Wednesday, 31 December 2025

प्रदूषित पेय जल से मौतें : इंदौर की स्वच्छ छवि कलंकित


भारत द्वारा जापान को पीछे छोड़ विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाना गौरव का विषय है। जिस गति से हम बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि जल्द ही जर्मनी से भी आगे निकलकर भारत तीसरे स्थान पर आ जाएगा और तब केवल अमेरिका और चीन ही हमसे आगे होंगे। इस वर्ष जो रफ्तार है उसके आधार पर दुनिया भर की प्रतिष्ठित रेटिंग एजेंसियों का अनुमान  है कि भारत  औसतन 6.5 फीसदी की दर से विकास करते हुए  दुनिया में सबसे तेज गति से  बढ़ रही अर्थव्यवस्था होने का श्रेय अपने नाम बनाए  रखेगा। निश्चित रूप से ये उपलब्धि सुखद एहसास कराती है। भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा में जो वृद्धि बीते एक दशक में हुई उसके पीछे विकास दर की तेज रफ्तार ही है। लेकिन इस गौरवशाली उपलब्धि के बावजूद ये खबर शर्मिंदा करती है कि लगातार देश के सबसे स्वच्छ शहर का पुरस्कार जीतने वाले  इंदौर  के एक आवासीय इलाके में दूषित पेयजल आपूर्ति के कारण हजारों लोग बीमार हो गए और 8 की मृत्यु भी हो गई। प्राप्त जानकारी के अनुसार वहां की पाइप लाइन खराब होने के बावजूद बदली नहीं गई जबकि चार महीने पहले उसकी निविदा जारी हो चुकी थी किंतु नगर निगम की निकम्मी नौकरशाही ने उन्हें खोलने का कष्ट नहीं उठाया। अब हजारों लोग दूषित पानी पीकर बीमार हुए और मौतें भी हो गईं तब जाकर भ्रष्ट व्यवस्था की कुंभकर्णी नींद खुली और निविदाएं खोली गईं। बीते कई दिनों से गंदा पानी नलों में आने की शिकायत के बाद भी नगर निगम के हुक्मरान लापरवाह बने रहे। यदि दूषित जल से लोगों की जान नहीं जाती तब मामले पर लीपापोती कर दबा दिया जाता किंतु समाचार माध्यमों ने जब पर्दाफाश किया तब प्रशासनिक अमला हरकत में आया।  हालांकि  स्वास्थ्य विभाग की मानें तो एक भी मौत नहीं हुई जबकि इंदौर के एकछत्र नेता और प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने ही 2 - 3 लोगों के मरने की बात मानी है। स्मरणीय है वे यहां के महापौर भी रह चुके हैं। इंदौर प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी कहलाता है। स्वच्छता  सर्वेक्षण में अनेक वर्षों से देश का सबसे अग्रणी शहर होने के कारण पूरे देश में इसकी सकारात्मक छवि बनी थी । लेकिन प्रदूषित पेय जल के कारण हजारों लोगों के बीमार होने और कुछ की जान चली जाने की घटना ने उस छवि को बट्टा लगा। दिया। इंदौर के महापौर पद पर आसीन पुष्यमित्र  भार्गव काफी लोकप्रिय और कार्यकुशल माने जाते हैं ।  और तो और वहां के प्रभारी मंत्री  प्रदेश के मुख्यमंत्री ही हैं। उसके बाद भी  क्षतिग्रस्त पाइपलाइन की निविदा जारी होने के बावजूद महीनों तक उसके बारे में फैसला न लिया जाना आपराधिक उदासीनता के अलावा और कुछ नहीं है। जिन अधिकारियों के कारण ये दर्दनाक स्थिति उत्पन्न हुई उन्हें इतनी कड़ी सजा मिलनी चाहिए जिससे  पूरे प्रदेश के स्थानीय निकायों में बैठी नौकरशाही दहशत में आए। जहां एक तरफ भारत अंतरिक्ष की ऊंचाई नापने का कारनामा कर रहा है वहीं हम दूसरी तरफ अपनी जनता को पीने योग्य साफ पानी उपलब्ध करवाने में नाकाम साबित हों तो ये डूब मरने वाली बात है। यद्यपि  प्रदूषित पेय जल केवल इंदौर नहीं अपितु ज्यादातर शहरों की समस्या है। इसके कारण सामान्य  तौर पर लोगों को  आंत्रशोध और पीलिया जैसी बीमारियां होने की खबरें आया करती थीं किंतु इंदौर नगरनिगम की लापरवाही ने निर्दोष लोगों को मौत के मुंह में धकेल दिया जो कि बेहद चिंता और डर पैदा करने वाला है। इसकी जांच भी चूंकि सरकारी अमला ही करेगा इसलिए उसमें अपनी बिरादरी के लोगों को बचाने का भरपूर प्रयास होना तय है। वैसे  भी इंदौर जैसे महत्वपूर्ण शहर की नगर निगम में पदस्थ बड़े अधिकारी भी सत्ता प्रतिष्ठान के चहेते ही होंगे। बावजूद  इसके प्रदेश  के सबसे बड़े शहर में अशुद्ध पेय जल से लोगों के मरने की स्थिति बन जाए तब दुख के साथ ही गुस्सा भी आता है। लेकिन  सवाल वही है कि लोग अपना गुस्सा उतारें भी तो किस पर क्योंकि नेताओं और नौकरशाहों के बीच अघोषित गठबंधन के आगे सब लाचार हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 30 December 2025

खालिदा की मौत के बाद बांग्लादेश फिर अनिश्चितता के साये में



ऐसे समय जब बांग्लादेश में नए चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है तब पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का निधन वहां की राजनीति में खालीपन छोड़ने के  साथ ही अनिश्चितता को बढ़ावा दे सकता है।  गत दिवस ही उन्होंने अपना नामांकन भरा था।  स्मरणीय है  दस वर्षों तक  प्रधानमंत्री रहीं खालिदा के पति जिया उर रहमान  शेख मुजीब की हत्या के बाद पहले सेनाध्यक्ष और फिर राष्ट्रपति निर्वाचित हुए किंतु उनकी भी हत्या कर दी गई जिसके बाद  बीएनपी ( बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) की कमान खालिदा जिया ने संभाली । जब शेख हसीना सत्ता में आईं तब खालिदा को भ्रष्टाचार के आरोप में दस वर्ष की सजा सुनाए गई। गत वर्ष हुए तख्ता पलट के बाद ही वे जेल से बाहर आईं । तभी से ये कयास लगाए जा रहे थे कि वे फिर से देश की सत्ता संभालेंगी क्योंकि हसीना की पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया। वैसे भी हसीना के देश छोड़ने के बाद उनकी पार्टी पूरी तरह बिखराव का शिकार हो चुकी है। इसीलिए बीएनपी के लिए रास्ता साफ नजर आ रहा था और खालिदा  की सत्ता में वापसी भी सुनिश्चित थी। कुछ दिन पहले ही जबसे उनके बेटे तारिक रहमान 17 वर्ष के निर्वासन उपरान्त देश लौटे तबसे माना जाने लगा कि वे बीएनपी का भविष्य हैं। वैसे भी बेगम जिया का स्वास्थ्य जिस तेजी से बिगड़ रहा था उसे देखते हुए तारिक उत्तराधिकारी के तौर पर उभर रहे थे। और जब चुनाव नामांकन के दौरान ही उनकी माँ चल बसीं तब सहानुभूति की लहर पर सवार होकर वे बांग्लादेश के नए निर्वाचित प्रधानमंत्री बन सकते हैं। लेकिन  इस देश की तासीर को देखते हुए कुछ भी पक्के तौर पर कह पाना कठिन है क्योंकि जिन युवाओं ने शेख हसीना के विरुद्ध जनांदोलन किया उन्होंने सीएनपी नामक पार्टी बनाकर कट्टरपंथी जमायत ए इस्लामी से गठजोड़ कर लिया जिस पर हसीना सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा था । यूनुस ने सत्ता में आते ही उसे हटाकर कट्टरपंथी ताकतों का हौसला बढ़ाया। सीएनपी  के पक्ष में युवाओं का  झुकाव देखते हुए ये गठबंधन बीएनपी की राह में रोड़ा अटकाए बिना नहीं रहेगा। हाल ही में युवाओं के नेता हादी की हत्या के बाद हुए हिंसक आंदोलन के बाद ये आशंका भी है कि यूनुस किसी न किसी बहाने चुनाव टालते रहेंगे जिससे सत्ता की कमान उनके हाथ से न निकले। अब जबकि खालिदा का निधन हो चुका है तब सभी की निगाहें उनके पुत्र तारिक पर जमी हैं। फिलहाल बांग्लादेश में कद्दावर राजनेताओं का अभाव होने से राजनीति का  दूसरा धड़ा कट्टरपंथी जमायत के अलावा ऐसे युवाओं के हाथ में आ गया है जिनकी कोई स्पष्ट सोच नहीं है। ऐसे में तारिक  प्रधानमंत्री बनने में सफल होंगे ये अनिश्चित है। हालांकि इस समय देश में उनकी पार्टी ही राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद है लेकिन 17 वर्षों तक देश से बाहर रहने के कारण वे जनता से अपना जुड़ाव किस हद तक स्थापित कर पाएंगे ये बड़ा सवाल है। रही बात भारत की तो ये सर्वविदित है कि चाहे तारिक सत्ता संभालें या किसी अन्य की किस्मत जोर मारे लेकिन ये तय है कि बांग्लादेश में इस समय भारत विरोधी तत्वों का बोलबाला है। खालिदा भी भारत के  प्रति शत्रुता का भाव रखती थीं । इस प्रकार समूचा बांग्लादेश  वर्तमान में भारत विरोधी ताकतों के हाथ में है। अवामी लीग मुकाबले से बाहर है और हिन्दू समुदाय आतंक  के साये में है। ऐसे में चुनाव के बाद भी स्थिरता लौटेगी इसमें संदेह है। सबसे बड़ा  सवाल ये है कि क्या यूनुस हाथ आई सत्ता इतनी आसानी से छोड़ देंगे ? और ये भी कि शेख हसीना का तख्ता पलटने वाले युवाओं के नेता क्या तारिक को आसानी से अपना नेता स्वीकार कर लेंगे क्योंकि जिस भ्रष्टाचार के कारण हसीना को सत्ता से उतरने बाध्य किया गया वैसे ही तो खालिदा और उनकी पार्टी पर लगे थे और देश छोड़ने से पहले तारिक भी भ्रष्टाचार से जुड़े होने के आरोप में गिरफ्तार हुए थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 29 December 2025

दिग्विजय के बयानों से कांग्रेस की अंतर्कलह उजागर


म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में क्रमशः भोपाल और राजगढ़ से बुरी तरह हार चुके हैं। फिलहाल वे राज्यसभा में हैं जिसका कार्यकाल 2026 में खत्म होने जा रहा है। 2020 के राज्यसभा चुनाव के पहले उनके और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच हुई खींचतान के कारण कांग्रेस विधायक दल में फूट पड़ने से उनके गुट के 22 विधायक बगावत कर भाजपा में आ गए जिससे कमलनाथ सरकार गिर गई। यद्यपि सिंधिया परिवार और दिग्विजय के बीच अहं की लड़ाई पुरानी है। लेकिन 2018 में जब कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर मिला तब  ज्योतिरादित्य को उम्मीद थी कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जायेगा। राहुल गाँधी से नजदीकी  उनके आत्मविश्वास का आधार था। लेकिन दिग्विजय ने कमलनाथ का साथ देकर उनकी ताजपोशी करवा दी। उसके बाद जब 2019 के लोकसभा चुनाव में श्री सिंधिया अपनी परंपरागत सीट गुना से हार गए। तब उन्होंने राज्यसभा के लिए हाथ - पांव मारना शुरू किया। लेकिन यहाँ भी श्री सिंह उनके रास्ते में रोड़ा अटकाने लगे तो उन्होंने अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए भाजपा का दामन पकड़ा और केन्द्र सरकार में मंत्री बन गए। 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जबरदस्त सफलता हासिल की।  2024 के लोकसभा चुनाव में तो म. प्र की सभी सीटें कांग्रेस हार गई। यहाँ तक कि कमलनाथ अपने बेटे नकुलनाथ तक को नहीं जिता पाए। इसके बाद कांग्रेस हाईकमान की नींद टूटी जिसका प्रमाण कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाये जाने से मिला। नेता प्रतिपक्ष सहित दोनों पदों पर की गई नियुक्तियों में श्री नाथ और श्री सिंह की पसंद का ध्यान नहीं रखे जाने से ये संकेत गया कि अब प्रदेश  कांग्रेस को दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के  वर्चस्व से आजाद कराने की शुरुआत हो चुकी है। श्री नाथ ने  संगठन में राष्ट्रीय स्तर का कोई पद लेना चाहा किंतु अब तक उनकी दाल नहीं गली। दूसरी तरफ दिग्विजय भी गाँधी परिवार के चहेतों की सूची से धीरे - धीरे बाहर होने लगे।स्मरणीय  है श्री नाथ और उनके पुत्र नकुल के भाजपा में शामिल होने की खबरें कई बार उड़ने के बाद शांत हो गईं। इधर दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह एक बार फिर कांग्रेस से बाहर आकर उसके नेतृत्व पर निशाना साध रहे हैं। जिस पर दिग्विजय कुछ नहीं कहते। इसी तरह उनके विधायक पुत्र जयवर्धन हिन्दू राष्ट्र के समर्थक बागेश्वर धाम के मुखिया धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के आयोजनों में शिरकत करने लगे जो बिना पिता की सहमति के संभव नहीं था। राजनीति के जानकार इससे चौंके जरूर  किंतु दिग्विजय सिंह के भाजपा विरोधी बयानों के कारण किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका। लेकिन पिछले कुछ दिनों में दो बातें ऐसी हुईं जिनके कारण कांग्रेस के भीतर खलबली मची। पहली ये कि एक टीवी चैनल पर दिग्विजय ने रा.स्व.संघ को देश विरोधी मानने से इंकार करते हुए कहा कि अपनी स्थापना से लेकर शताब्दी पूरी करने तक उसने कभी भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की प्रतिबद्धता नहीं छोड़ी। उसके प्रचारकों के मन में भी हिन्दू राष्ट्र की भावना कूट - कूटकर भरी है। इसके बाद गत सप्ताह उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पुराना फोटो जारी किया जिसमें कुर्सी पर बैठे लालकृष्ण आडवाणी के सामने जमीन पर नरेंद्र मोदी बैठे दिखाई दे रहे हैं। इसके साथ टिप्पणी की कि  जिस तरह रा.स्व.संघ के जमीनी स्तर के स्वयंसेवक और जनसंघ के कार्यकर्ता नेताओं के चरणों में बैठकर राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री बनते हैं, यही इस संगठन की ताकत है , जय सिया राम। उनकी उक्त टिप्पणी ने हलचल मचा दी। कांग्रेस में इसे लेकर तरह - तरह के कयास लगने लगे। कुछ ने इसे दबाव बनाने की कोशिश कहा क्योंकि अगले साल श्री सिंह की राज्यसभा सदस्यता समाप्त होने वाली है और म.प्र में कांग्रेस केवल एक ही सीट जीत सकती है। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक और स्थापना दिवस के पहले आई उक्त पोस्ट ने कांग्रेस हाईकमान को  परेशान कर दिया क्योंकि भाजपा के बहाने उन्होंने अपनी पार्टी को ही निशाना बनाया। पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे शशि थरूर और सलमान खुर्शीद जैसे नेता जहाँ उस पोस्ट के पक्ष में दिखे वहीं राहुल सहित अनेक नेताओं को उनकी हरकत नागवार गुजरी। जिसके बाद दिग्विजय ने लीपापोती वाला बयान देकर खुद को बचाने की कोशिश की किंतु जितना नुकसान होना था वह हो चुका। म.प्र में उनके कारण ही कांग्रेस 22 साल पहले सत्ता से ऐसी हटी कि अब तो उसकी वापसी असंभव लगने लगी। अपने हिन्दू विरोधी बयानों से वे समय - समय पर कांग्रेस की जड़ों में मठा डालने का काम करते रहे हैं। उनके ताजा बयान पार्टी के भीतर चल रही उथलपुथल को उजागर करने वाले हैं। ऐसा लगता है गाँधी परिवार के प्रति उनकी निष्ठा भी खत्म हो रही है। बड़ी बात नहीं जल्द ही वे भी असंतुष्टों के साथ खड़े नजर आयें और म.प्र की तरह से ही राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस का बंटाधार करने जुट जाएं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 27 December 2025

सोना - चांदी के महत्व को भारत ने सदियों पहले जान लिया था


वैश्विक अर्थव्यवस्था में इन दिनों डॉलर, यूरो, येन और युआन सब महत्वहीन होकर रह गए हैं। पूरी दुनिया सोने और चांदी की खरीदी में जुटी है। इसका कारण प्रथम दृष्ट्या तो यूक्रेन -रूस और इसरायल - हमास युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों को माना गया क्योंकि जिस तरह से तनाव बढ़ रहा था उससे तीसरे विश्व युद्ध की आशंका बलवती होने लगी थी। हालांकि इसरायल और हमास  के बीच तो फिलहाल जंग रुकी है लेकिन रूस और यूक्रेन में युद्धविराम की संभावनाएं अनिश्चितता में फंसी होने से पूरा विश्व अस्त- व्यस्त है। और उस पर भी 2025 की शुरुआत में दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प की सनक भरी हेकड़ी ने उथलपुथल मचाकर रख दी। अमेरिका की अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट को थामने के लिए उन्होंने विभिन्न देशों पर अनाप - शनाप टैरिफ थोपने के अलावा अमेरिकी वीजा के लिए कड़ी शर्तें तो लगाई हीं , अप्रवासियों को अमानुषिक तरीकों से बाहर निकालने का अभियान छेड़ दिया। चीन और भारत जैसे दो बड़े देशों ने उनकी धौंस में आने से इंकार करते हुए अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने का जो दुस्साहस किया उसकी प्रतिक्रियास्वरूप ट्रम्प की बौखलाहट बढ़ती गई तथा वे टैरिफ की दरें बढ़ाने जैसी मूर्खता करते गए। लेकिन उनके टैरिफ आतंक के सामने घुटने टेकने के बजाय चीन, भारत, ब्राज़ील और द. अफ्रीका जैसी ऊपर उठती अर्थव्यस्था वाले देशों ने अमेरिकी डॉलर की चौधराहट तोड़ने का बीड़ा उठाते हुए यूरो जैसी  वैकल्पिक साझा मुद्रा प्रारंभ करने की पहल कर डाली। रूस भी उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों से उबरने के लिए डॉलर विरोधी इस मुहिम में शामिल हो गया। इसका असर यूरोपीय यूनियन में शामिल देशों पर भी हुआ और उन्होंने भी अमेरिकी दादागिरी से आजाद होने के लिए हाथ - पाँव मारना शुरू कर दिया। लेकिन ये बात भी सही है कि डॉलर की पकड़ को ढीला करना आसान नहीं है। यूरोप के विकसित कहे जाने वाले देशों में कुछ को छोड़ शेष इन दिनों मुस्लिम  शरणार्थियों द्वारा उत्पन्न समस्याओं से जूझ रहे हैं। जनसंख्या संतुलन बिगड़ने की वजह से उनका  समूचा आर्थिक नियोजन गड़बड़ा गया है। रूस के अलग - थलग पड़ जाने से यूरोप को कच्चे तेल और गैस के अलावा खाद्यान्न की किल्लत से जूझना पड़ रहा है। कुल मिलाकर वैश्विक परिदृश्य में आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति है। इसका मनोवैज्ञानिक असर अविश्वास के रूप में होने से प्रचलित मुद्राओं की साख का संकट मंडराने लगा। भले ही शीतयुद्ध के हालात नहीं हैं किंतु पूरी दुनिया इस समय चिंता के माहौल में जी रही है। सोना और चांदी दुनिया की सबसे पुरानी उन धातुओं में से हैं जो किसी भी मुद्रा पर भारी पड़ती हैं और जिनकी स्वीकार्यता दुनिया के सभी हिस्सों में एक जैसी है। किसी देश की मुद्रा का विनिमय मूल्य उसके पास रखे  स्वर्ण भंडार से ही तय होता है। ज्ञान - विज्ञान में  कल्पनातीत तरक्की के बावजूद सोने और चांदी का महत्व लेश मात्र भी कम नहीं हुआ। भारत ने तो इनके सर्वकालिक महत्व को सदियों पूर्व समझ लिया था जिसकी वजह से उसे  सोने की चिड़िया जैसा विशेषण प्राप्त हुआ। भले ही हम सदियों तक विदेशी शक्तियों के गुलाम रहे किंतु भारत में सोना और चांदी ही नहीं अपितु अन्य धातुओं में निवेश की परिपाटी भी कायम रही। आज भले ही अमेरिका और चीन के सरकारी  स्वर्ण भंडार दुनिया में सर्वाधिक हों किंतु भारत की जनता के निजी आधिपत्य वाले स्वर्ण को मिलाया जाए तो वह दोनों से ज्यादा निकलेगा। बीते एक वर्ष से सोने - चांदी की कीमतें जिस आश्चर्यजनक तरीके से उछाल मार रही हैं उसने भारतीय आर्थिक सोच को पुनर्स्थापित कर दिया। भारत भले ही पूर्ण विकसित देशों से पीछे हो किंतु आज भी वह सोने का सबसे बड़ा आयातक है तो उसका कारण धातुओं  के निवेश में निहित सुरक्षा है। गत दिवस  खबर  आई कि सोने और चांदी के साथ भी तांबा जैसी धातु की मांग में अचानक तेजी आने से उसके दाम भी चढ़ने लगे । उसके अलावा प्लेटिनम आदि भी महंगे हो गए। हालांकि चांदी की महंगाई को उसके औद्योगिक उपयोग से जोड़कर देखा जा रहा है किंतु अधिकांश देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़े पैमाने पर सोने की खरीदी कागजी मुद्रा के प्रति बढ़ते अविश्वास का संकेत है। दुनिया इस बात को समझ चुकी है कि विषम हालातों में सोना ही आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है। हालांकि ये दौड़ कहां जाकर ठहरेगी कहना कठिन है । लेकिन फिलहाल जो देखने मिल रहा है उसने आर्थिक विश्लेषकों को भारतीय अर्थव्यवस्था के इस मौलिक सिद्धांत में विश्वास के लिए बाध्य कर दिया है कि वैज्ञानिक प्रगति से आई चकाचौंध अस्थायी और क्षणभंगुर  है जबकि सोना और चांदी की चमक कभी फीकी नहीं पड़ेगी। ईश्वर न करे यदि विश्वयुद्ध हुआ तब जिस देश के पास जितना सोना - चांदी होगा वह उतनी ही सुविधाजनक और सुरक्षित स्थिति में रहेगा। इसीलिए  इन दोनों की कीमतें आये दिन आसमान छू रही हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 26 December 2025

भारतीय फिल्मों में सच्चाई दिखाने के दौर की शुरुआत अच्छा संकेत


इन दिनों धुरंधर नामक एक फिल्म की सर्वत्र चर्चा है।   चूंकि इसने ब्लॉक बस्टर होने का स्तर छू लिया इसलिए व्यवसायिक सिनेमा की दृष्टि से ये सफलतम फिल्मों की श्रेणी में आकर खड़ी हो गई । यद्यपि ये आम मुंबैया फॉर्मूला फिल्मों से अलग हटकर कथानक पर आधारित है जिसमें आतंकवाद, राजनीति, माफिया, जासूसी और सबसे ऊपर राष्ट्रवाद है। शुरुआत में फिल्म ने रफ्तार नहीं पकड़ी तब लगा कि वह दर्शकों द्वारा नापसंद कर दी गई किंतु एक सप्ताह के बाद वह नये कीर्तिमान बनाने लगी । कहने को तो फिल्म में अनेक नामी अभिनेता हैं किंतु खालिस मनोरंजन फिल्म न होने से इसकी सफलता पर संदेह के बादल मंडरा रहे थे। लेकिन दर्शकों ने इसके प्रति जो उत्साह दिखाया वह भारतीय फिल्म उद्योग में नये युग का सूत्रपात माना जा सकता है जिसमें केवल दिखावटी देशभक्ति की बजाय असली समस्याओं को उजागर कर लोगों को उनके प्रति जागरूक करने का मकसद है। बीते कुछ वर्षों में कश्मीर, केरल और बंगाल को लेकर कुछ ऐसी फिल्में बनाई गईं जिनमें उन सच्चाइयों को दर्शाया गया है जिन्हें देश की जनता से छिपा लिया गया। इसी तरह कुछ ऐतिहासिक और राजनीतिक हस्तियों पर बनी फिल्में भी दर्शकों द्वारा सराही गईं। इसीलिए उनके प्रदर्शित होते ही सिने जगत के चौधरियों के पेट में मरोड़ शुरू हो गया जो केवल नृत्य - संगीत, रोमांस और एक्शन को ही फिल्म की सफलता का आधार समझते रहे। आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता का सहारा लेना भी आम होता जा रहा था। ओ. टी. टी नामक माध्यम ने तो नंगेपन की हदें पार कर डालीं।  कभी - कभी तो लगता है मानों फिल्म उद्योग के पास अच्छे पटकथा और संवाद  लेखकों का बड़ा अभाव हो चला है। ऐसे वातावरण में देश से जुड़े मुद्दों पर फिल्में बनाने का प्रयास साहसिक भी है और सराहनीय भी। पहले ऐसे विषयों पर फिल्म बनाने में  आर्थिक जोखिम होने से उनमें पैसा लगाने वाले नहीं मिलते थे। लेकिन  अब फिल्म उद्योग को ये समझ में आने लगा है कि दर्शक विशुद्ध मनोरंजन और हल्की - फुलकी पारिवारिक फिल्मों के अलावा ऐसी  फिल्मों को भी टिकिट खरीदकर देखने में भरपूर रुचि लेने लगा है। भले ही ये कहा जाए कि इनके निर्माण के पीछे मौजूदा केंद्रीय सत्ता की भूमिका है किंतु जो फिल्में मनोरंजन के साथ ही लोगों को देश के सामने खड़े खतरों से अवगत कराने के साथ ही राष्ट्रवादी भावना का संचार करती हैं , उन्हें हर दृष्टि से प्रोत्साहित किया जाना जरूरी है। उस लिहाज से धुरंधर ने फिल्म निर्माण के साथ ही दर्शकों की बदलती सोच का जो संकेत दिया उससे  वस्तुवादी धरातल वाली फिल्मों का रास्ता खुल गया। कहते हैं उसके निर्माता ने फिल्म का अगला भाग भी तैयार करके रख लिया है जिसे कुछ माह बाद प्रदर्शित किया जाएगा। धुरंधर फिल्म के कथानक को सांप्रदायिक बताने वालों को कोई महत्व नहीं मिलना भी हवा का रुख बदलने का इशारा है। कुछ फिल्मी दिग्गजों को तो इस फिल्म की आलोचना करने के बाद पलटी मारने मजबूर होना पड़ा। इसका असर केवल भारत में ही होता तब वह सामान्य बात होती क्योंकि अतीत में भी दर्जनों ऐसी फिल्में बनाई जा चुकी हैं जिनके कारण देशभक्ति की भावना का संचार हुआ।  चीन और पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाइयों पर भी अनेक फिल्में बनीं जो सफल भी रहीं। आतंकवाद को आधार बनाकर भी फिल्में बनाई गईं किंतु बीते कुछ सालों के भीतर कुछ ऐसी फिल्मों को दर्शकों ने जमकर सराहा जिनमें वास्तविकता को साहसिक तरीके से फिल्माया गया। इसीलिए इनकी प्रतिक्रिया देश की सीमाओं से परे भी हुई। धुरंधर के कुछ चरित्रों को लेकर पाकिस्तान में जिस तरह से बवाल मचा उससे लगा कि फिल्म का कथानक तैयार करने में काफी मेहनत और शोध हुआ। भारत में दुनिया की सबसे अधिक फिल्में बनती हैं किंतु अभी भी हमारे फिल्म उद्योग को वैश्विक स्तर पर खास सम्मान नहीं मिलता क्योंकि वे  सच्चाई से दूर रहती हैं। आतंकवाद के विषय पर बनी कुछ फिल्मों में कहानी को ऐसा मोड़ दिया गया जिससे निंदा करने के बजाय उसके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित हुई। लेकिन अब ऐसा लगता है भारतीय फिल्म निर्माता ढर्रे से निकलकर जमीनी सच्चाई से दर्शकों को अवगत करवाने का साहस दिखा रहे हैं। इसके पीछे बड़ा कारण देश के राजनीतिक परिदृश्य में आया बदलाव भी है। इसके अलावा राष्ट्रवाद का उभार भी फिल्म निर्माताओं को अपना रवैया बदलने प्रेरित कर रहा है। धुरंधर की सफलता ने फिल्म उद्योग के  स्थापित छत्रपों के वर्चस्व को जिस प्रकार से चोट पहुंचाई उसे एक नये दौर की शुरुआत कहा जा सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 25 December 2025

वरना साँस का संकट पूरे देश को घेर लेगा


बीते कुछ दिनों से पश्चिमी उ.प्र से , हरियाणा और राजस्थान तक फैली अरावली पर्वतमाला को खनन माफिया से होने वाले नुकसान से बचाने हेतु हो रहा आंदोलन चर्चा का विषय बना हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय के एक ताजा फैसले के कारण ऐतिहासिक अरावली के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। न सिर्फ पर्यावरण प्रेमी अपितु इस क्षेत्र में रहने वाले आम नागरिक के मन में भी अरावली को खनन माफिया के हवाले किये जाने के फैसले से गुस्सा है। यद्यपि केंद्र सरकार ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए तत्काल प्रतिबंधात्मक कदम उठाये हैं परंतु  ऊंचाई के आधार पर  पहाड़ की परिभाषा तय करने के बाद अरावली में उत्खनन का रास्ता साफ होने से इस अंचल के रहवासियों में चिंता और गुस्से की लहर दौड़ पड़ी। इसकी रोषपूर्ण प्रतिक्रिया समूचे देश में होने से केंद्र सरकार भी हरकत में आई और उसने कुछ कदम उठाये। हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि इनसे  अरावली को बचाने में सफलता मिलेगी या नहीं किंतु इतना तो हुआ कि पर्यावरण संरक्षण को लेकर लोग मुखर हुए। अरावली की नैसर्गिक संरचना को नष्ट करने से दिल्ली, उ.प्र और अन्य निकटवर्ती राज्यों में राजस्थान के मरुस्थलों से आने वाली आँधियों के जरिये धूल उड़कर फैलने का खतरा जो बताया जा रहा है वह निराधार नहीं है। ऐसा होने पर खेतों  के अलावा पेड़ - पौधों की सेहत भी बिगड़ेगी। उल्लेखनीय है खनन माफिया की धन कमाने की वासना के कारण देहरादून के आसपास की प्राकृतिक संरचना बुरी तरह बिगड़ चुकी है। समूचे गढवाल अंचल में भी पहाड़ों के साथ किये गए निर्मम व्यवहार का दुष्प्रभाव जल्दी - जल्दी दिखाई देने लगा है। इसे लेकर चिंता तो खूब व्यक्त की जाती है लेकिन जो किया जाना चाहिए वह नहीं होने से हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं। इसके अलावा हिमालय के बाकी हिस्सों में भी मानवीय हस्तक्षेप के कारण प्रकृति का कोप समय - समय पर प्रकट होता रहता है। इस साल बरसात के मौसम में जितने भूस्खलन हिमालय के विभिन्न हिस्सों में हुए वे भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्व संकेत हैं। विकास की अंधी दौड़ में  प्रकृति और पर्यावरण से छेड़छाड़ कितनी महंगी पड़ती है ये देश की राजधानी दिल्ली और उसके हिस्से बन बन चुके नोएडा तथा ग़ाज़ियाबाद में रहने वालों से पूछा जा सकता है। कहने को दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय महानगर है। शहरी विकास की सभी योजनाएं वहाँ लागू हैं। पूरी सरकार वहाँ रहती है। संसद और सर्वोच्च न्यायालय है। देश - विदेश से आवागमन की भरपूर सुविधाएं हैं।ढेर सारे  पांच सितारा होटल हैं। लेकिन एन.सी.आर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में रहने वाले शुद्ध हवा में सांस लेने को तरस रहे हैं। संसद से सर्वोच्च न्यायालय तक में इसकी चर्चा होने के बाद भी कोई समाधान नजर नहीं आता। जो कदम उठाये भी जाते हैं वे अपर्याप्त साबित होने से लोगों की मुश्किलें बजाय खत्म होने के और बढ़ती जा रही हैं। सरकारें बदलने के बावजूद दिल्ली की दुर्दशा दूर नहीं हो रही। इससे स्पष्ट है कि प्रकृति से लड़कर पर्यावरण का संरक्षण नहीं किया जा  सकता। इसके बाद भी अरावली के सीने पर जेसीबी चढ़ाना जानबूझकर अपने विनाश को न्यौता देना है। हालांकि कुछ लोग ये प्रचारित कर रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की गलत व्याख्या की जा रही है। लेकिन ये कहना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं होगा कि समूचे देश में खनन व्यवसाय में लगे तत्वों ने नेताओं और नौकरशाहों के संरक्षण में प्रकृति और पर्यावरण के साथ जो अत्याचार किया वह अक्षम्य अपराध ही नहीं अपितु भावी पीढ़ी के जीवन को संकट में डालने का कारण बनेगा। गत दिवस दिल्ली उच्च न्यायालय ने घरों  के भीतर हवा को साँस लेने लायक बनाने लगाए जा रहे एयर प्यूरीफायर पर 18 फीसदी जीएसटी होने पर ऐतराज जताया किंतु सरकार जीएसटी पूरी तरह घटा  दे तब भी घर के भीतर की हवा भले ही साफ हो जाए लेकिन लोग घरों में ही कैद नहीं रह सकते। विद्यार्थियों के अलावा नौकरपेशा वर्ग को बाहर जाना ही पड़ता है। इस बारे में चीन की राजधानी बीजिंग का उदाहरण दिया जा रहा है जो एक दशक पूर्व तक दुनिया का  सबसे प्रदूषित शहर  था किंतु अब स्थिति पूरी तरह बदल गई और वहाँ का पर्यावरण सुधर गया। दिल्ली की हवा को साँस लेने लायक बनाने के लिए बीजिंग मॉडल को अपनाया जा सकता है। लेकिन केवल दिल्ली ही क्यों साँस लेने हेतु शुद्ध हवा प्रत्येक देशवासी का अधिकार है। इसलिए जरूरी हो गया है कि पर्यावरण की मौजूदा स्थिति में जरूरी सुधार हेतु युद्ध स्तरीय प्रयास किये जाएं वरना साँस का संकट पूरे देश को घेर लेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 24 December 2025

करोड़ों अपात्र मतदाता बाहर होने से फर्जी मतदान रुकेगा


बिहार के बाद देश के अनेक राज्यों में चुनाव आयोग ने एस.आई.आर (विशेष गहन पुनरीक्षण) का कार्य संचालित किया। इनमें उ.प्र को छोड़कर बाकी की मतदाता सूची का प्रारूप प्रकाशित हो चुका है। अभी तक जो जानकारी आई उसके अनुसार तमिलनाडु में सर्वाधिक नाम काटे गए। उ.प्र. में पुनरीक्षण की तारीख बढ़ा दी गई है। इस प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस सहित ज्यादातर विपक्षी दलों ने काफी हल्ला मचाया। सड़क से संसद तक इसे लोकतंत्र विरोधी बताकर रद्द करने की मांग की। सर्वोच्च न्यायालय में असंवैधानिक साबित करने के लिए भी दलीलें दी गईं। लेकिन बिहार चुनाव निर्विघ्न संपन्न होने के बाद विपक्ष की आवाज धीमी होने लगी। हालांकि कांग्रेस के दिमाग से अभी भी वोट चोरी निकल नहीं रही। राहुल गाँधी जर्मनी में घूम - घूमकर हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव के नतीजों को वोट चोरी की उपज बताने में जुटे हैं। हाल ही में उनके नेतृत्व में पार्टी ने दिल्ली में एक बड़ी रैली भी आयोजित की थी। उसके पहले भी देश भर में एस. आई. आर विरोधी आंदोलन आयोजित किये। जिन 12 राज्यों में मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण हुआ और लाखों की संख्या में नाम काटे गए उनमें भाजपा शासित म.प्र , राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ की प्रारूप मतदाता सूचियों में लाखों मतदाता कम होने के बाद गैर भाजपा राज्यों का ये आरोप निराधार साबित हो गया कि  एस.आई.आर का निशाना केवल विपक्षी दलों की सत्ता वाले राज्य हैं। इस समूची प्रक्रिया में एक बात प्रमुखता से उभरकर सामने आई कि जो नाम काटे गए उनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है जो इस दुनिया में नहीं हैं। उसके बाद दूसरी जगह चले गए  और फिर लापता तथा ऐसे मतदाता जिनके नाम दो बार दर्ज थे। एस. आई. आर के बाद प्रकाशित प्राथमिक सूची में यदि  गड़बड़ी है तो उसे सुधारने के लिए मतदाता के पास पर्याप्त समय रहता है। लेकिन इस कार्य में मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी कहीं ज्यादा है। यदि उनका संगठन वाकई सक्रिय है तब वे इन सूचियों में गलतियों को सुधरवाने में सफल रहते हैं। अन्यथा अंतिम प्रकाशन होने के बाद किया गया विरोध सांप के निकल जाने के बाद लकीर पीटते रहने जैसा होकर रह जाता है। राजनीतिक आरोप - प्रत्यारोप से इतर देखें तो मतदाता सूची में मृत हो चुके लोगों का नाम होना पूरी तरह गलत है। इसके अलावा एक स्थान से काम - धंधे की तलाश में अन्य स्थान पर चले गए व्यक्तियों का नाम अलग किया जाना भी सही है। बहुत से ऐसे नाम भी मतदाता सूचियों में बने रहते हैं जिनका  कुछ अता - पता नहीं है। ये बात भी गौरतलब है कि जहाँ - जहाँ एस. आई. आर की प्रक्रिया हुई वहाँ लाखों मतदाता आयोग द्वारा मांगी गई जानकारी देने में असफल रहने के कारण  बाहर किये गए। बिहार में जब 65 लाख नाम कटे तब प्रथम दृष्ट्या चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक था। लेकिन प्राथमिक प्रकाशन के बाद केवल 16 लाख मतदाता अपना नाम जुड़वाने आगे आये जिनमें पहली बार मतदाता बने युवा भी शामिल थे। चुनाव के बाद भी कोई ये साबित नहीं कर सका कि किसी को जिताने या हराने के लिए लाखों नाम काटे गए। बिहार के बाद जब प. बंगाल में मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण शुरू हुआ तब मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने उसका खुलकर विरोध ही नहीं किया अपितु  व्यवधान पैदा करने का भरपूर प्रयास भी किया  । इसी तरह तमिलनाडु और केरल की सरकारें भी शुरुआती विरोध के बाद ठंडी पड़ गईं। अब तक जो देखने मिला उसके अनुसार एस. आई. आर पूरा हो जाने के बाद देश भर में करोड़ों अपात्र मतदाता  अलग हो जाएंगे जिससे फर्जी मतदान रुकेगा। साथ ही निर्वाचन प्रक्रिया से वे तत्व बाहर होंगे जो गलत तरीके से मतदाता बने या बनाये गए थे। ऐसे लोगों के पास जो मतदाता पहचान पत्र होता है उसकी मदद से वे तमाम शासकीय योजनाओं का लाभ भी उठाते रहे हों तो आश्चर्य नहीं होगा। बहरहाल राहुल गाँधी और ममता बैनर्जी जैसे नेता एस.आई.आर का कितना भी विरोध करते रहें लेकिन जनता ने जिस उत्साह के साथ चुनाव आयोग के अभियान में सहयोग दिया उससे उसकी सार्थकता प्रमाणित हो गई। इसी तरह वोट चोरी के  हल्ले को लोगों ने अनसुना कर दिया। ऐसे में श्री गाँधी द्वारा जर्मनी के लोगों को इसके बारे में बताना हास्यास्पद ही है। बेहतर हो विपक्ष व्यर्थ के मुद्दों को छोड़  भावी चुनौतियों का सामना करने खुद को तैयार करे वरना उसे आगे भी निराशा का सामना करना पड़ेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 23 December 2025

बांग्लादेश में गृहयुद्ध के हालात से भारत को सतर्क रहना जरूरी


बांग्लादेश के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। शेख हसीना के तख्ता पलट के लिए हुए आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार हादी की हत्या से भड़की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि एनसीपी नामक संगठन के एक नेता को घर में घुसकर मार दिया गया। इस सबकी वजह से पूरा देश अस्तव्यस्त है। कानून -  व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह से बिगड़ चुकी है। अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे। ग्रामीण इलाकों की हालत तो और भी खराब है। अंतरिम सरकार के मुखिया बने बैठे मो. यूनुस हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।। चुनाव की तिथियाँ घोषित हो जाने के बावजूद उसकी तैयारियों के कोई संकेत नहीं मिलने से ये आशंका बढ़ रही है कि वे अराजकता के  बहाने चुनाव टालते रहने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। हादी के हत्यारे अब तक गिरफ्त से बाहर हैं। उसके समर्थकों का आरोप है कि भारत की शह पर वह हत्या की गई। ये भी कहा जा रहा है कि हत्यारे भागकर भारत आ चुके हैं। इसीलिए पूरे  देश में चल रहे हिंसक आंदोलनों में भारत विरोधी नारे लग रहे हैं । भारत की सीमा के निकट भी प्रदर्शन किये गए जिनमें शेख हसीना को वापस  सौंपने की मांग की गई। विगत दिवस ढाका स्थित संसद भवन में घुसकर भी प्रदर्शनकारियों ने आगजनी और लूटपाट की। इन सबसे ये प्रमाणित हो गया कि बांग्लादेश पूरी तरह अव्यवस्था का शिकार हो चुका है। अल्पसंख्यक हिंदुओं के साथ की जा रही हैवानियत पर सं.रा.संघ और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार की चुप्पी भी दुखद है। हसीना के शासनकाल में बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति काफी सुधरी थी। लेकिन बीते एक साल में सब गुड़ - गोबर हो  गया। सत्ता परिवर्तन के साथ संजोई  उम्मीदें पूरी होना तो दूर निराशा का वातावरण सर्वत्र नजर आने लगा। जिन छात्र संगठनों ने शेख हसीना को देश छोड़ने मजबूर कर दिया उनके नेताओं को लगने  लगा कि  वे सांसद और मंत्री बनकर हुकूमत में हिस्सेदारी करेंगे किंतु यूनुस ने बड़ी ही कुटिलता से ऐसे हालात बना दिये जिससे उनमें ही मतभेद उत्पन्न हो गए। आज के समय बांग्ला देश में राष्ट्रीय स्तर पर कोई भी ऐसा नेता नजर नहीं आ रहा जो  वैकल्पिक सरकार बना सके। पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की नेता बेगम खालिदा जिया की सत्ता में वापसी के कयास भी  हवा- हवाई होते लग रहे हैं। उनके हालिया बयान इस बात का संकेत हैं कि यूनुस और उनके बीच तनातनी बढ़ चुकी है । बांग्लादेश में व्याप्त अस्थिरता का लाभ उठाकर अमेरिका और चीन अपना प्रभुत्व कायम करना चाह रहे हैं। लेकिन असली खलनायक मो. यूनुस हैं जो  हाथ आई सत्ता को आसानी से गँवा देने तैयार नहीं हैं। सत्ता की दौड़ में शामिल तमाम गुटों के बीच जिस प्रकार की रस्साकशी चल रही है उसने बांग्लादेश को गृहयुद्ध के आग में धकेल दिया है जिसकी तपिश भारत तक पहुंचने लगी है। इसे देखते हुए हमारी  सेना ने  किसी भी आकस्मिक स्थिति का सामना करने की तैयारी कर ली है। इस आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि ऑपरेशन सिंदूर का बदला लेने के लिए पाकिस्तान बांग्लादेश के कंधे का इस्तेमाल करे। यद्यपि बांग्लादेश की सैन्य क्षमता भारत के सामने नगण्य है लेकिन आज की स्थिति में चीन और पाकिस्तान का सहारा लेकर वह दुस्साहस कर सकता है। ऐसे में भारत को हर स्थिति के लिए तैयार रहना होगा। जरूरत पड़ने पर पर यदि सीमा पार करना पड़े तो उसमें भी संकोच नहीं किया जाए। हालांकि ये कदम असाधारण हालात में ही उठाना उचित होगा किंतु किसी देश को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बन रहे उद्दंड पड़ोसी को सबक सिखाने के लिए कड़े कदम उठाने का पूरा अधिकार है। बांग्लादेश में पाकिस्तान का बढ़ता हस्तक्षेप आतंकवादियों को बढ़ावा दे सकता है। इसलिए भी सीमा की निगरानी बेहद जरूरी है। दिसम्बर 1971 में  भारत की सहायता से अस्तित्व में आये इस देश में  जिस प्रकार से भारत विरोधी वातावरण जोर पकड़ता गया वह अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र का हिस्सा ही है। इसलिए  हमें अतिरिक्त सतर्कता दिखानी होगी क्योंकि वहाँ  हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तब शरणार्थियों का सैलाब आने की संभावना बढ़ती जाएगी जिसे किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिये। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 22 December 2025

महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन के आगे विपक्ष चारों खाने चित्त


महाराष्ट्र में गत दिवस स्थानीय निकाय चुनावों के जो नतीजे आये वे विपक्ष के लिए जहाँ निराशाजनक हैं वहीं भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन के लिए हौसला बढ़ाने वाले हैं। 288 नगर परिषदों और नगर पंचायतों के चुनावों में महायुति ने 207 अध्यक्ष पदों पर कब्जा कर लिया। इन चुनावों में एक बार फिर भाजपा अपना दबदबा साबित करने में कामयाब रही जिसे 117 अध्यक्ष पद हासिल हुए वहीं उसकी सहयोगी शिवसेना (शिंदे) को 53 और अजीत पवार वाली एनसीपी को 37 अध्यक्ष पद मिले। दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी के हिस्से में मात्र 44 अध्यक्ष आये। जिनमें कांग्रेस के हिस्से में  28, एनसीपी ( शरद पवार )  के 7 और शिवसेना (उद्धव ठाकरे ) के 9 अध्यक्ष ही आये। राज ठाकरे का हाथ खाली रहा। चौंकाने वाली बात ये है कि कांग्रेस के बराबर  गैर मान्यता प्राप्त दलों के प्रत्याशी 28 स्थानों पर चुने गए। उक्त निकायों के लगभग 7  हजार पार्षदों में भी दो तिहाई महायुति के जीते। इन परिणामों ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस, उपमुख्यमंत्री द्वय  एकनाथ शिंदे और अजीत पवार की जमीनी पकड़ को एक बार फिर सिद्ध कर दिया । वहीं दूसरी ओर ये बात भी स्पष्ट हो गई कि गत वर्ष संपन्न  विधानसभा चुनाव में मिली जोरदार पराजय से  विपक्ष उबर नहीं सका। इन परिणामों  का प्रभाव बीएमसी (ब्रहन्नमुंबई नगर निगम ) के आगामी चुनाव पर पड़ना सुनिश्चित है जिस पर उद्धव ठाकरे का राजनीतिक भविष्य टिका हुआ है। उल्लेखनीय है दशहरा पर होने वाली शिवसेना की परंपरागत रैली में इस वर्ष उद्धव और उनके चचेरे भाई राज ठाकरे की पार्टी मनसे (महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ) ने एकजुटता दिखाई। बरसों बाद दोनों भाई एक मंच पर आये आये और मराठी अस्मिता का ढोल पीटा । ज़ाहिर है उसके पीछे मुंबई के स्थानीय निकाय पर अपना कब्जा बनाये रखना है जो ठाकरे परिवार की राजनीति का आधार रही है। अनेक राज्यों से अधिक बजट वाली बीएमसी की सत्ता मुंबई की राजनीति को  गहराई से प्रभावित करती है। इसीलिए इस पर कब्जा करने की महत्वाकांक्षा सभी राजनीतिक दलों में होती है। लंबे समय तक भाजपा और अविभाजित शिवसेना का कब्जा इस निकाय पर बना रहा। विगत चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी भाजपा ने महापौर पद शिवसेना के लिए छोड़ दिया था। लेकिन इस बार स्थितियाँ पूर्णरूपेण बदली हुई हैं। शिवसेना के साथ ही एनसीपी भी टूट चुकी है। दोनों का बड़ा और ताकतवर धड़ा भाजपा के साथ है। राज्य सरकार के पास विशाल बहुमत है।  रही बात कांग्रेस की तो उसके पास नीति और नेता दोनों का अभाव है। उद्धव ठाकरे के साथ हाथ मिलाकर उसने धर्म निरपेक्ष होने के दावे को ध्वस्त कर दिया। यही हाल उद्धव का हुआ। बाल ठाकरे जैसे कट्टर हिंदुवादी नेता का राजनीतिक वारिस होने के बाद भी सत्ता की लालच में वे  कांग्रेस और शरद पवार की गोद में जा बैठे जिनकी मुस्लिम परस्ती सर्वविदित रही है। इस कारण जहाँ हिंदुओं के मन में उनके प्रति वितृष्णा उत्पन्न हो गई वहीं मुसलमान उनके अतीत को नहीं भूल पा रहे। इसी तरह अपनी पुत्री प्रेम में शरद पवार ने अपने दाहिने हाथ रहे भतीजे अजीत की नाराजगी मोल ले ली जिसके कारण महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे अनुभवी और चालाक नेता अपना ही घर टूटने से नहीं रोक पाया।  भाजपा ने ठाकरे परिवार के पीछे चलने के बाद अपने पैरों पर खड़े होने की जो बुद्धिमत्ता दिखाई  उसका लाभ उसे मिल रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद उसके नेतृत्व ने  चतुराई से काम लिया जिसका सुपरिणाम विधानसभा चुनाव में मिली प्रचंड विजय के रूप में सामने आया। दूसरी तरफ ज्यादा सांसद जीतने के कारण कांग्रेस के नेतृत्व वाला इंडिया गठबंधन चैन की नींद में डूब गया जिसका जबरदस्त नुकसान उसे विधानसभा चुनाव में हुआ। लेकिन उसके बाद भी बजाय अपनी गलतियों को सुधारने और कमियों को दूर करने के विपक्ष फिजूल की बातों में उलझकर रह गया। राज्य दर राज्य मिल रही पराजय से उसका हौसला पूरी न तरह टूट चुका है।  महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों के जो परिणाम गत दिवस जारी हुए उनके बाद उद्धव और राज की जोड़ी के साथ ही शरद पवार भी हाशिये पर सिमटते दिख रहे हैं। कांग्रेस भी अपने इस परंपरागत गढ़ में जनाधार खोती जा रही है। विधानसभा चुनावों की तरह से ही महाराष्ट्र के ये चुनाव भी जिस तरह इकतरफा रहे उसे देखते हुए  आगामी चुनावी मुकाबलों में भी महायुति का दबदबा बना रहना तय है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

 



Saturday, 20 December 2025

नमक हराम बांग्लादेश को सबक सिखाना जरूरी


बांग्लादेश से आ रही खबरें चिंता का विषय हैं। गत वर्ष शेख हसीना अपने तख्ता पलट के बाद भारत आ गईं जिन्हें पूरी सुरक्षा के बीच यहाँ रहने की सुविधा प्रदान कर हमने बांग्लादेश से दुश्मनी और गहरी कर ली। वहाँ की सरकार उनकी वापसी हेतु औपचारिक आवेदन कर चुकी है जिसे भारत सरकार ने स्वीकृति नहीं दी। इसका कारण  ये है कि वहाँ की अदालत उन्हें विभिन्न आरोपों में मृत्यदंड दे चुकी है। वर्तमान परिदृश्य पर निगाह घुमाने पर  महसूस होता है कि भविष्य में वहाँ संभावित सत्ता परिवर्तन में हसीना की भूमिका भारत के लिए लाभदायक  होगी। लेकिन   हालात देखते हुए उनकी वापसी लंबे समय तक तक तो मुमकिन नहीं दिखती। नये चुनाव होने के बाद वहाँ कामचलाऊ  की जगह चुनी हुई सरकार सत्ता में आयेगी किंतु अव्वल तो चुनाव होना अनिश्चित है। और  हुए भी तब उनकी निष्पक्षता पर संदेह बना रहेगा क्योंकि सत्ता में बैठे लोग आसानी से अलग नहीं होना चाहेंगे। सबसे बड़ी बात ये है कि हसीना सरकार के विरुद्ध सड़कों पर आंदोलन करने वाले संगठनों में भी फूट पड़ गई है। लेकिन जिस एक मुद्दे पर बांग्लादेश के मुस्लिम समुदाय में आम सहमति है वह है भारत विरोध , जिसका दंड वहाँ रहने वाले हिंदुओं को  भुगतना पड़ रहा है। हसीना के बांग्लादेश से भागने के बाद  बहुसंख्यक मुसलमानों ने 1947 की दर्दनाक स्मृतियों को सजीव करते हुए हिंदुओं पर अत्याचार की जो श्रंखला प्रारंभ की वह सरकारी संरक्षण में बेरोकटोक जारी है। हाल ही में हसीना के तख्तापलट में अग्रणी भारत विरोधी एक नेता की हत्या के बाद हिंदुओं पर हमले और बढ़ गए। इस सबके बीच पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी नेताओं की बांग्लादेश में आवाजाही बढ़ी , वहीं अमेरिका को झटका देते हुए बांग्लादेश ने चीन को हवाई अड्डे और रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण बंदरगाह  सौंपने का फैसला कर डाला जिससे भारत के लिए खतरा बढ़ना तय है। दरअसल सत्तापलट के बाद  ही वहाँ चीन ने अपनी घुसपैठ शुरू कर दी थी। यद्यपि हसीना के विरुद्ध हुए छात्र आंदोलन के समय मो.युनुस अमेरिका में निर्वासित जीवन बिता रहे थे और आम अवधारणा ये थी कि बांग्लादेश में हुआ सत्ता परिवर्तन अमेरिकी रणनीति का हिस्सा था जिसके तहत वह चीन के निकट अपना अड्डा बनाना चाहता था। यही सोचकर उसने युनुस को अंतरिम सरकार के मुखिया बनाने की जमीन तैयार की। स्मरणीय है उन्हें नोबल पुरस्कार दिलाने के पीछे भी अमेरिका की दूरगामी सोच रही। ये भी सच है कि  बाइडेन के राष्ट्रपति रहते अमेरिका में वामपंथी विचारधारा को काफी प्रोत्साहन मिला। लेकिन ढाका आने के बाद युनुस ने अमेरिका को धोखे में रखते हुए चीन के लिए लाल कालीन बिछा दिया और डोनाल्ड ट्रम्प देखते रह गए। चूंकि चीन और बांग्लादेश के बीच भौगोलिक दूरी बेहद कम है लिहाजा वहाँ की भारत विरोधी ताकतें बजाय अमेरिका के चीन से याराना कायम करने को प्राथमिकता दे रही हैं। बीते कुछ दिनों से बांग्लादेश में हिंसा का जो उफान आया उसका निशाना भारत और वहाँ का हिन्दू समुदाय है । युनुस सरकार अल्पसंख्यकों के  जान - माल की सुरक्षा करने की बजाय उपद्रवियों को पूरी छूट दे रही है। हिंदुओं की हत्या, लड़कियों का अपहरण, मंदिरों में तोडफोड़, आम हो चला है। आश्चर्यजनक बात ये है कि फिलीस्तीनियों के पक्ष में झोला टांगने वाले भारत के कतिपय नेता बांग्लादेश के हिंदुओं के नरसंहार पर एक शब्द बोलने तैयार नहीं हैं। प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को इस बात की फिक्र तो है कि मतदाता सूचियों से बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों का नाम न कट जाए किंतु बांग्लादेश में रह रहे हिंदुओं के दमन के विरुद्ध वे कुछ भी बोलने से इसलिए डरती हैं कि  मुस्लिम वोट बैंक हाथ से न निकल जाए। बांग्लादेश में जो स्थितियाँ बन गई हैं वे भारत के लिए कई दृष्टियों से नुकसानदेह है। वहाँ की सरकार द्वारा प्रायोजित उपद्रव में हसीना की वापसी के लिए भारत पर दबाव बनाने जिस प्रकार हिंदुओं पर अत्याचार हो रहा है उसके विरुद्ध जवाबी कार्रवाई का समय आ चुका है। हालांकि भारत ने आर्थिक नाकेबंदी करते हुए बांग्लादेश को घेरने का जो दाँव चला उसका असर हुआ था किंतु चीन के साथ आ जाने के बाद युनुस सरकार का हौसला बढ़ गया। ताजा उपद्रव उसी का प्रमाण है। वैसे  भारत में होने वाली घुसपैठ में कमी आई है लेकिन वहाँ रह रहे हिंदुओं की सुरक्षा भी हमारा नैतिक दायित्व है क्योंकि उनसे  हमदर्दी रखने वाला और कोई देश नहीं है। सही बात ये है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान मिलकर भारत को घेरने में लगे हैं । दोनों देशों में हिंदुओं के साथ एक जैसा अमानवीय व्यवहार होने से  ज़ाहिर है कि कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतें तेजी से सक्रिय हैं जिन्हें चीन खुलकर साथ दे रहा है। हालांकि बांग्लादेश को सबक सिखाने के लिए सैन्य कार्रवाई करना तो जल्दबाजी होगी किंतु यही स्थिति रही तब भारत को इस एहसान फरामोश पड़ोसी को ऐसा दंड देने में संकोच नहीं करना चाहिए जिससे वह दोबारा सिर उठाने की हिम्मत न करे। 


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Friday, 19 December 2025

मुख्य न्यायाधीश ने लोगों के मन की बात कह दी

र्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने म.प्र के एक प्रधान जिला न्यायाधीश को सेवा निवृत्ति के 10 दिन पूर्व  निलंबित किये जाने के विरुद्ध प्रस्तुत याचिका की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि जजों में रिटायरमेंट की पूर्व संध्या पर बाहरी कारणों से  आदेश पारित करने का चलन बढ़ रहा है।  जजों द्वारा अंतिम ओवरों में छक्के मारने की इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा मैं इस पर ज्यादा बात नहीं करना चाहता।पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची भी शामिल थे। मुख्य न्यायाधीश के उक्त कटाक्ष ने  सेवाकाल समाप्त होने के  पहले न्यायाधीशों द्वारा कछुआ चाल छोड़कर खरगोश से भी तेज दौड़ने की प्रवृत्ति पर सार्वजनिक विमर्श का रास्ता खोल दिया है। कुछ बरस पहले देश भर के निजी मेडिकल कालेजों की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने सेवानिवृत्त होने के कुछ घंटों पहले ही जो फैसला सुनाया उसकी जबरदस्त आलोचना हुई थी।  न्यायपालिका में व्याप्त विसंगतियों के बारे में चूंकि अदालत की अवमानना के डर से लोग बोलने से कतराते हैं इसलिए इस चलन को रोकने जैसी कोई मुहिम शुरू नहीं हो सकी। यहाँ तक कि मुख्य न्यायाधीश  सूर्यकांत ने भी अंतिम ओवरों में छक्के मारने की प्रवृत्ति पर चिंता जताने के बाद उस पर ज्यादा न बोलने की बात कहकर अपना पिंड छुड़ा लिया ,जो आश्चर्यजनक है। शायद इसका कारण ये हो कि कानून किसी न्यायाधीश को अपने सेवाकाल के अंतिम दिनों में  फैसला लेने से नहीं रोकता। लेकिन उनसे अपेक्षा रहती है कि वे न्याय प्रक्रिया में व्याप्त  विसंगतियों को दूर करें जिनकी वजह से उसकी प्रतिष्ठा पर आंच आ रही है। मुख्य न्यायाधीश नियुक्त होने के बाद श्री सूर्यकांत ने सर्वोच्च न्यायालय की कार्यप्रणाली में सुधार के जो संकेत दिये उनसे उम्मीदें बढ़ी है। उनकी संदर्भित टिप्पणी ने भी दरअसल विधि क्षेत्र में होने वाली चर्चाओं को ही अभिव्यक्त किया है। हमारे देश में कोई भी सरकार पूरे पांच वर्ष के लिए चुनी जाती है। लेकिन अगले चुनाव हेतु आचार संहिता लागू होते ही उस पर नीतिगत फैसले लेने की बंदिश लग जाती है। सरकारी आयोजन और विज्ञापन बंद हो जाते हैं। सरकारी विश्रामगृह की सुविधा छिन जाती है। लेकिन नौकरशाह और न्यायाधीश अपनी सेवानिवृत्ति  के अंतिम क्षणों तक आदेश और निर्णय पारित करते हैं। हालांकि ये जरूरी नहीं कि उनका प्रत्येक कार्य या  फैसला लोभ - लालच या बाहरी दबाववश लिया गया हो जैसा श्री सूर्यकांत ने कहा किंतु ये बात गलत नहीं है कि सेवानिवृत्ति के पहले न्यायाधीशों द्वारा दिये जाने वाले ताबड़तोड़ फैसलों में पक्षपात की आशंका रहती है। यद्यपि न्यायप्रक्रिया में ये प्रावधान है कि यदि  न्यायाधीश उसके समक्ष सुनवाई हेतु प्रस्तुत    प्रकरण पर फैसला करने से पूर्व सेवानिवृत्त हो जाए तब उसकी सुनवाई नये सिरे से होती है। हमारे देश में न्यायपालिका के प्रत्येक स्तर पर   न्यायाधीशों की बेहद कमी है। इसके चलते न्यायाधीशों पर काम का बहुत दबाव रहता है। ऐसे में सेवानिवृत्ति करीब आने पर फैसला सुनाने की  रफ्तार बढ़ जाती है और तब आपाधापी में वह सब होता है जिस पर श्री सूर्यकांत ने निशाना साधा। जिस न्यायाधीश के निलंबन संबंधी प्रकरण पर मुख्य न्यायाधीश ने अंतिम ओवरों में छक्के मारने वाला तंज कसा उसके द्वारा सेवानिवृत्ति के पूर्व दिये फैसले ही विवाद का कारण बने। हालांकि श्री सूर्यकांत भी बात आगे  बढ़ाने से बचे किंतु जब उन्होंने मुद्दा छेड़ ही दिया तब उसे आगे ले जाने का प्रयास भी उनको करना चाहिए क्योंकि इससे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और निष्पक्षता जुड़ी हुई है। सेवानिवृत्ति के निकट आते ही किसी न्यायाधीश द्वारा दिये जाने वाले फैसलों की निष्पक्षता का प्रमाणीकरण कैसे हो इस पर विचार होना जरूरी है। और जब बात देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा  ही शुरू की गई तब उसे केवल बौद्धिक चर्चा और टेलीविजन पर होने वाली दिशाहीन बहस के लिए छोड़ देना उचित नहीं होगा। बेहतर हो न्यायपालिका  ही इस विसंगति को दूर करने का रास्ता निकाले। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 18 December 2025

भ्रष्टाचार के साथ जीना मजबूरी बन चुकी है


घूसखोरी में सरकारी अमले का पकड़ा जाना आश्चर्यचकित नहीं करता। आये दिन इस आशय के समाचार आया करते हैं। गत दिवस जबलपुर में जीएसटी विभाग के एक उच्च अधिकारी सहित छोटे कर्मचारी को सीबीआई ने लाखों की घूस लेते दबोच लिया। एक होटल व्यवसायी की शिकायत पर उक्त कार्रवाई हुई। जो जानकारी आई उसके अनुसार जीएसटी विभाग के कतिपय लोगों ने होटल वाले पर जीएसटी चोरी का आरोप लगाकर भारी पैनाल्टी लगाने का दबाव बनाया और फिर घूस लेकर मामला रफा - दफा करने का आश्वासन दिया। होटल मालिक ने बजाय उनकी मांग पूरी करने के सीबीआई से संपर्क किया जिसने पूरी तैयारी कर घूस लेने वालों पर फंदा कस दिया। ये कोई अनोखा प्रकरण नहीं है क्योंकि प्रदेश और देश में इस तरह के सैकड़ों मामले रोजाना सामने आते हैं। घूसखोरी और अन्य तरह का भ्रष्टाचार किसी एक या कुछ विभागों तक सीमित रहने के बजाय लगभग प्रत्येक सरकारी महकमे में फैल चुका है।  केन्द्र और राज्य सरकार के अलावा स्थानीय निकाय भी इस बुराई से अछूते नहीं हैं।  लिपिक जैसे साधारण पद पर कार्यरत कर्मचारियों के भी घूस लेते पकडे़ जाने से  इस बात का अंदाज लगाया जा सकता है कि सरकारी अमला कितना निडर हो चुका है। पहले ये अवधारणा थी कि महिला कर्मचारी और अधिकारी भ्रष्टाचार से दूर रहती हैं। लेकिन अब ये भ्रम भी टूट चुका है। हाल ही में म.प्र के सिवनी जिले में एक वाहन में हवाला की जो मोटी रकम पुलिस ने जप्त की उसकी बंदरबांट में वहाँ पदस्थ महिला पुलिस अधिकारी की मुख्य भूमिका उजागर होने से ये बात प्रमाणित हो गई कि महिलाओं के मन में भी भ्रष्टाचार का आकर्षण उत्पन्न  हो चुका है। किसी सरकारी मुलाजिम पर जाँच एजेंसी का शिकंजा कसने पर उसके द्वारा भ्रष्टाचार से  अर्जित की गई अकूत दौलत का पर्दाफ़ाश होने पर हर कोई दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर हो जाता है। 2014 में जब नरेंद्र मोदी  प्रधानमंत्री की दौड़ में कूदे तब उन्होंने आश्वस्त किया था कि न खाऊंगा , न खाने दूंगा। लोगों ने उनकी बात पर विश्वास करते हुए  देश की बागडोर उन्हें सौंप दी। बीते 11 वर्षों में उन्होंने न खाऊंगा के आश्वासन को  को तो सही साबित किया। निजी तौर पर भ्रष्टाचार करने के आरोप से वे पूरी तरह मुक्त हैं। उनकी नीतियों और विचारधारा की घोर आलोचना करने वाले भी प्रधानमंत्री को भ्रष्ट साबित करने का साहस नहीं जुटा पाते किंतु अपने वायदे के दूसरे हिस्से को पूरा करने में वे  सफल हुए इसका दावा उनके प्रबल समर्थक भी नहीं कर सकते । हालांकि उनके सत्ता में आने के बाद केन्द्र सरकार के अनेक फैसलों ने व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया किंतु  बेईमानों की जमात ने नये रास्ते तलाश लिए। सवाल ये है कि क्या हमारे देश से भ्रष्टाचार कभी मिटाया जा सकेगा या हम उसके साथ ही जीने को मजबूरी बने रहेंगे? हालांकि ये भी सत्य है कि घूस लेना जितना बड़ा अपराध है उतना ही घूस देना भी। ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि अवैध कार्यों पर पर्दा डालने वाले सरकारी अमले की जेब गर्म करते हैं। लेकिन विडंबना ये है कि अपने देश में सही काम करने वाले भी भ्रष्टाचार रूपी  आतंक से सुरक्षित रहेंगे इसकी गारंटी प्रधानमंत्री तक नहीं दे सकते। यही कारण है कि आम नागरिक के मन में व्यवस्था के प्रति विश्वास निरंतर घटता जा रहा है। जिस न्यायपालिका से ये उम्मीद की जाती रही कि वह भ्रष्ट व्यवस्था की जड़ों पर प्रहार करने का साहस दिखाएगी वह भी जन आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकी। और अब तो उसमें भी भ्रष्टाचार नामक वायरस घुस चुका है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार हमारे रक्त में समा चुका है और इसीलिए हम उसके साथ जीने के लिए मजबूर हैं। बीते कुछ समय से दुनिया के अनेक देशों में भ्रष्टाचार के विरोध में हुए हुए जनांदोलनों ने सत्ता बदल दी। लेकिन हमारे देश में भ्रष्टाचार ने चूंकि शिष्टाचार का रूप ले लिया लिहाजा वह हमारी ज़िंदगी से स्थायी रूप से जुड़ चुका है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि राजनीति का संरक्षण मिलने से ये बुराई गाजर घास की तरह फैलती गई। विचारणीय प्रश्न ये है कि क्या भ्रष्टाचार को नियति मानकर स्वीकार कर लिया जाए या उसके विरुद्ध निर्णायक लड़ाई शुरू की जाए। लेकिन समस्या यही है कि इस लड़ाई की अगुआई कौन करेगा क्योंकि नेताओं और नौकरशाहों के अघोषित गठबंधन ने व्यवस्था ही नहीं लोगों की मानसिकता को भी भ्रष्ट कर दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 17 December 2025

58 लाख नाम कटे : देखें अब ममता क्या करती हैं


प .बंगाल में एस.आई.आर का पहला चरण पूरा हो चुका है। चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों की सघन जाँच के बाद उसका प्राथमिक प्रकाशन कर दिया। जारी आंकड़ों के अनुसार, कुल 58,20,898 नाम मसौदा सूची से हटाए गए हैं। इनमें सबसे ज्यादा 24,16,852 लोग मृत पाए गए, जबकि 19,88,076 लोग स्थानांतरित हो चुके थे। इसके अलावा 12,20,038 लोग लापता, 1,38,328 नाम डुप्लीकेट और 57,604 अन्य श्रेणी में पाए गए। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए की जा रही है। इसके बाद अब जिन मतदाताओं के नाम काटे गए उनको आपत्ति व्यक्त कर आवश्यक दस्तावेजों के जरिये नाम जुड़वाने का अवसर मिलेगा जैसा बिहार में देखने मिला था। प. बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बैनर्जी एस. आई. आर के विरोध में आंदोलन करती रहीं । उन्होंने शासकीय कर्मचारियों को चुनाव आयोग से असहयोग करने भी भड़काया । यहाँ तक कि महिलाओं को एस. आई. आर करने आये लोगों को रसोई के उपकरणों से पीटने जैसा बयान भी जारी किया किंतु उनका मंसूबा धरा रह गया और चुनाव आयोग ने राज्य सरकार के असहयोग  के बाद भी  अपना काम पूरा कर दिखाया । आयोग देश के 12 राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष  सघन पुनरीक्षण  का अभियान चला रहा है। हालांकि सभी गैर भाजपा शासित राज्यों की सरकारें इसका विरोध कर रही हैं किंतु उसने निःसंकोच अपना काम जारी रखा। सबसे रोचक बात ये रही कि राजनीतिक दलों के विरोध के बाद भी जनता ने इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में उत्साहपूर्वक सहयोग किया। इसका उदाहरण बिहार है जहाँ एस. आई. आर में 65 लाख नाम कटने के बाद 16 लाख नये मतदाताओं ने अपना पंजीयन करवाया। इसके बाद मतदान के प्रतिशत में आये उछाल ने भी एस. आई. आर की सार्थकता पर मोहर लगा दी। आशय ये है कि चुनाव आयोग द्वारा संचालित इस प्रक्रिया ने लोगों में मतदाता बनने और मतदान करने के प्रति उत्साह में वृद्धि की। बिहार में जब एस. आई. आर का ऐलान हुआ तब विपक्ष ने ये दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया कि इसके जरिये भाजपा विरोधी मतदाताओं के नाम चुन- चुनकर काटे जाएंगे। उनका इशारा मुख्य रूप से मुस्लिम मतदाताओं की तरफ था। जब 65 लाख नाम कटने वाली मतदाता सूची का पहला प्रकाशन हुआ तब ऐसी आशंका जताई गई कि लाखों लोग सड़कों पर उतर आयेंगे। लेकिन पत्ता भी नहीं खड़का। हालांकि नाम कटने वाले काफी लोगों ने आपत्ति दर्ज करवाकर अपना मताधिकार सुरक्षित रखा किंतु अंतिम सूची में तकरीबन 45 लाख नाम अलग हुए जो बड़ी संख्या थी। इसके कारण मतदाता सूचियाँ  शुद्ध हुईं और मतदान शांतिपूर्ण हुआ क्योंकि अवैध मतदाता परिदृश्य से बाहर थे। अब जबकि चुनाव आयोग ने प. बंगाल में भी मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित कर दी जिसमें 58 लाख नाम अलग किये गए तब ममता और उनकी पार्टी का दायित्व है कि यदि चुनाव आयोग द्वारा गलत तरीके से नाम काटे गए तो वह अपने कैडर के जरिये उनको मताधिकार दिलवाने आगे आये। अन्यथा ये माना जायेगा कि चुनाव आयोग विरोधी उनका प्रचार महज राजनीतिक प्रोपेगंडा है। रोचक बात ये है काटे गए 58 लाख लोगों में 24 लाख तो दुनिया में ही नहीं है। इस आंकड़े में मामूली गलती तो मानी जा सकती है किंतु इसे पूरी तरह गलत मान लेना भी सच्चाई से नजरें चुराने जैसा है। एस. आई. आर में भाजपा विरोधी मतदाताओं के नाम काटे जाने का आरोप भी निराधार ही है क्योंकि चुनाव आयोग तो क्या राजनीतिक पार्टियों के लिए भी ये असंभव है कि वे अपने समर्थक अथवा विरोधी प्रत्येक मतदाता की पहचान कर सकें। इसकी वजह ये है कि कोई भी आसानी से अपनी पसंद की पार्टी या प्रत्याशी का नाम उजागर नहीं करता। कुल मिलाकर चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों का प्राथमिक प्रकाशन कर गेंद ममता बैनर्जी के पाले में डाल दी है। देखना ये है कि इस प्रक्रिया को अनावश्यक और लोकतंत्र विरोधी साबित करने पर आमादा ममता और उनकी पार्टी  इस प्रारूप सूची में काटे गए कितने नाम जोड़े जाने लायक साबित कर पाती हैं क्योंकि आयोग ने तो जो किया उसे सार्वजनिक करते हुए अपने काम को प्रामाणिक बना दिया , अब बारी ममता की है अपने आरोप साबित करने की। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 16 December 2025

बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस गठबंधन से ऊबने लगी


बिहार चुनाव के बाद देश की राजनीति में बड़े बदलाव की आहट महसूस की जा रही है। इसका पहला बड़ा संकेत तो भाजपा ने बिहार सरकार में मंत्री नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर दे दिया जो मात्र 45 वर्ष के हैं। उनका चयन जिस गोपनीय तरीके से हुआ उससे राजनीतिक विश्लेषक ही नहीं बल्कि अंतरिक्ष से पाताल तक की जानकारी रखने का दावा करने वाले खबरखोजी पत्रकार तक आश्चर्यचकित रह गए।  इस नियुक्ति से भाजपा ने तीसरी पीढ़ी के हाथ में नेतृत्व देने का संकेत दिया है। पार्टी में तमाम ऐसे चेहरे हैं जिनको संगठन के काम का समुचित अनुभव तो है ही , चुनावी व्यूहरचना में भी महारत हासिल है। लेकिन बिहार सरकार के एक युवा मंत्री को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर मोदी - शाह की जोड़ी ने एक बार फिर सबको चौंका दिया। हालांकि अभी ये तय नहीं है कि वे ही स्थायी अध्यक्ष बनेंगे या प. बंगाल का चुनाव होने के बाद किसी अन्य को संगठन की बागडोर सौंपी जाएगी? लेकिन इस निर्णय ने अन्य पार्टियों के युवा नेताओं में खलबली मचा दी है जिनकी महत्वाकांक्षाएं वरिष्ट नेताओं के लदे रहने से अकाल मौत झेलने मजबूर हैं।   बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर भी बेचैनी है। भले ही कोई कुछ न कहे लेकिन राहुल गाँधी की क्षमता पर पार्टी के भीतर अविश्वास बढ़ता जा रहा है। उनकी रहस्यमय विदेश यात्राओं का औचित्य समझ से परे है। इसकी वजह से ही इंडिया गठबंधन भी उदासीन पड़ा है। उसमें शामिल पार्टियां कांग्रेस विशेष रूप से श्री गाँधी की अव्यवहारिक शैली से परेशान हैं। खबर है कि जनसुराज पार्टी की करारी हार के बाद प्रशांत किशोर चुनाव रणनीतिकार का पुराना काम शुरू करने के लिए अवसर तलाश रहे हैं। यद्यपि बिहार में उनकी पार्टी द्वारा जमानत जप्ती का कीर्तिमान स्थापित करने के कारण प्रशांत की पेशेवर दक्षता  सवालों के घेरे में आ गई है किंतु प्रियंका वाड्रा से उनकी ताजा मुलाकात के बाद ये खबर तेज है कि कांग्रेस उनकी सेवाएं उ.प्र विधानसभा के अगले चुनाव में लेने पर विचार कर रही है।  प्रशांत ने इसके लिए शर्त रखी है कि कांग्रेस गठबंधन की राजनीति से मुक्त होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व दोबारा कायम करे। स्मरणीय है बिहार चुनाव के दौरान भी वे सार्वजनिक तौर पर ये कहते सुने गए कि कांग्रेस को राजद से पिंड छुड़ा लेना चाहिए।  उस चुनाव में राहुल और तेजस्वी के बीच जिस तरह की खींचातानी दिखी उससे ये एहसास होने लगा था कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन से ऊब चुकी है।  कुछ दिनों से ये चर्चा जोरों पर है कि  भाजपा जहाँ क्षेत्रीय दलों को हजम कर रही है वहीं  क्षेत्रीय दल कांग्रेस को खा रहे हैं। प्रशांत , कांग्रेस के साथ कितना जुड़ेंगे ये अभी निश्चित नहीं है लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि कांग्रेस भी अब क्षेत्रीय दलों से दूर होने की इच्छुक है। उ.प्र के अलावा अन्य राज्यों में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में वह अकेले लड़ने का ऐलान कर चुकी है। अखिलेश यादव  के अलावा उद्धव ठाकरे और शरद पवार  से राहुल की पटरी नहीं बैठ रही। वोट चोरी का जो आरोप श्री गाँधी आये दिन लगाया करते हैं  उसका जनमानस पर खास असर नजर नहीं आ रहा। दिल्ली में कांग्रेस द्वारा आयोजित रैली भी उतनी प्रभावशाली नहीं रही जितना उसका प्रचार हुआ था। इन सबका असर इंडिया गठबंधन के भविष्य पर पड़ना तय है। चूंकि लोकसभा चुनाव अभी दूर हैं इसलिए उसके पहले होने वाले चुनावी मुकाबलों में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों की बैसाखियाँ त्यागकर अपने पैरों पर खड़े होने का फैसला ले सकती है। हालांकि इसके लिए उसे नीति और नेतृत्व दोनों  स्तरों पर बड़े सुधार करने होंगे। बीते कुछ दिनों में पार्टी अध्यक्ष  मल्लिकार्जुन खरगे सहित कुछ अन्य वरिष्ट नेताओं को सार्वजनिक रूप से जो उपेक्षा झेलनी पड़ी उससे अच्छे संदेश नहीं गये । शशि थरूर लगातार राहुल द्वारा बुलाई बैठकों में आने से बच रहे हैं ।  वहीं प्रियंका वाड्रा द्वारा ईवीएम का विरोध किये जाने के बावजूद सुप्रिया सुले ने लोकसभा में कह दिया मुझे उससे शिकायत नहीं क्योंकि मैं चार चुनाव ईवीएम होते हुए भी जीती। भाजपा पर वोट चोरी के श्री गाँधी के आरोपों से इतर प. बंगाल में अधीर रंजन चौधरी, ममता बैनर्जी पर 60 लाख फ़र्जी वोट बनाने का आरोप लगाकर भाजपा की बात को सच साबित कर रहे हैं। ये स्थिति कांग्रेस के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती। उसे बिना समय गंवाये अपनी दिशा स्पष्ट करनी चाहिए। आज की तारीख में न वह गठबंधन के साथ सामंजस्य बिठाने में सफल है और न ही अकेले चलने का साहस ही दिखा पा रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 15 December 2025

सिडनी हत्याकांड इस्लामिक आतंकवाद के विश्वव्यापी फैलाव का संकेत



ऑस्ट्रेलिया एक शांतिप्रिय देश है।जहाँ आबादी के अनुपात में जमीन ज्यादा होने से वहाँ की सरकार विदेशियों को आकर बसने के लिए प्रोत्साहित करती है। कभी ब्रिटिश उपनिवेश रहा ऑस्ट्रेलिया भले ही  यूरोप से हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर  क्षेत्र में स्थित हो किंतु उसके मूल निवासी चूंकि अंग्रेज थे लिहाजा इस देश की भाषा और संस्कृति पर ब्रिटेन की छाया स्पष्ट झलकती है। ज्ञान - विज्ञान, खेल , पर्यटन आदि में इसकी गणना एक विकसित देश के तौर पर होती है। गत दिवस इस खुशनुमा देश में हुए दर्दनाक हादसे ने पूरी दुनिया को दहला दिया जब इसके प्रमुख शहर सिडनी के समुद्र तट पर सैकड़ों यहूदी अपना परंपरागत त्यौहार हनुक्का मनाने जमा थे। लेकिन हर्षोल्लास का माहौल  मातम में बदल गया जब दो लोगों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाना शुरू कर दिया। रविवार होने से समुद्र तट पर सैलानियों का भी जमावड़ा था। गोलियों की आवाज सुनते ही भगदड़ मच गई किंतु 11 यहूदियों को जान से हाथ धोना पड़ा । घटनास्थल पर मौजूद पुलिस  की जवाबी कार्रवाई में एक हमलावर  मारा गया जबकि दूसरे को पकड़ लिया गया। दोनों पिता - पुत्र हैं और पाकिस्तानी मूल के हैं। चूंकि उन्होंने यहूदियों को  ही निशाना बनाया इसलिए स्पष्ट है कि उनका संबंध  किसी बड़े मुस्लिम आतंकवादी संगठन से है। हमलावर जानते थे कि यहूदी अपना पर्व मनाने एकत्र होंगे और वहाँ उन पर हमला करना आसान होगा। स्मरणीय है पाकिस्तान प्रवर्तित आतंकवादियों द्वारा कुछ महीनों पहले भारत की  कश्मीर घाटी के पहलगाम नामक पर्यटन स्थल पर जमा सैलानियों के बीच भी इसी तरह की गोलीबारी करते हुए दर्जनों लोगों की हत्या कर डाली थी। उसके बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर नामक सैन्य कारवाई करते हुए पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों के अड्डों को नष्ट किया। गत दिवस सिडनी में हुए हत्याकांड और  पहलगाम की आतंकी घटना में ये साम्यता है कि दोनों में धर्म विशेष के लोगों को निशाना बनाया गया। पहलगाम में धर्म पूछकर हिंदुओं को गोली मारी गई जबकि ऑस्ट्रेलिया की घटना में यहूदी  निशाने पर थे। पहलगाम हत्याकांड में पाकिस्तानी आतांकियों की भूमिका  स्वाभाविक थी क्योंकि कश्मीर को लेकर दोनों देशों में पुराना विवाद है किन्तु आस्ट्रेलिया में रह रहे यहूदियों की हत्या में पाकिस्तानी आतंकवादियों का हाथ चौंकाता है। इससे ये संदेह प्रबल होता है कि संदर्भित कांड किसी बड़ी साजिश का हिस्सा है। गौरतलब है कि इसराइल और हमास के बीच युद्धविराम के बाद प. एशिया में शांति लौटने लगी थी। गाजा पट्टी को विकसित स्वरूप प्रदान करने पर भी बड़े देश आगे आ रहे हैं। इसराइल के अरब देशों से रिश्ते भी सुधार पर हैं। ऐसे में इस घटना के बाद राख के भीतर दबी चिंगारी दोबारा भड़क सकती है क्योंकि इसराइल यहूदियों और विशेष रूप से अपने नागरिकों की मौत का बदला लेने में जरा भी संकोच नहीं करता। गाजा में हुआ  युद्ध भी हमास  द्वारा इसराइल पर हमला कर उसके नागरिकों की नृशंस हत्या और उन्हें बंधक बनाये जाने के जवाब में हुआ। इस लड़ाई में गाजा पट्टी को इसराइल ने पूरी तरह मलबे में तब्दील कर दिया। इसके पहले भी जब - जब कहीं  इसराइल के नागरिकों के साथ अमानवीय व्यवहार हुआ उसने बिना डरे उसका बदला लिया। ये देखते हुए सिडनी हत्याकांड की प्रतिक्रिया जरूर होगी। यदि हमलावरों  का पाकिस्तानी संबंध साबित हो गया तो फिर वह भी इसराइल के गुस्से से शायद ही बच पायेगा। इस घटना ने इस्लाम और आतंक के अंतरंग रिश्ते को एक बार फिर से प्रमाणित कर दिया है। जिन पश्चिमी देशों ने हाल ही में स्वतंत्र  फिलिस्तीनी राष्ट्र का समर्थन किया उनके मुँह पर भी इस घटना ने कालिख पोत दी। इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने जिस तल्खी के साथ ईरान सहित कुछ इस्लामिक देशों पर आरोप लगाए उसे देखते हुए बड़ी मुश्किल से शांत हुआ प. एशिया दोबारा धधक सकता है। इस घटना के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को भी पाकिस्तान के प्रति अपने प्रेम पर पुनर्विचार करना चाहिए वरना जो कल ऑस्ट्रेलिया में हुआ वह अमेरिका में भी होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। इसी के साथ ही यूरोप के उन देशों को भी सावधान हो जाना चाहिये जो मुस्लिम शरणार्थियों को अपने यहाँ बसाने की भयंकर गलती कर बैठे। ऑस्ट्रेलिया की उक्त घटना में इस्लामिक आतंकवाद के विश्वव्यापी फैलाव का संकेत  छिपा हुआ है । 

- रवीन्द्र वाजपेयी

 

Saturday, 13 December 2025

म.प्र सरकार के दो साल : भ्रष्टाचार और नौकरशाही की निरंकुशता पर रोक जरूरी


म.प्र की वर्तमान सरकार को दो वर्ष पूरे हो गए। गत दिवस मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाते हुए नक्सली आतंक की समाप्ति का दावा किया वहीं भावी लक्ष्यों को भी स्पष्ट किया जिनमें नशा मुक्ति और नदियों को जोड़ने जैसे कार्य हैं। विगत दो सालों में म.प्र में निवेश हेतु दर्जनों अनुबंध हस्ताक्षरित हुए। मुख्यमंत्री ने प्रदेश में तो निवेशक सम्मेलनों का आयोजन किया ही , दूसरे प्रदेशों में जाकर भी प्रदेश के औद्योगिक विकास हेतु पूंजी लगाने के इच्छुक निवेशकों को आमंत्रित किया। विदेश यात्राओं के माध्यम से भी उन्होंने म.प्र के विकास की संभावनाओं को जमीन पर उतारने की पुरजोर कोशिशें कीं। इसके अलावा शिक्षा , स्वास्थ्य , सड़क, बिजली और पेयजल जैसी मूलभूत आवश्यकतों को पूरा करने की दिशा में भी उनके प्रयास चर्चा में रहे। अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तरह से ही डॉ. यादव भी बेहद गतिशील हैं। सचिवालय में बैठे - बैठे सरकार चलाने के बजाय वे पूरे प्रदेश में भ्रमण करते हुए जनता के सीधे संपर्क में रहते हैं। इसका लाभ क्षेत्रीय असंतुलन दूर करने के रूप में मिलता है। मुख्यमंत्री के पास भारी बहुमत होने से सरकार के स्थायित्व को कोई संकट नहीं है। भाजपा चूंकि संगठन आधारित राजनीतिक दल है इसलिए पार्टी के भीतर भी उनके विरुद्ध  मोर्चेबंदी की कोई गुंजाइश नहीं है। भाजपा के पितृ संगठन कहे जाने वाले रा. स्व. संघ से भी डॉ. यादव का जुड़ाव सर्वविदित हैं। यही वजह है कि उनका दो वर्षीय कार्यकाल बिना किसी बाधा के पूरा हो गया। मुख्यमंत्री को शासन और प्रशासन का भी अच्छा - खासा अनुभव है । यद्यपि बीच - बीच में उनको अस्थिर करने की हवा उड़ती रही किंतु पार्टी हाइकमान का भरोसा बने रहने से वे पद पर बने हुए हैं। जहाँ तक दो वर्ष के कार्यकाल की समीक्षा का है तो ये कहना गलत नहीं होगा उन्होंने शिवराज सरकार द्वारा तैयार प्रदेश के विकास की कार्ययोजना को आगे बढ़ाने में सफलता हासिल की है। वहीं सामाजिक क्षेत्र की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को  जारी रखकर भाजपा के चुनावी वायदों को पूरा करने की प्रतिबद्धता दर्शाई है। लेकिन उपलब्धियों की चर्चा मात्र से विगत दो वर्ष के कार्यकाल का मूल्यांकन पूरा नहीं होगा। इसके लिए उन बिंदुओं पर भी प्रकाश डालना होगा जिन पर प्रदेश सरकार को विशेष तौर पर ध्यान देना होगा। और उनमें मुख्य हैं भ्रष्टाचार उन्मूलन और दूसरा नौकरशाही में व्याप्त असंवेदनशीलता दूर करना। आये दिन विभिन्न जाँच एजेंसियां भ्रष्ट सरकारी कर्मियों को रंगे हाथ पकड़ती हैं। उनके पास अकूत संपत्ति का मिलना इस बात का प्रमाण है कि  भ्रष्टाचार निचले पायदान तक फैल चुका है। दूसरी जिस बात पर प्रदेश के मुखिया के तौर पर मुख्यमंत्री को विशेष तौर पर ध्यान देना चाहिये वह है नौकरशाही में व्याप्त असंवेदनशीलता जिसके चलते सरकारी मशीनरी खास तौर पर अधिकारी वर्ग निरंकुश हो चला है। इतने विशाल बहुमत वाली सरकार होते हुए भी प्रशासनिक अधिकारियों में अंग्रेजी राज वाली मानसिकता  सवाल खड़े  करने के लिए पर्याप्त है। बीते दो वर्षों के कालखंड में मुख्यमंत्री को प्रदेश की स्थिति का पूरा - पूरा ज्ञान हो गया होगा। प्रशासनिक अमले से आम जनता को होने वाली तकलीफों की जानकारी भी उन तक पहुंचती ही होगी। ऐसे में अब उन्हें नौकरशाही की जवाबदेही तय करने के लिए कारगर कदम उठाने पड़ेंगे। हालांकि मुख्यसचिव के रूप में मुख्यमंत्री के पास बहुत ही कुशल और अनुभवी प्रशासनिक अधिकारी है किंतु जिला स्तर पर भी वैसी ही कसावट आवश्यक है । अपने शेष कार्यकाल में डॉ. यादव के लिए प्रदेश को देश के विकसित राज्यों के समकक्ष खड़ा करने की चुनौती है। हालांकि बीते दो दशकों में प्रदेश उस बीमारू राज्य के कलंक को धो चुका है जो दिग्विजय सिंह के दस वर्षीय शासन में लगा था। बिजली, सड़क सहित आधारभूत संरचना के मामले में म.प्र ने निःसंदेह  ऊँची छलांग लगाई है। कृषि क्षेत्र में तो उसकी उपलब्धियां पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों से भी बेहतर हैं। लेकिन उद्योगों के विकास की संभावनाओं को हकीकत में बदलने का कार्य अभी पूरा नहीं हुआ। डाॅ. यादव में ऊर्जा और उत्साह दोनों हैं , जो सफल नेतृत्व की मूलभूत जरूरत है। उम्मीद की जा सकती है कि आगामी वर्ष जब वे अपनी सरकार की तीसरी वर्षगांठ मना रहे होंगे तब उनकी उपलब्धियों की सूची  और बड़ी होगी। म.प्र  में विकास की तमाम अनुकूलताएं हैं जिनका समुचित दोहन चमत्कारिक परिणाम दे सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 12 December 2025

संतोष वर्मा जैसे लोग ही दलित वर्ग के उत्थान में बाधक


म.प्र सरकार के एक आई.ए.एस अधिकारी संतोष वर्मा बीते कुछ दिनों से विवादित बातें करते - करते खुद विवादग्रस्त हो गए हैं। अजाक्स नामक कर्मचारी संगठन के सम्मेलन में ब्राह्मण की बेटी उनके बेटे  को दिये जाने  तक आरक्षण जारी रखने जैसा बयान देकर वे उच्च जातियों के निशाने पर आये थे। शिकायतें होने पर उनसे जवाब मांगा गया जिसे शासन ने असंतोषजनक मानते हुए उन्हें पद से हटाने के साथ ही उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश भी केन्द्र सरकार से कर दी। श्री वर्मा पर ये आरोप भी है कि उन्होंने गलत दस्तावेजों के आधार पर पदोन्नति हासिल की थी। अतीत में  वे जेल भी जा चुके हैं। गत दिवस उनका एक और बयान आ गया जिसमें उन्होंने उच्च न्यायालय पर आरोप लगा दिया कि उसके कारण आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी सिविल जज नहीं बन पा रहे। इस पर विधि जगत की अनेक हस्तियों ने उनकी तीखी आलोचना की है। ऐसा लगता है उन्हें अपनी नौकरी पर मंडराते खतरे का आभास हो चुका था। संभवतः इसीलिये वे उल्टे - सीधे बयान देकर दलित वर्ग के बीच ये भावना फैलाना चाहते हैं कि उनके हितों की खातिर उन्होंने नौकरी कुर्बान कर दी। जिस तरह के आरोप उन पर लगे हैं उनकी गंभीरता को देखते हुए कह सकते हैं कि बर्खास्तगी के बाद भी उनकी मुसीबतें कम नहीं होने वालीं क्योंकि फर्जी दस्तावेजों के जरिये पदोन्नति प्राप्त करने के अपराध में उन पर आपराधिक प्रकरण भी दर्ज हो सकता है। उनके अतीत और हालिया बयानों से ऐसा लगता है वे  दलित नेता के तौर पर स्थापित होकर अपने अपराधों पर पर्दा डालना चाहते हैं। बीते कुछ दशकों से  ये देखने मिला है कि  दलित वर्ग के अनेक प्रशासकीय अधिकारी नौकरी छोड़ राजनीति में आकर सांसद - विधायक ही नहीं बल्कि मंत्री तक बन बैठे। अविभाजित म.प्र में स्व.अजीत जोगी नामक आई.ए.एस अधिकारी इस्तीफा देकर कांग्रेस में आये और कालांतर में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बन गए। श्री वर्मा का भविष्य क्या होगा ये अभी तक अनिश्चित  है। अपनी बर्खास्तगी के विरुद्ध वे अदालत में जाने के साथ ही दलित कार्ड खेले बिना नहीं रहेंगे। हालांकि ये अभी तक स्पष्ट नहीं है कि उनकी भावी रणनीति क्या होगी किन्तु उनकी हरकतों से दलित वर्ग का कोई लाभ होगा ये सोचना पूरी तरह गलत है। सही बात ये है कि उन जैसे दूषित मानसिकता के लोग ही अपने समुदाय के उत्थान में बाधक बनते हैं। हाल ही में सेवा निवृत्त  सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई तो उच्च पदों पर बैठे आरक्षित लोगों की अगली पीढ़ी को आरक्षण का लाभ नहीं मिलने का सुझाव  अदालत और उसके बाहर कह चुके हैं जबकि वे स्वयं उसी वर्ग से हैं। वहीं दूसरी तरफ श्री वर्मा  हैं जो प्रशासनिक अधिकारी जैसे जिम्मेदार ओहदे पर पहुंचकर भी जहर बुझी बातें कहकर खुद तो विवादित होते ही हैं पूरे दलित वर्ग को मुख्यधारा में आने से रोकने का अपराध भी करते हैं। उनके  विरुद्ध जिस तरह की उग्र प्रतिक्रियाएं आईं वे जातीय  संघर्ष का कारण बन सकती हैं। बेहतर तो यही होता कि उनके आपत्तिजनक और भड़काऊ बयानों का विरोध दलित वर्ग के बीच से ही हो क्योंकि ऐसे लोग अपने अपराध छिपाने के लिए जातीय समुदाय को ढाल बनाने की चालाकी दिखाते हैं। प्रदेश सरकार ने उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश केन्द्र सरकार को भेजकर सही कदम उठाया है। अन्यथा उन जैसी स्तरहीन सोच रखने वालों का हौसला बुलंद होगा। समय आ गया है जब आरक्षण का लाभ ले रहे वर्ग को बजाय सरकार के रहमो - करम पर निर्भर रहने  के अपनी प्रतिभा विकास पर ध्यान देना चाहिए। मोदी सरकार ने कौशल विकास की जो योजनाएं  शुरू कीं उनका लाभ लेकर दलित वर्ग को भी स्वरोजगार के प्रति जागरूक होना चाहिए क्योंकि भविष्य में सरकारी नौकरियां कम होना तय है। आरक्षण निश्चित तौर पर जरूरी था किंतु श्री वर्मा सदृश जो लोग उसका लाभ उठाकर उच्च पदों पर बैठ जाते हैं वे बजाय पूरे समुदाय के अपने परिवार को ही आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं। इसे देखते हुए ही श्री गवई ने क्रीमी लेयर जैसा मुद्दा उठाया। बहरहाल संदर्भित प्रकरण में म.प्र सरकार ने श्री वर्मा के विरुद्ध जो भी कारवाई की वह न्यायोचित है क्योंकि उन्होंने जो कर्म किये उसका फल तो उनको भुगतना ही पड़ेगा। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 11 December 2025

लेकिन नये मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाने वाले शिक्षक कहाँ से आयेंगे

म.प्र.सरकार ने प्रदेश के छोटे - छोटे जिलों में मेडिकल कालेज खोलने का जो फैसला किया उसका उद्देश्य  चिकित्सकों की कमी दूर करना है।  सर्वविदित है कि चिकित्सा सेवाओं के विस्तार में चिकित्सकों की कमी सबसे बड़ी बाधा है। चिंताजनक ये भी है कि सरकारी मेडिकल कालेजों में बेहद सस्ती शिक्षा पाकर डिग्री हासिल करने के बाद बहुत कम चिकित्सकों की रुचि शासकीय सेवा में दिखाई देती है। उसका एक कारण उन्हें ग्रामीण अथवा कस्बाई सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों में नियुक्ति मिलना भी है। जो चिकित्सक स्नातकोत्तर उपाधि या उससे भी आगे  की पढ़ाई कर विशेषज्ञ बन जाते हैं उनकी प्राथमिकता निजी प्रैक्टिस ही होती है। सरकार चिकित्सकों को विदेश जाने से रोकने के लिए बाँड जैसी कितनी भी व्यवस्था कर ले किंतु उससे भी चिकित्सकों की कमी दूर नहीं हो पा रही। इसीलिये निजी क्षेत्र को मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति दी जाने लगी  किंतु उनकी पढ़ाई बेहद महंगी होने से वहाँ से  निकले अधिकांश चिकित्सक अपनी पढ़ाई पर हुए खर्च की वसूली मरीजों से करने में जुट जाते हैं। इसीलिये केन्द्र सरकार ने देश भर में नये मेडिकल कॉलेज खोलने की नीति लागू की जिसके अंतर्गत म.प्र सरकार ने भी बीते कुछ वर्षों में छोटे - छोटे जिलों में मेडिकल कॉलेज खोलने का सिलसिला शुरू किया जो क्षेत्रीय राजनीतिक संतुलन बनाये रखने पर केंद्रित हो गया। इसी क्रम में  प्रदेश मंत्रिपरिषद की हालिया बैठक में पन्ना, कटनी, धार और बैतूल में नए मेडिकल कॉलेज खोलने का निर्णय हुआ। साथ ही पहले से चल रहे मेडिकल कालेजों का उन्नयन करने के बारे में भी योजना बनी। निश्चित रूप से ये नीति स्वागतयोग्य है। पहले मेडिकल कॉलेज केवल संभागीय मुख्यालयों में ही थे। लेकिन अब प्रदेश के विभिन्न जिलों में शासकीय और निजी मिलाकर 30 - 32 मेडिकल कॉलेज हैं जिनमें क्रमशः 2700 और 2500 सीटें हैं। भोपाल में एम्स ( भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) भी है। चार नए कॉलेज खुलने पर प्रदेश में तीन दर्जन मेडिकल कॉलेज होने से सीटें और बढेंगी। इस प्रकार कुछ सालों बाद प्रतिवर्ष 5 हजार से ज्यादा नए चिकित्सक तैयार होंगे जो निश्चित रूप से अच्छा संकेत है। लेकिन चिंता की बात ये है कि जो मेडिकल कॉलेज हाल के वर्षों में खोले गए  वे ही अब तक  पूरी तरह स्थापित और साधन संपन्न नहीं हो सके हैं। और तो और  दशकों पुराने जो मेडिकल कॉलेज हैं उनकी सेहत भी संतोषजनक नहीं है। सबसे बड़ी समस्या है इन कॉलेजों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की कमी। नये मेडिकल कॉलेज को मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया से मान्यता दिलवाने पुराने कॉलेजों से शिक्षकों को भेजा जाता है जो कुछ समय बाद अपने मूल कॉलेज में वापसी के लिए हाथ पाँव मारते देखे जा सकते हैं। और सफलता नहीं मिलने पर अवकाश पर चले जाते हैं। कुछ तो नौकरी भी छोड़ने में संकोच नहीं करते। निजी क्षेत्र वाले तो सरकारी मेडिकल कॉलेज से सेवा निवृत शिक्षकों को नियुक्त कर काम चला लेते हैं किंतु शासकीय कॉलेजों में योग्य शिक्षकों का अभाव शिक्षा का स्तर गिरा रहा है। ये देखते हुए बेहतर तो यही होगा कि जो मेडिकल कॉलेज वर्तमान में संचालित है उन्हीं में सीटें बढ़वाने की स्वीकृति मेडिकल काउंसिल से ली जाए। इसके लिए जरूरी औपचारिकताओं को पूरा करने में नये कॉलेज खोलने की तुलना में बेहद कम खर्च आयेगा और शिक्षकों की कमी भी नहीं रहेगी। नये कॉलेज को पूरी तरह स्थापित करने में लगने वाली धनराशि से पुराने मेडिकल कालेजों की क्षमता और स्तर सुधारने के बेहतर परिणाम मिलेंगे। हालांकि राजनीतिक नेता इस सुझाव को मान्य नहीं करेंगे  क्योंकि जनप्रतिनिधियों के लिए कॉलेज का खुलना  ही उपलब्धि है। भविष्य में उसका संचालन ठीक से हो इसकी चिंता आम तौर पर उन्हें नहीं होती। चिकित्सा जैसे सर्वोच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र की दुर्दशा का कारण सरकारी क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और अव्यवस्था ही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आयुष्मान योजना के अंतर्गत 5 लाख तक के निःशुल्क इलाज की जो सुविधा दी उसका लाभ निजी अस्पतालों को मिलने का कारण सरकारी चिकित्सा केंद्रों का अक्षम होना ही है। ऐसे में केंद्र सरकार को भी ये देखना चाहिए कि नये मेडिकल कॉलेज खोलने के बाद सुचारु रूप से संचालित हो भी पा रहे हैं या उनकी दशा भी बाकी सरकारी दफ्तरों जैसी ही है।


 - रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 10 December 2025

गलतियों को दोहराना राहुल की आदत बन गई



लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी का जन्म देश के प्रमुख राजनीतिक परिवार में होने से उन्होंने बचपन से ही राजनीति के उतार चढ़ाव देखे। उनका लालन - पालन प्रधानमंत्री आवास में हुआ। उस वजह से सत्ता का स्वाद  भी उन्होंने महसूस किया। पिता की हत्या के बाद पहले उनकी माताजी सोनिया गाँधी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष बनाई गईं। और उसके बाद जैसा होता आया  धीरे से राहुल भी पार्टी में सक्रिय होकर महामंत्री और अध्यक्ष बन गए। यद्यपि लंबे समय से वे संगठन के किसी पद पर नहीं हैं किंतु आज  की स्थिति में पार्टी पूरी तरह उनकी मुट्ठी में है। कहने को तो उनकी बहिन प्रियंका वाड्रा भी महामंत्री होने के साथ ही लोकसभा सदस्य हैं किंतु सोनिया जी की अस्वस्थता के कारण कांग्रेस की पूरी कमान श्री गाँधी के पास ही है। लोकसभा में भी वे दो दशक से हैं। इतनी समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि और सुदीर्घ संसदीय अनुभव के बाद भी वे अपनी और  कांग्रेस की दिशा और दशा में कोई सुधार नहीं कर सके। उल्टे खुद को हास्यास्पद बनाने के साथ ही पार्टी को भी पराजय का प्रतीक बना बैठे। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें राष्ट्रीय परिदृश्य पर नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर उभरने का स्वर्णिम अवसर मिला था। लोकसभा में कांग्रेस पार्टी की अच्छी खासी संख्या होने के अलावा अन्य विपक्षी दल भी ताकतवर हुए। कांग्रेस को मुख्य विपक्षी दल का दर्जा मिलने से श्री गाँधी स्वाभाविक  तौर पर नेता प्रतिपक्ष बने। पूरा देश अपेक्षा कर रहा था कि वे परिपक्वता का परिचय देंगे । भारत जोड़ो यात्रा के जरिये उन्हें जमीन से जुड़ने का भरपूर अवसर भी मिला। लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि तमाम अनुकूलताओं और पार्टी पर एकाधिकार के बावजूद उन्होंने निराश किया। जम्मू -कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन के बाद जब बिहार में चुनावी रणभूमि सजी तब एक बार फिर ये उम्मीद व्यक्त की जाने लगी कि चेहरा विहीन भाजपा और थके दिखने लगे नीतीश कुमार पर तेजस्वी और राहुल की जोड़ी भारी पड़ेगी। कुछ यू ट्यूबर पत्रकार तो उनके महागठबंधन को जीता - जिताया प्रचारित करने में जुट गए। राहुल ने वोट चोरी का ढोल पीटकर चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करने में पूरी ताकत लगा दी किंतु बिहार की जमीनी सच्चाई को भांपने में असफल रहकर उन्होंने पिछली गलतियाँ ही दोहराईं। और अपने साथ ही तेजस्वी सहित बाकी विपक्षी दलों की नैया भी डुबो दी। उसके बाद मोदी सरकार के पतन और  राहुल के अगले  प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी करने वाले राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार अपना मुँह छिपाते घूमते देखे गए। बिहार में महागठबंधन का झंडा लेकर घूमने वाला ये तबका अब राहुल की कार्यप्रणाली में दोष ढूढ़ने लग गया है । इंडिया गठबंधन के अन्य घटक भी उनसे छिटकने लगे। लेकिन इन सबसे बेखबर श्री गाँधी अपना रवैया  बदलने तैयार नहीं हैं। गत दिवस लोकसभा में बोलते हुए उन्होंने एक बार फिर रास्वसंघ पर अपना गुस्सा उतारते हुए आरोप लगाया कि सभी संवैधानिक संस्थाओं पर उसका कब्जा हो गया है। ये पहला अवसर नहीं है जब उन्होंने संघ पर इस तरह का आरोप लगाया हो। जब उन्हें कोई मुद्दा नहीं सूझता तब वे संघ पर निराधार आरोप लगाने लगते हैं। आज तक उनकी समझ में ये नहीं आया कि वे संघ के विरुद्ध जो बकवास करते हैं उसका हिन्दू समाज पर विपरीत असर होता है। हाल ही में जितने विधानसभा चुनाव हुए उनमें हिन्दू मतदाताओं का जो ध्रुवीकरण  हुआ उसके लिए भाजपा की रणनीति से ज्यादा राहुल द्वारा संघ की आलोचना जिम्मेदार है। महाराष्ट्र में उन्होंने वीर सावरकर के विरोध में दुष्प्रचार करने की जो गलती की उसकी महंगी कीमत कांग्रेस ने चुकाई किंतु उसके बाद भी उन्होंने अपनी गलती नहीं सुधारी। पता नहीं उनके सलाहकार कौन हैं जो उन्हें इस बात का एहसास  नहीं करवाते कि देश का हिन्दू जनमानस संघ के विरुद्ध किये जाने वाले जहरीले प्रचार को बर्दाशत नहीं करता। हाल ही में संघ के शताब्दी वर्ष आयोजन के अवसर पर सरसंघचालक डाॅ. मोहन भगवत ने कहा भी था कि जिस तरह संघ हर प्रतिबंध के बाद और ताकतवर होकर निकला वैसे ही उसकी निरर्थक आलोचना से भी इस हिन्दू संगठन की लोकप्रियता और बढ़ती है। बेहतर हो  राहुल अपने इर्द - गिर्द मंडराने वाले चाटुकार किस्म के सलाहकारों की बजाय संघ प्रमुख की बात का निहितार्थ समझें। संवैधानिक संस्थाओं पर संघ के प्रभाव का रोना रोने के बजाय उनको इस बात का अध्ययन करना चाहिये कि समाज पर संघ का प्रभाव क्यों और कैसे बढ़ रहा है  क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति वही होता है जो अपने विरोधी के गुणों से भी सीखे। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 9 December 2025

घरेलू पूंजी ने आत्मनिर्भरता का एहसास कराया


अमेरिका द्वारा बढ़ाये गए टैरिफ के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव उतना नहीं हो सका जितना कि आशंका जताई जा रही थी। हालांकि निर्यात पर उसका थोड़ा असर हुआ किंतु भारत ने समय रहते वैकल्पिक बाजार तलाशकर अमेरिकी दबाव को काफी हद तक कम कर दिया। इसी बीच खबर आई कि विदेशी निवेशकों ने हाल ही में 10000 करोड़ रु. के शेयर बेचकर भारतीय पूंजी बाजार से अपना पैसा निकाला। डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत गिरते जाने के लिए विदेशी निवेशकों द्वारा की जा रही बिकवाली को भी बड़ा कारण माना जा रहा है। लेकिन चिंता के बादलों के बीच उम्मीद की किरण के रूप में भारतीय संस्थागत निवेशकों ने 19000 करोड़ निवेश करते हुए बाजार में पूंजी का संकट उत्पन्न नहीं होने दिया। हालांकि ऐसा पहले भी होता रहा है जब विदेशी निवेशकों द्वारा की गई भारी बिकवाली के दौरान  छोटे - छोटे भारतीय निवेशकों ने शेयर बाजार को गुलजार रखा। विशेष रूप से म्यूचल फंड में मध्यमवर्गीय निवेशकों ने अपनी बचत लगाकर अच्छा मुनाफा भी कमाया। जहाँ तक बात विदेशी पूंजी की है तो वह ज्यादा ब्याज या मुनाफे के फेर में ही भारत में निवेश होती है। विदेशियों को भारत की प्रगति से कुछ लेना - देना नहीं होता किंतु घरेलू निवेशक के मन में देश की प्रगति का भाव किसी न किसी रूप में रहता ही है। बीते दो दशकों से भारत के पूंजी बाजार में जो रौनक  है वह मध्यमवर्गीय निवेशकों के कारण ही है जो पहले केवल बैंकों से मिलने वाले ब्याज पर ही निर्भर होता था। चूंकि बैंकों द्वारा जमा राशि पर दिये जाने वाले ब्याज की दर काफी कम हो गई लिहाजा  प्रौढ़ावस्था के लोग भले ही बैंकों में अपनी बचत करते हों किंतु नई पीढी़ के निवेशक पूंजी बाजार के उतार - चढ़ाव का सामना करने में नहीं डरते। यही कारण है कि  निजी क्षेत्र को आम जनता से मिलने वाली पूंजी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। सबसे खास बात ये है कि ये निवेशक केवल चुनिंदा बड़ी कंपनियों में ही पैसा नहीं लगाते अपितु गैर परंपरागत व्यवसायों में भी निवेश करने में आगे आ रहे हैं। इसका सकारात्मक प्रभाव देखा जा सकता है। अर्थव्यवस्था के लिए ये शुभ संकेत है कि बड़ी संख्या में युवा पेशेवर बजाय नौकरी करने के अपना व्यवसाय शुरू कर स्वरोजगार की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं। विदेशों में कार्यरत हजारों युवाओं ने बीते कुछ सालों में भारत आकर खेती, व्यापार और उद्योग  में अपनी प्रतिभा और परिश्रम के झंडे गाड़ दिये। दुनिया के बाजारों में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करवाने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था में जो गतिशीलता आई उसका बड़ा कारण एक तो विशाल घरेलू बाजार है , वहीं दूसरी तरफ  विदेशी पूंजी जरूरी होने के बाद भी अब  मजबूरी नहीं रही। दुनिया के तमाम बड़े देश और वित्तीय संस्थान भारत के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने लालायित हैं तो उसका कारण हमारी आर्थिक आत्मनिर्भरता ही है। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का उत्साहजनक प्रदर्शन भी अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है। मोदी सरकार ने रक्षा सौदों में तेजी लाकर जहाँ देश के सुरक्षा तंत्र को सुदृढ़ किया वहीं उसके समानांतर घरेलू स्तर पर रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र के प्रवेश का रास्ता खोलकर भारत को निर्यातक बनाने की स्थिति में ला खड़ा किया जिसका असर दिखने भी लगा है। डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लादे गए टैरिफ के बाद भी यदि भारतीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने से बची हुई है तो उसका कारण घरेलू स्तर पर बढ़ती क्रय शक्ति के साथ ही बढ़ती घरेलू पूंजी भी है। इससे बौखलाए ट्रम्प अब और टैरिफ थोपने की धमकी दे रहे हैं किंतु उससे विचलित हुए बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी ने पिछले दिनों रूस के राष्ट्रपति पुतिन के साथ दिल्ली में वार्ता करते हुए आपसी संबंधों को जो मजबूती प्रदान की वह सीधे - सीधे अमेरिका को चुनौती है जो भारत और रूस के रिश्तों में दरार पैदा करने की हरसंभव कोशिश कर रहा है। समूचे परिदृश्य पर नजर डालने पर लगता है कि देश अब अपनी समस्याओं से निपटने के लिए आत्मविश्वास से भरपूर है। घरेलू निवेशकों द्वारा शेयर बाजार से निकली विदेशी पूंजी से दोगुनी लगा देने से आत्मनिर्भर भारत अब हकीकत में बदलता प्रतीत हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 8 December 2025

बालाघाट में नक्सलियों का आत्म समर्पण शुभ संकेत



म.प्र  के बालाघाट में 12 नक्सलियों का आत्म समर्पण शुभ संकेत है। हाल ही में इसी जिले में नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में एक युवा पुलिस इंस्पेक्टर जान से हाथ धो बैठा था।  खनिज संपदा से संपन्न बालाघाट जिला नक्सलियों की गतिविधियों का बहुत पुराना गढ़ रहा है  अतीत में उनके द्वारा कई नेताओं की भी हत्या  की जा चुकी है । समीपवर्ती कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में भी उनकी आवाजाही रही। सर्वविदित है नक्सलियों की गतिविधियाँ मुख्य रूप से खनिज और वन्य संपदा संपन्न क्षेत्रों में ही देखी जाती हैं। इसके अलावा वे राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों को ही अपना कार्यक्षेत्र बनाते रहे हैं जिससे कि एक में वारदात कर दूसरे में भाग सकें। बालाघाट जिले की सीमाएं भी छत्तीससगढ़ और महाराष्ट्र से मिलती हैं। इसीलिए म.प्र का यह जिला उनको रास आता रहा। इसके अलावा निकटवर्ती मंडला  भी आदिवासी बहुल और वन्य संपदा संपन्न होने से नक्सलियों की पसंद बना रहा किंतु उनका आतंक ज्यादातर बालाघाट जिले में ही है। इसमें भी दो राय नहीं है कि जिस तरह चंबल संभाग में डकैत समस्या को समाज और शासन - प्रशासन से जुड़े कुछ तबके खाद -पानी देते थे लगभग वही स्थिति नक्सलियों के साथ भी है। उनके मुखबिर पुलिस की गतिविधियों की जानकारी उन तक पहुंचाते रहे हैं। इसी तरह खनिज व्यवसायियों से की जाने वाली वसूली भी बिचौलियों के जरिये ही होती है। यद्यपि बालाघाट में नक्सलियों का जाल छत्तीसगढ़ जैसा बड़ा और मजबूत तो नहीं बन पाया किंतु उनका आतंक पूरी तरह महसूस किया जा सकता था। म.प्र में नक्सली आतंक से निपटने के लिए पुलिस विभाग ने विशेष व्यवस्था कर रखी थी। इसीलिए बीते कुछ वर्षों में प्रदेश में कोई बड़ी वारदात तो नहीं कर सके किंतु उनका डर लोगों के मन - मस्तिष्क पर हावी था। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा 31 मार्च 2026 तक नक्सल समस्या के खात्मे का जो संकल्प लिया गया उसके कारण बीते कुछ महीनों से विभिन्न राज्यों में सक्रिय नक्सली गुटों में जो दहशत है उसका प्रमाण बड़ी संख्या में उनके हथियार डालने से मिल रहा है। हिडमा नामक बड़े नक्सली के अलावा अन्य के मारे जाने से नक्सलवादियों के संगठन कमजोर होने लगे हैं। यही वजह है कि आये दिन नक्सलियों द्वारा हथियार डालकर मुख्य धारा में शामिल होने के समाचार मिल रहे हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र और तेलंगाना में भी नक्सलियों द्वारा लगातार आत्म समर्पण किये जाने से लगता है केंद्र सरकार द्वारा तय की गई समय सीमा के भीतर ही उनके आतंक से देश को मुक्ति मिल जायेगी। यदि ऐसा हुआ तो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बना हुआ बड़ा खतरा समाप्त होने के साथ ही आदिवासी बहुल देश के बड़े हिस्से में विकास की गंगा बहने का शुभारंभ भी सकेगा। ये बात सही है कि यदि शासन चाह ले तो आतंकी और अपराधी की कमर तो़ड़ना असम्भव नहीं होता। डाकू समस्या का उन्मूलन भी तभी हो सका जब दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ प्रयास किये गए। जब म.प्र, उ.प्र और राजस्थान में फैले डाकुओं को लगा कि उनके लिए जान बचाना कठिन है तब उन्होंने हथियार रखकर समाज के साथ जुड़ने की अकलमंदी दिखाई। लेकिन उनमें और नक्सलियों में सबसे बड़ा बुनियादी फर्क ये है कि डकैतों की कोई  विचारधारा नहीं थी। वे सामाजिक शोषण  , अत्याचार अथवा सामान्य अपराधी मानसिकता से ग्रसित होकर हथियार उठाते थे। लेकिन नक्सलियों की पीठ पर चीन पोषित माओवादी विचारधारा का हाथ है जिसका उद्देश्य भारत में खूनी क्रांति के जरिये साम्यवादी शासन व्यवस्था कायम करना है। आदिवासियों का उत्थान और वन संपदा के संरक्षण जैसे उनके नारे महज दिखावा हैं। ये बात प्रमाणित हो चुकी है कि अपने को गरीबों और शोषितों का मसीहा कहने वाले नक्सली उनके सबसे बड़े दुश्मन साबित हुए जिन्होंने उनके विकास के रास्ते अवरुद्ध कर दिये। यदि नक्सली आतंक न होता तब प. बंगाल,बिहार, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और म.प्र. के आदिवासी इलाकों में विकास का सूर्योदय हो चुका होता। उस दृष्टि से श्री शाह ने जो दृढ़ संकल्प लिया वह राष्ट्रहित के साथ आदिवासियों के जीवन को संवारने की दिशा में बड़ा कदम है। बालाघाट में हुए नक्सली आत्म समर्पण के लिए  म.प्र की मोहन  यादव सरकार भी बधाई की पात्र है। उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले कुछ महीनों में म.प्र भी नक्सली आतंक से मुक्त हो जाएगा।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 6 December 2025

लूट खसोट करने वाली एयरलाइनों पर भी कारवाई होना चाहिए


देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो की सेवाएं अवरुद्ध हो जाने से  लाखों यात्रियों को अकल्पनीय  मानसिक, शारीरिक और आर्थिक परेशानियों से गुजरना पड़ा । हजारों उड़ानें रद्द होने से जो अफरातफरी मची उसके दृश्य और समाचारों ने हर जिम्मेदार व्यक्ति को चिंता में डाल दिया। इस संकट के लिए फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन नामक नये नियम को जिम्मेदार बताया जा रहा है जिसके तहत विमान चालक पायलटों को अवकाश और आराम की व्यवस्था है। ये नियम 1 नवंबर से लागू है जिसे बाकी एयरलाइनों ने तो लागू कर लिया किंतु सबसे अधिक विमान और उड़ानों की संख्या चूंकि इंडिगो की है लिहाजा उसे पायलटों  की कमी से जूझना पड़ा जिसका परिणाम उड़ानें रद्द होने के तौर पर दिखाई देने लगा। नवंबर माह से शुरू संकट दिसंबर आते - आते  भीषण रूप ले बैठा और फिर जो हुआ वह देश में हवाई सेवाओं के इतिहास का सबसे खराब अनुभव है। इससे यात्रियों को हुई दिक्कतों की जानकारी तो सर्वविदित है किंतु संकट के इस दौर में बाकी एयरलाइनों ने जो लूट - खसोट की उसे न रोक पाना भी कम असफलता नहीं है। यात्रियों की मजबूरी का लाभ उठाकर दस - बीस गुना किराया वसूलना मानवीयता और नैतिकता के सर्वथा विरुद्ध है। सरकार ने नियम पालन में विफल रहने के लिए इंडिगो पर कार्रवाई करने की जो बात कही वह पूरी तरह उचित है। फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन नामक व्यवस्था लागू करने के लिए फरवरी तक की  मोहलत यात्रियों को हुई परेशानी दूर करने के लिए मजबूरी में दी गई किंतु इस अभूतपूर्व संकट के समय जिन एयरलाइनों ने किराये के नाम पर यात्रियों की जेब पर डाका डालने जैसा टुच्चापन दिखाया उनके विरुद्ध भी सख्त कदम उठाये जाने चाहिए जिससे यात्रियों की जरूरतों का लाभ उठाकर मनमाना किराये की लूटमार रोकी जा सके। इंडिगो ही नहीं अन्य एयरलाइनों में भी पायलटों से निर्धारित नियमों से अधिक काम लिया जाता है। ज्यादा कमाई के लालच में निर्धारित क्षमता से अधिक फेरे लगाने के कारण पायलटों की कार्यक्षमता पर बुरा असर पड़ता है। इसी वजह से आये दिन हादसे होते - होते बचते हैं जिनमें यात्रियों की जान के लिए जोखिम उत्पन्न होता है। विमान के पायलट का काम बेहद महत्वपूर्ण होता है। उसकी जरा सी गलती से सैकड़ों यात्रियों की ज़िंदगी खत्म हो सकती है। इसीलिए ये आवश्यक है कि उससे जरूरत से अधिक काम न लिया जाए क्योंकि वह आम कर्मचारी नहीं है। बहरहाल इंडिगो कांड के बाद उड्डयन संबंधी नियमों का कड़ाई से पालन करवाने की अचूक व्यवस्था के अलावा किरायों की अधिकतम सीमा भी तय होना चाहिए क्योंकि जब उपभोक्ताओं की मजबूरी का लाभ उठाकर कालाबाजारी करने वाला आम व्यवसायी कानून की नजर में अपराधी है तब एयरलाइनों  को ऐसा करने की खुली छूट देने का औचित्य क्या है ? इस बारे में ये बात ध्यान देने योग्य है कि अब हवाई यात्रा केवल धनाड्य वर्ग और नेताओं तक सीमित नहीं रही अपितु मध्यमवर्ग में इसका उपयोग करने का चलन बढ़ा है। इसे देखते हुए एयरलाइनों ने हवाई यात्रा को सस्ता बनाने के लिए आरामदेह सीटें हटाकर साधारण सीटें लगाने के अलावा खान - पान तक पर पाबंदी लगा दी। पानी तक मांगने पर प्रदान किया जाता है। लेकिन किरायों को लेकर होने वाली लूट - खसोट बढ़ती जा रही है। अनेक बार सर्वोच्च न्यायालय तक इस बारे में ऐतराज दर्ज करवा चुका है किंतु इस गोरखधंधे पर रोक लगने के बजाय वह बढ़ता ही जा रहा है। इंडिगो की सेवाएं रुक जाने से जो यात्री अग्रिम भुगतान करने के बावजूद यात्रा से वंचित हो गये उनके पैसे तत्काल लौटाने का दबाव जिस प्रकार सरकार बना रही है उसी तरह उन एयरलाइनों को भी लूटा गया अतिरिक्त किराया लौटाने मजबूर किया जाए जिन्होंने  बेहद असंवेदनशील रवैया दिखाकर यात्रियों का शोषण किया। इसके अलावा देश में बढ़ते उड्डयन व्यवसाय को देखते हुए बड़े पैमाने पर पायलट तैयार करने की कार्ययोजना भी बनाई जाए।  उल्लेखनीय है  अनेक एयरलाइन विदेशी पायलटों की सेवाएं ले रही हैं। इंडिगो को फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन संबंधी नये नियम लागू करने के लिए कुछ महीनों की छूट दिये जाने का कारण भी पायलटों की कमी ही है जिसे दूर करने में कई माह लग जाएंगे। बीते कुछ दिनों में जो पीड़ादायक स्थिति उत्पन्न हुई उसके लिए जिम्मेदार लोगों को समुचित दंड मिलना जरूरी है। इंडिगो देश की सबसे बड़ी एयरलाइन होने के साथ ही समयबद्धता के लिए भी जानी जाती है। लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि वह नियम कानूनों से ऊपर है। उसे भी समय रहते सरकार द्वारा लागू नये नियम का पालन निर्धारित समय सीमा में करना चाहिए था जिसमें असफल रहकर उसने लाखों यात्रियों को हलाकान कर डाला। इस संकट से सरकार को भी सबक लेना चाहिए जिससे ऐसी स्थिति दोबारा न उत्पन्न हो क्योंकि इससे देश की प्रतिष्ठा पर भी आंच आई है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 5 December 2025

भारत और रूस दोनों को एक दूसरे की जरूरत है


रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत दौरा ऐसे समय हो रहा है जब वैश्विक राजनीति में उथलपुथल मची हुई है। यूक्रेन और रूस के बीच चले आ रहे युद्ध ने पूरी दुनिया को दो धड़ों में बाँट दिया है। हालांकि सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस ने साम्यवादी विचारधारा पर आधारित सामाजिक आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को तिलांजलि दे दी। इसकी वजह से अमेरिका और यूरोप के साथ उसके व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्ते काफी सुधरे।  इसका एक कारण ये भी है कि सोवियत संघ का विखंडन अमेरिका की दूरगामी योजना का ही हिस्सा था। विश्व व्यापार संगठन के प्रादुर्भाव के बाद अर्थव्यवस्था का जो वैश्वीकरण हुआ उसने पूरी दुनिया को बड़े बाजार में तब्दील कर दिया। रूस ही नहीं बल्कि साम्यवाद की कट्टरता के पक्षधर चीन तक ने  उदारवादी आर्थिक नीतियों को अंगीकार कर लिया। इसमें दो मत नहीं  कि बीते तीन दशक में चीन  दोध्रुवीय दुनिया की व्यवस्था को बदलकर अमेरिका तथा रूस की टक्कर में आर्थिक, वैज्ञानिक और सामरिक शक्ति बन  बैठा। उसके साथ ही भारत ने भी  विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का बीड़ा उठाते हुए सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का गौरव हासिल कर लिया जिससे दुनिया के ताकतवर देशों के किसी भी जमावड़े में भारत की मौजूदगी अनिवार्य बन गई है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भारत ने कूटनीतिक स्तर पर भी खुद को स्थापित किया और यही वजह है कि सभी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर वे प्रभाव छोड़ देते हैं। रूस के राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा इसका प्रमाण है। यूक्रेन युद्ध के पहले से ही दोनों के बीच काफी मधुर संबंध विकसित हो चुके थे। इसीलिए  उस युद्ध के शुरू होने के बाद  भारत ने अमेरिकी दबाव को दरकिनार करते हुए तटस्थता का रास्ता चुना। यद्यपि परोक्ष रूप से ये नीति रूस का समर्थन थी क्योंकि अमेरिका सहित समूचे यूरोप ने  पर कठोर प्रतिबंध लगाकर उसके साथ व्यापारिक रिश्ते खत्म कर दिये ।  इसका उद्देश्य रूस की आर्थिक कमर तोड़ना था ताकि वह युद्ध को लंबा न खींच सके। लेकिन तब भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदकर उसे जबरदस्त सहारा दिया। हालांकि उस खरीद से हमको  भी बड़ा लाभ हुआ क्योंकि रूस ने भारत को रूपये में भुगतान की सुविधा प्रदान की। लेकिन इसकी वजह से भारत को अमेरिकी नाराजगी झेलनी पड़ी । डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनते ही टैरिफ नामक हथियार का प्रयोग करते हुए रूस से व्यापारिक रिश्ते तोड़ने का दबाव बनाया। लेकिन श्री मोदी ने उसके सामने झुकने से इंकार करते हुए रूस से रिश्ते और मजबूत करने का संकेत दिया। ट्रम्प को यह नागवार गुजरा और वे भारत को परेशान करने नये - नये तरीके अपनाने लगे। लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। दूसरी तरफ  पुतिन  भारत के प्रति अपना दोस्ताना जाहिर करने में आगे - आगे रहे। चीन में हुई एस.सी.ओ ( शंघाई सहयोग संगठन) की बैठक में उन्होंने श्री मोदी को अपनी कार में बिठाकर पूरी दुनिया को संदेश दे दिया। गत दिवस उनके नई दिल्ली आगमन पर श्री मोदी ने भी उनको अपने वाहन में बिठाकर ट्रम्प को बता दिया कि भारत उनकी धौंस से अप्रभावित है। पुतिन की इस यात्रा में रक्षा क्षेत्र में बड़े सौदों के अलावा काफी ऐसे समझौते हो रहे हैं जिनसे द्विपक्षीय व्यापार में और वृद्धि होगी। एक दूसरे के सैन्य क्षेत्र का उपयोग करने के बारे में जो सहमति बनने की खबर है वह इस उपमहाद्वीप के शक्ति संतुलन को गहराई तक प्रभावित करेगी। पुतिन की इस यात्रा को विश्व मीडिया ने जिस तरह बढ़ - चढ़कर प्रचारित किया उससे इसका महत्व  साबित हो गया है। रूसी राष्ट्रपति ने नई दिल्ली आकर श्री मोदी के बारे में जो कुछ कहा उससे डोनाल्ड ट्रम्प निश्चित तौर पर भन्नाए होंगे किंतु भारत ने सदैव इस बात पर जोर दिया है कि वह अपने हितों को ध्यान रखकर ही अपनी विदेश और व्यापार नीतियां तय करेगा और किसी का दबाव उसे स्वीकार नहीं है। श्री मोदी और पुतिन के बीच की आपसी समझ का दिन ब दिन  मजबूत होना दोनों के लिए शुभ संकेत है। सबसे बड़ी बात  ये है कि अमेरिका भारत विरोधी रुख पर आमादा है तो रूस जैसी महाशक्ति खुलकर हमारे साथ है। पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद अमेरिका जहाँ खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़ा नजर आया वहीं चीन ने दबी जुबान ही सही किंतु उसके प्रति हमदर्दी दिखाई । इन दोनों महाशक्तियों द्वारा भारत के जन्मजात दुश्मन की पीठ पर हाथ रखने के बाद भी भारत विचलित नहीं हुआ तो उसका बड़ा कारण रूस का ठोस समर्थन ही था। इस यात्रा से श्री मोदी और पुतिन की नजदीकी और बढ़ेगी। इस संबंध में ये बात ध्यान रखने वाली है कि जितनी जरुरत आज भारत को रूस के समर्थन, सहयोग और संरक्षण की है उतनी ही रूस को भी भारत का साथ आवश्यक है। महाशक्ति होने के बाद भी पुतिन विश्व समुदाय में अकेले पड़ते जा रहे थे किंतु श्री मोदी जैसे दिग्गज नेता के साथ  जुगलबंदी से उन्हें हाशिये पर धकेलने की अमेरिकी कूटनीति अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पा रही। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 4 December 2025

मुख्य न्यायाधीश द्वारा घुसपैठिये को शरणार्थी मानने से इंकार

देश के मुख्य न्यायाधीश श्री  सूर्यकांत द्वारा विगत दिनों रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर जो टिप्पणी की गई वह उस लोगों के गाल पर जोरदार तमाचा है जो मानवीय आधार पर उन्हें शरण देने की वकालत किया करते हैं। मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ के समक्ष जब एक  याचिकाकर्ता की वकील ने रोहिंग्या मुस्लिमों को शरणार्थी कहा तब  मुख्य न्यायाधीश ने पूछा- भारत सरकार का कौन-सा आदेश है जो उन्हें शरणार्थी घोषित करता है ।अगर उनके पास भारत में रहने का कानूनी अधिकार नहीं है और वे घुसपैठिए हैं, तो क्या हम लाल कालीन बिछाकर उनका स्वागत करें? उक्त याचिका में 3 रोहिंग्या घुसपैठियों की गिरफ्तारी के बाद उनके निर्वासन के लिए कानूनी प्रक्रिया के पालन की मांग की गई थी। इस पर श्री सूर्यकांत ने तीखे शब्दों में कहा कि सुरंग खोदकर या बाड़ काटकर अवैध रूप से भारत में दाखिल होने के बाद वे कहते हैं कि अब  भारत के कानूनों के मुताबिक  उन्हें भोजन , आवास का स्थान और  बच्चों को शिक्षा मिलना चाहिए। वे  यहाँ तक बोल गए  कि देश में पहले से करोड़ों गरीब  हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है। मुख्य न्यायाधीश द्वारा  घुसपैठियों को शरणार्थी मानकर भारत के नागरिकों जैसी सुविधाओं देने पर ऐतराज जताये जाने के बाद  सवाल उठ खड़ा होता है कि उनके प्रति मानवीय दृष्टिकोण रखने की वकालत करने वाले क्या अपना नजरिया बदलेंगे या देश पर बोझ बने घुसपैठियों की आवभगत करते रहेंगे जो  आंतरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा बने हुए हैं। श्री सूर्यकांत के इस सवाल के निहितार्थ को समझा जाना चाहिए कि क्या हम उनका लाल कालीन बिछाकर स्वागत करें ? देश में इन दिनों मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण चल रहा है। इसके जरिये उन मतदाताओं के नाम तो अलग किये ही जा रहे हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है या जिनके नाम एक से अधिक स्थानों की सूचियों में दर्ज हैं। लेकिन इससे भी बढ़कर यह अभियान उन लोगों को मताधिकार से वंचित करने पर केंद्रित है जिन्होंने व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार का लाभ उठाकर आधार कार्ड जैसा दस्तावेज बनवाकर   मुफ्त राशन, चिकित्सा , रसोई गैस और आवास जैसी शासकीय  योजनाओं का लाभ उठाने की पात्रता तो हासिल कर ही ली किंतु उससे भी बढ़कर मतदाता सूची में नाम दर्ज करवाकर निर्वाचन प्रक्रिया में भी हिस्सेदार बन बैठे। देश में इस अभियान का विरोध करने वाले राजनीतिक दल और उनके नेतागण आरोप लगा रहे हैं कि  पुनरीक्षण का असली उद्देश्य मुस्लिम मतदाताओं के नाम काटना है । लेकिन जिस बिहार से इस कार्य की शुरुआत हुई, वहाँ विधानसभा चुनाव के पहले 40 लाख से अधिक नाम काटे गए किंतु इक्का - दुक्का मुसलमान ने ही शिकायत की होगी । जाहिर है अवैध रूप से बसे विदेशी भी उन लोगों में शामिल होंगे जिनका नाम अलग हुआ। फिलहाल मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण पर सबसे ज्यादा विवाद प. बंगाल में है । पहले वामपंथी और फिर ममता बैनर्जी के शासनकाल में यहाँ  मुस्लिम आबादी जिस तेजी से बढ़ी उसका कारण घुसपैठिये ही हैं। प्रसिद्ध टीवी पत्रकार राजीव रंजन ने हालिया दौरे के बाद अपने साक्षात्कार में खुलकर कहा कि प. बंगाल में मुस्लिम आबादी 40 फीसदी हो चुकी है जो  राजनीतिक संतुलन को अपनी मर्जी से बनाने -  बिगाड़ने की ताकत रखती है। उन्होंने कुछ जिलों का जिक्र करते हुए बताया कि पूरे रास्ते भर  जितनी भी दुकानें नजर आईं वे सभी मुस्लिमों की थीं । उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बांग्लादेश की सीमा से सटे जिलों में तो मुस्लिम आबादी शत प्रतिशत  हो गई है।  धार्मिक ध्रुवीकरण का उदाहरण देते हुए श्री रंजन ने स्पष्ट किया कि  राज्य की बहरामपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी 1999 से जीत रहे थे। लेकिन 2024 के चुनाव में ममता बैनर्जी ने गुजरात के क्रिकेटर यूसुफ  पठान को लड़वाकर उन्हें  हरवा दिया। मुस्लिम बहुल सीट के मतदाताओं ने अधीर रंजन के साथ 25 साल का रिश्ता एक झटके में महज इसलिये तोड़ दिया क्योंकि उनके मुकाबले  मुस्लिम प्रत्याशी खड़ा था जिसका बहरामपुर तो क्या प. बंगाल तक से कोई जुड़ाव नहींं है। वस्तुतः मुख्य न्यायाधीश की दो टूक टिप्पणी ने नागरिकता रजिस्टर की जरूरत को भी नये सिरे से प्रासंगिक बना दिया है। देश में जितनी कल्याणकारी योजनाएं केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा संचालित हैं उनका लाभ बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक नागरिक को मिले ये न्यायोचित है किंतु घुसपैठिये उसका लाभ उठाकर हमारा शोषण करें ये  किसी भी कोण से स्वीकार्य नहीं हो सकता। मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकांत बधाई के पात्र हैं जिन्होंने अवैध  घुसपैठियों को शरणार्थी मानकर देश के नागरिकों के समकक्ष  सुविधाएं देने जैसी देश विरोधी मानसिकता पर कड़ा प्रहार किया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 December 2025

कांग्रेस हायकमान से न पार्टी संभल रही है और न ही गठबंधन

कर्नाटक में सिद्धारमैया मुख्यमंत्री रहेंगे या उनकी जगह डी. के. शिवकुमार को कांग्रेस गद्दीनशीन करेगी , ये सवाल बीते कुछ दिनों से राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। इसके पीछे वजह वह समझौता है जिसके अंतर्गत ढाई साल बाद सिद्धारमैया को हटाकर मुख्यमंत्री पद उपमुख्यमंत्री शिवकुमार को मिलना था। जैसे ही उक्त अवधि पूरी हुई शिवकुमार के समर्थक विधायकों ने दिल्ली में डेरा डालकर  हायकमान पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। उल्लेखनीय है शिवकुमार कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं जिनका कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद भी कांग्रेस का नेतृत्व उन्हें हटाकर नया अध्यक्ष नियुक्त करने का साहस नहीं बटोर पा रहा। सर्वविदित है कि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत दिलाने में उनका काफी योगदान था। वे देश के सबसे धनी राजनेताओं में गिने जाते हैं।  भले ही इन दिनों उनकी और सिद्धारमैया की एक साथ नाश्ता करने की तस्वीरें समाचार माध्यमों में प्रकाशित हो रही हों और शिवकुमार उनके साथ मतभेदों का खंडन करते रहे हों किंतु दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे खुद भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे किंतु सिद्धारमैया बाजी मार ले गए। शिवकुमार भी मनमसोस कर रह गए। तब ढाई साल बाद उनकी ताजपोशी का वायदा कर उनको मना लिया गया। लेकिन वे मौका निकालकर मुख्यमंत्री को  परेशान करते रहे। हाल ही में उन्होंने रास्वसंघ की प्रार्थना नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे पढ़कर सबको चकित कर दिया क्योंकि उसी समय संघ के शताब्दी वर्ष आयोजन चल रहे थे। राजनीतिक पंडितों ने इसे शिवकुमार की बगावत का संकेत मानकर उनकी और भाजपा की नजदीकी का अंदाज लगाना शुरू कर दिया। हालांकि अब तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और शिवकुमार ने राहुल गाँधी या श्री खरगे के सामने   मुख्यमंत्री पद का दावा भी खुलकर नहीं रखा ।  लेकिन वे बिना कुछ कहे  अपने पांसे फेंकते जा रहे हैं। कर्नाटक की राजनीति क्या मोड़ लेगी ये कहना फिलहाल मुश्किल है क्योंकि सिद्धारमैया भी राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं जिन्होंने खरगे जी और शिवकुमार जैसे दिग्गजों को पीछे धकेलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर ली थी । ऐसा लगता है कांग्रेस हायकमान संसद के शीतकालीन सत्र के बाद ही इस विवाद को सुलझाने का प्रयास करेगी। अभी तक भाजपा ने शिवकुमार को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं। राज्य में भाजपा का नेतृत्व उनके साथ सरकार बनाने को लेकर असमंजस में हैं क्योंकि पार्टी उनको भ्रष्टाचार के अनेक मामलों में घेरती रही है। स्मरणीय है मनी लाउंड्रिंग के आरोप में उन्हें जेल में भी रहना पड़ा था। लेकिन भाजपा हायकमान की मौजूदा नीति किसी भी तरह कांग्रेस को कमजोर करने की है। ऐसे में  कांग्रेस से कर्नाटक की सत्ता छीन लेने का कोई मौका वह नहीं गँवाना चाहेगी। वैसे भी देवगौड़ा परिवार की जनता दल (एस) के साथ भाजपा का गठजोड़ है जो अनेक आरोपों में घिरा है। कर्नाटक के अलावा भाजपा ने झारखंड पर भी निगाहें गड़ा दी हैं। मुख्यमंत्री  हेमंत सोरेन की कुछ भाजपा नेताओं से हुई मुलाकात के बाद इस बात की अटकलें तेज हो गई हैं कि हेमंत इंडिया गठबंधन को अलविदा कहकर एनडीए की गोद में बैठने का मन बना चुके हैं जिसका बड़ा कारण चुनावी वायदे पूरे करने में आ रही धन की कमी है। बिहार विधानसभा चुनाव में हेमंत कुछ आदिवासी सीटें झामुमो के लिए  मांग रहे थे किंतु राहुल गाँधी और तेजस्वी  ने उन्हें कोई भाव नहीं दिया जिसके कारण वे नाराज हैं।  भाजपा हायकमान मौके की तलाश कर ही रहा था। हेमंत के पिता शिबू सोरेन की मृत्यु पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस प्रकार से हेमंत के पास पहुँचकर सांत्वना प्रदान की उसके बाद से ही झारखंड की सियासत में बदलाव की आहट सुनाई देने लगी थी। बिहार चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन में शामिल दलों को ये लगने लगा है कि फिलहाल कांग्रेस का कोई भविष्य नहीं है। इसलिए गठबंधन के प्रति उनका मोह भंग होने लगा है। यदि भाजपा ने हेमंत को तोड़ लिया  तब विपक्ष का एक और किला ढह जाएगा जिसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव अन्य दलों पर पड़ना तय है। उमर अब्दुल्ला के हालिया बयान भी इंडिया गठबंधन से अलगाव का संकेत दे रहे हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस  हायकमान से न तो पार्टी संभल रही है और न ही गठबंधन। ऐसे में आने वाले कुछ महीने कांग्रेस के लिए काफी संकट भरे होंगे। बड़ी बात नहीं उसके भीतर ही कोई बड़ा विवाद खड़ा हो जाए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 2 December 2025

संसद में हंगामा कर अपना ही नुकसान कर रहा विपक्ष


सद का शीतकालीन सत्र शुरू होने के पहले लोकसभाध्यक्ष द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में सदन सुचारु रूप से चलाने के लिए आम सहमति बनी थी। प्रत्येक सत्र के पूर्व आयोजित होने वाली सर्वदलीय बैठक में ऐसा ही दिखाई देता है। और फिर  सदन के भीतर वही सब होता है जो मौजूदा सत्र में लगातार दूसरे दिन देखने मिला। विपक्ष मतदाता सूचियों के  एस.आई.आर (विशेष गहन पुनरीक्षण) पर तुरंत चर्चा की मांग पर अड़ा है जबकि सरकार का कहना है वह चर्चा हेतु तैयार है किंतु कब होगी इसके लिए दबाव स्वीकार नहीं है। हंगामे के कारण सदन स्थगित हो रहा है। वैसे भी ये सत्र काफी छोटा होता है। ऐसे में बेहतर तो यही होगा कि विपक्ष  उपलब्ध समय का सदुपयोग करते हुए सरकार को घेरने की रणनीति बनाये। लेकिन विपक्ष की अगुआई कर रही कांग्रेस पुराने ढर्रे पर चलने आमादा है। वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा लगाकर वह जिस मुद्दे को गर्माना चाह रही है उसकी हवा बिहार में निकल गई। राहुल गाँधी ने पूरे राज्य में यात्रा निकालकर एस. आई. आर के विरोध में जनमत बनाने का भरपूर प्रयास किया किंतु चुनाव में सबसे बुरी हालत कांग्रेस की ही हुई। वेसोचते थे कि बिहार में 40 लाख से ज्यादा नाम मतदाता सूचियों से कटने के बाद लाखों लोग सड़कों पर उतर आयेंगे । लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। मतदान निर्विघ्न संपन्न होने के बाद सरकार बनने तक की समूची प्रक्रिया सुचारु रूप से संपन्न हो गई। जिन राज्यों में एस. आई. आर चल रहा है वहाँ  भी किसी बड़े विरोध की खबर नहीं आ रही। यहाँ तक कि प. बंगाल में ममता बैनर्जी के पुरजोर ऐतराज के बावजूद पुनरीक्षण जारी है।  मोदी विरोधी पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि वोट चोरी का मुद्दा कोई असर नहीं छोड़ सका क्योंकि इससे आम जनता को कोई नुकसान नहीं हो रहा। सर्वोच्च न्यायालय तक ने इसे रोकने से इंकार करते हुए चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करना जरूरी नहीं समझा। साथ ही मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को जरूरी बता दिया। बेहतर होता विपक्षी नेता अपने कार्यकर्ताओं को इस कार्य में सहयोग करने का  निर्देश देते जिससे कि बाद में शिकायत की गुंजाइश न रहे। लेकिन ऐसा करने के बजाय देशव्यापी विरोध करने का फैसला किया गया जो नाकामयाब ही रहा। ये देखते हुए विपक्ष संसद में ऐसे मुद्दे उठाये जिनका जनता से सीधा सरोकार हो।  जनता से जुड़े ऐसे तमाम विषय हैं जिन पर विपक्ष की सक्रियता अपेक्षित है।  सरकार की जो विफलताएं हैं उन्हें उजागर करना विपक्ष का दायित्व है। संसद का सत्र इसके लिए सबसे सही अवसर होता है। लेकिन बीते अनेक वर्षों से देखने मिल रहा है कि विपक्ष किसी विशेष मुद्दे को पकड़कर पूरे सत्र में हंगामा करता रहता है। दूसरी ओर सरकार अपने सभी विधायी कार्य संसद से बिना बहस के मंजूर करवा लेती है। राहुल सहित अन्य विपक्षी नेताओं को ये बात समझनी चाहिए कि संसद  में हंगामा करने के कारण वे जन समर्थन खो रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद 6 राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में से चार पर एनडीए की बड़ी जीत हुई। हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में कांग्रेस के साथ ही इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दलों को मतदाताओं ने जिस बुरी तरह ठुकराया वह इस बात का प्रमाण है कि वे जनता का भरोसा जीतने में कामयाब नहीं हो पा रहे।  लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष जैसे जिम्मेदार ओहदे पर आने के बाद श्री गाँधी से जिस गंभीरता और दायित्वबोध की अपेक्षा थी वे उसे पूरा नहीं कर पा रहे। इसीलिये चुनावी हार का ठीकरा उनके सिर पर फूटना स्वाभविक भी है और सही भी। बिहार चुनाव में हुई फजीहत के बाद कांग्रेस ने जिस सतही ढंग से समीक्षा की उसके कारण उनकी नेतृत्व क्षमता पर पार्टी के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं। कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने को लेकर चल रही खींचतान को रोकने में पार्टी हायकमान जिस तरह असहाय नजर आ रहा है उसके लिए भी श्री गाँधी की लापरवाही  जिम्मेदार है। वे खुद तो कोई निर्णय करते नहीं और दूसरा कोई करे ये भी उन्हें नागवार गुजरता है। इन्हीं वजहों से वे कांग्रेस पर बोझ बन चुके हैं। वोट चोरी के मुद्दे पर अभी तक उन्होंने जितने भी खुलासे किये उन्हें भले ही किसी बम का नाम दिया गया किंतु वे सब फुस्स निकले। लोकतंत्र में जनता की नब्ज और मिजाज को जानने वाला दल और नेता ही सफल होता है। भाजपा और नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव में लगे झटके को गंभीरता से लेते हुए अपनी कमियाँ दूर कर विधानसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया। वहीं राहुल और उनके सलाहकार 99 सीटों के फेर में फंसकर रह गए जिसका नतीजा कांग्रेस को  लगातार पराजयों के रूप में देखने मिला। उम्मीद थी कि बिहार चुनाव में हुई शर्मनाक हार से सबक लेते हुए श्री गाँधी अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करेंगे किंतु संसद के मौजूदा सत्र की शुरुआत में ही उनका रवैया देखकर लग गया कि उन्होंने गलतियों को सुधारने की बजाय दोहराते जाने की कसम खा ली है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी