Thursday, 6 July 2023

इसके पहले कि भारत में फ्रांस जैसे हालात बनें , सतर्कता जरुरी



बीते कुछ  दिनों से फ्रांस अशांत है। आगजनी , तोड़फोड़  और दंगों के कारण यूरोप का ये बड़ा और ताकतवर देश हिंसा की आग में झुलसने बाध्य हो उठा है। सरकार और पुलिस को स्थिति पर नियंत्रण करने में पसीने आ रहे हैं। ये हालात तब पैदा हुए जब कार चला रहे एक  युवक को पुलिस द्वारा पूछताछ हेतु रोके जाने के बाद भागने की कोशिश करने पर गोली मार दी गई। 17 वर्षीय उक्त युवक के पास वाहन चलाने का लाइसेंस नहीं होने से वह  बचकर निकलना चाहता था किंतु पुलिस की कार्रवाई उसके लिए जानलेवा साबित हुई । किसी अरबी देश का वह मुस्लिम युवक उन लाखों लोगों में से था जो पश्चिम एशिया के विस्फोटक हालातों से बचने यूरोपीय देशों में बतौर शरणार्थी आए और अब वहीं के होकर रह गए। फ्रांस में आबादी का 10 फीसदी हिस्सा इन्हीं मुस्लिम शरणार्थियों का हो जाने से ये वहां की शांति - व्यवस्था के लिए स्थायी खतरा बन चुके हैं। उक्त घटना में यद्यपि पुलिस का रवैया ज्यादती भरा था और गोली मारने वाले गिरफ्तार भी कर लिए गए किंतु जिस प्रकार वहां रहनेवाले मुस्लिम समुदाय ने इसे धार्मिक भेदभाव का रूप देकर पूरे देश को आग के हवाले कर दिया उससे इन शरणार्थियों को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता व्यक्त की जाने लगी है। फ्रांस के साथ ही अनेक पड़ोसी यूरोपीय देशों में बसे मुस्लिम शरणार्थियों ने  भी उपद्रव शुरू कर दिया। याद रहे जबसे अरब देशों के इन  शरणार्थियों को फ्रांस ,बेल्जियम , ब्रिटेन , जर्मनी , डेनमार्क आदि ने मानवता के नाम पर अपने यहां बसाया उसके कुछ समय बाद से ही इन्होंने बजाय उपकार मानने के  अपनी धार्मिक कट्टरता का परिचय देना शुरू कर दिया। इनकी आलोचना करने वाले अनेक पत्रकारों की हत्या के साथ उनके प्रतिष्ठानों पर हमले किए जाने लगे। ये सब देखते हुए जो स्थानीय जनता इनको शरण देने के लिए अपने देश की सरकार पर दबाव डालती थी वही इनके आक्रामक रवैये से त्रस्त हो उठी है। संदर्भित घटना के लिए दोषी पुलिसवालों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग करना पूरी तरह जायज है लेकिन उसको दूसरा रूप देकर पूरे देश में  अशांति फैला देना  मुसलमानों की पहले से खराब छवि को और खराब करने जैसा है। बीते कुछ सालों में शांत समझे जाने वाले अनेक यूरोपीय देश इन शरणार्थियों को पनाह देने को गलती मान रहे हैं। अब इसी स्थिति को भारत के संदर्भ में देखें तो हमारे देश में भी राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में एक वर्ग है जो शरणार्थियों को लेकर बेहद उदार है। बांग्लादेश से आए घुसपैठिए तो पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के लिए तो नासूर बन ही चुके हैं । देश की राजधानी दिल्ली तक में इनकी अवैध बस्तियां वोटों के सौदागरों ने बनवा दीं। मणिपुर में दो माह से जो अशांति है उसके पीछे भी अतीत में म्यांमार से आए घुसपैठियों को बसने की अनुमति देना  बड़ी वजह मानी जा रही है  । ये नशीले पदार्थों की खेती और तस्करी में लिप्त होकर इतने ताकतवर हो गए कि सुरक्षा बलों का मुकाबला आधुनिक हथियारों से करने में सक्षम हैं। कुछ साल पहले म्यांमार से आए रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों को वापस  भेजने की बात चली तब भी एक बड़ा वर्ग मानवता के नाम पर उनको शरण देने की मांग करने लगा। उस समय भी ये उदाहरण दिया गया था कि यूरोप के देश जब अरबी मुस्लिम शरणार्थियों को ठिकाना दे सकते हैं तब तो हमारी संस्कृति और परंपरा शरणागत को शरण देने की रही है। ऐसी सोच रखने वालों के कारण ही पूर्वोत्तर के अनेक सीमावर्ती जिले मुस्लिम बहुल हो गए जिसकी वजह से सीमापार से होने वाली घुसपैठ , तस्करी और आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने वालों को सहूलियत हो गई। भारत - नेपाल की सीमा पर  तराई का जो क्षेत्र है वहां जिस मात्रा में मदरसे खुले वह भी  चौंकाने वाला है। रोहिंग्या मुस्लिमों को तो कश्मीर में पाकिस्तान की  सीमा के करीब बसाने की शरारत तक की गई। आशय ये है कि जो हाल आज  फ्रांस सहित अन्य यूरोपीय देशों में हो रहा है ,  वह किसी भी समय हमारे देश में होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता । दुर्भाग्य से कुछ  राजनीतिक दल और उनके नेता सत्ता की लालसा में देश विरोधी मानसिकता को बढ़ावा देने की भूल को दोहराने में जुटे हुए हैं। एक विभाजन होने के बाद भी देश को तोड़ने वाली ताकतें लगातार सक्रिय हैं जिनको विदेशी मदद और मार्गदर्शन मिलता है। यही वजह है  कि नागरिकता का रिकॉर्ड तैयार करने बनाए कानूनों को मुस्लिम विरोधी बताकर उनके विरोध में आसमान सिर पर उठा लिया गया । जबकि उनका उद्देश्य देश की सुरक्षा और अखंडता को अक्षुण्ण रखना है। यदि देश को फ्रांस जैसी स्थिति में फंसने से बचना है तो शरणार्थियों की पूरी - पूरी पहिचान होना जरूरी है। और।इसे धर्म के चश्मे की बजाय देश के दूरगामी हित की दृष्टि से देखा जाना चाहिए , अन्यथा चीन और पाकिस्तान की कार्ययोजना सफल होते देर नहीं लगेगी। नेपाल को जिस तरह  हिंदू राष्ट्र से धर्मनिरपेक्षता के नाम पर साम्यवादी रंग में रंगा गया वह चेतावनी है। पाकिस्तान से तो उम्मीद करना व्यर्थ है लेकिन बांग्ला देश तक मुस्लिम कट्टरता से बाहर आने राजी नहीं है। एक सोची - समझी रणनीति के अंतर्गत भारत में घुसपैठियों को शरणार्थी बनाकर यहां का नागरिक बनाए जाने का सिलसिला आजादी के बाद से ही जारी है। असम ,बिहार , केरल और प.बंगाल के अनेक जिलों में तो गैर मुस्लिम  प्रत्याशी का चुनाव जीतना ही संभव नहीं रहा। समय आ गया है जब दुनिया में होने वाली घटनाओं का विश्लेषण करते समय भारत पर पड़ने वाले उनके प्रभावों की चिंता भी की जाए। वरना फ्रांस जैसे हालात कभी भी और कहीं भी बन सकते हैं और तब शायद बहुत देर हो चुकी होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 5 July 2023

संविदा कर्मचारियों को राहत हर दृष्टि से प्रशंसनीय किंतु खाली पद भी भरे जाएं




म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गत दिवस एक और चुनावी दांव खेलते हुए संविदा कर्मचारियों पर राहत की बरसात कर दी। उनको प्रतिवर्ष संविदा के नवीनीकरण से मुक्ति देने के साथ ही पूरा वेतन ,भत्ते , अवकाश , चिकित्सा सुविधा और सेवा निवृत्ति पर नियमित कर्मचारियों जैसी पेंशन ,  आंदोलन के दौरान काटे गए वेतन के भुगतान के घोषणा के  अलावा उनके साथ हुए अन्याय के लिए जिस विनम्रता के साथ माफी मांगी उससे भोपाल में जमा हजारों संविदा कर्मी मुख्यमंत्री के मुरीद हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा। लाड़ली बहना योजना के बाद शिवराज सरकार का ये दूसरा बड़ा दांव है। संविदा कर्मियों के साथ  सभी सरकारें उपेक्षापूर्ण व्यवहार करती रहीं हैं। हर चुनाव के पहले उनको स्थायी किए जाने का आश्वासन देने के बाद हासिल आया शून्य की स्थिति ही बनी रही। यद्यपि समय - समय पर उन्हें दिए जाने वाले वेतन और सुविधाओं में मामूली वृद्धि की गई किंतु बरसों तक सेवा में रहने के बावजूद स्थायी कर्मचारी की हैसियत न मिलने से वे दोयम दर्जे के माने जाते रहे जिन पर नौकरी छूट जाने की तलवार लटकती रहती थी। संविदा कर्मचारी अपने से उच्च पद वाले का काम करने के बाद भी उससे जुड़े लाभों से वंचित रखे जाते रहे , जो सरासर अन्याय था। इस व्यवस्था की शुरुआत सरकार द्वारा अपना स्थापना व्यय कम करने के उद्देश्य से की गई थी। आकस्मिक कार्यों के लिए अतिरिक्त अमले की जरूरत होने पर इस तरह के कर्मचारी रखकर कम खर्चे में काम चलाए जाने से सरकार पर दीर्घकालीन बोझ नहीं पड़ने के कारण इस व्यवस्था को पसंद किया जाने लगा । लेकिन देखने में आया कि अस्थायी मानकर काम वेतन पर रखे कर्मचारी से स्थायी रूप से काम कराया जाने लगा। इसका अर्थ यही था कि जिस पद के लिए  उसको रखा गया उस पर स्थायी कर्मचारी की जरूरत थी। लेकिन बेरोजगारों की मजबूरी का लाभ उठाकर सरकार उनका शोषण करती रही। ये बात सही है कि सरकार का स्थापना व्यय असहनीय होता जा रहा है । डॉ. मनमोहन सिंह ने जब उदारीकरण की नीतियां लागू  कीं तब सरकारी अमले का आकार घटाते हुए खर्चा कम करने के लिए बहुत बड़ी संख्या में निजी क्षेत्र को काम दिया जाने लगा। तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के लाखों कर्मचारी  ठेकेदारी प्रथा के जरिए भी सेवा में रखे गए जिनका नियंत्रण ठेकदार के हाथ रहता है। ये चलन केवल छोटे स्तर के कर्मचारियों तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि विश्वविद्यालयों में भी प्राध्यापकों की नियुक्ति संविदा पर होने लगी। आज पूरे देश में संविदा और ठेकेदारी प्रथा से सरकारी कामकाज चलाया जा रहा है।  ये बात भी सच है कि सरकारी अमले में बढ़ती अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए भी संविदा जैसे उपाय उपयोग में लाए गए। लेकिन इसमें ये विसंगति सामने आई कि जब किसी कर्मचारी  से दशकों तक सरकार काम ले रही है तब उसे अस्थायी कैसे माना जा सकता है और ये बात भी स्व प्रमाणित हो जाती है कि वह जिस पद पर कार्यरत है उस पर स्थायी नियुक्ति की आवश्यकता है।  शिवराज सरकार ने भले ही आगामी विधानसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए ये दरियादिली दिखाई जिसकी वजह से उस पर आर्थिक बोझ भी बढ़ेगा किंतु  इसके लिए सरकार ही दोषी है जिसने इस निर्णय पर पहुँचने में बरसों - बरस लगा दिए । इस वजह से सरकारी काम की गुणवत्ता और समयबद्धता दोनों पर विपरीत प्रभाव तो पड़ा ही ,  संविदा कर्मचारियों के परिवारों और  उनसे जुड़े अन्य लोगों में भी नाराजगी बढ़ी। आज के दौर में सरकार के लिए वेतन - भत्तों का खर्च वहन करना वाकई मुश्किल होता जा रहा है। इसीलिये पुरानी पेंशन योजना बंद की गई थी किंतु इस बारे में पारदर्शी नीति होनी चाहिए। सरकार निजी क्षेत्र के नियोक्ताओं को तो श्रम कानून का डर दिखाकर परेशान करती है किंतु खुद के विभागों में दैनिक वेतन भोगी और संविदा जैसे वर्ग बनाकर कर्मचारियों का जो शोषण करती है , वह भी तो श्रम कानूनों का उल्लंघन ही है। ये भी देखने में आया कि बड़े अधिकारियों और मंत्रियों के बंगलों पर बेगारी करने वाले भी दैनिक वेतन भोगी और संविदा कर्मचारी होते हैं। नौकरी चली जाने के भय से ये अन्याय और अपमान सहते हुए भी काम करते रहते हैं। उस दृष्टि से श्री चौहान ने जो कदम उठाया उसकी राजनीतिक की बजाय मानवीय नजरिए से  प्रशंसा होनी चाहिए। सरकार को चाहिए वह घाटे में कमी लाने के लिए अनुत्पादक खर्चों पर नियंत्रण लगाए । लेकिन इसके लिए उसे अपने मंत्रियों और अधिकारियों को दी जा रही शाही सुविधाओं में कटौती करनी होगी जो हर दृष्टि न्यायोचित होगा और जनमानस पर भी उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। ये बात सही है कि मंत्रियों और आला अफसरों के बंगले और अन्य सुविधाओं पर होने वाले खर्च देखने पर ऐसा लगता ही नहीं कि इनमें और अंग्रेज सत्ताधीशों तथा नौकरशाहों में कोई अंतर है। इसलिए   मुख्यमंत्री से अपेक्षा है कि वे मंत्रियों और बड़े अधिकारियों के ऐशो - आराम पर जनता की कमाई लुटाई जाने पर भी विराम लगाएं जिसके कारण शासन और प्रशासन के प्रति लोगों के मन में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। इस बारे में एक बात और भी गौरतलब है। कि सरकार का हर विभाग कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है । यहां तक कि अदालतों में न्यायाधीशों के पद खाली हैं। इस वजह से काम का बोझ और विलंब दोनों बढ़ रहे हैं। विधानसभा चुनाव में ये भी बड़ा मुद्दा है क्योंकि पदों का रिक्त रहना और बेरोजगारी बढ़ना विरोधाभासी हैं ।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 4 July 2023

हिंदू कोड बिल की जगह समान नागरिक संहिता बनती तो ये विवाद न होते




समान नागरिक संहिता  विधेयक संसद में पेश होगा या नहीं , ये फिलहाल पक्का नहीं है। विधि आयोग द्वारा विभिन्न धार्मिक संस्थाओं सहित अन्य लोगों को इस बारे में अपनी राय व्यक्त करने का जो आमंत्रण दिया उस पर तो उतना  बवाल नहीं मचा किंतु जैसे  ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में एक जैसे नागरिक कानून की जरूरत बताते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय इस हेतु निर्देशित कर चुका है तबसे पूरे देश में ये मुद्दा गरमा गया है। राजनीति के अलावा धार्मिक संगठन भी इस पर अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। कांग्रेस ने तो बिना देर लगाए ही इसका विरोध कर दिया । नीतीश कुमार ने अपनी राय सुरक्षित रखी तो शरद पवार ने समर्थन या विरोध दोनों से दूर रहने की बात कर डाली। उद्धव ठाकरे ने समर्थन करने की जो घोषणा की वह उनकी हिंदूवादी छवि बनाए रखने के लिए जरूरी हो गई थी किंतु आम आदमी पार्टी ने जब अपनी सहमति दिखाई तब लोगों को आश्चर्य हुआ क्योंकि इन दिनों उसके और भाजपा के बीच सांप और नेवले जैसे रिश्ते बने हुए हुए हैं। अकाली दल के अलावा बौद्ध संगठन भी अपनी अलग पहिचान के आधार पर  समान नागरिक संहिता का विरोध कर रहे हैं । मुस्लिम समुदाय से तो विरोध की अपेक्षा थी ही।  लेकिन समर्थन कर रहे संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा भी ये कहा जा रहा है कि वे  समान नागरिक संहिता को तभी समर्थन देंगे जब उस पर  सभी पक्षों की आम राय बने। दूसरी ओर ओवैसी ने संयुक्त हिंदू परिवार को मिलने वाली टैक्स छूट का मुद्दा छेड़ दिया तो अनेक आदिवासी समुदाय ये कह रहे हैं कि उनकी परंपराएं ही उनके धर्म हैं और वे उनमें छेड़छाड़ स्वीकार नहीं करेंगे। उत्तर पूर्व राज्यों के कबीलाई समुदायों को लेकर भी ऐसे ही सवाल उठाए जा रहे हैं। वरिष्ट अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने विपक्षी दलों सहित बाकी सभी पर तंज कसा है कि जब संभावित विधेयक का प्रारूप स्पष्ट नहीं है तो बेकार का हल्ला क्यों मचाया जा रहा है ? लेकिन एक बात  काफी तेजी से उठ रही है कि इसकी जरूरत क्या है क्योंकि किसी ने इसकी मांग तो की नहीं और इसे पेश करने के लिए यही समय क्यों चुना गया ?  ये भी आरोप है कि भाजपा इसके जरिए  हिंदुत्व के मुद्दे को नए सिरे से गरमाना चाहती है ताकि लोकसभा चुनाव में ध्रुवीकरण करा सके। समान नागरिक संहिता के विरोध में ये भी प्रचारित हो रहा है कि इसका निशाना मुस्लिम समुदाय ही है। लेकिन इस बारे में एक बात तो माननी पड़ेगी कि सर्वोच्च न्यायालय अनेक मामलों में समान नागरिक संहिता लागू किए जाने पर जोर दे चुका है और उसी के मद्देनजर विधि आयोग ने लोगों से सुझाव आमंत्रित करने की प्रक्रिया शुरू की है । अब जो लोग इसकी आवश्यकता और समय पर सवाल उठा रहे हैं उनसे ये पूछा जाना चाहिए  कि आजादी के बाद जब 1951 में हिंदू कोड  बिल पेश किया गया तब उसकी जरूरत किसने जताई थी और बिना आम सहमति के उसे संसद में पेश करने की कोशिश पंडित नेहरू की सहमति से डॉ.अंबेडकर ने क्यों की? जब वह विधेयक भारी विरोध के कारण नामंजूर हो गया तो क्षुब्ध होकर बाबा साहेब ने त्यागपत्र दे दिया। लेकिन 1952 के आम चुनाव के बाद जब कांग्रेस को भारी बहुमत संसद और राज्यों में मिल गया तब पंडित नेहरू ने दोबारा उस बिल को टुकड़ों में बांटकर अनेक कानून स्वीकृत करवाए। उस समय भी हिंदू धर्माचार्यों ने उनका विरोध किया था। जवाब में ये कहा गया कि आजादी के आंदोलन के दौरान ही  महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए क़दम उठाए जाने की मांग उठने लगी थी। उस आधार पर नेहरू जी यदि समान नागरिक संहिता का प्रस्ताव लाते तब वह धर्म निरपेक्षता के दावे के अनुरूप होता । यद्यपि उस समय तक संविधान में धर्म निरपेक्ष शब्द था ही नहीं  किंतु  देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून की बात उल्लिखित थी। लेकिन ऐसा लगता है  विभाजन के बाद भारत में बस गए मुस्लिमों को खुश रखने के लिए हिंदुओं के विवाह विच्छेद , बहुपत्नी प्रथा , पुनर्विवाह ,  उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे  प्रावधान तो सुधार के उद्देश्य से बदल दिए गए किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को शरीयत से निर्देशित मानकर उससे छेड़छाड़ करने की हिम्मत नहीं हुई । जबकि उस दौर में नेहरू जी  राजनीतिक तौर पर इतने मजबूत थे कि वे समान नागरिक संहिता का प्रस्ताव लाते तब वह सही मायनों में सामाजिक सुधार का प्रयास कहलाता। लेकिन मुस्लिम  महिलाओं से जुड़ी विसंगतियां दूर करने का साहस वे और संसद में बैठे दिग्गज क्यों नहीं दिखा सके ये सवाल उठना स्वाभाविक है । उसके बाद से ही मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप कांग्रेस पर लगने लगा जिससे वह आज भी नहीं उबर पाई है। यद्यपि मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव के बाद ममता बैनर्जी ने तो मुसलमानों का वोट हासिल करने के लिए तुष्टीकरण के नए कीर्तिमान स्थापित कर डाले । यही वजह है कि समान नागरिक संहिता के विरोध में सुनियोजित ढंग से मुहिम शुरू कर दी गई। इस बारे में श्री सिब्बल की बात सही है कि पहले संबंधित विधेयक का प्रारूप तो सामने आ जाए और उसे देखकर विरोध अथवा समर्थन का फैसला करें। इसके साथ ही ये भी अपेक्षित है कि विरोध करने वाले विधि आयोग को अपने सुझाव भेजें जिससे कि उसे अपनी रिपोर्ट बनाने में सुविधा हो। हालांकि सरकार चाहे तो संसद में सीधे विधेयक भी ला सकती है किंतु आम राय बनाने की दिशा में विधि आयोग की पहल सराहनीय है । हिंदू कोड बिल पारित करवाते समय इस तरह पूछने का प्रयास  हुआ हो,  इस बारे में जानकारी शायद ही किसी को होगी और इसीलिए हिंदुओं में सदैव इस बात को लेकर असंतोष रहता है कि उनके रीति - रिवाजों को बदलने का सिलसिला तो  चलता रहा किंतु शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले तक को संसद में पलट दिया गया क्योंकि मुस्लिम समाज उस फैसले से नाराज था।  तीन तलाक पर रोक लगने के बाद सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए समान नागरिक संहिता समय की मांग हैं । भाजपा द्वारा इसके जरिए राजनीतिक लाभ उठाने की बात सही है क्योंकि ये तो उसके मुख्य उद्देश्यों में रहा है किंतु जो विरोध कर रहे हैं उनके भी राजनीतिक स्वार्थ हैं। यदि सभी धर्म इस बात पर अड़ जाएं कि उनमें प्रचलित किसी भी प्रथा को बदलने नहीं देंगे चाहे वह आज के दौर में अनुपयोगी , आपत्तिजनक और अव्यवहारिक ही क्यों न हो , तब सवाल ये है कि देश कैसे चलेगा ? और यदि देश के 80 फीसदी बहुसंख्यकों की धार्मिक और सामाजिक परम्पराओं और कानूनों को समयानुकूल बनाने के लिए बदला जा सकता है तो अल्पसंख्यकों को रियायत किस बात की ?

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 3 July 2023

चाचा - भतीजे की लड़ाई या मिलीभगत , कहना मुश्किल




महाराष्ट्र की राजनीति में गत दिवस  एक नया अध्याय जुड़ गया जब एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजीत पवार  एक बार फिर भाजपा के साथ हाथ मिलाकर उपमुख्यमंत्री बन गए। उनके साथ आठ अन्य एनसीपी विधायक भी मंत्री पद पा गए। अजीत का दावा है कि 53 में से 40 विधायक उनके साथ हैं । वहीं दूसरी ओर एनसीपी ने विधानसभा अध्यक्ष को मंत्री बने सभी विधायकों की सदस्यता समाप्त करने की अर्जी लगा दी है।  इस मामले का रोचक पक्ष ये है कि उपमुख्यमंत्री बनने के बाद अजीत बोले कि वे एनसीपी में हैं और अगला चुनाव भी इसी से लड़ेंगे। उनका यह कहना उन्हें दलबदल के आरोप से बचाने में काम आएगा। वाकई 40 विधायक साथ हैं तब तो वह विधायक दल का विधिवत विभाजन होगा किंतु  संख्या कम हुई और श्री पवार द्वारा अजीत एवं उनके साथ गए विधायकों पर अनुशासन की कार्रवाई करते हुए  हटा दिया तब वे  स्वतंत्र माने जायेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अजीत की बगावत के संकेत तो लंबे समय से मिल रहे थे किंतु शिंदे गुट के सदस्यों की अयोग्यता के खतरे को देखते हुए भाजपा ने इस घटनाचक्र को तेजी प्रदान कर दी। अजीत अपने चाचा के अघोषित उत्तराधिकारी माने जाते थे। लेकिन जबसे श्री पवार ने बेटी सुप्रिया सुले को उनके समानांतर खड़ा किया तभी से परिवार में खाई चौड़ी होने लगी। 2019 में भी अजीत ने भाजपा से हाथ मिलाकर सुबह - सुबह सरकार बनाई थी किंतु वह कोशिश श्री पवार के भावनात्मक कार्ड के कारण बेअसर हुई और दो दिन में ही उसका पटाक्षेप हो गया। हालांकि शिवसेना और कांग्रेस के साथ बनी सरकार में भी अजीत उपमुख्यमंत्री बनाए गए किंतु उनके मन में ये टीस बनी रही कि उनके मुख्यमंत्री बनने की संभावना को चाचा पलीता लगा देते हैं। शिंदे गुट की बगावत से उस सरकार का तो पतन हो गया किंतु भतीजे की अतृप्त महत्वाकांक्षाएं जोर मारती रहीं । इसका प्रमाण उनके हालिया बयान हैं जिनमें वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों के पक्ष में बोलते रहे। कुछ समय पहले जब श्री पवार ने पार्टी प्रमुख का पद छोड़ने की घोषणा की तब ऐसा लगा था कि वे विरासत अजीत को सौंपेंगे किंतु नाटकीय घटनाक्रम के बाद उन्होंने बेटी सुप्रिया और अपने बेहद करीबी प्रफुल्ल पटेल को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर अजीत को पूरी तरह निराश कर दिया। गत दिवस जो कुछ हुआ उसके पीछे एनसीपी में उत्तराधिकार के विवाद को ही कारण माना जा रहा है किंतु  छगन भुजबल और प्रफुल्ल पटेल का अजीत के साथ आना मामूली घटना नहीं है। हाल ही में श्री मोदी ने एनसीपी पर हजारों करोड़ के घपले के जो आरोप लगाए थे उनका निशाना अजीत ही थे। कल मंत्री बने कुछ चेहरे भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे हुए हैं । बगावत की खबर मिलने के बाद श्री पवार की प्रारंभिक प्रतिक्रिया से तो ऐसा लगा जैसे उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।  इतने बड़े विद्रोह के बाद वे आज सतारा में रैली करने जा रहे हैं। उनकी इस बेफिक्री  का  आकलन इतनी जल्दी करना कठिन है क्योंकि उनको जानने वाले ये कहने से नहीं चूक रहे कि इस सबके पीछे उन्हीं की चाल है जिसके जरिए वे अपने परिवार को भ्रष्टाचार के आरोपों से बचाने भतीजे के जरिए भाजपा के साथ जुड़े रहें।और दूसरी तरफ विपक्ष को भी इस भ्रम में रखें कि वे उसके साथ खड़े हैं। उल्लेखनीय है संसद के बजट सत्र में  अडानी मामले में जेपीसी गठन के लिए जब विपक्ष की ज्यादातर पार्टियां एकजुट होकर संसद को चलने नहीं दे रही थीं तब श्री पवार ये कहते हुए आगे आए कि वह मांग अर्थहीन है। यही नहीं तो उन्होंने गौतम अडानी के पक्ष में बयान तक दिया और बाद में उसके साथ लंबी मुलाकात  की। यही नहीं तो विपक्ष की बैठक के अलावा सार्वजनिक तौर पर वीर सावरकर के बारे में राहुल गांधी और कुछ अन्य नेताओं के बयानों पर ऐतराज भी व्यक्त किया  ।  इस घटनाचक्र को यदि श्री पवार द्वारा लिखित पटकथा का हिस्सा मान लिया जावे तो फिर यह  विपक्षी एकता की मुहिम के लिए  बड़ा धक्का है । यदि अजीत पिछली बार की तरह पलटी नहीं मारते तब भाजपा के लिए ये बड़ी राजनीतिक सफलता कही जायेगी जिसे शिंदे गुट के विधायकों की अयोग्यता संबंधी  आशंका खाए जा रही है। उद्धव गुट के प्रवक्ता संजय राउत का ये बयान भी काबिले गौर है कि जल्द ही राज्य को नया मुख्यमंत्री मिलेगा । हालांकि इस  समय किसी भी तरह का पक्का अनुमान नहीं लगाया जा सकता क्योंकि अभी श्री पवार का दांव देखना बाकी है। वे बेहद अनुभवी और चालाक राजनेता हैं। उनका पूरा जीवन इसी तरह की घात - प्रतिघात में बीता। वे ऊपरी तौर पर सबके दोस्त हैं किंतु भीतर से किसी के सगे नहीं। लेकिन यदि अजीत अपने दावे के अनुसार 40 विधायक तोड़ लाए तब चाचा की दशा ठीक वैसी ही होकर रह जायेगी जैसी 2017 में बेटे अखिलेश के तेवरों से स्व.मुलायम सिंह यादव की हो गई थी। बहरहाल चाल तो अजीत ने भी बहुत सोच - समझकर चली है क्योंकि उन्होंने और उनके साथियों ने  पार्टी नहीं छोड़ी है । चाचा - भतीजे की इस लड़ाई में भाजपा ने खुद को मजबूत कर लिया है। हालांकि उस पर आरोप लग रहा है कि जिन्हें वह  भ्रष्ट कह रही थी उनको भागीदार बना लिया। कांग्रेस के जयराम रमेश ने तो भाजपा को वाशिंग मशीन बताया जिसमें भ्रष्टाचार के दाग धुल जाते हैं। लेकिन आज की राजनीति में सत्ता ही सबका उद्देश्य है और इसलिए नैतिकता का उपदेश देने की पात्रता सभी खो बैठे हैं। लालू यादव जैसे नेताओं के साथ एकता  बैठक में बैठने वाले भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुंह खोलें ये  अटपटा लगता है । इसी तरह अरविंद केजरीवाल का राहुल गांधी से मिलने बेताब होना इस बात का प्रमाण है कि कोई नेता तभी तक भ्रष्टाचारी होता है जब तक दूसरे खेमे में रहे। जैसे ही वह अपने साथ आता है ,  दूध का धुला हो जाता है। भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही क्योंकि आज के राजनीति रूपी महाभारत में शत्रु पक्ष को पराजित करना ही धर्म है , फिर चाहे तरीका कोई भी क्यों न हो । अपने गुरू स्व.वसंत दादा पाटिल के साथ विश्वासघात कर सत्ता हासिल करने वाले शरद पवार को गुरु पूर्णिमा के एक दिन पहले ही उनके भतीजे द्वारा धोखा दिया जाना इतिहास के  दोहराए जाने का उदाहरण है। 2024 के महासंग्राम के पहले राजनीति के खिलाड़ियों से  ऐसे और भी दांव - पेच देखने मिलते रहेंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 1 July 2023

लाड़ली बहना जैसी दरियादिली पेट्रोल - डीजल पर भी दिखाई जाए




वंदे भारत रेलगाड़ी के शुभारंभ पर हाल ही में भोपाल प्रवास के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर जब राज्य सरकारों पर तीखा कटाक्ष किया तब वे भूल गए कि म.प्र.भी उन राज्यों में है जहां सबसे  महंगा पेट्रोल - डीजल बिकता है। उनके बयान पर विपक्ष ने तंज कसना  शुरू कर दिए । यहां तक कहा जाने लगा कि प्रधानमंत्री की उक्त टिप्पणी ने अपनी ही पार्टी की प्रदेश सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। ऐसा लगता है उनके दिमाग में राजस्थान घूम रहा था जिसका चुनावी दौरा वे बीते दिनों कर आए थे जहां पेट्रोल - डीजल के दाम काफी अधिक हैं । श्री मोदी का आज दोबारा म.प्र आगमन हुआ है।वे उमरिया के निकट आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करेंगे , जहां मौसम खराब होने से पिछली यात्रा में नहीं जा सके थे। ऐसा लगता है उनके आगमन को देखकर ही प्रदेश सरकार ने पेट्रोल - डीजल पर टैक्स घटाकर उनको सस्ता करने का संकेत दिया है। उससे कितना बोझ सरकार के खजाने पर पड़ेगा इसका आकलन किया जा रहा है । संभवतः जल्द ही प्रदेश वासियों को इस बारे में खुशखबरी मिलेगी। इसके पहले जब भी केंद्र सरकार ने पेट्रोल - डीजल सस्ते किए तब राज्य सरकार ने भी उस पर अमल किया। ये बात सर्वविदित है कि. म.प्र में पेट्रोलियम पदार्थों पर भारी करा रोपण होने से उनके दाम उ.प्र से कम हैं जिसका खामियाजा सीमावर्ती जिलों के पेट्रोल पंपों को होता है। उ.प्र जाने - आने वाले निजी और व्यावसायिक वाहन म.प्र में प्रवेश करने के पहले ही पूरी टंकी भरवा  लेते हैं। शराब के अलावा पेट्रोल - डीजल से मिलने वाला टैक्स राज्य सरकार की कमाई का बड़ा स्रोत है। लेकिन शराब और इसकी तुलना करना बेमानी है क्योंकि पेट्रोल - डीजल आज के समय की सबसे प्रमुख आवश्यकताओं में है। जिस व्यक्ति के पास अपना वाहन नहीं है वह भी ऑटो , बस या टेक्सी का उपयोग करता है। इसी तरह माल की ढुलाई में ट्रकों का उपयोग होता है। सड़कें बन जाने से छोटे - छोटे गांव और कस्बे तक पेट्रोल - डीजल चलित वाहन पहुंच चुके हैं। अब तो किशोरावस्था के बच्चे भी दोपहिया स्कूटी नुमा वाहन इस्तेमाल करते हैं। आवागमन के सार्वजनिक साधनों की कमी के चलते  निजी वाहनों का उपयोग मजबूरी बनता जा रहा है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों  को इनकी कीमतें कम रखने पर विचार करना चाहिए। हालांकि म.प्र सरकार यदि पेट्रोल - डीजल सस्ता करती है तो इसे प्रधानमंत्री की टिप्पणी और कुछ महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जायेगा लेकिन उपभोक्ताओं को चूंकि इससे लाभ मिलेगा इसलिए इसका स्वागत हर कोई करेगा। सभी जानते हैं कि पेट्रोल और - डीजल की वैश्विक कीमत कम हो जाने के बावजूद भारत में उन पर लगाया जाने वाला टैक्स कमरतोड़ है जिसे दूसरे शब्दों में मुनाफाखोरी कहना गलत नहीं होगा।केंद्र के साथ राज्य भी अपना कर थोपते हैं जिसका असर महंगाई बढ़ने के रूप में सामने आता है। सवाल ये है कि पेट्रोल - डीजल के दामों को  जब बाजार के उतार - चढ़ाव पर ही छोड़ने का नीतिगत फैसला लगभग दो दशक पहले कर लिया गया था तब क्या कारण है कि राजनीतिक नफे - नुकसान के मद्देनजर उनकी घट - बढ़ को केंद्र और राज्य सरकारें नियंत्रित करती हैं। पारदर्शिता का तकाजा है कि पेट्रोल - डीजल पर सरकार द्वारा लगाये  जाने वाले कर की राशि प्रति लीटर निश्चित कर दी जाए जिससे कि वैश्विक मूल्य बढ़ने पर भी टैक्स यथावत रहे। इससे जनता की नाराजगी भी दूर होगी और सरकार को अपनी आय में कमी की चिंता नहीं सताएगी। वैसे सबसे अच्छा विकल्प है पेट्रोल - डीजल , रसोई गैस और अन्य पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी में शामिल कर राजनीतिक प्रपंच से मुक्त कर दिया जाए। संचार क्रांति के इस युग में साधारण व्यक्ति को भी दुनिया - जहान की थोड़ी जानकारी रहती है। इसीलिए कच्चे तेल के मूल्य घटने - बढ़ने की बात भी छुपी नहीं रहती। सरकार की अपनी मजबूरियां हो सकती हैं किंतु बेहतर आर्थिक प्रबंधन के जरिए जनहित में रास्ता निकालना संभव है। शिवराज सरकार ने हाल ही में जो लाड़ली बहना योजना शुरू की उसकी प्रदेश भर में महिलाओं के बीच खूब प्रशंसा हो रही है । यदि प्रदेश सरकार ऐसी ही दरियादिली पेट्रोल - डीजल के दामों को लेकर भी दिखा दे तब केवल वाहन मालिक ही लाभान्वित नहीं होंगे अपितु व्यापार - उद्योग जगत भी इससे राहत अनुभव करेगा क्योंकि उसका सीधा असर महंगाई को रोकने पर पड़ेगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 30 June 2023

तब क्या राज्य का शासन जेल से चलेगा



तमिलनाडु के एक मंत्री  सेंथिल बालाजी  14 जून को भ्रष्टाचार के मामले में ईडी द्वारा गिरफ्तार  किए गए थे। उनकी न्यायिक हिरासत 12 जुलाई तक बढ़ा दी गई है। उसके बाद भी न तो उन्होंने इस्तीफा दिया और न ही मुख्यमंत्री स्टालिन ने उन्हें हटाने की पहल की। आज की भारतीय राजनीति में ये बेहद साधारण घटना कही जायेगी किंतु राज्यपाल आर. एन.रवि ने उक्त मंत्री को ये कहते हुए बर्खास्त करने का फैसला कर डाला कि पद पर रहते हुए वे जांच को प्रभावित कर रहे हैं। मंत्री की नियुक्ति या बर्खास्तगी यद्यपि करते राज्यपाल या राष्ट्रपति ही हैं लेकिन इसके लिए मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री की सिफारिश जरूरी मानी जाती है। इस प्रकरण में राज्यपाल की कार्रवाई पर विवाद इसलिए उठा क्योंकि उन्होंने बिना मुख्यमंत्री की सलाह के ही भ्रष्टाचार के मामले में फंसे मंत्री की बर्खास्तगी का फरमान जारी कर दिया। जब मुख्यमंत्री ने इसे अदालत में चुनौती देने की घोषणा की तब केंद्र सरकार की समझाइश पर राज्यपाल ने अपने निर्णय को स्थगित करते हुए एटार्नी जनरल से सलाह लेने के उपरांत आगे बढ़ने का फैसला किया। अब इस बात पर  बहस चल पड़ी है कि राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख होने के बावजूद क्या किसी मंत्री को बिना मुख्यमंत्री की सहमति के बर्खास्त कर सकते हैं ? आजादी के बाद अपनी तरह का ये पहला मामला होने से   कानूनी अनिश्चितता की स्थिति बन गई है। हालांकि राज्यपाल ही मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं और वे ही उनको शपथ भी दिलवाते हैं । लेकिन हमारे संविधान में निर्वाचित मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया होता है इसलिए संवैधानिक प्रमुख होने के बावजूद राज्यपाल और राष्ट्रपति के अधिकार सीमित होते हैं। इस प्रकरण में भी यदि राज्यपाल श्री रवि भ्रष्टाचार के आरोप में ईडी द्वारा गिरफ्तार मंत्री को मंत्री पद से हटाए जाने के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अपनी मंशा बताते तब दबाव श्री स्टालिन पर बना होता। राज्यपाल ने जो कार्रवाई की वह केंद्र के इशारे पर थी या स्वविवेक से किया गया फैसला , ये तो स्पष्ट नहीं है किंतु जिस तरह से उन्होंने अपने ही फैसले को स्थगित किया उससे स्पष्ट है केंद्र सरकार भी ये मान बैठी कि उक्त फैसला राजनीतिक तौर पर विवाद का कारण  बनने के साथ ही वैधानिक  दृष्टि से गलत साबित हो सकता है। इसीलिए बिना देर किए उस पर अमल रोक दिया गया। दरअसल मौजूदा राजनीतिक हालात में केंद्र सरकार तमिलनाडु की द्रमुक सरकार से टकराव को टालना चाहेगी। खैर , कानून की नजर में राज्यपाल के फैसले की वैधानिकता तय करना अदालत का काम है लेकिन इस प्रकरण का जो नैतिक पहलू है उस पर भी विचार किया जाना समय की मांग है। पहले ये परंपरा थी कि सरकार में बैठे किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी होने के पहले ही वह पद से इस्तीफा दे दिया करता था। म.प्र की पूर्व मुख्यमंत्री उमाश्री भारती ने कर्नाटक के हुबली शहर में 144 धारा तोड़ने के प्रकरण में गिरफ्तारी वारंट आने के बाद जब पुलिस उन्हें गिरफतार करने भोपाल आई तो इस्तीफा दे दिया जबकि वहां पहुंचते ही उनको  तत्काल रिहाई भी मिल गई। ये बात अलग है कि भाजपा की आंतरिक राजनीति के चलते वे दोबारा सत्ता में नहीं आ सकीं। और भी अनेक मामले हैं जिनमें सत्ताधारी मंत्री को गिरफ्तारी के चलते इस्तीफा देना पड़ा। उल्लेखनीय है शासकीय कर्मचारी या अधिकारी को सेवा शर्तों के अनुसार 48 घंटे तक हिरासत में रहने पर  निलंबित कर दिया जाता है। उस दृष्टि से मंत्री भी लोक सेवक है और सरकारी खजाने से  वेतन - भत्ते और अन्य सुविधाएं प्राप्त करता है। लिहाजा उसके बारे में भी ऐसा नियम क्यों नहीं है,  ये बड़ा सवाल है। राजनीति में डूबे लोग जब अपने सिर पर तलवार लटकती है तब राजनीतिक प्रतिशोध का हल्ला मचाते हुए बच निकलना चाहते हैं। तमिलनाडु के मंत्री ने जेल जाने पर यदि पद नहीं छोड़ा तो उसके लिए उनके सामने प्रेरणा के तौर पर उद्धव ठाकरे और अरविंद केजरीवाल सरकार के दो मंत्रियों के मामले थे जिन्हें जेल जाने के बावजूद मंत्री बनाए रखा गया । लेकिन तमिलनाडु का कोई सरकारी कर्मचारी अथवा अधिकारी यदि  सीबीआई , आयकर अथवा ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसी द्वारा गिरफ्तार कर जेल भेजा जाता तब भी क्या मुख्यमंत्री राजनीतिक दुर्भावना का आरोप लगाकर उसका निलंबन रोके रहते ? इस तरह के सवाल आजकल लगातार उठ रहे हैं। हालांकि इसके लिए किसी एक या कुछ राजनीतिक दलों को ही कठघरे में खड़ा करना पक्षपात होगा क्योंकि ज्यादातर का आचरण काफी कुछ एक जैसा हो चला है। स्व.लालबहादुर शास्त्री द्वारा रेल दुर्घटना होने पर मंत्री पद छोड़ देने का अनुसरण करने की अपेक्षा दूसरे दल से तो की जाती है किंतु खुद उस पर अमल करने कोई तैयार नहीं है। तमिलनाडु के राज्यपाल ने संविधान के अनुसार सही किया या गलत इसका फैसला सर्वोच्च न्यायालय को करना चाहिए जिससे भविष्य में ऐसा विवाद उत्पन्न न हो। लेकिन इसके साथ ही उसे  भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाने के बाद भी मंत्री को न  हटाए जाने की नई राजनीतिक शैली पर भी अपनी राय स्पष्ट शब्दों  में देना चाहिए क्योंकि कल को किसी मुख्यमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तारी के जेल जाना पड़े और वह त्यागपत्र देने से इंकार करे तब राज्य का शासन क्या जेल से चलेगा ? 


-रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 29 June 2023

वंदे भारत : किराया कम न हुआ तो यात्री नहीं मिलेंगे




प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश भर में वंदे भारत एक्सप्रेस का उद्घाटन कर रहे हैं। इस हेतु वे स्वयं संबधित शहर जाकर  ट्रेन को हरी झंडी दिखाते हैं। अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित यह रेलगाड़ी भारत के आर्थिक विकास का उदाहरण है। हालांकि भारतीय रेल विश्व का सबसे बड़ा नेटवर्क है किंतु विकसित देशों की तुलना में गुणवत्ता , सुरक्षा और समयबद्धता की दृष्टि से हम बहुत पीछे हैं । मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही मुंबई - अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन चलाने की योजना को मूर्त रूप देकर उस पर काम शुरू करवा दिया। उसके साथ ही प्रधानमंत्री ने व्यक्तिगत रुचि लेकर वंदे भारत नामक तेज गति से चलने वाली कुर्सी यान रेल गाड़ी चलाने की शुरुआत की जिसके बाद  हर माह विभिन्न राज्यों में वंदे भारत गाड़ी चलाने का सिलसिला जारी है। हाल ही में म.प्र में इंदौर - भोपाल और भोपाल - जबलपुर के बीच वंदे भारत एक्सप्रेस का शुभारंभ किया गया। 100 कि.मी और उससे भी तेज गति से चलने वाली इस रेलगाड़ी को देखने के लिए जनता हर स्टेशन पर उमड़ पड़ी। ढोल - धमाके के साथ इंजिन चालक और स्टाफ का स्वागत किया गया। इस सबसे यही लगता है कि आम जनता में रेलवे के आधुनिकीकरण को लेकर कितनी उत्सुकता है। प्रतिदिन करोड़ों लोगों के आवागमन का सबसे सस्ता और सुलभ साधन होने से रेलवे देश की जीवन रेखा कहलाती है। हर व्यक्ति चाहता है कि रेलवे का स्तर सुधरे , उसमें स्वच्छता और सुरक्षा के साथ ही लेट - लतीफी बंद हो तथा किसी भी गड़बड़ी के लिए जवाबदेही तय की जाए।  उस दृष्टि से वंदे भारत गाड़ियां अच्छा प्रयास कही जा सकती हैं । रेल मंत्री अश्विन वैष्णव बता चुके हैं कि श्री मोदी इन गाड़ियों को लेकर काफी गंभीर हैं और इनको रेलवे का भविष्य मानते हैं। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री की सोच दूरगामी और विकासमूल है।लेकिन जहां - जहां भी वंदे भारत गाड़ी चली वहां से जो खबरें मिल रही हैं वे उत्साह को ठंडा करने वाली हैं । इसका उदाहरण उद्घाटन के बाद इन गाड़ियों में यात्रियों की संख्या में देखी जा रही कमी है। कई शहरों में तो 800 - 900 क्षमता वाली इस गाड़ी में 100 से भी कम यात्री सफर करते देखे गए । इसका कारण जानने पर पता लगा कि अव्वल तो जिस गति से इस गाड़ी को चलाए जाने की बात कही जा रही थी वह  संभव नहीं हो पा रही क्योंकि आज भी पटरियों की हालत 160 कि.मी की रफ्तार  लायक नहीं है। इसके कारण जो सुपर फास्ट गाड़ियां पहले से चल रही हैं उनके और वंदे भारत द्वारा लिये जाने वाले समय में  ज्यादा अंतर नहीं आता। दूसरी बात इनकी समय सारणी भी उपयुक्त नहीं है। और सबसे बड़ी बात किराए की है जो मध्यमवर्गीय लोगों के लिए विलासिता या फिजूलखर्ची ही है। भोपाल से जबलपुर के बीच चलाई गई वंदे भारत को ही लें तो 1000 रु. की टिकिट व्यवहारिक नहीं है । समय की कुछ बचत बहरहाल अवश्य हो रही है किंतु रेलवे को ये  भी ध्यान रखना चहिए कि देश में विश्व स्तरीय सड़कों के बन जाने से उच्च मध्यमवर्गीय यात्री भी निजी वाहन से यात्रा करना पसंद करने लगे हैं । इसी तरह अनेक स्थानों से यात्रा करने पर हवाई टिकिट और रेल की  प्रथम श्रेणी वातानुकूलित टिकिट में ज्यादा अंतर नहीं बचा । थोड़ा सा  अतिरिक्त किराया देकर यदि यात्री का समय बचता है तब वह उड़कर जाना पसंद करता है। इंदौर और भोपाल के बीच टेक्सी सेवा  भी दशकों से चली आ रही है। ऐसे में वंदे भारत में  यात्रियों  को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धात्मक किराए रखने होंगे। जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं वहां वंदे भारत गाड़ियों को प्राथमिकता के आधार पर चलाया जा रहा है किंतु जब यात्री ,  किराए की राशि देखता है तब इस गाड़ी की सुंदरता , सुविधाएं और गति वगैरह उसे महत्वहीन लगने लगती हैं। और ये मान लेना भी भूल होगी कि संपन्न वर्ग इस गाड़ी का उपयोग करेगा क्योंकि उसके लिए किराया बेमानी होता है।  रेल से यात्रा करने वालों में सभी वर्गों के लोग होते हैं। वह देखते हुए वंदे भारत के किराए को व्यवहारिक बनाया जाना जरूरी है वर्ना ये गाड़ियां रेलवे के लिए सफेद हाथी साबित होकर रह जायेंगी। चूंकि इनसे प्रधानमंत्री का नाम जुड़ा हुआ है इसलिए रेलवे का ये दायित्व बन जाता है कि वह अब तक चलाई गईं समस्त वंदे भारत रेल गाड़ियों से यात्रा कर चुके  यात्रियों की संख्या के आंकड़े एकत्र कर इस बात की समीक्षा करे कि इसे  कितना प्रतिसाद मिला है। यदि रेलवे को लगता है कि वंदे भारत गाड़ियां उसके अनुमान और आकलन के मुताबिक सही परिणाम दे रही हैं तब बात और है । अन्यथा इसके किराए को युक्तयुक्तिपूर्ण बनाया जाना चाहिए वरना ये गाड़ियां अपनी उपयोगिता खो बैठेंगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी