Wednesday, 1 November 2023

शराब घोटाले से आम आदमी पार्टी की छवि को धक्का पहुंचा है



जिस सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ दिन पहले  ईडी ( प्रवर्तन निदेशालय ) को  फटकारते हुए पूछा था कि आखिर कब तक दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया को जेल में रखा जाएगा , उसी ने उनकी जमानत याचिका अस्वीकार करते हुए माना कि केजरीवाल सरकार की शराब नीति से  300 करोड़ से ज्यादा का लाभ   व्यापारियों को हुआ । लिहाजा श्री सिसौदिया को फिलहाल जमानत नहीं दी जा सकती। इसी मामले में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह भी जेल में हैं। ईडी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को 2 नवंबर को पूछताछ हेतु बुलाया है। जिस पर उनकी सरकार में मंत्री आतिशी मार्लेना ने भविष्यवाणी कर दी कि पूछताछ के बाद मुख्यमंत्री गिरफ्तार कर लिए जाएंगे। आतिशी ने ये आशंका भी जता दी कि इसके बाद अन्य विपक्षी मुख्यमंत्री भी गिरफ्तार होंगे। आतिशी का कहना था कि प्रधानमंत्री , आम आदमी पार्टी से डरे हुए हैं। वे चूंकि उसे हरा नहीं सकते इसलिए उसे खत्म करने के लिए बिना किसी मामले के पार्टी के प्रमुख नेताओं को जेल में ठूंस रहे हैं। अन्य विपक्षी मुख्यमंत्रियों की गिरफ़्तारी का डर दिखाकर दरअसल आतिशी ने  उनका समर्थन हासिल करने का दांव चला है। उल्लेखनीय है अनेक गैर भाजपाई मुख्यमंत्री जांच के घेरे में हैं। इस मामले में सबसे बड़ी बात ये है कि दिल्ली के चर्चित शराब घोटाले में अब तक नामजद आरोप पत्र पेश नहीं हो सका और पूछताछ ही चल रही है। कुछ आरोपियों ने  सरकारी गवाह बनकर ईडी को जो जानकारी दी उसके आधार पर ही संजय सिंह पर शिकंजा कसा गया। चूंकि 300 करोड़ की  राशि का उपयोग आम आदमी पार्टी द्वारा चुनाव में  किये जाने की जानकारी आई है इसलिए ईडी पूरी पार्टी को ही आरोपी बनाने की सोच रही है। यदि ऐसा हुआ तब ये अपने तरह का अभूतपूर्व मामला होगा जिसमें किसी राजनीतिक दल पर ही आर्थिक भ्रष्टाचार का आरोप लगेगा। कल श्री केजरीवाल को ईडी द्वारा गिरफ्तार किया जावेगा या नहीं ये आज कहना कठिन है किंतु इतना जरूर कहा जा सकता है कि इस पार्टी का उदय जिस उम्मीद के साथ हुआ था वह पूरी नहीं हो सकी और धीरे - धीरे वह भी राजनीति के दलदल में बाकी पार्टियों की तरह से ही कमर तक धंस चुकी है। राष्ट्रीय पार्टी बनने की जल्दबाजी में श्री केजरीवाल ने जिस तरह की रणनीति बनाई उसमें उन  मूल उद्देश्यों को दरकिनार कर दिया गया जिनके नाम पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध किए गए आंदोलन की परिणिति एक नये राजनीतिक दल के तौर पर हुई। दिल्ली की जनता ने इसे दो बार अपना विश्वास भी सौंपा । लेकिन जिस पारदर्शी और जनहितकारी राजनीति का वायदा श्री  केजरीवाल और उनके साथियों द्वारा किया गया था , वह अब नहीं दिखाई देती। पार्टी द्वारा धनसंग्रह के लिए जिस तरह के तरीके शुरुआत में अपनाए गए उनका सकारात्मक प्रभाव पड़ने लगा था। अन्य राजनीतिक दल भी उसके कारण दबाव में थे। मुफ्त बिजली -  पानी , शिक्षा और चिकित्सा जैसी सुविधाओं के वायदों ने दिल्ली के जनमानस पर जादू जैसा असर किया और आम आदमी पार्टी ने चुनावी जीत का इतिहास रच दिया। श्री केजरीवाल ने जिस सादगी और सरलता का वायदा किया उसे भी मतदाताओं ने खूब पसंद किया। 2014 और 2019 की मोदी लहर के बावजूद इस पार्टी ने दिल्ली में जिस धमाकेदार अंदाज में विधानसभा चुनाव जीता वह साधारण उपलब्धि नहीं थी। लेकिन मुफ्त उपहारों के बल पर हासिल सफलता ने श्री केजरीवाल के मन में प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जगा दी। आम आदमी पार्टी द्वारा भ्रष्ट नेताओं की सूची जारी कर ये साबित करने का प्रयास किया कि श्री केजरीवाल ही नरेंद्र मोदी के विकल्प हो सकते हैं। दिल्ली के अलावा अन्य राज्यों में चुनाव लड़ने का फैसला भी उसी सोच से उत्पन्न विचार था। हालांकि पार्टी को पंजाब में भी दिल्ली जैसी सफलता मिल गई किंतु शेष राज्यों में अब भी वह जमानत जप्ती का रिकॉर्ड बनाती रही है। जाहिर  है राष्ट्रीय विकल्प बनने के लिए आम आदमी पार्टी को धन की जरूरत पड़ी । गौरतलब है उसके पास अन्य राज्यों में दिल्ली जैसा संगठनात्मक ढांचा भी नहीं है और इसलिए वह दूसरे दलों से आए अवसरवादियों को अपने  कंधों पर बिठाने में  परहेज नहीं कर रही। इस सबके कारण उसका प्रारंभिक स्वरूप अब दिखाई नहीं देता । पार्टी के विस्तार और चुनाव के लिए धन की आवश्यकता के मद्देनजर उसे भी उन्हीं तौर - तरीकों को अपनाना पड़ा जिनके लिए वह दूसरे दलों को घेरती रहती थी। दिल्ली का शराब घोटाला भी उसी का परिणाम है। ईडी की जांच का अंजाम क्या होगा ये तो अदालत ही तय करेगी लेकिन इससे श्री केजरीवाल और  पार्टी की छवि पर आंच आई है। सबसे बड़ी बात ये है कि खुद को ईमानदारी का एकमात्र ठेकेदार बताने वाली यह पार्टी  विपक्षी गठबंधन में उन नेताओं के साथ बैठने लगी जिन्हें वह सबसे भ्रष्ट बताया करती थी।

-रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 31 October 2023

मराठा आंदोलन को देख अन्य जातियां भी मैदान में उतर सकती हैं


महाराष्ट्र में मराठा समुदाय द्वारा आरक्षण की मांग लंबे समय से चली आ रही है। इसे लेकर बड़े आंदोलन भी हुए जिनमें हिंसा भी देखने मिली। गत दिवस एक बार फिर मराठा आरक्षण आंदोलन में हिंसा के बाद तनाव है।  एनसीपी के दो विधायकों के घर फूंक दिए गए । जिनमें एक शरद पवार और दूसरा अजीत पवार के गुट का है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट के दो सांसदों और एक भाजपा विधायक द्वारा आंदोलन के पक्ष में इस्तीफा दे दिया गया। लोकसभा चुनाव के कुछ माह पहले उठे  इस बवाल का असर हरियाणा , प.उत्तर प्रदेश , राजस्थान सहित कुछ और  राज्यों में भी पड़ सकता है जिनमें जाट, गुर्जर और मीणा जातियां अनेक वर्षों से आंदोलन करती रहीं। दरअसल तात्कालिक उपायों के तौर पर कुछ मांगें मानकर बाकी को टाल दिए जाने से आंदोलन के जो बीज दबे रह जाते हैं उनमें अनुकूल वातावरण मिलते ही दोबारा अंकुरण होने लगता है। महाराष्ट्र में मराठा जाति अगड़ी है या पिछड़ी ये भी विवाद का विषय है। गत दिवस मुख्यमंत्री ने किसी रिपोर्ट के आधार पर उनमें से कुछ को आरक्षण देने की बात कही तो आंदोलन के नेता ने जिद पकड़ी कि सभी मराठाओं को आरक्षण का लाभ दिया जावे। इस बारे में सबसे महत्वपूर्ण ये है कि हिंसा होने पर इन आंदोलनों की जमीन तैयार करने वाले नेता चूहों की तरह बिल में दुबक जाते हैं । इसीलिए मराठा आरक्षण की मांग के समर्थन या विरोध में बोलने का साहस शरद पवार जैसे दिग्गज  तक नहीं कर पाते। एनसीपी विधायकों का  घर आग के हवाले करने के बाद भी पवार परिवार घटना की निंदा करने का साहस नहीं जुटा सका । जो राजनीतिक दल मराठा समुदाय की इस मांग का समर्थन करते रहे हैं वे भी अपनी चमड़ी बचाते देखे जा सकते हैं । देश भर में  जातिगत जनगणना करवाने की गारंटी बांट रहे राहुल गांधी ने भी  मौन साध रखा है । कांग्रेस ने राज्य सरकार से इस मामले में नीति स्पष्ट करने कहा है किंतु उद्धव  सरकार की सहयोगी रहते हुए मराठा आरक्षण का मसला हल करने का काम उसने क्यों नहीं किया ये बड़ा सवाल है । शरद पवार भी अनेक बार मुख्यमंत्री बने किंतु  मराठाओं का सबसे बड़ा नेता होने के बावजूद उन्होंने भी इस विवाद का हल खोजने का सार्थक प्रयास नहीं किया । ऐसे मामले वैसे तो देश के लगभग सभी राज्यों में हैं। मणिपुर में मैतेई समुदाय आरक्षण मांग रहा था । कुछ महीनों पहले उच्च न्यायालय ने उसकी दशकों पुरानी मांग मंजूर कर ली किंतु उसके बाद वह राज्य गृहयुद्ध जैसे हालात में उलझकर रह गया। शायद इसीलिए राजनेता ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर बचते फिरते हैं क्योंकि एक पक्ष का समर्थन करने से दूसरे का विरोध झेलने का खतरा बन जाता है। दुर्भाग्य से जातिगत आरक्षण के  लिए आने वाले नए - नए दबाव राजनीति को पूरी तरह से विकृत करने का कारण बन रहे हैं। जाति आधारित जनगणना के पैरोकार भी अपने बनाए जाल में फंसने लगे हैं । इसका ताजा प्रमाण बिहार है जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का  जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करने वाला दांव उनके लिए संकट का कारण बन गया। यहां तक कि  उनके अपने जनता दल (यू) में ही  भारी असंतोष देखने मिल रहा है। इस कदम का उद्देश्य  पिछड़ी जातियों की सही संख्या जानकर उनको लाभान्वित करना था किंतु उल्टे नए जातीय विवादों का खतरा बढ़ गया  । मराठा , जाट, मीणा अथवा गुर्जर आरक्षण की मांग को किसी न किसी राजनीतिक नेता अथवा पार्टी ने ही हवा दी है। इसके पीछे उनके अपने निजी और  निहित स्वार्थ होते हैं किंतु व्यापक नजरिए से देखें तो देश और समाज के लिए ये मुद्दे विघटनकारी साबित हो रहे हैं। हंसी तो तब आती है जब दलित और पिछड़ी जातियों के राजनीतिक नेता अंतर्जातीय विवाह का आदर्श प्रस्तुत करने के बावजूद भीर जाति की राजनीति करते हैं। उदाहरण के लिए स्व.रामविलास पासवान की दूसरी पत्नी उच्च जाति की हैं , अखिलेश यादव के अलावा लालू प्रसाद यादव के दोनों बेटों ने भी पिछड़ी जाति से बाहर जाकर विवाह किया , सचिन पायलट की पत्नी मुस्लिम है। लेकिन ये सब अपनी जाति के नेता कहलाते हैं। स्व.गोपीनाथ मुंडे पिछड़ी जाति के थे । उन्होंने स्व.प्रमोद महाजन की बहिन से विवाह किया जो ब्राह्मण जाति की थीं। उसके बाद भी स्व.मुंडे पार्टी नेतृत्व से पिछड़े होने के नाम पर भिड़ते रहे। यही काम उनकी बेटियां करती हैं। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे वैसे तो ग्वालियर के  सिंधिया राजवंश की पुण्याई को भुनाती हैं किंतु  जाट समुदाय की सरगना बनी हुई हैं। कड़वी सच्चाई तो ये है कि पिछड़े और दलित जातियों के हित चिंतक बने  नेताओं ने अपना और अपने परिवार का  उत्थान तो खूब कर लिया किंतु अपनी जाति के लोगों के सामाजिक स्थिति को सुधारने के लिए कुछ नहीं। इसीलिए आजादी के 75 वर्षों बाद भी अगड़े -  पिछड़े के नाम पर समाज को बांटने की राजनीति का गंदा खेल चल रहा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 30 October 2023

केरल में विस्फोट आने वाले बड़े खतरे का संकेत



केरल के एर्नाकुलम जिले  में गत दिवस ईसाई समुदाय की एक प्रार्थना सभा में हुए विस्फोटों में  अब तक 3 मौतें हुई और दर्जनों लोग घायल हो गए। जिस सभागार में धमाका हुआ उसमें निकलने के अनेक दरवाजे थे वरना धुएं से दम घुटने के कारण और भी जानें जा सकती थीं। जिस व्यक्ति ने विस्फोट की जिम्मेदारी लेते हुए आत्मसमर्पण कर दिया , उसकी बातों की पुष्टि नहीं हो पाई है। जांच एजेंसियां सक्रिय हो गई हैं। चर्चों सहित अन्य धार्मिक स्थलों की सुरक्षा कड़ी किए जाने के साथ ही ये पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इन धमाकों का संबंध कहीं इजराइल और हमास के बीच चला आ रहा युद्ध तो नहीं है। वैसे ईसाई समुदाय के भीतर ही एक उग्रवादी संगठन पैदा हो गया है जो काफ़ी आक्रामक है। जांच एजेंसियों को ये चिंता भी है कि कहीं ये  हमास समर्थक मुस्लिम संगठनों की कारस्तानी तो नहीं है ? उल्लेखनीय है केरल में मुस्लिम जनसंख्या भी काफी है और यह मुस्लिम लीग का एक मात्र प्रभावक्षेत्र बचा है।  ईसाई समुदाय आम तौर पर इजराइल समर्थक माना जाता है । उधर  देश भर में जिस प्रकार  से हमास की तरफदारी करने मुस्लिम समुदाय मुखर हुआ उसके कारण दोनों के बीच शत्रुता बढ़ने की आशंका बलवती हो गई है। संयोग से केरल में ईसाई और मुस्लिम दोनों समुदायों का काफी असर है। लेकिन जिस  व्यक्ति ने विस्फोट की जिम्मेदारी ली वह खुद को ईसाई समुदाय के भीतर यहोवा के साक्षी , नामक समूह का विरोधी बताता है जिसके केरल में काफी  अनुयायी हैं। यह समूह ईसाई होते हुए भी उनसे कई मामलों में अलग रास्ते पर चलता है। विस्फोट की जिमेदारी लेने वाले व्यक्ति ने इसको राष्ट्रविरोधी बताया है। इसी के साथ सुरक्षा एजेंसियां भारत में रहने वाले यहूदियों की सुरक्षा को लेकर भी सतर्क हैं । दरअसल जिस तरह से इजराइल पर हमास के हमले को न्यायोचित ठहराने का अभियान देश भर चलाया जा रहा है उसको देखते हुए यहूदियों पर  हमले की आशंका बनी हुई है। लेकिन अपेक्षाकृत शांत समझे जाने वाले ईसाई समुदाय के भीतर उभर रहे अंतर्विरोध भी हिंसात्मक रूप लेने लगे तो फिर उसे सस्ते में नहीं लिया जा सकता। चिंता का विषय ये भी है कि केरल जैसे राज्य के  लाखों लोग खाड़ी देशों में कार्यरत हैं जिनमें ईसाई और मुस्लिम भी बड़ी संख्या में  हैं। इनके जरिए विदेशों में बैठी भारत विरोधी ताकतें देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डालने का षडयंत्र रचें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन  सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि केरल ईसाई मिशनरियों के साथ ही मुस्लिम संगठनों का मजबूत गढ़ बन चुका है जिनको विदेशी आर्थिक सहायता मिलने की बात भी सर्वविदित है। इस राज्य में वामपंथी विचारधारा लंबे समय से हावी रही है। दुनिया की पहली निर्वाचित साम्यवादी सरकार केरल में ही अस्तित्व में आई थी। हालांकि कांग्रेस के नेतृत्व  वाला मोर्चा भी सत्ता में आता - जाता रहा किंतु उसका  मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन होने से वह हिंदूवादी शक्तियों को दबाता रहा है। हालांकि बीते कुछ दशकों से इस राज्य में रा.स्व.संघ का प्रभाव क्षेत्र गांव - गांव तक फैलने से राजनीति त्रिकोणीय होने लगी है । केरल की मौजूदा वामपंथी सरकार को अब तक की सबसे क्रूर माना जा रहा है। राजनीतिक विरोधियों की इतनी हत्याएं पहले यहां पहले  कभी नहीं हुईं । हालांकि वामपंथी खुद को अनीश्वरवादी मानते हैं लेकिन राष्ट्रवादी हिंदू संगठनों को रोकने के लिए वे  भी कांग्रेस की तरह मुस्लिमों और ईसाइयों का तुष्टीकरण करने से बाज नहीं आते । ये देखते हुए गत दिवस एर्नाकुलम में जो विस्फोट हुए वे किसी बड़ी कार्ययोजना का हिस्सा लगते हैं। भले ही इसके पीछे ईसाई समुदाय के भीतर का वैचारिक मतभेद हो लेकिन कहीं न कहीं विदेशी हाथ से इंकार नहीं किया जा सकता। दुर्भाग्य से राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस केरल में मुस्लिम लीग और ईसाई मिशनरियों को खुश रखने में लगी रहती है। 2019 में जब राहुल गांधी को अमेठी में अपनी हार का खतरा दिखा तब वे केरल की वायनाड सीट से भी लड़े। यद्यपि वे कहीं से भी लड़कर अपना जनाधार साबित कर सकते थे किंतु उन्होंने वायनाड का चयन किया क्योंकि वहां ईसाई मतदाताओं का वर्चस्व है। आगामी लोकसभा चुनाव के लिए बने विपक्षी गठबंधन में यूं तो वामपंथी दल भी है किंतु प.बंगाल में कांग्रेस के साथ उनके गठजोड़ के बावजूद केरल में वे दूरी बनाकर चलते हैं । हालांकि बीते कुछ चुनावों से वहां हिदुवादी राजनीति जोर पकड़ने लगी है किंतु अभी वह राजनीतिक संतुलन बनाने - बिगाड़ने की स्थिति में नहीं है। यही वजह है कि ईसाई मिशनरियों के अलावा मुस्लिम धर्मांधता केरल में हावी है। गत दिवस हुए विस्फोट की असली वजह साफ नहीं हुई है। लेकिन जो और जैसे भी हुआ वह किसी भावी खतरे का संकेत है । केंद्रीय जांच एजेंसियों को इसकी तह तक जाना चाहिए क्योंकि केरल देश का तटीय राज्य है जहां गैर हिन्दू संगठनों के विदेशों से रिश्ते किसी से छिपे नहीं हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Sunday, 29 October 2023

राज्य वन अनुसंधान संस्थान का तुगलकी फैसला:सुबह - शाम टहलने वालों पर भी लगा दिया टोल टैक्स

 पोलीपाथर स्थित राज्य वन अनुसंधान संस्थान के स्थानीय अधिकारी एक बार फिर जनविरोधी रवैए पर उतर आए हैं। इस संस्थान में प्रातः एवं सायंकाल सैकड़ों लोग भ्रमण हेतु आते हैं। अतीत में भी अनेक मर्तबा संस्थान के अधिकारियों द्वारा इस मार्ग पर प्रवेश हेतु प्रतिबंध एवं शुल्क का प्रावधान किया था जिसे जनविरोधी मानकर रद्द किए जाता रहा। अचानक वह जिन्न फिर बोतल से निकल आया है। संस्थान के संचालक के हस्ताक्षर से जारी निर्देश के अनुसार 1 नवंबर से नियमित प्रवेश करने वाले व्यक्तियों और वाहनों को 50 रु. प्रति माह अर्थात 600 रु. प्रतिवर्ष देना होगा। इसके पहले जब भी इस तरह का निर्णय हुआ जनता के विरोध के बाद विभाग को उसे वापिस लेना पड़ा। ऐसे में सवाल उठता है कि इस संस्थान के कर्ताधर्ता नौकरशाह बार - बार वही हेकड़ी क्यों दोहराते हैं ? जो लोग या वाहन इस परिसर में आते हैं उनका उद्देश्य गैर व्यवसायिक है। इस मार्ग के उपयोग को लेकर यहां से भोपाल तक अनेक मर्तबा कागज दौड़े और हर बार यही फैसला हुआ कि संस्थान में आने - जाने वालों पर कोई पाबंदी या शुल्क नहीं लगाया जाए। ताजा फैसला संभवतः चुनाव आचार संहिता का लाभ लेते हुए संस्थान के हुक्मरानों ने किया है। उनको लगता है इस समय नेता और जनप्रतिनिधि व्यस्त हैं , इसलिए वे अपनी मर्जी जनता पर थोप सकते है। वहां सैर करने आने वाले कुछ बुजुर्ग नागरिकों ने इस बात की आशंका भी जताई कि संस्थान के भीतर आने वालों पर शुल्क लादकर अधिकारीगण चुनाव में जनप्रतिनिधियों विशेष रूप से भाजपा के विरुद्ध जनता की नाराजगी बढ़ाना चाहते हैं।

Saturday, 28 October 2023

सपा , बसपा और आम आदमी पार्टी म.प्र में विश्वसनीयता गंवाती जा रहीं




म.प्र विधानसभा चुनाव में विपक्ष का राष्ट्रीय गठबंधन कारगर नहीं हो सका। कांग्रेस द्वारा हठधर्मिता दिखाए जाने के कारण सपा, बसपा और आम आदमी पार्टी ने अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए। आखिर - आखिर में जनता दल (यू) ने भी अपनी सूची जारी कर दी। इसका चुनाव परिणाम पर  क्या असर होगा ये तो मतगणना में ही स्पष्ट होगा किंतु जिन सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच हार - जीत का अंतर कम होगा उनमें इन पार्टियों द्वारा बटोरे गए मत नतीजे की दिशा तय कर सकते हैं। हालांकि सपा और बसपा अतीत में कुछ सीटें जीतते आए हैं किंतु धीरे - धीरे  उनकी ताकत घटती गई। इसका कारण उनके विधायकों का पाला बदलना रहा। इस बार आम आदमी पार्टी सिंगरौली सहित एक दो स्थानों पर उम्मीद लगाए हुए है। इक्का - दुक्का निर्दलीय भी जीत सकते हैं किंतु बाद में उन सबका भाजपा या कांग्रेस की गोद में बैठ जाना तय है। यही कारण है कि इन पार्टियों की विश्वसनीयता समाप्त हो चुकी है। कमोबेश यही हालत गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और जयस जैसे दलों की है। प्रदेश की राजनीति में कभी सपा और बसपा का वैचारिक आधार था। कुछ नेता उनके ऐसे थे जो पार्टी की पहिचान हुआ करते थे। वे विधायक रहें या नहीं किंतु सैद्धांतिक दृढ़ता के कारण उनका सम्मान  विरोधी भी करते थे।  इसीलिए उनके समर्थक मतदाता भी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने में नहीं झिझकते थे । लेकिन बीते दो दशकों में इन पार्टियों का चेहरा विकृत होता चला गया। हर हाल में साथ रहने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की बजाय  ये पार्टियां प्रवासी और मतलबपरस्त  नेताओं की सराय बनकर रह गई। जिनको भाजपा - कांग्रेस ने टिकिट नहीं दिया उनके लिए दरवाजे खोलकर ऐसे दलों ने अपनी जड़ों को खुद ही खोद डाला। एक जमाना था जब प्रदेश में समाजवादी विचारधारा वाले राष्ट्रीय स्तर के नेता हुआ करते थे। इसी तरह बसपा के भी प्रादेशिक नेता दलित समुदाय में  अपनी पकड़ रखते थे। इस पार्टी के उदय से प्रदेश में दलित राजनीति का भविष्य काफी उज्जवल नजर आने लगा था । लेकिन निहित स्वार्थों के लिए सौदेबाजी करने वाले विधायकों और नेताओं ने बसपा के प्रति विश्वास पूरी तरह घटा दिया। यही स्थिति सपा की भी रही जिसके विधायक बिकाऊ निकले । दरअसल पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए इन दोनों ने दूसरी पार्टी में टिकिट से वंचित नेताओं को बुलाकर उम्मीदवारी दी । जो मतलब निकलते ही  छोड़कर चलते बने। इस चुनाव में भी यही देखने मिल रहा है। चौंकाने वाली बात ये है कि साफ - सुथरी राजनीति करने वाली आम आदमी पार्टी भी इसी धारा में बहने लगी और भाजपा - कांग्रेस के असंतुष्टों को अपनी नाव में बिठाने को तैयार हो उठी। किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनाव अपना प्रभाव बढ़ाने का माध्यम है। इस दौरान वैचारिक आधार पर सहमति और असहमति के कारण लोग एक पार्टी छोड़कर दूसरी में जाते हैं। लेकिन जो नेता महज इसलिए आते हैं कि उनकी पार्टी ने उन्हें चुनाव की टिकिट नहीं दी तो उनकी निष्ठा पर भरोसा करना निरी मूर्खता है। इस बुराई से भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां भी अछूती नहीं हैं और इसके नुकसान भी उनको उठाने पड़ रहे हैं लेकिन छोटी और क्षेत्रीय पार्टियों का ढांचा अपेक्षाकृत छोटा होने से अचानक आए बाहरी नेता उस पर भारी पड़ जाते हैं। उनका आगमन क्षणिक लाभ तो दे जाता है किंतु जाना दूरगामी नुकसान का कारण बनता है। आज से 15 - 20 साल पहले तक प्रदेश में सपा और बसपा के कुछ नेता ऐसे थे  जिनकी प्रदेश भर में पहिचान और प्रभाव  था। लेकिन आज ऐसा एक भी शख्स नहीं है। ये देखते हुए भाजपा और कांग्रेस द्वारा ठुकराए गए नेताओं को थाली में रखकर टिकिट देने से कुछ हासिल तो होगा नहीं । उल्टे बची - खुची साख भी मिट्टी में मिल जायेगी । नई भर्ती वाले उम्मीदवारों में से दो - चार जीत भी गए तो वे टिकाऊ नहीं होंगे और बेहतर अवसर दिखते ही दाएं - बाएं होने में देर नहीं लगाएंगे। आम आदमी पार्टी तो अभी प्रदेश में अपने पांव जमाने की स्थिति में है। ऐसे में वह यदि मतलबपरस्त नेताओं को शरण देने की भूल करेगी तब ये अपने लिए गड्ढा खोदने जैसा होगा। चूंकि ये पार्टियां और निर्दलीय मिलकर ज्यादातर भाजपा विरोधी मतों में ही  सेंध लगाएंगे । इसलिए कांग्रेस के साथ उनके रिश्ते और बिगड़ने की आशंका बनी रहेगी जिसका असर 2024 के लोकसभा चुनाव में बनने जा रहे  गठबंधन पर पड़ना तय है। बेहतर होता ये पार्टियां अपने प्रभावक्षेत्र में सीमित सीटों पर वैचारिक तौर प्रतिबद्ध प्रत्याशी उतारतीं तब मतदाता उन्हें गंभीरता से लेते। लेकिन आज की स्थिति में इनको वोट कटवा ही माना जा रहा है। हो सकता है दल बदलू उम्मीदवारों के कारण कुछ सीटें इनकी झोली में आ जाएं किंतु जीते हुए विधायक ज्यादा देर साथ नहीं रहेंगे क्योंकि उनका उद्देश्य केवल अपना स्वार्थ साधना है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 27 October 2023

भारतीय नागरिकों को मौत की सजा सुनाकर कूटनीतिक दबाव बना रहा कतर


कतर नामक खाड़ी देश में  8 पूर्व भारतीय नौसैनिकों  को मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने से देश में खलबली है। सरकार ने इस पर अचरज जताते हुए उनको कानूनी सहायता देने की पहल की है। उन सब पर इजराइल के लिए जासूसी करने का आरोप है। वैसे भारत और कतर के आपसी संबंध काफी अच्छे हैं। लेकिन दुनिया के सभी इस्लामिक आतंकवादी संगठनों को वह खुलकर आर्थिक सहायता देता है । कतर की सऊदी अरब से जरा भी नहीं पटती । चूंकि इसके पास गैस का सबसे बड़ा भंडार है इसलिए अमेरिका तक उससे दबता है। जबकि वह इजराइल को फूटी आंखों नहीं देखना चाहता। बीते 7 अक्टूबर को गाजा पट्टी पर काबिज हमास नामक संगठन द्वारा इजराइल पर हमला किया जाने के बाद भारत ने इजराइल के साथ खड़े होने की जो पेशकश की उससे कतर नाराज बताया जाता है। कतर और ईरान वे देश हैं जो इस लड़ाई में खुलकर हमास के साथ खड़े हुए हैं। इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन का बयान आ गया कि हमास द्वारा इजराइल पर हमले के पीछे भारत - मध्यपूर्व यूरोप आर्थिक कारीडोर परियोजना है जिसके लिए दिल्ली में हुए जी - 20 सम्मेलन में अमेरिका , फ्रांस , इटली , यूरोपीय यूनियन , सऊदी अरब , यूएई ने  सहमति दी थी। इस कारीडोर को भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना गया। उल्लेखनीय है चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा  यूरोप तक वन बेल्ट वन रोड की जो योजना शुरू की गई थी वह खटाई में पड़ती जा रही है। अनेक देश उससे हाथ खींचते जा रहे हैं । यहां तक कि पाकिस्तान तक में  विरोध की आवाजें उठने लगीं। इससे चीन को जबरदस्त आर्थिक नुकसान हो रहा है। जी - 20 में जिनपिंग की गैर मौजूदगी में ही भारत द्वारा प्रस्तावित  कारीडोर पर रजामंदी बनी। चूंकि ईरान भी चीन की परियोजना में शामिल था इसलिए उसे भी भारत की ये सफलता रास नहीं आई। वह इस बात से भी भन्नाया हुआ है कि भारत - इजराइल बेहद निकट आ चुके हैं । दूसरी तरफ अमेरिका द्वारा सऊदी अरब और इजराइल के बीच दोस्ती करवाने के प्रयासों में रुकावट पैदा करने के लिए भी ईरान और कतर बेचैन थे । वैश्विक राजनीति के जानकार ये मानकर चल रहे हैं कि हमास के  हमले का निशाना  केवल इजराइल ही नहीं अपितु सऊदी अरब और भारत - मध्यपूर्व यूरोप आर्थिक कारीडोर भी है। कतर में पूर्व सैन्य अधिकारियों को मृत्यदंड के पीछे भी भारत द्वारा  इजराइल के साथ खड़े होने का फैसला बताया जाता है। उसका सोचना ये हो सकता है कि इस बहाने वह भारत को दबाने में कामयाब हो जाएगा। और फिर गैस की आपूर्ति को लेकर भी तो भारत काफी हद तक उस पर निर्भर है। कूटनीति  में जो दिखता है वास्तविकता उससे काफी हटकर रहती है। इसीलिए इजराइल पर हमास के हमले को भले ही फिलिस्तीन  से जोड़कर देखा गया किंतु असली कारण सऊदी अरब और इजराइल की दोस्ती में बाधा पैदा करना भी था । साथ ही  जिनपिंग की  खीझ भी है जो वन बेल्ट वन रोड परियोजना के खटाई में पड़ने से तो परेशान थे ही , जी - 20  सम्मेलन में नरेंद्र मोदी के भारत मध्यपूर्व यूरोप आर्थिक कारीडोर के प्रस्ताव पर अमेरिका,  यूरोप , यूएई  और सऊदी अरब की सहमति  मिलने से चीन के साथ ही ईरान और पाकिस्तान जैसे देश  परेशान हो उठे । हमास के  हमले के बाद जिस तरह से अरब देशों के साथ ही ईरान , कतर और चीन खुलकर उसके पक्षधर बनकर उभरे उससे बहुत सारी बातें स्पष्ट हो गईं। अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान और कतर में पूर्व भारतीय नौसैनिकों को मृत्युदंड के समाचार एक साथ आना भी महज संयोग है। ऐसा ऐसा लगता है पश्चिम एशिया में नया शक्ति संतुलन बनने  से  इस्लामिक देशों की एकजुटता  छिन्न - भिन्न होने लगी है। यूएई तो इजराइल से पहले ही दोस्ताना कायम कर चुका है। मिस्र ने भी  गाजा पट्टी से आने वाले शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए । सऊदी अरब के नए शाही शासक देश को आधुनिकता की ओर ले जाने प्रयासरत हैं।  ऐसे में इस्लाम के नाम पर आतंकवाद और कट्टरता के पोषक यदि उद्वेलित हैं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कतर में भारतीय नागरिकों को मौत की सजा दिया जाना भी भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाने की कोशिश है जिससे वह इजराइल के साथ खड़े रहने से बचे । हालांकि भारत सरकार ने फिलीस्तीन के भूमि अधिकार का समर्थन दोहराते हुए गाजा पट्टी में राहत सामग्री भी भेजी किंतु कतर द्वारा उठाए गए कदम के बाद प्रधानमंत्री श्री मोदी को वहां की सरकार से सीधे बात करनी चाहिए। ऐसे  अवसरों पर ही कूटनीतिक कुशलता की परीक्षा होती है। इस सबके बीच भारत को अपने राष्ट्रीय हितों के साथ विदेशों में रह रहे अपने नागरिकों की सुरक्षा की चिंता भी करनी होगी। उल्लेखनीय है कतर सहित खाड़ी देशों में लाखों भारतीय कार्यरत हैं।

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 रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 26 October 2023

शिक्षा , कला , साहित्य और संस्कृति का भारतीयकरण समय की मांग


एनसीईआरटी  (राष्ट्रीय शैक्षिक और अनुसंधान परिषद ) द्वारा अपनी पुस्तकों में देश का नाम इंडिया की जगह भारत लिखने की सिफारिश , एक सार्थक कदम है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत पाठ्यक्रम  में विषयों के नाम बदलने की प्रक्रिया चल रही है। उदाहरण के तौर पर प्राचीन इतिहास के स्थान पर शास्त्रीय इतिहास लिखने और भारत का ज्ञान नामक पुस्तक का प्रकाशन किया जाना है। विशेषज्ञों के साथ ही राज्यों से भी इस बारे में अभिमत लिया गया जिनमें से कुछ ने बदलाव के प्रति असहमति व्यक्त कर दी। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने कश्मीरी पंडितों के नरसंहार जैसी घटनाओं को पाठ्यक्रम में रखे जाने की पिछली सरकार की सिफारिश वापस ले ली। वहीं अनेक गैर भाजपा राज्य सरकारें अंधविश्वास से बचने की पक्षधर हैं तो कुछ संतुलन बनाए रखने की। इसमें दो मत नहीं हैं कि पाठ्यक्रम की विषयवस्तु का छद्म धर्मनिरपेक्षता के पैरोकारों ने जमकर सत्यानाश किया । दूसरा नुकसान अंग्रेजियत में डूबे तबके के हाथों हुआ। दुर्भाग्य से आजादी के बाद साम्यवादी विचारधारा के  चुनिन्दा लोग शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में घुस आए जिन्हें पंडित नेहरू ने प्रोत्साहित किया जो खुद सोवियत संघ की साम्यवादी क्रांति से प्रभावित थे। इसके अलावा विदेशों में शिक्षित लोग शिक्षा - शास्त्री बनकर व्यवस्था में बैठ गए और ज्ञान - विज्ञान का सारा श्रेय पश्चिम को देते हुए अंग्रेजी को प्रगतिशीलता की निशानी बना दिया। इस वजह से भारत के इतिहास ,    पौराणिक ग्रंथों , महानायकों और उपलब्धियों पर उपेक्षा की धूल डाली जाती रही। भारत के महान साहित्यकारों , कलाकारों और उनकी कलाओं  को नजरंदाज किया जाने लगा । देश के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगाने वाले महाराणा प्रताप की बजाय अकबर को महान बताया जाने लगा। गुलाम मानसिकता के प्रतीक चिन्ह मार्ग देश की राजधानी में बाबर , हुमायूं , औरंगजेब के नाम पर बनाए गए। प्रशासन में भी भारतीय संस्कृति को पिछड़ेपन से जोड़कर देखने वाले कथित आधुनिक भर गए । वर्तमान दुरावस्था का सबसे बड़ा कारण शिक्षा पद्धति और पाठ्यक्रम ही है जिसने हमारे इतिहास और संस्कृति के गौरवशाली पक्ष पर परदा डालते हुए  निराशाजनक पहलुओं को उभारने का प्रयास किया । केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद नई शिक्षा नीति पर काम शुरू हुआ और अब जाकर पाठ्यक्रम में सकारात्मक बदलाव और सुधार  किए जाने की प्रक्रिया प्रारंभ होने जा रही है। प्राचीन ग्रंथों पर शोध कार्य को यदि प्रोत्साहन और संरक्षण दिया गया होता तो युवा पीढ़ी को पश्चिम से प्रभावित होने से रोका जा सकता था। लेकिन प्रतिभा पलायन का जो  सिलसिला आजादी के बाद शुरू हुआ उसे रोकने के लिए सार्थक प्रयास कभी हुए ही नहीं क्योंकि  हमारे नीति नियंता ही भारतीयता को लेकर हीन भावना से ग्रसित रहे । उस दृष्टि से एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम और पुस्तकों का भारतीयकरण किया जाना 21 वीं सदी को भारत के नाम लिखने के लिए नितांत जरूरी है। हजारों साल पहले भारत में विज्ञान और तकनीक का जो विकास हुआ वह उन मंदिरों में देखा जा सकता है जिनकी अभी तक उपेक्षा होती रही। आजकल भारत की प्राचीन स्थापत्य और वास्तु कला के सैकड़ों ऐसे स्मारकों की जानकारी आ रही है जिनके सामने ताजमहल तुच्छ है। उनके निर्माण में जिस इन्जीनियरिंग कौशल और खगोलीय ज्ञान का उपयोग किया गया उसे देखकर पश्चिम के वैज्ञानिक भौचक रह जाते हैं किंतु हमारे देश में मुगल इतिहास और वामपंथी विचारधारा से प्रभावित शिक्षा शास्त्रियों को वह सब महत्वहीन प्रतीत होता है। हमारे पौराणिक ग्रंथों में जिन प्रसंगों का विवरण है उनका समुचित अध्ययन कर ईमानदारी से शोध किया जाए तो ये साबित किया जा सकता है कि आज पश्चिम जिन बातों के आधार और खुद को श्रेष्ठ समझता है वे सब भारतीय ज्ञान परंपरा का अभिन्न अंग रहीं। लेकिन कालांतर में  राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के कारण राष्ट्र के व्यापक हितों को  उपेक्षित किए जाने से हमारे सीमांत असुरक्षित हुए जिससे विदेशी लुटेरों के हमले होने लगे जो भारत की संपन्नता के किस्से सुनकर  लूटपाट करने आते और लौट जाते। धीरे - धीरे उन्हें लगा  कि यहां के शासक संकीर्ण मानसिकता के शिकार हैं जिसने उनको बार - बार आने के अवसर दिए  । अंततः वे यहां राज करने के इरादे पाल बैठे जिससे सैकड़ों वर्षों के लिए  गुलामी ने हमें जकड़ लिया। उसी का दुष्परिणाम प्राचीन ज्ञान , विज्ञान, कला और संस्कृति पर विदेशी प्रभाव के रूप में देखा जा सकता है। 1193 में बख्तियार खिलजी नामक एक मुस्लिम आक्रांता ने नालंदा के पुस्तकालय को आग के हवाले कर दिया ताकि हमारी समूची ज्ञान संपदा भस्म हो जाए। इसी तरह मुस्लिम शासकों ने ऐतिहासिक मंदिरों एवं सांस्कृतिक केंद्रों को ध्वस्त किया जिससे भारत की धार्मिक - सांस्कृतिक जड़ें नष्ट हो जाएं। अंग्रेजों ने तोड़फोड़ तो नहीं की किंतु हमारे अभिजात्य वर्ग में भारतीयता के प्रति हीन भावना का बीजारोपण जरूर कर दिया जिसका असर अभी भी स्पष्ट नजर आता है। देश का वह वर्ग जो अंग्रेजी के चार अक्षर भी लिख -  पढ़ नहीं सकता वह भी अंग्रेजियत से जुड़ने की कोशिश करता है। इससे जो नुकसान हुआ उसका आकलन करना बेहद कठिन है किंतु समय आ गया है जब शिक्षा, कला , साहित्य और संस्कृति का भारतीयकरण किया जाए । एनसीईआरटी द्वारा इस दिशा में प्रारंभ किए गए प्रयास को व्यापक समर्थन मिलना चाहिए क्योंकि इसका उद्देश्य भावी पीढ़ी के मन में भारतीयता के प्रति आदर का भाव उत्पन्न करना है।


- रवीन्द्र वाजपेयी