Friday, 2 February 2024

अंतरिम बजट : सत्ता में वापसी के आत्मविश्वास का प्रमाण


वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गत दिवस लोकसभा में जो अंतरिम बजट पेश किया उसका सभी अपने - अपने तरीके से विश्लेषण कर रहे हैं। सत्ता पक्ष की नजर में ये समृद्ध भारत का घोषणापत्र है और इसका लाभ समाज के सभी वर्गों को मिलेगा । दूसरी तरफ विपक्ष स्वाभाविक रूप से उसकी आलोचना में जुटा है। ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का मानना है मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का यह आखिरी बजट चूंकि महज कुछ महीनों के लिए है इसलिए सरकार के पास करने को ज्यादा कुछ नहीं था फिर भी गरीबों और महिलाओं से जुड़ी योजनाओं पर जोर देकर केंद्र सरकार ने लोकसभा चुनाव में लाभार्थी रूपी अपने वोट बैंक को पुख्ता करने का प्रयास बिना शोर मचाए किया है। इन्फ्रा स्ट्रक्चर का बजट बढ़ने से सीधा लाभ उद्योग - व्यापार को होगा और रोजगार के अवसर खुलेंगे। इसमें दो मत नहीं नरेंद्र मोदी चुनाव जीतने के घिसे - पिटे तरीकों को दोहराने में विश्वास नहीं रखते। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने विकास की जो ठोस बुनियाद रखी उसी के कारण भाजपा वहां अंगद के पैर की तरह जमी हुई है। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने गरीब कल्याण की जिन भी योजनाओं का ऐलान स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से किया उनको कार्य रूप में परिणित करने की पूरी योजना पहले से तैयार होने से सकारात्मक परिणाम भी जल्द नजर आने लगे। शौचालय , स्वच्छता , उज्ज्वला , आवास , जल आपूर्ति , किसान कल्याण जैसी अनेक योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के कारण प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता न सिर्फ कायम रही अपितु उसमें निरंतर वृद्धि भी देखी जा सकती है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर विकास की सही दिशा में देश को ले जाने में वे सफल हुए । इसीलिए मोदी की गारंटी अन्य सभी वायदों और घोषणापत्रों पर भारी पड़ जाती है। अंतरिम बजट से आम लोगों की जो अपेक्षा थी वह निश्चित रूप से पूरी नहीं हुई होगी किंतु प्रधानमंत्री जानते हैं कि किस बीमारी में कौन सी दवा कारगर है ? अपने राजनीतिक विरोधियों के पैंतरों को बेअसर करने की कला भी उन्हें भली - भांति आती है । इसीलिए कुछ दिनों से वे गरीब ,महिला , युवा और कारीगरों को चार जातियां बताकर इन्हीं के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। इसका लाभ भी भाजपा को हाल ही में संपन्न म.प्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में छप्पर फाड़कर मिला । श्रीमती सीतारमण के इस अंतरिम बजट में उक्त चारों वर्गों को केंद्रित किया गया है। दरअसल जातिवादी राजनीति करने वाले नेताओं को ये प्रधानमंत्री का जवाब है। वित्तमंत्री द्वारा जितनी भी बजट घोषणाएं की गईं उनका मकसद हर क्षेत्र में गतिशीलता लाना है । और यही संतुलित आर्थिक नीति है । राहुल लगभग रोजाना आरोप लगाते रहते हैं कि सारा पैसा कुछ उद्योगपतियों के पास जा रहा है किंतु वे भूल जाते हैं कि बीते दस वर्षों में देश ने इन्फ्रा स्ट्रक्चर के क्षेत्र में जो चमत्कारिक प्रगति की , उसके कारण समाज के प्रत्येक वर्ग को लाभ मिला है। सड़कों का जाल जिस तेजी के साथ बिछता जा रहा है उससे उद्योग जगत ही नहीं अपितु सामान्य जन भी लाभान्वित हुए क्योंकि जहां से राजमार्ग गुजरते हैं वहां के समीपवर्ती गांव , कस्बे और शहर की तकदीर चमक जाती है। प्रधानमंत्री आवास योजना निर्माण क्षेत्र को मंदी से उबारने साथ ही करोड़ों श्रमिकों को रोजगार देने में सहायक सिद्ध हुई। डायरेक्ट ट्रांसफर व्यवस्था के कारण लाभार्थियों के खाते में पैसा आने से उनकी क्रय शक्ति भी बढ़ी जिसने उपभोक्ता बाजार को संबल दिया। जी.एस.टी के संग्रह में प्रति माह हो रही वृद्धि बाजार में आई रौनक का जीवंत प्रमाण है। दुनिया का सबसे बड़ा मोबाइल बाजार तो भारत है ही , इंटरनेट के उपयोग में भी हम किसी विकसित देश से पीछे नहीं हैं। यथार्थ ये है कि मोदी सरकार ने अर्थव्यस्था को सीमित दायरे से निकालकर बहुमुखी विस्तार दिया जिसका लाभ अब नजर आने लगा है। रक्षा और ग्रामीण विकास पर खर्च बढ़ाए जाने से एक तरफ जहां देश का सुरक्षा तंत्र मजबूत हुआ वहीं दूसरी तरफ कृषि उत्पादन में जबरदस्त वृद्धि होने से भारत आयातक के बजाय निर्यातक बनने की स्थिति में आ गया। चंद्रयान सरीखे अभियान की सफलता ने जहां देश की गौरव पताका को अंतरिक्ष की ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया वहीं हर गांव तक सड़क , बिजली और पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधा के पहुंचने से ग्रामीण भारत की शक्ल ही बदल गई। इसी आधार पर ये उम्मीद जताई जाने लगी है कि आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार के वापस लौटने की संभावना बढ़ती जा रही है। अंतरिम बजट में खैरातों की बौछार न होने का कारण भी यही आत्मविश्वास है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 1 February 2024

देश के प्रत्येक नागरिक को मिले आयुष्मान भारत योजना का लाभ



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीब कल्याण कार्यक्रमों के अंतर्गत आयुष्मान भारत नामक जो योजना शुरू की गई उसने देश के करोड़ों साधनहीन लोगों को अस्पताल के कमर तोड़ खर्च से राहत दिलवाई है। इसके अंतर्गत सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में भी पांच लाख रुपए तक का इलाज बिना नगद भुगतान किए होने लगा है । इसकी वजह से अव्वल तो सरकारी अस्पतालों में इलाज की झंझट से मुक्ति मिली , दूसरी साधनों के अभाव में  जो मरीज अपनी चिकित्सा विशेष रूप से शल्य क्रिया करवाने में पीछे हट जाते थे , वे भी अब चिकित्सक की सलाह मिलते ही समुचित इलाज करवाने का साहस जुटा लेते हैं। यद्यपि इस योजना के क्रियान्वयन में भी जबरदस्त भ्रष्टाचार होता है। देश के सैकड़ों  निजी अस्पतालों द्वारा फर्जी बिल बनाए जाने के मामले सामने आए। कई जगह तो बिना मरीज को भर्ती किए ही उसका महंगा इलाज करवाए जाने की औपचारिकता का निर्वहन कर सरकार से अवैध वसूली की गई। इस मामले में अनेक चिकित्सक और अस्पताल संचालक गिरफ्तार भी हुए । ये देखते हुए कहा जा सकता है  कि इस योजना का लाभ आम जनता से ज्यादा चिकित्सा माफिया द्वारा उठाया जाता है। जब सरकार की तरफ से कड़ाई की गई तो अनेक निजी अस्पतालों ने आयुष्मान योजना के मरीजों को भरती करने से मना कर दिया या फिर उनसे अग्रिम भुगतान की मांग की जाने लगी। मरीज की अज्ञानता का बेजा लाभ उठाते हुए बढ़ा - चढ़ाकर बिल बनाने का गोरख धंधा तो केंद्र सरकार की कर्मचारियों के लिए संचालित सी.जी. एच. एस में भी होता आया है। ये देखते हुए आयुष्मान योजना में होने वाले भ्रष्टाचार के कारण उसकी उपयोगिता पर सवाल उठने के बावजूद उसकी जरूरत से कोई इंकार नहीं कर सकता । उसके क्रियान्वयन में जो विसंगतियां हैं उन्हें अवश्य दूर किया जाना चाहिए जिससे कि सरकार जो धन इस योजना पर खर्च कर रही है वह मरीज की चिकित्सा पर खर्च हो , न कि बिचौलियों की जेब में जाए। उससे भी बढ़कर अब जरूरत है इस योजना का विस्तार करने की क्योंकि गरीबों के अलावा कम आय वाला बहुत बड़ा वर्ग है जिसके लिए महंगा इलाज करवाना सपने में भी संभव नहीं है। सरकारी अस्पतालों में चूंकि भारी भीड़ होने के अलावा अव्यवस्था का बोलबाला रहता  है इसलिए लोग वहां जाने से कतराते हैं। ये भी सही है कि स्वास्थ्य के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ने के कारण लोग निजी अस्पतालों में जाने लगे हैं। संपन्न वर्ग के जो लोग अपना चिकित्सा बीमा करवा लेते हैं उनके पास तो  सुरक्षा चक्र होता है किंतु बीमा विहीन वह वर्ग जिसे शासन या अन्य किसी माध्यम से इलाज हेतु मदद नहीं मिल पाती उसके लिए चिकित्सा खर्च वहन करना मुश्किल होता है। ये कहना भी गलत न होगा कि चुनिंदा निजी अस्पतालों द्वारा प्रदान की जाने वाली अत्याधुनिक चिकित्सा का खर्च ज्यादा होने से मरीज और उसके परिजन खून के आंसू रोने मजबूर हो जाते हैं। ये बात भी कही जा सकती है कि चिकित्सा अब मिशन और मानवीयता से ऊपर उठकर व्यवसायिकता के मकड़ जाल में उलझकर संवेदनशीलता खो बैठी है। यद्यपि आज भी अनेक चिकित्सक और निजी अस्पताल हैं जो चिकित्सा को व्यवसाय के बजाय मानव सेवा का माध्यम मानकर कार्य करते हैं। टाटा मेमोरियल जैसे संस्थान भी हैं जो इस क्षेत्र में आदर्श कहे जा सकते हैं। विभिन्न न्यासों द्वारा संचालित निजी अस्पताल भी पेशे की पवित्रता के बारे में समर्पित और प्रतिबद्ध हैं। लेकिन 135 करोड़ से भी ज्यादा के आबादी वाले देश में आर्थिक ही नहीं अपितु सामाजिक और शैक्षणिक विषमताओं के कारण चिकित्सा का बढ़ता खर्च बड़ी समस्या बन गया है। ये देखते हुए मोदी सरकार से जन अपेक्षा है कि गरीबों के अलावा भी देश के प्रत्येक नागरिक को चिकित्सा बीमा जैसी सुविधा प्रदान की जाए। आशय ये है कि खाद्यान्न सुरक्षा की तरह ही चिकित्सा सुविधा हर उस व्यक्ति को प्राप्त हो जिसको उसकी जरूरत हो। हालांकि इतना बड़ा कदम उठाने पर सरकार पर जबरदस्त आर्थिक बोझ  आएगा किंतु देश यदि आर्थिक समृद्धि की और बढ़ रहा है तो फिर उसके प्रत्येक नागरिक की चिकित्सा का दायित्व सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए। जो सरकार करोड़ों लोगों को मुफ्त गल्ला तथा आवास दे सकती है और मुफ्त और सस्ती बिजली के अलावा विभिन्न नामों के साथ अनेक कल्याणकारी योजनाएं संचालित कर रही है ,  वह सभी नागरिकों की चिकित्सा की जिम्मेदारी भी ले सकती है। समृद्ध भारत की कल्पना , बिना स्वस्थ नागरिकों के संभव नहीं है। मोदी सरकार ने अपने 10 वर्ष के कार्यकाल में जिस तरह की जनकल्याणकारी योजनाओं को सफलता के साथ लागू किया उसे देखते हुए आयुष्मान भारत योजना का विस्तार करते हुए देश के प्रत्येक नागरिक को उसमें शामिल किया जाना समय की मांग है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 31 January 2024

अंतरिम बजट में मध्यम आय वर्ग वालों के हितों का संरक्षण भी जरूरी



लोकसभा चुनाव के कुछ माह पहले मोदी सरकार का अंतरिम बजट कल लोकसभा में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किया जावेगा। मई में बनने वाली नई सरकार वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए पूर्ण बजट लेकर आएगी। अंतरिम बजट में हालांकि नए नीतिगत फैसलों से बचा जाता है परंतु चुनाव करीब होने के कारण सरकार ऐसा कुछ जरूर करेगी जिससे मतदाताओं को आकर्षित कर सके। राम मंदिर में प्राण - प्रतिष्ठा के बाद से तो मोदी विरोधी विश्लेषक भी मानने लगे हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव में वे तीसरी बार विजेता बनकर उभरेंगे किंतु कोई भी चतुर योद्धा मुकाबले के पहले किसी भी तरह की कसर नहीं रखता । और उस दृष्टि से प्रधानमंत्री अंतरिम बजट के जरिए जितना संभव होगा ऐसा करने का प्रयास करेंगे जिससे कि अपने पक्ष में बह रही हवा को और तेज कर सकें। इसीलिए आर्थिक विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि वित्त मंत्री आयकर में छूट के साथ ही महिलाओं और गरीबों के कल्याण के लिए कुछ ऐसे प्रावधान अंतरिम बजट में करेंगी जिनका असर चुनाव तक बना रहे। इसका ताजा उदाहरण म. प्र है जहां गत वर्ष हुए विधानसभा चुनाव के कुछ महीने पहले तत्कालीन शिवराज सरकार द्वारा प्रारंभ की गई लाड़ली बहना योजना ने कांग्रेस के हाथ आती जीत को छीन लिया । हाल ही में किसान कल्याण की राशि में वृद्धि करने के पीछे भी मोदी सरकार की यही सोच रही। इसीलिए बड़े निर्णयों को भले ही अंतरिम बजट में श्रीमती सीतारमण समाहित न कर सकें किंतु उस पर चुनाव की छाया रहना निश्चित है। हालांकि अपने भाषण में वे भाजपा के चुनाव घोषणापत्र की झलक जरूर दे सकती हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि श्री मोदी के दस वर्षीय कार्यकाल में देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण प्रति माह होने वाला जीएसटी संग्रह है। आयकर सहित अन्य प्रत्यक्ष करों की वसूली भी उम्मीद से ज्यादा बढ़ी है। देश में वाहनों की बिक्री की अलावा घर बनाने या खरीदने वालों की संख्या में भी जबरदस्त वृद्धि हो रही है। कोरोना काल में यद्यपि अर्थव्यवस्था ने हिचकोले लिए थे किंतु 80 करोड़ लोगों को मुफ्त भोजन और खातों में सीधे राशि जमा किए जाने से देश अराजकता से बच गया। टीकाकरण का राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम भी जिस प्रभावशाली तरीके से संचालित हुआ उससे प्रधानमंत्री की कार्यकुशलता को वैश्विक स्तर पर प्रशंसा हासिल हुई। ये बात हर कोई मानता है कि इस सरकार द्वारा गरीबों के कल्याण के लिए जो योजनाएं शुरू की गईं उनका लाभ उन्हें बिना बिचौलियों को घूस दिए मिला। जनधन योजना के खाते खोले जाते समय उनकी उपयोगिता पर सवाल उठाए गए थे । लेकिन उसने गरीब कल्याण योजना को पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त बनाने का क्रांतिकारी काम किया। यद्यपि प्रधानमंत्री आवास योजना में ज़रूर घूसखोरी की शिकायतें विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों से मिलती हैं किंतु जिन योजनाओं में सहायता राशि सीधे हितग्राही के बैंक खाते में जमा होती है उनमें सरकारी अमले की लूट - खसोट पर विराम लग गया। विख्यात चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर का ये कहना अर्थपूर्ण है कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता के प्रमुख कारणों में राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के अलावा लाभार्थी भी हैं। हालांकि विभिन्न राज्य सरकारें भी ऐसी ही ढेरों योजनाएं लेकर आईं किंतु म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों ने ये साबित कर दिया कि प्रधानमंत्री द्वारा किए गए वायदों पर जनता का विश्वास ज्यादा है। लेकिन एक बात जो वित्तमंत्री को ध्यान रखनी होगी, वह है मध्यम वर्ग की अपेक्षाओं को पूरा करना जो भाजपा का सबसे पुख्ता समर्थक रहा है । यद्यपि अभी भी उसकी प्रतिबद्धता बनी हुई है किंतु ये कहना गलत न होगा कि मोदी सराकर की आर्थिक नीतियों से उद्योगपति और गरीब तो संतुष्ट हैं किंतु नौकरपेशा और मध्यमवर्गीय व्यवसायी महसूस करते हैं कि सरकार उसके हितों के बारे में उतनी संवेदनशील नहीं है। ऐसे में वित्त मंत्री से अपेक्षा है कि वे अंतरिम बजट के साथ जुड़ी मर्यादाओं का पालन करते हुए भी मध्यम आय वर्ग के कर्मचारियों और व्यवसायियों के प्रति उदारता बरतें। कम से कम इस बात का संकेत तो दिया ही जा सकता है कि तीसरी बार सत्ता में आने के बाद यह सरकार उनके हितों के संरक्षण हेतु क्या - क्या करेगी ? पेट्रोल - डीजल के दामों के अलावा जीएसटी की दरों को युक्तियुक्त बनाने के बारे में भी लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं। सबसे बड़ी समस्या है चिकित्सा के बढ़ते खर्च की। मोदी सरकार की आयुष्मान योजना ने गरीब वर्ग को तो जबरदस्त राहत दी किंतु मध्यम आय वाले इलाज के महंगे होने से हलाकान हैं। इसलिए इस बारे में किसी क्रांतिकारी ऐलान की उम्मीद भी है और जरूरत भी।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 30 January 2024

सूर्योदय योजना : सौर ऊर्जा क्रांति की दिशा में बड़ा कदम


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बात के लिए प्रशंसा करनी होगी कि वे हर समय किसी न किसी योजना या कार्यक्रम के बारे में न सिर्फ सोचते अपितु उसे कार्य रूप में परिणित भी करते हैं। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से लौटकर उन्होंने प्रधानमंत्री सूर्योदय योजना के अंतर्गत एक करोड़ घरों की छत पर सोलर पैनल (सौर ऊर्जा विद्युत संयंत्र ) लगाए जाने की घोषणा कर दी। इसके जरिए गरीब और मध्यम वर्गीय लोगों के बिजली बिलों में कमी आने के साथ ही देश बिजली के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। हालांकि देश के अधिकतर हिस्से विद्युत संकट से उबर चुके हैं किंतु सच्चाई ये है कि सरकार नियंत्रित विद्युत मंडलों को भले ही कंपनी में बदल दिया गया हो किंतु उनके द्वारा उत्पादित बिजली बेहद महंगी है। निजी क्षेत्र से सस्ती बिजली खरीदकर घरेलू और व्यवसायिक उपभोक्ताओं को कई गुना ज्यादा दरों पर बिजली बेची जाती है। दूसरी तरफ वोटों की सौदागरी के फेर में मुफ्त और सस्ती बिजली का चलन विद्युत मंडलों की कमर तोड़े डाल रहा है। कुल मिलाकर वोट बैंक की राजनीति ने बिजली उत्पादन से जुड़ी सरकारी व्यवस्था को मुनाफाखोर बना दिया। सरकारी संस्थान वैसे भी सफेद हाथी बन चुके हैं। ये बात भी बिलकुल सही है कि बिजली की खपत भी निरंतर बढ़ती जा रही है। पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जा रहे वैश्विक प्रयासों के अंतर्गत कोयले से बिजली बनाने वाले संयंत्र बंद होने से बिजली उत्पादन के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश की गई है जिनमें पवन ऊर्जा , परमाणु ऊर्जा और सौर ऊर्जा शामिल हैं। लेकिन इनमें सबसे सस्ती सूर्य किरणों से बनाई जाने      वाली ऊर्जा ही है। दुनिया के तमाम ऐसे देशों ने भी जिनमें धूप काफी कम होती है ,  सौर ऊर्जा उत्पादन में काफी प्रगति कर ली। हमारा पड़ोसी और विकास की दौड़ में प्रमुख प्रतिद्वंदी चीन तो सौर ऊर्जा उत्पादन में बहुत आगे निकल चुका है। हालांकि भारत इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ तो रहा है किंतु देश में सौर ऊर्जा संबंधी उपकरणों का उत्पादन काफी देर से शुरू होने की वजह से आयातित सोलर पैनल काफी महंगे पड़ते हैं। सरकार  इस पर सब्सिडी देती है किंतु अभी भी इसे लगाने पर जो खर्च आता है वह काम आय वालों के बस के बाहर है। इसके अलावा जो उपभोक्ता अपनी छतों पर सोलर पैनल लगवाना चाहते हैं उनको बिजली विभाग की नौकरशाही खून के आंसू रुलाती है। इविचारणीय बात ये है कि भारत का मौसम जिस प्रकार का है उसके कारण देश के अधिकांश हिस्सों में मानसून और सर्दियों का कुछ समय छोड़कर सूर्य का पर्याप्त प्रकाश उपलब्ध रहता है। ऐसे में यदि घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाने का  अभियान युद्ध स्तर पर शुरू करते हुए उन पर सब्सिडी और बढ़ाई जाए तो आने वाले पांच सालों के भीतर भारत सौर ऊर्जा के जरिए सस्ती बिजली का उत्पादन करने में सक्षम होगा। इससे उपभोक्ताओं को तो लाभ होगा ही साथ में उनके उपभोग से बची बिजली सरकारी विद्युत मंडल के काम आयेगी। प्रधानमंत्री ने जिस तरह शौचालय , स्वच्छता , और अटल जल योजना , रसोई गैस और आवास जैसी मूलभूत जरूरतों को राष्ट्रीय कार्यक्रम बना दिया वैसे ही यदि सूर्योदय योजना को राष्ट्रीय अभियान बनाया जाए तो देश में सौर  ऊर्जा क्रांति हो सकती है। बीते एक दशक में शासकीय कार्यालयों के अलावा बड़े औद्योगिक एवं व्यावसायिक संस्थानों  के साथ ही अनेक किसानों द्वारा  सोलर पैनल लगवाए गए हैं। जिन घरेलू उपभोक्ताओं ने सौर ऊर्जा के लिए अपने घरों की छतों का इस्तेमाल किया उनका अनुभव भी बेहद सुखद है। लेकिन अभी भी इस दिशा में बहुत कुछ होना बाकी है। प्रधानमंत्री चूंकि नवाचार में काफ़ी रुचि लेते हैं इसलिए  उम्मीद की जा  सकती है  कि सौर ऊर्जा उत्पादन उनकी प्रमुख कार्ययोजना में शामिल होकर रिकॉर्ड तेजी से आगे बढ़ेगा । लेकिन केवल सब्सिडी देने मात्र से यह लक्ष्य पूरा नहीं होने वाला। जिस तरह नए बन रहे भवनों में वर्षा जल संग्रहण (वाटर हार्वेस्टिंग) की व्यवस्था अनिवार्य की गई वही नियम सोलर पैनल के लिए भी बनना चाहिए। स्थानीय निकायों को स्ट्रीट लाइट के लिए भी सौर ऊर्जा का उपयोग बढ़ाने में मदद दी जावे। ग्रामीण क्षेत्रों भी खुला क्षेत्र काफी है। यदि पंचायत स्तर पर सौर ऊर्जा उत्पादन के लक्ष्य निर्धारित कर स्वच्छता अभियान जैसी प्रतियोगिता रखी जावे तो ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर ग्रामों की कल्पना साकार हो सकती है। गरीबों की बस्तियों में भी सामुदायिक सौर ऊर्जा उत्पादन के जरिए मुफ्त और सस्ती बिजली से होने वाले घाटे को कम किया जा सकता है। कुल मिलाकर ये विश्वास करना गलत नहीं होगा  कि प्रधानमंत्री सूर्योदय योजना देश में सौर ऊर्जा क्रांति का सूत्रपात कर सकती है। 

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 रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 29 January 2024

ज्ञानवापी में मंदिर के प्रमाण मिलने के बाद हठधर्मिता छोड़ें मुस्लिम


वाराणसी के सुप्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद में पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की गई खुदाई से  उस दावे की पुष्टि हो गई है कि वह हिन्दू मंदिर पर ही बनाई गई थी। इस खुदाई को रोकने  मुस्लिम पक्ष द्वारा  अदालत में भरपूर दलीलें दी गईं। अपेक्षा तो थी कि स्वाधीनता के बाद केंद्र सरकार  मुगल काल में हिन्दू धर्मस्थलों को तोड़कर या उन्हीं ढांचों पर खड़ी की गई मस्जिदों को हिंदुओं को सौंपने की नीति बनाती । लेकिन  कांग्रेस सहित अन्य पार्टियां  मुसलमानों की नाराजगी से बचने के लिए हिंदुओं के वैध दावों को  ठुकराती रहीं। हालांकि अयोध्या विवाद को सुलझाकर सर्वोच्च न्यायालय ने जो रास्ता खोल दिया वह उन सभी धर्मस्थलों को मुक्त करवाने में सहायक होगा जिनको  मुस्लिम शासकों ने  बलपूर्वक मस्जिद का रूप दे दिया। उस दृष्टि से ज्ञानवापी में किए गए  सर्वेक्षण की जो रिपोर्ट अदालत में पेश हुई  ,  उसमें समाहित चित्रों को देखकर कोई भी कह सकता है कि वह मंदिर ही है ।  मुस्लिम पक्ष को इसका एहसास काफी पहले से था । इसीलिए उन चीजों को  छिपा दिया गया था जो हिन्दू धर्म के प्रतीक हैं। सबसे बड़ी बात शिवलिंग का मिलना है। मुस्लिम पक्ष द्वारा इस बारे में वही गलती दोहराई जा रही है जो अयोध्या विवाद में देखने मिली। इसलिए  इस विवाद को निपटाने के लिए अदालत ही एकमात्र विकल्प बच रहती है जहां पुख्ता प्रमाणों के आधार पर फैसले होते हैं। अयोध्या में  हिन्दू मंदिर होने की बात भी वहां की गई खुदाई  से ही तय हुई। वही प्रक्रिया ज्ञानवापी के बारे में भी अपनाई जा रही है।  1991 में केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार ने जो कानून बनाया उसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को किसी भी धर्मस्थल की जो स्थिति थी उसे परिवर्तित नहीं किया जावेगा। लेकिन अयोध्या विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना निर्णय इस आधार पर दिया कि बाबरी ढांचा हिंदुओं के मंदिर को मस्जिद का रूप देकर खड़ा किया गया था। ठीक वही बात ज्ञानवापी के बारे में भी सामने आ रही है। मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि के बारे में भी ऐसा ही दावा  है। ये सब देखते हुए मुस्लिम धर्मगुरुओं को अपने समुदाय के लोगों को  समझाना चाहिए कि वे हठधर्मिता के बजाय समझदारी और व्यवहारिकता से काम लें। इसमें दो राय नहीं है कि मुगलों द्वारा पूरे देश में हिंदुओं के धर्मस्थलों को नष्ट करने का काम बड़े पैमाने पर हुआ।  प्राचीन धर्मस्थलों के बारे में जो तथ्य उभरकर सामने आ रहे हैं वे चौंकाने वाले हैं। उल्लेखनीय  है कि देश का बंटवारा धर्म के नाम पर हमारे नेताओं ने स्वीकार किया था।  सर्व धर्म समभाव के भारतीय संस्कारों के कारण भले ही मुस्लिमों की बड़ी आबादी भारत में रह गई और पाकिस्तान के उलट भारत ने अपने को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाया किंतु ये भी उतना ही सही है कि तत्कालीन शासकों ने मुस्लिम तुष्टीकरण के फेर में बहुसंख्यकों की धार्मिक भावनाओं को धक्का पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यदि सरदार पटेल न होते तब बड़ी बात नहीं सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार भी न हो पाता।अयोध्या का विवाद तो स्वाधीनता के पहले से चला आ रहा था। मथुरा और वाराणसी में हिंदुओं के सर्वोच्च आराध्यों के पवित्र  मंदिर के बगल में बनी मस्जिद के हिन्दू मंदिर होने की बात  पंडित नेहरू से लेकर तमाम नेताओं को ज्ञात थी । लेकिन उन्होंने इस दिशा में सोचने की तकलीफ  इसलिए नहीं उठाई क्योंकि वे हिंदुओं की सहनशक्ति को जानते थे। वरना क्या कारण था कि हिंदुओं की  विवाह व्यवस्था संबंधी रीति - रिवाजों को तो उलट - पलट दिया गया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को छेड़ने की हिम्मत नहीं हुई। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समान नागरिक संहिता लागू करने पर जोर दिए जाने के बाद भी ज्यादातर राजनीतिक दल उसके लिए राजी नहीं हैं। हालांकि ज्ञानवापी के विवाद पर अदालती निर्णय ही एकमात्र रास्ता बच रहता है परंतु मुस्लिम समाज को ये बात समझ लेनी चाहिए कि जिन राजनीतिक दलों के बहकावे में आकर वह सच्चाई की स्वीकार करने से बचता है उनका मकसद महज उनके वोट हासिल करना  है। ऐसे में उनका भला इसी में है कि वे अतीत में मुगल शासकों द्वारा हिंदुओं के धर्मस्थलों पर जबरन कब्जा किए जाने वाली गलती को सुधारने की पहल करते हुए उनकी सद्भावना हासिल करें।  बहुसंख्यक हिंदुओं के साथ समन्वय बनाकर चलने में ही उनका भविष्य सुरक्षित और उज्ज्वल है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 28 January 2024

नीतीश और भाजपा दोनों को एक दूसरे की जरूरत थी : लालू कुनबे के जेल जाने की संभावना भी बनी बड़ा कारण



आज सुबह तक जो अनिश्चितता बनी हुई थी वह दोपहर आते - आते खत्म हो गई। नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। शाम तक भाजपा और जीतनराम मांझी की पार्टी के सहारे वे दोबारा सरकार बना लेंगे। नई सरकार में जद (यू) के साथ अब भाजपा और श्री मांझी के विधायक बतौर मंत्री दिखाई देंगे। इंडी नामक विपक्षी गठबंधन को जन्म देने वाले नीतीश ने जाति आधारित जनगणना करवाकर भाजपा के लिए चिंताजनक हालात उत्पन्न कर दिए थे। राहुल गांधी  तो इसे 2024  के लोकसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाने में जुट गए। हालांकि म.प्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा कारगर नहीं रहा किंतु इतना तो माना ही जा सकता था कि नीतीश विपक्षी गठबंधन के सबसे प्रमुख नेता  के तौर पर राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभर रहे थे। उनको गठबंधन के संयोजक पद के अलावा प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाए जाने की संभावना भी काफी प्रबल थी।  इंडी की पिछली बैठक में संयोजक का मसला तो अनिर्णीत ही रहा किंतु ममता बैनर्जी ने प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी के मुकाबले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम उछालकर नया दांव चल दिया। अरविंद केजरीवाल द्वारा उसका समर्थन करना भी चौंकाने वाला रहा। यद्यपि श्री खरगे ने उक्त प्रस्ताव पर सहमति नहीं दी लेकिन नीतीश को ये खटक गया कि तेजस्वी यादव के अलावा अखिलेश यादव ने  भी ममता के प्रस्ताव का विरोध नहीं किया। उन्हें अपेक्षा थी  कि सोनिया गांधी तो कम से कम ममता की पहल को महत्व नहीं देंगी किंतु उन्होंने भी मौन साधे रखा। इस बात से नीतीश उखड़ गए। उनको ये लगने लगा कि जिस गठबंधन को आकार देने के लिए वे महीनों से जुटे हुए थे और अपने से कनिष्ट नेताओं से भी जा - जाकर मिले , यदि वही उनको उपेक्षित कर रहा है तब उसके साथ रहने में कोई लाभ नहीं होने वाला। इधर बिहार में  महागठबंधन के मुख्य घटक राजद की गतिविधियों से भी वे चौकन्ने थे। बीच में ये अटकलें भी लगीं कि जद (यू) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह भीतर - भीतर लालू के साथ गोटियां बिठाते हुए नीतीश को हटाने की बिसात बिछा रहे थे। इसीलिए नीतीश उनको हटाकर पार्टी अध्यक्ष पद पर खुद आसीन हो गए। और तभी से उनके महागठबंधन से अलग होने की खबरें उड़ने लगीं। हालांकि भाजपा के साथ दोबारा जुड़ना आसान नहीं था क्योंकि बीते लगभग डेढ़ साल में दोनों तरफ से बयानों के जो जहर बुझे तीर चले उनके बाद पुनर्मिलन बेहद मुश्किल लग रहा था। पहले भाजपा नीतीश को लेकर उतनी आक्रामक नहीं होती थी किंतु 2022 के अलगाव के बाद कटुता चरम पर जा चुकी थी। नीतीश ने भाजपा के साथ आने के बजाय मर जाना पसंद करूंगा जैसा बयान दिया तो भाजपा ने जवाब में यहां तक कह दिया कि वे आना भी चाहेंगे तो पार्टी अपने दरवाजे नहीं खोलेगी। लेकिन राजनीति में  दोस्ती और दुश्मनी दोनों स्थायी नहीं होतीं वाली उक्ति को सही साबित करते हुए नीतीश और भाजपा एक बार फिर साथ आ गए। लेकिन इस  बार ये जुगलबंदी महज बिहार पर असर नहीं डालेगी ,  अपितु आगामी लोकसभा चुनाव की दृष्टि से इसका प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर पड़े बिना नहीं रहेगा । जिस विपक्षी गठबंधन को जन्म देने के लिए  नीतीश ने जी - जान से मेहनत की उसको उनके इस पैंतरे से जबरदस्त धक्का पहुंचा है क्योंकि  तमाम विपक्षी दलों को एक साथ लाने का असली श्रेय उन्हीं को है। ये बात भी सही है कि लालू प्रसाद यादव  अपने बेटे तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनवाने का दबाव बना रहे थे । यदि नीतीश को इंडी का संयोजक बना दिया गया होता तो वे तेजस्वी  की ताजपोशी करवाने राजी भी हो जाते किंतु उस संभावना के कमजोर पड़ते ही उन्होंने मुख्यमंत्री पद न छोड़ने का मन बना लिया। आज त्यागपत्र देने के बाद नीतीश ने आरोप लगाया कि राजद के मंत्री काम नहीं कर रहे थे , इसलिए उन्होंने महागठबंधन तोड़ दिया परंतु इस अलगाव का सबसे बड़ा कारण यह है कि लालू परिवार के अनेक सदस्य ईडी और सीबीआई के शिकंजे में हैं । और कब किसकी गिरफ्तारी हो जाए कोई नहीं जानता। ऐसा होने पर उनकी और सरकार दोनों की छवि खराब होती । नीतीश को ये बात अच्छी तरह पता है कि भले ही लगातार पलटी मारने के कारण उनको पलटूराम कहा जाने लगा हो किंतु भ्रष्टाचार के मामले में वे आज भी बेदाग हैं और यही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। भाजपा ने भी उनकी इसी खासियत के कारण न चाहते हुए भी एक बार फिर गले लगाया। ये बात भी सही है कि शुरुआत में नीतीश को बिहार की सत्ता के उच्च शिखर पर पहुंचाने में भाजपा ही बतौर सीढ़ी  काम आई। लालू के साथ तो उनका गठजोड़ केंद्र की राजनीति में श्री मोदी के प्रवेश की प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ किंतु उसे छोड़कर भी वे एक बार भाजपा के साथ लौटे थे। दरअसल आज के नीतीश में वह दमखम नहीं रहा गया था कि वे लालू कुनबे के दबाव को झेल पाते । ऐसे में उन्हें अपने बचे हुए राजनीतिक जीवन में सुरक्षित ही नहीं सम्मानजनक स्थिति की जरूरत थी जिसके लिए भाजपा ही सर्वोत्तम विकल्प था जो बिहार में वह एक बड़ी वैकल्पिक ताकत बन चुकी है । और उसे भी जातीय समीकरणों के लिहाज से किसी बड़े चेहरे की जरूरत थी जो नीतीश से बेहतर दूसरा नहीं हो सकता था। नीतीश के इस कदम ने भाजपा को चिंता से उबार लिया है वहीं लालू के साथ ही कांग्रेस और अंततः इंडी गठबंधन के लिए अपशकुन उत्पन्न कर दिया । बिहार में हुए परिवर्तन के बाद लालू और उनके परिवार से सत्ता रूपी सुरक्षा चक्र छिन गया है। इसके बाद जांच एजेंसियों को उनकी घेराबंदी करना आसान हो जाएगा । दूसरी तरफ इंडी गठबंधन में भी तेजस्वी की वजनदारी हल्की हो जायेगी। राजद के अनेक नेता सुरक्षित भविष्य की तलाश में अब भाजपा या जद (यू) में संभावनाएं तलाश सकते हैं। भाजपा के हाथ  में उ.प्र से सटा एक बड़ा राज्य और आ आने से झारखंड , प.बंगाल और उड़ीसा में भी एनडीए को जबरदस्त लाभ होना तय है। कांग्रेस के लिए ये बदलाव बड़ा धक्का है क्योंकि अब ये आवाज चारों तरफ से उठने लगी है कि विपक्षी गठबंधन के मजबूत न होने के लिए राहुल गांधी का लापरवाह रवैया ही जिम्मेदार है। जिन्होंने न्याय यात्रा निकालने के पहले इंडी के घटक दलों से कोई सहमति नहीं ले। बीते दो - तीन दिनों के भीतर इस गठबंधन को जिस तरह के झटके लगे हैं उनसे ये आशंका मजबूत होती जा रही है कि लोकसभा चुनाव आते - आते तक विपक्षी दलों की एकता में और भी दरारें आएंगी। हो सकता है न्याय यात्रा खत्म होते - होते कुछ और धक्के इस गठबंधन को लग जाएं  क्योंकि इसमें शामिल दलों में न साम्यता और न ही समन्वय।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 26 January 2024

भारतीयता के प्रति समर्पित नेतृत्व के हाथों में ही देश सुरक्षित रह सकता है




आजकल कुछ लोग यह दुष्प्रचार कर रहे हैं कि भारत में लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा। उनका मानना है कि आगामी चुनाव में  नरेंद्र मोदी सत्ता में लौटे तो  तानाशाही आ जाएगी और ये देश  हिन्दू राष्ट्र घोषित कर दिया जावेगा। राम मंदिर में हुई प्राण - प्रतिष्ठा से भी समाज के उस वर्ग का रक्तचाप बढ़ा हुआ है जिसने कभी देश का हित नहीं चाहा।  नेताजी सुभाष चंद्र बोस को हिटलर का दलाल प्रचारित करने वाला यह वर्ग आयातित राजनीतिक विचार को भारत के जनमानस पर थोपने का प्रयास करता आ रहा है। जब उसे लगा इसे जनस्वीकृति नहीं मिल सकती तब मुख्य धारा की राजनीति से जुड़कर इसने अपनी कार्ययोजना को लागू करने की चाल चली। दुर्भाग्य से ज्यादातर राजनीतिक दल इनके जाल में फंसकर उन नीतियों को लागू करने लगे जिनसे इस देश का स्वभाव मेल नहीं खाता। भारत का अस्तित्व उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर आधारित है। आजादी के बाद उसी आधार को कमजोर करने का सुनियोजित प्रयास होता रहा । विदेशी टुकड़ों पर पलने वाले कतिपय बुद्धिजीवी देश का मनोबल तोड़ते हुए  हीन भावना का संचार करने में जुट गए और वह भी सरकार के सहयोग और संरक्षण में। धर्म  , संस्कृति ,कला - साहित्य जैसे क्षेत्रों में भारतीयता के भाव को कमजोर करने का प्रयास पूरी ताकत से चलता रहा। लेकिन जिस तरह हर रात के बाद सुबह होती है , ठीक वैसे ही 10 वर्ष पूर्व जनता ने राष्ट्रवादी सोच पर आधारित नेतृत्व को  बागडोर सौंप दी। सुपरिणाम ये हुआ कि देश नए उत्साह के साथ आगे बढ़ने लगा।पश्चिमी देशों की चकाचौंध से प्रभावित होने के बजाय हमारे युवाओं ने भारत को  विकसित देशों के समकक्ष खड़ा करने का संकल्प लिया। राजनीतिक नेतृत्व से प्राप्त प्रोत्साहन ने भी इसमें अपना योगदान दिया। फलस्वरूप भारत एक शक्ति संपन्न और संभावनाओं भरे देश के तौर पर उभरा है। दुनिया की सबसे सक्षम युवा शक्ति नए भारत की उम्मीदों का स्रोत है। खास बात ये है कि भारत और भारतीयता के प्रति समाज के प्रत्येक वर्ग में आकर्षण बढ़ा है। वो जमाना चला गया जब हम विश्व शक्ति कहे जाने वाले देशों के पिछलग्गू हुआ करते थे। उसके उलट आज का भारत खुद एक विश्व शक्ति है। इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित नेतृत्व के हाथ में सत्ता आना रहा। और यही बात उन ताकतों को बर्दाश्त नहीं हो रही जिनका उद्देश्य भारतीयता की भावना को नष्ट करना था । बीते 10  सालों में केंद्रीय सत्ता ने  देश हित में जो साहसिक निर्णय लिए उनके कारण ये तबका पूरी तरह हाशिए पर चला गया। अपनी कुंठा व्यक्त करने के लिए ये  समय - समय पर जनता को भड़काने के प्रयास करता रहता है किंतु इनकी असलियत पूरी तरह उजागर होने से अब लोग इनके दुष्प्रचार में नहीं फंसते। 22 जनवरी को अयोध्या स्थित राम मंदिर में हुई प्राण - प्रतिष्ठा के विरोध में इसी वर्ग ने जनता को बरगलाने का भरपूर प्रयास किया किंतु पूरे देश में जो नजारा दिखाई दिया उससे भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रमाण पूरे विश्व को मिल गया। उस दृष्टि से देश का 75 वां गणतंत्र उम्मीदों भरी नई सुबह लेकर आया है। कुछ महीनों बाद देश आगामी पांच वर्षों के लिए अपनी सरकार चुनने जा रहा है। ऐसे में पूरी दुनिया की निगाहें हमारी ओर लगी हुई हैं। जो लोग लोकतंत्र और संविधान को खतरे में बताकर भय का वातावरण बनाने एकजुट हैं वे ही सही मायनों में लोकतंत्र का अपने निजी हितों के लिए उपयोग करने के दोषी हैं। उनके दोहरे चरित्र को जनता जान चुकी है । इसलिए उनका दुष्प्रचार बेअसर साबित हो रहा है। कुछ माह पूर्व हुए विधानसभा चुनावों में इसका संकेत मिल चुका है। ये विश्वास प्रबल होता जा रहा है कि देश और लोकतंत्र  भारतीयता के प्रति समर्पित नेतृत्व के हाथों में ही सुरक्षित रह सकता है। विगत दस वर्षों में भारत ने प्रत्येक क्षेत्र में ऊंची छलांगें लगाई हैं किंतु अभी बहुत कुछ करना बाकी है और उसके लिए सरकार के साथ ही जनता को भी जागरूक और जिम्मेदार रहना होगा क्योंकि गणतंत्र की सफलता इसी पर निर्भर होती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी