Saturday, 2 September 2023

इंडिया : हाथ मिलने के बाद भी दिल मिलते नहीं दिख रहे


2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए बनाए गए इंडिया नामक विपक्षी दलों के गठबंधन की तीसरी बैठक गत दिवस मुंबई में संपन्न हुई । इसमें एक बार फिर ये भाव उभरकर आया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने के लिए गैर भाजपाई दलों की एकता ही एकमात्र उपाय है। बैठक से हासिल क्या हुआ ये कह पाना तो कठिन है  लेकिन जुड़ेगा भारत जीतेगा इंडिया,  जैसा नारा जरूर तय हो गया। इसके अलावा 14 सदस्यों वाली समन्वय समिति भी गठित हुई किंतु  संयोजक पर मतैक्य न होने से  निर्णय को टाल दिया गया।  इसका कारण विभिन्न नेताओं की महत्वाकांक्षाओं में टकराव को माना जा रहा है । वैसे तो सभी नेता कहते रहे हैं कि वे इस पद हेतु दावेदार नहीं हैं किंतु वास्तविकता ये है कि कांग्रेस येन केन प्रकारेण अपना संयोजक बनाना चाहती है किंतु आम आदमी पार्टी जैसे छोटे दल भी कांग्रेस की अगुआई में काम करने के इच्छुक नहीं हैं । पार्टी के एक दो नेताओं ने तो अरविंद केजरीवाल को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने तक की मांग कर डाली।  बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी संयोजक  बनने के लिए लालायित हैं । लेकिन भीतरी तौर पर लालू प्रसाद यादव  उनके नाम पर राजी नहीं हैं जो नीतीश को राष्ट्रीय  नेता बनते नहीं देखना चाहते। एक परेशानी ये भी है कि यदि मल्लिकार्जुन खरगे या नीतीश संयोजक बनते हैं तो ये शरद पवार खेमे को अपमानजनक महसूस होगा । हालांकि ये भी सही है कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर कांग्रेस छोड़ राकांपा बनाए जाने का उनका दांव गांधी परिवार भूला नहीं है। और फिर अडानी मामले में जेपीसी की मांग को निरर्थक बताने और फिर वीर सावरकर के बारे में आलोचनात्मक टिप्पणियां करने से राहुल गांधी को रोकने जैसे उनके कदमों से भी कांग्रेस चौकन्ना है। अपने  भतीजे अजीत के भाजपा की गोद में बैठ जाने के बावजूद उनसे मिलते रहने की  वजह से वे अन्य विपक्षी नेताओं के बीच भी अविश्वसनीय हो चले हैं।  ऐसे में इंडिया के लिए संयोजक तय करना मुश्किल होता जा रहा है। यही समस्या सीटों के बंटवारे को लेकर है। श्री केजरीवाल ने बैठक में ये मांग कर डाली कि इस मुद्दे पर तत्काल फैसला किया जाए । लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गई। जिस  तरह की जानकारी अंदरखाने से आई हैं उनके अनुसार कांग्रेस संयोजक और सीट बंटवारे को म.प्र,छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव तक टालना चाहती है। दरअसल उसे उम्मीद है कि वह कर्नाटक की तरह से ही उक्त तीनों राज्य जीतने जा रही है । और तब संयोजक और सीट बंटवारे के निर्णय में उसका हाथ ऊपर रहेगा। इस प्रकार भले ही राहुल  गांधी कितनी भी  उदारता दिखाते हुए विपक्षी एकता के प्रति समर्पण भाव व्यक्त करें किंतु गठबंधन का स्वरूप नैसर्गिक कम कृत्रिम ज्यादा नजर आ रहा है । दूसरे शब्दों में कहें तो ये मजबूरी से उपजी जरूरत है। यही वजह है कि मोदी विरोध के नाम पर एक साथ बैठने के बाद भी  नेता और सीटों के बंटवारे  पर निर्णय नहीं हो पा रहा। इस बारे में अनेक राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही पचास से ज्यादा नेता इंडिया की बैठक में  शामिल होते हैं किंतु जब श्री मोदी के मुकाबले के लिए किसी को सामने लाने का सवाल उठता है तब एक खालीपन महसूस होने लगता है। गठबंधन में ये डर भी देखा जा रहा है कि संयोजक को प्रधानमंत्री पद का चेहरा मान लिए जाने से पूरा मुकाबला इकतरफा हो जाएगा क्योंकि व्यक्तित्व के मामले में प्रधानमंत्री सब पर भारी पड़ते हैं। मुंबई में हुई बैठक के पहले जो माहौल बनाया गया उसे देखकर लग रहा था कि उसमें ठोस निर्णय होंगे किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ और पांच सितारा होटल में बैठकर गरीबी और बेराजगारी पर केंद्र सरकार की आलोचना कर बैठक खत्म हो गई। गठबंधन की पटना बैठक के बाद श्री पवार की पार्टी टूट गई और मुंबई के जमावड़े के दौरान ही संसद के विशेष सत्र की खबर ने खलबली पैदा कर दी। उस पर भी कपिल सिब्बल के बिना बुलाए पहुंच जाने के कारण पैदा हुआ विवाद इस बात का संकेत दे गया कि हाथ मिलाए जाने के बावजूद अभी दिल नहीं मिले।  अगली बैठक कब होगी और संयोजक बनेगा या केवल समन्वय समिति बनाकर सामूहिक नेतृत्व का प्रयोग होगा , इन प्रश्नों का उत्तर फिलहाल नहीं मिल रहा। सीटों के बंटवारे को जिस तरह से कांग्रेस टरका रही है उसकी वजह से भी अविश्वास बरकरार है। आम आदमी पार्टी जिस प्रकार से दबाव बना रही है उससे  बाकी पार्टियां भी परेशान हैं क्योंकि श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री बनने की है जिसे न कांग्रेस भाव देगी , न ही ममता बैनर्जी और नीतीश कुमार। जिन तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव आगामी महीनों में होने जा रहे हैं उनमें आम आदमी पार्टी जिस प्रकार से पैर पसार रही है उससे कांग्रेस परेशान है । लेकिन श्री केजरीवाल को रोकने का साहस भी नहीं बटोर पा रही। ऐसा लगता है संसद के विशेष सत्र  की घोषणा ने गठबंधन को रुको , देखो और फिर आगे बढ़ने के लिए बाध्य कर दिया है। मुंबई बैठक के तकरीबन बेनतीजा खत्म होने से ये बात साबित भी हो गई।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 1 September 2023

विशेष सत्र बुलाने के पीछे कारण भी विशेष ही होगा




हालांकि जब तक कार्यसूची की घोषणा न हो जावे तब तक  कहना कठिन है कि 18 से 22 सितंबर तक आयोजित  संसद के विशेष सत्र के पीछे का उद्देश्य क्या है ? गत रात्रि ज्योंही उक्त खबर आई त्योंही राजनीति में रुचि रखने वालों के साथ ही आम जनता में भी इस बात की उत्सुकता उत्पन्न हुई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस कदम के जरिए कौन सा धमाका करना चाह रहे हैं ?  पहले - पहल संकेत मिला कि आजादी के अमृत काल के उपलक्ष्य में विशेष सत्र के दौरान सार्थक और रचनात्मक विमर्श होगा । कुछ देर बाद ही जानकारी आई कि कुछ विशेष विधेयक इस सत्र के दौरान पेश किए जा सकते हैं जिनमें समान नागरिक संहिता  और जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने  के अलावा संसद और विधानमंडलों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण प्रदान करना है। समाचार माध्यमों में व्यक्त की गई संभावनाओं के अनुसार आगामी लोकसभा चुनाव में ज्यादा मतदाताओं वाले निर्वाचन क्षेत्र से एक पुरुष और एक महिला   सांसद चुने जाने का प्रस्ताव  पारित किया जावेगा। संसद के नए भवन के शुभारंभ से ही इस आशय की अटकलें लगाई जाने लगी थीं कि सांसदों की संख्या बढ़ाई जावेगी। चूंकि नया परिसीमन अभी 3 वर्ष दूर है इसलिए 2024 के चुनाव के लिए  तदर्थ उपाय के जरिए महिला आरक्षण को अमल में लाए जाने की कोशिश की जा सकती है । लेकिन आज सुबह ज्योंही ये खबर आई कि एक देश एक चुनाव , की संभावनाएं तलाशने हेतु एक उच्च स्तरीय समिति गठित की गई है जिसकी अध्यक्षता पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ गोविंद करेंगे , त्योंही तमाम अटकलों को दिशा मिल गई।  हालांकि इतने कम समय में  समिति की रिपोर्ट आना और उसके अनुसार एक देश एक चुनाव की व्यवस्था को लागू कर पाना आसान काम नहीं है किंतु प्रधानमंत्री श्री मोदी की कार्यशैली में चूंकि जबरदस्त गोपनीयता रहती है लिहाजा बड़ी बात नहीं , वे विपक्ष को चौंकाते हुए एक देश एक चुनाव जैसा बड़ा निर्णय संसद के विशेष सत्र के दौरान ही करवाने का दांव चल दें । जहां तक बात समान नागरिक संहिता की है तो उसे लेकर भले ही राजनीतिक दलों में मतभेद हों किंतु महिला आरक्षण का जो विधेयक लंबे समय से लंबित पड़ा हुआ है उसे पेश किए जाने पर विपक्ष का जो गठबंधन आकार ले रहा है उसके सामने भी धर्मसंकट की स्थिति हो जायेगी। उल्लेखनीय है अतीत में इस विधेयक को संसद में जब भी पेश किया गया तब मंडल  राजनीति के पोषक लालू प्रसाद यादव , स्व .मुलायम सिंह यादव और स्व.शरद यादव ने जमकर विरोध किया। यहां तक कि भाजपा नेत्री उमा श्री भारती भी उसके विरोध में थीं। शरद यादव ने तो मंत्री से छीनकर विधेयक फाड़ तक दिया था। इनकी मांग थी कि महिलाओं को संसद और विधानमंडलों में एक तिहाई आरक्षण देने के साथ ही उसमें ओबीसी वर्ग एक हिस्सा तय किया जावे। जबकि भाजपा ,  कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां चाह रही थीं कि पहले विधेयक पारित कर लिया जावे और उसके बाद बाकी के संशोधन हों । सहमति न बन पाने की वजह से वह विधेयक आज तक अटका पड़ा है। ऐसे में यदि मोदी सरकार विशेष सत्र में उसे लेकर आती है तब भाजपा में तो विरोध की आवाज शायद ही उठे और  कांग्रेस तथा वामपंथी दल भी उहापोह की स्थिति में होंगे।ममता बैनर्जी भी महिलाओं की नाराजगी मोल लेने का जोखिम शायद ही उठाएं। समान नागरिक संहिता तो भाजपा के घोषणापत्र का स्थायी हिस्सा रहा है। 370 , राममंदिर और तीन तलाक जैसे फैसलों के बाद यही मुख्य मुद्दा शेष है। संसद का गणित  भी भाजपा के पक्ष में है जो अनेक अवसरों पर साबित हो  चुका है।  बहरहाल एक देश एक चुनाव का फैसला संसद में किए जाने के बाद उसे तत्काल लागू करना कितना संभव होगा ये कह पाना कठिन है लेकिन श्री  मोदी और गृह मंत्री  अमित शाह के मन की थाह ले पाना किसी के बस की बात नहीं। इसलिए पूर्व राष्ट्रपति को उस हेतु गठित समिति का अध्यक्ष बनाया जाना महत्वपूर्ण है । छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव ने एक देश एक चुनाव का व्यक्तिगत तौर पर स्वागत करते हुए ये तक कह दिया कि ये विचार काफी पुराना है। यद्यपि विपक्ष की आम प्रतिक्रिया विशेष सत्र को लेकर आलोचनात्मक ही है। बिना विषय सूची का खुलासा हुए ही एक देश एक चुनाव के सुझाव का विरोध किया जाना ये साबित करता है कि विपक्ष भी इससे हतप्रभ रह गया है। क्या होगा , क्या नहीं ये तो फिलहाल श्री मोदी और श्री शाह ही जानते होंगे किंतु ऐसे में जबकि कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों का कार्यक्रम अंतिम रूप ले चुका है तब अचानक संसद का  विशेष सत्र आयोजित करना मोदी सरकार की किसी विशेष कार्ययोजना का हिस्सा होना निश्चित है क्योंकि प्रधानमंत्री की हर बात और काम किसी न किसी दूरगामी सोच पर आधारित होता है और वे अपने फैसलों से न सिर्फ विपक्ष अपितु आम जनता को भी चौंका देते हैं। ये देखते हुए अचानक से ये फैसला निश्चित तौर पर किसी बड़े नीतिगत निर्णय की ओर बढ़ाया कदम है जिसका खुलासा कार्यसूची उजागर होते ही हो जाएगा। वैसे इंडिया गठबंधन का ये कहना गलत नहीं है कि केंद्र सरकार विपक्षी एकता की प्रतिक्रिया स्वरूप ये सब कर रही है। रसोई गैस के दाम घटाए जाने पर भी ऐसे ही बयान आए थे। लेकिन चुनावी रणनीति के लिहाज से इसमें कुछ भी नया नहीं है। स्व. इंदिरा गांधी की राजनीतिक शैली भी विपक्ष को चौंकाने वाली थी। सत्ता में बैठे नेता और पार्टी के साथ ये सुविधा तो रहती ही है कि वह अपनी नीतियों और निर्णयों को लागू कर सके। उस दृष्टि से श्री मोदी भी वही कर  रहे हैं। जिन राज्यों में चुनाव के नगाड़े बज उठे हैं वहां के मुख्यमंत्री भी आए दिन ऐसे फैसले ले रहे हैं जिनसे विपक्ष का हमला कमजोर पड़े। प्रधानमंत्री इस विशेष सत्र के जरिए देश की राजनीति को किस दिशा में मोड़ना चाहते हैं ये अभी तो अज्ञात है किंतु संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने के पीछे कारण भी विशेष ही होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 30 August 2023

गहलोत का आरोप गंभीर : न्यायपालिका को उनसे सबूत मांगना चाहिए


राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्री उदय. यू . ललित के सामने कहा था कि अदालतें  बड़े वकीलों के चेहरे देखकर फैसले देती हैं। उसी तरह की बात वहां मौजूद केंद्र के पूर्व कानून मंत्री किरण रिजजु ने भी कही। लेकिन श्री ललित ने उसका कोई प्रतिवाद नहीं किया ।  जल्द ही वे  सेवानिवृत्त भी हो गए और वह बात लगभग भुला दी गई। उसके बाद श्री रिजजू को उस मंत्रालय से हटा भी दिया गया। इस पर वे तो खामोश हो गए लेकिन गत दिवस श्री गहलोत एक बार फिर न्यायपालिका पर ये कहते हुए हमलावर हो उठे कि उसमें भयंकर भ्रष्टाचार है और कुछ वकील जो लिखकर लाते हैं वैसा ही फैसला आ जाता है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि भ्रष्टाचार निचली से ऊपरी अदालत तक व्याप्त है। और देश वासियों को इस बारे में सोचना चाहिए। ये बात पूरी तरह सही है कि न्यायपालिका के बारे में कानून के जानकारों के अलावा आम लोगों में भी श्रद्धा और विश्वास पहले से काफी घटा है। हमारे देश की फिल्मों में भी न्यायाधीशों की अपराधी तत्वों के साथ मिलीभगत के दृश्य दिखाए जाते रहे हैं। बड़े वकीलों  से अदालतों के प्रभावित होने की अवधारणा भी जनमानस में स्थापित हो चुकी है। लेकिन श्री गहलोत  सामान्य व्यक्ति न होकर राजस्थान जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री हैं।  यदि उन जैसा व्यक्ति न्यायपालिका में भयंकर भ्रष्टाचार की बात सार्वजनिक रूप से कहे तो उसे उपेक्षित किया जाना न संभव है और न ही उचित। न्यायपालिका और सरकारों के बीच अधिकारों के अतिक्रमण का विवाद लंबे समय से  चला आ रहा है। श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार के कुछ अहम निर्णयों को जब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उलट दिया गया तब  बात प्रतिबद्ध न्यायपालिका तक जा पहुंची थी । वामपंथी मानसिकता के कुछ न्यायाधीशों ने भी खुलकर उसका समर्थन किया। धीरे - धीरे ये शिकायत आम होने लगी कि न्यायपालिका अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर निकलकर विधायिका और कार्यपालिका के क्षेत्राधिकार में अतिक्रमण कर रही है। कालेजियम व्यवस्था पर संसद के सर्वसम्मत निर्णय को जिस तरह सर्वोच्च  न्यायालय ने रद्द किया उसके बाद से ये चर्चा आम हो गई। श्री रिजजू ने इसी संदर्भ में श्री ललित के सामने ही कहा था कि न्यायाधीश यदि न्याय देने से हटकर एग्जीक्यूटिव का काम करेंगे तो फिर समूची व्यवस्था पर फिर से विचार करना पड़ेगा। लेकिन देश के वरिष्ट राजनेता और  मुख्यमंत्री श्री गहलोत ने न्यायपालिका में भयंकर भ्रष्टाचार होने की जो टिप्पणी की वह बेहद गंभीर और इस बात का संकेत भी कि दूसरों को कठघरे में खड़ा करने वाली न्यायपालिका भी अब घेरे में आ रही है। कार्यपालिका के कार्यों में उसके अवांछित हस्तक्षेप  का आरोप तो फिर भी राजनीतिक मानकर दरकिनार किया जाता रहा लेकिन जब एक मुख्यमंत्री नीचे से ऊपर तक न्यायपालिका को भयंकर भ्रष्ट बता रहा हो तब भी यदि न्यायपालिका खामोश रहती है तब ये माना जाएगा कि वह अपराधबोध से ग्रसित हो गई है। सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश श्री डी.वाय.चंद्रचूड़ अपने पूर्ववर्तियों से अलग हटकर काफी सख्त और मुखर हैं और किसी दबाव में नहीं आते। उनका कार्यकाल भी काफी लंबा है। उस दृष्टि से ये अपेक्षित है कि वे श्री गहलोत की बात  का संज्ञान लेते हुए उन्हें तलब कर पूछेंगे कि सार्वजनिक तौर पर  न्यायपालिका में सबसे भयंकर भ्रष्टाचार  के आरोप का  आधार क्या है ? इसके अलावा मुख्यमंत्री से ये भी पूछना जरूरी है कि वे कौन से फैसले हैं जिनके बारे में उनका कहना है कि उनकी इबारत वकीलों द्वारा लिखित थी ? सवाल और भी हैं जिनका उत्तर देना न्यायपालिका की नैतिक जिम्मेदारी है क्योंकि वर्तमान वातावरण में जब राजनेता , पत्रकार  , गैर सरकारी समाजसेवी संगठन  और नौकरशाह सभी विश्वसनीयता के संकट से जूझ रहे हैं तब न्यायपालिका अंधेरी कोठरी में एकमात्र रोशनदान की तरह है। ऐसे में अगर उस पर भी लांछन लगने लगें तब पूरे कुएं में भांग घुली होने जैसी स्थिति बन जायेगी। यद्यपि किसी नेता के कहने मात्र से न्यायपालिका को भ्रष्ट मान लेना भी जल्दबाजी होगी  किंतु मुख्यमंत्री जैसा संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति जब ऐसा कहे तब उससे सवाल तो पूछा ही  जाना चाहिए। बेहतर हो श्री चंद्रचूड़ स्वयं आगे आकर इस बारे में पहल करें  क्योंकि संवैधानिक पद पर विराजमान व्यक्ति यदि न्यायपालिका में सबसे भयंकर भ्रष्टाचार  की शिकायत करे तो उसे नजरंदाज करना आरोप को स्वीकार करने जैसा होगा। 


-रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 29 August 2023

धारा 370 के समर्थकों को मुख्य न्यायाधीश की बात का जवाब देना चाहिए




सर्वोच्च न्यायालय में धारा 370 हटाए जाने के विरुद्ध पेश की गई याचिकाओं पर चल रही बहस अंतिम चरण में आ गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई दलीलों के जवाब में सरकार की ओर से उक्त धारा को हटाए जाने के अधिकार और औचित्य साबित करने का प्रयास किया गया। इस दौरान मुख्य बात जो उभरकर सामने आई वह 370 के  अमरत्व की थी । याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश हुए देश के दिग्गज अधिवक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारत में विलय के बावजूद जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देते हुए उसका पृथक संविधान  बनाया गया था। चूंकि उस हेतु गठित राज्य की संविधान सभा अस्तित्व में नहीं है इसलिए उक्त धारा को समाप्त करना तो दूर रहा छुआ तक नहीं जा सकता। चूंकि 1950 के बाद भारत के संविधान को बनाने वाली संविधान सभा भी भंग हो गई इसलिए जम्मू कश्मीर को 370 और 35 ए के तहत दी गई विशेष स्थिति को बदलना तभी संभव हो सकता है जब उस सभा को पुनर्गठित किया  जावे। संवैधानिक पेचीदगियों से जुड़े और भी सवाल याचिकर्ताओं के अधिवक्ताओं द्वारा पेश किए जा चुके  हैं । इस दौरान मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ सहित उनकी अध्यक्षता वाली संविधान पीठ में शामिल न्यायाधीशों ने अधिवक्ताओं से  जो प्रश्न पूछे वे निश्चित रूप से उनके फैसले में परिलक्षित होंगे।  हालांकि पीठ याचिकाओं पर क्या निर्णय करेगी इस बारे में कह पाना तो कठिन है किंतु गत दिवस श्री चंद्रचूड़ ने 35 ए को लेकर जो टिप्पणी की वह बेहद महत्वपूर्ण है। उक्त धारा के अंतर्गत जम्मू कश्मीर के लोगों को दिए गए विशेष अधिकारों को सुरक्षित रखने के पक्ष में दी गई दलील पर मुख्य न्यायाधीश की वह टिप्पणी  इस प्रकरण से जुड़ी तमाम बातों का एक पंक्ति में दिया गया उत्तर है , जिसमें उन्होंने कहा कि 35 ए ने उक्त राज्य के नागरिकों को तो विशेष अधिकार संपन्न बना दिया किंतु देश के बाकी नागरिकों को इस राज्य में बसने , भूमि खरीदने  और  नौकरी करने जैसे अधिकारों से वंचित कर दिया। उन्होंने इस बात का भी उल्लेख किया कि जिन सफाई कर्मियों को पीढ़ियों पहले पंजाब सहित अन्य राज्यों से वहां लाया गया वे सरकारी नौकरी में रहते हुए भी जम्मू कश्मीर की नागरिकता से वंचित रहे और उस आधार पर मतदाता नहीं बन सके। ऐसी ही स्थिति उन शरणार्थियों की भी बनी रही जो रियासत के भारत में विलय के बाद पाकिस्तान से आकर वहां बसे। श्री चंद्रचूड़ की यह टिप्पणी अदालत से बाहर की गई होती तब तो शायद उसे उनका निजी विचार मानकर उपेक्षित किया भी जा सकता था लेकिन  सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने 35 ए को लेकर जो  कुछ कहा उसका संज्ञान लिया जाना स्वाभाविक है । और मुख्य रूप से धारा 370 के हटाए जाने की मांग के पीछे भी यही मुख्य कारण बना । जम्मू कश्मीर का अलग संविधान बनने के बाद संसद द्वारा पारित कानून वहां तब तक लागू नहीं होते थे जब तक उन्हें राज्य विधानसभा पारित न करे। यहां तक कि देश के संविधान के अंतर्गत नियुक्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को राज्य के संविधान के अंतर्गत शपथ दिलाई जाती थी। अगस्त 2019 में मोदी सरकार द्वारा जब राज्य की विशेष स्थिति खत्म करते हुए उसे विभाजित कर लद्दाख अलग कर दिया और जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित राज्य बना दिया तबसे वहां की परिस्थितियों में जो बदलाव हुए वे इस निर्णय के औचित्य को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं। कहने को विशेष स्थिति उत्तर पूर्वी राज्यों में से भी कुछ को दी गई है किंतु जम्मू कश्मीर की स्थिति उनसे पूरी तरह अलग है जहां जनमत संग्रह के नाम पर उसे भारत से काटने का षडयंत्र शुरुआत से चला आ रहा  था। जिस भारतीय सेना की मौजूदगी का कश्मीर घाटी की अलगाववादी ताकतें विरोध करती रहीं वह अगर सजग न होती तो घाटी पर पाकिस्तान का कब्जा हो जाता। मुख्य न्यायाधीश ने 35 ए के कारण देश के अन्य नागरिकों को जम्मू कश्मीर में अधिकार विहीन  किए जाने का जो  मुद्दा छेड़ा , दरअसल 370 हटाकर राज्य की विशेष स्थिति को खत्म करने का वही सबसे उचित आधार है। जम्मू कश्मीर जिन हालातों में भारतीय संघ में  शामिल हुआ वे निश्चित रूप से बेहद जटिल एवं असामान्य थीं। जब रियासत का भारत में विलय हुआ तब विशेष स्थिति के अंतर्गत ही राज्यपाल को सदर ए रियासत और मुख्यमंत्री को वजीर ए आज़म (प्रधानमंत्री) कहा जाता था। लेकिन बाद में उसे बदलकर बाकी राज्यों की तरह ही राज्यपाल और मुख्यमंत्री जैसे संबोधन लागू  कर दिए गए। इसके बाद भी 370 की आड़ में आजादी के सात दशकों बाद तक कश्मीर घाटी में पाक परस्ती को जिंदा रखा गया। श्री चंद्रचूड़ ने जो प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय में उठाया वह करोड़ों भारतीयों की भावनाओं को शब्द देने वाला है। मुख्य न्यायाधीश का ये कहना मायने रखता है कि जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति के चलते देश में रहने वाले अन्य लोग वहां जमीन खरीदने , बसने और नौकरी पाने जैसे मौलिक अधिकारों से वंचित थे। जबकि कश्मीर के लोग भारत में कहीं भी रहने और नौकरी पाने स्वतंत्र हैं। न्यायालयीन बहस से अलग हटकर देखें तो श्री चंद्रचूड़ द्वारा उठाया मुद्दा बेहद गंभीर एवं तीखा है। जो लोग 370 को हटाए जाने का विरोध कर रहे हैं उन्हें मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गई टिप्पणी पर अपना दृष्टिकोण रखना चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी 


Monday, 28 August 2023

आधी आबादी को साधने का दांव शिवराज का तुरुप का पत्ता




म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मैदानी राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी बन चुके हैं। इसमें कोई शक नहीं कि प्रदेश की राजनीति में इस समय उनसे मेहनती राजनेता और कोई नहीं है । और ये भी कि उनका चेहरा शहरों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में भी जाना - पहिचाना है। लंबे समय  से सत्ता में रहने के कारण प्रदेश के प्रत्येक हिस्से में उनका आना - जाना बना रहा । इसलिए  उनकी  छवि उन नेताओं से अलग है जो चुनाव के समय ही चेहरा दिखाते हैं। ये कहना भी गलत नहीं है कि श्री चौहान हर समय खुद को मुकाबले के लिए तैयार रखते हैं। प्रदेश विधानसभा के आगामी चुनाव हेतु कांग्रेस ने ये  माहौल बनाया था कि वह 2018 के परिणाम को  दोहराते हुए भाजपा को सत्ता से दूर कर देगी। कमलनाथ को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाकर उसने बढ़त लेने की कोशिश की थी । चूंकि भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर काफी सुगबुगाहट थी इसलिए कांग्रेस को उस पैंतरे से  मनोवैज्ञानिक लाभ होता दिखाई देने लगा किंतु ज्योंही वह अनिश्चितता खत्म हुई त्योंही शिवराज सिंह ने पूरी ताकत से मुकाबले में उतरने का हौसला दिखाते हुए कांग्रेस पर ताबड़तोड़ हमले करने का दांव चला। कांग्रेस ने महिलाओं को 1500 रु. हर महीने देने के साथ ही 500 रु.में गैस सिलेंडर देने का वायदा कर भाजपा पर दबाव बनाने की जो कोशिश की वह श्री चौहान के एक ही वार में फुस्स हो गई जब उन्होंने लाड़ली बहना नामक योजना के अंतर्गत जून महीने से करोड़ों महिलाओं को प्रति माह 1000  रु. देने के साथ ही ये वायदा भी कर दिया कि धीरे - धीरे इसे 3000 रु.तक बढ़ा दिया जावेगा। और गत दिवस भोपाल में प्रदेश भर से एकत्र हुए लाखों महिलाओं के बीच 250 रु. उनके खाते में जमा करवाते हुए कहा कि अब अक्टूबर से उनको 1250 रु. दिए जावेंगे । इस तरह कांग्रेस का वायदा तो हवा में रह गया किंतु शिवराज सिंह ने करोड़ों बहनों के खाते में पैसे जमा करवाना शुरू कर दिया। कांग्रेस इस पैंतरे के सामने असहाय होकर रह गई। गत दिवस उन्होंने सावन के महीने में 450 रु. का गैस सिलेंडर देने की घोषणा कर एक और जबरदस्त चाल चलते हुए कांग्रेस को पिछले पांव पर जाने मजबूर कर दिया। साथ ही सितंबर में बढ़े हुए बिजली बिल माफी के अलावा महिलाओं को नौकरी में 35 फीसदी  आरक्षण  और 100 रु. में बिजली के अलावा महिलाओं के सामूहिक विरोध पर शराब दुकान बंद करने जैसी घोषणा कर आधी आबादी को अपने पाले में खींचने का जो दांव चला उसका कांग्रेस के पास फिलहाल कोई जवाब नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है कि कांग्रेस वायदा करती रह गई लेकिन  शिवराज सरकार ने एक कदम आगे बढ़कर वायदे को कार्यरूप में बदलकर अपनी  विश्वसनीयता स्थापित कर ली। अपनी शुरुआती पारियों में श्री चौहान ने लाड़ली लक्ष्मी योजना के जरिए पूरे देश में ख्याति अर्जित की थी। हाल ही में उन्होंने छात्राओं को स्कूटी प्रदान कर युवा मतदाताओं को आकर्षित किया। लाड़ली बहना की पात्र महिलाओं की बेटियों को निःशुल्क शिक्षा की सुविधा का ऐलान भी शिवराज सिंह का बेहद प्रभावशाली कदम है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ने औपचारिक तौर पर चुनावी मुकाबला शुरू होने के पहले ही दबाव से बाहर आकर कांग्रेस को रक्षात्मक होने बाध्य कर दिया है। 2018 में भाजपा थोड़े से  अंतर से चूक गई थी जिसके लिए पार्टी के अति आत्मविश्वास को जिम्मेदार ठहराया गया । ऐसा लगता है इस बार मुख्यमंत्री किसी भी प्रकार की खुश फहमी से दूर रहते हुए कोई कसर नहीं छोड़ रहे। इसीलिए वे कांग्रेस के वायदों के जवाब में नई - नई योजनाओं को अमल में लाकर मतदाताओं पर असर छोड़ने में जुटे हैं। और कुछ  समय पहले तक जो  राजनीतिक विश्लेषक ये मानकर चल रहे थे कि इस बार मुकाबला बेहद कड़ा होगा और कांग्रेस मजबूती के  साथ चुनौती पेश करेगी ,  वे भी मानने लगे हैं कि शिवराज सिंह की सक्रियता और आक्रामक शैली ने  कांग्रेस को फिलहाल तो ठहराव की स्थिति में ला दिया है। भाजपा ने 39 प्रत्याशी घोषित करने का निर्णय लेकर भी कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना दिया है। इसमें दो राय नहीं है कि कांग्रेस कुछ महीनों पहले तक जिस आक्रामक अंदाज में नजर आ रही थी उसमें लगातार कमी आ रही है। ये भी महसूस होने लगा है कि कमलनाथ अकेले ही मैदान में जूझ रहे हैं। दूसरी पंक्ति के नेता भी प्रभाव नहीं छोड़ पा रहे। एकमात्र दिग्विजय सिंह ही कांग्रेस के दूसरे चेहरे हैं लेकिन वे जितना  फायदा करते हैं उससे  ज्यादा अपने बयानों से पार्टी को नुकसान पहुंचाते हैं। चुनावों की तारीखों का ऐलान अक्टूबर के पहले सप्ताह में संभावित है। उसके साथ ही आचार संहिता लग जायेगी और तब नए कार्यक्रमों और योजनाओं का ऐलान नहीं हो सकेगा और इसीलिए मुख्यमंत्री बिना समय गंवाए लोक लुभावन घोषणाएं  करते जा रहे हैं। कांग्रेस को उम्मीद थी कि वह सत्ता विरोधी रुझान का लाभ लेकर भाजपा पर हावी हो सकेगी किंतु मुख्यमंत्री ने उल्टे  दबाव कांग्रेस पर बना दिया। हालांकि चुनाव में लगभग दो माह हैं और आज के दौर में राजनीति भी टी - ट्वेंटी क्रिकेट जैसी हो गई है किंतु शिवराज सिंह धीरे - धीरे अपना स्कोर जिस तरह बढ़ा रहे हैं उसका पीछा कांग्रेस किस तरह करती है ये देखने वाली बात होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 26 August 2023

अवैध कालोनियों को वैध करना जनहित में किंतु भविष्य में सख्ती जरूरी



म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गत दिवस प्रदेश की 2700 से अधिक अवैध कालोनियों को वैध घोषित कर उनमें रहने वाले लाखों लोगों को राहत की सांस लेने का अवसर प्रदान कर दिया। इनमें अनेक कालोनियां तो दशकों पहले बनाई गई थीं।अपने घर का सपना  साकार करने के लिए निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों ने इन कालोनियों में अपनी मेहनत की कमाई निवेश कर दी। स्थानीय निकायों में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण मकानों  के नक्शे भी स्वीकृत हो गए । उसके बाद वोटों की चाहत में जनप्रतिनिधियों ने वहां बिजली के खंबे लगवा दिए । पानी की पाइप लाइन भी पहुंचा दी गई। लेकिन अवैध कालोनी होने से सड़क , नाली बनाने जैसे कार्य रुके  रहे । जिन कालोनाइजरों ने ऐसी कालोनियाँ बनाईं वे तो पैसा कमाकर चलते बने किंतु उनमें रहने वाले अपने आशियाने के उजड़ जाने के मानसिक तनाव में जी रहे थे  ।  लंबे समय से ये मांग उठती आ रही थी कि इन कालोनियों को वैधता प्रदान की जाए। सरकार भी इनको लेकर अपराध बोध से ग्रसित थी क्योंकि उसका अपना अमला ही इसके लिए जिम्मेदार है। यदि स्थानीय निकाय के अधिकारी - कर्मचारी कर्तव्यनिष्ठ हों तो अवैध कालोनी अस्तित्व में आ ही नहीं सकती । इसलिए ये कहना पूरी तरह सही है कि इनका निर्माण सरकारी मशीनरी द्वारा जानबूझकर की गई अनदेखी के चलते हुआ जिसका कारण किसी से छिपा नहीं है। अन्यथा नौकरशाही के ईमानदार रहते किसी की क्या मजाल है कि कालोनी तो बड़ी बात है , एक मकान भी नियम विरुद्ध बना सके। हालांकि इनमें भूखंड खरीदने वाले की भी ये जिम्मेदारी होती है कि वह कालोनी की वैधता जांच ले किंतु वास्तविकता ये है कि साधारण लोग इतनी गहराई में नहीं जाते और कालोनाइजर तथा बिल्डर  की लुभावनी बातों में फंसकर अपना पैसा फंसा देते हैं। अनेक अवैध कालोनियां ऐसी हैं जिनमें रहने वाले नारकीय स्थिति में जिंदगी बसर कर रहे हैं। विकास होना तो दूर रहा  अवैध होने के कारण आशियाना उजड़ने का डर उनको हमेशा सताया करता था। मौजूदा परिस्थितियों में जब सरकारी भूमि पर बसी झुग्गी झोपड़ी हटाने में भी कानूनी से ज्यादा मानवीयता आड़े आती है तब लाखों घरों को उजाड़ने की कल्पना करना भी असंभव प्रतीत होता है। ये देखते हुए मुख्यमंत्री श्री चौहान की सरकार द्वारा अवैध कालोनियों को  वैधता प्रदान करने का फैसला व्यवहारिक तौर पर समझदारी भरा है।  इसका सबसे बड़ा लाभ ये होगा कि एक तो शासन को इनसे करों की  आय होने लगेगी और दूसरा ये कि उनमें रह रहे लाखों लोगों को समुचित विकास का लाभ मिलेगा। मुख्यमंत्री ने ये स्पष्ट कर दिया कि आगे से अवैध कालोनी बनाने नहीं दी जावेगी । लेकिन ऐसा करने के लिए सरकारी मशीनरी में कसावट लाते हुए उसके मन में ये बात बिठानी जरूरी है कि अवैध कालोनी या उस जैसा कोई भी निर्माण होने पर उसके लिए  संबंधित कालोनाइजर और बिल्डर  तो कसूरवार माना ही जाएगा किंतु अवैध निर्माण को न रोकने वाले अधिकारी और उसके अधीनस्थों पर भी कड़ी कार्रवाई होगी। सही बात तो ये है कि अवैध निर्माण और अतिक्रमण हमारे देश में एक प्रवृत्ति के तौर पर विकसित हो गए हैं। अवैध कालोनियां और झोपड़ पट्टियां लाइलाज बीमारी बन गई हैं । शिवराज सरकार ने अवैध कालोनियों को वैध बनाकर जिस मानवीय पहलू को ध्यान में रखा उसकी जरूरत से कोई इंकार नहीं करेगा । लेकिन देखने वाली बात ये भी है कि अवैध कालोनी , बहुमंजिला काम्प्लेक्स और झुग्गियों की बसाहट में नौकरशाही के साथ राजनेताओं की भी महती भूमिका रहती है। ऐसे में राजनीतिक दलों का भी ये दायित्व है कि अवैध निर्माण करवाने वाले कालोनाइजर , बिल्डर और माफिया को संरक्षण देने से परहेज करें। अक्सर देखा गया है कि किसी अवैध निर्माण को तोड़ने के विरोध में नेतागिरी होने लगती है। इसलिए मुख्यमंत्री श्री चौहान का ये कहना पूरी तरह जायज है कि भविष्य में बनने वाली अवैध कालोनी के विरुद्ध पूरी तरह सख्ती बरती जाएगी। इसमें दो मत नहीं है कि समाज के गरीब और निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए  अपना  घर बनाना आज भी सपना है। श्री चौहान ने माफिया से खाली कराई गई हजारों एकड़ भूमि गरीबों को पट्टे पर देने की जो घोषणा की वह भी सही निर्णय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बेघरबारों को घर देने की जो योजना शुरू की गई उसके सुखद परिणाम आ रहे हैं। मुंबई में  एशिया की सबसे बड़े झोपड़पट्टी धारावी को सुविकसित कर वहां रह रहे लोगों को पक्के मकानों में स्थानांतरित करने की जो योजना है उसको बाकी शहरों में भी लागू किया जाए तो अरबों -  खरबों की सरकारी जमीन का व्यवसायिक उपयोग किया जा सकता है । साथ ही उस पर काबिज गरीब  भी पक्के घरों में जाकर बेहतर जिंदगी जी सकेंगे। शिवराज सरकार ने अवैध कालोनियों से अवैध का ठप्पा हटाकर सामयिक निर्णय लिया है। लेकिन  भविष्य में अवैध कालोनी बनाने जैसी हिमाकत कोई न कर सके उसके लिए शासन और प्रशासन के साथ ही नेताओं को भी सतर्क रहना होगा । अवैध निर्माण कानूनी अपराध होने के साथ ही सामाजिक बुराई भी है जिसे मिटाए बिना शहर , कस्बे और यहां तक कि गांव तक का व्यवस्थित विकास संभव नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 24 August 2023

कुछ लोगों को देश का गौरवगान भी अच्छा नहीं लगता


चंद्रयान 3 की सफलता पर पूरा देश गौरवान्वित हुआ। इसरो के वैज्ञानिकों ने बीते अनेक वर्षों तक अथक परिश्रम करते हुए भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी विश्व शक्तियों के समक्ष ला खड़ा किया।चंद्रमा के जिस क्षेत्र में चंद्रयान उतरा उससे अब तक अंतरिक्ष वैज्ञानिक अपरिचित थे । इसलिए यह दुस्साहसिक प्रयास था । लेकिन 23 अगस्त की शाम भारत में उल्लास का अभूतपूर्व सूर्योदय लेकर आई जब चंद्रयान ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर धरातल को छू लिया । उसके साथ भेजा गया प्रज्ञान नामक वाहन भी चंद्रमा की धरती पर चहलकदमी करने लगा जिसका काम वहां की भौगोलिक और वातावरण संबंधी जानकारी इसरो को भेजना है। हालांकि ये अभियान  महज दो सप्ताह का है,  लेकिन इसकी सफलता ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में हमें वैश्विक दर्जा दिला दिया जो कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस सफलता से उत्साहित इसरो ने तत्काल सूर्य की कक्षा में भेजे जाने वाले आदित्य नामक अभियान की भी घोषणा कर दी। चंद्रयान के चंद्रमा पर उतरने का वीडियो अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा  प्रसारित किया जाना जताता  है कि ये अभियान कितना महत्वपूर्ण था। पूरी दुनिया में इसे भारतीय वैज्ञानिकों के शानदार कारनामे के तौर पर देखा गया किंतु हमारे देश में कुछ लोग हैं  जिन्हें  देश का गौरवगान अच्छा नहीं लग रहा। किसी को प्रधानमंत्री द्वारा दक्षिण अफ्रीका से  वैज्ञानिकों को बधाई देने के साथ ही पूरी दुनिया को अंतरिक्ष में भारत की ऊंची छलांग का ब्यौरा देने पर ऐतराज है तो कुछ इस बात को प्रचारित करने में जुट गए कि इसरो की स्थापना किसने और कब की ।  एक तबका ऐसा भी है जिसे लग रहा है कि अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर लुटाया जा रहा धन पानी में पैसे फेंकने जैसा है। ये लोग अपनी बात के समर्थन में  दावा कर रहे हैं कि जिन देशों ने अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर अनाप - शनाप धन खर्च किया , उन्हें उससे कुछ हासिल नहीं हो सका क्योंकि पृथ्वी से लाखों - करोड़ों किलोमीटर दूर स्थित किसी ग्रह पर काबिज होने के बाद भी वहां रहना संभव नहीं है। एक यू ट्यूबर पत्रकार गत रात्रि इस बात का हिसाब देते रहे कि चंद्रयान पर हुए खर्च से ज्यादा तो प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर व्यय होता है। यद्यपि एक वर्ग ऐसा है जिसने इस बात की जरूरत जताई कि इसरो सरीखे संगठनों को दिया जाने वाला बजट और बढ़ना चाहिए। लंबे समय से वहां वेतन नहीं मिलने की बात भी उछली। देश में शोध और विकास ( रिसर्च एंड डेवलपमेंट ) पर कम ध्यान दिए जाने की बात भी जोरदार तरीके से उठी। टीवी चैनलों में चंद्रयान के सफल आरोहण पर आयोजित चर्चा में बजाय वैज्ञानिकों के राजनीतिक नेताओं को बिठाए जाने पर भी बहुतों ने एतराज किया। और ये बात सही भी है क्योंकि नेताओं का पूरा जोर वैज्ञानिकों द्वारा अर्जित सफलता का श्रेय लूटने पर केंद्रित रहा। कुछ लोगों ने इस उपलब्धि का ये कहकर मजाक भी उड़ाया कि अमेरिका तो 50 साल पहले ही अपने अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा पर उतार चुका था और हम महज एक यान के वहां पहुंचाकर फूले नहीं समा रहे। कुल मिलाकर देखने पर पता चलता है कि राष्ट्रीय गौरव के विषयों पर भी हम एक सुर में बोलना भूलते जा रहे हैं। गनीमत ये रही कि सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक किए जाने के प्रमाण मांगने वाले चंद्रयान के सफल आरोहण का प्रमाण मांगने की हिम्मत नहीं कर सके किंतु अभियान की सफलता का श्रेय लूटने  के अलावा उसकी उपयोगिता और सार्थकता पर जिस तरह से सवाल उठाए गए वह शुभ संकेत नहीं है क्योंकि इससे दुनिया में हमारी छवि खराब होती है। जिस तरह खेलों में किसी खिलाड़ी अथवा टीम के  जीतने पर पूरा देश उसको बधाई देकर प्रोत्साहित करता है ठीक वैसे ही  वैज्ञानिकों की उपलब्धि पर उनकी हौसला अफजाई सामूहिक तौर पर होना चाहिए थी। वैसे भी यदि अंतरिक्ष कार्यक्रम की उपादेयता और उपलब्धियों के बारे में उसी क्षेत्र के जानकार अपनी राय व्यक्त करें तो वह बेहतर होता है। लेकिन विज्ञान के बारे में जानकारी न  रखने वाले भी जब ऐसे मामलों में अपना ज्ञान बघारकर उपदेश देने लगते हैं तो दुख होता है। कुछ लोगों को तो इसरो प्रमुख सहित कुछ वैज्ञानिकों के  तिरुपति देवस्थानम जाकर प्रार्थना किए जाने पर भी आपत्ति हुई। लेकिन उक्त अभियान के प्रमुख सोमनाथन द्वारा  वेदों को  विज्ञान के स्रोत के तौर स्वीकार कर ऐसे लोगों को करारा जवाब दे दिया गया। चंद्रयान 3 की सफलता के लिए श्रेय के अधिकारी यदि हैं तो केवल वे वैज्ञानिक जो अनेक वर्षों से इस अभियान को अपने जीवन का मिशन मानकर जुटे रहे। इस सफलता ने भारत का मान पूरी दुनिया में बढ़ाया है। इस पर खर्च हुई राशि ऐसे ही अभियानों पर अन्य देशों द्वारा किए गए खर्च से कम होने से अपने उपग्रह छोड़ने के इच्छुक तमाम देश अब इसरो की सेवा लेने आतुर हैं। इससे इस संगठन की आय भी बढ़ेगी और भविष्य में वह आत्मनिर्भर  हो सकेगा। सर्वविदित है कि अमेरिका की असली ताकत विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में की जाने वाली रिसर्च ही है। ऐसे में  इसरो द्वारा अंतरिक्ष में किए जाने वाले शोध और अध्ययन भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने में सहायक होंगे ये बात उन सभी को समझनी चाहिए जो चंद्रयान 3 की सफलता पर खुश होने के बजाय वैज्ञानिकों की उपलब्धि को कमतर साबित करने का प्रयास कर रहे हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी