब प्रधानमंत्री के लिए सर्वे किया जाता है तब श्री मोदी ही बाकी सबसे आगे नजर आते हैं । इसका कारण ये है कि बतौर प्रधानमंत्री बेहद सक्रिय रहते हुए वे कुछ न कुछ नया करते रहते हैं । बीते 9 वर्ष में  उन्होंने जितना कार्य किया वह अपने आप में रिकॉर्ड है।  राम मंदिर , धारा 370  और तीन तलाक जैसे मुद्दों की बात न करते हुए आर्थिक , सामरिक और    अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर उनकी सरकार ने जो हासिल किया है  वह हर मापदंड पर खरा उतरता है। उनके पूर्ववर्ती जो दो प्रधानमंत्री रहे वे अपने - अपने क्षेत्र में महारथी थे। स्व.अटल बिहारी वाजपेयी अपने समकालीन राष्ट्रीय नेताओं में  सबसे लोकप्रिय और सम्मानित थे।संसदीय राजनीति में उनके लंबा अनुभव और निष्कलंक सार्वजनिक जीवन की वजह से उनके किसी भी कार्य पर उंगली उठाने का साहस विरोधी भी नहीं कर पाते थे। उनके कार्यकाल में भी परमाणु विस्फोट और कारगिल विजय के साथ वैश्विक मंचों पर भारत की  प्रतिष्ठा नई ऊंचाई पर पहुंची किंतु एक तो उनको राजनीतिक अस्थिरता से लगातार जूझना पड़ा क्योंकि उनकी पार्टी के पास पर्याप्त संख्याबल नहीं था । इसीलिए 1996 , 98 और 99 में उन्हें जल्दी - जल्दी चुनाव का सामना करना पड़ा । और फिर उनकी आयु और स्वास्थ्य भी उनके लिए समस्या बना। उनके बाद आए डा.मनमोहन सिंह की पेशेवर योग्यता को कोई चुनौती नहीं दे सकता था। एक अर्थशास्त्री के तौर पर उनका लोहा पूरी दुनिया मानती थी किंतु वे भी स्वतंत्र रहकर कार्य नहीं कर पाए। दरअसल वे राजनीति के लिए बने ही नहीं थे। इसलिए उनका दस वर्षीय कार्यकाल घपलों , घोटालों और विवादों में घिरा रहा। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि उन्हें वह श्रेय नहीं मिल सका जिसके वे हकदार रहे । लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि ये रही कि उन पर निष्क्रियता का आरोप भले लगता रहा किंतु उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। ऐसे में जब श्री मोदी सत्ता में आए तो उनके पक्ष में दो बातें रहीं। अव्वल तो ये कि वे उम्र और स्वास्थ्य के मद्देनजर पूरी तरह सक्षम थे और दूसरा उनके पास पूरा बहुमत होने से वे निर्णय लेने को स्वतंत्र रहे। अटल जी के दौर में ममता , जयललिता और मायावती जैसे अवरोध आते रहे वहीं मनमोहन सिंह जी गांधी परिवार के दबाव से मुक्त नहीं हो पाए। श्री मोदी इन समस्याओं से मुक्त रहे। इसलिए उन्होंने जोखिम उठाने में संकोच नहीं किया। और यही वह कारण है जिसकी वजह से वे देश ही नहीं वरन दुनिया में एक ताकतवर नेता के तौर पर स्थापित हो सके। बीते 9 वर्ष में रामराज आ गया है ये कहना अतिशयोक्ति होगी लेकिन ये स्वीकार करना ही पड़ेगा कि उन्होंने देश को आर्थिक और सामरिक दृष्टि से एक शक्ति के रूप में खड़ा कर दिया। वैश्विक मसलों पर उनकी नीतिगत कुशलता ने  भारत को महाशक्तियों के समकक्ष हैसियत दिलवाई । बीते 9 वर्ष के  कालखंड पर दृष्टिपात करें तो ये कहा जा सकता है कि उन्होंने देश और देशवासियों का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ाया है। पूरी दुनिया में भारत और भारतीयों का जो सम्मान बढ़ा उसका श्रेय उन्हें देना ही होगा। राजनीति के अपने दांव पेच होते हैं किंतु देशहित के बारे में सोचने पर ये लगता है कि नरेंद्र मोदी का नेतृत्व आज भारत की आवश्यकता है और यही उनकी सबसे बड़ी सफलता है।  विश्व के तमाम नेता उनको जो सम्मान देते हैं वह निश्चित तौर पर भारत की बढ़ती शक्ति का प्रमाण है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी 


Monday, 29 May 2023

जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में लोकसभा सीटें भी बढ़ना चाहिए



नये संसद भवन का बहुप्रतीक्षित लोकार्पण गत दिवस संपन्न हो गया | इसी के साथ इस बात की सुगबुगाहट भी शुरू हो गयी कि देश की जनसँख्या में हुई वृद्धि के  अनुपात में लोकसभा की सीटें बढ़ाई जाएँगी | इस बारे में ये जानकारी भी मिल रही है कि स्व. इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल में भी लोकसभा की सीटें बढ़ाये जाने की बात चली थी किन्तु उस समय दक्षिण के राज्य विरोध में खड़े हो गए क्योंकि उनको ये डर था कि जनसंख्या के मामले में चूंकि उत्तरी राज्य भारी पड़ते हैं लिहाजा लोकसभा का संतुलन बिगड़ जायेगा | श्रीमती गांधी ने इसीलिए उस प्रस्ताव को टाल दिया | उसके बाद से देश की जनसँख्या  काफी बढ़ चुकी है | अनेक छोटे राज्य भी बनाये गए और लोकसभा सीटों का  परिसीमन भी किया गया किन्तु उनकी संख्या बढ़ाने का जोखिम उठाने कोई सरकार तैयार नहीं हुई | इसके पीछे सबसे बड़ा कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव था । मौजूदा संसद में स्थानाभाव का बहाना भी बनाया जाता रहा | उस दृष्टि से  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बात के लिए तारीफ़ करनी होगी कि उन्होंने दूरंदेशी का परिचय देते हुए न सिर्फ नये संसद भवन की रूपरेखा तैयार की वरन  उसके साथ ही राष्ट्रीय राजधानी में स्थित केंद्र सरकार के समूचे प्रशासनिक ढांचे को एक ही जगह केंद्रित करने हेतु महत्वाकांक्षी सेंट्रल विस्टा परियोजना तैयार करवाई , जिसमें सचिवालय के साथ ही प्रधानमंत्री निवास भी होगा। इसके पूरे हो जाने पर दिल्ली में यहां - वहां बिखरा केंद्र सरकार का तंत्र एक विशाल परिसर में सिमट जायेगा जिससे प्रशासनिक व्यवस्था के साथ ही निर्णय प्रक्रिया में तेजी आएगी। सुरक्षा संबंधी कारणों से भी ऐसा करना आवश्यक होता जा रहा था। इस बारे में उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार के अनेक दफ्तर दिल्ली में किराए के परिसर में होने से सरकार पर काफी बोझ पड़ता है। सेंट्रल विस्टा परियोजना दरअसल आने वाले 100 साल के लिए राष्ट्रीय राजधानी में प्रशासनिक जरूरतों के मद्देनजर बनाई गई है जिसके पहले चरण में संसद भवन का निर्माण रिकार्ड समय में पूरा किया गया। इसे लेकर राजनीतिक विवाद भी हो रहा है । लेकिन नए संसद भवन के शुभारंभ के बाद जो प्रतिक्रियाएं आईं उनसे इस भवन की उपयोगिता और आवश्यकता सिद्ध हो रही  है। इसकी भव्यता तो अपनी जगह है ही किंतु इसमें जिन आधुनिक सुविधाओं की उपलब्धता है वे समय के साथ चलने की प्रधानमंत्री की सोच का प्रमाण है । लेकिन इस सबसे अलग हटकर लोकसभा में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक होने लायक सीटों की व्यवस्था से ये संकेत मिलने लगे हैं कि मोदी सरकार संसद के निर्वाचित सदन में सीटें बढ़ाने की कार्ययोजना बना रही है।  ये काम 2024 के लोकसभा चुनाव के पूर्व होगा या बाद में , इस बारे में कुछ भी अधिकृत तौर पर नहीं कहा गया किंतु यदि ऐसा न करना होता तब कोरोना काल में भी नए संसद भवन का निर्माण युद्धस्तर पर न किया जाता। वैसे भी बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में लोकसभा के सदस्यों की संख्या में वृद्धि विकास के असंतुलन को दूर करने के लिए जरूरी लगने लगी है। देश के अनेक लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं जिनके सांसद के लिए पूरे इलाके का दौरा और क्षेत्र विकास के लिए मिलने वाली निधि का न्यायोचित आवंटन करना बेहद कठिन होता है। कुछ क्षेत्रों में जनसंख्या का फैलाव ज्यादा होने से भी समस्या आती है। यही सोचकर अनेक बड़े राज्यों का विभाजन करते हुए झारखंड, छत्तीसगढ़ , तेलंगाना और उत्तराखंड जैसे  छोटे राज्य बनाए गए। अतीत में पूर्वोत्तर में भी छोटे राज्यों का गठन विकास के असंतुलन को दूर करते हुए प्रशासनिक क्षमता बढ़ाने के लिए किया गया। विकास की दौड़ में छोटे राज्य जिस तेजी से आगे निकले  उसके कारण उस निर्णय की सार्थकता सिद्ध हो गई।  इसी आधार पर अब लोकसभा सीटों को  छोटा करते हुए उनकी संख्या बढ़ाए जाने पर विचार होना चाहिए। हालांकि इस बारे में दक्षिणी राज्यों की ओर से ऐतराज की खबरें भी सुनाई दे रही हैं । उन्हें डर है जनसंख्या के बल पर उ.प्र और बिहार में लोकसभा सीटें जिस मात्रा में  बढ़ेंगी उसकी वजह से राष्ट्रीय राजनीति का संतुलन पूरी तरह उत्तर भारत के हाथ चला जायेगा। हालांकि ये शंका इसलिए बेमानी है क्योंकि आज भी उक्त दोनों राज्यों में  लोकसभा की लगभग एक चौथाई सीटें हैं । राजनीतिक हल्कों में ये टिप्पणी अमूमन सुनाई देती है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ होकर जाता है । और ये बात सही भी है । पी.वी नरसिंहराव , एच. डी.देवगौड़ा , आई.के गुजराल और  डा.मनमोहन सिंह को छोड़कर शेष प्रधानमंत्री उ.प्र से ही बने। यहां तक कि स्व.अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी को भी प्रधानमंत्री की कुर्सी उनके गृहराज्य की बजाय उ.प्र से लोकसभा सदस्य चुने जाने के बाद ही नसीब हुई । ज्यादा लोकसभा सदस्य होने से ही तो  प.बंगाल ,  महाराष्ट्र और तमिलनाडु लोकसभा में अपनी वजनदारी रखते हैं । इसलिए राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय भावना को परे रखकर सोचना होगा। यदि सदस्य संख्या बढ़ती है तो जितना जितना लाभ उ.प्र  और बिहार को होगा उसी अनुपात में दक्षिण या अन्य राज्यों में भी सांसद बढ़ेंगे। इससे भाजपा का लाभ होगा ये मान लेना भी सही नहीं है क्योंकि छोटे राज्य बनाने का श्रेय लेने के बाद भी उसको उन राज्यों की सत्ता गंवानी पड़ी। दुनिया के सर्वाधिक आबादी वाले देश और इतने विशाल भूभाग को देखते हुए लोकसभा की सदस्य संख्या में आनुपातिक वृद्धि समयोचित होगी । जनहित की दृष्टि से देखें तो छोटा क्षेत्र और कम मतदाता होने से सांसद भी सतत संपर्क और  बेहतर सेवाएं दे सकेंगे। ये कार्य कब होगा ये फिलहाल कह पाना मुश्किल है क्योंकि लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया 10 - 11 माह बाद शुरू हो जायेगी। लेकिन प्रधानमंत्री की कार्यशैली जिस तरह की रही है उसे देखते हुए चौंकाने वाले तत्संबंधी निर्णय की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। लोकसभा का बड़ा सदन बनाने के पीछे श्री मोदी की सोच निश्चित ही किसी कार्ययोजना का हिस्सा है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 



 

Saturday, 27 May 2023

केंद्र से नीतिगत मतभेद ठीक लेकिन नीति आयोग से खुन्नस बेमानी



आज दिल्ली में नीति आयोग के गवर्निंग बोर्ड की आठवीं बैठक आयोजित की गयी जिसकी थीम विकसित भारत 2047 टीम इण्डिया की भूमिका है | प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हो रही इस बैठक में हुए विचार – विमर्श की जानकारी तो बाद में आयेगी किन्तु आजादी के 100 वर्ष पूर्ण होने पर  देश को विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनाने की महत्वाकाँक्षी कार्य योजना तैयार करने के लिए नीति आयोग जो दृष्टिपत्र तैयार कर रहा है उसमें राज्य सरकारों की सक्रिय भूमिका भी आवश्यक है ।  संघीय ढांचे की कल्पना को तभी साकार किया जा सकता है जब देश के प्रत्येक हिस्से तक विकास की रोशनी बराबरी से पहुंचे | उस दृष्टि से आज हुई  बैठक में  कुछ मुख्यमंत्रियों का गैर हाज़िर रहना चिंता का विषय है | ममता बैनर्जी , नीतीश कुमार , के चंद्रशेखर राव , अरविन्द केजरीवाल ,भगवंत सिंह मान , अशोक गहलोत , पी विजयन  और स्टालिन ने इस बैठक से दूरी बनाने के पीछे हालांकि अलग - अलग कारण बताए हैं किंतु कुल मिलाकर जो बात समझ में आती है वह है प्रधानमंत्री से इन नेताओं की निजी खुन्नस। आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तो श्री मोदी को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी की वजह खुलकर बता दी किंतु बाकी के या तो मौन हैं या इधर उधर की बातें कर रहे हैं। कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों में श्री गहलोत अनुपस्थित हैं किंतु भूपेश बघेल और सुखविंदर सिंह सुक्खू शामिल हुए। सिद्धारमैया को लेकर अनिश्चितता रही। बहरहाल ये तय है कि  उक्त सभी की अनुपस्थिति के पीछे राजनीतिक कारण हैं। नीतीश ने तो इसे नए संसद भवन के उद्घाटन के साथ जोड़ दिया है। राजनीतिक तौर पर प्रधानमंत्री या केंद्र सरकार के साथ राज्यों के मतभेद  स्वाभाविक हैं । भारत जैसे बहुदलीय देश में शुरू से ही इसकी छूट रही है। ये वो देश है जहां  विश्व में लोकतंत्रिक पद्धति से चुनी हुई पहली साम्यवादी राज्य सरकार केरल में 1957 में बनी थी। 1967 और फिर 1977 के बाद से  केंद्र में बैठी पार्टी से मतभिन्नता रखने वाली राज्य  सरकारें आती - जाती रहीं। प.बंगाल में तो तकरीबन चार दशक तक वाममोर्चा सत्ता पर काबिज रहा। इसी तरह तमिलनाडु में 1967 से द्रविड़ मूल की दो पार्टियों का वर्चस्व बना हुआ है। जम्मू कश्मीर में भी उन क्षेत्रीय दलों का दबदबा है जो कश्मीर में जनमत संग्रह का समर्थन करते आए हैं । कहने का आशय ये है कि राजनीतिक एकाधिकारवाद की कल्पना को भारत ने अपनी राजनीतिक संस्कृति  में जगह नहीं दी जिसकी वजह से संघीय ढांचा खड़ा रहा। लेकिन बीते कुछ समय से ऐसा लगने लगा है जैसे केंद्र और राज्य में  अलग विचारधारा की पार्टी का शासन दुश्मनी का रूप लेता जा रहा है। प्रधानमंत्री के तेलंगाना  आने पर मुख्यमंत्री का स्वागत हेतु न पहुंचना और कोलकाता में श्री मोदी की बैठक में ममता का देर से आने के बाद जरूरी काम का बहाना बनाकर उठ जाना , इस बात के  प्रमाण हैं कि राजनीतिक रस्साकशी में सौजन्यता और शिष्टाचार को भी तिलांजलि दी जाने लगी है। नए संसद भवन के शुभारंभ को सियासी शक्ल देकर उससे दूर रहने की घोषणा के बाद नीति आयोग की इस महत्वपूर्ण बैठक से गैर हाजिर रहना संबंधित मुख्यमंत्रियों के लिहाज से बहुत ही गैर जिम्मेदाराना आचरण है। इस बैठक में देश के विकास के बारे में गंभीर चिंतन होना है। आने वाले ढाई दशक के भीतर भारत किस तरह से दुनिया का सिरमौर बनकर आर्थिक महाशक्ति बने और उसके बारे में सभी मुख्यमंत्री अपनी राय व्यक्त करते हुए एक समन्वित कार्ययोजना बनाएं ये देशहित में है। जिस तरह जीएसटी कौंसिल  में सभी राज्य मिलकर फैसले लेते हैं वैसा ही नीति आयोग में होना चाहिए। नीति आयोग  देश में ढांचागत विकास के साथ ही आर्थिक और औद्योगिक विकास की संभावनाएं तलाशकर उन्हें जमीन पर उतारने का  भागीरथी प्रयास कर रहा है। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ इसके साथ जोड़े गए हैं जो बिना किसी प्रचार के देश के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं। उनका किसी राजनीतिक विचारधारा से कोई लगाव या दुराव नहीं  है। उन्होंने जो विचार सूची आज की बैठक हेतु तैयार की वह पूरे देश के भले के लिए है  न कि भाजपा या प्रधानमंत्री के । ऐसे में जिन मुख्यमंत्रियों ने किसी भी कारणवश इस बैठक का बहिष्कार किया वे अपने राज्य के विकास के प्रति उदासीन ही कहे जायेंगे। राजनीतिक मतभेद प्रजातंत्र को चैतन्य बनाए जाने के लिए मूलभूत आवश्यकता हैं लेकिन जब बात देश और उसके विकास की हो तब कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है का नारा गूंजना चाहिए। उस दृष्टि से आज जो हुआ  ,  वह शुभ संकेत नहीं है। प्रधानमंत्री से नीतिगत मतभेदों को लेकर लड़ने के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव भरपूर अवसर सभी दलों को प्रदान करेगा । लेकिन नीति आयोग को राजनीति का अखाड़ा बनाकर गैर हाजिर रहे  मुख्यमंत्रियों ने जिस रवैए का परिचय दिया वह उनकी अपरिपक्वता को दर्शाता है। बैठक में हुए किसी निर्णय से असहमति जताने का अवसर और अधिकार भी उन्होंने अपनी अनुपस्थिति से खो दिया।

- रवीन्द्र वाजपेयी