Friday, 1 March 2024

मुंबई बम विस्फोटों के आरोपी टुंडा का बरी हो जाना चिंता का विषय


1993 में  मुंबई सहित कुछ और शहरों में हुए बम विस्फोटों का कर्ताधर्ता  अब्दुल करीम उर्फ टुंडा गत दिवस अजमेर की टाडा अदालत से बरी कर दिया गया क्योंकि सीबीआई उसके विरुद्ध  आरोप पत्र प्रस्तुत नहीं कर सकी। वह दाऊद इब्राहीम के करीबियों में शुमार था। उसे बेकसूर मान लेना तो उचित नहीं होगा किंतु अदालत में किसी को अपराधी साबित करने के लिए प्रमाण सहित आरोप पत्र  प्रस्तुत करना पड़ता है। टुंडा जिस घटना के लिए पकड़ा गया उसे 30 वर्ष से भी अधिक बीत चुके हैं। लेकिन सिर्फ इसलिए कि जांच एजेंसी उसके विरुद्ध आरोप पत्र पेश नहीं कर सकी , वह बरी हो जाए तो फिर समूची अभियोजन प्रक्रिया पर सवाल उठ खड़े होते हैं। सीबीआई देश की प्रमुख जांच एजेंसी है। किसी भी बड़ी वारदात की जांच उससे करवाने की मांग उठती है। उसके द्वारा अनेक गंभीर मामलों के अपराधियों को दंडित करवाया जा चुका है। अनेक राजनीतिक नेता भी सीबीआई जांच के बाद  जेल जाने मजबूर हुए। भ्रष्टाचार के सैकड़ों मामलों के पर्दाफाश में उसने सराहनीय भूमिका का निर्वहन किया। लेकिन  अनेक चर्चित अपराधिक मामलों में वह दोषियों को दंड दिलवाने में विफल रही। टुंडा का बरी हो जाना निश्चित रूप से चिंता का विषय है क्योंकि मुंबई में हुए विस्फोट साधारण अपराध नहीं थे। देश की आर्थिक राजधानी में आतंक उत्पन्न करने के उस प्रयास में  पड़ोसी शत्रु राष्ट्र की भूमिका भी सामने आ चुकी है। कुख्यात माफिया सरदार दाऊद इब्राहीम उसके बाद  पाकिस्तान भाग गया था । लेकिन देश विरोधी गंभीर वारदातों के जो आरोपी पकड़ में आ गए उन सबको दंडित करने में भी जब लंबा समय लगाया जाता है तो अन्य अपराधियों का हौसला बुलंद होता है। टुंडा का मामला अकेला नहीं है जिसमें सीबीआई द्वारा आरोप पत्र दाखिल नहीं किए जाने के कारण अपराधी बरी हो गए हों। अन्य जांच एजेंसियां भी इसी तरह की उदासीनता के लिए जिम्मेदार हैं। गत दिवस चार वर्ष पूर्व दिल्ली में हुए दंगों की एक महिला आरोपी ने उसके विरुद्ध आरोप पत्र पेश न किए जाने की शिकायत की। यही तोहमत ईडी पर भी लगती है कि वह छापेमारी और गिरफ्तारी करने के बाद आरोप पत्र दाखिल करने में जो विलम्ब करती है उससे उसकी दुर्भावना जाहिर होने के साथ ही उसके शिकंजे में आए व्यक्ति के प्रति सहानुभूति उत्पन्न होने लगती है। हमारे देश में सिविल सोसायटी के नाम पर कुछ लोगों का समूह है जो किसी आतंकवादी की फांसी रुकवाने के लिए देर रात सर्वोच्च न्यायालय खुलवाने की हद तक चला जाता है। टुंडा जैसों के बरी हो जाने के बाद इस तबके को जांच एजेंसियों को कठघरे में खड़ा करने का अवसर मिल जाता है। कई बार ऐसा लगता है कि सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों के पास काम का बोझ जरूरत से ज्यादा है।  गत दिवस खबर आई कि सीबीआई द्वारा सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को उनके मुख्यमंत्रित्वकाल में हुए किसी भ्रष्टाचार के सिलसिले में पूछताछ हेतु बुलाया गया है । उन्हें सत्ता से हटे हुए सात वर्ष बीत चुके हैं। उ.प्र की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के विरुद्ध भी सीबीआई जांच एक बार बंद किए जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के उपरांत दोबारा शुरू की गई थी। इसीलिए ये आरोप केंद्र सरकार पर लगते हैं कि वह सीबीआई और ईडी का उपयोग अपने स्वार्थ साधने के लिए करती है। नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी से घंटों पूछताछ होने के बाद मामला कहां पहुंचा ये कोई नहीं जानता। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया  साल भर से जेल में हैं। उनके विरुद्ध भी विस्तृत आरोप पत्र लंबित हैं। अदालत इस बारे में ईडी से तीखे सवाल भी कर चुकी है। हालांकि प्रभावशाली व्यक्तियों की ओर से जांच एजेंसी द्वारा की जाने वाली पूछताछ में अड़ंगे लगाया जाना भी जांच प्रक्रिया को विलंबित करने का कारण बनता है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन लंबे  समय तक ईडी के समन को ठुकराते रहे और अंततः गिरफ्तार हुए। दिल्ली के मुख्यमंत्री भी ईडी के बुलावे को अनेक महीनों से नजरंदाज करते आ रहे हैं । इस तरह की रस्साखींच में आरोपी अपने बचाव के रास्ते तलाश लेता है। जांच एजेंसी के कार्यालय में पूछताछ होने के दौरान नेताओं के समर्थक बाहर धरना - प्रदर्शन देने बैठे रहते हैं। ये देखते हुए जरूरी हो गया है कि सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों की कार्यकुशलता बढ़ाने हेतु उनको पर्याप्त स्टाफ दिया जाए । साथ ही लंबित प्रकरणों के जल्द निबटारे की समुचित व्यवस्था की जावे। अन्यथा इन एजेंसियों पर लगाए जाने वाले प्रश्नचिन्ह और गहरे हो जाएंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 29 February 2024

उच्च न्यायालय सख्त न होता तो शाहजहां की गिरफ्तारी नहीं होती



प.बंगाल के 24 परगना जिले का संदेशखाली नामक कस्बा बीते काफी समय से चर्चा में है। जनवरी माह में शाहजहां शेख नामक एक व्यक्ति के यहां ईडी का दल जब छापा मारने गया तो सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के उक्त  नेता के गुर्गों ने उस पर हमला कर दिया जिसमें ईडी के अनेक लोग घायल हो गए। उसी बीच शाहजहां भाग निकला। उस घटना के बाद संदेशखाली में उसके अत्याचारों का खुलासा होने लगा। वह और उसके गैंग के लोग महिलाओं के यौन शोषण और जमीनों पर कब्जा करने जैसा काम लंबे समय से करते आ रहे थे ।  उनके आतंक का  कोई विरोध इसलिए नहीं करता था क्योंकि  पुलिस द्वारा उनकी शिकायतें अनसुनी कर दी जाती थीं और पता लगने पर शाहजहां के लोग उन्हें और प्रताड़ित करते। महिलाओं को घर से उठा ले जाना और बलात्कार करने के बाद छोड़ देना वहां  आम हो चला था। नव विवाहिता तक के साथ इस तरह की अमानवीयता की जाती रही । जाहिर है शाहजहां और उसकी गैंग को सत्ता का संरक्षण था । ईडी के छापे के बाद शाहजहां के फरार होने और उसके खास साथियों के  भूमिगत हो जाने के बाद संदेशखाली में जो जनजागृति आई उसने पूरे देश को चौंका दिया। महिलाओं ने सड़कों पर आकर अपने साथ हुए अत्याचार का  वृतांत उजागर किया।  विपक्षी दलों के प्रतिनिधिमंडल , महिला और मानव अधिकार आयोग जैसी  संस्थाओं सहित समाचार माध्यमों के  प्रतिनिधियों ने भी संदेशखाली पहुंचकर वहां के हालात को देश और दुनिया की जानकारी में लाने का कार्य किया। होना तो ये चाहिए था कि मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी  पीड़ित महिलाओं के जख्मों पर मरहम लगातीं और तृणमूल से जुड़े नरपिशाचों को गिरफ्तार करवाने की कार्रवाई करतीं। लेकिन इसके उलट उन्होंने विपक्षी दलों पर अशांति फैलाने का आरोप मढ़ दिया। सबसे  चौंकाने वाली बात रही शाहजहां को गिरफ्तार न किया जाना। बीच - बीच में खबर उड़ी कि वह बांग्ला देश भाग गया किंतु संदेशखाली में ही रह रहे उसके भाई दावा करते रहे कि वह प.बंगाल में ही था। कुछ दिन पहले कोलकाता उच्च न्यायालय ने ममता सरकार को लताड़ते हुए एक सप्ताह के भीतर शाहजहां को गिरफ्तार कर पेश करने का हुक्म दिया। उसके बाद सरकार हरकत में आई और आज सुबह उसे 24 परगना के ही किसी इलाके में गिरफ्तार कर लिया गया। अब जबकि शाहजहां पकड़ा जा चुका है तब ये प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठ खड़ा हुआ है कि उच्च न्यायालय द्वारा  डांट पिलाए जाने के बाद गिरफ्तारी इतनी आसानी से कैसे हो गई ? ये बात इसलिए उठ खड़ी हुई क्योंकि शाहजहां अपने ही जिले में पकड़ा गया। ये भी शंका है कि वह किसी अन्य जगह पर रहा हो और गिरफ्तार करने के लिए 24 परगना बुलवा लिया गया। भाजपा इस मामले को पूरे जोरशोर से उठाती आई है। वहीं कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर तो ममता सरकार पर हमला बोलने से परहेज किया किंतु उसकी प.बंगाल इकाई जरूर इस मुद्दे पर तृणमूल को घेरती रही।  उच्च न्यायालय द्वारा  दी गई  मोहलत के पहले ही पुलिस द्वारा शाहजहां को पकड़ लेने से ये स्पष्ट हो गया कि उसके ठिकाने के बारे में  शासन - प्रशासन को सब कुछ पता था। ममता सरकार पर मुस्लिम तुष्टीकरण के जो आरोप लगते रहे , संदेशखाली ने उनकी पुष्टि कर दी है। शाहजहां और उसके गुर्गों के अत्याचार के जो किस्से वहां की महिलाओं द्वारा बताए जा रहे हैं वे दिल दहला देने वाले हैं । सबसे शर्मनाक ये है कि महिलाओं के साथ सामूहिक दुराचार तृणमूल के कार्यालय तक में होता रहा। अब जबकि शाहजहां और उसके साथ के लोग पकड़े जा चुके हैं तब सुश्री बैनर्जी को चाहिए उन्हें पार्टी से  बाहर करने के साथ ही संदेशखाली की पीड़ित महिलाओं और उनके परिवार को सुरक्षा और न्याय दिलवाने की पुख्ता व्यवस्था करें।  शाहजहां को राज्य सरकार का कितना  संरक्षण था ये उसके 55 दिन तक फरार रहने से स्पष्ट हो गया। उच्च न्यायालय यदि सख्ती न दिखाता तो वह अभी भी गिरफ्तार नहीं होता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 28 February 2024

क्रॉस वोटिंग : विपक्ष से अपना घर नहीं संभल रहा



गत दिवस उ.प्र, हिमाचल और कर्नाटक में राज्यसभा चुनाव के जो परिणाम आए उनमें सपा और कांग्रेस को  झटका लगा । उ.प्र में सपा के आधा दर्जन विधायकों ने भाजपा के आठवें प्रत्याशी को मत देकर अपने एक प्रत्याशी को हरवा दिया। इसी तरह हिमाचल में कांग्रेस के 6 विधायकों द्वारा भाजपा प्रत्याशी को मत देने से अभिषेक मनु सिंघवी हार गए। यदि  तीन निर्दलीय ही साथ देते तो कांग्रेस उम्मीदवार जीत जाता। लेकिन पार्टी का नेतृत्व सिर पर मंडराते खतरे को भांप नहीं सका । उ.प्र में भी सपा विधायकों द्वारा बगावत की आशंका  थी । वैसे बगावत कर्नाटक में भी हुई जहां भाजपा विधायक ने कांग्रेस प्रत्याशी को मत देकर सबको चौंका दिया। लेकिन उ.प्र में सपा और हिमाचल में कांग्रेस का प्रत्याशी चूंकि हार गया इसलिए भाजपा पर विधायकों को लालच और भय दिखाकर तोड़ने का आरोप लगाया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक इसमें सपा और कांग्रेस के नेतृत्व की विफलता देख रहे हैं जिसने सामने खड़े खतरे को नजरंदाज किया। उ.प्र में जया बच्चन को उम्मीदवार बनाए जाते ही सपा में बगावत के सुर उठने लगे थे जिन्हें अखिलेश यादव ने  अनसुना कर दिया । इसी तरह हिमाचल में कांग्रेस को बगावत की आशंका थी इसीलिए सोनिया गांधी को राजस्थान से राज्यसभा भेजने का फैसला लिया गया  । कुछ मंत्री और विधायक खुलकर मुख्यमंत्री के विरुद्ध थे। राम मंदिर के शुभारंभ पर विक्रमादित्य सिंह नामक मंत्री  पार्टी लाइन से अलग हटकर अयोध्या भी गए। आज उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया । अनेक विधायक खुलकर मुख्यमंत्री बदलने पर अड़े हुए थे  जिसके बाद  मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू ने भी इस्तीफा दे दिया। जो जानकारी आ रही है उसके मुताबिक शाम तक कांग्रेस नया नेता चुन सकती है। लेकिन बागी विधायक नहीं माने और  निर्दलीय भी छिटक गए तो सरकार की स्थिरता संदिग्ध रहेगी। उ.प्र में सपा चूंकि विपक्ष में है इसलिए उसे सरकार गिरने की चिंता तो है नहीं किंतु लोकसभा चुनाव के ठीक पहले पार्टी के विधायकों की बगावत अखिलेश के लिए चेतावनी है। निश्चित रूप से भाजपा की रणनीति विपक्षी दलों में सेंध लगाने की है । सत्ता में होने के कारण उसका प्रभाव और दबाव दोनों बढ़े हैं। लेकिन विपक्ष को अपनी कमजोरी भी देखनी होगी। हिमाचल में कांग्रेस की अंतर्कलह का लाभ ही भाजपा ने उठाया । उसी तरह कर्नाटक में कांग्रेस के पास भारी बहुमत होने के बाद भी उसने एक भाजपा विधायक को तोड़ने में संकोच नहीं किया।  हिमाचल में मुख्यमंत्री द्वारा त्यागपत्र दिए जाने से स्पष्ट हो गया कि कल बगावत न हुई होती तब भी  उनके विरुद्ध  ज्वालामुखी फूटने के कगार पर था। स्मरणीय है श्री सुक्खू कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा की पसंद थे जिन्हें पूर्व मुख्यमंत्री स्व.वीरभद्र सिंह का परिवार पसंद नहीं करता । विक्रमादित्य उन्हीं के बेटे हैं और  प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह उनकी माता जी । इस प्रकार श्री सिंघवी न हारते तब भी मुख्यमंत्री की कुर्सी को हिलाने का प्रयास जारी रहता। दरअसल ये कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए चेतावनी है कि उसके द्वारा थोपे गए नेताओं को आंख मूंदकर स्वीकार कर लेने वाला दौर चला गया। वैसे भी पुरानी कहावत है कि जब केंद्रीय सत्ता कमजोर होती है तो सूबे सिर उठाने लगते हैं। गांधी परिवार राज्यों में अपनी मर्जी के नेताओं को लादने की जो गलती कर रहा है उसी के कारण अनेक राज्य उसके हाथ से खिसक गए। म.प्र में झटका खाने के बाद भी उसने राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पनपे असंतोष का समय रहते इलाज नहीं किया जिसका नतीजा सामने है। सपा में भी अखिलेश खुद को सर्वेसर्वा मानकर नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ ही गठबंधन के साथियों से  दूरी बनाए रहते हैं। यही कारण है कि ओमप्रकाश राजभर  और स्वामीप्रसाद मौर्य के  बाद जयंत चौधरी ने उनसे रिश्ता तोड़ लिया । रही - सही कसर पूरी कर दी राज्यसभा चुनाव में हुई क्रॉस वोटिंग ने। इस प्रकार ये स्पष्ट हो रहा है कि कांग्रेस और सपा जैसी पाटियों के शीर्ष नेतृत्व का  निचले स्तर तक संवाद  टूट चुका है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक खबर आ गई कि असम में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष ने भी पार्टी छोड़ दी। प. बंगाल से भी ऐसी ही जानकारी आई है। बेहतर है भाजपा को कोसने के बजाय कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियां अपने अंदरूनी हालात सुधारें। केवल आपस में गठबंधन कर लेने से उनका  बेड़ा पार नहीं होने वाला। भाजपा की रणनीति बेशक विपक्ष का मनोबल तोड़ने की है। इसके लिए वह कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहती परंतु जहां भाजपा कमजोर है वहां विपक्ष को भी सफलता मिली । कर्नाटक और तेलंगाना इसके उदाहरण हैं । ऐसे में विपक्षी दलों को चाहिए वे अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते हुए उन्हें पार्टी में बने रहने प्रेरित करें । यदि वे इस काम में असफल रहते हैं तब फिर किसी और को दोष देना कहां तक उचित है ? 
क्रॉस वोटिंग : विपक्ष से अपना घर नहीं संभल रहा

गत दिवस उ.प्र, हिमाचल और कर्नाटक में राज्यसभा चुनाव के जो परिणाम आए उनमें सपा और कांग्रेस को  झटका लगा । उ.प्र में सपा के आधा दर्जन विधायकों ने भाजपा के आठवें प्रत्याशी को मत देकर अपने एक प्रत्याशी को हरवा दिया। इसी तरह हिमाचल में कांग्रेस के 6 विधायकों द्वारा भाजपा प्रत्याशी को मत देने से अभिषेक मनु सिंघवी हार गए। यदि  तीन निर्दलीय ही साथ देते तो कांग्रेस उम्मीदवार जीत जाता। लेकिन पार्टी का नेतृत्व सिर पर मंडराते खतरे को भांप नहीं सका । उ.प्र में भी सपा विधायकों द्वारा बगावत की आशंका  थी । वैसे बगावत कर्नाटक में भी हुई जहां भाजपा विधायक ने कांग्रेस प्रत्याशी को मत देकर सबको चौंका दिया। लेकिन उ.प्र में सपा और हिमाचल में कांग्रेस का प्रत्याशी चूंकि हार गया इसलिए भाजपा पर विधायकों को लालच और भय दिखाकर तोड़ने का आरोप लगाया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक इसमें सपा और कांग्रेस के नेतृत्व की विफलता देख रहे हैं जिसने सामने खड़े खतरे को नजरंदाज किया। उ.प्र में जया बच्चन को उम्मीदवार बनाए जाते ही सपा में बगावत के सुर उठने लगे थे जिन्हें अखिलेश यादव ने  अनसुना कर दिया । इसी तरह हिमाचल में कांग्रेस को बगावत की आशंका थी इसीलिए सोनिया गांधी को राजस्थान से राज्यसभा भेजने का फैसला लिया गया  । कुछ मंत्री और विधायक खुलकर मुख्यमंत्री के विरुद्ध थे। राम मंदिर के शुभारंभ पर विक्रमादित्य सिंह नामक मंत्री  पार्टी लाइन से अलग हटकर अयोध्या भी गए। आज उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया । अनेक विधायक खुलकर मुख्यमंत्री बदलने पर अड़े हुए थे  जिसके बाद  मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू ने भी इस्तीफा दे दिया। जो जानकारी आ रही है उसके मुताबिक शाम तक कांग्रेस नया नेता चुन सकती है। लेकिन बागी विधायक नहीं माने और  निर्दलीय भी छिटक गए तो सरकार की स्थिरता संदिग्ध रहेगी। उ.प्र में सपा चूंकि विपक्ष में है इसलिए उसे सरकार गिरने की चिंता तो है नहीं किंतु लोकसभा चुनाव के ठीक पहले पार्टी के विधायकों की बगावत अखिलेश के लिए चेतावनी है। निश्चित रूप से भाजपा की रणनीति विपक्षी दलों में सेंध लगाने की है । सत्ता में होने के कारण उसका प्रभाव और दबाव दोनों बढ़े हैं। लेकिन विपक्ष को अपनी कमजोरी भी देखनी होगी। हिमाचल में कांग्रेस की अंतर्कलह का लाभ ही भाजपा ने उठाया । उसी तरह कर्नाटक में कांग्रेस के पास भारी बहुमत होने के बाद भी उसने एक भाजपा विधायक को तोड़ने में संकोच नहीं किया।  हिमाचल में मुख्यमंत्री द्वारा त्यागपत्र दिए जाने से स्पष्ट हो गया कि कल बगावत न हुई होती तब भी  उनके विरुद्ध  ज्वालामुखी फूटने के कगार पर था। स्मरणीय है श्री सुक्खू कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा की पसंद थे जिन्हें पूर्व मुख्यमंत्री स्व.वीरभद्र सिंह का परिवार पसंद नहीं करता । विक्रमादित्य उन्हीं के बेटे हैं और  प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह उनकी माता जी । इस प्रकार श्री सिंघवी न हारते तब भी मुख्यमंत्री की कुर्सी को हिलाने का प्रयास जारी रहता। दरअसल ये कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए चेतावनी है कि उसके द्वारा थोपे गए नेताओं को आंख मूंदकर स्वीकार कर लेने वाला दौर चला गया। वैसे भी पुरानी कहावत है कि जब केंद्रीय सत्ता कमजोर होती है तो सूबे सिर उठाने लगते हैं। गांधी परिवार राज्यों में अपनी मर्जी के नेताओं को लादने की जो गलती कर रहा है उसी के कारण अनेक राज्य उसके हाथ से खिसक गए। म.प्र में झटका खाने के बाद भी उसने राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पनपे असंतोष का समय रहते इलाज नहीं किया जिसका नतीजा सामने है। सपा में भी अखिलेश खुद को सर्वेसर्वा मानकर नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ ही गठबंधन के साथियों से  दूरी बनाए रहते हैं। यही कारण है कि ओमप्रकाश राजभर  और स्वामीप्रसाद मौर्य के  बाद जयंत चौधरी ने उनसे रिश्ता तोड़ लिया । रही - सही कसर पूरी कर दी राज्यसभा चुनाव में हुई क्रॉस वोटिंग ने। इस प्रकार ये स्पष्ट हो रहा है कि कांग्रेस और सपा जैसी पाटियों के शीर्ष नेतृत्व का  निचले स्तर तक संवाद  टूट चुका है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक खबर आ गई कि असम में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष ने भी पार्टी छोड़ दी। प. बंगाल से भी ऐसी ही जानकारी आई है। बेहतर है भाजपा को कोसने के बजाय कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियां अपने अंदरूनी हालात सुधारें। केवल आपस में गठबंधन कर लेने से उनका  बेड़ा पार नहीं होने वाला। भाजपा की रणनीति बेशक विपक्ष का मनोबल तोड़ने की है। इसके लिए वह कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहती परंतु जहां भाजपा कमजोर है वहां विपक्ष को भी सफलता मिली । कर्नाटक और तेलंगाना इसके उदाहरण हैं । ऐसे में विपक्षी दलों को चाहिए वे अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते हुए उन्हें पार्टी में बने रहने प्रेरित करें । यदि वे इस काम में असफल रहते हैं तब फिर किसी और को दोष देना कहां तक उचित है ? 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 27 February 2024

वायनाड में सीपीआई प्रत्याशी के उतरने से विपक्षी एकता सवालों के घेरे में



राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय न्याय यात्रा अपने अंतिम चरण में आने जा रही है। इसका उद्देश्य लोकसभा चुनाव में उनको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकल्प साबित करने के अलावा इंडिया गठबंधन के घटक दलों को ये संदेश देना था कि कांग्रेस ही राष्ट्रीय पार्टी होने की वजह से भाजपा को टक्कर दे सकती है। हालांकि इस यात्रा के दौरान ही विपक्षी एकता को लगातार झटके लगते रहे। अनेक कांग्रेसी नेताओं के अलावा कुछ विपक्षी नेता इंडिया गठबंधन से निकलकर भाजपा के साथ चले गए। उ.प्र और दिल्ली में क्षेत्रीय दल द्वारा सीमित संख्या में सीटें दिए जाने से भी कांग्रेस का वजन घटा है। ममता बैनर्जी ने प.बंगाल और अरविंद केजरीवाल ने पंजाब में अकेले लड़ने का ऐलान कर रखा है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव तो न्याय यात्रा में शरीक ही तभी हुए जब कांग्रेस ने 17 सीटों पर लड़ने की शर्त स्वीकार कर ली। सही बात ये है कि नीतीश कुमार और जयंत चौधरी के अलग होने के बाद इंडिया गठबंधन की धमक कम हुई है। वह बिखराव की ओर बढ़ रहा है ये कहना जल्दबाजी होगी किंतु जैसे संकेत आ रहे हैं उनके आधार पर कहा जा सकता है कि घटक दलों की प्रतिबद्धता घटती जा रही है। इसका ताजा प्रमाण केरल से मिला जहां की वायनाड सीट से राहुल गांधी लोकसभा के सदस्य हैं। 2019 में अमेठी में हार का खतरा देखते हुए उन्होंने अचानक केरल की इस सीट से भी लड़ने का निर्णय लिया जिसमें मुस्लिम और ईसाई मतदाताओं की संख्या निर्णायक है। उनका वह दांव कारगर रहा और अमेठी में परास्त होने के बाद भी वायनाड के रास्ते वे लोकसभा में आ गए। उस चुनाव में उनके विरुद्ध सीपीआई प्रत्याशी था जो कि सत्तारूढ़ वाममोर्चे की घटक है। ये भी उल्लेखनीय है कि प.बंगाल में वाममोर्चे के साथ कांग्रेस का गठबंधन होने के बाद भी केरल में वे अलग - अलग लड़ते रहे। विधानसभा में भी कांग्रेस मुख्य विपक्ष की भूमिका में है। लेकिन इंडिया गठबंधन के अस्तित्व में आने के बाद ये माना जा रहा था कि केरल में भी वामपंथी और कांग्रेस एकजुट होकर लोकसभा चुनाव लड़ेंगे । लेकिन गत दिवस सीपीआई महासचिव डी. राजा ने अपनी पत्नी एनी राजा को वायनाड से चुनाव मैदान में राहुल के विरुद्ध उतारने की घोषणा करते हुए सबको चौंका दिया। यही नहीं उन्होंने तिरूवनंतपुरम सीट से कांग्रेस सांसद शशि थरूर के सामने भी सीपीआई उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर दिया। वामपंथी पार्टियों में महासचिव ही सबसे प्रमुख पद होता है । वैसे भी श्री राजा वर्तमान में वामपंथियों के सबसे वरिष्ट नेता हैं। ऐसे में उनके द्वारा प्रत्याशियों की घोषणा को हवा - हवाई नहीं माना जा सकता। लेकिन श्री गांधी और श्री थरूर जैसे बड़े कांग्रेस नेताओं के विरुद्ध सीपीआई द्वारा अचानक प्रत्याशी उतार देने से इंडिया गठबंधन में दरार आने की आशंका तो बढ़ी ही है। पंजाब में भी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी अलग - अलग लड़ने जा रही हैं। वहीं प.बंगाल में ममता बैनर्जी के रुख में नरमी नहीं आ रही। ये देखते हुए इस गठबंधन की एकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ये बात भी सामने आ रही है कि गठबंधन के सदस्यों के बीच संवादहीनता बढ़ती जा रही है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद दिसंबर में उसकी बैठक हुई थी जिसमें राज्यों के स्तर पर सीटों का बंटवारा करने की बात तय की गई थी। उसी आधार पर कुछ राज्यों में फार्मूला तय भी हुआ लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन यह एहसास करवाने में अब तक सफल नहीं हो सका कि भाजपा के विरुद्ध साझा प्रत्याशी खड़ा करने की नीति पर अमल होगा। यही कारण है कि वह अब तक खुद को विकल्प के तौर पर प्रचारित करने में नाकामयाब साबित हुआ है। कुछ राज्यों में दोस्ताना संघर्ष के बावजूद घटक दलों के प्रमुख नेताओं के विरुद्ध प्रत्याशी लड़ाने से राष्ट्रीय स्तर पर गलत संदेश जाएगा । सोनिया गांधी के चुनाव मैदान से हट जाने के बाद राहुल ही कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे हैं। पार्टी के अलावा लालू प्रसाद यादव जैसे नेता तो उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर स्वीकार भी करते हैं। ऐसे में यदि गठबंधन का कोई घटक उनके विरुद्ध प्रत्याशी खड़ा करता है तो इससे आम जनता में ये बात फैलेगी कि जिस नेता का उसके सहयोगी दल ही विरोध करते हों उसे प्रधानमंत्री के लिए उपयुक्त कैसे माना जाए ?उल्लेखनीय है उ.प्र की अमेठी और रायबरेली लोकसभा सीट से सपा और बसपा अपना उम्मीदवार नहीं उतारते थे । सीपीआई वायनाड में अपना प्रत्याशी लड़ाने के निर्णय पर अडिग रहेगी या मान - मनौव्वल के बाद हटा लेगी ये अभी कहना कठिन है क्योंकि उसके महासचिव श्री राजा हार्ड लाइनर किस्म के वामपंथी माने जाते हैं। और जब उन्होंने अपनी पत्नी को उम्मीदवार बनाया तब जाहिर है चुनाव उनके लिए भी प्रतिष्ठा का विषय बनेगा। हालांकि वायनाड में सीपीआई प्रत्याशी को उतारे जाने के बावजूद श्री गांधी की जीत में कोई संशय भले न हो किंतु इंडिया गठबंधन की मजबूती और घटक दलों में आपसी विश्वास जरूर सवालों के घेरे में आ गया है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 26 February 2024

अपेक्षित समर्थन न मिलने से बिखर रहा किसान आंदोलन


इस बार के किसान आंदोलन में पिछली बार जैसा तीखापन नजर नहीं आ रहा। हरियाणा सरकार के कड़े रुख के कारण पंजाब से निकले जत्थे दिल्ली पहुंचने में सफल नहीं हो सके । रास्ते बंद किए जाने से आम जनता और वाहन चालकों को  भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है । सामान की आवाजाही रुकने से व्यापार को भी नुकसान हो रहा है। पंजाब के बाहर के किसान संगठन भी मैदान में उतरने से बच रहे हैं। विपक्षी नेता लोकसभा चुनाव में व्यस्त हैं। दरअसल जिस तरह से कांग्रेस की तत्कालीन अमरिंदर सरकार ने किसानों को दिल्ली जाकर धरना देने के लिए मदद दी थी ठीक वही  पंजाब की वर्तमान आम आदमी पार्टी सरकार ने किया। इसका कारण ये है कि इस पार्टी ने विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों से सभी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य निश्चित करने का वायदा किया था।  जब उसे लगा कि ऐसा करना असंभव होगा तब सुनियोजित तरीके से किसान नेताओं को दिल्ली जाकर आंदोलन करने की समझाइश  दे दी । लेकिन हरियाणा सरकार की सख्ती के कारण किसानों की टोलियां आगे नहीं बढ़ पा रहीं। केंद्र सरकार से जारी बातचीत में एक भी बिंदु पर सहमति नहीं बन सकी। ये बात भी जमकर प्रचारित हो रही है कि यह संपन्न किसानों द्वारा प्रायोजित है। महंगे चौपहिया वाहनों की मौजूदगी से आंदोलन के जमीन से कटे होने की अवधारणा  फैल गई है। देश भर से किसान संगठनों द्वारा दिल्ली कूच जैसा फैसला नहीं किया जा रहा । उल्लेखनीय है पिछला आंदोलन भी पंजाब , उ.प्र और उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव के पहले किया गया था जबकि यह लोकसभा चुनाव के ठीक पहले हो रहा है। आम आदमी पार्टी जरूर आंदोलन को पूरी मदद कर रही है किंतु कांग्रेस और अकाली दल  दूरी बनाए हुए हैं । चूंकि आंदोलनकारी दिल्ली से काफी दूर हैं इसलिए विपक्षी राजनेता भी फोटो सेशन हेतु नहीं आ पा रहे। पिछले आंदोलन में प्रचार का काम देख रहे योगेंद्र यादव भी कटे हुए हैं। राहुल गांधी किसानों के पक्ष में  कुछ न कुछ रोजाना बोलते हैं किंतु कांग्रेस पार्टी की तरफ से आंदोलन में सक्रिय भागीदारी नहीं दिखाई दे रही। वामपंथी संगठन  छद्म रूप से भले ही किसानों के बीच घुसे हों किंतु खुलकर  सामने आने से हिचक रहे हैं। कुल मिलाकर  कहा जा सकता है कि आंदोलन का समय चयन गलत हो गया क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल या उससे जुड़े किसान संगठन इस समय उलझने की मनःस्थिति में नहीं है।  सभी नेता जानते हैं कि किसान संगठनों की  सभी मांगों को मान लेना लगभग असंभव है। जिस स्वामीनाथन रिपोर्ट की चर्चा अक्सर होती है वह डा.मनमोहन सिंह की सरकार के समय ही आ चुकी थी । लेकिन आर्थिक मामलों के बड़े जानकार होने के बाद भी वे एम.एस.पी को कानूनी दर्जा देने से बचते रहे।  मोदी सरकार भी किसानों की आय को दोगुना करने का आश्वासन देती रही किंतु उसने भी एम.एस.पी को वैधानिक स्वरूप देने की मांग को स्वीकार नहीं किया। जिन राज्यों में गैर भाजपा सरकार है वे भी ऐसा करने का साहस नहीं दिखा सकी। इससे ये साबित होता है कि किसानों की जो प्रमुख मांगें हैं उनके प्रति सैद्धांतिक समर्थन तो चौतरफा है किंतु जब उन पर अमल करने की बात उठती है खजाना दिखने लगता है। केंद्र सरकार ने भी यह आकलन कर लिया है कि फसल कटाई नजदीक आने के कारण  साधारण किसान अपना खेत छोड़कर आंदोलन में शामिल होने से रहा और  किराए की भीड़ जमा करना  लंबे समय तक संभव नहीं होगा। लोकसभा चुनाव की तिथियां मार्च के प्रथम सप्ताह में घोषित होने वाली हैं और सभी पार्टियां  व्यूह रचना तैयार करने में व्यस्त हैं। पश्चिमी उ.प्र के अलावा हरियाणा और राजस्थान के जाट समुदाय द्वारा पिछले किसान आंदोलन को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया गया था । और राकेश टिकैत बड़े किसान नेता के तौर पर उभरे भी किंतु उ.प्र में भाजपा की जीत ने  टिकैत परिवार का दबदबा खत्म कर दिया। हाल ही में जयंत चौधरी के विपक्षी गठबंधन से बाहर निकलने के बाद से जाट बहुल इलाकों में  राजनीतिक समीकरण काफी बदल गए हैं। अब तक जो देखने मिल रहा है उसके मुताबिक मौजूदा आंदोलन पंजाब तक सीमित रह गया है। कुछ लोगों द्वारा जिस प्रकार की देशविरोधी बयानबाजी की गई उसके कारण पंजाब  से ही आंदोलन पर उंगलियां उठने लगी हैं। बार - बार दिल्ली कूच की तारीख आगे बढ़ाए जाने से बड़ी संख्या में आंदोलनकारी अपने ठिकाने पर लौट गए। पूरे परिदृश्य पर नजर डालने से लगता है इस बार का आंदोलन पूरी तैयारी से शुरू नहीं किया गया। इसीलिए वह भटकाव और बिखराव का शिकार हो रहा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 25 February 2024

उप्र में 80 फीसदी सीटों पर कांग्रेस के न लड़ने से कार्यकर्ता और समर्थक निराश



उ.प्र में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच लोकसभा चुनाव की सीटों के बंटवारे की गुत्थी सुलझने को इंडिया गठबंधन की बड़ी सफलता प्रचारित किया जा रहा है। इसके अंतर्गत अखिलेश यादव ने कांग्रेस को महज 17 सीटें दी हैं जबकि वह 21 मांग रही थी। इस समझौते के बाद कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच दिल्ली , हरियाणा , गुजरात और गोवा में भी सीटों का बंटवारा तय हो गया। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण राज्य उ.प्र ही है जिसके बारे में कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ होकर जाता है। 80 सीटों वाले इस राज्य ने देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री दिए। स्व अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी क्रमशः म.प्र और गुजरात के मूल निवासी होने के बावजूद प्रधानमंत्री तभी बने जब उन्होंने उ.प्र से लोकसभा चुनाव जीता। और ये भी कि इस राज्य में ज्यादा सीटें जीतने पर ही भाजपा को केंद्र की सत्ता मिली। 2014 की मोदी लहर में भाजपा को यहां 71 और 2019 में 62 सीटें मिली थीं जिसके कारण वह स्पष्ट बहुमत हासिल करने में कामयाब हुई। 

       इस बार विपक्ष का प्रयास है कि भाजपा को उ.प्र में घेरकर उसकी सीटें कम की जाएं ताकि वह बहुमत से पीछे रहे। शुरुआत में इंडिया गठबंधन में सपा और कांग्रेस के अलावा रालोद भी था । लेकिन जयंत चौधरी अचानक इससे दूर हो गए। बहरहाल , सपा और कांग्रेस द्वारा सीटें बांटने के बाद इंडिया की स्थिति तो स्पष्ट हो गई किंतु अभी भाजपा , अनुप्रिया पटेल , जयंत चौधरी , ओमप्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के बीच सीटों का आवंटन नहीं होने से एनडीए की मोर्चेबंदी साफ नहीं हो सकी। हालांकि उसमें अधिकतर सीटें भाजपा ही लड़ेगी और ज्यादा से ज्यादा 10 सीटें सहयोगियों को दी जाएंगी। दूसरी तरफ राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस सबसे ज्यादा सीटों वाले राज्य में मात्र 20 फीसदी सीटों पर लड़ेगी जिनमें केवल रायबरेली उसके पास है। जो 17 सीटें सपा ने उसे दी हैं उनमें आज की स्थिति में कांग्रेस के जीतने की संभावनाएं बहुत ही कम हैं । सबसे बड़ी बात ये हुई की मात्र 17 सीटें मिलने के कारण बाकी की 63 में कांग्रेस परिदृश्य से बाहर हो गई। वैसे भी उसका मत प्रतिशत चुनाव दर चुनाव घुटता चला गया जिससे संगठन भी बेहद कमजोर हो गया। इसीलिए ये माना जा रहा है कि वह पांच सीटें जीत ले तो आश्चर्य होगा। रायबरेली से सोनिया गांधी के न लड़ने के फैसले के बाद अब तो उसे लेकर भी पार्टी निराश है। 

      हालांकि अखिलेश भी कांग्रेस की खस्ता हालत से परिचित हैं और इसीलिए वे उसके साथ गठबंधन से हिचक रहे थे । लेकिन जयंत चौधरी के भाजपा की ओर झुकने के बाद सपा प्रमुख कांग्रेस को अपने साथ जोड़ने बाध्य हो गए । लेकिन इस गठजोड़ के बाद भी भाजपा को रोक पाना इंडिया के लिए कठिन है क्योंकि सपा और बसपा 2019 में जब मिलकर लड़े तब दोनों ने मिलकर 15 सीटें जीती थीं । इस बार बसपा एकला चलो की नीति अपनाए हुए है। ये भी कहा जा रहा है कि ऐसा वह भाजपा के दबाव में कर रही है। चूंकि कांग्रेस का समर्थन या विरोध चुनाव परिणाम को प्रभावित करने लायक बचा नहीं इसलिए सपा भी बुरी तरह फंस गई है। 2022 के विधानसभा चुनाव में उसके साथ रहे ओमप्रकाश राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य साथ छोड़ चुके हैं। वहीं पल्लवी पटेल भी खुलकर विरोध कर रही हैं। भाजपा ने दलित और ओबीसी वर्ग में अपनी पकड़ को जहां मजबूत किया वहीं राममंदिर में प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद सवर्ण मतदाता थोक के भाव उसके साथ नजर आ रहा है। एक बात और जो इंडिया के साथ ही सपा को भी नुकसान पहुंचा रही है वह है किसी वरिष्ट नेता का न होना। 2019 में मुलायम सिंह की भौतिक उपस्थिति के कारण सपा को कुछ राहत थी जिससे वह इस बार वंचित है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभामंडल भी पूरे प्रदेश में भाजपा की ताकत है। 

        दरअसल सपा के साथ सीटों का बंटवारा कांग्रेसजनों को ही नागवार गुजर रहा है। पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने तो खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर भी कर दी है जबकि अन्य कुछ नेता दबी जुबान असंतोष जताते हुए अलग रास्ता तलाश रहे हैं। वैसे भी उ.प्र में पार्टी के पास कोई बड़ा चेहरा बचा ही नहीं है । यदि अमेठी और रायबरेली से गांधी परिवार का कोई सदस्य नहीं लड़ा तब इस राज्य में उसका सफाया होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता । 80 फीसदी लोकसभा सीटों पर अपना प्रत्याशी नहीं होने से उसके कार्यकर्ता और समर्थक दिशाहीन होकर रह गए हैं। हालांकि राजनीति के जानकार ये भी कह रहे हैं कि अखिलेश ने कांग्रेस के साथ सीटों का तालमेल कर एक तीर से कई निशाने साध लिए। पहला तो बसपा को इंडिया में आने से रोक लिया और दूसरा 67 सीटों पर कांग्रेस के विरोध की संभावना को खत्म करने में भी कामयाब हो गए। कुल मिलाकर इस समझौते से समाजवादी पार्टी भले ही अपनी चार - पांच सीटें बचाने में कामयाब हो जाए किंतु कांग्रेस के हाथ खाली ही रहेंगे। और इसके लिए गांधी परिवार की अकड़ ही जिम्मेदार है। जो काम प्रियंका वाड्रा ने चार दिन पहले किया वह हफ्ते दो हफ्ते पहले कर लिया जाता तब शायद अखिलेश न्याय यात्रा के उ.प्र में घुसते ही उसके साथ जुड़ते जिसका फायदा इंडिया को होता। लेकिन सीटों का बंटवारा तब हुआ जब यात्रा राज्य से बाहर निकलने को है। आगरा में अखिलेश का उसमें शामिल होना भी महज चेहरा दिखाना होगा। 

      उ.प्र में कांग्रेस का पक्ष प्रभावशाली ढंग से रखने वाले आचार्य प्रमोद कृष्णम के भाजपा के साथ जुड़ने से भी पार्टी को बड़ा झटका लग गया। लोकसभा चुनाव नजदीक आते तक कांग्रेस से नेताओं के बाहर निकलने सिलसिला जारी रहने की संभावना बढ़ती जा रही है। कांग्रेस समर्थकों का मानना है कि यदि पार्टी अकेले दम पर लड़ती तो पूरे प्रदेश में उसकी उपस्थिति महसूस की जाती । उस स्थिति में भी वह अमेठी और रायबरेली के अलावा और किसी सीट की उम्मीद नहीं कर सकती थी और सपा से गठजोड़ के बाद भी वह वहीं अटकी हुई है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 February 2024

कांग्रेस के लिए भाजपा से ज्यादा खतरनाक है आम आदमी पार्टी




उ.प्र में  सपा के साथ सीट बंटवारे के बाद कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के साथ दिल्ली , हरियाणा और गुजरात में  लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ने का निर्णय कर लिया। दिल्ली में कांग्रेस 3 और आप 4 सीटों पर लड़ेगी। जबकि हरियाणा में कांग्रेस ने 1 और गुजरात में 2 सीटें उसके लिए छोड़ी हैं। कांग्रेस पंजाब में भी तालमेल चाहती थी किन्तु आम आदमी पार्टी  वहां एक भी सीट छोड़ने राजी नहीं हुई। इससे लगता है  गरज आम आदमी पार्टी की नहीं बल्कि कांग्रेस की है । दिल्ली , गुजरात और हरियाणा में 2919 में कांग्रेस- भाजपा के बीच मुकाबला था। वहीं पंजाब में  कांग्रेस ने  8 सीटें जीतने के साथ ही 40 प्रतिशत मत हासिल किए। लेकिन आम आदमी पार्टी द्वारा एक भी सीट न दिया जाना  दर्शाता है कि उसकी नजर में कांग्रेस वहां अस्तित्वहीन हो चुकी है। ऐसे में कांग्रेस को दिल्ली में  ज्यादा की मांग करनी थी। लेकिन  लगता है वह पिछली गलतियां  दोहराने पर अमादा है। 2014 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ा दल थी किंतु कांग्रेस ने 8 विधायकों का समर्थन देकर अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनवा दिया। कुछ महीनों बाद कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लिए जाने पर सरकार गिर गई। दोबारा हुए चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया।और भाजपा भी लुढ़ककर 3 पर आ गई। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस दिल्ली की सभी सीटों पर दूसरे स्थान पर रही और आम आदमी पार्टी की जमानतें जप्त हो गईं । फिर 2020 के विधानसभा और उसके बाद  दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भी आम आदमी पार्टी ने शानदार जीत हासिल की। वहीं कांग्रेस घुटनों के बल चलने की स्थिति में ही है। हालांकि दोनों भाजपा की विरोधी हैं और नरेंद्र मोदी को किसी भी कीमत पर हटाना चाहती हैं। लेकिन कांग्रेस  भूल रही है कि दिल्ली और पंजाब में उसकी दुर्गति के लिए भाजपा से ज्यादा आम आदमी पार्टी जिम्मेदार है।  पंजाब में भगवंत सिंह मान की सरकार  अनेक कांग्रेस नेताओं पर भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई कर रही है। वहीं दिल्ली में कांग्रेस ने शराब घोटाले पर केजरीवाल सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी का स्वागत किया था। दोनों राज्यों के कांग्रेस नेता आम आदमी पार्टी  के साथ गठबंधन का खुलकर विरोध करते रहे । फिर भी दिल्ली की  4 तथा हरियाणा की 1 सीट उसके लिए छोड़ दी गईं। कांग्रेस के लिए आगामी लोकसभा चुनाव जीवन - मरण का प्रश्न  है।  इसीलिए वह क्षेत्रीय दलों के समक्ष  झुकने तैयार हो रही है। लेकिन ये चुनाव आम आदमी पार्टी का भविष्य भी तय करेगा जो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विकल्प बनने की कोशिश में  है जिसका सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस को होने की आशंका है। पूरे देश  पर नजर डालें तो कांग्रेस आज भी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है।  भाजपा भले ही केंद्र के साथ अनेक राज्यों में सत्तासीन हो किंतु अनेक राज्यों में  उसकी उपस्थिति नाममात्र की है । ऐसे में आम आदमी पार्टी के विस्तार का सीधा नुकसान कांग्रेस को ही होने वाला है। इसलिए  सीटों का बंटवारा करने से पहले कांग्रेस को ये बात सोचनी चाहिए थी कि शराब घोटाले के सिलसिले में  श्री सिसौदिया और संजय सिंह जेल में न होते तब क्या श्री केजरीवाल उसे दिल्ली की एक भी सीट देते? पंजाब में एकला चलो की नीति अपनाकर उन्होंने अपनी  नीयत  स्पष्ट कर दी। दरअसल कांग्रेस को दिल्ली की सभी सीटों के लिए इस आधार पर अड़ना था कि 2019 में उसे 22 फीसदी से ज्यादा मत मिले थे जबकि आम आदमी पार्टी को 1 प्रतिशत से भी कम। ऐसा करने से  उसे पंजाब की कुछ सीटें मिल सकती थीं  । लेकिन पार्टी का आत्मबल कमजोर हो चुका है। उसके उच्च नेतृत्व को ये बात समझनी चाहिए कि आम आदमी पार्टी  जहां भी मजबूत होगी वहां कांग्रेस का खात्मा होना तय है। 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोककर उन्हें गिरफ्तार किए जाने के बाद भाजपा ने  वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया था । उ.प्र में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद यादव  की सरकार भी उस कारण खतरे में आ गई । स्व. राजीव गांधी ने समर्थन देकर उन दोनों सरकारों को तो गिरने से बचा लिया लेकिन उसके बाद उ.प्र और बिहार में पार्टी का तम्बू जो उखड़ा तो आज तक दोबारा नहीं लग सका। आम आदमी पार्टी  से भी सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही हुआ है। ऐसे में उसे पंजाब में भी सीटें मांगनी थीं और यदि श्री केजरीवाल राजी न होते तो दिल्ली में उनको उपकृत करने से इंकार करना था। कांग्रेस को ये बात अच्छी तरह से जान लेना चाहिए कि आम आदमी पार्टी उसके लिए भाजपा से बड़ा खतरा है क्योंकि भाजपा तो सामने से वार करती है जबकि आम आदमी पार्टी उसकी पीठ में छुरा भोंकने में जुटी हुई है।

- रवीन्द्र वाजपेयी