घूसखोरी में सरकारी अमले का पकड़ा जाना आश्चर्यचकित नहीं करता। आये दिन इस आशय के समाचार आया करते हैं। गत दिवस जबलपुर में जीएसटी विभाग के एक उच्च अधिकारी सहित छोटे कर्मचारी को सीबीआई ने लाखों की घूस लेते दबोच लिया। एक होटल व्यवसायी की शिकायत पर उक्त कार्रवाई हुई। जो जानकारी आई उसके अनुसार जीएसटी विभाग के कतिपय लोगों ने होटल वाले पर जीएसटी चोरी का आरोप लगाकर भारी पैनाल्टी लगाने का दबाव बनाया और फिर घूस लेकर मामला रफा - दफा करने का आश्वासन दिया। होटल मालिक ने बजाय उनकी मांग पूरी करने के सीबीआई से संपर्क किया जिसने पूरी तैयारी कर घूस लेने वालों पर फंदा कस दिया। ये कोई अनोखा प्रकरण नहीं है क्योंकि प्रदेश और देश में इस तरह के सैकड़ों मामले रोजाना सामने आते हैं। घूसखोरी और अन्य तरह का भ्रष्टाचार किसी एक या कुछ विभागों तक सीमित रहने के बजाय लगभग प्रत्येक सरकारी महकमे में फैल चुका है। केन्द्र और राज्य सरकार के अलावा स्थानीय निकाय भी इस बुराई से अछूते नहीं हैं। लिपिक जैसे साधारण पद पर कार्यरत कर्मचारियों के भी घूस लेते पकडे़ जाने से इस बात का अंदाज लगाया जा सकता है कि सरकारी अमला कितना निडर हो चुका है। पहले ये अवधारणा थी कि महिला कर्मचारी और अधिकारी भ्रष्टाचार से दूर रहती हैं। लेकिन अब ये भ्रम भी टूट चुका है। हाल ही में म.प्र के सिवनी जिले में एक वाहन में हवाला की जो मोटी रकम पुलिस ने जप्त की उसकी बंदरबांट में वहाँ पदस्थ महिला पुलिस अधिकारी की मुख्य भूमिका उजागर होने से ये बात प्रमाणित हो गई कि महिलाओं के मन में भी भ्रष्टाचार का आकर्षण उत्पन्न हो चुका है। किसी सरकारी मुलाजिम पर जाँच एजेंसी का शिकंजा कसने पर उसके द्वारा भ्रष्टाचार से अर्जित की गई अकूत दौलत का पर्दाफ़ाश होने पर हर कोई दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर हो जाता है। 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की दौड़ में कूदे तब उन्होंने आश्वस्त किया था कि न खाऊंगा , न खाने दूंगा। लोगों ने उनकी बात पर विश्वास करते हुए देश की बागडोर उन्हें सौंप दी। बीते 11 वर्षों में उन्होंने न खाऊंगा के आश्वासन को को तो सही साबित किया। निजी तौर पर भ्रष्टाचार करने के आरोप से वे पूरी तरह मुक्त हैं। उनकी नीतियों और विचारधारा की घोर आलोचना करने वाले भी प्रधानमंत्री को भ्रष्ट साबित करने का साहस नहीं जुटा पाते किंतु अपने वायदे के दूसरे हिस्से को पूरा करने में वे सफल हुए इसका दावा उनके प्रबल समर्थक भी नहीं कर सकते । हालांकि उनके सत्ता में आने के बाद केन्द्र सरकार के अनेक फैसलों ने व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया किंतु बेईमानों की जमात ने नये रास्ते तलाश लिए। सवाल ये है कि क्या हमारे देश से भ्रष्टाचार कभी मिटाया जा सकेगा या हम उसके साथ ही जीने को मजबूरी बने रहेंगे? हालांकि ये भी सत्य है कि घूस लेना जितना बड़ा अपराध है उतना ही घूस देना भी। ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि अवैध कार्यों पर पर्दा डालने वाले सरकारी अमले की जेब गर्म करते हैं। लेकिन विडंबना ये है कि अपने देश में सही काम करने वाले भी भ्रष्टाचार रूपी आतंक से सुरक्षित रहेंगे इसकी गारंटी प्रधानमंत्री तक नहीं दे सकते। यही कारण है कि आम नागरिक के मन में व्यवस्था के प्रति विश्वास निरंतर घटता जा रहा है। जिस न्यायपालिका से ये उम्मीद की जाती रही कि वह भ्रष्ट व्यवस्था की जड़ों पर प्रहार करने का साहस दिखाएगी वह भी जन आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकी। और अब तो उसमें भी भ्रष्टाचार नामक वायरस घुस चुका है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार हमारे रक्त में समा चुका है और इसीलिए हम उसके साथ जीने के लिए मजबूर हैं। बीते कुछ समय से दुनिया के अनेक देशों में भ्रष्टाचार के विरोध में हुए हुए जनांदोलनों ने सत्ता बदल दी। लेकिन हमारे देश में भ्रष्टाचार ने चूंकि शिष्टाचार का रूप ले लिया लिहाजा वह हमारी ज़िंदगी से स्थायी रूप से जुड़ चुका है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि राजनीति का संरक्षण मिलने से ये बुराई गाजर घास की तरह फैलती गई। विचारणीय प्रश्न ये है कि क्या भ्रष्टाचार को नियति मानकर स्वीकार कर लिया जाए या उसके विरुद्ध निर्णायक लड़ाई शुरू की जाए। लेकिन समस्या यही है कि इस लड़ाई की अगुआई कौन करेगा क्योंकि नेताओं और नौकरशाहों के अघोषित गठबंधन ने व्यवस्था ही नहीं लोगों की मानसिकता को भी भ्रष्ट कर दिया है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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