बांग्लादेश से आ रही खबरें चिंता का विषय हैं। गत वर्ष शेख हसीना अपने तख्ता पलट के बाद भारत आ गईं जिन्हें पूरी सुरक्षा के बीच यहाँ रहने की सुविधा प्रदान कर हमने बांग्लादेश से दुश्मनी और गहरी कर ली। वहाँ की सरकार उनकी वापसी हेतु औपचारिक आवेदन कर चुकी है जिसे भारत सरकार ने स्वीकृति नहीं दी। इसका कारण ये है कि वहाँ की अदालत उन्हें विभिन्न आरोपों में मृत्यदंड दे चुकी है। वर्तमान परिदृश्य पर निगाह घुमाने पर महसूस होता है कि भविष्य में वहाँ संभावित सत्ता परिवर्तन में हसीना की भूमिका भारत के लिए लाभदायक होगी। लेकिन हालात देखते हुए उनकी वापसी लंबे समय तक तक तो मुमकिन नहीं दिखती। नये चुनाव होने के बाद वहाँ कामचलाऊ की जगह चुनी हुई सरकार सत्ता में आयेगी किंतु अव्वल तो चुनाव होना अनिश्चित है। और हुए भी तब उनकी निष्पक्षता पर संदेह बना रहेगा क्योंकि सत्ता में बैठे लोग आसानी से अलग नहीं होना चाहेंगे। सबसे बड़ी बात ये है कि हसीना सरकार के विरुद्ध सड़कों पर आंदोलन करने वाले संगठनों में भी फूट पड़ गई है। लेकिन जिस एक मुद्दे पर बांग्लादेश के मुस्लिम समुदाय में आम सहमति है वह है भारत विरोध , जिसका दंड वहाँ रहने वाले हिंदुओं को भुगतना पड़ रहा है। हसीना के बांग्लादेश से भागने के बाद बहुसंख्यक मुसलमानों ने 1947 की दर्दनाक स्मृतियों को सजीव करते हुए हिंदुओं पर अत्याचार की जो श्रंखला प्रारंभ की वह सरकारी संरक्षण में बेरोकटोक जारी है। हाल ही में हसीना के तख्तापलट में अग्रणी भारत विरोधी एक नेता की हत्या के बाद हिंदुओं पर हमले और बढ़ गए। इस सबके बीच पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी नेताओं की बांग्लादेश में आवाजाही बढ़ी , वहीं अमेरिका को झटका देते हुए बांग्लादेश ने चीन को हवाई अड्डे और रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण बंदरगाह सौंपने का फैसला कर डाला जिससे भारत के लिए खतरा बढ़ना तय है। दरअसल सत्तापलट के बाद ही वहाँ चीन ने अपनी घुसपैठ शुरू कर दी थी। यद्यपि हसीना के विरुद्ध हुए छात्र आंदोलन के समय मो.युनुस अमेरिका में निर्वासित जीवन बिता रहे थे और आम अवधारणा ये थी कि बांग्लादेश में हुआ सत्ता परिवर्तन अमेरिकी रणनीति का हिस्सा था जिसके तहत वह चीन के निकट अपना अड्डा बनाना चाहता था। यही सोचकर उसने युनुस को अंतरिम सरकार के मुखिया बनाने की जमीन तैयार की। स्मरणीय है उन्हें नोबल पुरस्कार दिलाने के पीछे भी अमेरिका की दूरगामी सोच रही। ये भी सच है कि बाइडेन के राष्ट्रपति रहते अमेरिका में वामपंथी विचारधारा को काफी प्रोत्साहन मिला। लेकिन ढाका आने के बाद युनुस ने अमेरिका को धोखे में रखते हुए चीन के लिए लाल कालीन बिछा दिया और डोनाल्ड ट्रम्प देखते रह गए। चूंकि चीन और बांग्लादेश के बीच भौगोलिक दूरी बेहद कम है लिहाजा वहाँ की भारत विरोधी ताकतें बजाय अमेरिका के चीन से याराना कायम करने को प्राथमिकता दे रही हैं। बीते कुछ दिनों से बांग्लादेश में हिंसा का जो उफान आया उसका निशाना भारत और वहाँ का हिन्दू समुदाय है । युनुस सरकार अल्पसंख्यकों के जान - माल की सुरक्षा करने की बजाय उपद्रवियों को पूरी छूट दे रही है। हिंदुओं की हत्या, लड़कियों का अपहरण, मंदिरों में तोडफोड़, आम हो चला है। आश्चर्यजनक बात ये है कि फिलीस्तीनियों के पक्ष में झोला टांगने वाले भारत के कतिपय नेता बांग्लादेश के हिंदुओं के नरसंहार पर एक शब्द बोलने तैयार नहीं हैं। प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को इस बात की फिक्र तो है कि मतदाता सूचियों से बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों का नाम न कट जाए किंतु बांग्लादेश में रह रहे हिंदुओं के दमन के विरुद्ध वे कुछ भी बोलने से इसलिए डरती हैं कि मुस्लिम वोट बैंक हाथ से न निकल जाए। बांग्लादेश में जो स्थितियाँ बन गई हैं वे भारत के लिए कई दृष्टियों से नुकसानदेह है। वहाँ की सरकार द्वारा प्रायोजित उपद्रव में हसीना की वापसी के लिए भारत पर दबाव बनाने जिस प्रकार हिंदुओं पर अत्याचार हो रहा है उसके विरुद्ध जवाबी कार्रवाई का समय आ चुका है। हालांकि भारत ने आर्थिक नाकेबंदी करते हुए बांग्लादेश को घेरने का जो दाँव चला उसका असर हुआ था किंतु चीन के साथ आ जाने के बाद युनुस सरकार का हौसला बढ़ गया। ताजा उपद्रव उसी का प्रमाण है। वैसे भारत में होने वाली घुसपैठ में कमी आई है लेकिन वहाँ रह रहे हिंदुओं की सुरक्षा भी हमारा नैतिक दायित्व है क्योंकि उनसे हमदर्दी रखने वाला और कोई देश नहीं है। सही बात ये है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान मिलकर भारत को घेरने में लगे हैं । दोनों देशों में हिंदुओं के साथ एक जैसा अमानवीय व्यवहार होने से ज़ाहिर है कि कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतें तेजी से सक्रिय हैं जिन्हें चीन खुलकर साथ दे रहा है। हालांकि बांग्लादेश को सबक सिखाने के लिए सैन्य कार्रवाई करना तो जल्दबाजी होगी किंतु यही स्थिति रही तब भारत को इस एहसान फरामोश पड़ोसी को ऐसा दंड देने में संकोच नहीं करना चाहिए जिससे वह दोबारा सिर उठाने की हिम्मत न करे।
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