Friday, 4 August 2023

ज्ञानवापी : होगा तो वही जो अदालत तय करेगी लेकिन .....



यदि सर्वोच्च न्यायालय ने रोक न लगाई तो अलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार एएसआई ( भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ) वाराणसी स्थित ज्ञानवापी मस्जिद का वैज्ञानिक सर्वे करेगा। उच्च न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष द्वारा खुदाई से  ढांचे को होने वाले नुकसान की आशंका जताए जाने पर एएसआई को निर्देश दिया कि सर्वे के अत्याधुनिक तरीके अपनाए जाएं जिससे इमारत को किसी तरह की क्षति न पहुंचे। एएसआई ने भी अदालत को आश्वस्त किया है कि आजकल बिना फर्श खोदे या दीवारों की ऊपरी परत को खुरचे भी भीतरी जानकारी हासिल करना संभव है। उल्लेखनीय है अयोध्या में खुदाई इसलिए हुई थी क्योंकि विवादित स्थल पर कोई इमारत नहीं थी। उस दृष्टि से अलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश प्रीतिंकर दिवाकर का निर्णय सच्चाई को जानने की  दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा। उन्होंने कहा भी कि न्याय हित में यह जरूरी है।  सर्वोच्च न्यायालय भी संभवतः इस पर रोक नहीं लगाएगा क्योंकि उच्च न्यायालय ने ढांचे को नुकसान पहुंचाए बिना सर्वे के लिए कहा है। हालांकि अब तक जो भी तथ्य सामने आए हैं वे इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि ज्ञानवापी मस्जिद काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर का ही एक हिस्सा है जिस पर मुगल काल में जबरन कब्जा कर मस्जिद खड़ी कर दी गई। कुछ समय पहले जब वजू खाने में शिवलिंग होने की बात सामने आई तब भी दीवारों और स्तंभों पर हिंदू धार्मिक प्रतीकों की बात उजागर हुई थी। देश - विदेश के अनेक पुरातत्व विशेषज्ञों और इतिहासकारों ने भी इस बात को माना है कि ज्ञानवापी ,  विश्वनाथ मंदिर के हिस्से में ही बनाई गई और ऐतिहासिक शिवलिंग भी इसके नीचे दबा हो सकता है। एक नंदी प्रतिमा भी है जो मस्जिद की तरफ मुंह करते हुए खड़ी है जिसके आधार पर हिंदू पक्ष का दावा है कि भीतर शिव लिंग है। बहरहाल चूंकि न्यायालय के आदेशानुसार सर्वे होगा और उसमें मस्जिद के ढांचे को क्षति न पहुंचे इसकी सावधानी रखी जाएगी तब एतराज करने की बजाय मुस्लिम पक्ष को  सहयोग करना चाहिए । ज्ञानवापी के अलावा मथुरा की शाही मस्जिद का मामला भी  ऐसा ही है। ये दोनों हिंदुओं की  आस्था के  बड़े केंद्र हैं। इनको लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद बना रहे तो ये भावी पीढ़ियों के लिए भी तकलीफदेह होगा। होना तो ये चाहिए था कि स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद एक निश्चित समयावधि में ऐसे सभी मामलों को सुलझा लिया होता जिससे कि व्यर्थ के तनाव न पैदा होते। उस समय देश की बागडोर जिनके हाथों थी ,  उनकी बात को कोई नहीं टालता । लेकिन उन्होंने इसकी जरूरत नहीं समझी और दूसरी बातों में उलझे रहे। दरअसल अल्पसंख्यकों को खुश करने के फेर में तमाम ऐसे फैसले टाले जाते रहे जो देश के दूरगामी हितों के लिए आवश्यक थे। संदर्भित धर्मस्थलों के बारे में भी ऐसा ही हुआ। उल्लेखनीय है जिस अयोध्या विवाद के लिए भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद को कसूरवार ठहराया जाता है वह तो स्व .पं.जवाहरलाल नेहरू और स्व. पं. गोविंद वल्लभ पंत के रहते ही शुरू हो चुका था किंतु उसे साधारण मुकदमा मानकर अदालती दायरे में छोड़ दिया गया।   दशकों बाद जब  ये मुद्दा राजनीतिक बना तब जाकर लोगों की नींद खुली। यदि शुरू में ही मुस्लिम पक्ष को ये समझाइश सभी बड़े नेता देते कि वे इतिहास में हुई ज्यादतियों को स्वीकार कर भविष्य में शांति और सद्भाव का  वातावरण बनाने में सहयोग दें तो अब तक बहुत कुछ ठीक हो गया होता । लेकिन दुर्भाग्य ये रहा कि दूसरों पर राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाने वाले राजनीतिक नेता खुद वोटों के लालच में  फंस गए। किसी भी सुव्यवस्थित देश में अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा एक मानवीय जरूरत है।  भारत का संविधान इसकी गारंटी देता है। लेकिन क्या कारण था जो हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान की प्रस्तावना में धर्म निरपेक्ष (सेकुलर) शब्द नहीं जोड़ा और 1976 में जब पूरा विपक्ष जेल में था तब स्व. इंदिरा गांधी ने संविधान संशोधन करते हुए सेकुलर शब्द को प्रस्तावना का हिस्सा बनाया। इसका आशय ये लगाया जा  सकता है कि स्वाधीनता संग्राम में शामिल रहे  तमाम तत्कालीन नेताओं को सेकुलर होने का ढिंढोरा पीटने की जरूरत महसूस नहीं हुई । लेकिन इंदिरा जी का दौर आते - आते वैसा करना जरूरी हो गया और फिर ज्यादातर पार्टियों ने धर्म निरपेक्षता का लबादा ओढ़ लिया। कहने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस को ही इसका सबसे ज्यादा नुकसान हुआ और मुस्लिम मतों पर उसका एकाधिकार धीरे - धीरे घटता चला गया । जिससे उ.प्र, बिहार और प. बंगाल जैसे राज्यों में उसकी दयनीय स्थिति  हो गई जहां मुस्लिम आबादी 20 से 30 फीसदी तक है। कहने का आशय ये है कि मुस्लिम तुष्टीकरण भी अब चुनाव जीतने का  औजार नहीं रह गया । ये कहना भी गलत न होगा कि  भाजपा को सर्वोच्च शिखर तक पहुंचाने में इन तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों का ही योगदान है जो मुसलमानों के खैरख्वाह बने रहने का दिखावा करने के साथ ही हनुमान गढ़ी से प्रचार शुरू करते हैं और मंदिर मठों में जाकर मत्था टेकते हैं। मुसलमानों को चाहिए वे इस दोहरे रवैए से खुद को दूर करें। ज्ञानवापी का प्रकरण चूंकि अदालत की निगरानी में है इसलिए उसका फैसला तो अब वहीं से होना ठीक रहेगा किंतु मुस्लिम पक्ष को इस बारे में जय - पराजय के भाव से ऊपर उठकर आगे आना चहिए। आज के हालात में मुसलमान नेतृत्व विहीन हो गए हैं । केवल भाजपा को हराने के उद्देश्य से कभी इसके तो कभी उसके पीछे घूमते रहने से अपना महत्व खो बैठे हैं। यदि मुस्लिम कौम अपनी तरक्की चाहती है तो उसे शिक्षा जैसे क्षेत्र में आगे बढ़ने पर ध्यान देना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर उनका राजनीतिक दोहन तो खूब हुआ किंतु सामाजिक और आर्थिक स्तर पर वह पिछड़ गई । ज्ञानवापी एक अवसर है उस पिछड़ेपन को दूर करने की दिशा में कदम उठाने का । वरना वही होगा जो अब तक उनके साथ होता आया है अर्थात वे वोट बैंक बने रहकर भी बदहाली में जीने मजबूर रहेंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 3 August 2023

मेवात में बढ़ते अपराधों का परिणाम है नूंह का दंगा



देश की राजधानी दिल्ली से कुछ घंटे की दूरी पर स्थित नूंह जिला हरियाणा के मेवात इलाके में स्थित है , जहां तीन चौथाई आबादी मेव मुसलमानों की है। कहा जाता है कि उनके पूर्वज राजपूत थे जिन्होंने मुस्लिम शासनकाल में  इस्लाम अपना लिया। इसीलिए लंबे समय तक वे हिंदू रीति - रिवाजों से जुड़े रहे। लेकिन अब वह स्थिति नहीं है। हाल ही में वहां सांप्रदायिक दंगा होने के बाद  मेवात क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो गया । एक हिंदू संगठन द्वारा निकाली गई धार्मिक यात्रा पर पत्थर फेंके जाने के बाद उत्पन्न तनाव ने दंगे  का रूप ले लिया। और फिर वही सब हुआ जो ऐसे अवसरों पर होता है। मसलन गोलियां चलीं , घर , दुकानें और वाहन जलाए गए। लेकिन इस सबके बीच ये चौंकाने वाली बात हुई कि दंगाइयों की भीड़ अनेक थानों के सामने से निकलती हुई सायबर थाना पहुंची और उसे आग लगा दी । इसकी वजह ये बताई जा रही है कि उक्त थाने में इस इलाके के विभिन्न अपराधिक प्रकरणों के दस्तावेजी प्रमाण संरक्षित थे। इसलिए दंगे के बहाने उन प्रमाणों को नष्ट किए जाने का सुनियोजित प्रयास हुआ। इसमें दो मत नहीं है कि नूंह की घटना में प्रशासन और पुलिस की लापरवाही ने आग में घी का काम किया । वरना  छतों से पथराव होते ही पुलिस बल हरकत में आ जाता तब बात आगे न बढ़ती । कई घंटों तक दंगाई उत्पात मचाते रहे जिससे ये साबित हो गया कि पुलिस और प्रशासन दोनों अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रहे। लेकिन घूम - फिरकर बात वहीं  आ जाती है कि किसी को भी किसी और के धार्मिक आयोजन में व्यवधान डालने या उस पर हमला करने का अधिकार कौन देता है ? जिन लोगों की पत्थर फेंकते हुए तस्वीरें सार्वजनिक हुईं वे किस समुदाय के थे ये बताने की आवश्यकता नहीं रही क्योंकि कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने का जो चलन शुरू हुआ वह इस समुदाय विशेष की राष्ट्रव्यापी पहिचान बन गया। दिल्ली में हुए दंगों के दौरान भी ये देखने मिला था। उसके बाद से हिंदुओं के धार्मिक आयोजनों पर पत्थर फेंके जाने जैसी घटनाएं देश के विभिन्न हिस्सों में होने लगीं। धर्म निरपेक्ष तबका ऐसे समय पर हिंदू संगठनों को तो कठघरे में खड़ा करता है किंतु क्या कभी किसी ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के पास जाकर ये समझाइश देने का साहस किया कि वे  छतों से पत्थर फेंकने जैसी हरकत बंद करवाने आगे आएं। वैसे अनेक मुस्लिम संगठन हैं जो ऐसे अवसरों पर संवेदनशील रवैया अपनाते हुए सर्वधर्म समभाव का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इसी तरह ईद के दिन ईदगाहों के बाहर बधाई देने वालों में भी हिंदुओं की संख्या रहती है किंतु इसके पीछे राजनीतिक दिखावा ज्यादा होने से जिस गंगा -जमुनी संस्कृति की बात कही जाती है वह केवल भाषणों तक ही सीमित है। हरियाणा में मुस्लिम आबादी मुख्य रूप से मेवात अंचल तक ही है। लेकिन जिस तरह से नूंह में हुए दंगे की आग पड़ोसी राजस्थान और राष्ट्रीय राजधानी से सटे गुरुग्राम ,  फरीदाबाद, पलवल तक फैली उससे ये संदेह पैदा हो गया है कि उक्त धार्मिक यात्रा पर पथराव करना किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा था। ऐसे मौकों पर होने वाली राजनीति भी समाधान की बजाय समस्याओं को और बढ़ाती है । और ये भी कि सूचनातंत्र के फैलाव के कारण एक जगह की घटना पूरे देश में चर्चित हो जाती है। नूंह के साथ भी यही हुआ। संसद का सत्र चलने के कारण भी राजनीतिक सरगर्मी और तेज हो गई। लेकिन जैसी खबरें आ रही हैं उनके अनुसार मेवात अपराधों के लिए कुख्यात हो चला है। यहां गो तस्करी और गोकशी बढ़ती जा रही है जबकि एक समय ऐसा भी था जब मेव  गाय को पवित्र मानते थे। इसके अलावा यहां सट्टे का कारोबार भी जोरों पर है। सायबर अपराधों के मामले  में तो नूंह काफी  आगे है और इसीलिए ये माना जा रहा है कि दंगे की आड़  में सायबर थाना फूंकने जैसा काम किया गया। कुल मिलाकर ये देखने में आया है कि लगभग 80 फीसदी मुस्लिम आबादी वाला यह इलाका कानून - व्यवस्था के लिए बड़ी समस्या बनता जा रहा है। वहां हुई घटना इस बात का प्रमाण है कि घनी मुस्लिम आबादी वाले इलाके अपराधियों की शरणस्थली बनते जा रहे हैं। लेकिन इस सबसे अलग हटकर देखें तो देश की राजधानी के इतने करीब इस तरह की घटना होना गंभीर स्थिति का संकेत  है। शाहीन बाग वाली ताकतें केवल दिल्ली तक ही सीमित नहीं रहीं अपितु पूरे देश में उनका विस्तार हो चुका है। सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस ये तो कह दिया कि  धार्मिक रैलियों में दिए जाने वाले भाषणों की वीडियो रिकॉर्डिंग करवाई जाए किंतु जो भाषण चहारदीवारी के भीतर होते हैं उनकी रिकॉर्डिंग संभव नहीं है। ऐसे में जरूरी हो गया है कि दंगाइयों की पहिचान कर उन्हें इतनी कड़ी सजा मिले जिससे भविष्य में ऐसा करने से लोग बचें। आगामी वर्ष देश में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं । हरियाणा के पड़ोसी राजस्थान में तो कुछ माह बाद विधानसभा चुनाव भी हैं। वहां भी सांप्रदायिक माहौल खराब  करने के प्रयास होते रहे हैं। केंद्र और राज्य दोनों की सरकार के लिए ये समय बेहद चुनौती भरा है क्योंकि दंगे देश की प्रगति और छवि दोनों को नुकसान पहुंचाते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 2 August 2023

लोकतंत्र का तकाजा : वैचारिक विभिन्नता व्यक्तिगत शत्रुता में न बदले




गत दिवस पुणे  में लोकमान्य तिलक की पुण्य तिथि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार तिलक  स्मारक मंदिर ट्रस्ट द्वारा  दिया जाता है। प्रधानमंत्री इस पुरस्कार से सम्मानित होने वाले 41वें व्यक्ति हैं। इससे पहले यह  डॉ. शंकर दयाल शर्मा ,  प्रणब मुखर्जी, अटल बिहारी वाजपेयी, इंदिरा गांधी , मनमोहन सिंह, मशहूर व्यवसायी एन आर नारायणमूर्ति तथा ‘मेट्रो मैन' ई श्रीधरन को भी प्रदान किया जा चुका है। उक्त न्यास का संचालन लोकमान्य तिलक के परिवार द्वारा किया जाता है। इसको लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ। हालांकि विवाद तो श्री मोदी को पुरस्कृत करने पर भी नहीं था।  लेकिन हाल ही में एनसीपी नेता शरद पवार  के भतीजे अजीत  अनेक विधायकों सहित भाजपा से हाथ मिलाकर महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री बन बैठे। ऐसे में जब ये बात सामने आई कि श्री पवार उक्त आयोजन के मुख्य अतिथि होंगे तब उनकी अपनी पार्टी के अलावा कांग्रेस और शिवसेना ने भी मांग की कि उनको प्रधानमंत्री के साथ एक ही मंच पर नहीं बैठना चाहिए। श्री पवार ने इस बारे में अंत तक चुप्पी साधे रखी किंतु आखिर में वे  शामिल हुए ।   विपक्षी नेताओं ने  समारोह में नहीं जाने का अनुरोध करने हेतु उनसे मिलना चाहा किंतु उन्हें समय नहीं दिया गया ।  श्री पवार के धड़े वाली एनसीपी भी गत दिवस पुणे में प्रधानमंत्री के विरोध में हुए प्रदर्शन में शरीक रही। लेकिन इस सबको नजरंदाज करते हुए उन्होंने  उक्त समारोह का मुख्य आतिथ्य स्वीकार किया । इन दिनों  संसद के भीतर मोदी सरकार और विपक्ष में तनातनी  से सदन चल नहीं पा रहा।  इसी परिप्रेक्ष्य में भाजपा विरोधी अनेक नेताओं का मानना रहा कि श्री पवार द्वारा प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा किए जाने से विपक्षी एकता के प्रयासों को धक्का पहुंचेगा । दरअसल महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी नामक गठबंधन में कांग्रेस , शिवसेना और एनसीपी प्रमुख घटक हैं। शिवसेना में विभाजन के बाद अघाड़ी पहले ही कमजोर हो गई थी। एनसीपी के टूटने के बाद तो उसकी ताकत और भी कम हो गई। ऐसे में शिवसेना और कांग्रेस को ये डर सता रहा है  कि कहीं श्री पवार भी  भाजपा के करीब न चले जाएं। हालांकि वे मोदी सरकार की नीतियों की  आलोचना करते रहते हैं किंतु उसके बाद भी विपक्षी गठबंधन के साथियों के दबाव को नकारते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री को सम्मानित किए जाने वाले आयोजन में  शामिल होकर प्रमाणित कर दिया कि वे कितने सुलझे हुए राजनेता हैं। वैसे भी श्री पवार देश के उन बचे -  खुचे नेताओं में से हैं जिनके निजी संबंध लगभग प्रत्येक पार्टी और उसके नेताओं से है। उनके जन्मदिन पर आयोजित समारोह में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के साथ ही स्व.चंद्रशेखर भी एक साथ शामिल हुए थे। अनेक अवसरों पर श्री मोदी के साथ भी  उन्होंने मंच साझा किया। ऐसे में गत दिवस का कार्यक्रम कोई अनोखा नहीं था। लेकिन  जिस तरह उसमें जाने से श्री पवार को रोका गया वह राजनीति में घटती सौजन्यता का प्रमाण है। इंडिया नामक  गठबंधन में ऐसे अनेक दल हैं जो एक दूसरे को फूटी आंखों नहीं सुहाते। आम आदमी पार्टी और  तृणमूल कांग्रेस पार्टी का कांग्रेस से छत्तीस का आंकड़ा है किंतु फिर भी वे एक दूसरे के साथ बैठ रहे हैं। किसी नेता के यहां विवाह या शोक के अवसर पर भी  वैचारिक विरोधी नेतागण निःसंकोच पहुंचते हैं। एक दूसरे की निजी परेशानियों में भी संवेदनशीलता दिखाई जाती है। तिलक सम्मान  समारोह तो वैसे भी  एक महापुरुष की स्मृति में आयोजित होता है। ऐसे में श्री पवार को उसमें जाने  से महज इस कारण से रोकना  कि उसमें श्री मोदी  को पुरस्कृत किया जाना था , छोटी सोच है। स्मरणीय है मोदी सरकार द्वारा  स्व. मुलायम सिंह यादव को पद्म विभूषण से अलंकृत किए जाने के बाद उनके पुत्र अखिलेश यादव ने राष्ट्रपति भवन में उक्त सम्मान ग्रहण किया। जबकि वे भाजपा के घोर विरोधी हैं। ऐसा ही तब हुआ था जब स्व. पी.वी.नरसिम्हा राव की सरकार ने भी स्व. अटल जी को पद्म विभूषण प्रदान किया था।  प्रजातंत्र की खूबसूरती भी यही है कि वैचारिक विभिन्नता व्यक्तिगत शत्रुता में न बदले। उस दृष्टि से श्री पवार द्वारा  अच्छा उदाहरण पेश किया गया।  देखने में आता है कि किसी नेता की मृत्यु होने के बाद घोर विरोधी रहे नेता भी उसकी तारीफों के पुल बांधते हैं । ऐसे में जीवित अवस्था में घृणा और द्वेष रखना अटपटा लगता है। विपक्ष का प्रधानमंत्री से विरोध स्वाभाविक है। लेकिन  किसी गैर राजनीतिक आयोजन में उनके साथ मंच  साझा नहीं करने की बात नासमझी है।  देश में जबसे कांग्रेस का एकाधिकार खत्म हुआ तभी से राजनीतिक छुआछूत भी मिटती चली गई। लेकिन अब भी कुछ दलों के भीतर ये भावना विद्यमान है।  जिन लोगों ने श्री पवार को कल के आयोजन में जाने से रोका वे उसी मानसिकता से ग्रसित हैं । ऐसे में श्री पवार की प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने अपने साथियों की मांग के विरुद्ध जाकर  खुद को लोकमान्य के अपमान के आरोप से बचा लिया। ऐसा ही तब भी हुआ था जब कांग्रेस के न चाहते हुए भी पूर्व राष्ट्रपति स्व.प्रणब मुखर्जी नागपुर में रास्वसंघ के विजयादशमी उत्सव में शामिल हुए थे। जबकि उनकी बेटी तक उनके विरोध में थी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी 



Tuesday, 1 August 2023

संसद को बाधित कर अपना नुकसान कर रहा विपक्ष




संसद में काम नहीं हो रहा। हंगामे के कारण कार्रवाई लगातार स्थगित हो रही है। विपक्ष मणिपुर पर चर्चा चाहता है किंतु चर्चा किस नियम के अंतर्गत हो इस पर विवाद  है।  विपक्ष का आरोप है कि सरकार चर्चा से भाग रही है , वहीं सत्ता पक्ष का कहना  है कि उसकी रुचि चर्चा में नहीं अपितु हंगामा  करने के बहाने खोजना है। जैसा कि होता आया है दोनों पक्ष अपनी - अपनी बात पर अड़े हुए हैं । परिणाम स्वरूप प्रश्नकाल पूरा होते ही शोर -  शराबा शुरू  होने पर अध्यक्ष कार्रवाई स्थगित करने बाध्य हो जाते हैं। हालांकि ये कोई नई बात नहीं है। पिछले सत्रों में भी ऐसा होता आया है। यहां तक कि बजट जैसा महत्वपूर्ण सत्र भी ढंग से नहीं चला। राज्यों की विधानसभाओं में भी ऐसे  दृश्य आम हो चले हैं। हर सत्र के पहले सदन के पीठासीन अधिकारी सर्वदलीय बैठक आमंत्रित करते हैं। उसमें पूरे सत्र की कार्यसूची पर विमर्श होता है और सरकार के साथ ही विपक्षी दल भी सदन सुचारू रूप से चलाने पर सहमति दिखाते हैं । लेकिन  सत्र शुरू होते ही विवाद प्रारंभ हो जाता है। विपक्ष किसी न किसी मुद्दे पर सरकार को घेरना चाहता है वहीं  सरकार उसके हमले से  बचाव में लग जाती है। इस दौरान दोनों को इस बात की फिक्र नहीं रहती कि करोड़ों रुपए खर्च कर आयोजित किए जाने वाले सत्र का बहुमूल्य समय नष्ट हो रहा है। इस स्थिति के लिए दोनों ही पक्ष बराबर के दोषी हैं क्योंकि संसद में आज का सत्तापक्ष जब विरोध में हुआ करता था तब उसने भी अनेक सत्र हंगामे की बलि चढ़वाए थे। स्व. अरुण जेटली ने कहा भी था कि सदन को न चलने देना भी विरोध का तरीका है। जहां तक बात सत्ता पक्ष की है तो उसके लिए तो यही अच्छा है कि सदन में बहस  हो ही नहीं और वह हंगामे के दौरान ही  विधेयक वगैरह पारित करवाने के बाद मौका मिलते ही सत्रावसान की घोषणा करवा दे । लेकिन इससे विपक्ष को बहुत नुकसान होता है। वह जब किसी चीज की जिद लेकर बैठ जाता है तो सदन की कार्यवाही ठप्प हो जाती है जो सरकार के लिए तो  राहत भरा होता है। लेकिन सदन के जरिए जनता तक अपने विचार पहुंचाने का  अवसर  वह गंवा बैठता है। और यही गलती संसद के मौजूदा सत्र में भी उसके द्वारा दोहराई गई। मणिपुर पर चर्चा से सरकार ने इंकार तो किया नहीं परंतु प्रधानमंत्री के बयान पर अड़े रहने से चर्चा झमेले में फंसकर रह गई। रही बात किस नियम के अंतर्गत चर्चा हो , तो निश्चित तौर पर ये तय करना बहुमत प्राप्त सत्ता पक्ष के ही अधिकार में होता है । कांग्रेस जब सत्ता में रही तब उसने भी विपक्ष की हर मांग मान ली हो ऐसा नहीं था।  आज जब वह विपक्ष में है और वह भी बेहद दयनीय हालत में , तब उसके लिए सरकार को झुका पाना संभव नहीं रहा । और ऐसी स्थिति में उसके लिए फायदेमंद रहता यदि वह  सरकार की पसंद के नियमानुसार चर्चा पर पूरे विपक्ष को राजी कर लेती । ऐसे में वह सरकार को घेरकर अपनी बात रख सकती थी किंतु बीच में उसने ये कहते हुए अविश्वास प्रस्ताव  पेश कर दिया कि इसी बहाने वह प्रधानमंत्री को सदन में बोलने के लिए बाध्य कर सकेगी। अभी तक तो उसका ये दांव भी कारगर नहीं रहा क्योंकि मणिपुर को लेकर विपक्ष जो कहता आया है और सदन में भी कहेगा , वह सब सर्वोच्च न्यायालय में कहा और सुना जा रहा है। अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में भी वही सब बातें उठेंगी जो सर्वोच्च न्यायालय में सरकार और याचिकाकर्ता द्वारा कही जा रही हैं । संसद में भी सत्ता पक्ष ये कहते हुए अनेक बातों को खुलासा करने से बचेगा कि मामला न्यायालय के विचाराधीन है। ये सब देखते हुए कहना गलत न होगा कि विपक्ष जोश में होश खोकर अपना नुकसान कर बैठा। उसे ये समझना चाहिए कि सरकार के पास लोकसभा में अच्छा - खासा बहुमत होने से उसे अविश्वास प्रस्ताव को लेकर कोई चिंता नहीं है। और कांग्रेस के सहयोगी तक इस बात से नाराज हो उठे कि प्रस्ताव पर उनसे सहमति नहीं ली गई । दिल्ली अध्यादेश पर भी विपक्ष में एक राय नहीं बन सकी। मणिपुर पर  चर्चा तो सत्र के पहले दिन ही हो सकती थी किंतु विपक्ष अपने ही बनाए जाल में फंसकर रह गया जिससे धीरे - धीरे मुद्दा ठंडा पड़ता जा रहा है। आगामी वर्ष लोकसभा चुनाव होने वाले हैं । इस सत्र के बाद संसद का एक शीतकालीन सत्र होगा और उसके बाद का बजट सत्र महज औपचारिकताओं और विदाई में बीत जायेगा । बजट भी अंतरिम ही पेश होगा जिस पर सरकार को घेरने की गुंजाइश ही नहीं रहेगी। ऐसे में विपक्ष को चाहिए,   इस सत्र के जितने भी दिन शेष हैं उनका समुचित उपयोग कर ले । वरना हो - हल्ले में ही पूरा समय बीत जाने के बाद  उसके हाथ कुछ नहीं लगेगा। रही बात अविश्वास प्रस्ताव की तो उसका हश्र चूंकि सबको पता है इसलिए उसके बारे लोगों  की ज्यादा रुचि रह भी नहीं गई है।

-रवीन्द्र वाजपेयी 


Monday, 31 July 2023

म.प्र में आदिवासियों के नेतृत्व को उभरने नहीं दिया गया




म.प्र आदिवासी बहुल प्रदेश है। लगभग 47 विधानसभा सीटें तो अनु.जनजाति के लिए आरक्षित हैं किंतु इनके अलावा भी 25 से 30 सीटों पर हार -  जीत आदिवासियों पर निर्भर  हैं। 2018 में कांग्रेस ने 47 में से 30 सीटों पर जीत हासिल कर भाजपा का खेल बिगाड़ दिया था। इसीलिए इस बार वह आदिवासी क्षेत्रों में पूरी ताकत झोंक रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शहडोल दौरा इसका सबूत है। दूसरी तरफ कांग्रेस भी पीछे नहीं है। राहुल गांधी भी आदिवासी बहुल क्षेत्र में आने वाले हैं। गत दिवस कांग्रेस ने इंदौर में आदिवासी सम्मेलन किया ।  इस अवसर पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा आदिवासियों को जूते , चप्पल और छाता देने की घोषणा पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वे कोई भिखारी नहीं हैं। उसके साथ ही उन्होंने आदिवासी बहुल  अपने निर्वाचन क्षेत्र छिंदवाड़ा का उल्लेख कर दावा किया कि वहां आदिवासियों के लिए जो काम उन्होंने करवाए उन्हें बतौर मॉडल अपनाया जाना चाहिए। हालांकि नेताओं द्वारा चुनाव के मौसम में छोड़े जाने वाले बयानों के तीर तो चलते ही रहते हैं किंतु आदिवासियों को जूते , चप्पल और छाता देने की बात  पर व्यंग्य करने की कोई जरूरत नहीं थी। उल्टे श्री नाथ को इस बात पर अफसोस करना चाहिए था  आदिवासी समुदाय इतना पिछड़ा कैसे रह गया कि आजादी के 75 साल बाद भी उसे जूते , चप्पल और छाते देने की जरूरत पड़ रही है। यद्यपि ऐसा नहीं है कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास का कोई कार्य नहीं हुआ। सड़कें , बिजली और पानी जैसी सुविधाएं वहां भी पहुंची हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं की स्थिति भी पहले  से  सुधरी है और राजनीतिक दृष्टि से भी वे काफी जागरूक हुए जिसका प्रमाण उनके अपने सामाजिक और राजनीतिक संगठन बनना है। चुनाव में वे भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों के साथ सौदेबाजी करने लगे हैं।  सच्चाई ये है कि बड़ी पार्टियां आदिवासियों के मत तो बटोरना चाहती हैं किंतु उनके बीच नेतृत्व को उभारने के प्रति उदासीन हैं। कहने को केंद्र में अनेक आदिवासी मंत्री हुए । झारखंड में भी शिबू सोरेन ,बाबूलाल मरांडी , अर्जुन मुंडा और हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी को कमान मिली। लेकिन म.प्र में आदिवासी कांग्रेस नेता स्व.शिवभानु सिंह सोलंकी के पक्ष में बहुमत होते हुए भी  स्व.अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री बनाए गए। कहने का आशय ये कि अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर से तो नेतृत्व उभरा जिसके कारण केंद्र और राज्य दोनों में उस वर्ग का दबदबा है किंतु आदिवासी समुदाय इस मामले में पीछे रह गया। कमलनाथ को ही लें तो छिंदवाड़ा में अनेक आदिवासी विधायक बने  किंतु जब राजनीतिक उत्तराधिकार की बात आई तो श्री नाथ ने पहले पत्नी अलका नाथ और फिर बेटे नकुल नाथ को ही चुना। आज म.प्र में एक भी आदिवासी नेता ऐसा नहीं है जिसकी प्रादेशिक स्तर पकड़ हो। और इसका कारण है उनको दबाकर  रखा जाना ।  श्रीमती  द्रौपदी मुर्मू को जब राष्ट्रपति पद हेतु एनडीए द्वारा नामांकित किया तब होना तब ये अपेक्षित था कि सभी विपक्षी दल उनके निर्विरोध निर्वाचित होने का रास्ता प्रशस्त करते। हालांकि अनेक पार्टियां श्रीमती मुर्मु के साथ खड़ी हो गईं किंतु कांग्रेस ने यशवंत सिन्हा को समर्थन दे दिया। आजादी के अमृत महोत्सव के समय  यदि बेहद साधारण पृष्ठभूमि  से आई एक आदिवासी महिला सर्वसम्मत से राष्ट्रपति चुनी जाती तो वह सामाजिक समरसता का बेहतरीन उदाहरण होता। ऐसे ही अनेक वाकयों के कारण सीधे - सादे  और शांत कहे जाने   इस वर्ग की भावनाएं आहत होने लगीं जिसका लाभ  ईसाई मिशनरियों और नक्सलियों ने उठाते हुए उनके मन में विद्रोह के बीज बोए । भले ही सांस्कृतिक तौर पर आदिवासी समाज अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है किंतु धर्मांतरण के जरिए उसे मुख्यधारा से काटने का जो षडयंत्र आधी सदी से ज्यादा चला उसे कांग्रेस ही नहीं अपितु अन्य विपक्षी दलों खासकर वामपंथियों ने भी समर्थन और  संरक्षण प्रदान किया। यही वजह है कि इस समुदाय में भीतर - भीतर गुस्सा पनप रहा है। यद्यपि आरक्षण ने उनके आर्थिक , शैक्षणिक और सामाजिक उत्थान में काफी सहायता की किंतु उसकी भी अपनी सीमाएं हैं । और इसीलिए आज भी आदिवासी पिछड़ेपन के शिकार हैं। राजनीति के करीब आने से उनमें चैतन्यता तो आई किंतु सक्षम नेतृत्व के अभाव में आज भी वे पिछलग्गू बनने बाध्य हैं। ऐसे में श्री नाथ द्वारा  उनको जूते ,चप्पल और छाता जैसी चीज देने पर कटाक्ष करना राजनीतिक तौर पर साधारण बात है किंतु सदियों से जल , जंगल और जमीन से जुड़ा शांत और संयमी समाज यदि नंगे पांव चलने बाध्य है तो फिर उसका विद्रोही होना गलत नहीं है । और ये भी कि  उनके बीच असंतोष की आग सुलगाने का अवसर ईसाई मिशनरियों और नक्सलियों को  हमारी सामूहिक उदासीनता ने ही दिया है। आदिवासी क्षेत्रों के विकास के नाम पर बीते 75 साल में जितना धन खर्च हुआ उससे  वहां का पिछड़ापन पूरी तरह मिट जाना चाहिए था किंतु नेताओं और नौकरशाहों की संगामित्ती में हुई लूटमार से स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका। आजादी का अमृत महोत्सव मनाते समय यह स्थिति मन को कचोटती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 29 July 2023

अर्थव्यवस्था मजबूत होने के साथ प्रति व्यक्ति आय बढ़ना भी जरूरी





प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2024 में  सत्ता में लौटने के आत्मविश्वास के साथ भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने की जो बात कही गई उस पर तरह - तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। कुछ लोगों ने उनके दावों को कोरा आशावाद बताया तो एक वर्ग ऐसा भी है जो भारत के आर्थिक महाशक्ति बनने के उनके विश्वास को न सिर्फ सही मानता है , अपितु ये भी कि उन्होंने अब तक जो कुछ लिया उससे देश की आर्थिक स्थिति सुधरी है। लेकिन देश के पूर्व वित्त मंत्री और वरिष्ट कांग्रेस नेता पी.चिदंबरम ने श्री मोदी के बयान पर बोलते हुए कहा कि ये तो  गौरव की बात है कि भारत आज विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है किंतु जब तक प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा इस अनुपात में आकर्षक नहीं होता तब तक इस तरह के दावे पूरे होने के बाद भी वह अर्थव्यवस्था का आदर्श रूप नहीं होगा। पूर्व वित्त मंत्री के अनुसार अर्थव्यवस्था की मजबूती नापने का सबसे अच्छा पैमाना प्रति व्यक्ति आय है । और यदि भारत विश्व भर में अपनी समृद्धि का ढिंढोरा पीटना चाहता है तब उसे अर्थव्यवस्था को इस तरह ढालना होगा जिससे आर्थिक विषमता अर्थात  गरीब - अमीर की माली हैसियत में जमीन और आसमान वाला अंतर खत्म हो सके। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो  उन्होंने प्रधानमंत्री के कथन पर एक तरह से कटाक्ष ही किए जो बतौर विपक्षी सांसद अपेक्षित भी हैं । गौरतलब है , भारत में जब आर्थिक उदारीकरण आया था तब डा.मनमोहन सिंह के साथ ही श्री चिदम्बरम भी नई आर्थिक नीतियों  के शिल्पकार रहे। उस दृष्टि से ये माना जा सकता है कि बीते लगभग तीन दशक के दौरान अर्थव्यस्था में आए उतार - चढ़ावों पर उनकी नजर रही है। उस दृष्टि से उन्होंने जो टिप्पणी प्रधानमंत्री के बयान पर की वह विचारणीय है। दुनिया में प्रति व्यक्ति आय के जो अधिकृत आंकड़े हैं उनके अनुसार भारत वैश्विक स्तर पर 128 वें स्थान पर है। इसका सीधा - सीधा अर्थ है कि 127 देश ऐसे हैं जिनमें प्रति व्यक्ति का आंकड़ा भारत से बेहतर है। ऐसे में श्री चिदम्बरम द्वारा उठाया गया मुद्दा हमारे नीति - निर्माताओं और सत्ता में आसीन नेताओं के लिए चुनौती है । यद्यपि  बीते एक दशक में भारत में प्रति व्यक्ति कमाई में वृद्धि हुई है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि कोरोना संकट खत्म होने के बाद से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में आम आदमी के पास पूर्वापेक्षा अधिक पैसा आ रहा है किंतु जिस अनुपात में अर्थव्यवस्था सुधरी उसे देखते हुए प्रति व्यक्ति आय  में आशाजनक सुधार नहीं होना ये दर्शाता है कि समृद्धि का बंटवारा इकतरफा है। अर्थात पहले से संपन्न  और सुदृढ़ हुए , जबकि पंक्ति के अंतिम  छोर पर खड़ा व्यक्ति आगे आने का इंतजार करता रह गया। हालांकि इस बारे में भी कुछ  विरोधाभास हैं,  क्योंकि बेरोजगारी और प्रति व्यक्ति आय के जो उपलब्ध आंकड़े हैं उनका सत्यापन करने का कोई प्रामाणिक तरीका अब तक नहीं बन सका। वस्तुस्थिति ये है कि करोड़ों लोग असंगठित क्षेत्र में कार्यरत होने से न तो उनके रोजगार संबंधी जानकारी मिल पाती है और न आय की। उदाहरण के लिए घरेलू काम करने वाले पुरुष और महिलाओं के बारे में सरकारी और निजी एजेंसियां अनभिज्ञ रहती हैं इसी तरह सड़क किनारे खोमचा लगाकर खाने - पीने की चीजें बेचने वाले , टपरा रखकर नाई का काम और कपड़ों पर इस्त्री करने वाले भी हर जगह मिल जाते हैं जिनकी गणना सरकारी सांख्यिकी का हिस्सा नहीं बन पाती। आजकल कार ड्राइवरों को भी अच्छा वेतन मिलता है।  स्वरोजगार से जुड़े लाखों ऐसे लोग हैं जिनकी अच्छी खासी आय होने के बाद भी वे सरकारी रिकार्ड में बेरोजगार बनकर गरीबी रेखा वाले सारे लाभ ले रहे हैं। ऐसी विसंगतियां बड़े पैमाने पर हैं जिनके चलते  आयुष्मान योजना में ऐसे लोग भी शामिल हो गए हैं जो संपन्न वर्ग की श्रेणी में गिने जाते हैं। बावजूद इसके ये कहना गलत नहीं है कि भारत में प्रति व्यक्ति आय की स्थिति शर्मनाक है। भले ही महंगी कारें और विलासिता के अन्य सामान धड़ल्ले से बिक रहे हैं , पर्यटन स्थलों पर भीड़ रिकार्ड तोड़ रही है , हवाई यात्री बढ़ रहे हैं , मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे विदेश पढ़ने जाने लगे हैं , डेस्टिनेशन शादियों पर पैसा बहाया जा रहा है । लेकिन दूसरी तरफ 80 करोड़ लोगों को खाद्य सुरक्षा योजना के अंतर्गत मुफ्त अनाज बांटा जा रहा है। 1000 - 1500 की नगदी करोड़ों बूढ़े  और  निराश्रित लोगों के खाते में जमा की जा रही है । इस सबसे एक तरफ तो जहां सरकार की संवेदनशीलता प्रकट होती है वहीं दूसरी तरफ ये गरीबी के बोलते हुए आंकड़े हैं। उस दृष्टि से भारत को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में सम्मानजनक स्थान मिलने के प्रयासों के साथ ही  प्रति व्यक्ति आय बढ़ाकर गरीबी मिटाने का राष्ट्रीय अभियान छेड़ा जाना चाहिए । काम करने वाला कोई व्यक्ति निठल्ला नहीं बैठे इसकी समयबद्ध कार्य योजना बनाकर आर्थिक विषमता मिटाने का बीड़ा यदि उठा लिया जाए तो।आगामी दस सालों  के भीतर प्रति व्यक्ति आय बढ़ाई जा सकती है जो कि अर्थव्यवस्था की मजबूती का सबसे पुख्ता प्रमाण होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 28 July 2023

राजस्थान के चुनाव में लाल डायरी बनेगी मुद्दा



राजस्थान सरकार के एक पूर्व मंत्री राजेंद्र गुढ़ा इन दिनों चर्चा में हैं। मंत्री रहते हुए सचिन पायलट के साथ उनका जुड़ाव रहा। एक रैली में तो उन्होंने अशोक गहलोत सरकार को अब तक की सबसे भ्रष्ट प्रदेश सरकार बताकर सनसनी फैला दी। लेकिन मुख्यमंत्री ने उन्हें फिर भी  मंत्री पद से नहीं हटाया और न ही कोई टिप्पणी की। संभवतः वे श्री पायलट को आक्रामक होने का कोई अवसर नहीं देना चाहते थे। लेकिन मणिपुर में महिलाओं के साथ हुई अपमानजनक घटना पर मुख्यमंत्री की आलोचनात्मक टिप्पणी के बाद उक्त मंत्री ने आरोप लगाया कि राजस्थान भी महिला उत्पीड़न के मामले में सबसे आगे है। जब उनके तीर ज्यादा जहर बुझे हो चले तब श्री गहलोत ने उनको पद से हटा दिया और उसके बाद वे विधानसभा में एक लाल डायरी लेकर अध्यक्ष से उलझते हुए चिल्लाने लगे कि उसमें गहलोत सरकार के करोड़ों रुपए के घपलों का बखान है। सत्ता पक्ष के विधायकों के साथ उनकी झूमाझटकी हुई और फिर उनको सदन से निलंबित कर दिया गया। इसके बाद श्री गुढ़ा ने नाटकीय अंदाज में अपनी व्यथा पत्रकारों को सुनाई और दावा किया कि वे अभी और पोल खोलेंगे। कांग्रेस के लिए उनके आरोपों का खंडन करना भी कठिन हो रहा है क्योंकि कुछ दिन पहले तक तो वे खुद सरकार का हिस्सा रहे। विधानसभा से निलंबित होने के बाद उन्होंने एक मंत्री पर  बलात्कारी होने का इल्जाम लगाते हुए यहां तक कह दिया कि राजस्थान सरकार के तमाम मंत्री बलात्कारी हैं और इसे प्रमाणित करने के लिए उनका नार्को टेस्ट करवाया जाना चाहिए। लेकिन इस प्रकरण में अब तक श्री पायलट का सामने नहीं आना चौंकाता है क्योंकि श्री गुढ़ा मंत्री रहते हुए भी खुलकर उनके साथ रहते हुए गहलोत सरकार पर भ्रष्टाचार सहित अन्य आरोप लगाते रहे। इसी तरह ये भी बड़ा सवाल है कि जब श्री गुढ़ा ने गहलोत सरकार को अब तक की सर्वाधिक भ्रष्ट सरकार कहा और वह भी श्री पायलट के मंच से तब मुख्यमंत्री ने उनके विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं की ? वह तो जब कांग्रेस हाईकमान ने श्री गहलोत और सचिन के बीच समझौता करवा दिया तब उनको मंत्री पद से बर्खास्त किया गया। इसमें दो राय नहीं है कि श्री गुढ़ा ने पानी में रहकर मगर से दुश्मनी करने का दुस्साहस किया। लेकिन उनको भी इस बात का स्पष्टीकरण देना चाहिए कि जिस सरकार को वे अब तक की सबसे  भ्रष्ट सरकार बताते रहे , उसे छोड़ने की नैतिकता उन्होंने क्यों नहीं दिखाई ? भ्रष्टाचार के सबूतों का जो विवरण  कथित लाल डायरी में होने का दावा श्री गुढ़ा करते हुए  आंसू बहा रहे हैं उसका खुलासा पहले क्यों  नहीं किया गया इसका जवाब भी उनसे अपेक्षित है। राजस्थान उन राज्यों में से है जहां कुछ माह बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर है। जाहिर है सरकार अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीट रही है  और विपक्ष उस पर नाकामी के साथ भ्रष्ट होने का आरोप लगा रहा है। इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं है। कांग्रेस आलाकमान द्वारा दी गई समझाइश के बाद यद्यपि श्री पायलट ने  अपने सभी अस्त्र - शस्त्र उठाकर रख लिए जिनका उपयोग वे मुख्यमंत्री के विरुद्ध बीते दो सालों से करते आ रहे थे। लेकिन श्री गुढ़ा पूरी तरह से छुट्टा बने रहे। श्री पायलट ने उनको भी युद्धविराम हेतु राजी क्यों नहीं किया ये भी सोचने वाली बात है। मंत्री पद से बर्खास्त किए जाने के बाद श्री गुढ़ा पहले से ज्यादा आक्रामक  हो उठे और विधानसभा से निलंबित होने के बाद से  जिस तरह रो - रोकर खुद को हरिश्चंद्र का अवतार साबित करने पर तुले हैं वह देखकर हंसी भी आती है और गुस्सा भी। एक व्यक्ति  सरकार का हिस्सा रहते हुए उसे सबसे भ्रष्ट बताए और उससे चिपका भी रहे ये बात विरोधाभासी है। यदि श्री गहलोत उनको बर्खास्त करने की कार्रवाई न करते तो शायद श्री गुढ़ा अभी तक उस सरकार में मंत्री बने रहते जिसके मंत्री उनके अनुसार बलात्कारी हैं। लाल डायरी नामक जिस दस्तावेज को श्री गुढ़ा द्वारा गहलोत सरकार के काले कारनामों का पुलिंदा बताया जा रहा है उसकी सच्चाई  सामने आनी चाहिए । बेहतर हो राजस्थान उच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेते हुए उसकी जांच करवाए क्योंकि जब सरकार में रहा हुआ एक व्यक्ति चिल्ला - चिल्लाकर उसी  को कठघरे में खड़ा करे तो उसे पूरी तरह नजरंदाजकरना उचित नहीं होगा।  आम तौर पर सरकार या पार्टी से हटाए जाने के बाद कोई नेता उसके विरुद्ध मुंह खोलता है। लेकिन श्री गुढ़ा तो सरकार में रहकर भी उसके विरोध में बोलते रहे और वहीं बातें मंत्री पद छिन जाने के बाद भी कह रहे हैं। यदि उनकी बातों में थोड़ी सी भी सच्चाई है तो फिर ये मुख्यमंत्री श्री गहलोत और कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनाव में जबरदस्त नुकसानदायक रहेगा । 

- रवीन्द्र वाजपेयी