Wednesday, 1 November 2023
शराब घोटाले से आम आदमी पार्टी की छवि को धक्का पहुंचा है
Tuesday, 31 October 2023
मराठा आंदोलन को देख अन्य जातियां भी मैदान में उतर सकती हैं
महाराष्ट्र में मराठा समुदाय द्वारा आरक्षण की मांग लंबे समय से चली आ रही है। इसे लेकर बड़े आंदोलन भी हुए जिनमें हिंसा भी देखने मिली। गत दिवस एक बार फिर मराठा आरक्षण आंदोलन में हिंसा के बाद तनाव है। एनसीपी के दो विधायकों के घर फूंक दिए गए । जिनमें एक शरद पवार और दूसरा अजीत पवार के गुट का है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट के दो सांसदों और एक भाजपा विधायक द्वारा आंदोलन के पक्ष में इस्तीफा दे दिया गया। लोकसभा चुनाव के कुछ माह पहले उठे इस बवाल का असर हरियाणा , प.उत्तर प्रदेश , राजस्थान सहित कुछ और राज्यों में भी पड़ सकता है जिनमें जाट, गुर्जर और मीणा जातियां अनेक वर्षों से आंदोलन करती रहीं। दरअसल तात्कालिक उपायों के तौर पर कुछ मांगें मानकर बाकी को टाल दिए जाने से आंदोलन के जो बीज दबे रह जाते हैं उनमें अनुकूल वातावरण मिलते ही दोबारा अंकुरण होने लगता है। महाराष्ट्र में मराठा जाति अगड़ी है या पिछड़ी ये भी विवाद का विषय है। गत दिवस मुख्यमंत्री ने किसी रिपोर्ट के आधार पर उनमें से कुछ को आरक्षण देने की बात कही तो आंदोलन के नेता ने जिद पकड़ी कि सभी मराठाओं को आरक्षण का लाभ दिया जावे। इस बारे में सबसे महत्वपूर्ण ये है कि हिंसा होने पर इन आंदोलनों की जमीन तैयार करने वाले नेता चूहों की तरह बिल में दुबक जाते हैं । इसीलिए मराठा आरक्षण की मांग के समर्थन या विरोध में बोलने का साहस शरद पवार जैसे दिग्गज तक नहीं कर पाते। एनसीपी विधायकों का घर आग के हवाले करने के बाद भी पवार परिवार घटना की निंदा करने का साहस नहीं जुटा सका । जो राजनीतिक दल मराठा समुदाय की इस मांग का समर्थन करते रहे हैं वे भी अपनी चमड़ी बचाते देखे जा सकते हैं । देश भर में जातिगत जनगणना करवाने की गारंटी बांट रहे राहुल गांधी ने भी मौन साध रखा है । कांग्रेस ने राज्य सरकार से इस मामले में नीति स्पष्ट करने कहा है किंतु उद्धव सरकार की सहयोगी रहते हुए मराठा आरक्षण का मसला हल करने का काम उसने क्यों नहीं किया ये बड़ा सवाल है । शरद पवार भी अनेक बार मुख्यमंत्री बने किंतु मराठाओं का सबसे बड़ा नेता होने के बावजूद उन्होंने भी इस विवाद का हल खोजने का सार्थक प्रयास नहीं किया । ऐसे मामले वैसे तो देश के लगभग सभी राज्यों में हैं। मणिपुर में मैतेई समुदाय आरक्षण मांग रहा था । कुछ महीनों पहले उच्च न्यायालय ने उसकी दशकों पुरानी मांग मंजूर कर ली किंतु उसके बाद वह राज्य गृहयुद्ध जैसे हालात में उलझकर रह गया। शायद इसीलिए राजनेता ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर बचते फिरते हैं क्योंकि एक पक्ष का समर्थन करने से दूसरे का विरोध झेलने का खतरा बन जाता है। दुर्भाग्य से जातिगत आरक्षण के लिए आने वाले नए - नए दबाव राजनीति को पूरी तरह से विकृत करने का कारण बन रहे हैं। जाति आधारित जनगणना के पैरोकार भी अपने बनाए जाल में फंसने लगे हैं । इसका ताजा प्रमाण बिहार है जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करने वाला दांव उनके लिए संकट का कारण बन गया। यहां तक कि उनके अपने जनता दल (यू) में ही भारी असंतोष देखने मिल रहा है। इस कदम का उद्देश्य पिछड़ी जातियों की सही संख्या जानकर उनको लाभान्वित करना था किंतु उल्टे नए जातीय विवादों का खतरा बढ़ गया । मराठा , जाट, मीणा अथवा गुर्जर आरक्षण की मांग को किसी न किसी राजनीतिक नेता अथवा पार्टी ने ही हवा दी है। इसके पीछे उनके अपने निजी और निहित स्वार्थ होते हैं किंतु व्यापक नजरिए से देखें तो देश और समाज के लिए ये मुद्दे विघटनकारी साबित हो रहे हैं। हंसी तो तब आती है जब दलित और पिछड़ी जातियों के राजनीतिक नेता अंतर्जातीय विवाह का आदर्श प्रस्तुत करने के बावजूद भीर जाति की राजनीति करते हैं। उदाहरण के लिए स्व.रामविलास पासवान की दूसरी पत्नी उच्च जाति की हैं , अखिलेश यादव के अलावा लालू प्रसाद यादव के दोनों बेटों ने भी पिछड़ी जाति से बाहर जाकर विवाह किया , सचिन पायलट की पत्नी मुस्लिम है। लेकिन ये सब अपनी जाति के नेता कहलाते हैं। स्व.गोपीनाथ मुंडे पिछड़ी जाति के थे । उन्होंने स्व.प्रमोद महाजन की बहिन से विवाह किया जो ब्राह्मण जाति की थीं। उसके बाद भी स्व.मुंडे पार्टी नेतृत्व से पिछड़े होने के नाम पर भिड़ते रहे। यही काम उनकी बेटियां करती हैं। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे वैसे तो ग्वालियर के सिंधिया राजवंश की पुण्याई को भुनाती हैं किंतु जाट समुदाय की सरगना बनी हुई हैं। कड़वी सच्चाई तो ये है कि पिछड़े और दलित जातियों के हित चिंतक बने नेताओं ने अपना और अपने परिवार का उत्थान तो खूब कर लिया किंतु अपनी जाति के लोगों के सामाजिक स्थिति को सुधारने के लिए कुछ नहीं। इसीलिए आजादी के 75 वर्षों बाद भी अगड़े - पिछड़े के नाम पर समाज को बांटने की राजनीति का गंदा खेल चल रहा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Monday, 30 October 2023
केरल में विस्फोट आने वाले बड़े खतरे का संकेत
Sunday, 29 October 2023
राज्य वन अनुसंधान संस्थान का तुगलकी फैसला:सुबह - शाम टहलने वालों पर भी लगा दिया टोल टैक्स
Saturday, 28 October 2023
सपा , बसपा और आम आदमी पार्टी म.प्र में विश्वसनीयता गंवाती जा रहीं
Friday, 27 October 2023
भारतीय नागरिकों को मौत की सजा सुनाकर कूटनीतिक दबाव बना रहा कतर
कतर नामक खाड़ी देश में 8 पूर्व भारतीय नौसैनिकों को मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने से देश में खलबली है। सरकार ने इस पर अचरज जताते हुए उनको कानूनी सहायता देने की पहल की है। उन सब पर इजराइल के लिए जासूसी करने का आरोप है। वैसे भारत और कतर के आपसी संबंध काफी अच्छे हैं। लेकिन दुनिया के सभी इस्लामिक आतंकवादी संगठनों को वह खुलकर आर्थिक सहायता देता है । कतर की सऊदी अरब से जरा भी नहीं पटती । चूंकि इसके पास गैस का सबसे बड़ा भंडार है इसलिए अमेरिका तक उससे दबता है। जबकि वह इजराइल को फूटी आंखों नहीं देखना चाहता। बीते 7 अक्टूबर को गाजा पट्टी पर काबिज हमास नामक संगठन द्वारा इजराइल पर हमला किया जाने के बाद भारत ने इजराइल के साथ खड़े होने की जो पेशकश की उससे कतर नाराज बताया जाता है। कतर और ईरान वे देश हैं जो इस लड़ाई में खुलकर हमास के साथ खड़े हुए हैं। इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन का बयान आ गया कि हमास द्वारा इजराइल पर हमले के पीछे भारत - मध्यपूर्व यूरोप आर्थिक कारीडोर परियोजना है जिसके लिए दिल्ली में हुए जी - 20 सम्मेलन में अमेरिका , फ्रांस , इटली , यूरोपीय यूनियन , सऊदी अरब , यूएई ने सहमति दी थी। इस कारीडोर को भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना गया। उल्लेखनीय है चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा यूरोप तक वन बेल्ट वन रोड की जो योजना शुरू की गई थी वह खटाई में पड़ती जा रही है। अनेक देश उससे हाथ खींचते जा रहे हैं । यहां तक कि पाकिस्तान तक में विरोध की आवाजें उठने लगीं। इससे चीन को जबरदस्त आर्थिक नुकसान हो रहा है। जी - 20 में जिनपिंग की गैर मौजूदगी में ही भारत द्वारा प्रस्तावित कारीडोर पर रजामंदी बनी। चूंकि ईरान भी चीन की परियोजना में शामिल था इसलिए उसे भी भारत की ये सफलता रास नहीं आई। वह इस बात से भी भन्नाया हुआ है कि भारत - इजराइल बेहद निकट आ चुके हैं । दूसरी तरफ अमेरिका द्वारा सऊदी अरब और इजराइल के बीच दोस्ती करवाने के प्रयासों में रुकावट पैदा करने के लिए भी ईरान और कतर बेचैन थे । वैश्विक राजनीति के जानकार ये मानकर चल रहे हैं कि हमास के हमले का निशाना केवल इजराइल ही नहीं अपितु सऊदी अरब और भारत - मध्यपूर्व यूरोप आर्थिक कारीडोर भी है। कतर में पूर्व सैन्य अधिकारियों को मृत्यदंड के पीछे भी भारत द्वारा इजराइल के साथ खड़े होने का फैसला बताया जाता है। उसका सोचना ये हो सकता है कि इस बहाने वह भारत को दबाने में कामयाब हो जाएगा। और फिर गैस की आपूर्ति को लेकर भी तो भारत काफी हद तक उस पर निर्भर है। कूटनीति में जो दिखता है वास्तविकता उससे काफी हटकर रहती है। इसीलिए इजराइल पर हमास के हमले को भले ही फिलिस्तीन से जोड़कर देखा गया किंतु असली कारण सऊदी अरब और इजराइल की दोस्ती में बाधा पैदा करना भी था । साथ ही जिनपिंग की खीझ भी है जो वन बेल्ट वन रोड परियोजना के खटाई में पड़ने से तो परेशान थे ही , जी - 20 सम्मेलन में नरेंद्र मोदी के भारत मध्यपूर्व यूरोप आर्थिक कारीडोर के प्रस्ताव पर अमेरिका, यूरोप , यूएई और सऊदी अरब की सहमति मिलने से चीन के साथ ही ईरान और पाकिस्तान जैसे देश परेशान हो उठे । हमास के हमले के बाद जिस तरह से अरब देशों के साथ ही ईरान , कतर और चीन खुलकर उसके पक्षधर बनकर उभरे उससे बहुत सारी बातें स्पष्ट हो गईं। अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान और कतर में पूर्व भारतीय नौसैनिकों को मृत्युदंड के समाचार एक साथ आना भी महज संयोग है। ऐसा ऐसा लगता है पश्चिम एशिया में नया शक्ति संतुलन बनने से इस्लामिक देशों की एकजुटता छिन्न - भिन्न होने लगी है। यूएई तो इजराइल से पहले ही दोस्ताना कायम कर चुका है। मिस्र ने भी गाजा पट्टी से आने वाले शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए । सऊदी अरब के नए शाही शासक देश को आधुनिकता की ओर ले जाने प्रयासरत हैं। ऐसे में इस्लाम के नाम पर आतंकवाद और कट्टरता के पोषक यदि उद्वेलित हैं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कतर में भारतीय नागरिकों को मौत की सजा दिया जाना भी भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाने की कोशिश है जिससे वह इजराइल के साथ खड़े रहने से बचे । हालांकि भारत सरकार ने फिलीस्तीन के भूमि अधिकार का समर्थन दोहराते हुए गाजा पट्टी में राहत सामग्री भी भेजी किंतु कतर द्वारा उठाए गए कदम के बाद प्रधानमंत्री श्री मोदी को वहां की सरकार से सीधे बात करनी चाहिए। ऐसे अवसरों पर ही कूटनीतिक कुशलता की परीक्षा होती है। इस सबके बीच भारत को अपने राष्ट्रीय हितों के साथ विदेशों में रह रहे अपने नागरिकों की सुरक्षा की चिंता भी करनी होगी। उल्लेखनीय है कतर सहित खाड़ी देशों में लाखों भारतीय कार्यरत हैं।
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रवीन्द्र वाजपेयी
Thursday, 26 October 2023
शिक्षा , कला , साहित्य और संस्कृति का भारतीयकरण समय की मांग
एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक और अनुसंधान परिषद ) द्वारा अपनी पुस्तकों में देश का नाम इंडिया की जगह भारत लिखने की सिफारिश , एक सार्थक कदम है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत पाठ्यक्रम में विषयों के नाम बदलने की प्रक्रिया चल रही है। उदाहरण के तौर पर प्राचीन इतिहास के स्थान पर शास्त्रीय इतिहास लिखने और भारत का ज्ञान नामक पुस्तक का प्रकाशन किया जाना है। विशेषज्ञों के साथ ही राज्यों से भी इस बारे में अभिमत लिया गया जिनमें से कुछ ने बदलाव के प्रति असहमति व्यक्त कर दी। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने कश्मीरी पंडितों के नरसंहार जैसी घटनाओं को पाठ्यक्रम में रखे जाने की पिछली सरकार की सिफारिश वापस ले ली। वहीं अनेक गैर भाजपा राज्य सरकारें अंधविश्वास से बचने की पक्षधर हैं तो कुछ संतुलन बनाए रखने की। इसमें दो मत नहीं हैं कि पाठ्यक्रम की विषयवस्तु का छद्म धर्मनिरपेक्षता के पैरोकारों ने जमकर सत्यानाश किया । दूसरा नुकसान अंग्रेजियत में डूबे तबके के हाथों हुआ। दुर्भाग्य से आजादी के बाद साम्यवादी विचारधारा के चुनिन्दा लोग शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में घुस आए जिन्हें पंडित नेहरू ने प्रोत्साहित किया जो खुद सोवियत संघ की साम्यवादी क्रांति से प्रभावित थे। इसके अलावा विदेशों में शिक्षित लोग शिक्षा - शास्त्री बनकर व्यवस्था में बैठ गए और ज्ञान - विज्ञान का सारा श्रेय पश्चिम को देते हुए अंग्रेजी को प्रगतिशीलता की निशानी बना दिया। इस वजह से भारत के इतिहास , पौराणिक ग्रंथों , महानायकों और उपलब्धियों पर उपेक्षा की धूल डाली जाती रही। भारत के महान साहित्यकारों , कलाकारों और उनकी कलाओं को नजरंदाज किया जाने लगा । देश के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगाने वाले महाराणा प्रताप की बजाय अकबर को महान बताया जाने लगा। गुलाम मानसिकता के प्रतीक चिन्ह मार्ग देश की राजधानी में बाबर , हुमायूं , औरंगजेब के नाम पर बनाए गए। प्रशासन में भी भारतीय संस्कृति को पिछड़ेपन से जोड़कर देखने वाले कथित आधुनिक भर गए । वर्तमान दुरावस्था का सबसे बड़ा कारण शिक्षा पद्धति और पाठ्यक्रम ही है जिसने हमारे इतिहास और संस्कृति के गौरवशाली पक्ष पर परदा डालते हुए निराशाजनक पहलुओं को उभारने का प्रयास किया । केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद नई शिक्षा नीति पर काम शुरू हुआ और अब जाकर पाठ्यक्रम में सकारात्मक बदलाव और सुधार किए जाने की प्रक्रिया प्रारंभ होने जा रही है। प्राचीन ग्रंथों पर शोध कार्य को यदि प्रोत्साहन और संरक्षण दिया गया होता तो युवा पीढ़ी को पश्चिम से प्रभावित होने से रोका जा सकता था। लेकिन प्रतिभा पलायन का जो सिलसिला आजादी के बाद शुरू हुआ उसे रोकने के लिए सार्थक प्रयास कभी हुए ही नहीं क्योंकि हमारे नीति नियंता ही भारतीयता को लेकर हीन भावना से ग्रसित रहे । उस दृष्टि से एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम और पुस्तकों का भारतीयकरण किया जाना 21 वीं सदी को भारत के नाम लिखने के लिए नितांत जरूरी है। हजारों साल पहले भारत में विज्ञान और तकनीक का जो विकास हुआ वह उन मंदिरों में देखा जा सकता है जिनकी अभी तक उपेक्षा होती रही। आजकल भारत की प्राचीन स्थापत्य और वास्तु कला के सैकड़ों ऐसे स्मारकों की जानकारी आ रही है जिनके सामने ताजमहल तुच्छ है। उनके निर्माण में जिस इन्जीनियरिंग कौशल और खगोलीय ज्ञान का उपयोग किया गया उसे देखकर पश्चिम के वैज्ञानिक भौचक रह जाते हैं किंतु हमारे देश में मुगल इतिहास और वामपंथी विचारधारा से प्रभावित शिक्षा शास्त्रियों को वह सब महत्वहीन प्रतीत होता है। हमारे पौराणिक ग्रंथों में जिन प्रसंगों का विवरण है उनका समुचित अध्ययन कर ईमानदारी से शोध किया जाए तो ये साबित किया जा सकता है कि आज पश्चिम जिन बातों के आधार और खुद को श्रेष्ठ समझता है वे सब भारतीय ज्ञान परंपरा का अभिन्न अंग रहीं। लेकिन कालांतर में राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के कारण राष्ट्र के व्यापक हितों को उपेक्षित किए जाने से हमारे सीमांत असुरक्षित हुए जिससे विदेशी लुटेरों के हमले होने लगे जो भारत की संपन्नता के किस्से सुनकर लूटपाट करने आते और लौट जाते। धीरे - धीरे उन्हें लगा कि यहां के शासक संकीर्ण मानसिकता के शिकार हैं जिसने उनको बार - बार आने के अवसर दिए । अंततः वे यहां राज करने के इरादे पाल बैठे जिससे सैकड़ों वर्षों के लिए गुलामी ने हमें जकड़ लिया। उसी का दुष्परिणाम प्राचीन ज्ञान , विज्ञान, कला और संस्कृति पर विदेशी प्रभाव के रूप में देखा जा सकता है। 1193 में बख्तियार खिलजी नामक एक मुस्लिम आक्रांता ने नालंदा के पुस्तकालय को आग के हवाले कर दिया ताकि हमारी समूची ज्ञान संपदा भस्म हो जाए। इसी तरह मुस्लिम शासकों ने ऐतिहासिक मंदिरों एवं सांस्कृतिक केंद्रों को ध्वस्त किया जिससे भारत की धार्मिक - सांस्कृतिक जड़ें नष्ट हो जाएं। अंग्रेजों ने तोड़फोड़ तो नहीं की किंतु हमारे अभिजात्य वर्ग में भारतीयता के प्रति हीन भावना का बीजारोपण जरूर कर दिया जिसका असर अभी भी स्पष्ट नजर आता है। देश का वह वर्ग जो अंग्रेजी के चार अक्षर भी लिख - पढ़ नहीं सकता वह भी अंग्रेजियत से जुड़ने की कोशिश करता है। इससे जो नुकसान हुआ उसका आकलन करना बेहद कठिन है किंतु समय आ गया है जब शिक्षा, कला , साहित्य और संस्कृति का भारतीयकरण किया जाए । एनसीईआरटी द्वारा इस दिशा में प्रारंभ किए गए प्रयास को व्यापक समर्थन मिलना चाहिए क्योंकि इसका उद्देश्य भावी पीढ़ी के मन में भारतीयता के प्रति आदर का भाव उत्पन्न करना है।
- रवीन्द्र वाजपेयी