Monday, 4 December 2023
मोदी के मुकाबले एक बार फिर बौने साबित हुए राहुल
Saturday, 2 December 2023
मुसलमानों को अपने पाले में खींचने में कामयाब होती लग रही कांग्रेस
कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस की सफलता का सबसे बड़ा कारण मुस्लिम मतदाताओं का देवगौड़ा परिवार के जनता दल ( सेकुलर ) से छिटक कर उसकी तरफ घूम जाना रहा। परिणामस्वरूप भाजपा का मत प्रतिशत तो यथावत रहा किंतु जनता दल ( सेकुलर ) का 5 प्रतिशत कम होकर कांग्रेस के खाते में आ गया। दरअसल कांग्रेस मुस्लिमों में ये बात फैलाने में पूरी तरह से सफल रही कि पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी.देवगौड़ा के पुत्र कुमार स्वामी भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन सकते हैं। इसका कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा काफी समय से देवगौड़ा जी की प्रशंसा किया जाना था। हालांकि 2018 में त्रिशंकु विधानसभा बनने के बाद कुमारस्वामी को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनवाया था । दलबदल के कारण वह सरकार के गिरने से भाजपा सत्ता में आ गई किंतु 2023 में कांग्रेस और जनता दल ( सेकुलर ) में गठजोड़ नहीं हो सका। बीते अनेक चुनावों से राज्य का मुस्लिम समुदाय जनता दल ( सेकुलर ) से जुड़ा हुआ था। लेकिन पिछले चुनाव में उसका ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में होने से देवगौड़ा परिवार मैसूर अंचल के अपने प्रभाव क्षेत्र तक में मात खा गया। ये भी देखने में आया कि दूसरे राज्यों से मुस्लिम धर्मगुरुओं ने कर्नाटक आकर मुस्लिम मतदाताओं के मन में ये बात बिठा दी कि जनता दल ( सेकुलर ) का समर्थन करने से भाजपा मजबूत होगी। ये समझाइश काम कर गई और कांग्रेस को अच्छा खासा बहुमत मिल गया। उसी के बाद कुमारस्वामी ने भाजपा की ओर हाथ बढ़ाया जिससे वे कम से कम लोकसभा चुनाव में तो प्रासंगिक बने रहें। इस प्रकार कांग्रेस का ये कहना कि फलां पार्टी भाजपा की बी टीम है , उसकी रणनीति का हिस्सा बनने लगा। उल्लेखनीय है असदुद्दीन ओवैसी को लेकर उसका ये प्रचार काफी समय से चला आ रहा है और इसका प्रभाव भी कम से कम उत्तर भारत में तो देखने मिला ही । लेकिन कर्नाटक के बाद कांग्रेस ने जिस कुशलता से तेलंगाना में इस दांव को आजमाया उसके अनुकूल परिणाम देखने मिल रहे हैं। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के बाद एग्जिट पोल के जो निष्कर्ष आए हैं वे सभी तेलंगाना में बीआरएस सरकार की विदाई का संकेत देते हुए कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने का दावा कर रहे हैं। और इसका सबसे बड़ा जो कारण बताया जा रहा है कि हैदराबाद महानगर में ओवैसी के आभामंडल के अलावा अन्य शहरों , कस्बों और गांवों में फैले मुसलमानों के बीच कांग्रेस का ये नारा असर कर गया कि भाजपा के दो यार - ओवैसी और केसीआर । यद्यपि भाजपा गलत फैसले करने के कारण मुकाबले में पूरी तरह नजर नहीं आई किंतु प्रधानमंत्री के इस बयान से कि श्री राव उनके पास एनडीए में शामिल होने आए थे किंतु उन्होंने मना कर दिया , भाजपा को तो लाभ हुआ नहीं किंतु बीआरएस मुसलमानों की नजर में गिर गई जिसका फायदा कांग्रेस को मिला । हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि एग्जिट पोल ही परिणाम है किंतु इतना तो तय है कि तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं के अलावा मुस्लिम तुष्टिकरण के तमाम फैसलों के बावजूद श्री राव 2018 वाला जादू कायम रखने में विफल प्रतीत हो रहे हैं तो उसका कारण मुसलमानों का कांग्रेस पर मेहरबान होना है। यदि ऐसा वाकई होता है और तेलंगाना में तमाम अनुमानों के मुताबिक कांग्रेस सत्ता हथिया लेती है तब ये राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलाव का कारण बने बिना नहीं रहेगा। विशेष रूप से उ.प्र, बिहार और प.बंगाल में क्रमशः अखिलेश यादव , लालू और नीतीश के अलावा ममता बैनर्जी के लिए चिंता के कारण उत्पन्न हो जाएंगे। सबसे बड़ी बात ये होगी कि इंडिया नामक गठबंधन में कांग्रेस हावी होने की स्थिति में आ जाएगी । महाराष्ट्र में शरद पवार की राजनीति भी काफी हद तक मुस्लिम मतों पर टिकी हुई है जो इस बदलाव से कमजोर हो सकती है। कुल मिलाकर ये मान लेना गलत न होगा कि यदि तेलंगाना कांग्रेस के कब्जे में आता है तो इसका साफ मतलब होगा कि बाबरी ढांचा गिरने के बाद जो मुसलमान उससे दूर चले गए थे वे भाजपा के बढ़ते प्रभुत्व से घबराकर वापस लौट रहे हैं। और ऐसा होने से अल्पसंख्यकों के बल पर राजनीति करने वाली अनेक तीसरी ताकतें घुटनों के बल आने मजबूर हो जाएंगी। ये बदलाव कांग्रेस को कितना लाभ पहुंचा सकेगा वह तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन इसका जवाबी असर हिंदुओं के ध्रुवीकरण के तौर पर किस मात्रा में होता है ये देखने वाली बात होगी क्योंकि हिंदुत्व का झंडा उठाकर घूमने के बाद भी भाजपा को सभी राज्यों में हिंदुओं का उतना समर्थन प्राप्त नहीं हो पाता जितना मुस्लिम उसका विरोध करते हैं। ऐसा लगता है कांग्रेस ने काफी सोच - समझकर मुसलमानों को बाकी गैर भाजपाई पार्टियों के शिकंजे से मुक्त करवाने की जो रणनीति कर्नाटक के बाद तेलंगाना में भी अपनाई वह फिलहाल तो काम करती दिख रही है। लोकसभा चुनाव के लिए जो इंडिया गठबंधन बना है उसके घटक दल कांग्रेस के इस पैंतरे पर क्या रुख अपनाते हैं ये उत्सुकता का विषय है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Friday, 1 December 2023
नींद तो एग्जिट पोल करने वालों को भी नहीं आएगी
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के जो एग्जिट पोल गत दिवस जारी हुए उनमें कुछ तो चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से मेल खाते हैं वहीं कुछ में थोड़ा तो कुछ में काफी अंतर है। एग्जिट पोल करने वाली संस्थाएं भी 3 फीसदी घट - बढ़ की संभावना व्यक्त करती हैं। ऐसे में जहां मुकाबला नजदीकी होता है वहां उलटफेर देखने मिलता है परंतु जीत हार के बीच लंबा अंतर वाले अनुमान काफी हद तक सही होते हैं। हमारे देश में चुनाव पूर्व सर्वेक्षण सबसे पहले 1984 के लोकसभा चुनाव में प्रणय रॉय और विनोद दुआ द्वारा शुरू किया गया था। उसके बाद इसका चलन बढ़ा । बाजारवाद के आगमन के साथ ही अनेक सर्वेक्षण संस्थान ग्राहकों की पसंद - नापसंद पता कर उत्पादक को देने लगे जिससे वे अपनी विक्रय रणनीति तय करते हैं। गुणवत्ता में सुधार हेतु भी सर्वेक्षण का उपयोग किया जाने लगा है। धीरे - धीरे राजनीतिक दल भी सर्वेक्षण के जरिए मतदाताओं के मन को पढ़ने का प्रयास करने लगे । आजकल प्रत्याशी चयन के अलावा चुनावी वायदे भी सर्वेक्षण के जरिए तय किए जाते हैं। अनेक पत्र - पत्रिकाएं और टीवी चैनल समय - समय पर देश का मूड जानने के लिए सर्वेक्षण करवाकर उसे प्रचारित करते हैं जिनमें सरकार के प्रति जनमानस की सोच उजागर होती है। ये सब देखते हुए सर्वेक्षण एक बड़े व्यवसाय के तौर पर स्थापित हुआ है। हालांकि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण की उपयोगिता तो समझ में आती है किंतु एग्जिट पोल के औचित्य पर ये कहकर सवालिया निशान लगाए जाते हैं कि मतगणना के पहले अंदाजिया घोड़े दौड़ाने से हासिल क्या होता है? इसके जवाब में कहा जाता है कि जहां एक से अधिक चरणों में मतदान होता है वहां राजनीतिक दल हर चरण के बाद एग्जिट पोल से मिले संकेतों के मुताबिक अपनी रणनीति निर्धारित करते हैं। लेकिन कल जो एग्जिट पोल आए वे केवल बुद्धिविलास का विषय हैं । दरअसल , उनके जरिए सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियां अपनी कार्यकुशलता प्रमाणित करती हैं। मसलन जिसका एग्जिट पोल परिणाम के जितने नजदीक होगा उसका व्यवसाय और बढ़ेगा । उस दृष्टि से देखें तो जो निष्कर्ष कल जारी हुए उनमें कुछ अनुमान एक दूसरे का समर्थन करते हैं तो कुछ में काफी अंतर है। लेकिन जिन दो - तीन एजेंसियों की साख अच्छी है उनके एग्जिट पोल पर भरोसा करें तो छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की बढ़त स्पष्ट है। उसी तरह तेलंगाना केसीआर के हाथ से खिसकता दिख रहा है। राजस्थान पर जहां भारी अनिश्चितता है वहीं म.प्र में भाजपा आसानी से बहुमत हासिल कर लेगी । यद्यपि वह जितना बड़ा दर्शाया गया है उसे लेकर आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा है। हालांकि म.प्र में भाजपा को भारी सफलता मिलती है तो ये उन चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों को झुठलाने वाला होगा जिनमें बेहद करीबी टक्कर के बावजूद कांग्रेस का पलड़ा भारी बताया गया था। इसी तरह राजस्थान में सभी सर्वेक्षण भाजपा की जीत को निश्चित बता रहे थे किंतु एग्जिट पोल के मुताबिक कांग्रेस दौड़ से पूरी तरह बाहर नहीं हुई है। मिजोरम चूंकि राष्ट्रीय राजनीति की मुख्य धारा से अलग है इसलिए लोगों की उसके बारे में ज्यादा रुचि नहीं है किंतु तेलंगाना के अनुमान जरूर चौंकाने वाले हैं क्योंकि के .सी . रेड्डी की बीआरएस नामक क्षेत्रीय पार्टी को 2018 में भारी बहुमत हासिल हुआ था। ऐसे में कांग्रेस को बड़ी सफलता मिलने से श्री रेड्डी का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा जो कांग्रेस और भाजपा दोनों के निशाने पर हैं। छत्तीसगढ़ में एकाध एग्जिट पोल ही भाजपा को बहुमत दे रहा है जबकि ज्यादातर में वह 2018 के प्रदर्शन से काफी बेहतर प्रदर्शन करने जा रही है और ऐसे में बहुमत के जादुई आंकड़े को स्पर्श कर ले तो वह सबसे बड़ा उलटफेर होगा। ढेर सारे एग्जिट पोल चूंकि अलग - अलग निष्कर्ष दे रहे हैं इसलिए असमंजस और बढ़ गया है। मसलन म.प्र में कांग्रेस जहां अपनी हार स्वीकार नहीं कर रही वहीं राजस्थान को लेकर भाजपा का भी कहना है कि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में उसकी सरकार बनने का जो अनुमान था वही नतीजे में परिलक्षित होगा। दो दिन बाद दोपहर तक स्थिति पूरी तरह साफ हो जाएगी। तब तक एग्जिट पोल को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म रहेगा। वैसे जो संकेत मोटे तौर पर मिल रहे हैं उनके अनुसार तेलंगाना को छोड़कर तीनों मुख्य राज्यों में राजनीति भाजपा और कांग्रेस के बीच दो ध्रुवीय होती दिख रही है। लेकिन म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस का प्रदर्शन उसकी उम्मीदों के अनुसार नहीं रहा तब सपा और आम आदमी पार्टी को उस पर हावी होने का मौका मिल जायेगा जिनके साथ गठबंधन करने से कांग्रेस ने साफ मना कर दिया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने म.प्र बचा लिया और राजस्थान कांग्रेस से छीन लिया तो उसका उत्साह बढ़ जाएगा । वहीं तेलंगाना और छत्तीसगढ़ जीतकर भी कांग्रेस भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकेगी और इंडिया गठबंधन के सहयोगी दल उस पर दबाव बनाने में जुट जाएंगे। के. सी.रेड्डी यदि अपनी गद्दी गंवा बैठे तो वे तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद में जुटे बिना नहीं रहेंगे। 3 दिसंबर की शाम तक पांचों राज्यों की स्थिति स्पष्ट होने तक अनुमानों के घोड़े दौड़ते रहेंगे। नींद तो एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों को भी नहीं आएगी क्योंकि उनकी विश्वसनीयता भी तो कसौटी पर है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Thursday, 30 November 2023
राष्ट्रीय नेता बनने के फेर में राज्य भी गंवा देंगे नीतीश
बिहार किसी न किसी कारण से चर्चाओं में रहता ही है। उ.प्र के बाद देश को सबसे ज्यादा आई.ए.एस और आई.पी. एस देने वाले इस राज्य में आर्थिक और सामाजिक विषमता चरम पर रही है। इसलिए आजादी के 75 वर्ष बीतने के बावजूद बिहार जातिवाद के शिकंजे से मुक्त नहीं हो सका । जबकि अतीत में जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर जैसे धुरंधर समाजवादी नेताओं की कर्मभूमि रहे इस राज्य ने सामाजिक समरसता का बिगुल फूंकने में अग्रणी भूमिका निभाई। महात्मा गांधी ने जिस चंपारण से स्वाधीनता आंदोलन शुरू किया वह यहीं है और 1974 के संपूर्ण क्रांति आंदोलन की चिंगारी भी बिहार से ही भड़की। मगध साम्राज्य के गौरवशाली इतिहास का साक्षी रहे बिहार को नालंदा जैसे शिक्षा केंद्र के कारण विश्वव्यापी ख्याति मिली। बुद्ध और महावीर जैसे युगपुरूषों की यह जन्मभूमि रही। लेकिन धीरे - धीरे बिहार का प्राचीन गौरव क्षीण होता गया और अपने स्वर्णिम अतीत से सर्वथा पृथक यह गरीबी , पिछड़ेपन , जातिवादी संघर्ष , शोषण और पलायन का जीवंत उदाहरण बनकर रह गया। बीमारू राज्यों में पहले क्रम पर बिहार को रखा जाना इसका प्रमाण है। देश के विभिन्न हिस्सों में फैले बिहारी श्रमिक इस राज्य की दयनीय स्थिति का बयान करते हैं। बिहार रातों - रात इस दुर्दशा को प्राप्त हुआ ऐसा नहीं है किंतु आज जो हालात हैं उनके लिए काफी कुछ लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार का राज है जिसने इस राज्य को अराजकता का पर्याय बना दिया था। सामाजिक न्याय और धर्म निरपेक्षता का लबादा ओढ़कर लालू ने जिस परिवारवाद और भ्रष्टाचार का उदाहरण पेश किया उसी का परिणाम है कि समाजवादी आंदोलन से जुड़े तमाम साथी उनसे छिटकते गए । उन्हीं में से एक हैं राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जो उनके जंगलराज से लड़ने वालों में अग्रणी रहे । जार्ज फर्नांडीज जैसे प्रखर समाजवादी दिग्गज के साथ समता पार्टी का गठन कर वे भाजपा के नेतृत्व वाले एन.डी.ए में शामिल होकर केंद्र में मंत्री और बाद में भाजपा के साथ मिलकर बिहार के मुख्यमंत्री बने। उस दौरान बिहार की छवि में काफी सुधार हुआ । कानून - व्यवस्था पटरी पर लौटी , आर्थिक विकास भी नजर आने लगा जिसकी वजह से बीमारू राज्य का दाग भी कुछ हल्का पड़ने लगा । इस सबके कारण ही नीतीश को सुशासन बाबू जैसा संबोधन प्राप्त हुआ। लेकिन बीते एक दशक में उनका राजनीतिक व्यवहार जिस प्रकार से बदला उसके कारण वे उन्हीं लालू के शिकंजे में उलझ गए जिन्हें उन्होंने जेल भिजवाया था । उनका यह कदम दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निजी कुढ़न के कारण उठाया गया था। यद्यपि बीच में वे एक बार फिर श्री मोदी के साथ आकर भाजपा से जुड़े किंतु केंद्रीय मंत्रीमंडल में उनके दल को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने की खुन्नस में फिर लालू एंड कंपनी के संग गठजोड़ कर लिया। इस सबसे उनकी निजी छवि खराब हो गई और सुशासन बाबू का खिताब भी हाथ से जाता रहा। हालांकि आज के राजनीतिक माहौल में इस तरह की पैंतरेबाजी चौंकाती नहीं है किंतु प्रधानमंत्री पद का दावेदार होने के बावजूद नीतीश जिस तरह का राजनीतिक व्यवहार करने लगे वह दिशाहीनता का संकेत है। उनके हालिया फैसले इसका प्रमाण हैं। जातीय जनगणना के बाद हिन्दू त्यौहारों के सरकारी अवकाश कम करने और मुस्लिम पर्वों पर बढ़ाने का फैसला ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि उनकी सोच सतही होने लगी है। इस निर्णय के कारण अपने दल के भीतर ही उनको अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। जातीय जनगणना के विवाद से वे उबर पाते उसके पूर्व ही हिन्दू तीज - त्यौहारों की छुट्टियां कम करने जैसा निर्णय उनके गले कि फांस बन गया। अब उनकी पार्टी के नेतागण इस फैसले को बदलने का आश्वासन देकर चमड़ी बचाने का प्रयास कर रहे हैं किंतु जो नुकसान होना था वह हो चुका। भाजपा ने इसे मुद्दा बनाया ये तो स्वाभाविक था किंतु बिहार का आम जनमानस भी नीतीश के बदलते राजनीतिक आचरण से हतप्रभ है। बिहार के बाहर भी जो लोग उनको एक सुलझा हुआ दूरदर्शी राजनेता समझते थे वे भी अपनी राय बदलने मजबूर हो रहे हैं। एक जमाना था जब मुलायम सिंह यादव ने उ.प्र की राजनीति में मुस्लिम तुष्टिकरण का रंग भर दिया था। उसके चलते समाजवादी पार्टी को कुछ फायदा जरूर हुआ किंतु धीरे - धीरे उसके हाथ से हिन्दू छिटके और अब मुसलमानों का भी मोहभंग होने लगा है। नीतीश को इससे सबक लेना चाहिए था क्योंकि भाजपा और मोदी विरोध में वे जिस रास्ते पर बढ़ चले हैं वह उनके राजनीतिक पराभव का कारण बने बिना नहीं रहेगा । पता नहीं उनका सलाहकार कौन है जो उन्हें इस तरह की मूर्खतापूर्ण सलाह देता है। नीतीश राजनीतिक तौर पर भले ही भाजपा का कितना भी विरोध करें लेकिन उन्हें समाज को जाति में विभाजित करने के साथ ही हिन्दू समाज की भावनाओं को आहत करने से बचना चाहिए। ऐसा लगता है वे इंडिया गठबंधन के नेता बनने के लालच में मुस्लिम तुष्टिकरण में लग गए हैं। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय नेता बनने के फेर में वे राज्य में भी अपनी पकड़ को बैठें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Wednesday, 29 November 2023
श्रमिकों का बचना सुखद किंतु विकास की आड़ में हो रहे विनाश को रोका जाए
12 नवंबर को उत्तराखंड के उत्तरकाशी इलाके में निर्माण कार्य के दौरान सिलक्यारा सुरंग ( टनल ) धसक जाने से 41 श्रमिक भीतर फंस गए थे। प्रारंभ में तो ये आशंका थी कि वे सभी भीतर ही दबकर दम तोड़ देंगे। कई टन मलबा सुरंग के ऊपर और मुहानों पर होने के कारण भीतर फंसे लोगों से संपर्क नहीं हो पाने के कारण स्थिति का कुछ पता नहीं चल पा रहा था । लेकिन एन.डी.आर एफ (राष्ट्रीय आपदा अनुक्रिया बल ) ने उस चुनौती को स्वीकार किया और ऐसा बचाव अभियान हाथ में लिया जो भारत के लिए पहला अनुभव था। एन.डी.आर एफ को विदेशों से मंगाए गए उपकरण भी उपलब्ध करवाए गए। दरअसल इस अभियान में खतरा ये था कि सुरंग के भीतर जाने का रास्ता बनाने के लिए की जा रही ड्रिलिंग से जो ठोस जगह थी , वह भी धसक न जाए और बचाव कार्य पूरी तरह बंद करना पड़े। बीते 17 दिनों में अनेक क्षण ऐसे आए जब कभी उपकरण खराब हुए तो कभी जहां श्रमिकों तक पहुंचने हेतु छेद किया जा रहा था वहां की मिट्टी भसक गई। कुछ दिनों बाद जब एक पाइप भीतर तक पहुंचा और उन श्रमिकों से संपर्क कायम हो सका तब ये जानकर बचाव दल का हौसला बढ़ा कि सभी 41 श्रमिक न सिर्फ जीवित अपितु आत्मविश्वास से भरे हुए थे। धीरे - धीरे उन तक भोजन , पानी आदि पहुँचाने की व्यवस्था पाइप के जरिए की गई। कैमरों की मदद से उनकी कुशलता का प्रमाण भी मिला जिससे उनके परिजनों को उनके जीवित रहने का विश्वास हुआ। 17 दिनों तक दिन रात चले अभियान के उपरांत कल देर शाम पहला श्रमिक बाहर लाया गया और कुछ ही देर में सभी सकुशल मौत के मुंह से बाहर आने में कामयाब हो गए। इस अभियान से आपदा प्रबंधन में हमारे बढ़ते आत्मविश्वास का परिचय तो मिला ही । साथ में एन.डी.आर एफ , सेना , उत्तराखंड शासन - प्रशासन के साथ ही केंद्र सरकार के बीच बेहतरीन समन्वय भी सामने आया। केंद्रीय मंत्री और पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वी.के.सिंह की घटनास्थल पर उपस्थिति इसका प्रमाण रही। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी बचाव दल का हौसला बढ़ाते रहे। निश्चित रूप से इस अभियान की सफलता की चर्चा विश्व भर में होगी क्योंकि भविष्य में होने वाली ऐसी ही दुर्घटना के समय बचाव कार्य में यह अनुभव काम आएगा। भारत में प्राकृतिक आपदाएं आती ही रहती हैं। उनके अलावा विभिन्न प्रकार के हादसे भी यदाकदा होते रहते हैं। जिनमें रेल दुर्घटनाएं भी उल्लेखनीय हैं। उस दौरान एन.डी.आर एफ राहत और बचाव के काम में सबसे आगे रहता है। उसके काम को वैश्विक स्तर पर भी प्रशंसा मिलने लगी है। उदाहरण के लिए तुर्की में आए विनाशकारी भूकंप के समय भारत सरकार ने ऑपरेशन दोस्त के अंतर्गत सेना के साथ ही एन.डी.आर एफ का को दल वहां भेजा उसने 10 दिन वहां बचाव कार्य किया । और जब उसके सदस्य लौट रहे थे तो तुर्की के लोगों ने हवाई अड्डे पर जो भावभीनी विदाई दी वह एक सुखद अनुभव था। लेकिन इस हादसे से एक और मुद्दा गहन रूप से विचारणीय हो गया है और वह है उत्तराखंड सहित समूचे हिमालय क्षेत्र में विकास के कारण प्राकृतिक संतुलन के साथ हो रही छेड़छाड़। कुछ समय पहले जब जोशीमठ में भूमि के फटने के कारण पूरे शहर का अस्तित्व खतरे में आ गया था तब भी इस बात को लेकर काफी हल्ला मचा था कि कथित विकास उत्तराखंड के गढ़वाल अंचल में प्राकृतिक आपदाओं का आधार बन रहा है। टिहरी बांध के निर्माण का विरोध करने वालों ने दशकों पूर्व जिन खतरों की चेतावनी दी थी वे समय के साथ ही सच साबित होती जा रही हैं। ताजा हादसे का सुखद पहलू ये जरूर है कि सुरंग में फंस गए 41 श्रमिक 17 दिन तक हर पल मृत्यु की आहट सुनते रहने के उपरांत जीवित लौट आए किंतु इस खुशी के साथ ही यह हादसा कैसे हुआ उसकी जांच के अलावा उत्तराखंड और शेष पहाड़ी क्षेत्रों में किए जा रहे विकास कार्यों की समीक्षा करते हुए ये देखा जाना जरूरी है कि प्राकृतिक भूगर्भीय संरचना को नुकसान पहुंचाकर किया जा रहा विकास कहीं विनाश का कारण तो नहीं बन रहा? इस बारे में ये बात ध्यान रखने योग्य है कि विज्ञान और तकनीक चाहे जितनी विकसित हो जाए किंतु प्रकृति की अदृश्य शक्ति के सामने वे असहाय होकर रह जाती हैं। सिलक्यारा सुरंग हादसे में भी जब विदेशों से आए महंगे उपकरण जवाब दे गए तब अंततः प्रतिबंधित कर दी गई परंपरागत पद्धति ही कारगर साबित हुई। वैसे तो एन.डी.आर एफ के दल इस दौरान हुए अनुभवों पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे ही किंतु केंद्र और उत्तराखंड सरकार को भी चाहिए कि विकास कार्यों का ऐसा तरीका अपनाने पर जोर दिया जाए जिससे प्राकृतिक संतुलन में गड़बड़ी न हो। बहरहाल एन.डी.आर एफ सहित बचाव कार्य में बिना रुके और बिना थके लगे रहे सभी लोगों के प्रयासों की पूरा देश सराहना कर रहा है किंतु इस सफलता से आत्ममुग्ध होने के बजाय उन कारणों का सूक्ष्म विश्लेषण होना भी जरूरी है जिनके चलते 41 श्रमिकों की जान तो खतरे में पड़ी ही करोड़ों रु. लगाकर किए जा रहे विकास कार्यों के औचित्य पर भी सवाल उठ खड़े हुए हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी