Monday, 30 September 2024

इजरायल के साथ रिश्ते सुधारने में ही अरब देशों का फायदा

 अक्तूबर 2023 को इजरायल पर हमास ने बड़ा हमला बोला जिसमें 1200 इजरायली नागरिकों की जान गई और 251 को बंधक बना लिया गया। इसी के साथ इजरायल ने हमास के खिलाफ जंग का एलान किया। इस बीच गाजा में इजरायली हमलों के विरोध में हिजबुल्लाह ने भी उत्तरी इजरायल को निशाना बनाना शुरू किया। उस हमले को एक साल पूरा होने में सप्ताह भर बाकी है। इस अवधि में इजरायल ने जो रौद्र रूप दिखाया उसके कारण रूस और यूक्रेन युद्ध की खबरें फीकी पड़ गईं। हमास द्वारा अचानक किये गये  मिसाइल हमलों ने इजरायल की अचूक मानी जाने वाली एयर डिफेंस प्रणाली  पर सवाल उठा दिये। हमास के लड़ाके जिस तरह इजरायली नागरिकों का अपहरण करने में कामयाब हुए उससे पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई। यहाँ तक कि अमेरिका भी आश्चर्य में डूब गया।  वह हमला इजरायल की गुप्तचर एजेंसियों के गाल पर भी बड़ा तमाचा था जो  दुनिया भर में धाक जमा चुकी थीं। हमास के हमले के पीछे ईरान का हाथ बताया गया जो अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन है और इजरायल को मिटाने आमादा  है। असल में अमेरिका के प्रयासों से सऊदी अरब और इजरायल के बीच दोस्ती की शुरुआत स्वरूप एक समझौता अंतिम स्थिति में आ गया था जिसके बाद अरब जगत का समूचा शक्ति संतुलन बदल जाता। सं. अरब अमीरात के  देशों से इजरायल के व्यापारिक संबंध कायम होने के बाद ईरान परेशानी में था। उसे लगा कि सऊदी अरब और इजरायल में दोस्ताना कायम होने पर इस्लामिक जगत में इजरायल विरोधी भावना मंद पड़ जायेगी। वैसे भी लगातार युद्ध करते - करते  अनेक  देश हताश हो चुके हैं। अन्य कुछ देश भी इजरायल के विरोधी तो हैं किंतु सीधे टकराव से बचने लगे हैं। लेबनान  और यमन ही हैं जो ईरान की तरह अभी भी उसके प्रति नफरत से भरे हुए हैं। गत वर्ष जब हमास ने  इजरायल पर सैकड़ों मिसाइलें दागकर उसका मनोबल तोड़ने की कोशिश की तब उसने दोगुनी ताकत से पलटवार किया और हमास को समूल नष्ट करने के संकल्प के साथ गाजा पट्टी की आपूर्ति रोक दी। स्मरणीय है अतीत में हुए समझौते में गाजा और पश्चिमी हिस्से के रूप में  फिलीस्तीन के दो टुकड़े कर दिये गए।  बीच में इजरायल है। दोनों को बिजली , पानी सहित अन्य जीवनोपयोगी वस्तुओं की आपूर्ति वही करता है। हमास का हमला गाजा की तरफ से हुआ जिसकी सीमाएं मिस्र और लेबनान से मिलती हैं। इजरायल का जवाबी आक्रमण गाजा वासियों के लिए बरबादी लेकर आया। लाखों लोग बेघर हो गए  । पूरी दुनिया इजरायल पर युद्ध विराम के लिए दबाव डालती रही किंतु वह रुकने तैयार नहीं। लेकिन इस युद्ध का केंद्र अचानक गाजा के साथ ही लेबनान भी बन गया। इसका कारण वहाँ बैठा हिज़बुल्लाह नामक  संगठन है जो इस्लामिक आतंकवाद का मुखिया बना हुआ था। लेकिन बीते कुछ दिनों में ही इजरायल ने उसके सभी शीर्ष नेताओं को मार डाला। लेबनान की राजधानी बेरुत आधे से ज्यादा मलबे में तब्दील हो चुकी है। हिजबुल्लाह की पीठ पर ईरान का हाथ होने से अब ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि इजरायल का अगला निशाना वही होगा। इसके डर से ईरान के सर्वोच्च नेता को अति सुरक्षित स्थान पर छुपना पड़ा। कहा जा रहा है पश्चिम एशिया लंबे युद्ध में फंसने जा रहा है। इजरायल के प्रधानमंत्री  नेतन्याहू ने संरासंघ महासभा को संबोधित करते हुए जो तेवर दिखाये उनसे लगता है वह इस बार इस्लामिक आतंकवाद की कमर तोड़ने पर आमादा है। ईरान भी उससे सीधे टकराने का साहस नहीं कर पा रहा। अमेरिका चूंकि इजरायल के साथ खुलकर खड़ा है इसलिए वह कदम पीछे खींचने तैयार नहीं है। लेकिन इस संकट में जो सबसे बड़ी बात सामने आई वह ये कि अरब राष्ट्रों को इजरायल के साथ संबंध सुधारकर पश्चिम एशिया को आग में जलने से बचाने की अकलमंदी दिखानी चाहिए। इजरायल विज्ञान और तकनीक में जितना आगे है उसके सामने  तेल संपदा संपन्न तमाम अरब देश भी कहीं ठहरते नहीं हैं। सं. अरब अमीरात इस बात को समझ चुका है और सऊदी अरब के नये शासक भी इजरायल के साथ अच्छे रिश्तों का फ़ायदा समझकर उससे निकटता स्थापित करना चाह रहे हैं  जिसमें ईरान रोड़े अटका रहा है। इस्लामिक देशों को अपने यहाँ बैठे आतंकवादियों को संरक्षण देना बंद करना होगा जिनके कारण उनकी छवि भी खराब होती है। इसमें दो राय नहीं कि बीते कुछ दशकों से इस्लाम के नाम पर फैलाई जा रही दहशतगर्दी ने पूरी दुनिया को अशांत  कर रखा है। अरब राष्ट्रों से लाखों लोग जान बचाकर यूरोपीय देशों में शरण लेने पहुंचे लेकिन वहाँ भी उन्होंने आंतक के बीज बो दिये। इजरायल ने हमास पर जो हमला किया वह आक्रमण का जवाब था। इसी तरह हिजबुल्लाह के विरुद्ध उसकी कारवाई भी तब हुई जब उसने हमास के समर्थन में इजरायल पर मिसाइलें दागीं। कुल मिलाकर इजरायल जो कर रहा है उसके लिए उसे हमास ने उकसाया। उसकी जगह कोई और देश होता तो वह भी ऐसा ही करता। 


-  रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 28 September 2024

पेट्रोल - डीजल : कम से कम 10 रु. सस्ते हों


दो दिनों से पेट्रोल - डीजल सस्ता किये जाने की खबरें आ रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में आई गिरावट के चलते बीते कुछ महीनों में भारत की तेल कंपनियों ने भरपूर मुनाफा कमाया। कहने को तो पेट्रोल - डीजल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया है किंतु ये केवल दिखावे के लिए है। केंद्र और राज्य सरकारों ने अपना पूरा नियंत्रण उन पर बना रखा है। इसीलिए दुनिया भर में कीमतें कम होने के बावजूद भारत में पेट्रोल - डीजल महंगा बेचा जा रहा है। ज्यादातर तेल कंपनियां सरकार का उपक्रम होने से उन पर पूरा नियंत्रण उसी का है। बीते सालों में एक या दो मर्तबा दाम घटाए भी गए तो बेहद कम। हालाँकि काफी समय से उनमें स्थिरता का बना रहना ही सरकारी मेहरबानी रही। दो वर्ष पहले तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दीपावली के पहले कीमतें घटने का ऐलान कर जनता को उपहार देने की बात कही। कोरोना की विभीषिका से उबरकर दुनिया यूक्रेन संकट में फंस गई। ऐसी स्थिति में आम तौर पर कच्चा तेल महंगा हो जाता है। लेकिन रूस से हुए सौदे के तहत भारत को सस्ते दामों पर कच्चा तेल मिलने से हम बड़े घाटे से बचे रहे। यही वजह है कि भारत की तेल कंपनियां भारी मुनाफा कमाने में सफल रहीं। जो खबरें अधिकृत तौर पर प्रसारित हुईं उनके अनुसार आज की स्थिति में उनको प्रति लीटर पर 15 रु. का मुनाफा है। ऐसे में यदि पिछली बार की तरह मात्र 2 से 3 रु. प्रति लीटर कीमतें घटाई जाती हैं तो इसे ऊँट के मुँह में जीरा कहा जाएगा। युद्द या किसी अन्य आपातकालीन स्थिति में जनता से अपेक्षा होती है सरकार का साथ दे किंतु  आये दिन ये दावा किया जाता है कि अर्थव्यवस्था बेहद सुखद स्थिति में है और मेक इन इंडिया की 10 वर्षीय मुहिम के कारण देश  निर्यात के क्षेत्र में भी तेजी से आगे  बढ़ रहा है । भारत में बने रक्षा उपकरणों की दुनिया भर में भारी मांग होने से व्यापार संतुलन की स्थिति सुधरी है। कूटनीतिक मंचों पर भारत को विश्व की महाशक्तियों के बराबर बिठाया जाता है। सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता  के लिए हमारे दावे का समर्थन वे देश भी करने लगे हैं जो अब तक भारत को हेय दृष्टि से देखा करते थे। देश में वैकल्पिक ईंधन का उपयोग बढ़ने से पेट्रोल डीजल की खपत कम करने का प्रयास भी रंग ला रहा है। जीएसटी और टोल टेक्स से होने वाली कमाई उम्मीद से ज्यादा होने लगी है। आयकर संग्रह   भी लक्ष्य से अधिक होना शुभ संकेत है। ये देखते हुए सबसे अच्छा तो यही होगा कि जीएसटी काउंसिल की आगामी बैठक में पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी में शामिल किया जावे। हालाँकि इसके लिए राज्यों की असहमति का बहाना बना दिया जाता है। लेकिन यदि किसी विशेष परिस्थितिवश ऐसा करना संभव न हो तब भी केंद्र सरकार पेट्रोल डीजल के दामों में कम से कम 10 रु. प्रति लीटर की कमी करे। इसके साथ ही रसोई गैस सिलेंडर के दाम  भी 150 से 200 रु. कम किये जाएं, तभी इसे सही मायनों में दीपावली उपहार माना जाएगा। यदि इसमें भी सरकार के वित्तीय सलाहकार टांग फंसाएं तो फिर ईमानदारी इसी में है कि पेट्रोलियम उत्पादों को बाजार के उतार - चढ़ाव पर छोड़ दिया जावे। काफी समय तक पेट्रोल - डीजल की कीमतों में ये प्रयोग चलता रहा जिसके कारण दैनिक स्तर पर कीमतें घटती - बढ़ती रहीं और जनता भी उसे सहज भाव से लेने लगी थी किंतु निजी क्षेत्र को आर्थिक सुधारों को अपनाने की नसीहत देने वाला सरकारी तंत्र पेट्रोल - डीजल के दामों को अपनी मुट्ठी में कैद करने  पर आमादा है। मोदी सरकार से मंहगाई को लेकर उसके प्रतिबद्ध समर्थक भी नाराज हैं। जिसमें पेट्रोल - डीजल की कीमतें बड़ा कारण है। ऐसे में जब दक्षिण एशिया के छोटे - छोटे देशों में इन चीजों के दाम भारत की तुलना में बेहद कम हैं तब हमारे यहाँ उनका 100 रु. प्रति लीटर से ज्यादा होना मुनाफाखोरी नहीं तो और क्या है? दाम घटाने की जो खबरें उड़ रही हैं उनके पीछे कुछ राज्यों के विधानसभा  चुनाव  भी हैं। खास तौर पर महाराष्ट्र को लेकर भाजपा काफी चिंतित है। ऐसे में यदि दाम घटाना ही है तो कम से कम उतने तो हों जिनसे लोग राहत का अनुभव करें। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 27 September 2024

हिमाचल के शांत माहौल में आग लगाने वालों के मंसूबों को कुचलना जरूरी


प्राकृतिक सुंदरता के साथ ही शांतिप्रियता के लिए प्रसिद्ध  हिमाचल प्रदेश इन दिनों अशांत  है। राजधानी शिमला की एक मस्जिद के अवैध निर्माण का हिन्दू संगठनों ने जब विरोध किया तब उसे तोड़ने की कवायद शुरू हुई। मस्जिद के मौलवी की ये सफाई किसी के गले नहीं उतरी कि उसे नहीं पता मस्जिद में हुआ अवैध निर्माण किसने करवाया। वह विवाद जैसे - तैसे सुलझा तो मंडी जिले की एक मस्जिद में अवैध निर्माण के विरोध में शुरू हुआ हिंदुओं का आंदोलन देखते - देखते  पूरे प्रदेश में फैल गया। हिमाचल  में मुस्लिम आबादी उंगलियों पर गिनने लायक है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में वहाँ उ.प्र से मुसलमानों के  आकर बसने का सिलसिला शुरू हुआ और उसी के साथ  तनाव की नींव पड़ गई। ये लोग यहाँ किस कारण से बसे ये स्पष्ट नहीं है। हिमाचल  में  कोई मुस्लिम धार्मिक केंद्र भी नहीं है। अवैध रूप से दुकानें खोलने और सड़कों पर रेहड़ी लगाने वालों में मुस्लिमों की बढ़ती संख्या के बीच जब उनमें  से कुछ के दस्तावेजों की जाँच हुई तब पता चला कि  ज्यादातर की जन्मतिथि 1 जनवरी है। ये जानकारी भी उजागर हुई कि राज्य के अनेक शहरों में दशकों  से  वीरान पड़ी मस्जिदों में अचानक नमाज  की शुरुआत हो गई जिसमें अन्य राज्यों से आये लोगों की बड़ी संख्या नजर आई। हिन्दू संगठनों का आरोप है कि मुस्लिम  आबादी जिस रहस्यमय तरीके से बढ़ी वह किसी बड़े षडयंत्र का हिस्सा लगता है। बहुसंख्यक आबादी को ये भी महसूस होने लगा कि अन्य राज्यों से आ रहे मुस्लिम माहौल को  तनाव ग्रस्त बना रहे हैं। मस्जिदों के इर्द गिर्द रहने वाले हिन्दू परिवारों की महिलाएं इन बाहरी तत्वों की अश्लील हरकतों  से असहज महसूस करने लगीं। जब इसकी शिकायत की गई तो जवाब मिला आप अपनी आँखें बंद कर लीजिये। हिन्दू व्यापारियों के प्रतिष्ठानों के सामने जबरन अपना कारोबार शुरू करने से भी विवाद पैदा हो रहे हैं। बड़ी मंडियों में अचानक अपरिचित व्यापारियों की आमद होने से स्थानीय व्यवसायी परेशानी में हैं।   शिमला की मस्जिद के अवैध निर्माण को तोड़ने के लिए सख्त कदम उठाये जाने का सकारात्मक असर भी हुआ। इसी क्रम में गत दिवस राज्य के एक मंत्री विक्रमादित्य सिंह द्वारा कहा गया कि उ.प्र की तरह ही  हिमाचल में भी खाद्य सामग्री बेचने वालों को अपनी आईडी और नाम लिखना होगा। इस हेतु एक समिति विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बनाये जाने की बात भी कही गई । विक्रमादित्य पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह के पुत्र हैं ।  उनकी माँ प्रतिभा देवी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थीं और विधानसभा  चुनाव में पार्टी की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद की दावेदार रहीं । लेकिन हाईकमान ने सुखविंदर सिंह सुक्खू की ताजपोशी करवा दी।  विक्रमादित्य मंत्री बन तो  गए किंतु कुछ विधायकों के इस्तीफे के बाद उत्पन्न राजनीतिक संकट के दौरान उन्होंने पद छोड़ दिया। यद्यपि बाद में त्यागपत्र वापस ले लिया लेकिन मुख्यमंत्री से उनके  मतभेद बने हुए हैं। इसलिए जब खाद्य सामग्री विक्रेताओं को अपनी पहिचान के साथ कर्मचारियों का नाम प्रदर्शित करने के फैसले की खबर उनके हवाले से आई तो लोग चौंक गए क्योंकि ऐसा ही आदेश उ.प्र की योगी सरकार द्वारा जारी किये जाने पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने आसमान सिर पर उठा लिया था। लेकिन कुछ घंटों बाद ही खबर आ गई कि कांग्रेस हाईकमान इस आदेश से बहुत नाराज है और विक्रमादित्य को दिल्ली तलब किया गया है। मुख्यमंत्री श्री सुक्खू ने भी स्पष्टीकरण दिया कि अभी उक्त निर्णय लागू नहीं किया गया। लेकिन इस सबसे कांग्रेस का अधकचरापन एक बार फिर सामने आ गया। दुकान के मालिक का नाम या पहिचान प्रदर्शित करना धर्मनिरपेक्षता के लिए कौन सा खतरा है ये समझ से परे है। असली मुद्दा हिमाचल प्रदेश में आ रहे बाहरी लोगों की पहिचान उजागर करना है। मैदानी इलाकों से पहाड़ी राज्य में आकर बसने वालों का सत्यापन जरूरी है। हिमाचल के कुछ इलाके सीमावर्ती होने से सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी हैं। उस लिहाज से संदर्भित निर्णय  रोककर राज्य सरकार और कांग्रेस हाईकमान इस राज्य के सामाजिक ताने - बाने को नष्ट करने में सहायक बन  रही है। जिन इलाकों में दूर - दूर तक मुस्लिम आबादी न हो वहाँ अचानक मस्जिद बनने लगे तो संदेह होना स्वाभाविक है। उत्तराखंड  पहले से ही इस समस्या से जूझ रहा है और अब एक और पहाड़ी राज्य में वैसे ही हालात बन रहे हैं । संयोग से दोनों की सीमाएं चीन से मिलती हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 26 September 2024

राहुल के बयान से कश्मीर घाटी के अलगाववादियों का हौसला बढ़ेगा



कांग्रेस समर्थक प्रचार माध्यम लगातार ये दावा कर रहे हैं  कि राहुल गाँधी काफी परिपक्व हो गए हैं। संसद में उनके भाषणों के आधार पर ये अवधारणा बनाने का प्रयास भी जारी है कि  वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर  स्थापित हो गए हैं। उनकी हालिया अमेरिका यात्रा में इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने भारतीय श्रोताओं के सामने कहा कि राहुल पप्पू  नहीं अपितु एक कुशल रणनीतिकार हैं। कोई पार्टी अपने नेता को महिमामंडित करे तो आश्चर्य नहीं होता। लेकिन ये नेता पर निर्भर है कि वह अपने को उस कसौटी पर साबित करे।  लोकसभा चुनाव में मिली 99 सीटों को लेकर श्री गाँधी में जो  उत्साह उत्पन्न हुआ वह पूरी तरह सही है किंतु अभी भी वे कुछ न कुछ ऐसा कह जाते हैं जिससे उनकी छवि तो खराब होती ही है , कांग्रेस को भी रक्षात्मक हो जाना पड़ता है। अमेरिका यात्रा में भी उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था और जातिगत जनगणना के मुद्दे पर जो टिप्पणियाँ कीं वे बेहद गैर जिम्मेदाराना थीं। वहाँ से लौटने के बाद भी वे जिस तरह से  बयानबाजी कर रहे हैं उससे उनके परिपक्व होने पर संदेह होता है। गत दिवस जम्मू कश्मीर चुनाव  में कांग्रेस का प्रचार करते हुए उन्होंने कह दिया कि भाजपा ने जम्मू कश्मीर से पूर्ण राज्य का दर्जा इसलिए छीना क्योंकि वह उप राज्यपाल के जरिये बाहरी लोगों से राज्य को चलाना चाहती थी। जब तक वे यहाँ रहेंगे जम्मू कश्मीर के खर्चे पर बाहरी लोगों को लाभ मिलता रहेगा। उनका यह कथन कश्मीर घाटी के अलगाववादियों के बयानों का समर्थन करने वाला है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उनको  इतना ज्ञान तो होना ही चाहिए कि देश के हर राज्य में राज्यपाल और  केंद्र शासित प्रदेश में उपराज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति शासन लगने पर विधानसभा के अधिकार भी संसद में निहित हो जाते हैं।  श्री गाँधी ने उपराज्यपाल के बाहरी होने का मुद्दा छेड़कर व्यर्थ की बहस को जन्म दे दिया। राज्यपाल अथवा उपराज्यपाल की नियुक्ति करते समय जाहिर तौर पर केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी अपने अनुकूल व्यक्तियों का चयन करती है। लेकिन वे उसी राज्य के हों ये न तो संवैधानिक तौर पर जरूरी है और न ही संघीय ढांचे की मजबूती के लिये। कांग्रेस जब - जब केंद्र की सत्ता में रही तब उसने जम्मू कश्मीर में जिन राज्यपालों को पदस्थ किया उनमें डाॅ. कर्णसिंह को छोड़कर सभी अन्य राज्यों के थे। श्री गाँधी द्वारा जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाने के लिए केंद्र पर दबाव बनाने की जो बात कही उस पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए। वह इस चुनाव का वह प्रमुख मुद्दा भी  है किंतु उपराज्यपाल को बाहरी व्यक्ति बताना संघीय ढाँचे की व्यवस्था को ध्वस्त करने का प्रयास माना जायेगा। उनके ऐसे ही बयानों के कारण उनकी राजनीतिक समझ पर संदेह होने लगता है। ऐसा कहते समय वे भूल गए कि जम्मू कश्मीर में सबसे लंबा राष्ट्रपति शासन 1990 से 96 तक लगा था। 6 वर्ष 264 दिन की उस अवधि के दौरान केंद्र में  5 साल कांग्रेस और शेष समय उसके समर्थन वाली सरकार थी। तब कश्मीर के अलगाववादी नेता और संगठन जो बातें कहते थे उन्हीं को श्री गाँधी ने एक तरह से दोहरा दिया। इस चुनाव में भी अनेक नेता जम्मू कश्मीर के भविष्य का फैसला वहीं की जनता की मर्जी पर छोड़ने की बात बोल रहे हैं। कांग्रेस की गठबंधन सहयोगी नेशनल काँफ्रेंस खुलकर धारा 370 की वापसी का वायदा कर रही है। कांग्रेस भले ही इस मुद्दे पर शांत है किंतु उसमें इस वायदे का विरोध करने का साहस भी नहीं है। शायद इसीलिए नेशनल काँफ्रेंस को वह बोझ लगने लगी। इसका प्रमाण उसके नेता उमर अब्दुल्ला द्वारा राहुल गाँधी को कश्मीर घाटी की बजाय जम्मू अंचल में ध्यान केंद्रित करने की नसीहत दिये जाने  से मिला। उन्होंने ये आरोप भी लगाया कि कांग्रेस को जम्मू क्षेत्र में ज्यादा सीटें दी गईं थीं किंतु उसने वहाँ काम शुरू ही नहीं किया जबकि मतदान को कुछ दिन ही शेष हैं। श्री अब्दुल्ला के इस बयान को गठबंधन में दरार  के तौर पर देखा जा रहा है। उल्लेखनीय है अब्दुल्ला परिवार इस बार गठबंधन के पक्ष में नहीं था किंतु राहुल पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को लेकर श्रीनगर गए और उसके लिए दबाव बनाया। लेकिन दूसरे चरण तक अब्दुल्ला परिवार को गलती का एहसास होने लगा जिसकी बानगी उमर द्वारा  नाराजगी व्यक्त किये जाने से मिली। इसके बाद भी यदि कांग्रेस को समझ नहीं आ रही तो ये उसकी इच्छा किंतु श्री गाँधी यदि इसी तरह के गैर जिम्मेदराना बयान देते रहे तो इससे उन्हें और उनकी पार्टी दोनों को नुकसान होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 25 September 2024

शेयर बाजार की उछाल के बीच छोटे निवेशकों के हितों की सुरक्षा जरूरी



शेयर बाजार के उतार चढ़ाव किसी देश की अर्थव्यवस्था में निवेशकों के भरोसे का पैमाना माना जाता है। वैश्वीकरण के  बाद तो इसमें विदेशी पूंजी का आगमन भी बेरोकटोक होने लगा है। इस बारे में उल्लेखनीय है कि विदेशी निवेशकों का आना अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत होता है। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि अब पूंजी के इस खेल में केवल धनवान लोग ही शामिल नहीं होते अपितु मध्यमवर्गीय निवेशकों का एक बड़ा वर्ग भी शेयर बाजार में हाथ आजमाने लगा है। बचत के परंपरागत तरीके बदल रहे हैं। बैंकों द्वारा जमा राशि पर ब्याज दर घटाए जाने के फलस्वरूप छोटे निवेशकों की शेयर बाजार में रुचि उत्पन्न हुई। इसमें भी अनेक ऐसी योजनाएं निकलीं जिनसे किश्तों में निवेश के बावजूद निश्चित लाभ मिलने का आश्वासन मिलने से बैंकों की बजाय लोग शेयर बाजार और उससे जुड़ी अन्य योजनाओं के प्रति आकर्षित हुए। उसी का परिणाम है कि चंद लोगों तक सीमित यह व्यवसाय समाज में चर्चा का विषय बन गया। शेयर बाजार को सट्टा बाजार भी कहा जाता है क्योंकि निवेशकों द्वारा लगाए गए धन पर इच्छित लाभ न मिलने के अलावा उसके डूबने का खतरा भी रहता है। शेयर बाजार का संचालन करने वाली संस्था सेबी इस बारे में आगाह भी करती रहती है। इसके बाद भी घोटाले होते हैं । बड़ी - बड़ी कंपनियां पलक झपकते डूब जाती हैं। हिंडनबर्ग रिपोर्ट जैसे हादसे भी देखने आये हैं जिन्होंने न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के अनेक देशों के शेयर बाजारों को धराशायी कर दिया। भारत में भी हर्षद मेहता और यूनिट ट्रस्ट जैसे कांड होने के बाद शेयर बाजार लड़खड़ाया किंतु कुछ समय बाद वह पटरी पर लौट भी आया। भारत में उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद शेयर बाजार आम लोगों के घरों तक जा पहुंचा।  इसीलिए इसे लेकर सरकार को ज्यादा चिंता करनी चाहिए क्योंकि छोटे निवेशक की कमाई डूबना उसकी तबाही का कारण बन जाता है। भारत का शेयर बाजार इन दिनों कीर्तिमान तोड़ने में जुटा हुआ है। गत दिवस उसके सूचकांक  ने 85 हजार का आंकड़ा छू लिया।  लोकसभा चुनाव के पहले शेयर बाजार से आ रहे संकेतों के अनुसार मोदी सरकार की वापसी पर सूचकांक के 1 लाख तक उछलने की  उम्मीद थी। इसलिये जब एग्जिट पोल के नतीजों में ये बताया गया कि श्री मोदी को तीसरी पारी खेलने का मौका मिलने जा रहा है तो शेयर बाजार ने लंबी छलांग लगा दी। लेकिन परिणाम अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहे । भाजपा के स्पष्ट बहुमत से पीछे रहते ही शेयर बाजार धड़ाम से गिरने लगा। हालांकि बाहरी समर्थन से सरकार तो बन गई किंतु विपक्ष द्वारा उसके स्थायित्व को लेकर भ्रम पैदा करने से निवेशकों में भी डर बना रहा। विदेशी पूंजी के आगमन में भी कमी देखी गई। केंद्र सरकार के बजट में भी ऐसा कुछ नहीं दिखा जो शेयर बाजार को रास आता किंतु कुछ समय बाद से ही उसमें स्थिरता आई और उसके बाद से वह फर्राटे मारने लगा। बीच में जब विदेशी निवेशकों का भरोसा भारतीय बाजार में डगमगाया तब भी घरेलू निवेशकों ने उसको सहारा देते हुए सबको चौंका दिया। वर्तमान में जो उछाल है उसके पीछे अंतर्राष्ट्रीय कारण तो अपनी जगह हैं ही लेकिन छोटी बचत करने वालों का भरोसा बैंकों की बजाय शेयर बाजार में जिस तरह बढ़ा वह वैसे तो शुभ संकेत है किंतु सरकार को इस बात की चिंता करनी चाहिए कि मध्यमवर्गीय निवेशकों की राशि सुरक्षित रहे। शेयर बाजार पूरी तरह अनिश्चितता का खेल है। जो लोग उसकी बारीकियाँ समझते हैं वे तो हवा का रुख भांपकर सावधान हो जाते हैं किंतु छोटे निवेशकों को इसके बारे में ज्यादा पता नहीं होता। इसलिए उनको नुकसान से बचाना अर्थव्यवस्था के दूरगामी हितों की दृष्टि से जरूरी है क्योंकि  जिस तरह शेयर बाजार की उछाल  लोगों मनोबल बढ़ाती है वहीं उसका अचानक नीचे गिरना देश की प्रतिष्ठा के लिए घातक होता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 September 2024

ओवैसी के बयान ने खोल दी वक्फ की पोल


वक्फ संशोधन विधेयक भले ही अभी जेपीसी के पास विचारार्थ हो किंतु उ.प्र के  कौशाम्बी जिले में ग्राम सभा की 96 बीघा भूमि उससे वापस लेकर ग्राम सभा के नाम दर्ज करने का एस. डी. एम का फैसला चर्चा का विषय बना हुआ है। यह प्रकरण 1946 से लंबित था। वक्फ बोर्ड का दावा था कि अलाउद्दीन खिलजी के जमाने में बतौर माफीनामा वह भूमि मिली थी । सरकारी रिकार्ड में भी वह वक्फ संपत्ति दर्शाई गई थी किंतु 2 साल पहले यह खुलासा हुआ कि वह ग्राम सभा की भूमि है और उसके बाद अदालती आदेश पर उसे वापस ग्राम सभा के नाम दर्ज कर दिया गया। इस मामले की विस्तृत रिपोर्ट राज्य शासन द्वारा मंगवाकर अवैध तौर पर हड़पी गई जमीनें एवं अन्य संपत्तियाँ वापस लेने की मुहिम शुरू किये जाने की खबर से वक्फ बोर्ड में घबराहट है।  कौशाम्बी जैसे मामले पूरे प्रदेश में होने की आशंका जताई जा रही है। राज्य की पिछली  गैर भाजपा सरकारों  में मुस्लिम वोट बैंक के लालच में वक्फ के अवैध कब्जों वाली संपत्तियों को छीनने का साहस ही नहीं हुआ । लिहाजा सार्वजनिक भूमि को वक्फ का बताकर अवैध कब्जे होते रहे। वक्फ संशोधन का विरोध करने के साथ ही मुस्लिम समुदाय द्वारा देश भर में हिंदुओं के धर्मस्थल के अलावा सरकारी इमारतों तक को वक्फ संपत्ति बताकर खाली करने का दबाव बनाया जा रहा है। इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हिन्दू  समाज में देखने मिल रही है। इसी के चलते उ.प्र की योगी सरकार कौशाम्बी प्रकरण को आधार बनाकर पूरे राज्य में वक्फ के कब्जे वाली संपत्तियों की वैधानिकता जाँचने  जा रही है। मुस्लिम समाज इससे भन्नाया हुआ है। उसकी हमदर्द सामजवादी पार्टी तथा कांग्रेस के पेट में भी मरोड़ होने लगा है क्योंकि वक्फ संशोधन के पक्ष में वे हिन्दू भी खड़े नजर आ रहे हैं जिन्होंने गत  लोकसभा चुनाव में भाजपा के विरोध में मतदान किया था। दरअसल जबसे हिंदुओं  के संज्ञान में ये बात आई कि वक्फ जिस संपत्ति पर अपना दावा कर दे वह बिना किसी लागलपेट के उसकी हो जायेगी, तबसे उनके बीच भय व्याप्त है। विशेष रूप  से मंदिरों जैसे धार्मिक स्थलों पर वक्फ के दावों की आशंका चिंता बढ़ा रही है। लेकिन कुछ दिनों पहले मुस्लिम समाज के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के भाषण का एक वीडियो तेजी से प्रसारित हुआ जिसमें वे मुसलमानों को वक्फ संशोधन का विरोध करने हेतु प्रेरित करने के साथ ही ये भी बोल गए कि उक्त विधेयक पारित होने पर वक्फ के हाथ से बड़े पैमाने पर संपत्तियाँ निकल जाएंगी। इसके बाद उन्होंने वह राज खोल दिया जिसके कारण मुस्लिम समाज इस संशोधन से भड़का हुआ है। ओवैसी ने खुले मंच से मुसलमानों को आगाह किया कि उ.प्र  में वक्फ के आधिपत्य में जो 1.21 लाख संपत्तियाँ हैं उनमें से 1.12 लाख के वैधानिक दस्तावेज नहीं हैं। इसलिए वक्फ संशोधन  कानून में बदला तो बिना दस्तावेज वाली संपत्तियाँ उसके हाथ से छिन जाएंगी। ओवैसी के इस बयान ने वक्फ के नाम पर देश भर में किये गए अवैध कब्जों की पोल खोलकर रख दी। लेकिन उ.प्र के कौशाम्बी में ग्राम सभा की 96 बीघा भूमि वक्फ से छीने जाने के बाद से योगी सरकार जिस तरह वक्फ के फर्जीवाड़े का पर्दाफाश करने सक्रिय हुई  वह अन्य राज्यों के लिए एक सबक है। यदि भाजपा और उसके सहयोगियों द्वारा शासित राज्यों में भी वक्फ द्वारा बिना वैधानिक दस्तावेजों के कब्जा की गई जमीनों एवं अन्य संपत्तियों को वापस लेने का अभियान छेड़ दिया गया तब गैर भाजपा राज्य सरकारें भी वैसा करने बाध्य होंगी। इस प्रकार संदर्भित संशोधन पारित होने के पहले ही वक्फ के कर्ताधर्ताओं में हड़कंप मचा हुआ है। इस बारे में ये बात भी ध्यान देने वाली है कि भले ही मौलवियों के दबाव में मुस्लिम समुदाय इस संशोधन का विरोध कर रहा हो किंतु एक वर्ग ऐसा है जो वक्फ संपत्ति पर समाज के कुछ  लोगों द्वारा कब्जा कर उसका लाभ लेने से नाराज हैं। ये आरोप भी लग रहा है कि वक्फ बोर्ड के कब्जे वाली संपत्तियों का समुचित रखरखाव न होने से उनसे अपेक्षित आय नहीं होती और समाज के जरूरतमंद लोगों के कल्याण के कार्यक्रम अधर में अटक जाते हैं। ये चर्चा भी  है कि वक्फ की अनेक संपत्तियों से होने वाली कमाई कुछ प्रभावशाली लोगों की जेब में चली जाती है। इस तरह की शिकायतें हिंदुओं सहित अन्य धर्मों के न्यासों में भी हैं किंतु वक्फ के पास सेना और रेलवे के बाद सबसे ज्यादा जमीनें हैं। इसलिए उसमें होने वाले घोटाले भी बड़े ही होंगे। ओवैसी ने तो केवल उ.प्र का खुलासा किया है। बाकी  राज्यों में  भी यही स्थिति हो तो अचरज नहीं होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 23 September 2024

रेल पटरियों पर अवरोध जनता को भयभीत करने का षडयंत्र


कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी, दिल्ली में किसानों का धरना, जेएनयू, जामिया मिलिया, जादवपुर, उस्मानिया और अलीगढ़ मुस्लिम वि.वि में  छात्र आंदोलन, दिल्ली के शाहीन बाग का धरना आदि को व्यवस्था विरोधी प्रयोग कहा गया। उनका एकमात्र निहित उद्देश्य केंद्र में बैठी मोदी सरकार को अस्थिर करना था। किसान आंदोलन की आड़ लेकर पंजाब में नये सिरे से सिर उठाने वाला खालिस्तानी आंदोलन उसकी अगली पायदान बना। इसे कैनेडा, अमेरिका और ब्रिटेन में बैठे अलगाववादी संगठनों का समर्थन मिलना अपने आप में काफी कुछ कह देता है। नागरिकता संशोधन जैसे कानूनों का भी जिस प्रकार संगठित विरोध हुआ वह किसी सुनियोजित षडयंत्र का हिस्सा ही था। उसी की पुनरावृत्ति वक्फ संशोधन को लेकर सामने आई है। देश में एक वर्ग ऐसा है जो राष्ट्रवादी ताकतों को मजबूत होते देख जल - भुन रहा है। यहाँ तक कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार और भारत विरोधी भावनाओं के भड़कने से भी ये तबका मन ही मन प्रसन्न है। लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से कुछ लोग इस बात का प्रचार करने में जुटे हुए हैं कि हिंदुत्व भारतीय राजनीति में प्रासंगिक हो गया है और जनता पर उनका प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। इस अवधारणा को मीडिया का एक संगठित समूह जमकर हवा दे रहा है। यही वजह है कि श्री मोदी से परेशान  राष्ट्रविरोधी शक्तियों का हौसला बुलंद हो रहा है। जिसका ताजा प्रमाण है रेल पटरियों पर पत्थर, लोहे की सलाखें और गैस के सिलेंडर रखकर गाड़ियों को दुर्घटनाग्रस्त करने की कोशिशों में अचानक वृद्धि होना। गत दिवस म.प्र में सेना से जुड़ी एक रेलगाड़ी की पटरी पर विस्फोटक रखे पाए गए। पहली बार जब ऐसी खबर आई तब लगा कि ये किसी सिरफिरे  की करतूत है किंतु बीते कुछ दिनों में जिस तेजी से रेल पटरियों पर दुर्घटना करवाने वाला सामान रखा जा रहा है उसके बाद अब ये बात निःसंकोच कही जा सकती है कि इसके पीछे देश विरोधी किसी बड़ी कार्ययोजना का हाथ है। पूरे देश में फैली हजारों कि. मी लंबी रेल पटरियों की कदम - कदम पर निगरानी संभव नहीं है। इसी का लाभ विघटनकारी ताकतें उठा रही हैं। उनका उद्देश्य आम जनता के मन में भय उत्पन्न करने के साथ सरकार के बारे में अविश्वास उत्पन्न करना ही है। ये बात सर्वविदित है कि रेल भारत में आवागमन का सबसे सस्ता, सुलभ और सुरक्षित साधन है। प्रतिदिन करोड़ों यात्री इसके जरिये सफ़र करते हैं। समय - समय पर दुर्घटनाएं होने के बाद भी रेल यात्रा की उपयोगिता और आवश्यकता से कोई असहमत नहीं हो सकता। एक बड़े वर्ग के लिए तो इसका उपयोग करना मजबूरी भी है। इसी तरह मालगाड़ी सामान ढोने के लिए सबसे आसान माध्यम है। रेलवे को यात्री गाड़ियों के परिचालन से होने वाली आर्थिक क्षति की भरपाई माल ढुलाई के व्यवसाय से ही होती है। निजी क्षेत्र के अलावा सेना के सामान की आवाजाही के लिए मालगाड़ी सबसे अधिक उपयोग में आती है। ये देखते हुए रेलवे का निर्बाध परिचालन सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में है। इसलिए उसमें अवरोध उत्पन्न करने का श्रंखलाबद्ध प्रयास हर दृष्टि से देश विरोधी गतिविधि कहा जाएगा। इससे जुड़े कुछ लोग पकड़े जाने के बाद भी अब तक इसे संचालित करने वाले गिरोह का पर्दाफाश नहीं हो सका। लेकिन सतही तौर पर ये प्रतीत होता है कि कश्मीर घाटी में युवकों को पैसे देकर सुरक्षा बलों पर पत्थर फिकवाने जैसी योजना रेल पटरियों पर अवरोध उत्पन्न करने की हरकत से मेल खाती है। इसे अंजाम देने वाली ताकतें पर्दे के पीछे रहकर नौजवानों को कुछ रुपयों का लालच देकर लोगों की जान से खेलने के साथ ही राष्ट्रीय संपत्ति को क्षति पहुँचाने का षडयंत्र रच रही हैं। ये बहुत ही गंभीर स्थिति है जिससे निपटने के लिए बेहद सतर्कता रखनी चाहिए। इसे कुछ खुराफाती दिमागों की उपज कहकर उपेक्षित करना बड़ी भूल होगी। इसके जरिये देश विरोधी तत्व जनता को भयभीत करने के साथ ही सरकार को कमजोर साबित करने का जो कुचक्र रच रहे हैं उसके पीछे वही सब है जो लोकसभा चुनाव के पहले देश ने देखा और उसके बाद वही हरकतें रूप बदलकर सामने आ रही हैं। ये भी गौरतलब है कि जब भी कहीं चुनाव होते हैं तब - तब देश को अस्थिर करने वाले पूरी ताकत से सक्रिय हो जाते हैं। वर्तमान में भी कुछ राज्यों के चुनाव होने से उनकी हरकतों में वृद्धि हुई है। सरकार तो अपने स्तर पर सक्रिय है ही किंतु जनता को भी सतर्क रहना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 September 2024

वक्फ संशोधन पर मौलवियों की तुलना में हिन्दू धर्माचार्य उदासीन रहे

कराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी अपने बयानों के लिए चर्चित रहते हैं। राम  मंदिर  सहित अनेक मुद्दों पर वे मोदी सरकार की कड़ी आलोचना कर चुके हैं। हालांकि अपने को प्रधानमंत्री का शुभचिंतक बताते हुए दावा करते हैं कि वे जो आलोचना करते हैं वह उनके  भले के लिए होती है। गत दिवस उन्होंने मांग की कि हिंदुओं के धर्मस्थलों का प्रबंधन धर्मगुरुओं को सौंपा जाना चाहिए। अन्य शंकराचार्यों से मिलकर इस बारे में कानूनी कारवाई के संकेत भी उन्होंने दिये। तिरुपति देवस्थानम के लड्डुओं में पशु चर्बी युक्त घी का उपयोग होने के खुलासे पर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए शंकराचार्य जी ने कहा कि अब बद्रीनाथ मंदिर में भी सीधी भरती किये जाने से इस तरह की गड़बड़ियों की आशंका बढ़ रही है। आज़ादी के 77 वर्ष बाद भी हिंदुओं के प्रमुख धर्मस्थलों का प्रशासनिक नियंत्रण सरकारी नौकरशाहों के हाथ में होने पर उन्होंने रोष जताया। हिन्दू हितों के संरक्षण में शंकराचायों की भूमिका आलोचनाओं के घेरे में रहती है। सोशल मीडिया पर आने वाली प्रतिक्रियाएं इसका प्रमाण हैं। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों के विरुद्ध उनकी उदासीनता तीखी आलोचनाओं का शिकार हुई। हिंदुओं में इस बात पर काफी गुस्सा है कि फिलिस्तीन में रहने वाले मुसलमानों के पक्ष में तो मुस्लिम धर्मगुरुओं के बयान खुलकर आते हैं। असदुद्दीन ओवैसी नामक सांसद ने तो लोकसभा में सदस्यता की शपथ लेते समय फिलिस्तीन समर्थक नारा लगा दिया। हाल ही में मुस्लिम त्योहारों पर निकले जुलूसों में भी फिलिस्तीन के प्रति हमदर्दी जताते बैनर - पोस्टर देखे गए। उसकी तुलना में हमारे शंकराचार्य हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों के बारे में उतने मुखर नहीं हैं , यह अवधारणा दिन ब दिन मजबूत होती जा रही है। ये भी सुनने में आता है कि बड़े - बड़े धर्मगुरु और कथावाचक आम हिंदू से कटते जा रहे हैं और धन तथा ग्लैमर के प्रति उनका झुकाव बढ़ता देखा जा सकता है। कुछ समय  पूर्व देश के एक प्रसिद्ध उद्योगपति के पुत्र के विवाह में दो शंकराचार्यों सहित आध्यात्मिक जगत की ज्यादातर बड़ी हस्तियां मौजूद थीं। एक कथाकार तो  आस्ट्रेलिया में प्रवचन के बीच से आये क्योंकि मेजबान ने उन्हें लाने के लिए विशेष विमान भेजा। हालांकि उक्त विवाह में राजनीति, उद्योग, मनोरंजन, और खेल जगत के हजारों नामी - गिरामी लोग शरीक हुए किन्तु शंकराचार्य सदृश विभूतियों की  उपस्थिति पर समाज में आम प्रतिक्रिया अच्छी नहीं रही। इसका कारण ये माना जा सकता है कि वे साधारण जन के लिए सहज उपलब्ध नहीं हैं।  कथावाचक और प्रवचनकर्ता तो  फिल्मी सितारों की तरह महंगे हो गए हैं। वे श्रृद्धालुओं को तो त्याग और सादगी का उपदेश देते हैं किंतु खुद के लिए पाँच सितारा सुविधाएं और मोटी राशि मांगते हैं। धर्म के नाम पर  इसी  व्यापार के कारण धर्मगुरुओं के प्रति सम्मान में कमी आई है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने हिंदुओं के प्रमुख धर्मस्थलों का प्रबंध धर्मगुरुओं को सौंपने का जो मुद्दा छेड़ा वह सामयिक और आवश्यक है। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आजादी के बाद केवल हिंदुओं के धर्मिक और निजी मामलों में सरकारी दखल बढ़ा। देश में मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी समुदाय के जितने भी धार्मिक स्थल हैं उनमें से कितनों का प्रशासनिक नियंत्रण शासन के हाथों में है ये शोध का विषय है ।  जबकि सनातन से जुड़े मामलों में स्थिति पूरी तरह से उलटी है। हालांकि इसके लिए कुछ हद तक हिंदुओं के धर्मगुरुओं को भी कठघरे में खड़ा किया जा सकता है जो अपनी श्रेष्ठता के अहंकार में अपने समकक्ष को तुच्छ समझते हैं। दशकों पहले दक्षिण के एक शंकराचार्य को तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने निजी खुन्नस के चलते जेल में डाल दिया। अन्य किसी धर्म की दिग्गज हस्ती के साथ वह हुआ होता तो देश भर में बवाल हो जाता। लेकिन शेष शंकराचार्य गण केवल निंदा करते रहे। एकता के इसी अभाव के कारण सनातन धर्म के प्रति ज्यादातर राजनीतिक जमात अपेक्षा भाव रखती है। यदि किसी मुद्दे पर सभी प्रमुख धर्माचार्य एक साथ आवाज बुलंद करें तो सत्ता में बैठे लोगों को सोचने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। उनसे किसी राजनीतिक दल के समर्थन अथवा विरोध की अपेक्षा भले न की जाए किंतु वक्फ बोर्ड संशोधन के विरोध में  मुस्लिम मुल्ला - मौलवी जिस तरह खुलकर मैदान में उतरे उसकी तुलना में शंकराचार्य सहित अनगिनत महामंडलेश्वरों ने क्या किया, ये बड़ा सवाल है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 20 September 2024

तिरुपति के लड्डू ही नहीं मिलावट किसी भी खाद्य पदार्थ में अपराध



देश के सर्वाधिक प्रसिद्ध  धर्मस्थलों में  आंध्र प्रदेश स्थित तिरुपति देवस्थानम अग्रणी है। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर देश का सबसे संपन्न धार्मिक संस्थान है। इसकी एक और प्रसिद्धि है इसमें प्रसाद के तौर पर मिलने वाला लड्डू। इसकी कीमत और आकार घटने - बढ़ने की चर्चा संसद तक में होती है। दुनिया भर से सनातन धर्म के अनुयायी यहाँ दर्शनों हेतु आते हैं। चढ़ोत्री में केवल नगदी ही नहीं वरन सोने - चाँदी और जवाहरात भी होते हैं। तिरूपति देवस्थानम द्वारा अनेक जनकल्याणकारी प्रकल्पों का भी संचालन होता है। बड़े - बड़े उद्योगपति , फिल्मी सितारे और राजनेता तिरुपति के प्रति आस्था रखते हैं। लेकिन इन दिनों इसकी चर्चा जिस वजह से है उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रा बाबू नायडू ने आरोप लगाया है कि तिरुपति देवस्थानम में प्रसाद का जो लड्डू मिलता है उसमें मिलावटी घी का उपयोग किया जाता रहा। यहाँ तक तो फिर भी गनीमत थी लेकिन ये जानकर  करोड़ों भक्तों को धक्का लगा कि मिलावटी घी में मछली के तेल के अलावा गाय और सुअर जैसे पशुओं की चर्बी तक थी। शिकायत आते ही तिरुपति प्रशासन द्वारा घी की जाँच हेतु उसके नमूनों को प्रयोगशाला में भेजा गया जिनकी रिपोर्ट में मिलावट की पुष्टि हो गई। हालांकि इस रिपोर्ट की प्रामाणिकता पर संदेह किया जा रहा है किंतु मामला तब ज्यादा विवादित हो गया जब राज्य के मुख्यमंत्री श्री नायडू ने पिछली सरकार के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी  को इसके लिए कसूरवार ठहराते हुए आरोप लगा दिया कि उनके शासनकाल में  तिरुपति में  पशुओं की चर्बीयुक्त घी से बने लड्डू  बनवाये गए। ये आरोप भी लगाया गया कि श्री रेड्डी ने हिंदुओं की आस्था के  प्रमुख केंद्र  के प्रशासनिक अधिकारी के पद पर ईसाई धर्मावलंबी को नियुक्त किया। उल्लेखनीय है जगन मोहन भी ईसाई हैं। श्री नायडू ने आश्वस्त किया कि अब तिरुपति में बनाये जा रहे प्रसाद के लड्डुओं के लिए गैर मिलावटी शुद्ध घी उपलब्ध करवाया जा रहा है। मामला चूंकि धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है इसलिये उसकी चर्चा सर्वत्र हो गई। आलोचना और चिंता युक्त प्रतिक्रियाएं भी देखने मिल रही हैं। सोशल मीडिया में तो ऐसी खबरों पर सबसे अधिक सक्रियता नजर आती है। हालांकि श्री नायडू द्वारा लगाए आरोपों  की सत्यता पर संदेह जताने वाले भी कम नहीं हैं क्योंकि वे राजनीतिक व्यक्ति हैं और कठघरे में खड़ा किया जा रहा नेता उनका प्रतिद्वंदी।  श्री रेड्डी जब मुख्यमंत्री थे तब चंद्रा बाबू को जेल जाना पड़ा था। ऐसे में यदि वे प्रतिशोधवश  उनको घेरने का दाँव चल रहे हों तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन इस प्रकरण को केवल तिरुपति के लड्डुओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता  क्योंकि मिलावट हमारे देश का चरित्र बन गई है। किसी धर्मस्थल में बनने वाले प्रसाद की शुद्धता और पवित्रता बरकरार रखना नितांत आवश्यक है किंतु देश में रहने वाले करोड़ों नागरिकों को  शुद्ध खाद्य सामग्री उपलब्ध होना भी उतना ही जरूरी है। उस दृष्टि से ये कहना गलत न होगा कि सरकार द्वारा मिलावट रोकने के लिए की गई व्यवस्था पूरी तरह विफल और बिकी हुई है। तिरुपति की खबर आते ही सोशल मीडिया पर घी की कीमत और गुणवत्ता को लेकर जो प्रतिक्रियाएं आईं उनमें से अधिकांश में ये स्वीकार किया गया कि जिस कीमत पर विभिन्न ब्रांड का घी बाजार में उपलब्ध है उतने में शुद्धता संभव नहीं। इसी तरह खाद्य तेल, मसाले आदि में भी मिलावट किसी से छिपी नहीं है। उन्हें लंबे समय तक खराब होने से बचाने के लिए प्रयुक्त रासायनिक चीजें भी  स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। डेरियों से आने वाले खुले दूध की शुद्धता तो सदैव संदिग्ध रही है। भैंसों को जो इंजेक्शन लगाए जाते हैं उनका दुष्प्रभाव भी उपभोक्ता पर पड़ता है। ये कहना गलत नहीं है कि  चाहे स्थानीय हो या बड़े ब्रांड द्वारा बनाये गए खाद्य उत्पाद , सभी में मिलावट या नुकसानदेह चीजों का उपयोग हो रहा है। उपभोक्ता आंदोलन भी कुछ एन.जी.ओ के प्रचार तक सिमटकर रह गया है। सरकार के जिस विभाग पर इस समस्या को दूर करने का दायित्व है उसकी कार्यप्रणाली में ही बेईमानी मिली हुई है तो फिर जनता के स्वास्थ्य  से खिलवाड़ को कैसे रोका जा सकेगा, ये गंभीर प्रश्न है। मिलावट के लिए कठोर दंड का प्रावधान है लेकिन जिस बड़े पैमाने पर उसका कारोबार चल रहा है उसे देखते हुए दंडित किये जाने वालों की संख्या नगण्य है। हमारे देश में छोटी - छोटी बातों पर चका जाम कर दिया जाता है। धरना और घेराव भी आम बात है। लेकिन मिलावट के विरुद्ध कोई जनांदोलन शायद ही कभी सुनने में आया हो। किसी एक मामले के उजागर होने पर कुछ दिन चर्चा होने के बाद फिर सब भुला दिया जाता है। तिरूपति से उठे प्रकरण में चूंकि राजनेता शामिल हैं इसलिए हो सकता है बात किसी परिणाम तक पहुंचे वरना तो मिलावट को रोक पाने के तमाम प्रयासों की स्थिति वैसी ही है जैसी वाराणसी में गंगा शुद्धि हेतु चलाये गए अभियान की। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 19 September 2024

लोकसभा - विधानसभा के एक साथ चुनाव लोकतंत्र और देश दोनों के हित में



गत दिवस केंद्रीय मंत्री परिषद ने एक देश एक चुनाव  के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।  इसे संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किये जाने की संभावना है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा विभिन्न  दलों से राय लेने के उपरांत देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ करवाने  के साथ ही उसके 100 दिनों के भीतर स्थानीय निकायों और  पंचायत चुनाव कराने की अनुशंसा की थी। 32  दल इसके समर्थन में हैं वहीं 15 को ये मंजूर नहीं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के अनुसार ऐसा करना संविधान और संघवाद के विरुद्ध होगा । उल्लेखनीय है कि  उक्त फैसले को अमल में लाने के लिए संविधान संशोधन करना होगा जो  सत्ताधारी गठबंधन के लिए आसान नहीं है। ऐसे में  संभव है संसद में विधेयक  पेश करने के बाद उसे वक़्फ़ बोर्ड संशोधन की तरह से ही जेपीसी बनाकर उसके विचारार्थ भेज दिया जाए। लेकिन यह प्रस्ताव राष्ट्रीय विमर्श का विषय अवश्य बनेगा।  संसद द्वारा इसे पारित किये जाने के बाद भी इस व्यवस्था को लागू करने के लिए कुछ  विधानसभाओं का कार्यकाल घटाना पड़ेगा वहीं कुछ का बढ़ाया जायेगा। ईवीएम मशीनों के साथ ही चुनाव कार्य हेतु कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि बड़ी चुनौती होगी। सुरक्षा बलों की तैनाती भी समस्या बनेगी।  कुल मिलाकर इतने बड़े और  विविधता भरे देश में एक साथ चुनाव  सरकार के साथ ही राजनीतिक दलों के लिए भी बेहद कठिन होगा।  लेकिन ऐसा करना चूंकि  देश और लोकतंत्र दोनों के हित में है अतः इसको स्वीकार करना हर दृष्टि से लाभदायी है। श्री खरगे भले ही एक देश एक चुनाव की बात को संविधान और संघवाद के विरुद्ध बताएं किंतु ऐसा कहते समय वे भूल गए कि 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ ही होते थे। 1971 में इंदिरा गाँधी ने लोकसभा समय पूर्व भंग करवाकर मध्यावधि चुनाव करवाया और तभी से चुनाव की समय सारिणी  गड़बड़ा गई। दरअसल जबसे लोकसभा और विधानसभा चुनाव  अलग - अलग होने लगे तभी से संघवाद कमजोर होता दिखा जिसमें क्षेत्रीय दलों ने और योगदान दिया। इसी का  दुष्परिणाम है कि विरोधी विचारधारा वाली राज्य सरकार  केंद्र की सत्ता को चुनौती देने का दुस्साहस करती है। इसके पीछे चुनाव के दौरान उत्पन्न कटुता ही  है।  केंद्र और राज्यों में अलग - अलग दलों की सरकारें पहले भी रही हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों में तो स्थानीय छोटे - छोटे दल शुरू से ही सत्ता के समीकरणों को प्रभावित करते आये हैं। तमिलनाडु में 1967 से क्षेत्रीय दलों का आधिपत्य  बना हुआ है। प. बंगाल में 1977 के बाद  पहले वामपंथी सरकार रही और उसके उपरांत तृणमूल नामक क्षेत्रीय दल की सत्ता है। जिन राज्यों के चुनाव लोकसभा के साथ होते हैं उनमें क्षेत्रीयता की भावना उतनी तेजी से नहीं उभरती। कई बार ऐसा भी हुआ कि एक साथ हुए चुनाव में लोकसभा और विधानसभा में अलग दल को मतदाताओं का समर्थन मिला। लेकिन जब अकेले राज्य के चुनाव होते हैं तो संघवाद को ठेंगा दिखाते हुए केवल स्थानीय मुद्दों पर जोर दिया जाता है। वर्तमान  में केंद्र और राज्यों के बीच रिश्ते जिस हद तक बिगड़े उसमें अलग -  अलग चुनाव  सबसे बड़ा कारण है। उदाहरण के लिए उड़ीसा के विधानसभा चुनाव लोकसभा के साथ होते रहे और दोनों में अलग - अलग पार्टियों के  जीतने के बाद भी केंद्र और राज्य  के रिश्ते मधुर रहे। लेकिन अन्य राज्यों के साथ ऐसा नहीं है। सबसे बड़ी बात पूरे पाँच वर्ष कहीं न कहीं चुनावी कार्यक्रम होने से देश नीतिगत अस्थिरता में फंस जाता है।  केंद्र सरकार को कोई बड़ा निर्णय लेने से पहले चुनावी समीकरणों की चिंता करनी पडती है। क्षेत्रीय दल भी अपनी जीत के लिए ऐसे वायदे कर देते हैं जो  राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध होते हैं। केंद्र  द्वारा लागू की गई अनेक नीतियों को राजनीतिक वैमनस्य के चलते राज्यों द्वारा उपेक्षित किया जाता है। चुनावी खर्च चूंकि चंदे से होता है इसलिए राजनीतिक दल चंदा देने वालों को उपकृत करने बाध्य होते हैं। इलेक्टोरल बॉण्ड के जरिये कांग्रेस से अधिक चंदा कुछ क्षेत्रीय पार्टियों ने बटोरा। यदि पूरे देश में एक साथ लोकसभा - विधानसभा चुनाव की व्यवस्था हो सके तो राजनीतिक स्थायित्व कायम हो सकेगा। साथ ही भ्रष्टाचार पर भी काफी हद तक रोक लगाना संभव होगा। सरकार का जो खर्च चुनाव व्यवस्था पर होता है उसमें बचत के अलावा प्रशासनिक मशीनरी की तैनाती से होने वाले कामकाज के  नुकसान को भी रोका जा सकेगा। कुल मिलाकर केंद्रीय मंत्री परिषद ने  जिस प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की वह लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने के साथ ही निरंतर चलने वाली सियासी अखाड़ेबाजी पर भी विराम लगायेगा। देशहित इसी में है कि इसका  दलगत मतभेदों से ऊपर उठकर समर्थन किया जाए जिससे चुनाव प्रणाली में आम जनता का विश्वास और बढ़े। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 18 September 2024

कामचलाऊ मुख्यमंत्री की छवि से निकलना आतिशी के लिए बड़ी चुनौती




आखिरकार दिल्ली के नये मुख्यमंत्री का नाम सामने आ ही गया। अरविंद केजरीवाल के त्यागपत्र के बाद  दिल्ली सरकार में मंत्री रहीं आतिशी उनकी उत्तराधिकारी बनीं। हालांकि आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में जो लोग शामिल हैं उन्हें दरकिनार करते हुए आतिशी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाना चौंकाने वाला निर्णय माना जा रहा है किंतु पार्टी के सर्वोच्च नेता अरविंद केजरीवाल जिस तरह की राजनीति के लिए जाने जाते हैं उसमें ऐसा होना अस्वाभविक भी नहीं है। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के जेल जाने के बाद आतिशी ने दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी दोनों का काम जिस कुशलता से संभाला उसे उनकी पदोन्नति का कारण बताया जा रहा है । अब तक सत्ता और संगठन के खेल में वे काफी अनुभवी भी हो चुकी हैं। सबसे बड़ी बात है उनका स्वयंसेवी संगठन  (एन.जी.ओ) में कार्य करने का अनुभव जो आम आदमी पार्टी की कार्यशैली का आधार है। श्री केजरीवाल के अलावा पार्टी के कुछ अन्य बड़े नेता भी इन्हीं संगठनों से होकर राजनीति से जुड़े। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन  में भी ज्यादातर वही गैर राजनीतिक लोग थे जिनकी रुचि सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने की रही। आतिशी ने भी ऑक्सफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित वि.वि से शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत म.प्र में एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया।  कहा जा रहा है उनके मुख्यमंत्री बनने से  कम से कम दिल्ली विधानसभा चुनाव में तो आधी आबादी इस कदम से आम आदमी पार्टी के पक्ष में झुक ही जायेगी। लेकिन  उनमें सबसे बड़ी कमी ये है कि वे कठपुतली बनी रहकर काम करेंगी । गत दिवस उन्होंने  स्वीकार  भी किया  कि भले ही वे इस कुर्सी पर बैठ जाएं किंतु  मुख्यमंत्री तो श्री केजरीवाल ही रहेंगे। ये बात पूरी तरह सही है कि पार्टी में अनेक नेता ऐसे हैं जो मुख्यमंत्री बनाये जाने योग्य थे किंतु श्री केजरीवाल ने बहुत सोच - समझकर गोटी चली। महिला मुख्यमंत्री के तौर पर वे अपनी पत्नी सुनीता केजरीवाल को भी चुन सकते थे। उनकी गिरफ्तारी के बाद वे जिस तरह सक्रिय हुईं उससे दिल्ली में भी राबड़ी देवी की पुनरावृत्ति होने की चर्चा आम थी किंतु श्री केजरीवाल को बिहार और दिल्ली के सामाजिक ढांचे का अंतर पता है। इसलिए उन्होंने वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए आतिशी के सिर पर ताज रखा , जिनका रिमोट कंट्रोल पूरी तरह से उनके पास रहेगा। एक महिला मुख्यमंत्री के रूप में वे जयललिता, मायावती, और ममता बनर्जी की बराबरी कैसे कर सकेंगी , ये बड़ा सवाल है। ऐसे में श्री केजरीवाल का ये आशावाद सफल नहीं हो सकेगा कि आतिशी के जरिये वे देश भर की महिला मतदाताओं को लुभा सकेंगे। इसका एक कारण ये भी है कि उन्होंने विधानसभा चुनाव के बाद दोबारा दिल्ली की गद्दी संभालने की बात कही जिसका आतिशी ने भी समर्थन किया। इस प्रकार  बतौर मुख्यमंत्री उनकी छवि  कामचलाऊ की ही रहेगी। वैसे भी  श्री केजरीवाल को  मुख्यमंत्री पद जिन हालातों में  छोड़ना पड़ा उनमें त्याग जैसे किसी भाव की बात सोचना निरर्थक है। जमानत पर रिहा होने के बाद उन्होंने गैर भाजपा मुख्यमंत्रियों तक को ये समझाइश दे डाली कि यदि वे गिरफ्तार होते हैं तब त्यागपत्र न दें। उनका ये बयान ही काफी कुछ कह जाता है। सही बात ये है कि मुख्यमंत्री रहते हुए भी उससे जुड़े जरूरी कार्य नहीं कर पाने के कारण  संवैधानिक संकट बढ़ रहा था। उन्हें डर था कि ऐसे में विधानसभा भंग की जा सकती है और वैसा होने पर राजनीतिक समीकरण उलट - पुलट सकते सकते हैं। इसीलिए जेल से बाहर आते ही उन्होंने पद छोड़ने की घोषणा कर डाली और बिना देर किये आतिशी को उत्तराधिकारी बना दिया। उनका ये सोचना जल्दबाजी होगी  कि उनके त्यागपत्र देने  से हरियाणा विधानसभा के चुनाव में आम आदमी पार्टी पंजाब जैसा करिश्मा दिखाने में सफल हो जायेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में वे वोट कटवा की भूमिका निभा सकते हैं किंतु सत्ता की दौड़ में नहीं हैं। लेकिन कहीं कांग्रेस ने हरियाणा जीत लिया तब वह दिल्ली में आम आदमी पार्टी के वोटों में सेंध लगाने में जरूर सक्षम हो जाएगी।  आने वाले कुछ महीने देश की राजनीति में बड़ी उथलपुथल के रहेंगे जिनमें ये भी तय हो जाएगा कि आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय विकल्प बनने की कोई संभावना है या नहीं ? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 17 September 2024

हिंदुत्व के कमजोर होने का दुष्प्रचार देश विरोधी ताकतों का हौसला बढ़ा रहा


लोकसभा चुनाव के बाद देश में ऐसा माहौल बनाया  जा रहा  है कि हिंदुत्व अब राजनीति का केंद्र बिंदु नहीं रहा। इसके उलट  समूचा राजनीतिक विमर्श  जाति और अल्पसंख्यकों पर सीमित हो गया है। राहुल गाँधी तो जातिगत जनगणना का मुद्दा देश की सीमा से निकालकर अमेरिका तक ले गए । उ.प्र में भाजपा की सीटें कम होने को इस तरह पेश किया जा  रहा है मानो केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो गया। फ़ैज़ाबाद लोकसभा सीट पर भाजपा की पराजय पर राम मंदिर तक का मज़ाक बनाया जा रहा है।  इस प्रचार का असर मुस्लिम समुदाय पर सबसे ज्यादा देखा जा सकता है जिसको ये लगने लगा है कि  जैसा  श्री गाँधी बोलते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहद कमजोर हो गए हैं और उनकी सरकार जल्द गिर जायेगी। यद्यपि  राजनेता इस तरह की शिगूफेबाजी करते ही रहते हैं । भाजपा भी अवसर मिलते ही श्री गाँधी को कठघरे में खड़ा करने का कोई अवसर नहीं गंवाती किंतु लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने से उत्साहित होकर जिस तरह की बयानबाजी वे कर रहे हैं उससे कुछ लोगों को ये लगने लगा है मानो उन्हें कुछ भी करने की स्वच्छंदता मिल गई हो। रेल की पटरियों पर पत्थर और लोहे की सलाखें रखने जैसी हरकतें जिस तेजी से बढ़ीं वे उसी स्वच्छंदता का परिचायक हैं। वक्फ बोर्ड  संशोधन को लेकर भी मुस्लिम समुदाय के मध्य बेहद भड़काऊ गतिविधियां देखने मिल रही हैं। जम्मू कश्मीर में धारा 370 की वापसी की डींग विधानसभा चुनाव में हाँकी जा रही है जबकि उस बारे में कुछ भी करना केंद्र के अधिकार क्षेत्र में है। राम मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट फैसले के बाद भी बाबरी मस्जिद को दोबारा बनाने जैसी बातें उछालकर देश का माहौल खराब करने का कुचक्र रचा जा रहा है। सबसे अधिक चिंता का विषय है हिन्दू धर्म स्थलों और धार्मिक आयोजनों पर पथराव और हमले होना। राजस्थान और गुजरात  से इसकी शुरुआत होने के बाद म.प्र में मुस्लिम समुदाय ने थाने पर हमला कर दिया। जब मुख्य अपराधी के अवैध निर्माण पर बुलडोजर चला तो यहाँ से लेकर दिल्ली तक आसमान सिर पर उठा लिया गया। वरिष्ट कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और जीतू पटवारी थाने पर हमले की निंदा करने के बजाय आरोपी के पक्ष में खड़े हो गए।  इस तरह की राजनीतिक शैली का ही परिणाम है कि गत दिवस म.प्र के तीन शहरों में मिलादुन्नबी जुलूस में शामिल लोगों द्वारा हिन्दू धर्मस्थलों पर पथराव के अलावा आपत्तिजनक गतिविधियां की गईं। लेकिन मुस्लिम तुष्टीकरण की रोटी खाने वाले नेता मुँह में दही जमाये बैठे हैं। इस प्रकार की घटनाओं को श्री गाँधी जैसे विपक्षी नेताओं का दुष्प्रचार ही प्रोत्साहन देता है  ।  आज मोदी सरकार ने अपने तीसरे कार्यकाल के 100 दिन पूरे कर लिए। प्रधानमंत्री इस दौरान पूरी तरह सक्रिय नजर आये। अपनी विकास संबंधी कार्ययोजना को वे जारी रखे हुए हैं। विदेशी मोर्चे पर भी उनका प्रभावशाली प्रदर्शन जारी है। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में ठोस कदम उठाने से भी वे पीछे नहीं हट रहे। सहयोगी दलों के साथ भाजपा का अच्छा समन्वय होने से केंद्र सरकार के स्थायित्व पर लगाई गई अटकलें हवा - हवाई साबित हुईं जो विपक्ष को विचलित कर रही हैं। अमेरिका यात्रा में श्री गाँधी की गैर जिम्मेदार बयानबाजी से ये लगने लगा है कि लोकसभा की 99 सीटें जीतकर कांग्रेस जिस प्रकार मदमस्त हुई थी  वह नशा उतरने लगा है। लेकिन समाज के एक वर्ग विशेष में जो ज़हर चुनाव के दौरान और बाद में बोया उसके चलते देश को कमजोर करने वाली ताकतें सिर उठाने से बाज नहीं आ रहीं। म.प्र के तीन शहरों  में मिलादुन्नबी  जुलूस के दौरान जिस तरह का उपद्रव मुस्लिम समुदाय की ओर से हुआ  उसकी प्रतिक्रिया भी यदि वैसी ही हो जाती तब पूरा प्रदेश अशांत हो जाता। इसलिए कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं को चाहिए कि लोकसभा चुनाव के परिणाम को हिंदुत्व की भावना कमजोर होने के रूप में देखने की गलती न करें। उदाहरण के लिए हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में  बनी मस्ज़िद में किये गए अवैध निर्माण के विरुद्ध  हिन्दू  संगठन एकजुट होकर मैदान में उतर आये। पहले तो मौलवी  बात को घुमाते रहे और प्रदेश की कांग्रेस सरकार भी   उन्हें संरक्षण देती रही किंतु जब हिन्दू समुदाय का दबाव बढ़ा तब जाकर उसे तोड़ने की कारवाई करनी पड़ी। इससे उत्साहित हिन्दू संगठनों ने पूरे हिमाचल में अवैध रूप से बने मुस्लिम धर्मस्थलों के विरुद्ध मुहिम छेड़ दी है। इसका असर पूरे देश में होने की चर्चा सुनाई देने लगी है। बेहतर होगा विपक्षी नेताओं की शह पर उन्माद में आ रहे मुस्लिम इस बात को समझें कि उनको मोहरा बनाया जा रहा है। हिंदुत्व का आभामंडल  फीका पड़ने की खुशफहमी जिनके मन में है वे उसे जितनी जल्दी निकाल दें उतना अच्छा । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 September 2024

आम आदमी पार्टी और केजरीवाल की छवि पहले जैसी नहीं रही


दिल्ली के मुख्यमंत्री ने गत दिवस ऐलान कर दिया कि वे मंगलवार को अपने पद से त्यागपत्र दे देंगे और जनता की अदालत से निर्दोष साबित होने के बाद ही गद्दी पर आसीन होंगे। उन्होंने ये घोषणा भी कर दी कि पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया भी कोई पद नहीं लेंगे। नया मुख्यमंत्री कौन होगा इस पर रहस्य बनाकर रखा गया है। जिन नामों की चर्चा हो रही है उनमें श्री सिसौदिया ही ऐसे  हैं जिनको  विकल्प माना जाता रहा है किंतु  अरविंद केजरीवाल की  राजनीतिक शैली पूरी तरह से आत्मकेंद्रित है जिसमें संगठन और सत्ता दोनों पर एकाधिकार बनाये रखा जाता है। इसीलिए मुख्यमंत्री पद छोड़ने की घोषणा के साथ ही उन्होंने अपने सबसे निकटस्थ श्री सिसौदिया का रास्ता भी रोक दिया।  अब सवाल उठता है कि  जब उन्होंने जेल जाने के बाद भी इस्तीफ़ा नहीं दिया तब जमानत मिलने के बाद अचानक सत्ता त्याग करने का भाव उनके मन में कहाँ से आ गया ? और इसका सीधा - सीधा जवाब ये है कि अदालत द्वारा कार्यालय नहीं जाने और किसी फाइल पर हस्ताक्षर नहीं करने से रोक दिये जाने से आगामी विधानसभा चुनाव के पूर्व वे न तो नीतिगत निर्णय ले सकेंगे और न ही लोक - लुभावन घोषणाओं को लागू कर सकेंगे। ऐसे में किसी जनाधारविहीन व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाकर वे चुनाव तक शराब घोटाले से धूमिल हुई छवि को सुधारने का प्रयास करेंगे । उनकी चिंता का बड़ा कारण ये भी है कि लोकसभा चुनाव के पहले न चाहते हुए भी उन्हें जिस इंडिया गठबंधन में शामिल होना पड़ा उससे भी  नाता टूट चुका है। जिसके चलते हरियाणा में  कांग्रेस के साथ उसका गठबंधन नहीं हुआ। दरअसल श्री केजरीवाल को इस बात की चिंता सताने लगी है कि लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों सीटें भाजपा ने जीत लीं। हालांकि 2014 और 2019 में भी ऐसा हो चुका है लेकिन तब कांग्रेस भी अलग से लड़ी थी ।  2024 के मुकाबले में  दोनों मिलकर लड़ने के बाद भी भाजपा के वर्चस्व को नहीं तोड़ सके जबकि विधानसभा और दिल्ली नगर निगम में आम आदमी पार्टी का कब्जा है। यही बात श्री केजरीवाल को चिंतित कर  रही है। पंजाब में भी विधानसभा चुनाव की ऐतिहासिक जीत को वे लोकसभा चुनाव में नहीं दोहरा सके। इसमें दो मत नहीं हैं कि दिल्ली का गढ़ अब पार्टी के लिए उतना मजबूत नहीं रहा। पिछले नगर निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी के 134 पार्षद जीते जबकि भाजपा ने 106 सीटें जीतकर उसे कड़ी टक्कर दी।   हाल ही में निगम के 12 ज़ोन समितियों के चुनाव में भाजपा ने  7 ज़ोन में जीत हासिल कर निगम के वित्तीय प्रबंधन का नियंत्रण हासिल कर लिया।  श्री केजरीवाल  को ये बात अच्छी तरह समझ आ गई थी कि शराब घोटाले का निपटारा जल्द होने वाला नहीं है। ऐसे में उन्हें आये दिन अदालत में हाजरी देनी पड़ सकती है। और बड़ी बात नहीं दोबारा जेल जाना पड़े। ये भी सत्य है कि उनके और श्री सिसौदिया के जेल चले जाने से दिल्ली सरकार का कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ। कैबिनेट की बैठकें नहीं होने से नीतिगत निर्णय लंबित होते गए। इसका असर विकास कार्यों पर भी पड़ा। जिन मोहल्ला क्लीनिक और शालाओं के कारण दिल्ली सरकार की जमकर तारीफ होती थी उनकी दशा भी खराब होने लगी। सबसे बड़ा नुकसान हुआ शराब नीति के लागू किये जाने से बढ़ी शराबखोरी से। दरअसल शराब सस्ती होने से दिल्ली में शराब की खपत में बेतहाशा वृद्धि हुई जिसका दुष्परिणाम सामाजिक वातावरण पर पड़ा। लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत में शराब नीति के विरोध में बना जनमत भी सहायक साबित हुआ। ये सब देखते हुए श्री केजरीवाल के सामने पद त्यागने के सिवाय और कुछ रास्ता था भी नहीं। जमानत पर बाहर आने के बाद भी उनकी स्थिति दाँत और नाखून विहीन शेर सरीखी थी। यद्यपि सत्ता से प्रत्यक्ष तौर पर हटने के बाद भी सरकार तो वे ही चलाएंगे और ऐसे किसी व्यक्ति को गद्दी पर बिठाएंगे जो भविष्य में चंपई सोरेन न बन जाए।  जल्दी चुनाव करवाने की उनकी योजना भी फ़िलहाल कारगर होती नहीं लगती। इसलिए अब वे कुर्सी में उलझे रहने के बजाय जनता के बीच जाकर छवि को हुए नुकसान की भरपाई करने का प्रयास करेंगे। उसमें उन्हें कितनी सफलता मिलेगी ये तो समय बताएगा किंतु जिस तरह पार्टी विथ डिफरेंस का भाजपाई दावा अपनी चमक खो बैठा ठीक वैसे ही आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की जो छवि भ्रष्टाचार विरोधी की बनी थी उसमें जबरदस्त कमी आई है। जिन भ्रष्ट नेताओं की सूची श्री केजरीवाल जारी किया करते थे उनके ही साथ उन्होंने गठबंधन कर लिया। दिल्ली शराब घोटाले की शिकायत कांग्रेस ने ही की थी और जब श्री सिसौदिया और श्री केजरीवाल गिरफ्तार हुए तो उसने उसका स्वागत भी किया। आज ही दिल्ली के वरिष्ट कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने उन पर हमला बोला है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 September 2024

अदालत ने केजरीवाल को पंख कटी चिड़िया बना दिया

आम आदमी पार्टी में उत्सव का माहौल है। उसके सबसे बड़े  नेता अरविंद केजरीवाल को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली शराब घोटाले में जमानत जो दे दी। दो न्यायाधीशों में से एक ने उनकी गिरफ्तारी को  पूरी तरह वैध माना जबकि दूसरे ने ईडी द्वारा की गई  गिरफ्तारी पर  जमानत मिलने के पहले ही सीबीआई  द्वारा  गिरफ्तारी  को अनुचित मानते हुए उसे पिंजरे में बंद तोते की छवि से बाहर निकलने की समझाइश दे डाली। बस फिर क्या था श्री केजरीवाल को विजेता के तौर पर पेश किया जाने लगा। वे भी महाबली के अंदाज में खुद को पेश करते नजर आये। पार्टी के तमाम बड़े नेताओं ने इसे न्याय की जीत बताते हुए  अपने पुराने आरोप दोहराए। सर्वोच्च न्यायालय ने उनको रिहा तो कर दिया किंतु  जमानत की शर्तों के अनुसार वे  न तो मुख्यमंत्री कार्यालय जा सकेंगे और न ही किसी फाइल पर हस्ताक्षर करने की अनुमति उन्हें रहेगी। संदर्भित प्रकरण के बारे में टिप्पणी करने और  गवाहों से मिलने  पर भी रोक लगा दी गई है। साथ  ही 10 लाख रु. का बॉन्ड भी भरना होगा। भाजपा द्वारा उनसे  पद छोड़ने  की मांग किया जाना तो नितांत स्वाभाविक है किंतु कांग्रेस ने भी आम आदमी पार्टी द्वारा मनाई जा रही खुशी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने श्री केजरीवाल को दोषमुक्त नहीं किया केवल जमानत दी है। पार्टी प्रवक्ता आलोक शर्मा ने  अनुसार अभी आरोप पत्र दाखिल है और ऐसे में जमानत को क्लीन चिट नहीं माना जा सकता। यद्यपि कांग्रेस  अपनी प्रतिक्रिया को यहीं तक सीमित रखते हुए उनसे त्यागपत्र मांगने  से बची जिसका कारण संभवतः हरियाणा विधानसभा के चुनाव हैं जिनमें राहुल गाँधी की इच्छा के बावजूद दोनों पार्टियों में गठबंधन नहीं हो सका। चूंकि श्री केजरीवाल अपनी पार्टी के स्टार प्रचारक होंगे इसलिए कांग्रेस उन्हें ज्यादा नाराज नहीं करना चाहती क्योंकि आम आदमी पार्टी द्वारा उम्मीदवार उतारे जाने से भाजपा विरोधी मतों में विभाजन से कांग्रेस को नुकसान होने का खतरा बढ़ गया है । कुछ राजनीतिक विश्लेषक ये भी मान रहे हैं कि श्री केजरीवाल को जमानत मिलने के पीछे भी केंद्र सरकार का नर्म रवैया रहा। उसे लगने लगा था कि  मामले के निपटारे में लंबा समय लगेगा। चूंकि मनीष सिसौदिया , संजय सिंह और के. कविता सहित एक अन्य आरोपी जमानत पा चुके थे अतः श्री केजरीवाल को जेल में रखने का औचित्य नहीं बचा था। लेकिन  जेल रूपी पिंजरे से  बाहर आने के बाद भी उनकी स्थिति पंख कटी चिड़िया जैसी है । जिस मुख्यमन्त्री को अपने कार्यालय जाने की अनुमति न हो और न ही वह किसी फाइल पर हस्ताक्षर कर सकता हो उसका पद पर बना रहना मजाक ही है। लेकिन श्री केजरीवाल का रवैया समझ से परे है। उनमें यदि जरा भी स्वाभिमान होता तो वे अदालत में मांग रखते कि जमानत पर रिहा होने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में उनके दायित्वों का  निर्वहन करने का अधिकार मिले। लेकिन वे जेल से बाहर आने के लिए इतने आतुर थे कि  सभी शर्तों को सिर झुकाकर मान लिया। दिल्ली में आगामी वर्ष विधानसभा चुनाव होंगे। सवाल ये है कि क्या तब तक वहाँ की सरकार ऐसे मुख्यमंत्री के मातहत चलेगी जो शासन चलाने से वंचित कर दिया गया हो। स्वतंत्रता के बाद ये पहला अवसर है जब कोई मुख्यमंत्री जेल जाने के बाद भी गद्दी नहीं छोड़ रहा और अधिकार विहीन होने के बाद भी पद पर बना हुआ है। सही बात तो ये है कि श्री केजरीवाल ने पार्टी के भीतर वैकल्पिक नेतृत्व की गुंजाइश छोड़ी ही नहीं। बीच में तो उन्होंने पार्टी और सरकार चलाने का जिम्मा अनौपचारिक तौर पर अपनी पत्नी को सौंप दिया था जो जेल में उनसे मिलकर निर्देश लाती थीं। हालांकि जेल जाने के बाद लंबे समय तक मनीष सिसौदिया और सत्येंद्र जैन ने भी मंत्री पद नहीं छोड़ा था किंतु बाद में उनसे तो त्यागपत्र दिलवा दिया गया किंतु श्री केजरीवाल ने मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करने का खतरा मोल नहीं लिया। हरियाणा विधानसभा चुनाव में पार्टी की ओर से जारी स्टार प्रचारकों की सूची में उनके बाद दूसरे स्थान पर उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल का नाम होना काफी कुछ कह जाता है। इस प्रकार श्री केजरीवाल जमानत पर बाहर आकर भी अदालत द्वारा  मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करने से रोक दिये गए जो उनके गाल पर तमाचे से कम नहीं है। आम आदमी पार्टी चाहे कुछ भी कहे किंतु निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक ने ईडी और सीबीआई द्वारा प्रस्तुत आरोप पत्र को रद्द करने से इंकार कर दिया। ऐसे में  जमानत पर जेल से बाहर आये श्री केजरीवाल अपनी पार्टी के नेता भले हों किंतु बतौर मुख्यमंत्री उनकी शक्तियां छीन ली गईं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 13 September 2024

राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथ का एकमात्र चेहरा थे सीताराम


मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव सीताराम येचुरी के निधन से वामपंथी राजनीति का एक मजबूत स्तंभ ढह गया। स्व. सीताराम एक मेधावी छात्र रहे और दिल्ली के प्रसिद्ध जेएनयू से  स्नातकोत्तर उपाधि अर्जित की । छात्र जीवन से ही उनका झुकाव साम्यवादी  विचारधारा के प्रति हो गया था। स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया से जुड़कर वे जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे। साम्यवादी राजनीति के  सीपीएम धड़े से संबद्ध होने के कारण आपातकाल में जेल भी गए। उल्लेखनीय है सीपीआई नामक साम्यवादी पार्टी ने इंदिरा गाँधी द्वारा लगाए गए आपातकाल का समर्थन किया था। बाद में श्री येचुरी  सीपीएम के महासचिव भी बने जो  पार्टी संगठन में सबसे बड़ा पद होता है। पार्टी ने उन्हें प. बंगाल से राज्यसभा में  भेजा जहाँ प्रभावशाली प्रदर्शन के आधार पर उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद भी चुना गया। सांसद और पार्टी महासचिव न रहने के बाद भी वे राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा विरोधी खेमे को एकजुट करने में लगे रहते थे। यद्यपि वामपंथी विचारधारा का प्रभाव धीरे - धीरे  लुप्त होने लगा किंतु श्री येचुरी अपनी सक्रियता के कारण विपक्षी राजनीति के एक महत्वपूर्ण रणनीतिकार बने रहे। प. बंगाल में वामपंथी सत्ता के पराभव के बाद केवल केरल में  ही साम्यवादी सरकार बच रही है। लेकिन एक विरोधाभास जो देखने मिलता है वह है उक्त दोनों राज्यों में सीपीएम और कांग्रेस के बीच का रिश्ता। प. बंगाल में जहाँ वामपंथी और कांग्रेस ममता बनर्जी के विरुद्ध एकजुट हैं वहीं केरल में  एक दूसरे के विरोध में हैं। इसकी वजह ये रही कि स्व. येचुरी जहाँ भाजपा के विरोध में कांग्रेस सहित शेष विपक्ष से निकटता के पैरोकार रहे वहीं सीपीएम के एक और कद्दावर नेता प्रकाश कारत अपनी कट्टरवादी सोच के चलते एकला चलो की सोच रखते थे। प. बंगाल में ज्योति बसु , सोमनाथ चटर्जी और बुद्धदेव भट्टाचार्य का दौर समाप्त होने के बाद वहाँ स्व. येचुरी का प्रभाव बढ़ा जबकि श्री कारत के चलते केरल में वामपंथी मोर्चा कांग्रेस और भाजपा दोनों को राजनीतिक दुश्मन समझता है। हालिया लोकसभा चुनाव में प. बंगाल में वामपंथी और कांग्रेस एकजुट होकर ममता बनर्जी के विरुद्ध लड़े। वहीं केरल में वामपंथियों और कांग्रेस में मुकाबला हुआ। यहाँ तक कि वायनाड सीट पर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के विरुद्ध सीपीआई दिग्गज डी. राजा की पत्नी खड़ी हो गईं। वामपंथी मोर्चे ने श्री गाँधी से इस सीट से न लड़ने का आग्रह भी किया। ये सब तब हुआ जब राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस, वामपंथी और ममता बनर्जी इंडिया गठबंधन में शामिल होकर भाजपा को रोकने एकजुट थे। वामपंथी विचारधारा के प्रति घटते रुझान का कारण यही विरोधाभासी नीति थी किंतु ये भी सही है कि राष्ट्रीय राजनीति में उसकी उपस्थिति जिस एक शख्स के कारण बनी हुई थी वह सीताराम येचुरी ही थे। उनके महत्व का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि नेपाल में माओवादी सत्ता काबिज हो जाने के बाद जब वहाँ के वामपंथी नेताओं में आपसी मतभेद उभरे तब मध्यस्थता के लिए स्व. येचुरी को बुलाया गया। इसका कारण उनकी समझ और राजनीतिक अनुभव ही था। उनके साथ असहमति रखने वाले श्री कारत का मानना रहा कि भाजपा के अंध विरोध में कांग्रेस और सपा तथा राजद जैसे जातिवादी दलों के पिछलग्गू बने रहने से वामपंथी आंदोलन कमजोर हो रहा है। जेएनयू के अध्यक्ष रहे चर्चित वामपंथी छात्र नेता कन्हैया कुमार का कांग्रेस में जाना इसका उदाहरण बन गया। लेकिन स्व. येचुरी को वामपंथी कट्टरता की बजाय भाजपा के विरोध में विपक्ष का एकीकरण ज्यादा पसंद था। दरअसल वे इस बात को भाँप चुके थे कि वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा में कभी नहीं लौट सकेंगे। केरल के अलावा चंद विश्वविद्यालयों की छात्र राजनीति में ही उनका प्रभाव शेष रह गया है। प. बंगाल में अब वह स्थानीय निकाय जीतने योग्य भी नहीं बचे। लोकसभा और विधानसभा चुनाव जीतना तो दूर रहा।  प. बंगाल में मुख्य विपक्षी दल बनने के बाद  केरल में भी भाजपा जिस तेजी से तीसरी राजनीतिक ताकत बन रही है उसे देखते हुए वामपंथी राजनीति का भविष्य अंधकारमय लगता है। बावजूद इसके अपनी संपर्क शैली और लचीले स्वभाव के कारण स्व. येचुरी  एक महत्वपूर्ण शख्सियत बने रहे। उन्होंने युवावस्था में वामपंथ का उभार भी देखा और प्रौढ़ावस्था में उसके  ढलान पर जाने के भी  साक्षी बने। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि दिल्ली की राजनीतिक बिरादरी में वे वामपंथ के अकेले चेहरे थे। उनका न रहना  साम्यवादी विचारधारा की बड़ी क्षति है क्योंकि उनका कोई विकल्प फ़िलहाल नजर नहीं आता।
विनम्र श्रद्धांजलि। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 12 September 2024

12 वर्ष तक के सभी बच्चों को आयुष्मान योजना में शामिल किया जाए

लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 70 साल और उससे अधिक के सभी बुजुर्गों को आयुष्मान योजना के अंतर्गत प्रति वर्ष 5 लाख रु. तक का चिकित्सा बीमा  निःशुल्क  देने का जो वायदा किया था उसे गत दिवस केंद्र सरकार ने पूरा कर दिया। अब तक गरीब वर्ग को ही यह सुविधा थी किंतु इस योजना के अंतर्गत किसी भी  आय वर्ग के बुजुर्ग को एक साल में 5 लाख तक का इलाज निःशुल्क करवाने की  व्यवस्था की गई है। जिन गरीब बुजुर्गों के पास पहले से आयुष्मान कार्ड हैं उन्हें 5 लाख रु. का अतिरिक्त बीमा नई योजना में मिलेगा और जो  अपने साधनों से चिकित्सा बीमा करवाते आ रहे हैं वे भी लाभान्वित होंगे। इस प्रकार हर व्यक्ति 70 वर्ष का होते ही आयुष्मान योजना के अंतर्गत आ गया फिर चाहे वह धनकुबेर रतन टाटा हों या फिर रोज कमाने, रोज खाने वाला श्रमिक। पहले उम्मीद थी कि नरेंद्र मोदी सरकार तीसरी पारी के पहले बजट में ही चुनावी वायदे को पूरा कर देगी किंतु उस समय तत्संबंधी घोषणा नहीं की गई। अब जबकि कुछ ही दिनों में हरियाणा और जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं तब उक्त ऐलान को भाजपा का चुनावी दाँव भी कहा जा सकता है। लेकिन केंद्र सरकार ने आर्थिक स्थिति रूपी विभाजन रेखा को दूर करते हुए चूंकि केवल 70 वर्ष की आयु को आधार बनाया है इसलिए देश भर के वृद्ध जन इससे राहत महसूस कर रहे होंगे। भारत में औसत आयु  निरंतर वृद्धि की ओर है । इसके साथ ही एक नई समस्या बुजुर्गों के अकेलपन की भी उठ खड़ी हुई है। संयुक्त परिवारों के टूटने से भी माता - पिता को वृद्धावस्था में एकाकीपन झेलने मजबूर होना पड़ रहा है। कामकाज के लिए अपना गाँव या शहर छोड़कर बाहर जाने का सिलसिला तो बहुत पुराना है किंतु अब तो बड़ी संख्या में युवा शिक्षा हेतु भी दूसरे शहर तो क्या विदेश तक जाने लगे हैं और फिर वहीं नौकरी कर बस जाते हैं। इन सब वजहों से अकेले रह रहे बुजुर्गों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। और जब वे बीमार पड़ते हैं तब इलाज हेतु तत्काल पैसे की व्यवस्था के अलावा भागदौड़ उनका हौसला तोड़ देती है। हर किसी के पास घर में इतनी नगदी भी नहीं होती जितनी निजी अस्पताल में भर्ती होते ही जमा करवानी पड़ती है। जिन सेवा निवृत शासकीय कर्मचारियों को निःशुल्क इलाज की सुविधा है , उनके अलावा जो बुजुर्ग निजी तौर पर चिकित्सा बीमा करवाकर रखते हैं वे तो आकस्मिक स्थिति उत्पन्न होने पर निश्चिंत होकर अस्पताल जाकर भर्ती हो जाते हैं किंतु निम्न और मध्यम आय वर्ग में बहुत बड़ी संख्या उन बुजुर्गों की है जिनके पास चिकित्सा संबंधी किसी भी प्रकार का सुरक्षा चक्र नहीं है। केंद्र सरकार की ताजा घोषणा से उनको बहुत बड़ी मानसिक शांति प्राप्त हुई है।  इसका कितना लाभ भाजपा को आने वाले चुनावों में मिलेगा ये बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितनी ये कि केंद्र सरकार ने देश भर के बुजुर्गों को पारिवारिक भावना का एहसास करवाया है। लेकिन इस  बात की निगरानी सरकारी तौर पर रखी जानी चाहिए कि निजी अस्पताल वाले इन बुजुर्गों को परेशान न करें। कोरोना के दौरान ये देखने मिला था कि निःशुल्क चिकित्सा सुविधा प्राप्त शासकीय कर्मचारियों के अलावा चिकित्सा बीमा धारकों को अग्रिम भुगतान किये बिना निजी अस्पतालों में भर्ती करने से इंकार कर दिया गया। ये शिकायत बाद में भी आती रही। इसका कारण सरकार द्वारा अस्पतालों को समय पर भुगतान नहीं किया जाना रहा। लेकिन ये भी सच है कि देश भर में अनेक निजी अस्पतालों के लिये आयुष्मान योजना रुपये छापने की मशीन बन गई। बड़े पैमाने पर फर्जीबाड़े  सामने आने के बाद इसकी उपयोगिता और सार्थकता पर सवाल भी उठे।  अब चूंकि  70 साल के हो चुके  समस्त  बुजुर्गों को आयुष्मान योजना में शामिल कर लिया गया है तब स्थानीय प्रशासन को ये सतर्कता रखनी होगी कि किसी भी वृद्ध को इलाज से वंचित न होना पड़े। आयुष्मान योजना निश्चित रूप से स्वस्थ भारत की कल्पना को साकार करने की दिशा में क्रांतिकारी कदम थी। उसमें प्रत्येक आय वर्ग के वृद्धों को शामिल करने से केंद्र सरकार की संवेदनशीलता का पता चलता है किंतु  इसे एक पायदान और ऊपर ले जाते हुए कम से कम 12 वर्ष तक के  सभी बच्चों को भी इसके अंतर्गत लाना चाहिए। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि बच्चों का इलाज भी महंगा होता जा रहा है।  विकसित भारत के लिए देश के भविष्य को स्वस्थ रखना बेहद जरूरी है। वैसे तो शिक्षा और स्वास्थ्य पूरी तरह से सरकार का दायित्व होना चाहिए किंतु जब तक ऐसा नहीं होता तब तक जिस तरह वृद्ध जनों के प्रति केंद्र  सरकार ने अपनी संवेदनशीलता दिखाई वैसी ही नई पीढ़ी के नौनिहालों हेतु भी सामने आनी चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 11 September 2024

विदेशों में आरक्षण और जातिगत जनगणना की चर्चा से बचना चाहिए


लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी इन दिनों अमेरिका में हैं। लोकसभा में  नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद इस देश की उनकी यह पहली यात्रा है। लोकसभा चुनाव में 2014 और 2019 की अपेक्षा अधिक सफलता मिलने से उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा हुआ है। आक्रामक शैली में दिये जा रहे बयान इसका प्रमाण हैं। हालांकि वे जो कुछ भारत में बोलते हैं ज्यादातर वही बातें अमेरिका में उनके द्वारा कही जा रही हैं किंतु कुछ मुद्दों पर वे आपत्तिजनक बातें बोल गए जिन पर देश के भीतर विपरीत प्रतिक्रिया हो रही है।  वॉशिंगटन के निकट वर्जीनिया में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि लड़ाई इस बात की है कि क्या एक सिख को भारत में पगड़ी या कड़ा पहनने का अधिकार है या नहीं? या एक सिख के रूप में वह गुरुद्वारा जा सकते हैं या नहीं? लड़ाई इसी बात के लिए है और यह सिर्फ उनके लिए ही नहीं बल्कि सभी धर्मों के लिए है। इस बयान से ये आशय निकलता है मानों भारत में सिखों को पगड़ी और कड़ा पहिनने से रोका जा रहा हो। उनका यह बयान अमेरिका, कैनेडा और ब्रिटेन में कार्यरत खालिस्तान समर्थक संगठनों का हौसला बुलंद करने वाला है। इसके अलावा उन्होंने लोकसभा चुनाव पर भी प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा कि यदि ईमानदारी से होते तो एनडीए को 246 सीटों से ज्यादा नहीं मिलतीं। उनका ये कहना भी  अपरिपक्वता को दर्शाता है कि 2014 के बाद भारत ऐसे दौर में पहुँच गया है जहाँ लोकतंत्र की नींव पर हमला हो रहा है। लेकिन जो सबसे खतरनाक बात वे पूरे दौरे में दोहराते रहे वह है आरक्षण और जातिगत जनगणना पर उनकी वही टिप्पणियां जो वे देश में करते आये हैं। उन्होंने दलित, आदिवासी और पिछड़ों के प्रति निष्पक्ष न होने की बात करते हुए सरकारी और अन्य क्षेत्रों के साथ ही मीडिया में भी उनकी हिस्सेदारी का शिगूफा छोड़ दिया जो चौंकाने वाला है। उल्लेखनीय है कुछ दिनों पहले प्रयागराज में दिये  अपने भाषण में उन्होंने दलित और आदिवासी समाज से किसी के मिस इंडिया न बनने जैसा बचकाना मुद्दा उठाया था। जहाँ तक जातिगत जनगणना का प्रश्न है तो उनका कहना है कि इसके जरिये जो आंकड़े मिलेंगे उनके आधार पर  विभिन्न जातियों की हिस्सेदारी तय करने की नीति बनाई जावेगी। इसके लिए उन्होंने आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से अधिक करने की बात भी कही। लेकिन आज तक श्री गाँधी ये स्पष्ट नहीं कर सके कि जिन्हें वे 90 फीसदी बताते हैं उनके बीच हिस्सेदारी का बंटवारा कैसे होगा? जातिगत जनगणना में क्या मुसलमान भी आयेंगे जिनके बीच हिंदुओं से अधिक जातियाँ हैं ।  धर्म परिवर्तन  कर ईसाई बने दलितों की क्या स्थिति रहेगी क्योंकि उस धर्म में तो जाति है ही नहीं। राहुल द्वारा मीडिया में हिस्सेदारी की जो चर्चा छेड़ी वह भी बेतुकी है क्योंकि आज तक चाहे पत्रकारिता हो या फिल्में और टीवी, उनमें कभी जाति का सवाल उठा ही नहीं। हिन्दी फिल्मों के तीन बड़े नायक मुस्लिम हैं। उनकी फ़िल्मों को मिलने वाली सफलता के पीछे  हिन्दू दर्शक ज्यादा होते हैं। स्व. मो. रफी की जयंती पर मुस्लिम तो शायद ही कुछ करते हों किंतु हिन्दू आगे - आगे नजर आते हैं। टीवी धारावाहिकों के कलाकारों की जाति और धर्म कभी मुद्दा नहीं बना। महाभारत में अर्जुन की भूमिका मुस्लिम ने निभाई थी। इसी तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में जातिगत प्रतिनिधित्व जैसी बात कभी सोचने में भी नहीं आई। दलित जातियों पर हुए अत्याचारों पर पत्रकार सदैव मुखर रहे। आरक्षण को लेकर श्री गाँधी द्वारा जो कुछ कहा जा रहा है उसके पीछे की राजनीति किसी से छिपी नहीं है। लेकिन वे भूल रहे हैं कि इस तरह के मुद्दों पर लंबे समय तक राजनीति नहीं की जा सकती वरना मायावती, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव अपने इर्द - गिर्द ऊँची जातियों के लोगों को न रखते। उल्लेखनीय है लोकसभा के लिए चुन जाने के बाद  उ.प्र विधानसभा में  अपने स्थान पर नेता प्रतिपक्ष बनाने के लिए अखिलेश ने एक ब्राह्मण विधायक को चुना। यदि श्री गाँधी इस पर आपत्ति करते तब लगता कि उनके मन में वंचित वर्ग के लिए हमदर्दी है। कुल मिलाकर ये लगता है वे बजाय दूरगामी सोच के तात्कालिक लाभ की नीति पर चल रहे हैं जो उनके और कांग्रेस के लिए तो खतरनाक है ही देर सवेर इंडिया गठबंधन के लिए भी मुसीबत पैदा करेगा। देश के जिन राज्यों में भी पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के नाम पर राजनीति होती है उनमें से ज्यादातर में कांग्रेस घुटनों के बल पर है। राहुल जिस रास्ते पर चल रहे हैं वह भटकाव भरा तो है ही, उसमें गड्ढे भी बहुत हैं। अमेरिका में जहाँ जाति और धर्म किसी को अवसर देने के आधार नहीं होते वहाँ इस तरह की बातें करने का कोई लाभ नहीं। भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए उन्होंने ये पूछने का दुस्साहस नहीं किया कि उनमें कितने दलित, आदिवासी या पिछड़े हैं क्योंकि उनको पता है कि  विदेशों में कार्यरत भारतीय योग्यता के बल पर गए न कि आरक्षण के। बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी भारत में योग्य लोगों को ही रोजगार देती हैं। ये सब देखते हुए जातिगत जनगणना और आरक्षण जैसे मुद्दे विदेशों में उठाने से बचना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 September 2024

जीवन और चिकित्सा बीमा पर जीएसटी हटाने काउंसिल की विशेष बैठक जल्द हो

जीएसटी काउंसिल की गत दिवस हुई बैठक के पहले ये उम्मीद जताई जा रही थी कि उसमें जीवन और स्वास्थ्य बीमा पर लगने वाले जीएसटी को खत्म कर दिया जाएगा। इसका कारण न तो केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के मन में उत्पन्न करुणा थी और न ही गैर भाजपा शासित राज्यों के वित्त मंत्रियों की ओर से आया दबाव। दरअसल ये उम्मीद जगाई केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी द्वारा श्रीमती सीतारमण को लिखे उस पत्र ने जिसमें उन्होंने जीवन और स्वास्थ्य बीमा पर लगने वाले जीएसटी को हटाये जाने का अनुरोध किया था। चूंकि उन्होंने उस पत्र को सार्वजनिक कर दिया इसलिए पूरे देश में वह चर्चा का विषय बन गया। और कोई मंत्री होता तब शायद श्रीमती सीतारमण उसके पत्र को नजरंदाज भी कर देतीं किंतु चूंकि श्री गडकरी न केवल वरिष्ट अपितु बेहद लोकप्रिय मंत्री हैं लिहाजा उनके सुझाव पर जीएसटी काउंसिल में चर्चा हुई। उस सुझाव का विरोध करने का साहस किसी भी राज्य के वित्त मंत्री में नहीं था क्योंकि वैसा करने पर उसकी छवि जनता की निगाह में खलनायक की बन जाती । बैठक के पहले से ही समाचार माध्यमों में श्री गडकरी के सुझाव को माने जाने सम्बन्धी खबरें भी आने लगीं जिसकी सुखद प्रतिक्रिया भी हुई। लेकिन बैठक खत्म होने के बाद जब उसका विवरण आया तो ये जानकर सारा उत्साह ठंडा हो गया कि सभी सदस्य जीवन एवं स्वास्थ्य बीमा पर जीएसटी घटाने तो सहमत हो गए किंतु वह कितना कम हो इसका निर्णय अगली बैठक में होगा जो संभवतः नवम्बर में होगी। वित्तीय मामलों में जल्दबाजी से कोई फैसला लेना आसान नहीं होता क्योंकि उसके दूरगामी परिणाम होते हैं। जीएसटी केंद्र और राज्य सरकारों की आय का बड़ा या यूँ कहें कि मुख्य स्रोत है। ऐसे में उससे होने वाली आवक को कोई सरकार नहीं खोना चाहती। लेकिन लोककल्याणकारी शासन व्यवस्था में सरकार का लक्ष्य केवल धनोपार्जन न होकर जनहित होता है। जीएसटी जब लागू हुआ था तब यह आश्वासन दिया गया था कि पूरे देश में करों की दर एक समान होगी।  साथ ही ये भी कहा गया कि दरों के स्तर कम होंगे। वैसे आदर्श व्यवस्था तो यह होती कि विलासिता की वस्तुओं को छोड़कर बाकी वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी की एक ही दर 8 या अधिकतम 12  प्रतिशत रहती किंतु ऐसा न करते हुए उसमें प्रयोग होते रहे। सालों बीत जाने के बाद भी आज तक उसकी व्यवस्था में स्थायित्व नहीं आया जिसके चलते आये दिन कोई न कोई नया आदेश आता रहता है। पेट्रोल और डीजल को जीएसटी से मुक्त रखने की मांग लगातार होने के बावजूद जीएसटी काउंसिल का एक भी सदस्य इस पर सहमत नहीं है जिससे ये लगता है कि जनता का तेल निकालने में सभी पार्टियों के बीच संगामित्ती है। भाजपा विरोधी जो पार्टियां पेट्रोल - डीजल के दाम ज्यादा होने पर केंद्र सरकार को कठघरे  में खड़ा करती हैं उनके द्वारा शासित राज्यों ने भी जीएसटी काउंसिल में कभी इस मुद्दे को नहीं उठाया । गत दिवस हुई बैठक में यदि केन्द्रीय वित्त मंत्री जीवन और स्वास्थ्य बीमा पर जीएसटी खत्म करने या कम करने का पूरा प्रस्ताव बनाकर लातीं तब शायद उसके स्वीकृत होने में कोई अड़चन नहीं आती किंतु लगता है श्री गडकरी के पत्र के कारण बैठक में वह विषय उठाकर रस्म अदायगी कर ली गई और फैसले को नवम्बर तक टरका दिया गया। ये भी हो सकता है श्री गडकरी को इसका श्रेय न मिले इसलिए ऐसा किया गया। यूँ तो कल की बैठक में अनेक चीजों और सेवाओं पर जीएसटी की दरें कम या ज्यादा की गईं जिनमें कैंसर की दवाओं पर 12 से घटाकर 5 प्रतिशत जीएसटी लगाने का निर्णय भी है। लेकिन सही मायनों में तो कैंसर सदृश बीमारी के उपचार से जुड़ी किसी भी चीज पर जीएसटी लगना ही नहीं चाहिए ।  हो सकता है ऐसा न करने के पीछे कोई बड़ी मजबूरी  हो किंतु शिक्षा और चिकित्सा से जुड़ी चीजों और सेवाओं पर कम से कम कर होना अपेक्षित है। यदि जीएसटी काउंसिल के सदस्यों के मन में जरा भी मानवीयता है तो उन्हें विशेष बैठक बुलाकर जीवन और चिकित्सा बीमा को जीएसटी मुक्त कर देना चाहिए क्योंकि ये आम आदमी को सीधे प्रभावित करते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 9 September 2024

पैरालिंपिक्स में जीतने वालों की उपलब्धि अधिक सम्माननीय और मूल्यवान है


विश्व ओलम्पिक के बाद उसी स्थान पर विकलांग या दिव्यांग कहे  जाने वाले खिलाड़ियों की विश्व प्रतियोगिता आयोजित की जाती है जिसे        पैरालिंपिक्स कहते हैं | इस वर्ष पेरिस में संपन्न मुख्य ओलम्पिक खेलों के बाद आयोजित  पैरालिंपिक्स  का गत दिवस समापन हुआ | ये आयोजन भारतीय संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इसमें भारतीय खिलाड़ियों ने पहली बार ढेर सारे पदक हासिल कर मुख्य ओलम्पिक की खुशी को दोगुना  कर दिया | 1968 से अब तक भारत ने पैरालिंपिक्स में जितने पदक जीते उसका सबसे बड़ा हिस्सा इस बार का है | 2016 के रियो पैरालिंपिक्स  में भारत को कुल 5 पदक हासिल हुए थे । उसके बाद टोक्यो में भारतीय दस्ते ने 19 पदक जीतकर पूरे विश्व का ध्यान खींचा | लेकिन पेरिस  पैरालिंपिक्स का समापन रिकॉर्ड सात स्वर्ण, नौ रजत और 13 कांस्य मिलाकर कुल 29 पदकों के साथ हुआ और पदक तालिका में भारत 18वें स्थान पर रहा।  इन खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने के लिए बजट लगातार बढ़ाये जाने के साथ ही विश्वस्तरीय सुविधाएं भी  उपलब्ध कराई गईं। पेरिस में प्राप्त सफलता इसी का परिणाम है। प्रधानमंत्री सहित तमाम बड़ी हस्तियाँ समय - समय पर जिस तरह इन दिव्यांग खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करती रहीं वह निश्चित रूप से स्वागत योग्य है | भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ ही दक्षिण एशिया में मजबूत सामरिक शक्ति के रूप में उभर रहा है | हमारा देश दूध उत्पादन के साथ सबसे ज्यादा फिल्में बनाने के लिए भी प्रसिद्ध  है |  ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में भी हम वैश्विक बाजारों में अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं | वैक्सीन दवाइयां बनाने में तो भारत का अग्रणी स्थान है ही | मोबाइल और साफ्टवेयर के उत्पादन में भी देश  बहुत प्रभावशाली तरीके से आगे बढ़ रहा है | रक्षा उत्पादन के अलावा अन्तरिक्ष विज्ञान जैसे बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारतीय वैज्ञानिक एवं तकनीशियनों ने विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा हासिल की है | इसे  देखते हुए यह उम्मीद  करना गलत नहीं होता कि खेलों में भी हमारा देश अग्रणी हो | एक दौर था जब भारत और हॉकी एक दूसरे के पर्याय हुआ करते थे किन्तु 1968 के मांट्रियल ओलम्पिक में वह गौरव हमसे छिन गया और तबसे केवल एक मर्तबा हमने  मास्को में स्वर्ण पदक जीता और वह भी तब , जब  नाटो देश उससे बाहर रहे | टोक्यो के बाद हालिया पेरिस ओलम्पिक में भी कांस्य जीतने से सूखा तो खत्म हुआ लेकिन पुराना रुतबा बरकरार न रह सका | अन्य मैदानी खेलों में भी  भारतीय खिलाड़ी जिस तेजी से उभर रहे हैं वह उत्साहवर्धक  है | ये भी अच्छा है कि अब क्रिकेट के अलावा भी दूसरे खेलों के विजेताओं को नायक जैसा सम्मान मिलने लगा है | यही वजह रही कि पेरिस पैरालिंपिक्स  में भारत के खिलाड़ियों द्वारा किये गए प्रदर्शन का हर खेल प्रेमी ने संज्ञान लिया और पदक जीतने वालों को जमकर प्रशंसा मिल रही है।  उनके हौसले और हिम्मत को हर देशवासी सलाम कर रहा है क्योंकि उनकी उपलब्धि सामान्य खिलाड़ियों की  तुलना में अधिक सम्माननीय और मूल्यवान है | इससे ये भी साबित होता है कि यदि शासन और खेल संघों द्वारा शारीरिक विकलांगता के शिकार वर्ग में से उदीयमान खेल प्रतिभाओं का चयन कर उनके भरण – पोषण और प्रशिक्षण पर समुचित ध्यान दिया जावे तो इस बार पदक संख्या में जिस तरह वृद्धि हुई उससे भी बेहतर नतीजे आगामी  पैरालिंपिक्स में देखने मिल सकते हैं | आजकल हर मामले में भारत की तुलना चीन से की  जाती है । इस पैरालिंपिक्स में भी चीन ने सर्वाधिक  पदक जीते | इसकी ख़ास वजह ये है कि उसने आर्थिक प्रगति के साथ ही खेल जगत में भी अपनी धाक  ज़माने के लिए पुरजोर कोशिश की | ये कहने में भी कुछ भी गलती नहीं है कि खेल भी उद्योग का स्वरूप बनता जा रहा है | पदक जीतने वालों को शासकीय और निजी क्षेत्र से जिस तरह प्रोत्साहन मिलने लगा है उससे  खिलाड़ी बनने का आकर्षण बढ़ा है | इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा देने की जरूरत है क्योंकि ये खिलाड़ी हमारे  देश के वैश्विक  राजदूत हैं । विशेष रूप से शारीरिक दृष्टि से विकलांग खिलाड़ियों ने साबित कर दिया कि वे अब दया के पात्र नहीं वरन राष्ट्रीय गौरव के ध्वजावाहक हैं । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 September 2024

जाटों की एकजुटता पर टिका है हरियाणा चुनाव का दारोमदार

याणा के विधानसभा चुनाव में इन दिनों आयाराम - गयाराम का दौर जमकर चल रहा है। जिनकी टिकिट कटती है वे दूसरी पार्टी में मत्था टेकने पहुँच जाते हैं। भाजपा  सांसद नवीन जिंदल की माँ सावित्री जिंदल को पार्टी ने टिकिट नहीं दी तो वे निर्दलीय लड़ने पर आमादा हैं। कुछ मंत्री और विधायक भी पत्ता कट जाने पर बगावत का झंडा उठाये घूम रहे हैं।  भाजपा में इस बात से  ज्यादा नाराजगी है कि बाहर से आये लोगों को उम्मीदवार बनाकर पार्टी के लिए बरसों से खून पसीना बहा रहे लोगों को दरकिनार कर दिया गया। दूसरी तरफ कांग्रेस में भी बड़े नेताओं के बीच खींचातानी खुलकर सामने आ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और उनके सांसद बेटे दीपेंदर पार्टी के चुनाव अभियान पर पूरी तरह हावी हैं किंतु दलित समुदाय की सांसद शैलजा उनके विरुद्ध लामबंदी करते हुए विधानसभा चुनाव लड़ना चाह रही हैं। तीसरा मोर्चा है रणदीप सुरजेवाला का जिन्होंने मुख्यमंत्री बनने की इच्छा खुलकर व्यक्त कर दी। हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद से हीआम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर दिया था किंतु कांग्रेस नेता राहुल गाँधी उसके साथ गठजोड़ के लिए लालायित हैं। इसे लेकर उनके श्री हुड्डा सहित राज्य के अन्य कांग्रेस नेताओं के साथ मतभेद भी उजागर हुए । श्री हुड्डा ने दबी जुबान आम आदमी पार्टी के साथ हाथ मिलाने का विरोध किया किंतु श्री सुरजेवाला ने खुलकर गठबंधन की मुखालफत कर डाली।  लोकसभा चुनाव के बाद श्री गाँधी की वजनदारी जिस प्रकार बढ़ी उसे देखते हुए उनकी बात को सिरे से नामंजूर कर देना चौंकाने वाला है। कांग्रेस के भीतर चल रही इस खींचातानी के बीच गत दिवस आम आदमी पार्टी ने अपने 50 उम्मीदवारों की सूची जारी कर राहुल की उम्मीदों पर पानी फेर  दिया जो भाजपा विरोधी मतों के विभाजन को रोकने के लिए  उससे हाथ मिलाना चाह रहे थे।  इस प्रकार  हरियाणा में बहुकोणीय संघर्ष की स्थिति बन गई है। पूर्व उप प्रधानमंत्री स्व. देवीलाल का कुनबा भी कई  टुकड़ों में बँट गया है। पिछली सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे दुष्यंत चौटाला की पार्टी ने उ.प्र के दलित सांसद चंद्रशेखर आजाद की पार्टी के साथ गठबंधन कर जाट- दलित समीकरण बिठाने का  दांव चला है। किसान आंदोलन के अलावा जाट मुख्यमंत्री नहीं बनाये जाने से जाट समुदाय भाजपा से नाराज बताया जा रहा है। लोकसभा चुनाव में इसीलिए उसकी सीटें आधी रह गईं।  अतः शुरू से ये माना जा रहा था कि इस बार कांग्रेस यहाँ सरकार बना ले जायेगी। टिकिट वितरण  से भाजपा में जिस प्रकार से असंतोष उजागर हुआ उससे कांग्रेस का उत्साह और बढ़ गया। लेकिन बीते कुछ दिनों में आये श्री हुड्डा, सुश्री शैलजा और श्री सुरजेवाला के बयानों ने  पार्टी की छवि धूमिल की है। गलती श्री गाँधी की भी मामूली नहीं कही जायेगी जिन्होंने ऐन वक्त पर आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का शिगूफा छोड़ दिया जबकि ये काम काफी पहले हो जाना चाहिए था। हरियाणा में जाटों की जनसंख्या 25 फीसदी मानी जाती है। यदि  ये एकजुट होकर किसी का समर्थन कर दें तो उसकी  सरकार बनना तय हो जाता है किंतु वर्तमान में जाटों का कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। देवीलाल का कुटुंब बिखरा हुआ है, बंशीलाल की बहू भाजपा में आकर  राज्यसभा पहुँच गई। समय के साथ स्थानीय  स्तर पर भी युवा जाट नेताओं का उभार देखने मिल रहा है। इस प्रकार सबसे बड़े मतदाता समूह में ही सबसे  अधिक बिखराव है। यद्यपि श्री हुड्डा जाटों के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं किंतु उनकी अपनी पार्टी में ही उनकी चौधराहट को चुनौती मिल रही है। चर्चा तो ये भी है कि  उनकी जरूरत से ज्यादा दखलंदाजी श्री गाँधी को भी नागवार गुजर रही है। यही महसूस कर शैलजा और रणदीप ने अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर कर दी। हालांकि अभी ये कहना जल्दबाजी होगी कि इसका लाभ भाजपा उठाने में सफल हो जायेगी क्योंकि आम आदमी पार्टी यदि पूरी ताकत से लड़ गई तब वह दोनों राष्ट्रीय पार्टियों का खेल बिगाड़ सकती है। उसके सबसे बड़े नेता अरविंद केजरीवाल मूल रूप से हरियाणा के ही हैं। कुल मिलाकर जो चुनाव इकतरफा नजर आ रहा था वह अनिश्चित होता जा रहा है। कांग्रेस को अभी भी अपने आसार अच्छे नजर आ रहे हैं किंतु भाजपा अपने संगठन के बल पर ब्राह्मण, वैश्य  और पिछड़ी जातियों के समर्थन से तिकड़ी बनाने की सोच रही है। बहुकोणीय मुकाबले में  त्रिशंकु की स्थिति से भी इंकार नहीं किया जा सकता। हालांकि यदि कांग्रेस जाटों को  एकमुश्त अपने पक्ष में रख सकी तभी उसकी राह आसान होगी। 

 

-  रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 September 2024

सिंगापुर जैसे विश्व व्यापार के अनेक केंद्र भारत में भी बन सकते हैं


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकासमूलक सोच निश्चित  तौर पर प्रशंसनीय है। देश को  विश्वस्तरीय पहिचान दिलवाने के लिए वे निरंतर प्रयासरत रहते हैं। जब गुजरात में उन्होंने सरदार पटेल की मूर्ति जो संसार में सबसे ऊँची है  बनवाने की शुरुआत की तो  तरह - तरह के सवाल उठाये गए। उसकी लागत और निकटवर्ती क्षेत्रों को विकसित करने पर प्रस्तावित धनराशि को फिजूल खर्ची निरूपित किया गया। लेकिन कुछ ही वर्षों में वह पूरा खर्च वसूल हो गया । उस क्षेत्र की अर्थव्यस्था में भी जबरदस्त सुधार देखने मिला। वाराणसी में विश्वनाथ और उज्जैन में महाकाल परिसर के नवीनीकरण पर खर्च किये गए अरबों रूपयों की सार्थकता भी साबित हो चुकी है। बुलेट ट्रेन का प्रकल्प भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। ये सब विकसित और समृद्ध भारत के प्रमाण पत्र हैं। मुंबई में समुद्र पर बनाई गई लिंक रोड से भी लोगों का समय बचने लगा तथा जाम में भी कमी आई। राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास के कारण सड़क यातायात में हुई वृद्धि बदलते भारत की तस्वीर पेश करती है। कहने का आशय यह है कि विकसित होने का अर्थ केवल विदेशी मुद्रा भंडार का भरा होना नहीं बल्कि विकास का दिखना भी है। उस दृष्टि से स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की दूरगामी सोच  की दाद देनी होगी जिन्होंने स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी विराट परियोजना के साथ ही पक्की ग्रामीण सड़कें बनवाने का भागीरथी प्रयास किया। 2014 में देश की सत्ता संभालने के  साथ ही श्री मोदी ने अटल जी से भी एक कदम आगे बढ़ाते हुए अनेक नये काम प्रारम्भ करवाये जिनमें शौचालय जैसे मामूली नजर आने वाले कार्यों को प्राथमिकता दी  गई वहीं दूसरी ओर हवाई अड्डे और बंदरगाह भी बनाये। देश को आत्मनिर्भर बनाने हेतु रक्षा उपकरणों का उत्पादन बढ़ाने के अभियान के कारण देश उनका निर्यात करने की क्षमता अर्जित कर सका। इसीलिए अपनी सिंगापुर यात्रा में उन्होंने भारत में भी कई सिंगापुर बनाने की चर्चा छेड़ दी। उल्लेखनीय है कि कभी मलेशिया का हिस्सा रहा सिंगापुर शहर अब एक स्वतन्त्र देश है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी गणना विकसित देशों के बराबर होती है। क्षेत्रफल की दृष्टि से बेहद छोटा सिंगापुर भारत जैसे विशाल देश को वित्तीय और तकनीकी सहायता देने की हैसियत रखता है। श्री मोदी ने अपनी इस यात्रा में उसके साथ सेमी कंडक्टर सम्बन्धी जो समझौता किया वह इसका प्रमाण है। सिंगापुर की तरह एक ज़माने में हाँगकाँग भी इसी तरह चर्चित हुआ करता था। जिसे ब्रिटेन ने चीन से लीज पर लेकर मुक्त अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाया। हालांकि वह लीज खत्म हो गई और उस पर चीन का आधिपत्य दोबारा हो गया किंतु वह शहर आज भी विश्व व्यापार का प्रमुख केंद्र है। एक और उदाहरण दुबई का है जो बीते कुछ दशकों में ही निवेशकों का स्वर्ग बन गया। ऐसे में प्रधानमंत्री द्वारा भारत में कई सिंगापुर जैसी बात कहकर जो संकेत दिया वह देश को नया स्वरूप दे सकता है। कुछ समय पहले ही उन्होंने भारत के पास अनेकानेक द्वीप होने की बात कही थी। मालदीव से तनातनी के बाद जब उन्होंने भारतीय पर्यटकों को  लक्षद्वीप भ्रमण की सलाह दी तो  मालदीव के माथे पर पसीना आने लगा वहीं लक्षद्वीप में निवेश करने की होड़ लग गई। प्रधानमंत्री ने देश में कई सिंगापुर की संभावना किन स्थानों को सोचकर बताई ये तो स्पष्ट नहीं है किंतु वे बिना सोचे - समझे ऐसी बातें नहीं कहते , लिहाजा ये मानकर चला जा सकता है कि उनके मन में इसे लेकर कोई कार्ययोजना जरूर आकार ले चुकी होगी। हालांकि सिंगापुर एक दो बरस में नहीं बन सकता और फिर हमारे देश की भ्रष्ट नौकरशाही के चलते किसी भी काम में अड़ंगेबाजी होने लगती है। राजनीति भी आये दिन रुकावटें पैदा करने से नहीं चूकती। लेकिन इस सबकी उपेक्षा करते हुए इस तरह की सोच को कार्य रूप में परिणित करना वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खड़े रहने के लिए जरूरी है। श्री मोदी से उम्मीद है वे भारत में सिंगापुर की तर्ज पर कुछ क्षेत्रों को विश्व व्यापार का केंद्र बनाने के अभियान की शुरुआत जल्द करेंगे। ऐसे कार्यों में संसाधनों की कोई कमी नहीं पड़ती क्योंकि दुनिया भर से निवेशक वहाँ दौड़े - दौड़े चले आते हैं। दुबई इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। गौरतलब है वहाँ भारत के हजारों लोगों ने भी संपत्ति और अन्य कार्यों में अरबों रुपये लगा रखे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 September 2024

फारुख ने तो 370 पर अपनी नीति बता दी अब कांग्रेस भी रुख स्पष्ट करे


नेशनल काँफ्रेंस के वरिष्ट नेता डाॅ. फारुख अब्दुल्ला का साफ कहना है कि उनकी पार्टी  धारा 370 को जम्मू कश्मीर के आगामी  विधानसभा चुनाव में मुद्दा बनायेगी। उन्होंने माना कि  अदालती फैसले उसको हटाने के पक्ष में आये किंतु पूर्व में हुए कुछ निर्णयों ने उसे स्थायी माना था। ये पूछे जाने पर कि उनकी चुनावी भागीदार कांग्रेस धारा 370 पर गोलमाल रवैये का प्रदर्शन करती है , डाॅ. अब्दुल्ला ने  बचाव करते हुए कहा कि वह राष्ट्रीय पार्टी है जिसे पूरा देश देखना है। उनके उत्तर से स्पष्ट है कि  राहुल गाँधी जम्मू कश्मीर के दौरे पर राज्यपाल शासन और केंद्र शासित प्रदेश बनाये जाने जैसे मुद्दे तो उठाते हैं किंतु धारा 370 को हटाये जाने के बारे में मौन क्यों साधे रहते हैं ? निश्चित रूप से मंहगाई, बेरोजगारी, कानून - व्यवस्था , स्वास्थ्य सेवाएं अन्य राज्यों की तरह से ही जम्मू कश्मीर में भी पूरी तरह प्रासंगिक मुद्दे हैं । लेकिन 2019 में केंद्र सरकार ने जिस तरह से राज्य का विशेष दर्जा समाप्त कर  लद्दाख़ को अलग करते हुए जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य की बजाय केंद्र शासित राज्य बना दिया उससे घाटी के लोग नाराज बताये जाते हैं। लेकिन हिन्दू बहुल जम्मू में धारा 370  हटाये जाने का विरोध इसलिए कम दिखाई दिया क्योंकि इसके रहते घाटी में अलगाववाद का बोलबाला था। वहाँ लोगों के मन में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के साथ ही कुकुरमुत्ते जैसे पनप उठे अन्य पाकिस्तान समर्थक संगठनों द्वारा यह बात बिठाई जाती रही कि  धारा 370 के रहने से उनको देर - सवेर जनमत संग्रह द्वारा ये फैसला करने का अवसर मिलेगा कि यह राज्य भारत के साथ रहेगा या पाकिस्तान में मिलना पसंद करेगा। लेकिन ये सच्चाई लोगों से छिपाई गई कि जिस सं. रा. संघ के निरीक्षण में जनमत संग्रह का प्रावधान था उसी ने ये निर्णय कर लिया कि कश्मीर विवाद भारत और पाकिस्तान का आपसी मामला है जिसमें  तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की कोई आवश्यता नहीं है। उसी के बाद श्रीनगर स्थित सं. रा. संघ के कार्यालय को बन्द कर दिया गया। जो अमेरिका और ब्रिटेन लंबे समय तक  पाकिस्तान के  पक्ष में बोलते रहे वे भी किनारा कर गए।  ऐसे में जम्मू कश्मीर के पाकिस्तान जाने की संभावना लेश मात्र भी नहीं बची। पंडित नेहरू की सरकार ने जब स्व. शेख अब्दुल्ला को गद्दी से हटाकर नजरबंदी में रखा तब ही उन्हें धारा 370 खत्म करने का साहस दिखाना था। लेकिन बाद में उनकी बेटी इंदिरा गाँधी ने ही शेख को राज्य की सत्ता सौंप दी। उनके दोबारा ताकतवर होते ही घाटी में अलगाववाद के बीज पुनः अंकुरित होने लगे। वरना फारूक अपनी विदेशी पत्नी के साथ इंग्लैंड वासी हो चले थे। धारा 370 स्थायी थी या नहीं ये विवाद भी अब अर्थहीन हो चला है क्योंकि हर देश अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार समयानुकूल नीतियाँ बनाता है। आजादी के बाद जिन परिथितियों में धारा 370 का प्रावधान किया गया उनमें भारत विरोधी ताकतें तो सिर उठा रही थीं किंतु जैसा आतंकवाद नब्बे के दशक से वहाँ  पनपा उसे रोकने के लिए उसे हटाया जाना निहायत जरूरी था क्योंकि सीमा पार से मिलने वाली सहायता ने आतंकवाद को घाटी में कुटीर उद्योग की शक्ल में विकसित कर दिया था। ऐसे में डाॅ. अब्दुल्ला जिस तरह की बातें धारा 370 को लेकर कह रहे हैं उसके बारे में राहुल गाँधी को अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए क्योंकि जैसी संभावना सर्वेक्षण एजेंसियां जता रही हैं उसके अनुसार नेशनल काँफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन के सत्ता में आने के आसार हैं। उसकी बागडोर  निश्चित रूप से फ़ारुक या उनके बेटे उमर अब्दुल्ला के हाथ में होगी। यदि वे विधानसभा में धारा 370 और जनमत संग्रह पर अपना पुराना रवैया दोहराएंगे तब क्या कांग्रेस उनके साथ खड़ी होगी ? उल्लेखनीय है निकट भविष्य में अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव होना हैं। जिनमें धारा 370 को लेकर कांग्रेस को अपना रुख स्पष्ट करना होगा क्योंकि राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर वह जम्मू कश्मीर में अलग नीति पर चले और उसके बाहर उसके उलट ये संभव नहीं क्योंकि संचार क्रांति के इस युग में मतदाता से ऐसी बातें छिपी नहीं रहतीं। और ये भी सब जानते हैं कि फारुख अब्दुल्ला अपने मरहूम पिता की तरह ऊपर से कितना भी दिखावा करें किंतु उनके मन में  भारत से जरा सा भी प्रेम नहीं है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 4 September 2024

रा.स्व.संघ का संदेश राष्ट्रीय विमर्श की दिशा मोड़ने में सहायक होगा


केरल में संपन्न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समन्वय बैठक में जातिगत जनगणना और आरक्षण में क्रीमी लेयर जैसे ज्वलंत मुद्दों पर जो दृष्टिकोण सामने आया है उसने कांग्रेस के उस आरोप की जमीन, खिसका दी कि संघ आरक्षण के विरोध में है। जाति आधारित जनगणना के बारे में उसका यह कहना पूरी तरह सही है कि सरकार को सामाजिक कल्याण के लिए इस तरह के आंकड़ों की आवश्यकता होती है जिनका उपयोग राजनीति अथवा चुनाव जीतने के लिए नहीं होना चाहिए। क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से वंचित करने के बारे में भी संघ ने स्पष्ट किया कि इस बारे में संबंधित  जातियों को विश्वास में लेकर ही  निर्णय लेना उचित रहेगा। उल्लेखनीय है श्री गाँधी रोजाना जाति आधारित जनगणना के साथ ही जाति की संख्यानुसार हिस्सेदारी तय करने का राग अलापते हैं। यहाँ तक कि बजट बनाने वाली टीम में दलित और आदिवासी  अधिकारी न होने पर भी उन्होंने लोकसभा में  सवाल उठाया था। हाल ही में श्री गाँधी प्रयागराज में ये कहने के बाद हंसी का पात्र बन गए कि आज तक मिस इंडिया प्रतियोगिता में आरक्षित वर्ग की कोई लड़की विजेता नहीं बनी। हालांकि कांग्रेस की कर्नाटक सरकार उसके द्वारा करवाई गई जाति आधारित जनगणना  के आंकड़े सार्वजनिक करने का साहस नहीं जुटा पा रही क्योंकि जैसे ही उसका विवरण सामने आयेगा वैसे ही  लिंगायत और वोक्कालिंगा जैसे ताकतवर समुदाय सरकार के लिए खतरा बन जायेंगे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी जातिगत जनगणना करवाई थी । उसके आंकड़े भी जारी कर दिये गए जिससे  पता चला कि ओबीसी वर्ग में यादवों की सबसे बड़ी संख्या है। इस रिपोर्ट के आने के बाद लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार फूला नहीं समा रहा था किंतु जल्द ही गोप, गड़रिया, अहीर उपजातियों ने उनको यादवों से अलग दर्जा देने की माँग उछाल दी क्योंकि ओबीसी आरक्षण का बड़ा  लाभ यादव उठा लेते हैं। लोकसभा चुनाव में लालू  की पार्टी को बिहार में  कम सफलता मिलने के पीछे जातिगत जनगणना के आंकड़ों से विभिन्न उपजातियों में  उत्पन्न गुस्सा ही था। इसीलिए राहुल गाँधी के लगातार बोलते रहने के बावजूद कर्नाटक की कांग्रेस सरकार जातिगत जनगणना के आंकड़ों पर कुंडली मारकर बैठी हुई है। इंडिया गठबंधन की प्रमुख स्तंभ ममता बैनर्जी ने भी राष्ट्रीय स्तर पर जाति आधारित जनगणना की मांग को सिरे से नकार दिया। उनकी सरकार द्वारा नियम विरुद्ध जो ओबीसी आरक्षण किया गया वह भी कानूनी मकड़जाल में फंसा हुआ है। कांग्रेस 2018 से पाँच वर्ष तक छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सत्ता में रही। फिलहाल  कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में उसकी सरकार है किंतु उनकी ओर से इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया गया क्योंकि उससे होने वाले राजनीतिक नुकसान का अंदेशा उनको है। राहुल भी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं। लेकिन सही बात ये है कि जिस जातिवादी राजनीति के लिए कांग्रेस दूसरों को  कठघरे में खड़ा करती रही वे उसे उसी राह पर घसीट रहे हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि 1990 में भाजपा द्वारा समर्थन वापस लेने पर मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव की राज्य सरकारों को गिरने से बचाने की जो गलती स्व. राजीव गाँधी द्वारा की गई थी उसका खामियाजा   कांग्रेस आज तक भुगत रही है। भाजपा खुद भी लम्बे समय से सोशल इंजीनियरिंग रूपी दांव खेलने लगी है लेकिन वह  दिखावे से बचते हुए समरसता बनाये रखने का प्रयास करती रही जिसमें संघ का पूरा समर्थन मिला। लोकसभा चुनाव के परिणामों से उत्साहित श्री गाँधी जाति आधारित जनगणना को राम बाण औषधि  मान रहे हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से वंचित करने संबंधी टिप्पणी किये जाने से केंद्र सरकार और भाजपा दोनों असमंजस में थीं। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान संघ प्रमुख डाॅ. मोहन भागवत द्वारा आरक्षण की समीक्षा किये जाने संबंधी सुझाव को भाजपा विरोधी पार्टियों ने जमकर भुनाया था। इसी तरह 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष द्वारा  आरक्षण खत्म करने के प्रचार से उ.प्र में भाजपा को जबरदस्त नुकसान पहुंचा। लेकिन केरल से रा.स्व.संघ द्वारा दिये गए संदेश के बाद अब राष्ट्रीय विमर्श इस बात पर केंद्रित हो जाएगा आरक्षण, क्रीमी लेयर और जाति आधारित जनगणना चुनाव के मुद्दे हैं या सामाजिक कल्याण के जरिये। जिस तरह हिंदुत्व के चुनावीकरण पर विपक्ष उंगली उठाता रहा है उसी तरह श्री गाँधी सहित जाति की सियासत करने वाले नेता संघ  के निर्णय के बाद पिछले कदम पर आने बाध्य होंगे क्योंकि संघ किसी मुद्दे पर केवल प्रस्ताव पारित नहीं करता अपितु उसे घर - घर तक पहुंचाने के लिए भी हर संभव प्रयास करता है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 3 September 2024

मालदीव की तरह बांग्ला देश को भी रास्ते पर लाना जरूरी है


मालदीव में नई सरकार बनने के बाद उसने भारत से पंगा लेना शुरू कर दिया। राष्ट्रपति मुइज्जू ने चुनाव प्रचार में ही  कह दिया था कि जो भारतीय सैनिक वहाँ थे उनको वापस जाना होगा। भारतीय हैलीकाप्टरों के संचालन के लिए जो सैनिक टुकड़ी थी वह उनको बर्दाश्त नहीं थी। उनकी सरकार ने  भारतीय हितों  के विरुद्ध खुलकर बोलना शुरू कर दिया। इसका कारण मुइज्जू का चीन  समर्थक होना था। इस छोटे से टापू नुमा देश का इस तरह से आँखे तरेरना चौंकाने वाला था। हालांकि वह भारत का कुछ बिगाड़ सकने में सक्षम नहीं है किंतु पहले श्रीलंका और फिर मालदीव के चीन के प्रभावक्षेत्र में आ जाने से मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवालिया निशान लगने लगे , क्योंकि जो देश महाशक्ति बनने की राह पर हो उसके  छोटे - छोटे पड़ोसी देश भी उसके प्रभाव में न हों ये बात कुछ जमती नहीं।  पाकिस्तान, नेपाल और म्यांमार से भी हमारे रिश्ते सामान्य नहीं हैं। श्रीलंका में चीन ने अनेक बड़े प्रकल्पों का निर्माण कर 90 साल तक उनके उपयोग का  अनुबंध कर लिया।  हालांकि जब श्रीलंका में कंगाली के हालात बने तब भारत ने  उसकी हर संभव सहायता करते हुए संबंधों को पुनः मजबूत किया। उसके बाद मालदीव भी चीन की शह पर ऐंठने लगा। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्षद्वीप के समुद्रतट पर बैठकर उसके सौंदर्य की प्रशंसा कर मालदीव की रीढ़ पर जबरदस्त प्रहार किया। उनकी सांकेतिक कूटनीति रंग लाई। भारत से  सैलानियों ने वहाँ जाना रद्द कर दिया।  इससे मालदीव के  पर्यटन व्यवसाय  पर बुरा असर पड़ने लगा। मुइज्जू सरकार तो अपराधबोध के कारण कुछ बोलने में हिचकी किंतु वहाँ पर्यटन उद्योग से जुड़े लोग दौड़े - दौडे़ भारत की पर्यटन एजेंसियों के पास आकर गिड़गिड़ाने लगे। उधर केंद्र सरकार के इशारे पर लक्षद्वीप में  निवेश करने वाले उमड़ पड़े। थोड़े दिनों में ही मालदीव की अकड़ कम होने लगी। पहले तो मुइज्जू ने  भारत से अच्छे रिश्तों का बखान करना शुरू किया और फिर मौका मिलते ही दिल्ली आकर भारतीय नेताओं की मिजाजपुर्सी में लगे रहे।  श्रीलंका भी काफी कुछ रास्ते पर लौट आया है । नेपाल अपनी राजनीतिक अनिश्चितता में फंसा होने से फिलहाल ठण्डा है। वहीं म्यांमार के साथ झगड़ा केवल अवैध घुसपैठ को लेकर है। रही बात पाकिस्तान की तो वह अपने घरेलू मामलों में इतना उलझ गया है कि भारत से सीधे लड़ने की स्थिति उसकी है नहीं। चीन भी समझ गया है कि सैनिक मोर्चे पर भारत को दबाना असंभव होगा। बच रहा बांग्ला देश जिससे विगत 15 सालों में भारत के रिश्ते हर स्तर पर सबसे अच्छे दौर में थे। लेकिन अचानक  हालात उलट पुलट हो गए। शेख हसीना को सत्ता छोड़ भागकर भारत आना पड़ा। उनके स्थान पर जो अंतरिम सरकार बनी उसमें बैठे लोग ऐलानिया भारत विरोधी हैं। वहाँ रह रहे हिंदुओं को जिस प्रकार  से हमलों और लूटपाट का शिकार होना पड़ा उसके कारण भारत के सामने दोहरा संकट उपस्थित हो गया। सीमा पार से शरणार्थियों के आगमन को रोकने के अलावा वहाँ  रहने वाले हिंदुओं की सुरक्षा की चिंता करना भी जरूरी है। शेख हसीना को शरण देने के बारे में भी अब तक सरकार कुछ तय नहीं कर सकी। बांग्ला देश उनको दिल्ली में पनाह दिये जाने से नाराज है । ऐसे में कूटनीतिक, आर्थिक और मानवीय तीन मोर्चों पर भारत को निपटना पड़ रहा है। चूंकि बांग्ला देश में हालात सामान्य होने के संकेत मिलने लगे हैं और वैश्विक दबाव के कारण  हिंदुओं पर हमले भी कम होने लगे हैं इसलिए अब जरूरी है ढाका में बैठे नये हुक्मरानों से दो टूक  पूछा जावे कि उनको भारत से रिश्ते रखने हैं या नहीं और रखने हैं तो कैसे ? क्योंकि वहाँ हुआ सत्ता पलट चीन की बजाय अमेरिका के इशारे पर हुआ है। भारत को वहाँ की अंतरिम सरकार को  समझाना होगा कि यदि हम चीन के दबाव में नहीं आते और अमेरिका की नाराजगी के बाद भी यूक्रेन युद्ध में रूस का विरोध करने से बचे तब बांग्ला देश से डरने का सवाल ही नहीं  उठता। श्रीलंका और मालदीव  के बारे में भारतीय कूटनीति असरकारी साबित हुई है। आर्थिक नाकाबंदी ने नेपाल की अक्ल भी ठिकाने लगा दी। पाकिस्तान इस बात के लिए परेशान है कि भारत के साथ बातचीत शुरू हो। हालांकि बांग्ला देश के सुर भी कुछ नरम हुए हैं लेकिन वहाँ के कुछ नेता ज़हर बुझे तीर छोड़ने से बाज नहीं आते। ऐसे में कुछ न कुछ ऐसा किया जाना जरूरी है जिससे अंतरिम सरकार को ये चेतावनी  मिले कि भारत से रिश्ते बिगाड़ने पर उनका हर मोर्चे पर नुकसान होना तय है। हालांकि किसी देश के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप उचित नहीं होता किंतु इस देश का तो जन्म ही भारत के खुले हस्तक्षेप से हुआ था। आज फिर यदि वहाँ की स्थिति हमारे हितों के विरुद्ध हो तो इतिहास  द्वारा अपने आप को  दोहराए जाने की कहावत को चरितार्थ करने में संकोच नहीं करना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 September 2024

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा न्यायपालिका से की गई अपेक्षाओं का कोई असर नहीं होने वाला


राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का ये कहना पूरी तरह सही है कि ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब न्यायालय जाने से हिचकते हैं क्योंकि उनके मन में ये बात बैठ गई है कि अदालत जाने के बाद उनका जीवन तनाव पूर्ण हो जायेगा। जिला न्यायपालिका के राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र  में बोलते हुए उन्होंने कहा कि दुष्कर्म जैसे अपराधों में जब दशकों तक न्याय नहीं होता तो लोगों में ये अवधारणा प्रबल होती है कि  न्यायपालिका में  संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है। उन्होंने सुनवाई टालते रहने की प्रवृत्ति को समाप्त करने की अपेक्षा भी व्यक्त की। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भी इसी आशय के विचार व्यक्त कर चुके थे। देश की दो सबसे बड़ी संवैधानिक हस्तियों द्वारा कही गई उक्त बातों में कुछ भी नया नहीं है क्योंकि आम नागरिक के मन में न्यायपालिका की ऐसी ही छवि बन चुकी है। हाल ही में कुछ चर्चित मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालतों को फटकार लगाते हुए कहा गया था कि वे अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए मामला ऊपरी अदालतों के लिए छोड़ देते हैं। मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ तो इस बारे में खुलकर बोलते आ रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय पर भी ये तोहमत लगती रही है कि कुछ दिग्गज अधिवक्ताओं को वहाँ विशेष महत्व मिलता है। राजनेता और धनवान लोग उन अधिवताओं की मोटी फीस चुकाकर अपने पक्ष के मामले में तो जल्द  सुनवाई करवा लेते हैं वहीं  विरुद्ध चल रहे प्रकरणों में पेशियाँ बढ़वाकर न्याय प्रक्रिया को विलंबित करते हैं। इससे न्यायपालिका की छवि को तो बट्टा लग ही रहा है न्यायाधीशों के प्रति भी आम जनता के मन में जो सम्मान का भाव था उसमें कमी आ रही है। वकीलों की बढ़ती फीस भी न्याय प्राप्ति में बड़ी बाधा है। दीवानी प्रकरणों के निपटारे की कोई समय सीमा नहीं है और फौजदारी में जमानत हासिल करने के लिए  मुँह मांगी फीस चुकाना हर किसी के बस में नहीं। किसी वी. आई. पी की गिरफ्तारी में निचली अदालत से जमानत रद्द होते ही ऊपरी अदालत में फौरन तारीख मिल जाती है जबकि साधारण व्यक्ति को महीनों इंतजार करना होता है। यही वजह है कि कानून के रास्ते  पर चलने वाले साधारण नागरिक की न्यायपालिका में आस्था कम हो रही है वहीं कानून तोड़ने का दुस्साहस करने वालों के मन में उसके प्रति खौफ बचा ही नहीं । इस स्थिति के लिए वकील ज्यादा जिम्मेदार हैं या न्यायाधीश इस पर बहस हो सकती है किंतु कुछ हद तक दोनों की जिम्मेदारी बनती है। बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के लिए मृत्यदंड का प्रावधान होने के बाद भी वह रुकने का नाम नहीं ले रहा। प. बंगाल में ममता बैनर्जी की सरकार दुष्कर्म के विरुद्ध कोई नया कानून विधानसभा में लाने जा रही है । विपक्षी दल भाजपा ने भी उसको समर्थन देने की घोषणा कर दी। इसके पहले ममता ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बलात्कार पर मृत्युदंड   देने संबंधी कानून बनाने की मांग भी की थी। लेकिन इस तरह की कोशिशें भी महज दिखावा है जो दुष्कर्म की हर बड़ी वारदात के बाद किया जाता है। कोलकाता में हाल ही में एक महिला चिकित्सक की बलात्कार के बाद हत्या  देश भर में चर्चा का विषय बन गई। उसे लेकर वैसा ही गुस्सा फूट पडा जैसा बरसों पहले दिल्ली में निर्भया काण्ड के बाद देखने मिला था। उस काण्ड के बाद  बलात्कार के मामलों में निचली अदालतों ने बिजली जैसी फुर्ती से निपटारे किये। कुछ में तो  एक महीने के भीतर ही मृत्यदंड तक दे दिया गया। लेकिन वह उत्साह  क्षणिक ही था। न तो दुष्कर्म  रुके और न ही अदालतों की वह तेजी बरकरार रही। ये देखते हुए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा न्यायपालिका को जो नसीहत दी गई वह भी उस सम्मेलन में उपस्थित  प्रतिनिधियों के एक कान से घुसने के बाद दूसरे से निकल गई होगी। कोलकाता कांड से राज्य सरकार की छवि पर लगे धब्बे  प्रस्तावित कानून के पारित होने पर भी नहीं साफ होने वाले। सही बात तो ये है कि जनता को सस्ता और जल्द न्याय दिलवाने के प्रति सबंधित कोई भी पक्ष ईमानदार नहीं है। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों अपने आप में मस्त हैं। उन्हें न्याय व्यवस्था में कमी और खामी तभी नजर आती है जब उससे उनका कोई अहित हो रहा हो। जहाँ तक बात जनता  की है तो उसकी तकलीफ सुनने की फुर्सत किसी के पास नहीं। इस आधार पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा न्यायपालिका से की गई अपेक्षाएं कुछ दिन के बुद्धिविलास के उपरांत हवा - हवाई होकर रह जाएंगी क्योंकि पहले भी ऐसा होता रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी