Monday, 4 December 2023

मोदी के मुकाबले एक बार फिर बौने साबित हुए राहुल



चार राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम भाजपा के लिए जबरदस्त उत्साहवर्धक रहे। हिमाचल और कर्नाटक में मिली पराजय के बाद पार्टी की चिंताएं बढ़ रही थीं। दूसरी तरफ कांग्रेस का मनोबल आसमान छूने लगा। राजनीतिक विश्लेषक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू खत्म होने के साथ ही राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को पांसा पलटने वाली बताने लगे । यही वजह थी कि कुछ महीनों पहले तक तेलंगाना में हाशिये पर समझी जा रही कांग्रेस पूरे आत्मविश्वास के साथ उतरी और जल्द ही उसकी जीत के संकेत भी आने लगे। इसके बाद से ही ये अवधारणा तेजी से फैली कि म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी कांग्रेस अपना परचम फहराने में सफल हो जाएगी। म.प्र के बारे में तो खुद भाजपाई भी मानने लगे थे कि मुकाबला कड़ा है और जरा सी चूक से 2018 की पुनरावृत्ति हो सकती है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सरकार द्वारा चलाई गई जनकल्याणकारी योजनाएं कांग्रेस की वापसी का आधार मानी जा रही थीं। हालांकि बाद में राजस्थान में भाजपा की संभावनाएं बढ़ने लगीं किंतु छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की सरकार को अपराजेय मानते हुए यहां तक कहा जाने लगा कि वहां भाजपा आधे - अधूरे मन से मैदान में उतरी थी। तेलंगाना में भाजपा ने कुछ समय पहले प्रदेश अध्यक्ष बदलकर अपनी आक्रामकता खत्म कर दी थी जिससे कांग्रेस को अवसर मिल गया। हालांकि वहां पार्टी की सीटें 1 से बढ़कर 8 हो गईं । मतदान के बाद आए एग्जिट पोल के दो निष्कर्ष तो एकमतेन थे कि तेलंगाना और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस आसानी से जीतेगी जबकि म.प्र और राजस्थान को लेकर मतभिन्नता थी। एक दो पोल में म.प्र में भाजपा की बड़ी जीत बताने वालों का खूब मजाक भी उड़ा । वहीं राजस्थान में ज्यादातर लोग बराबरी की टक्कर मान रहे थे। लेकिन नतीजों ने सबको चौंका दिया। म.प्र में भाजपा की प्रचंड विजय के साथ ही राजस्थान में सुविधाजनक बहुमत मिलने तक तो ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ किंतु जैसे - जैसे छत्तीसगढ़ के परिणाम आते गए वैसे - वैसे सभी चौंक गए। भाजपा ने तेलंगाना छोड़ बाकी तीन राज्य जीतकर ये दिखा दिया कि हिमाचल और कर्नाटक की पराजय से सबक लेकर उसने अपनी कमजोरियों को दूर किया और समूचे चुनाव अभियान को बेहद पेशेवर अंदाज में संचालित किया। दूसरी तरफ कांग्रेस इस चुनाव में कर्नाटक की खुमारी से उबरती नहीं दिखी और उसने स्थानीय समीकरणों की घोर उपेक्षा की । गुटबाजी भाजपा में भी कम नहीं थी। टिकटों के लिए उसमें भी वही सब देखने मिला जो कांग्रेस में नजर आता था किंतु उसे दूर करने के लिए केंद्रीय नेतृत्व ने हरसंभव प्रयास किए जिसका सुखद परिणाम निकला। हारी हुई सीटों पर जिस तरह की व्यूह रचना भाजपा द्वारा की गई उसे कांग्रेस समझ ही नहीं सकी जिससे दो राज्य तो उसके हाथ से निकले ही म.प्र में भी उसे शर्मिंदगी उठानी पड़ी । शिवराज सिंह चौहान की लाड़ली बहना योजना ने जो इबारत दीवार पर लिखी उसे न कमलनाथ पढ़ सके और न ही दिग्विजय सिंह। कमलनाथ तो इतने आत्ममुग्ध थे कि उन्होंने चुनाव संचालन में किसी को हिस्सेदारी नहीं दी और पार्टी संगठन को निजी संपत्ति मान बना बैठे । इसीलिए आखिर - आखिर में दिग्विजय भी ठंडे होकर बैठ गए। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास के शिकार हुए। भाजपा ने दबे पांव वहां के चुनाव में आमद दर्ज कराई और मुकाबला जीत लिया । राजस्थान में कांग्रेस जीत सकती थी लेकिन आलाकमान अशोक गहलोत और सचिन पायलट का झगड़ा सुलझाने में असफल रहा जिसके कारण उसके हाथ से जीत छिन गई। दूसरी तरफ भाजपा ने कांग्रेस की गलतियों से फायदा उठाने के अलावा अपनी कमियों को दूर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सही बात ये है कि जिस तरह डा.मनमोहन सिंह की सरकार नीतिगत अनिर्णय के कारण जनता का भरोसा खो बैठी वही स्थिति कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व अर्थात गांधी परिवार की है जो पेचीदा मामलों में निर्णय लेने से बचता है। इसका पहला उदाहरण पंजाब था जहां अमरिंदर सिंह और नवजोत सिद्धू के झगड़े ने कांग्रेस का सत्यानाश कर दिया। लगभग वही कहानी राजस्थान में दोहराई जाती रही। हाईकमान के फैसले के विरुद्ध श्री गहलोत ने जिस तरह से बगावत का झंडा उठाया वह मामूली बात नहीं थी। गांधी परिवार न तो उन पर दबाव बना सका और न ही सचिन पायलट को उनके साथ सामंजस्य बनाने के लिए राज़ी कर सका। छत्तीसगढ़ में भी 2018 की जीत के बाद भूपेश बघेल और टी. एस. सिंहदेव के बीच ढाई - ढाई साल मुख्यमंत्री रहने का समझौता हुआ किंतु उसका पालन नहीं होने से श्री सिंहदेव नाराज बने रहे। चुनावी साल में उनको उपमुख्यमंत्री बनाकर संतुष्ट करने का दांव चला गया किंतु वह कारगर नहीं रहा और श्री सिंहदेव चुनाव हार गए। कुल मिलाकर ये कांग्रेस की नीतिगत दिशाहीनता का नतीजा है। भाजपा की नकल करते हुए हिंदुत्व का चोला धारण करने का दिखावा तो खूब हुआ किंतु पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे ने जब सनातन को नष्ट करने का समर्थन किया तो उसका राहुल , प्रियंका , कमलनाथ , अशोक गहलोत और श्री बघेल जैसे नेताओं ने विरोध नहीं किया। भाजपा इस मुद्दे पर कांग्रेस को सनातन विरोधी साबित करने में सफल हो गई। इस चुनाव में मोदी की गारंटी नामक नारे का जादू भी कारगर रहा। प्रधानमंत्री की गरीब कल्याण योजनाओं को जिस तरह सफलतापूर्वक लागू किया गया उसका मतदाताओं पर सकारात्मक असर हुआ। कुल मिलाकर तीन राज्य जीतकर भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए अपने हौसले को मजबूत कर लिया है। इन नतीजों का विपक्ष के इंडिया नामक गठबंधन के भविष्य पर भी असर पड़ना तय है क्योंकि हिमाचल और कर्नाटक जीतने के बाद कांग्रेस ने जिस तरह उत्तर भारत के तीन राज्यों में इंडिया के अन्य घटक दलों के साथ गठबंधन से इंकार किया उससे वे काफी नाराज हैं। जाहिर है ये चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए चिंता का कारण हैं क्योंकि श्री मोदी के मुकाबले राहुल गांधी एक बार फिर बौने साबित हुए हैं। म.प्र और राजस्थान के जिन इलाकों से भारत जोड़ो यात्रा निकली वहां कांग्रेस का सफाया हो जाना इसका प्रमाण है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 2 December 2023

मुसलमानों को अपने पाले में खींचने में कामयाब होती लग रही कांग्रेस


कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस की सफलता का सबसे बड़ा कारण मुस्लिम मतदाताओं का देवगौड़ा परिवार के जनता दल ( सेकुलर ) से छिटक कर उसकी तरफ घूम जाना रहा। परिणामस्वरूप भाजपा का मत प्रतिशत तो यथावत रहा किंतु जनता दल ( सेकुलर ) का 5 प्रतिशत कम होकर कांग्रेस के खाते में आ गया। दरअसल कांग्रेस मुस्लिमों में ये बात फैलाने में पूरी तरह से सफल रही कि  पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी.देवगौड़ा के पुत्र कुमार स्वामी भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन सकते हैं। इसका कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा काफी समय से देवगौड़ा जी की प्रशंसा किया जाना था। हालांकि 2018 में त्रिशंकु विधानसभा बनने के बाद कुमारस्वामी को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनवाया था । दलबदल के कारण वह सरकार के गिरने से भाजपा सत्ता में आ गई किंतु 2023 में कांग्रेस और जनता दल ( सेकुलर ) में गठजोड़ नहीं हो सका। बीते अनेक चुनावों से राज्य का मुस्लिम समुदाय जनता दल ( सेकुलर ) से जुड़ा हुआ था। लेकिन पिछले चुनाव में उसका ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में होने से देवगौड़ा परिवार मैसूर अंचल के अपने प्रभाव क्षेत्र तक में मात खा गया। ये भी देखने में आया कि दूसरे राज्यों से मुस्लिम धर्मगुरुओं ने कर्नाटक आकर मुस्लिम मतदाताओं के मन में ये बात बिठा दी कि जनता दल ( सेकुलर ) का समर्थन करने से भाजपा मजबूत होगी। ये समझाइश काम कर गई और कांग्रेस को अच्छा खासा बहुमत मिल गया। उसी के बाद कुमारस्वामी ने भाजपा की ओर हाथ बढ़ाया  जिससे वे कम से कम लोकसभा चुनाव में तो  प्रासंगिक बने रहें। इस प्रकार कांग्रेस का ये कहना कि फलां पार्टी भाजपा की बी टीम है , उसकी रणनीति का हिस्सा बनने लगा। उल्लेखनीय है असदुद्दीन ओवैसी को लेकर उसका ये प्रचार काफी समय से चला आ रहा है और इसका प्रभाव भी कम से कम उत्तर भारत में तो देखने मिला ही । लेकिन कर्नाटक के बाद कांग्रेस ने जिस कुशलता से तेलंगाना में इस दांव को आजमाया उसके अनुकूल  परिणाम देखने मिल रहे हैं। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के बाद एग्जिट पोल के जो निष्कर्ष आए हैं वे सभी तेलंगाना में बीआरएस  सरकार की विदाई का संकेत देते हुए कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने का दावा कर रहे हैं। और इसका सबसे बड़ा जो कारण बताया जा रहा है कि हैदराबाद महानगर में ओवैसी के आभामंडल के अलावा अन्य शहरों , कस्बों और गांवों में फैले मुसलमानों के बीच कांग्रेस का ये नारा असर कर गया कि भाजपा के दो यार - ओवैसी और केसीआर । यद्यपि भाजपा गलत फैसले करने के कारण मुकाबले में पूरी तरह नजर नहीं आई किंतु प्रधानमंत्री के इस बयान से कि श्री राव उनके पास एनडीए में शामिल होने आए थे किंतु उन्होंने मना कर दिया , भाजपा को तो लाभ हुआ नहीं किंतु बीआरएस मुसलमानों की नजर में गिर गई जिसका  फायदा कांग्रेस को मिला । हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि एग्जिट पोल ही परिणाम है किंतु इतना तो तय है कि तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं के अलावा मुस्लिम तुष्टिकरण  के तमाम फैसलों के बावजूद श्री राव 2018 वाला जादू कायम रखने में विफल प्रतीत हो रहे हैं तो उसका कारण मुसलमानों का कांग्रेस पर मेहरबान होना है। यदि ऐसा वाकई होता है और तेलंगाना में तमाम अनुमानों के मुताबिक कांग्रेस सत्ता हथिया लेती है तब ये राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलाव का कारण बने बिना नहीं रहेगा। विशेष रूप से उ.प्र, बिहार और प.बंगाल में क्रमशः अखिलेश यादव , लालू और नीतीश के अलावा ममता बैनर्जी के लिए चिंता के कारण उत्पन्न हो जाएंगे। सबसे बड़ी बात ये होगी कि इंडिया नामक गठबंधन में कांग्रेस हावी होने की स्थिति में आ जाएगी । महाराष्ट्र में शरद पवार की राजनीति भी काफी हद तक मुस्लिम मतों पर टिकी हुई है जो इस बदलाव से कमजोर हो सकती है। कुल मिलाकर ये मान लेना गलत न होगा कि यदि तेलंगाना कांग्रेस के कब्जे में आता है तो इसका साफ मतलब होगा कि बाबरी ढांचा  गिरने के बाद जो मुसलमान  उससे दूर चले गए थे वे भाजपा के बढ़ते प्रभुत्व से घबराकर वापस  लौट रहे हैं। और ऐसा होने से अल्पसंख्यकों के बल पर राजनीति करने वाली अनेक तीसरी ताकतें घुटनों के बल आने मजबूर हो जाएंगी। ये बदलाव कांग्रेस को कितना लाभ पहुंचा सकेगा वह तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन इसका जवाबी असर हिंदुओं के ध्रुवीकरण के तौर पर किस मात्रा में होता है ये देखने वाली बात होगी क्योंकि हिंदुत्व का झंडा उठाकर घूमने के बाद भी भाजपा को सभी राज्यों में हिंदुओं का उतना  समर्थन प्राप्त नहीं हो पाता जितना मुस्लिम उसका विरोध करते हैं। ऐसा लगता है कांग्रेस  ने काफी सोच - समझकर मुसलमानों को बाकी गैर भाजपाई पार्टियों के शिकंजे से मुक्त करवाने की जो रणनीति कर्नाटक के बाद तेलंगाना में भी अपनाई वह फिलहाल तो काम करती दिख रही है।  लोकसभा चुनाव  के लिए जो इंडिया गठबंधन बना है उसके घटक दल कांग्रेस के इस पैंतरे पर क्या रुख अपनाते हैं ये उत्सुकता का विषय है।

- रवीन्द्र वाजपेयी



Friday, 1 December 2023

नींद तो एग्जिट पोल करने वालों को भी नहीं आएगी


पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के जो एग्जिट पोल गत दिवस जारी हुए उनमें कुछ तो चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से मेल खाते हैं वहीं कुछ में थोड़ा तो कुछ में काफी अंतर है। एग्जिट पोल करने वाली संस्थाएं भी 3 फीसदी  घट - बढ़ की संभावना व्यक्त करती हैं। ऐसे में जहां मुकाबला नजदीकी होता है वहां उलटफेर देखने मिलता है परंतु जीत हार के बीच लंबा अंतर वाले अनुमान काफी हद तक सही होते हैं।  हमारे देश में चुनाव पूर्व सर्वेक्षण सबसे पहले 1984 के लोकसभा चुनाव में प्रणय रॉय और विनोद दुआ द्वारा शुरू किया गया था। उसके बाद इसका चलन बढ़ा । बाजारवाद के आगमन के साथ ही अनेक सर्वेक्षण संस्थान   ग्राहकों की  पसंद - नापसंद  पता कर  उत्पादक को देने लगे जिससे वे अपनी विक्रय रणनीति तय करते हैं। गुणवत्ता में सुधार हेतु भी सर्वेक्षण का उपयोग किया जाने लगा है। धीरे - धीरे  राजनीतिक दल भी सर्वेक्षण के जरिए मतदाताओं के मन को पढ़ने का प्रयास करने लगे । आजकल प्रत्याशी चयन के अलावा चुनावी वायदे भी सर्वेक्षण के जरिए तय किए जाते हैं। अनेक पत्र - पत्रिकाएं और टीवी चैनल समय - समय पर देश का मूड जानने के लिए सर्वेक्षण करवाकर उसे प्रचारित करते हैं जिनमें सरकार के प्रति जनमानस की सोच उजागर होती है। ये सब देखते हुए सर्वेक्षण एक बड़े व्यवसाय के तौर पर स्थापित हुआ है। हालांकि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण की उपयोगिता तो समझ में आती है किंतु  एग्जिट पोल के  औचित्य पर ये कहकर सवालिया निशान लगाए जाते हैं कि मतगणना के पहले अंदाजिया घोड़े दौड़ाने से हासिल क्या होता है? इसके जवाब में कहा जाता है कि जहां एक से अधिक चरणों में मतदान होता है वहां राजनीतिक दल हर चरण के बाद एग्जिट पोल से मिले संकेतों के मुताबिक अपनी रणनीति निर्धारित करते हैं। लेकिन कल जो एग्जिट पोल आए वे  केवल बुद्धिविलास का विषय हैं । दरअसल , उनके जरिए सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियां अपनी कार्यकुशलता प्रमाणित करती हैं। मसलन जिसका एग्जिट पोल  परिणाम के जितने नजदीक होगा उसका व्यवसाय और बढ़ेगा । उस दृष्टि से देखें तो जो निष्कर्ष कल  जारी हुए उनमें कुछ  अनुमान एक दूसरे का समर्थन करते हैं तो कुछ में काफी अंतर है। लेकिन जिन दो - तीन  एजेंसियों की साख अच्छी है उनके एग्जिट पोल पर भरोसा करें तो छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की बढ़त स्पष्ट है। उसी तरह तेलंगाना  केसीआर के हाथ से खिसकता दिख रहा है। राजस्थान पर जहां भारी अनिश्चितता है वहीं म.प्र में भाजपा आसानी से बहुमत हासिल कर लेगी । यद्यपि वह जितना बड़ा दर्शाया गया है उसे लेकर आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा है। हालांकि म.प्र में  भाजपा को भारी सफलता मिलती है तो ये उन चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों को झुठलाने वाला होगा जिनमें  बेहद करीबी टक्कर के बावजूद कांग्रेस का पलड़ा भारी बताया गया था। इसी तरह राजस्थान में सभी सर्वेक्षण भाजपा की जीत को निश्चित बता रहे थे किंतु एग्जिट पोल के मुताबिक कांग्रेस  दौड़ से पूरी तरह बाहर नहीं हुई है। मिजोरम  चूंकि राष्ट्रीय राजनीति की मुख्य धारा से अलग है इसलिए लोगों की उसके बारे में ज्यादा रुचि नहीं है किंतु तेलंगाना के अनुमान जरूर चौंकाने वाले हैं  क्योंकि के .सी . रेड्डी की बीआरएस नामक क्षेत्रीय पार्टी को 2018 में भारी बहुमत हासिल हुआ था।  ऐसे में  कांग्रेस को बड़ी सफलता मिलने से श्री रेड्डी का भविष्य  खतरे में पड़ जाएगा जो कांग्रेस और भाजपा दोनों के निशाने पर हैं। छत्तीसगढ़ में  एकाध एग्जिट पोल ही  भाजपा को बहुमत दे रहा है जबकि ज्यादातर में  वह 2018 के प्रदर्शन से काफी बेहतर प्रदर्शन करने जा रही है और ऐसे में  बहुमत के जादुई आंकड़े को स्पर्श कर ले तो वह सबसे बड़ा उलटफेर होगा। ढेर सारे  एग्जिट पोल चूंकि अलग - अलग निष्कर्ष दे रहे हैं इसलिए असमंजस और बढ़ गया है। मसलन म.प्र में कांग्रेस जहां अपनी हार स्वीकार नहीं कर रही वहीं राजस्थान को लेकर भाजपा का भी कहना है कि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में उसकी सरकार बनने का जो अनुमान था वही नतीजे में परिलक्षित होगा। दो दिन बाद दोपहर तक स्थिति पूरी तरह साफ हो जाएगी। तब तक एग्जिट पोल को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म रहेगा। वैसे जो संकेत मोटे तौर पर मिल रहे हैं उनके अनुसार तेलंगाना को छोड़कर तीनों मुख्य राज्यों में राजनीति भाजपा और कांग्रेस के बीच दो ध्रुवीय होती दिख रही है। लेकिन म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस का प्रदर्शन उसकी उम्मीदों के अनुसार नहीं रहा तब सपा और आम आदमी पार्टी को उस पर हावी होने का मौका मिल जायेगा जिनके साथ गठबंधन करने से कांग्रेस ने साफ मना कर दिया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने  म.प्र बचा लिया और राजस्थान कांग्रेस से छीन लिया तो उसका उत्साह बढ़ जाएगा । वहीं तेलंगाना और छत्तीसगढ़ जीतकर भी कांग्रेस भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकेगी और इंडिया गठबंधन के सहयोगी दल उस पर दबाव बनाने में जुट जाएंगे। के. सी.रेड्डी यदि अपनी गद्दी गंवा बैठे तो वे तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद में जुटे बिना नहीं रहेंगे। 3 दिसंबर की शाम तक  पांचों राज्यों की स्थिति स्पष्ट होने तक अनुमानों के घोड़े दौड़ते रहेंगे। नींद तो एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों को भी नहीं आएगी क्योंकि उनकी विश्वसनीयता भी तो कसौटी पर है।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 30 November 2023

राष्ट्रीय नेता बनने के फेर में राज्य भी गंवा देंगे नीतीश


बिहार किसी न किसी कारण से चर्चाओं में रहता ही है।  उ.प्र के बाद देश को सबसे ज्यादा आई.ए.एस और आई.पी. एस देने वाले इस राज्य में आर्थिक और सामाजिक विषमता चरम पर रही है। इसलिए आजादी के 75 वर्ष बीतने के बावजूद बिहार जातिवाद के शिकंजे से मुक्त नहीं हो सका । जबकि अतीत में  जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर जैसे धुरंधर समाजवादी नेताओं की कर्मभूमि रहे इस राज्य ने सामाजिक समरसता का बिगुल फूंकने में अग्रणी भूमिका निभाई। महात्मा गांधी ने जिस चंपारण से स्वाधीनता आंदोलन शुरू किया वह यहीं है और 1974 के संपूर्ण क्रांति आंदोलन की चिंगारी भी बिहार से ही भड़की। मगध साम्राज्य के गौरवशाली इतिहास का साक्षी रहे बिहार को  नालंदा जैसे शिक्षा केंद्र के कारण विश्वव्यापी ख्याति मिली। बुद्ध और महावीर जैसे युगपुरूषों की यह जन्मभूमि रही। लेकिन धीरे - धीरे बिहार का  प्राचीन गौरव क्षीण होता गया और अपने स्वर्णिम अतीत से सर्वथा पृथक यह गरीबी , पिछड़ेपन ,  जातिवादी संघर्ष , शोषण और पलायन का जीवंत उदाहरण बनकर रह गया। बीमारू राज्यों में पहले क्रम पर बिहार को रखा जाना इसका प्रमाण है।  देश के विभिन्न हिस्सों में फैले बिहारी श्रमिक इस राज्य की दयनीय स्थिति का बयान करते हैं। बिहार रातों - रात इस दुर्दशा को प्राप्त हुआ ऐसा नहीं है किंतु आज जो हालात हैं उनके लिए काफी कुछ लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार का राज है जिसने इस राज्य को अराजकता का पर्याय बना दिया था। सामाजिक न्याय और धर्म निरपेक्षता का लबादा ओढ़कर लालू ने जिस परिवारवाद और भ्रष्टाचार का उदाहरण पेश किया उसी का परिणाम है कि समाजवादी आंदोलन से जुड़े  तमाम साथी उनसे छिटकते गए । उन्हीं में से एक हैं राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जो उनके जंगलराज से लड़ने वालों में अग्रणी रहे । जार्ज फर्नांडीज जैसे प्रखर समाजवादी दिग्गज के साथ  समता पार्टी का गठन कर वे भाजपा के नेतृत्व वाले एन.डी.ए में शामिल होकर  केंद्र में मंत्री और बाद में भाजपा के  साथ मिलकर बिहार के मुख्यमंत्री बने। उस दौरान बिहार की छवि में काफी सुधार हुआ । कानून - व्यवस्था पटरी पर लौटी , आर्थिक विकास भी नजर आने लगा जिसकी वजह से बीमारू राज्य का दाग भी कुछ हल्का पड़ने लगा । इस सबके कारण ही नीतीश को सुशासन बाबू जैसा संबोधन प्राप्त हुआ। लेकिन बीते एक दशक में उनका राजनीतिक व्यवहार जिस प्रकार से बदला उसके कारण वे उन्हीं लालू के शिकंजे में उलझ गए जिन्हें उन्होंने जेल भिजवाया था । उनका यह कदम दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निजी कुढ़न के कारण उठाया गया था। यद्यपि बीच में वे एक बार फिर श्री मोदी के साथ आकर भाजपा से जुड़े किंतु केंद्रीय मंत्रीमंडल में उनके दल को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने की खुन्नस में फिर लालू एंड कंपनी के संग गठजोड़ कर लिया।  इस सबसे उनकी निजी छवि खराब हो गई और सुशासन बाबू का खिताब भी हाथ से जाता रहा। हालांकि आज के राजनीतिक माहौल में इस तरह की पैंतरेबाजी चौंकाती नहीं है किंतु प्रधानमंत्री पद का दावेदार होने के बावजूद नीतीश जिस तरह का राजनीतिक व्यवहार करने लगे वह दिशाहीनता का संकेत है। उनके हालिया फैसले इसका प्रमाण हैं। जातीय जनगणना के बाद हिन्दू त्यौहारों के सरकारी अवकाश कम करने और मुस्लिम पर्वों पर बढ़ाने का फैसला ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि उनकी सोच सतही होने लगी है। इस निर्णय के कारण अपने दल के भीतर ही उनको अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। जातीय जनगणना के विवाद से वे उबर पाते उसके पूर्व ही हिन्दू तीज - त्यौहारों की छुट्टियां कम करने जैसा निर्णय उनके गले कि फांस बन गया। अब उनकी पार्टी के नेतागण इस फैसले को बदलने का आश्वासन देकर चमड़ी बचाने का प्रयास कर रहे हैं किंतु जो नुकसान होना था वह हो चुका। भाजपा ने इसे मुद्दा बनाया ये तो स्वाभाविक था किंतु बिहार का आम जनमानस भी नीतीश के बदलते राजनीतिक आचरण से हतप्रभ है। बिहार के बाहर भी जो लोग उनको एक सुलझा हुआ दूरदर्शी राजनेता समझते थे वे भी अपनी राय बदलने मजबूर हो रहे हैं। एक जमाना था जब मुलायम सिंह यादव ने उ.प्र की राजनीति में मुस्लिम तुष्टिकरण का रंग  भर दिया था। उसके चलते समाजवादी पार्टी को कुछ फायदा जरूर हुआ किंतु धीरे - धीरे उसके हाथ से हिन्दू छिटके और अब मुसलमानों का भी मोहभंग होने लगा है। नीतीश को इससे सबक लेना चाहिए  था क्योंकि भाजपा और मोदी विरोध में वे जिस रास्ते पर बढ़ चले हैं वह उनके राजनीतिक पराभव का कारण बने बिना नहीं रहेगा । पता नहीं उनका  सलाहकार कौन है जो उन्हें इस तरह की मूर्खतापूर्ण सलाह देता है। नीतीश राजनीतिक तौर पर भले ही  भाजपा का कितना भी विरोध करें लेकिन उन्हें समाज को जाति में विभाजित करने के साथ ही हिन्दू समाज की भावनाओं को आहत करने से बचना चाहिए। ऐसा लगता है वे इंडिया गठबंधन के नेता बनने के लालच में  मुस्लिम तुष्टिकरण में लग गए हैं। परिणामस्वरूप  राष्ट्रीय नेता बनने के फेर में वे राज्य में भी अपनी पकड़ को बैठें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 29 November 2023

श्रमिकों का बचना सुखद किंतु विकास की आड़ में हो रहे विनाश को रोका जाए


12 नवंबर को उत्तराखंड के उत्तरकाशी इलाके में निर्माण कार्य के दौरान  सिलक्यारा सुरंग ( टनल ) धसक जाने से 41 श्रमिक भीतर फंस गए थे। प्रारंभ में तो ये आशंका थी कि वे  सभी  भीतर ही दबकर  दम तोड़ देंगे। कई टन मलबा सुरंग के ऊपर और मुहानों पर होने के कारण भीतर फंसे लोगों से संपर्क नहीं हो पाने के कारण स्थिति का कुछ पता नहीं चल पा रहा था । लेकिन एन.डी.आर एफ (राष्ट्रीय आपदा अनुक्रिया बल ) ने उस चुनौती को स्वीकार किया और ऐसा बचाव अभियान हाथ में लिया जो भारत के लिए पहला अनुभव था। एन.डी.आर एफ को विदेशों से मंगाए गए उपकरण भी उपलब्ध करवाए गए। दरअसल इस अभियान में खतरा ये था कि सुरंग के भीतर जाने का रास्ता बनाने के लिए की जा रही ड्रिलिंग से जो ठोस जगह थी , वह भी धसक न जाए और बचाव कार्य पूरी तरह बंद करना पड़े। बीते 17 दिनों में  अनेक क्षण ऐसे आए जब  कभी उपकरण खराब हुए तो कभी जहां श्रमिकों तक पहुंचने हेतु छेद किया जा रहा था वहां की मिट्टी भसक गई। कुछ दिनों बाद जब एक पाइप भीतर तक पहुंचा और उन श्रमिकों से संपर्क कायम हो सका तब ये जानकर बचाव दल का हौसला बढ़ा कि सभी 41 श्रमिक न सिर्फ जीवित अपितु आत्मविश्वास से भरे हुए थे। धीरे - धीरे उन तक भोजन , पानी आदि पहुँचाने की व्यवस्था पाइप के जरिए की गई। कैमरों की मदद से उनकी कुशलता का प्रमाण भी मिला जिससे उनके परिजनों को उनके जीवित रहने का विश्वास हुआ। 17 दिनों तक दिन रात चले अभियान के उपरांत कल देर शाम पहला श्रमिक बाहर लाया गया और कुछ ही देर में सभी सकुशल मौत के मुंह से बाहर आने में कामयाब हो गए। इस अभियान से  आपदा प्रबंधन  में हमारे बढ़ते आत्मविश्वास का परिचय तो मिला ही । साथ में एन.डी.आर एफ , सेना , उत्तराखंड शासन - प्रशासन के साथ ही केंद्र सरकार के बीच बेहतरीन समन्वय भी सामने आया।  केंद्रीय मंत्री और पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वी.के.सिंह की घटनास्थल पर उपस्थिति इसका प्रमाण रही। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी बचाव दल का हौसला बढ़ाते रहे। निश्चित रूप से इस अभियान की सफलता की चर्चा विश्व भर में होगी क्योंकि भविष्य में होने वाली ऐसी ही दुर्घटना के समय बचाव कार्य में यह अनुभव काम आएगा। भारत में प्राकृतिक आपदाएं  आती ही रहती हैं। उनके अलावा विभिन्न प्रकार के हादसे भी यदाकदा होते रहते हैं। जिनमें रेल  दुर्घटनाएं भी उल्लेखनीय हैं। उस दौरान    एन.डी.आर एफ राहत और बचाव के काम में सबसे आगे रहता है। उसके काम को वैश्विक स्तर पर भी  प्रशंसा मिलने लगी है। उदाहरण के लिए तुर्की में आए विनाशकारी भूकंप के समय भारत सरकार ने  ऑपरेशन दोस्त के अंतर्गत सेना के साथ ही एन.डी.आर एफ का को दल वहां भेजा उसने 10 दिन वहां बचाव कार्य किया । और जब उसके सदस्य लौट रहे थे तो तुर्की के लोगों ने हवाई अड्डे पर जो भावभीनी विदाई दी वह एक सुखद अनुभव था। लेकिन इस हादसे से एक और मुद्दा गहन रूप से विचारणीय हो गया है और वह है उत्तराखंड सहित समूचे हिमालय क्षेत्र में विकास के कारण प्राकृतिक संतुलन के साथ हो रही छेड़छाड़। कुछ समय पहले जब जोशीमठ में भूमि के फटने के कारण पूरे शहर का अस्तित्व खतरे में आ गया था तब भी इस बात को लेकर काफी हल्ला मचा था कि कथित विकास उत्तराखंड के  गढ़वाल अंचल में प्राकृतिक आपदाओं  का आधार बन रहा है। टिहरी बांध के निर्माण का विरोध करने वालों ने दशकों पूर्व जिन खतरों की चेतावनी दी थी वे समय के साथ ही सच साबित होती जा रही हैं। ताजा हादसे का सुखद पहलू ये जरूर है कि सुरंग में फंस गए 41 श्रमिक 17 दिन तक हर पल मृत्यु की आहट सुनते रहने के उपरांत जीवित लौट आए किंतु इस खुशी के साथ ही यह हादसा कैसे हुआ उसकी जांच के अलावा उत्तराखंड और शेष पहाड़ी क्षेत्रों में किए जा रहे विकास कार्यों की समीक्षा करते हुए ये देखा जाना जरूरी है कि प्राकृतिक भूगर्भीय संरचना को नुकसान पहुंचाकर किया जा रहा विकास  कहीं विनाश का कारण तो नहीं बन रहा? इस बारे में ये बात ध्यान रखने योग्य है कि  विज्ञान और तकनीक चाहे जितनी विकसित हो जाए किंतु प्रकृति की अदृश्य शक्ति के सामने वे  असहाय होकर रह जाती हैं। सिलक्यारा सुरंग हादसे में भी जब विदेशों से  आए महंगे उपकरण जवाब दे गए तब अंततः प्रतिबंधित कर दी गई परंपरागत पद्धति ही कारगर साबित हुई।  वैसे तो एन.डी.आर एफ के दल इस दौरान  हुए अनुभवों पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे ही किंतु केंद्र और उत्तराखंड सरकार को भी चाहिए कि विकास कार्यों का ऐसा तरीका अपनाने पर जोर दिया जाए जिससे  प्राकृतिक संतुलन में गड़बड़ी न हो। बहरहाल एन.डी.आर एफ सहित बचाव कार्य में बिना रुके और बिना थके लगे रहे सभी लोगों के प्रयासों की पूरा देश सराहना  कर रहा है किंतु इस सफलता से आत्ममुग्ध होने के बजाय उन कारणों का सूक्ष्म विश्लेषण होना भी जरूरी है जिनके चलते 41 श्रमिकों की जान तो खतरे में पड़ी ही करोड़ों रु. लगाकर किए जा रहे विकास कार्यों के औचित्य पर भी सवाल उठ खड़े हुए हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 27 November 2023

मुस्लिमों के लिए अलग आईटी पार्क का वायदा खतरनाक संकेत



मतदाताओं को रिझाने के लिए राजनीतिक दल तरह - तरह के प्रलोभन देते हैं। प्रतिमाह निश्चित राशि , मुफ्त और सस्ती बिजली , सरकारी नौकरियां , कृषि उत्पादों के खरीदी मूल्य में वृद्धि , वेतन - भत्ते बढ़ाना ,वृद्धावस्था और निराश्रित पेंशन , मुफ्त चिकित्सा और शिक्षा के अलावा दोपहिया वाहन तथा लैपटॉप आदि देकर चुनाव जीतने का फार्मूला लगभग सभी दलों ने अपना लिया है। इसे लेकर उनके बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा है। उदाहरण के तौर पर म.प्र में कांग्रेस ने सत्ता में आने पर 500 रु. में रसोई गैस सिलेंडर देने का वायदा किया। उसके जवाब में प्रदेश की भाजपा सरकार ने चुनाव के पहले ही 450 रु. में सिलेंडर देना शुरू कर दिया । इसी तरह कांग्रेस ने नारी सम्मान योजना के अंतर्गत महिलाओं को 1500 रु. हर माह देने के लिए आवेदन भरवाए किंतु शिवराज सरकार ने चुनाव के छह महीने पहले ही लाड़ली बहना योजना का ऐलान कर 1000 रु. प्रतिमाह से शुरुआत कर उसे 1250 रु. प्रतिमाह करते हुए भविष्य में 3000 रु. करने का वायदा भी कर दिया। साथ ही पक्का मकान देने की घोषणा भी कर दी । इस प्रकार चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा ऐसे वायदे किए जाने लगे हैं जैसे अपना उत्पाद बेचने के लिए कंपनियां और व्यवसायी किया करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 लाख तक मुफ्त इलाज की आयुष्मान भारत नामक योजना प्रारंभ की थी । राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने उसे चिरंजीवी योजना नाम देकर उसकी राशि 25 लाख कर दी। लेकिन इन सबसे अलग हटकर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी.राव ने एक चुनावी सभा में घोषणा कर दी कि यदि वे सत्ता में लोटे तो हैदराबाद में मुस्लिम युवकों के लिए अलग आईटी पार्क बनवाएंगे। उनकी इस घोषणा का भाजपा द्वारा विरोध करना तो समझ में आता है लेकिन आश्चर्य की बात है कि कांग्रेस ने भी श्री राव की उक्त घोषणा पर कड़ी आपत्ति जताई है। हालांकि वह भी तेलंगाना के अल्पसंखक कल्याण बजट में भारी वृद्धि का वायदा कर रही है। दरअसल मुख्यमंत्री की पार्टी बी.आर.एस को कांग्रेस से कड़ी चुनौती मिलने के संकेत मिले रहे हैं। उधर भाजपा भी हिन्दू मतदाताओं के मतों में बंटवारा करने की स्थिति में तो है ही। ऐसे में श्री राव को चिंता हो उठी कि हैदराबाद और उससे लगे क्षेत्रों के मुस्लिम मतों का बड़ा हिस्सा तो असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार ले जाएंगे । वहीं राज्य के बाकी हिस्सों के मुसलमानों को कांग्रेस भी अपने पाले में खींचने में जुटी हुई है। स्मरणीय है कर्नाटक में कांग्रेस की जीत में मुस्लिम मतदाताओं का बहुत बड़ा योगदान रहा जो भाजपा को रोकने के लिए उसके पक्ष में एकजुट हो गए। कांग्रेस ने तेलंगाना के मुसलमानों को भी अपनी तरफ झुकाने की रणनीति बनाई और इसीलिए श्री गांधी सहित अन्य कांग्रेस नेता श्री राव और ओवैसी को भाजपा की बी टीम कहकर मुसलमानों को उनसे दूर करने की रणनीति अपना रहे हैं। ऐसा लगता है मुख्यमंत्री मुस्लिम मतों को लेकर आशंकित हो उठे हैं और इसीलिए उन्होंने मुस्लिम युवाओं के लिए अलग आईटी पार्क बनाए जाने का वायदा कर डाला। इस पर कांग्रेस की तीखी प्रतिक्रिया से साफ हो गया कि उसे श्री राव के इस ऐलान में अपना नुकसान नजर आने लगा है। लेकिन राजनीति से ऊपर उठकर देखें तो श्री राव का उक्त ऐलान बेहद खतरनाक है क्योंकि धर्म के आधार पर इस तरह के संस्थान बनाए जाएंगे तो ये सिलसिला कहां जाकर रुकेगा ये सोचने वाली बात है। वैसे भी हैदराबाद वह रियासत है जिसने आजादी के बाद भारतीय संघ में शामिल होने से मना कर दिया था। वहां के मुस्लिम शासक निजाम के रजाकारों ( भाड़े के सैनिक )ने हजारों हिंदुओं की हत्या कर दी थी। बाद में सरदार पटेल ने पुलिस एक्शन नामक कार्रवाई करते हुए हैदराबाद रियासत का विलीनीकरण भारत में करवाया। ओवैसी जैसे नेता आज भी पुरानी निजामशाही की यादें मुसलमानों के मन में ताजा बनाए रखना चाहते हैं किंतु श्री राव जैसे अनुभवी राजनेता महज चुनाव जीतने के लिए मुसलमानों के लिए अलग आईटी पार्क जैसे संस्थान खोलने का वायदा कर उनमें अलगाव का भाव उत्पन्न करने का अपराध कर रहे हैं। सरकार किसी विशेष धर्म के अनुयायियों के लिए संस्थान खोले ये देश की एकता के लिए बड़ा खतरा बने बिना नहीं रहेगा। ऐसा लगता है इतिहास की गलतियों से सबक लेने के प्रति हमारे राजनेता बेहद उदासीन हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी 

राष्ट्रपति द्वारा न्यायिक सेवा के सुझाव में छिपे हैं भविष्य के संकेत




संविधान दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू  ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी. वाय.चंद्रचूड़ की उपस्थिति में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा प्रारंभ किए जाने की जरूरत बताते हुए न्यायिक नियुक्ति आयोग के मुद्दे को गर्म कर दिया। राष्ट्रपति ने स्पष्ट कहा कि इससे वंचित पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को मदद मिलेगी । उल्लेखनीय है श्री चंद्रचूड़ सहित सर्वोच्च न्यायालय के ज्यादातर न्यायाधीश मौजूदा कालेजियम प्रणाली के पक्षधर हैं। श्रीमती मुर्मू ने स्पष्ट तौर पर कहा कि  ऐसी प्रणाली विकसित की जाए जिसमें योग्यता आधारित , प्रतिस्पर्धी तथा पारदर्शी चयन प्रक्रिया के जरिए विभिन्न पृष्ठभूमि से आए लोगों का चयन बतौर न्यायाधीश किया जा सके। राष्ट्रपति ने अ.भा प्रशासनिक और पुलिस सेवा की तरह ही न्यायिक सेवा के सृजन का जो मुद्दा छेड़ा वह केंद्र सरकार और न्यायपालिका के बीच लंबे समय से तनाव का कारण बना हुआ है। हालांकि किरण रिजजू को कानून मंत्री पद से हटाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अघोषित युद्धविराम का संकेत दिया था किंतु उसके बाद भी न्यायाधीशों की नियुक्ति में विलंब को लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच खटपट होती रही है। अनेक अवसरों पर तो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चेतावनी दिए जाने के बाद सरकार ने मजबूरी में  नियुक्ति  को अंतिम रूप दिया। ऐसा लगने लगा था कि केंद्र सरकार इस  विवादास्पद विषय में न्यायपालिका से टकराव को टालना चाह रही है। लेकिन संविधान दिवस जैसे महत्वपूर्ण आयोजन में देश की संवैधानिक प्रमुख द्वारा  मुख्य न्यायाधीश के समक्ष न्यायिक सेवा की आवश्यकता जताने से ये मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। यदि यह बात किसी और ने कही होती तो अब तक श्री चंद्रचूड़ सहित कालेजियम प्रणाली के समर्थकों की ओर से प्रत्याक्रमण हो चुका होता। हालांकि श्रीमती मुर्मू पर ये आरोप तो लगेगा ही कि उन्होंने सरकार की मंशा को ही व्यक्त किया किंतु दूसरी तरफ ये भी सही है कि समाज के वंचित कहे जाने वाले वर्ग को न्यायिक क्षेत्र में आगे बढ़ने का समुचित अवसर नहीं मिल पाता। राष्ट्रपति ने इसीलिए इस बात का उल्लेख किया कि सिविल सेवाओं में जाने वाले अनेक प्रतिभाशाली अभ्यर्थी भी न्यायपालिका में आना चाहते हैं किंतु न्यायिक सेवा जैसी व्यवस्था के  अभाव में  उन्हें अवसर नहीं मिल पाता। निश्चित तौर पर ये गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। कालेजियम प्रणाली चूंकि संविधान के अंतर्गत न होकर आजादी के 46 साल बाद 1993 में लागू की गई इसलिए उसे पत्थर की लकीर मान लेना न्यायोचित नहीं होगा। उस पर ये आरोप लगातार लगते रहे हैं कि इसके जरिए न्यायपालिका में भी परिवारवाद हावी होता जा रहा है। वर्तमान मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रचूड़ के पिता भी इसी पद पर सबसे अधिक समय तक रहे। ये जरूर कहा जा सकता है कि न्यायपालिका का विधायिका और  कार्यपालिका के साथ टकराव पूर्वापेक्षा बढ़ा है । हालांकि इसकी शुरुआत तो इंदिरा गांधी के समय से ही हो चुकी थी जब कांग्रेस में चली वर्चस्व की लड़ाई में उनके द्वारा लिए गए कुछ नीतिगत निर्णयों को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द कर दिया गया था। उसके बाद प्रतिबद्ध न्यायपालिका की बात तक कही जाने लगी। अनेक न्यायाधीश ऐसे भी उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त हुए जिनकी पृष्ठभूमि तत्कालीन सत्तापक्ष के अनुकूल थी । लेकिन 1993 में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण हेतु बनाई गए कालेजियम प्रणाली के बाद चयन प्रक्रिया पर पूरी तरह से न्यायपालिका का ही एकाधिकार हो गया। केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद इस व्यवस्था के विकल्प के तौर पर लोकसेवा आयोग की तरह  न्यायिक नियुक्ति आयोग के सृजन का प्रस्ताव लोकसभा में सर्वसम्मति से पारित हुआ जबकि राज्यसभा में केवल एक मत विरोध में पड़ा। इतने प्रबल समर्थन के बाद भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उस फैसले को रद्द करने का फैसला ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि न्यायपालिका अपना वर्चस्व छोड़ने तैयार नहीं है। बहरहाल अब चूंकि राष्ट्रपति ने न्यायिक सेवा का सुझाव दिया है इसलिए  इस बात की संभावना व्यक्त की जाने लगी है कि आगामी लोकसभा चुनाव के बाद यदि श्री मोदी पुनः सत्ता में लौटे तब वे इस दिशा में निर्णायक कदम उठा सकते हैं । श्रीमती मुर्मू का वक्तव्य उसी का संकेत है।


- रवीन्द्र वाजपेयी