Monday, 29 December 2025

दिग्विजय के बयानों से कांग्रेस की अंतर्कलह उजागर


म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में क्रमशः भोपाल और राजगढ़ से बुरी तरह हार चुके हैं। फिलहाल वे राज्यसभा में हैं जिसका कार्यकाल 2026 में खत्म होने जा रहा है। 2020 के राज्यसभा चुनाव के पहले उनके और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच हुई खींचतान के कारण कांग्रेस विधायक दल में फूट पड़ने से उनके गुट के 22 विधायक बगावत कर भाजपा में आ गए जिससे कमलनाथ सरकार गिर गई। यद्यपि सिंधिया परिवार और दिग्विजय के बीच अहं की लड़ाई पुरानी है। लेकिन 2018 में जब कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर मिला तब  ज्योतिरादित्य को उम्मीद थी कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जायेगा। राहुल गाँधी से नजदीकी  उनके आत्मविश्वास का आधार था। लेकिन दिग्विजय ने कमलनाथ का साथ देकर उनकी ताजपोशी करवा दी। उसके बाद जब 2019 के लोकसभा चुनाव में श्री सिंधिया अपनी परंपरागत सीट गुना से हार गए। तब उन्होंने राज्यसभा के लिए हाथ - पांव मारना शुरू किया। लेकिन यहाँ भी श्री सिंह उनके रास्ते में रोड़ा अटकाने लगे तो उन्होंने अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए भाजपा का दामन पकड़ा और केन्द्र सरकार में मंत्री बन गए। 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जबरदस्त सफलता हासिल की।  2024 के लोकसभा चुनाव में तो म. प्र की सभी सीटें कांग्रेस हार गई। यहाँ तक कि कमलनाथ अपने बेटे नकुलनाथ तक को नहीं जिता पाए। इसके बाद कांग्रेस हाईकमान की नींद टूटी जिसका प्रमाण कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाये जाने से मिला। नेता प्रतिपक्ष सहित दोनों पदों पर की गई नियुक्तियों में श्री नाथ और श्री सिंह की पसंद का ध्यान नहीं रखे जाने से ये संकेत गया कि अब प्रदेश  कांग्रेस को दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के  वर्चस्व से आजाद कराने की शुरुआत हो चुकी है। श्री नाथ ने  संगठन में राष्ट्रीय स्तर का कोई पद लेना चाहा किंतु अब तक उनकी दाल नहीं गली। दूसरी तरफ दिग्विजय भी गाँधी परिवार के चहेतों की सूची से धीरे - धीरे बाहर होने लगे।स्मरणीय  है श्री नाथ और उनके पुत्र नकुल के भाजपा में शामिल होने की खबरें कई बार उड़ने के बाद शांत हो गईं। इधर दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह एक बार फिर कांग्रेस से बाहर आकर उसके नेतृत्व पर निशाना साध रहे हैं। जिस पर दिग्विजय कुछ नहीं कहते। इसी तरह उनके विधायक पुत्र जयवर्धन हिन्दू राष्ट्र के समर्थक बागेश्वर धाम के मुखिया धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के आयोजनों में शिरकत करने लगे जो बिना पिता की सहमति के संभव नहीं था। राजनीति के जानकार इससे चौंके जरूर  किंतु दिग्विजय सिंह के भाजपा विरोधी बयानों के कारण किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका। लेकिन पिछले कुछ दिनों में दो बातें ऐसी हुईं जिनके कारण कांग्रेस के भीतर खलबली मची। पहली ये कि एक टीवी चैनल पर दिग्विजय ने रा.स्व.संघ को देश विरोधी मानने से इंकार करते हुए कहा कि अपनी स्थापना से लेकर शताब्दी पूरी करने तक उसने कभी भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की प्रतिबद्धता नहीं छोड़ी। उसके प्रचारकों के मन में भी हिन्दू राष्ट्र की भावना कूट - कूटकर भरी है। इसके बाद गत सप्ताह उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पुराना फोटो जारी किया जिसमें कुर्सी पर बैठे लालकृष्ण आडवाणी के सामने जमीन पर नरेंद्र मोदी बैठे दिखाई दे रहे हैं। इसके साथ टिप्पणी की कि  जिस तरह रा.स्व.संघ के जमीनी स्तर के स्वयंसेवक और जनसंघ के कार्यकर्ता नेताओं के चरणों में बैठकर राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री बनते हैं, यही इस संगठन की ताकत है , जय सिया राम। उनकी उक्त टिप्पणी ने हलचल मचा दी। कांग्रेस में इसे लेकर तरह - तरह के कयास लगने लगे। कुछ ने इसे दबाव बनाने की कोशिश कहा क्योंकि अगले साल श्री सिंह की राज्यसभा सदस्यता समाप्त होने वाली है और म.प्र में कांग्रेस केवल एक ही सीट जीत सकती है। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक और स्थापना दिवस के पहले आई उक्त पोस्ट ने कांग्रेस हाईकमान को  परेशान कर दिया क्योंकि भाजपा के बहाने उन्होंने अपनी पार्टी को ही निशाना बनाया। पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे शशि थरूर और सलमान खुर्शीद जैसे नेता जहाँ उस पोस्ट के पक्ष में दिखे वहीं राहुल सहित अनेक नेताओं को उनकी हरकत नागवार गुजरी। जिसके बाद दिग्विजय ने लीपापोती वाला बयान देकर खुद को बचाने की कोशिश की किंतु जितना नुकसान होना था वह हो चुका। म.प्र में उनके कारण ही कांग्रेस 22 साल पहले सत्ता से ऐसी हटी कि अब तो उसकी वापसी असंभव लगने लगी। अपने हिन्दू विरोधी बयानों से वे समय - समय पर कांग्रेस की जड़ों में मठा डालने का काम करते रहे हैं। उनके ताजा बयान पार्टी के भीतर चल रही उथलपुथल को उजागर करने वाले हैं। ऐसा लगता है गाँधी परिवार के प्रति उनकी निष्ठा भी खत्म हो रही है। बड़ी बात नहीं जल्द ही वे भी असंतुष्टों के साथ खड़े नजर आयें और म.प्र की तरह से ही राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस का बंटाधार करने जुट जाएं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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