Sunday, 31 March 2024

आम आदमी पार्टी से हिसाब चुकता करने का अवसर गँवा दिया कांग्रेस ने




दिल्ली में आज लोकतंत्र बचाओ रैली हो रही है। राहुल गाँधी की न्याय यात्रा के समापन पर मुंबई में आयोजित रैली के बाद विपक्ष का यह दूसरा बड़ा शक्ति प्रदर्शन है।  इंडिया नामक गठजोड़ में शामिल नेता चुनाव के मौसम में इतनी जल्दी दोबारा एक मंच पर जमा होने राजी न हुए होते किंतु दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के गिरफ्तार होने और आयकर विभाग द्वारा कांग्रेस को 1800 करोड़ के कर और जुर्माने का भुगतान करने की कारवाई ने उन्हें इस हेतु मजबूर कर दिया।

सही बात ये है कि कानूनी प्रक्रिया को इकतरफा बताकर विपक्ष जनता के मन में ये बात बिठाने का प्रयास कर रहा है कि भाजपा सत्ता का दुरूपयोग करते हुए उसको चुनाव मैदान में निहत्था और साधनविहीन करने में जुटी है। श्री केजरीवाल  की गिरफ्तारी और कांग्रेस के बैंक खातों के संचालन पर लगी रोक पर जिस तरह से अमेरिका, जर्मनी और संरासंघ से प्रतिक्रियाएं आईं उनसे विपक्ष का हौसला मजबूत हुआ किंतु भारत सरकार द्वारा जिस  कड़ाई से उनका जवाब दिया गया उससे ये लगा कि भाजपा को उनसे कोई  तकलीफ नहीं है।

      उक्त दोनों मामले अदालत के समक्ष आ चुके थे ।  दिल्ली के मुख्यमंत्री को अचानक नहीं पकड़ा गया । ईडी लंबे समय से उनको समन भेज रही थी जिनकी उन्होंने कोई परवाह नहीं की। और तो और संभावित गिरफ्तारी से बचने उच्च न्यायालय जा पहुंचे। उनको उम्मीद थी कि ईडी द्वारा भेजे गए समन की वैधानिकता पर सवाल उठाकर वे उसके बुलावे से बचते रहेंगे किंतु उच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी पर रोक लगाने से मना करते हुए ईडी का हौसला बुलंद कर दिया। वरना एन चुनाव के समय वह उनको नहीं पकड़ती। इसी तरह काँग्रेस को ये मुगालता था कि आयकर विभाग की कारवाई को वह राजनीतिक प्रतिशोध का नाम देकर चुनाव तक बची रहेगी। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गाँधी ने पत्रकार वार्ता के जरिये ये रोना भी रोया कि  पार्टी के पास खर्च चलाने पैसे नहीं हैं। उसके बाद पार्टी उच्च न्यायालय भी गई किंतु वहाँ से भी राहत नहीं मिली।

     यदि मामला केवल श्री केजरीवाल की गिरफ्तारी तक सीमित रहता तब शायद कांग्रेस इस रैली हेतु राजी न  होती  किंतु आयकर विभाग द्वारा 1800 करोड़ की मांग भेजे जाने के बाद वह मजबूर नजर आई । हालांकि उच्चस्तरीय नेतृत्व भले ही आम आदमी पार्टी के संकट में साथ देने की सौजन्यता दिखा रहा हो किंतु निचले स्तर पर कांग्रेसी श्री केजरीवाल की गिरफ्तारी से मन ही मन प्रसन्न हैं। इसका कारण ये है कि दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस  की दुर्गति का कारण यही पार्टी है।

      इन दिनों श्री केजरीवाल के पुराने भाषण का एक  वीडियो जमकर प्रसारित हो रहा है जिसमें वे केंद्र सरकार को ललकारते हुए कहते रहे हैं कि दम है तो सोनिया गाँधी को गिरफ्तार कर पूछताछ करो और  वैसा न करने पर ईडी और सीबीआई को भंग करने का उलाहना भी  दे रहे हैं। कांग्रेस के प्रति आम आदमी पार्टी का रवैया  दरअसल शराब नीति घोटाले के उजागर होने के बाद उदार हुआ। इसका एक कारण ये भी है कि उक्त घोटाला कांग्रेस की शिकायत पर ही चर्चा में आया। जब मनीष सिसौदिया को ईडी ने गिरफ्तार किया तब कांग्रेस उसका स्वागत करने में आगे - आगे रही।

     ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए आम आदमी से हिसाब चुकता करने का ये सुनहरा अवसर था। पंजाब में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली और दिल्ली में मात्र तीन। यदि कांग्रेस अकड़ जाती तब दोनों राज्यों में आम आदमी पार्टी को भारी घाटा होना तय था। गाँधी परिवार और स्व. शीला दीक्षित के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर आम आदमी पार्टी ने दिल्ली पर कब्जा जमाया था। आज भी उसने उन आरोपों को न तो वापस लिया और न ही खेद व्यक्त किया। उसका जो रवैया है उसे देखते हुए यह पार्टी आगे भी कांग्रेस को  बख्श देगी ये सोचना निरी मूर्खता है। कांग्रेस का आयकर का मसला पूरी तरह तकनीकी है जिसमें उसे कर और दंड राशि देनी ही होगी। ऐसे में विपक्ष की रैली से उसे राहत मिलने वाली नहीं है। लेकिन पूरे विपक्ष को साथ लाकर आम आदमी पार्टी अपने भ्रष्टाचार के प्रति सहानुभूति अर्जित करने का दांव खेल रही है।

कांग्रेस के रणनीतिकार श्री केजरीवाल के मकड़जाल में इतनी आसानी से फंस गए ये देखकर आश्चर्य होता है। ऐसा लगता है गाँधी परिवार सहित कांग्रेस के अन्य नेताओं का आत्मविश्वास जवाब दे चुका है। इसीलिए आम आदमी पार्टी, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और लालू प्रसाद यादव आदि कांग्रेस पर हावी होने का साहस दिखा सके। ममता बैनर्जी ने तो उसे एक सीट तक नहीं दी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 29 March 2024

अर्थव्यवस्था को लेकर दो दिग्गजों के विरोधाभासी निष्कर्ष

भारत की आर्थिक प्रगति को लेकर दो भिन्न दृष्टिकोण सामने आए हैं। पहला रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का है जिसमें उन्होंने 2047 को लक्ष्य बनाकर  अर्थव्यवस्था के मजबूत होने के मोदी सरकार के दावों को अवास्तविक बताते हुए कहा कि 7 प्रतिशत की विकास दर और रोजगार सृजन दोनों के बारे में मौजूदा केंद्र सरकार की सोच सच्चाई  से दूर है। दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष  ( आई.एम.एफ) में भारत के कार्यकारी निदेशक कृष्णमूर्ति वेंकट सुब्रमण्यम का मानना है कि बीते 10 वर्षों में लागू आर्थिक नीतियों को दोगुना करते हुए आर्थिक  सुधारों में तेजी लाई जाए  तो हमारी अर्थव्यवस्था 2047 तक आठ प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। हालांकि उन्होंने  इसे बेहद महत्वाकांक्षी बताया किंतु श्री राजन की तरह असंभव बताने से भी बचे। जाहिर बात ये है कि श्री राजन घोषित तौर पर नरेंद्र मोदी के विरोधी हैं। ऐसे में उनका आलोचनात्मक होना लाजमी है। लेकिन उन्होंने कुछ बुनियादी मुद्दे उठाये हैं जिनसे भले ही असहमति हो किंतु उन पर विमर्श अवश्य होना चाहिए। मसलन आधी आबादी की आयु 30 वर्ष  से कम है किंतु इतनी बड़ी जनशक्ति को रोजगार नहीं मिल पाने के कारण मानव पूंजी नहीं बनाया जा सका। कोरोना काल के बाद विद्यार्थियों की शिक्षा बीच में छूट जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सुशिक्षित युवा पीढ़ी के बिना 2047 में विकसित भारत का सपना ख्याली पुलाव जैसा है। यद्यपि ये पहला अवसर नहीं है जब रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर द्वारा केंद्र सरकार की  आर्थिक नीतियों की खिल्ली उड़ाई गई हो। कांग्रेस से उनकी नजदीकी  किसी से छिपी नहीं है। राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा में शिरकत कर चुके श्री राजन उनको एक होशियार व्यक्ति बताकर उनकी प्रशंसा करने में भी आगे रहे। सितंबर 2013 से अगले तीन साल तक वे रिजर्व बैंक के गवर्नर थे। चूंकि उनका ज्यादातर कार्यकाल मोदी सरकार के साथ बीता इसलिए उस दौरान मिले अनुभवों  के आधार पर वे उसके प्रति दुराग्रहों से भर उठे। तत्कालीन वित्तमंत्री स्व.अरुण जेटली से जब भी  श्री राजन के साथ मतभेद के बारे में पूछा गया तो उन्होंने हँसकर टाल दिया। लेकिन जब उन्हें बतौर गवर्नर दूसरा कार्यकाल नहीं मिला तो उसके बाद से वे इस सरकार की आर्थिक नीतियों के कटु आलोचक के रूप में सामने आ गए ।  और इसी वजह से विपक्ष खास तौर पर कांग्रेस को  रास आने लगे। उन्होंने  खुद भी स्वीकार किया कि एक दशक से वे राहुल से जुड़े हुए हैं। हो सकता है मनमोहन सरकार के अंतिम वर्ष में उन्हें रिजर्व बैंक की गवर्नरी उसी वजह से मिली थी। बहरहाल जबसे वे उस पद से हटे तभी से मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां उनके निशाने पर रही हैं और वे सदैव उनको लेकर निराशाजनक निष्कर्ष ही निकालते रहे। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों एवं रेटिंग एजेंसियों द्वारा देश की विकास दर के बारे में जो उत्साहवर्धक आकलन किया जाता रहा वह भी श्री राजन के गले नहीं उतरा। लोकसभा चुनाव के पहले उन्होंने 2047 तक देश की आर्थिक उड़ान पर जिस तरह का नकारात्मक रवैया दिखाया वह विपक्ष को निश्चित ही रास आयेगा। यद्यपि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में कार्यकारी निदेशक के तौर पर कार्यरत श्री सुब्रमण्यम ने  श्री राजन के सर्वथा विपरीत 2047 तक 8 प्रतिशत की वार्षिक  दर से विकास होने की बात कहकर उम्मीदों को जिंदा रखा है। इस बारे में विचारणीय बात ये है कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक द्वारा किये गए आकलन  ही विदेशी निवेशकों को आकर्षित करते हैं।  हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार हमारा शेयर बाजार अब विदेशी पूंजी पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा। बीच में कई मर्तबा देखने में आया कि विदेशी निवेशकों ने जब भी बड़ी मात्रा में अपना निवेश निकाला तब घरेलू निवेशकों ने अर्थव्यवस्था में भरोसा जताते हुए शेयर बाजार को गिरने से बचाया।   इसके कारण  भारत के प्रति वैश्विक अवधारणा में जो सकारात्मक बदलाव आया वह श्री राजन के आकलन पर सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में महत्वपूर्ण दायित्व संभाल रहे श्री सुब्रमण्यम द्वारा जो बात कही गई वह इस लिहाज से काबिले गौर है कि केंद्र सरकार ने अपने दो कार्यकाल में जिन आर्थिक नीतियों को लागू किया उनको दोगुना किये जाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री भी  तीसरी बार सत्ता में लौटने पर बड़े और कड़े निर्णय करने की बात कह चुके हैं। यदि लोकसभा चुनाव में उनको फिर जनादेश मिला तो उसमें राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के साथ आर्थिक नीतियों के सफल क्रियान्वयन का भी योगदान होगा। गरीब कल्याण योजनाएं इस बारे में उल्लेखनीय हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 March 2024

गलतियों पर गलतियाँ करते जा रहे केजरीवाल


दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को उच्च न्यायालय से भी राहत न मिलने के बाद वे लंबे समय तक रिहाई से वंचित रहेंगे। गत दिवस श्री केजरीवाल के वकील द्वारा प्रस्तुत याचिका पर जवाब देने के लिए ईडी को 3 अप्रैल तक का समय दिया गया है। आज  रिमांड यदि अदालत ने नहीं बढ़ाया तब उनको जेल जाना पड़ेगा। इस मामले  में अब तक  गिरफ्तार किये गए एक - दो को ही जमानत मिली, वह भी सरकारी गवाह बनने के बाद। मनीष सिसौदिया और संजय सिंह की जमानत अर्जियां लगातार जिस प्रकार से रद्द होती रहीं उसके आधार पर ये कयास लग रहे हैं कि श्री केजरीवाल को जमानत मिलना  आसान नहीं होगा। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि दिल्ली की सरकार कैसे चलेगी? अब तक की परंपरानुसार सत्ता में बैठे नेता की गिरफ्तारी होने पर या तो वह स्वयं पद से इस्तीफा दे देता था या उसे बर्खास्त किया जाता रहा। गिरफ्तारी की संभावना होते ही पद त्यागने की परिपाटी का पालन करते हुए ही झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस्तीफा दे दिया था। हालांकि दिल्ली सरकार के उपमुख्यमंत्री श्री सिसौदिया और मंत्री सत्येंद्र जैन ने गिरफ्तार होने के बाद लंबे समय तक कुर्सी नहीं छोड़ी। लेकिन जब ये लगा कि अदालत उनको राहत नहीं दे रही तब इस्तीफा दिया ताकि दो नये मंत्री बनाये जा सकें और उनके विभागों का काम चल सके। उल्लेखनीय हैं श्री केजरीवाल ने अपने पास कोई विभाग नहीं रखा और श्री सिसौदिया के पास ज्यादातर बड़े महकमे थे। उक्त दोनों को जेल में रहते  हुए मंत्री के दायित्व निर्वहन की छूट  मुख्यमंत्री द्वारा क्यों नहीं दी गई, ये बड़ा सवाल है। सही बात तो ये है कि श्री केजरीवाल भी इस सच्चाई से अवगत हैं कि जेल से सरकारी कामकाज संभव नहीं क्योंकि वहाँ कार्यालायीन व्यवस्था मुश्किल है। गिरफ्तारी के समय हो सकता है उनको उम्मीद रही होगी कि अगले दिन जमानत मिल जायेगी किंतु ऐसा नहीं हुआ। ऐसे में  जेल से सरकार चलाने की  ज़िद सिवाय हेकड़ी के और कुछ भी नहीं। सही बात ये है कि  आम आदमी पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं है जो सरकार चलाने में सक्षम हो। दूसरा मुख्यमंत्री इस बात के प्रति सशंकित हैं कि  उनके समानांतर कोई और नेता ताकतवर न बन जाए। उनके गिरफ्तार होते ही उनकी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाने की चर्चा भी चली किन्तु पार्टी के भीतर बगावत की आशंका को देखते हुए उन्होंने फिलहाल तो उस निर्णय को लंबित कर दिया किंतु जिस तरह से वे पत्नी के जरिये अपने संदेश प्रसारित करवा रहे हैं उनमें भविष्य के संकेत छिपे हुए हैं। उधर उपराज्यपाल ने जेल से सरकार चलाने के श्री केजरीवाल के फैसले की संवैधानिकता पर जो सवाल उठाए हैं उनसे लगता है कि दिल्ली राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रही है। मुख्यमंत्री भी इस बात को जानते हैं और इसीलिए वे इस्तीफा न देकर सहानुभूति बटोरना चाह रहे हैं ।  लेकिन इस पेचीदा स्थिति  के लिए श्री केजरीवाल ही उत्तरदायी हैं। ईडी के समन को वे जिस प्रकार ठुकराते रहे उससे उनकी गिरफ्तारी का रास्ता पुख्ता होता गया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने ईडी द्वारा पेश किये गए प्रमाण देखने के बाद ही उनको गिरफ्तारी से राहत  न देने का निर्णय सुनाया था। ऐसे में आम आदमी पार्टी द्वारा ईडी और केंद्र सरकार के विरुद्ध किए जा रहे आंदोलन का कोई नैतिक आधार नहीं बचा। और जो कांग्रेस इस गिरफ्तारी को लेकर मुखर है वह भूल जाती है कि श्री केजरीवाल को इस हालत तक पहुंचाने में भाजपा के साथ वह भी जिम्मेदार है। जिस शराब नीति को लेकर ये मामला बना उसमें भ्रष्टाचार की शिकायत कांग्रेस ने भी करते हुए श्री केजरीवाल पर जोरदार हमले किये थे। बाद में इंडिया गठबन्धन में उनके शामिल होने के बाद उसने अपना मुँह बंद कर लिया। सही बात ये भी है कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए राजी भी शराब घोटाले पर चुप रहने की शर्त पर हुई थी। उसके एवज में दिल्ली में तीन लोकसभा सीटें उसके लिए छोड़ दीं। कुल मिलाकर मामला ये है कि श्री केजरीवाल ज्यादा होशियारी के फेर में मूर्खता कर बैठे। ईडी के पहले बुलावे पर वे चले गए होते तो शराब घोटाले की जाँच  अंजाम तक पहुँच जाती ।  और हो सकता है जेल में बंद उनके नेता जमानत पर छूट जाते। गिरफ्तारी के बाद इस्तीफा न देकर वे और भी बड़ी गलती कर रहे हैं। यदि राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया तब श्री केजरीवाल की  वजनदारी भी जाती रहेगी। जो काँग्रेस आज उनके गम में आँसू बहा रही है वह  पल्ला झाड़ने में देर नहीं करेगी क्योंकि मन ही मन वह भी आम आदमी पार्टी से खार खाए बैठी है। पंजाब के एक सांसद और विधायक के पार्टी छोड़ने से श्री केजरीवाल को सतर्क हो जाना चाहिए। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 27 March 2024

महाराष्ट्र में जंग शुरु होने के पहले ही बिखरने लगा विपक्षी खेमा



विपक्षी गठबंधन इंडिया जिन दो राज्यों में सबसे अधिक मजबूत माना जा रहा था वे तमिलनाडु और महाराष्ट्र हैं। तमिलनाडु में तो द्रमुक की सरकार और संगठन दोनों बेहद मजबूत हैं। इसीलिए सभी चुनाव पूर्ण सर्वेक्षण वहाँ इंडिया की जबर्दस्त जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं। शुरुआत में लग रहा था कि महाराष्ट्र  भाजपा की राह में बड़ी बाधा बनेगा। कांग्रेस, एनसीपी और उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना  के अलावा प्रकाश आंबेडकर जैसे कद्दावर दलित नेता के भी गठबंधन के साथ आ जाने से उसकी ताकत बढ़ी हुई नजर आ रही थी। राहुल गाँधी की न्याय यात्रा का समापन मुंबई में जिस विशाल रैली में हुआ उससे पूरा विपक्ष उत्साहित था। गठबंधन के बड़े चेहरे भी इसी राज्य से हैं। शिवसेना और एनसीपी में हुई टूटन और कांग्रेस से अशोक चव्हाण और मिलिंद देवड़ा के निकलने के कारण राजनीतिक खींचातानी काफी बढ़ गई थी। ये बात भी तेजी से उठी कि एकनाथ शिंदे और अजीत पवार को सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी देने से भाजपा में अंदरूनी असंतोष है। अशोक चव्हाण को पार्टी में आते ही राज्यसभा सीट मिलने की भी चर्चा रही। विपक्षी गठबंधन भाजपा में आये नेताओं के भ्रष्टाचार में लिप्त होने का मुद्दा भी गरमा रहा था। इंडिया में शामिल पार्टियों में सीटों का बंटवारा भी सौजन्यता के साथ होने की बात प्रचारित की जाती रही। शरद पवार और उद्धव ठाकरे जैसे बड़े नेताओं के रहते किसी भी मतभेद को सुलझाने की उम्मीद भी जताई जा रही थी। लेकिन न्याय यात्रा की समाप्ति के पहले तक इंडिया की जो एकजुटता सतह पर तैरती लग रही थी वह कुछ दिनों में ही बिखरती लगने लगी। जैसे ही चुनाव आयोग ने चुनाव कार्यक्रम घोषित किया और सीटों के चयन का कार्य शुरू हुआ, मतभेद सामने आने लगे। उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने बिना कांग्रेस को विश्वास में लिए 17 प्रत्याशी घोषित कर दिये। मुंबई में संजय निरुपम जैसे नेता जिस सीट पर नजरें टिकाए थे वहाँ उद्धव द्वारा अपना उम्मीदवार उतारे जाने से कांग्रेस नाराज है। श्री आंबेडकर की  वंचित बहुजन अगाड़ी ने 8 प्रत्याशी घोषित कर गठबंधन को झटका दे दिया  वहीं स्वाभिमानी शेतकरी संगठन ने भी महा विकास अगाड़ी को ठेंगा दिखा दिया। पार्टी हाथ से चली जाने के बाद शरद पवार बूढ़े शेर की तरह लाचार नजर आने लगे हैं। बारामती में उनकी बेटी सुप्रिया सुले के विरुद्ध अजीत पवार की पत्नी के कूद जाने से श्री पवार को अपनी विरासत के खत्म होने की चिंता सताने लगी है। इसी तरह उद्धव भी अपने परिवार के भविष्य को लेकर परेशान हैं। एकनाथ शिंदे उनके प्रभाव क्षेत्र में निरंतर सेंध लगाते जा रहे हैं। कांग्रेस भी श्री ठाकरे को ज्यादा ताकत देने में झिझक रही है। इस सबके विपरीत  एनडीए में सीटों का बंटवारा अपेक्षाकृत शांति से निपट गया। चूंकि भाजपा दबाव बनाने की स्थिति में है इसलिए उसके सहयोगी दल कड़ी सौदेबाजी से बचते दिखे। बीते दो - तीन दिनों के भीतर ही महाराष्ट्र में इंडिया के घटक दलों में जो खींचातानी देखने मिल रही है वह विपक्ष के लिए अच्छा संकेत नहीं है जहाँ उसके लिए अच्छी संभावनाएं बताई जा रही थीं। समस्या एनडीए में न हों ये कहना गलत होगा किंतु उसके सबसे बड़े दल भाजपा का प्रबंधन, आपसी संवाद और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता के कारण छोटी - बड़ी समस्याओं का हल समय रहते हो जाता है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने गठबंधन बनाने में इंडिया से पिछड़ने के बाद जिस तेजी से कदम बढ़ाये उसके कारण वह विभिन्न राज्यों में मजबूती के साथ खड़े होने की स्थिति में आ गई। बिहार के बाद महाराष्ट्र में एनडीए की शुरुआत धीमी रही किंतु अब वह आगे है। महाराष्ट्र में यदि इंडिया के सदस्यों में तालमेल बिगड़ा तो उसका प्रभाव अन्य राज्यों में भी दिखाई देगा। संजय निरुपम ने कांग्रेस नेतृत्व से मांग की है कि पार्टी बचाने वह उद्धव ठाकरे के साथ गठबंधन से बाहर आये। कुल मिलाकर विपक्षी गठबंधन के आसार अच्छे नजर नहीं आ रहे। भाजपा ने महाराष्ट्र में जिस प्रकार से विपक्ष में सेंध लगाई उसके कारण इंडिया की एकता खतरे में पड़ रही है। शरद पवार और उद्धव ठाकरे भी अपनी वजनदारी खोते जा रहे हैं। आने वाले दिन महाराष्ट्र की राजनीति में उठापटक भरे होना तय है जिसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़े बिना नहीं रहेगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 24 March 2024

म.प्र में सूपड़ा साफ होने से बचाने में लगी कांग्रेस दिग्विजय को लड़वाकर कमलनाथ को दिया संदेश




    विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भाजपा पर ये तंज कसती थी कि उसके पास मजबूत प्रत्याशी नहीं होने से उसने 6 सांसदों को उम्मीदवार बनाया जिनमें 3 तो केंद्र सरकार में मंत्री थे। राष्ट्रीय महामंत्री रहे कैलाश विजयवर्गीय को इंदौर से उतारा गया। कांग्रेस के उस व्यंग्य में कुछ हद तक सच्चाई भी थी क्योंकि सारे विश्लेषण म.प्र में भाजपा और कांग्रेस के बीच करीबी संघर्ष बता रहे थे। लेकिन जब परिणाम आये तब भाजपा हाईकमान की रणनीति सटीक साबित हो गई। हालांकि केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते मंडला जिले की निवास और सांसद गणेश सिंह सतना सीट से हार गए किंतु नरेंद्र सिंह तोमर - दिमनी, प्रहलाद सिंह पटेल- नरसिंहपुर, कैलाश विजयवर्गीय - इंदौर, रीति पाठक - सिंगरौली और उदय प्रताप सिंह गाडरवारा से बड़े अंतर से जीते।
      भाजपा ने उक्त प्रयोग अन्य राज्यों में भी अपनाया और उसे अपेक्षित सफलता मिली।  ये बात सही है कि बड़े चेहरों को छोटे चुनाव में उतारने से एक तो पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा वहीं दूसरी तरफ विपक्षी उम्मीदवार और उसकी पार्टी मनोवैज्ञानिक दबाव में आ गई। उस प्रयोग की सफलता ने कांग्रेस को भी उसका अनुसरण करने प्रेरित किया जिसका प्रमाण उसके द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को राजगढ़ और पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया को रतलाम से प्रत्याशी बनाए जाने से मिला।   विधानसभा चुनाव में मिली करारी पराजय के बाद  मनोबल पूरी तरह टूटने से  उसके पास प्रत्याशियों का टोटा हो चला था। बड़े नेता सुनिश्चित पराजय की वजह से  मुँह चुराते फिर रहे थे। मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में मात खाने के बाद कमलनाथ के जबलपुर से लड़ने की चर्चा चली तो उन्होंने छिंदवाड़ा से बाहर जाने की बात को नकार दिया। वैसे भी भाजपा में उनके और बेटे के आने की अटकलबाजियों ने उनकी साख पार्टी के भीतर काफी कम कर दी। यहाँ तक कि छिंदवाड़ा में उनके अति विश्वस्त दीपक सक्सेना तक ने उनका साथ छोड़ दिया। कांग्रेस से जिस बड़ी संख्या में नेताओं की भगदड़ मची हुई है उसने भी  हौसले ठंडे कर रखे हैं।

    सबसे बड़ी बात ये देखने मिल रही है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार को नियुक्त किये जाने के हायकमान के फैसले को भी कांग्रेसजन  पचा नहीं पा रहे। कमलनाथ भी उन्हें हटाये जाने के तरीके से अपमानित महसूस कर रहे हैं। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस में बड़ा शून्य पैदा हो गया था। इसीलिए दिग्विजय सिंह और कांतिलाल भूरिया को मैदान में उतारा गया है। दरअसल पार्टी ये संदेश देना चाहती है कि उसके पास अभी भी कुछ योद्धा शेष हैं। इसके अलावा  कमलनाथ को भी ये एहसास करवाया जा रहा है कि उनके छिंदवाड़ा में बैठ जाने के बावजूद कांग्रेस पूरे प्रदेश में लड़ने का माद्दा रखती है।

       राजगढ़ दिग्विजय सिंह की पुरानी सीट है। हालांकि उनकी जीत सुनिश्चित नहीं है क्योंकि ज्यादातर विधायक भाजपा के हैं। लेकिन उनके पास खोने को कुछ नहीं है। हारने पर  भी राज्यसभा सदस्य तो वे रहेंगे ही। इस दांव से वे फिर से कांग्रेस हायकमान के चहेते हो गए।सही बात तो ये है कि उनको अपने पुत्र जयवर्धन की फिक्र सता रही है। उसी वजह से उनका भाई लक्षमण सिंह नाराज हो उठे हैं।
      कांग्रेस द्वारा दो दिग्गजों को लोकसभा चुनाव लड़वाने का क्या लाभ होगा ये तो परिणाम के दिन ही पता चलेगा किंतु इस कदम के जरिये हायकमान ने दिग्विजय को विवादास्पद बयान देने से भी रोक दिया है जिनकी वजह  से उसको जबर्दस्त नुकसान उठाना पड़ता है। चूंकि वे खुद उम्मीदवार बन गए इसलिए जुबान पर नियंत्रण रखेंगे।

     हालांकि दो वरिष्टों को लड़वाने के बाद भी कांग्रेस चुनौती देती नहीं दिख रही। उसके कुछ प्रत्याशी दबाववश तो कुछ प्रचारित होने के लिए लड़ रहे हैं। सही बात तो ये है कि कांग्रेस का लक्ष्य भाजपा को सभी 29 सीटें जीतने से रोकना मात्र रह गया है। छिंदवाड़ा में नकुलनाथ बुरी तरह घिर चुके हैं जिस वजह से उनके पिताश्री वहीं फंसे हैं। खुद कांग्रेसी कह रहे हैं कि यदि पांच सीटें भी मिल गईं तो वह बड़ी उपलब्धि होगी। 


रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 23 March 2024

केजरीवाल का बचाव कर अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मार रही कांग्रेस



 दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ईडी द्वारा गिरफ़्तार करने के बाद 6 दिन के रिमांड पर ले लिया गया।  चर्चित शराब घोटाले के सिलसिले में दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया और राज्यसभा सदस्य संजय सिंह पहले से जेल में हैं।  तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के.सी. राव की बेटी भी गिरफ्त में है । उक्त घोटाले में कुछ और लोग भी जेल की हवा खा रहे हैं। ये प्रकरण इतना उलझ जाएगा ये अनुमान किसी को न था। दिल्ली की  नई शराब नीति पर जब कांग्रेस और भाजपा ने बवाल मचाया तब दिल्ली सरकार के एक अधिकारी ने उपराज्यपाल से उसमें भ्रष्टाचार  की शिकायत की। जिसके बाद श्री केजरीवाल  समझ गए कि वे लपेटे में आ जाएंगे तो वह नीति रद्द कर दी गई। लेकिन कांग्रेस और भाजपा द्वारा की गई  शिकायतें और अधिकारी की रिपोर्ट पर सीबीआई और ईडी सक्रिय हुईं और फिर  कुछ व्यापारियों सहित  श्री सिसौदिया और श्री सिंह पकड़े गए। जाँच में उजागर हुआ कि शराब नीति में मिली घूस का उपयोग आम आदमी पार्टी ने गोवा विधानसभा चुनाव में किया और श्री केजरीवाल भी घोटाले  से जुड़े हुए थे। इस पर उन्हें पूछताछ हेतु समन भेजे जाते रहे किंतु वे किसी न किसी बहाने से उनको अनदेखा करते गए। 9 समन भेजने के बाद भी पूछताछ हेतु न आना उन्हें संदिग्ध बनाने के लिए पर्याप्त था। दो दिन पहले उन्होंने अपनी संभावित गिरफ्तारी रोकने  उच्च न्यायालय की शरण ली किंतु उसने उनकी अर्जी ठुकरा दी जिसके बाद ईडी ने  उनको गिरफ्तार कर लिया। चूंकि लोकसभा चुनाव सिर पर हैं इसलिए आम आदमी पार्टी सहित अधिकांश विपक्ष भाजपा और केंद्र सरकार पर चढ़ बैठा। गत दिवस अदालत ने रिमांड अर्जी मंजूर करते हुए श्री  केजरीवाल की दिक्कतें बढ़ा दीं।   उसके बाद सवाल उठा कि दिल्ली सरकार कैसे चलेगी क्योंकि श्री केजरीवाल ने इस्तीफा देने से इंकार करते हुए जेल से हुकूमत चलाने की बात कही। इसके संवैधानिक पहलू पर बहस चल रही है क्योंकि मुख्यमंत्री रहते हुए किसी की  ये पहली गिरफ्तारी है। हाल ही में झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी गिरफ्तारी के पहले इस्तीफा दे दिया था। इस बारे में संविधान चूंकि मौन है इसलिए क्या होगा ये जल्द सामने आ जायेगा। कुछ लोगों का कहना है यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा नहीं देंगे तो राष्ट्रपति शासन की संभावना उत्पन्न हो सकती है। आश्चर्य ये है कि यही केजरीवाल ईडी को ललकारते हुए सोनिया गांधी को गिरफ्तार करने कहते थे । शराब नीति के विरोध में कांग्रेस नेताओं के पुराने साक्षात्कार भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। जहाँ तक सवाल  श्री केजरीवाल को गिरफ्तार किये जाने के औचित्य का है तो ईडी के 9 समन  रद्दी में फेंकने का दुस्साहस निश्चित तौर पर अक्षम्य है। मुख्यमंत्री किसी जाँच एजेंसी के बुलाये जाने पर एक दो बार तो व्यस्तता का बहाना बना सकता है किंतु वह न जाने की ज़िद पकड़ ले तो उसका नैतिक और कानूनी पक्ष स्वाभविक रूप से कमजोर हो जाता है। पूछताछ के लिए ईडी दफ्तर में न आकर श्री केजरीवाल ने चोर की दाढ़ी में तिनका की कहावत को चरितार्थ कर दिया। उनको  पता था कि अंततः वे गिरफ्तार होंगे। ऐसे में उनकी गिरफ्तारी पर ईडी और केंद्र सरकार पर आरोप लगाने से विपक्ष अपनी खुद की कमजोरी उजागर कर रहा है। जो कांग्रेस इस मामले में केजरीवाल सरकार का बचाव कर रही है वह खुद शराब नीति में भ्रष्टाचार को उजागर करने में अग्रणी रही। इसीलिए दिल्ली और पंजाब के उसके तमाम नेता लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के साथ गठबन्धन के विरुद्ध थे। लेकिन  आलाकमान ने उस विरोध को नजरंदाज कर दिया।  श्री केजरीवाल की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे  गाँधी परिवार को अपने नेताओं के उन बयानों को निकालकर सुनना चाहिए जिनमें श्री सिसौदिया की गिरफ्तारी का स्वागत करते हुए इस बात का ढोल पीटा गया था कि शराब घोटाला उसने ही उजागर किया था। ऐसा लगता है कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने गलतियों से सबक नहीं लेने की कसम खाई है। इसीलिये जिस आम आदमी पार्टी ने उसकी लुटिया डुबोई उसी के नेता के बचाव में वह आगे - आगे हो रही है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 22 March 2024

लॉटरी किंग द्वारा द्रमुक और तृणमूल को दिये बड़े चंदे को क्या नाम देंगे राहुल


सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती के बाद आखिरकार स्टेट बैंक ने इलेक्टोरल बॉण्ड के वे सभी विवरण सार्वजनिक कर दिये जिनसे ये पता चल सकेगा कि बॉण्ड  किसने खरीदा और किस पार्टी ने उसे भुनाया। जो मोटी - मोटी जानकारी आई है उसके अनुसार लॉटरी का व्यवसाय करने वाली फ्यूचर गेमिंग नामक कंपनी ने सबसे अधिक 1300 करोड़ के बॉण्ड खरीदे थे। जब यह बात उजागर हुई तभी से राजनीतिक क्षेत्रों में बवाल मचा हुआ है। इसका कारण उस कंपनी के कारोबार और  मुनाफे को देखते हुए चंदे की राशि का गैर अनुपातिक होना है। उस पर छापे और संपत्ति जप्ती की कार्रवाई भी हो चुकी थी। ऐसे में भाजपा सबसे ज्यादा निशाने पर थी। चूंकि उसे बॉण्ड के जरिये सबसे अधिक चंदा हासिल हुआ इसलिए माना जा रहा था कि उक्त लॉटरी कंपनी ने भाजपा को ही सबसे अधिक उपकृत किया होगा। लेकिन जब द्रमुक ने उसे मिले बॉण्ड का विवरण जारी किया तब ये बात सामने आई कि उसे मिले कुल 656 करोड़ के बॉण्ड में 503 करोड़ के बॉण्ड फ्यूचर गेमिंग द्वारा दिये गए। वहीं तृणमूल कांग्रेस को उसने 542 करोड़ रु. के बॉण्ड देकर उपकृत किया। भाजपा को उससे 100 करोड़ मिले तो कांग्रेस को भी लॉटरी कंपनी ने 50 करोड़ की मदद दी। दूसरे सबसे बड़े दानदाता मेघा समूह ने 1192 करोड़ के बॉण्ड खरीदे जिनमें 584 करोड़ भाजपा और 110 करोड़ कांग्रेस के खाते में गए। इन आंकड़ों के अलावा अन्य जिन कंपनियों ने इलेक्टोरल बॉण्ड खरीदे उनमें ज्यादातर ने बड़ा हिस्सा भाजपा को देने के साथ ही कुछ न कुछ कांग्रेस को भी दिया। फ्यूचर गेमिंग और मेघा समूह द्वारा दिये चंदे को लेकर सबसे अधिक सवाल उठ रहे थे। एक छापे के बाद बॉण्ड खरीदने तो दूसरा उसे मिले बड़े ठेकों के कारण चर्चा में आया। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी बॉण्ड से मिले चंदे को मोदी सरकार द्वारा की गई हफ्ता वसूली बताते फिर रहे हैं। इसे उन्होंने आजादी के बाद का सबसे बड़ा घोटाला भी बताया। चूंकि भाजपा को कुल खरीदे गए बॉण्ड का सबसे अधिक हिस्सा मिला इसलिए उसको कठघरे में खड़ा किया जाना सबसे आसान था। ये आशंका भी राजनीतिक जगत में जताई जाने लगी थी कि जैसे ही स्टेट बैंक बॉण्ड के नंबरों के साथ लाभार्थी का नाम उजागर करेगा त्योंही मोदी सरकार पर आसमान टूट पड़ेगा। और लोकसभा चुनाव में यह मुद्दा भाजपा के साथ वैसे ही चिपक जायेगा जैसा 1989 में बोफोर्स स्व. राजीव गाँधी के साथ जुड़ गया था। लेकिन गत दिवस पूरी जानकारी आने के बाद अब श्री गाँधी हफ्ता वसूली के आरोप को किस मुँह से दोहराएंगे क्योंकि चाहे फ्यूचर गेमिंग हो या मेघा समूह, दोनों ने कांग्रेस को भी बॉण्ड के जरिये चन्दा तो दिया ही। रही बात कम ज्यादा की तो जाहिर है पार्टी को जब भरपूर  वोट  मिलते  थे तब उस पर नोटों की भी जमकर बरसात होती थी। लेकिन जैसे - जैसे उसे मिलने वाले वोट घटते गए वैसे - वैसे चंदा बाजार में भी उसका भाव गिरता गया। राहुल यदि इस मामले में निष्पक्ष हैं तब उनको इंडिया समूह के सबसे ताकतवर घटकों क्रमशः द्रमुक और तृणमूल को फ्यूचर गेमिंग से मिले  भारी - भरकम चंदे पर भी सवाल उठाना चाहिए। जिसने कुल 1300 करोड़ के बॉण्ड का तीन चौथाई हिस्सा उक्त दोनों पार्टियों को देने के साथ ही कांग्रेस को भी 50 करोड़ से नवाजा। लॉटरी का व्यवसाय करने वाली कंपनी द्वारा द्रमुक और तृणमूल को किस दबाव में तकरीबन 1000 करोड़ दिये ये सवाल कांग्रेस को अपने सहयोगियों से पूछना चाहिए। राहुल गाँधी विपक्ष के सबसे प्रमुख नेता हैं। सरकार को कठघरे में खड़ा करना उनका मुख्य कार्य है किंतु   आरोप लगाने के पहले उनको ये देखना चाहिए कि वे कहीं उन्हीं के गले न पड़ जाएं। इस मामले में  जल्दबाजी में वे भूल गए कि उनकी पार्टी भी चंदे के खेल में शामिल रही जिसे वे हफ्ता वसूली बताते रहे। जानकार लोग पहले से ही ये मानकर चल रहे थे कि बॉण्ड विवाद का अंत हवाला कांड जैसा होगा। चूंकि कांग्रेस सहित अनेक विपक्षी पार्टियों ने भी बॉण्ड से चंदा लिया इसलिए वे किसी और पर आरोप लगाने का अधिकार खो चुकी हैं। द्रमुक और तृणमूल को लॉटरी किंग से मिली बड़ी रकम भी विपक्ष को संदेह के घेरे में लाती है। देखना ये है कि श्री गाँधी अपने सहयोगी दलों को मिले बड़े  चंदे को क्या नाम देते हैं? 


-रवीन्द्र वाजपेयी