Friday, 2 February 2024
अंतरिम बजट : सत्ता में वापसी के आत्मविश्वास का प्रमाण
Thursday, 1 February 2024
देश के प्रत्येक नागरिक को मिले आयुष्मान भारत योजना का लाभ
Wednesday, 31 January 2024
अंतरिम बजट में मध्यम आय वर्ग वालों के हितों का संरक्षण भी जरूरी
Tuesday, 30 January 2024
सूर्योदय योजना : सौर ऊर्जा क्रांति की दिशा में बड़ा कदम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बात के लिए प्रशंसा करनी होगी कि वे हर समय किसी न किसी योजना या कार्यक्रम के बारे में न सिर्फ सोचते अपितु उसे कार्य रूप में परिणित भी करते हैं। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से लौटकर उन्होंने प्रधानमंत्री सूर्योदय योजना के अंतर्गत एक करोड़ घरों की छत पर सोलर पैनल (सौर ऊर्जा विद्युत संयंत्र ) लगाए जाने की घोषणा कर दी। इसके जरिए गरीब और मध्यम वर्गीय लोगों के बिजली बिलों में कमी आने के साथ ही देश बिजली के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। हालांकि देश के अधिकतर हिस्से विद्युत संकट से उबर चुके हैं किंतु सच्चाई ये है कि सरकार नियंत्रित विद्युत मंडलों को भले ही कंपनी में बदल दिया गया हो किंतु उनके द्वारा उत्पादित बिजली बेहद महंगी है। निजी क्षेत्र से सस्ती बिजली खरीदकर घरेलू और व्यवसायिक उपभोक्ताओं को कई गुना ज्यादा दरों पर बिजली बेची जाती है। दूसरी तरफ वोटों की सौदागरी के फेर में मुफ्त और सस्ती बिजली का चलन विद्युत मंडलों की कमर तोड़े डाल रहा है। कुल मिलाकर वोट बैंक की राजनीति ने बिजली उत्पादन से जुड़ी सरकारी व्यवस्था को मुनाफाखोर बना दिया। सरकारी संस्थान वैसे भी सफेद हाथी बन चुके हैं। ये बात भी बिलकुल सही है कि बिजली की खपत भी निरंतर बढ़ती जा रही है। पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जा रहे वैश्विक प्रयासों के अंतर्गत कोयले से बिजली बनाने वाले संयंत्र बंद होने से बिजली उत्पादन के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश की गई है जिनमें पवन ऊर्जा , परमाणु ऊर्जा और सौर ऊर्जा शामिल हैं। लेकिन इनमें सबसे सस्ती सूर्य किरणों से बनाई जाने वाली ऊर्जा ही है। दुनिया के तमाम ऐसे देशों ने भी जिनमें धूप काफी कम होती है , सौर ऊर्जा उत्पादन में काफी प्रगति कर ली। हमारा पड़ोसी और विकास की दौड़ में प्रमुख प्रतिद्वंदी चीन तो सौर ऊर्जा उत्पादन में बहुत आगे निकल चुका है। हालांकि भारत इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ तो रहा है किंतु देश में सौर ऊर्जा संबंधी उपकरणों का उत्पादन काफी देर से शुरू होने की वजह से आयातित सोलर पैनल काफी महंगे पड़ते हैं। सरकार इस पर सब्सिडी देती है किंतु अभी भी इसे लगाने पर जो खर्च आता है वह काम आय वालों के बस के बाहर है। इसके अलावा जो उपभोक्ता अपनी छतों पर सोलर पैनल लगवाना चाहते हैं उनको बिजली विभाग की नौकरशाही खून के आंसू रुलाती है। इविचारणीय बात ये है कि भारत का मौसम जिस प्रकार का है उसके कारण देश के अधिकांश हिस्सों में मानसून और सर्दियों का कुछ समय छोड़कर सूर्य का पर्याप्त प्रकाश उपलब्ध रहता है। ऐसे में यदि घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाने का अभियान युद्ध स्तर पर शुरू करते हुए उन पर सब्सिडी और बढ़ाई जाए तो आने वाले पांच सालों के भीतर भारत सौर ऊर्जा के जरिए सस्ती बिजली का उत्पादन करने में सक्षम होगा। इससे उपभोक्ताओं को तो लाभ होगा ही साथ में उनके उपभोग से बची बिजली सरकारी विद्युत मंडल के काम आयेगी। प्रधानमंत्री ने जिस तरह शौचालय , स्वच्छता , और अटल जल योजना , रसोई गैस और आवास जैसी मूलभूत जरूरतों को राष्ट्रीय कार्यक्रम बना दिया वैसे ही यदि सूर्योदय योजना को राष्ट्रीय अभियान बनाया जाए तो देश में सौर ऊर्जा क्रांति हो सकती है। बीते एक दशक में शासकीय कार्यालयों के अलावा बड़े औद्योगिक एवं व्यावसायिक संस्थानों के साथ ही अनेक किसानों द्वारा सोलर पैनल लगवाए गए हैं। जिन घरेलू उपभोक्ताओं ने सौर ऊर्जा के लिए अपने घरों की छतों का इस्तेमाल किया उनका अनुभव भी बेहद सुखद है। लेकिन अभी भी इस दिशा में बहुत कुछ होना बाकी है। प्रधानमंत्री चूंकि नवाचार में काफ़ी रुचि लेते हैं इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि सौर ऊर्जा उत्पादन उनकी प्रमुख कार्ययोजना में शामिल होकर रिकॉर्ड तेजी से आगे बढ़ेगा । लेकिन केवल सब्सिडी देने मात्र से यह लक्ष्य पूरा नहीं होने वाला। जिस तरह नए बन रहे भवनों में वर्षा जल संग्रहण (वाटर हार्वेस्टिंग) की व्यवस्था अनिवार्य की गई वही नियम सोलर पैनल के लिए भी बनना चाहिए। स्थानीय निकायों को स्ट्रीट लाइट के लिए भी सौर ऊर्जा का उपयोग बढ़ाने में मदद दी जावे। ग्रामीण क्षेत्रों भी खुला क्षेत्र काफी है। यदि पंचायत स्तर पर सौर ऊर्जा उत्पादन के लक्ष्य निर्धारित कर स्वच्छता अभियान जैसी प्रतियोगिता रखी जावे तो ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर ग्रामों की कल्पना साकार हो सकती है। गरीबों की बस्तियों में भी सामुदायिक सौर ऊर्जा उत्पादन के जरिए मुफ्त और सस्ती बिजली से होने वाले घाटे को कम किया जा सकता है। कुल मिलाकर ये विश्वास करना गलत नहीं होगा कि प्रधानमंत्री सूर्योदय योजना देश में सौर ऊर्जा क्रांति का सूत्रपात कर सकती है।
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रवीन्द्र वाजपेयी
Monday, 29 January 2024
ज्ञानवापी में मंदिर के प्रमाण मिलने के बाद हठधर्मिता छोड़ें मुस्लिम
वाराणसी के सुप्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद में पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की गई खुदाई से उस दावे की पुष्टि हो गई है कि वह हिन्दू मंदिर पर ही बनाई गई थी। इस खुदाई को रोकने मुस्लिम पक्ष द्वारा अदालत में भरपूर दलीलें दी गईं। अपेक्षा तो थी कि स्वाधीनता के बाद केंद्र सरकार मुगल काल में हिन्दू धर्मस्थलों को तोड़कर या उन्हीं ढांचों पर खड़ी की गई मस्जिदों को हिंदुओं को सौंपने की नीति बनाती । लेकिन कांग्रेस सहित अन्य पार्टियां मुसलमानों की नाराजगी से बचने के लिए हिंदुओं के वैध दावों को ठुकराती रहीं। हालांकि अयोध्या विवाद को सुलझाकर सर्वोच्च न्यायालय ने जो रास्ता खोल दिया वह उन सभी धर्मस्थलों को मुक्त करवाने में सहायक होगा जिनको मुस्लिम शासकों ने बलपूर्वक मस्जिद का रूप दे दिया। उस दृष्टि से ज्ञानवापी में किए गए सर्वेक्षण की जो रिपोर्ट अदालत में पेश हुई , उसमें समाहित चित्रों को देखकर कोई भी कह सकता है कि वह मंदिर ही है । मुस्लिम पक्ष को इसका एहसास काफी पहले से था । इसीलिए उन चीजों को छिपा दिया गया था जो हिन्दू धर्म के प्रतीक हैं। सबसे बड़ी बात शिवलिंग का मिलना है। मुस्लिम पक्ष द्वारा इस बारे में वही गलती दोहराई जा रही है जो अयोध्या विवाद में देखने मिली। इसलिए इस विवाद को निपटाने के लिए अदालत ही एकमात्र विकल्प बच रहती है जहां पुख्ता प्रमाणों के आधार पर फैसले होते हैं। अयोध्या में हिन्दू मंदिर होने की बात भी वहां की गई खुदाई से ही तय हुई। वही प्रक्रिया ज्ञानवापी के बारे में भी अपनाई जा रही है। 1991 में केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार ने जो कानून बनाया उसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को किसी भी धर्मस्थल की जो स्थिति थी उसे परिवर्तित नहीं किया जावेगा। लेकिन अयोध्या विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना निर्णय इस आधार पर दिया कि बाबरी ढांचा हिंदुओं के मंदिर को मस्जिद का रूप देकर खड़ा किया गया था। ठीक वही बात ज्ञानवापी के बारे में भी सामने आ रही है। मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि के बारे में भी ऐसा ही दावा है। ये सब देखते हुए मुस्लिम धर्मगुरुओं को अपने समुदाय के लोगों को समझाना चाहिए कि वे हठधर्मिता के बजाय समझदारी और व्यवहारिकता से काम लें। इसमें दो राय नहीं है कि मुगलों द्वारा पूरे देश में हिंदुओं के धर्मस्थलों को नष्ट करने का काम बड़े पैमाने पर हुआ। प्राचीन धर्मस्थलों के बारे में जो तथ्य उभरकर सामने आ रहे हैं वे चौंकाने वाले हैं। उल्लेखनीय है कि देश का बंटवारा धर्म के नाम पर हमारे नेताओं ने स्वीकार किया था। सर्व धर्म समभाव के भारतीय संस्कारों के कारण भले ही मुस्लिमों की बड़ी आबादी भारत में रह गई और पाकिस्तान के उलट भारत ने अपने को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाया किंतु ये भी उतना ही सही है कि तत्कालीन शासकों ने मुस्लिम तुष्टीकरण के फेर में बहुसंख्यकों की धार्मिक भावनाओं को धक्का पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यदि सरदार पटेल न होते तब बड़ी बात नहीं सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार भी न हो पाता।अयोध्या का विवाद तो स्वाधीनता के पहले से चला आ रहा था। मथुरा और वाराणसी में हिंदुओं के सर्वोच्च आराध्यों के पवित्र मंदिर के बगल में बनी मस्जिद के हिन्दू मंदिर होने की बात पंडित नेहरू से लेकर तमाम नेताओं को ज्ञात थी । लेकिन उन्होंने इस दिशा में सोचने की तकलीफ इसलिए नहीं उठाई क्योंकि वे हिंदुओं की सहनशक्ति को जानते थे। वरना क्या कारण था कि हिंदुओं की विवाह व्यवस्था संबंधी रीति - रिवाजों को तो उलट - पलट दिया गया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को छेड़ने की हिम्मत नहीं हुई। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समान नागरिक संहिता लागू करने पर जोर दिए जाने के बाद भी ज्यादातर राजनीतिक दल उसके लिए राजी नहीं हैं। हालांकि ज्ञानवापी के विवाद पर अदालती निर्णय ही एकमात्र रास्ता बच रहता है परंतु मुस्लिम समाज को ये बात समझ लेनी चाहिए कि जिन राजनीतिक दलों के बहकावे में आकर वह सच्चाई की स्वीकार करने से बचता है उनका मकसद महज उनके वोट हासिल करना है। ऐसे में उनका भला इसी में है कि वे अतीत में मुगल शासकों द्वारा हिंदुओं के धर्मस्थलों पर जबरन कब्जा किए जाने वाली गलती को सुधारने की पहल करते हुए उनकी सद्भावना हासिल करें। बहुसंख्यक हिंदुओं के साथ समन्वय बनाकर चलने में ही उनका भविष्य सुरक्षित और उज्ज्वल है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Sunday, 28 January 2024
नीतीश और भाजपा दोनों को एक दूसरे की जरूरत थी : लालू कुनबे के जेल जाने की संभावना भी बनी बड़ा कारण
आज सुबह तक जो अनिश्चितता बनी हुई थी वह दोपहर आते - आते खत्म हो गई। नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। शाम तक भाजपा और जीतनराम मांझी की पार्टी के सहारे वे दोबारा सरकार बना लेंगे। नई सरकार में जद (यू) के साथ अब भाजपा और श्री मांझी के विधायक बतौर मंत्री दिखाई देंगे। इंडी नामक विपक्षी गठबंधन को जन्म देने वाले नीतीश ने जाति आधारित जनगणना करवाकर भाजपा के लिए चिंताजनक हालात उत्पन्न कर दिए थे। राहुल गांधी तो इसे 2024 के लोकसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाने में जुट गए। हालांकि म.प्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा कारगर नहीं रहा किंतु इतना तो माना ही जा सकता था कि नीतीश विपक्षी गठबंधन के सबसे प्रमुख नेता के तौर पर राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभर रहे थे। उनको गठबंधन के संयोजक पद के अलावा प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाए जाने की संभावना भी काफी प्रबल थी। इंडी की पिछली बैठक में संयोजक का मसला तो अनिर्णीत ही रहा किंतु ममता बैनर्जी ने प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी के मुकाबले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम उछालकर नया दांव चल दिया। अरविंद केजरीवाल द्वारा उसका समर्थन करना भी चौंकाने वाला रहा। यद्यपि श्री खरगे ने उक्त प्रस्ताव पर सहमति नहीं दी लेकिन नीतीश को ये खटक गया कि तेजस्वी यादव के अलावा अखिलेश यादव ने भी ममता के प्रस्ताव का विरोध नहीं किया। उन्हें अपेक्षा थी कि सोनिया गांधी तो कम से कम ममता की पहल को महत्व नहीं देंगी किंतु उन्होंने भी मौन साधे रखा। इस बात से नीतीश उखड़ गए। उनको ये लगने लगा कि जिस गठबंधन को आकार देने के लिए वे महीनों से जुटे हुए थे और अपने से कनिष्ट नेताओं से भी जा - जाकर मिले , यदि वही उनको उपेक्षित कर रहा है तब उसके साथ रहने में कोई लाभ नहीं होने वाला। इधर बिहार में महागठबंधन के मुख्य घटक राजद की गतिविधियों से भी वे चौकन्ने थे। बीच में ये अटकलें भी लगीं कि जद (यू) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह भीतर - भीतर लालू के साथ गोटियां बिठाते हुए नीतीश को हटाने की बिसात बिछा रहे थे। इसीलिए नीतीश उनको हटाकर पार्टी अध्यक्ष पद पर खुद आसीन हो गए। और तभी से उनके महागठबंधन से अलग होने की खबरें उड़ने लगीं। हालांकि भाजपा के साथ दोबारा जुड़ना आसान नहीं था क्योंकि बीते लगभग डेढ़ साल में दोनों तरफ से बयानों के जो जहर बुझे तीर चले उनके बाद पुनर्मिलन बेहद मुश्किल लग रहा था। पहले भाजपा नीतीश को लेकर उतनी आक्रामक नहीं होती थी किंतु 2022 के अलगाव के बाद कटुता चरम पर जा चुकी थी। नीतीश ने भाजपा के साथ आने के बजाय मर जाना पसंद करूंगा जैसा बयान दिया तो भाजपा ने जवाब में यहां तक कह दिया कि वे आना भी चाहेंगे तो पार्टी अपने दरवाजे नहीं खोलेगी। लेकिन राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी दोनों स्थायी नहीं होतीं वाली उक्ति को सही साबित करते हुए नीतीश और भाजपा एक बार फिर साथ आ गए। लेकिन इस बार ये जुगलबंदी महज बिहार पर असर नहीं डालेगी , अपितु आगामी लोकसभा चुनाव की दृष्टि से इसका प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर पड़े बिना नहीं रहेगा । जिस विपक्षी गठबंधन को जन्म देने के लिए नीतीश ने जी - जान से मेहनत की उसको उनके इस पैंतरे से जबरदस्त धक्का पहुंचा है क्योंकि तमाम विपक्षी दलों को एक साथ लाने का असली श्रेय उन्हीं को है। ये बात भी सही है कि लालू प्रसाद यादव अपने बेटे तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनवाने का दबाव बना रहे थे । यदि नीतीश को इंडी का संयोजक बना दिया गया होता तो वे तेजस्वी की ताजपोशी करवाने राजी भी हो जाते किंतु उस संभावना के कमजोर पड़ते ही उन्होंने मुख्यमंत्री पद न छोड़ने का मन बना लिया। आज त्यागपत्र देने के बाद नीतीश ने आरोप लगाया कि राजद के मंत्री काम नहीं कर रहे थे , इसलिए उन्होंने महागठबंधन तोड़ दिया परंतु इस अलगाव का सबसे बड़ा कारण यह है कि लालू परिवार के अनेक सदस्य ईडी और सीबीआई के शिकंजे में हैं । और कब किसकी गिरफ्तारी हो जाए कोई नहीं जानता। ऐसा होने पर उनकी और सरकार दोनों की छवि खराब होती । नीतीश को ये बात अच्छी तरह पता है कि भले ही लगातार पलटी मारने के कारण उनको पलटूराम कहा जाने लगा हो किंतु भ्रष्टाचार के मामले में वे आज भी बेदाग हैं और यही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। भाजपा ने भी उनकी इसी खासियत के कारण न चाहते हुए भी एक बार फिर गले लगाया। ये बात भी सही है कि शुरुआत में नीतीश को बिहार की सत्ता के उच्च शिखर पर पहुंचाने में भाजपा ही बतौर सीढ़ी काम आई। लालू के साथ तो उनका गठजोड़ केंद्र की राजनीति में श्री मोदी के प्रवेश की प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ किंतु उसे छोड़कर भी वे एक बार भाजपा के साथ लौटे थे। दरअसल आज के नीतीश में वह दमखम नहीं रहा गया था कि वे लालू कुनबे के दबाव को झेल पाते । ऐसे में उन्हें अपने बचे हुए राजनीतिक जीवन में सुरक्षित ही नहीं सम्मानजनक स्थिति की जरूरत थी जिसके लिए भाजपा ही सर्वोत्तम विकल्प था जो बिहार में वह एक बड़ी वैकल्पिक ताकत बन चुकी है । और उसे भी जातीय समीकरणों के लिहाज से किसी बड़े चेहरे की जरूरत थी जो नीतीश से बेहतर दूसरा नहीं हो सकता था। नीतीश के इस कदम ने भाजपा को चिंता से उबार लिया है वहीं लालू के साथ ही कांग्रेस और अंततः इंडी गठबंधन के लिए अपशकुन उत्पन्न कर दिया । बिहार में हुए परिवर्तन के बाद लालू और उनके परिवार से सत्ता रूपी सुरक्षा चक्र छिन गया है। इसके बाद जांच एजेंसियों को उनकी घेराबंदी करना आसान हो जाएगा । दूसरी तरफ इंडी गठबंधन में भी तेजस्वी की वजनदारी हल्की हो जायेगी। राजद के अनेक नेता सुरक्षित भविष्य की तलाश में अब भाजपा या जद (यू) में संभावनाएं तलाश सकते हैं। भाजपा के हाथ में उ.प्र से सटा एक बड़ा राज्य और आ आने से झारखंड , प.बंगाल और उड़ीसा में भी एनडीए को जबरदस्त लाभ होना तय है। कांग्रेस के लिए ये बदलाव बड़ा धक्का है क्योंकि अब ये आवाज चारों तरफ से उठने लगी है कि विपक्षी गठबंधन के मजबूत न होने के लिए राहुल गांधी का लापरवाह रवैया ही जिम्मेदार है। जिन्होंने न्याय यात्रा निकालने के पहले इंडी के घटक दलों से कोई सहमति नहीं ले। बीते दो - तीन दिनों के भीतर इस गठबंधन को जिस तरह के झटके लगे हैं उनसे ये आशंका मजबूत होती जा रही है कि लोकसभा चुनाव आते - आते तक विपक्षी दलों की एकता में और भी दरारें आएंगी। हो सकता है न्याय यात्रा खत्म होते - होते कुछ और धक्के इस गठबंधन को लग जाएं क्योंकि इसमें शामिल दलों में न साम्यता और न ही समन्वय।
- रवीन्द्र वाजपेयी