म.प्र सरकार के एक आई.ए.एस अधिकारी संतोष वर्मा बीते कुछ दिनों से विवादित बातें करते - करते खुद विवादग्रस्त हो गए हैं। अजाक्स नामक कर्मचारी संगठन के सम्मेलन में ब्राह्मण की बेटी उनके बेटे को दिये जाने तक आरक्षण जारी रखने जैसा बयान देकर वे उच्च जातियों के निशाने पर आये थे। शिकायतें होने पर उनसे जवाब मांगा गया जिसे शासन ने असंतोषजनक मानते हुए उन्हें पद से हटाने के साथ ही उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश भी केन्द्र सरकार से कर दी। श्री वर्मा पर ये आरोप भी है कि उन्होंने गलत दस्तावेजों के आधार पर पदोन्नति हासिल की थी। अतीत में वे जेल भी जा चुके हैं। गत दिवस उनका एक और बयान आ गया जिसमें उन्होंने उच्च न्यायालय पर आरोप लगा दिया कि उसके कारण आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी सिविल जज नहीं बन पा रहे। इस पर विधि जगत की अनेक हस्तियों ने उनकी तीखी आलोचना की है। ऐसा लगता है उन्हें अपनी नौकरी पर मंडराते खतरे का आभास हो चुका था। संभवतः इसीलिये वे उल्टे - सीधे बयान देकर दलित वर्ग के बीच ये भावना फैलाना चाहते हैं कि उनके हितों की खातिर उन्होंने नौकरी कुर्बान कर दी। जिस तरह के आरोप उन पर लगे हैं उनकी गंभीरता को देखते हुए कह सकते हैं कि बर्खास्तगी के बाद भी उनकी मुसीबतें कम नहीं होने वालीं क्योंकि फर्जी दस्तावेजों के जरिये पदोन्नति प्राप्त करने के अपराध में उन पर आपराधिक प्रकरण भी दर्ज हो सकता है। उनके अतीत और हालिया बयानों से ऐसा लगता है वे दलित नेता के तौर पर स्थापित होकर अपने अपराधों पर पर्दा डालना चाहते हैं। बीते कुछ दशकों से ये देखने मिला है कि दलित वर्ग के अनेक प्रशासकीय अधिकारी नौकरी छोड़ राजनीति में आकर सांसद - विधायक ही नहीं बल्कि मंत्री तक बन बैठे। अविभाजित म.प्र में स्व.अजीत जोगी नामक आई.ए.एस अधिकारी इस्तीफा देकर कांग्रेस में आये और कालांतर में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बन गए। श्री वर्मा का भविष्य क्या होगा ये अभी तक अनिश्चित है। अपनी बर्खास्तगी के विरुद्ध वे अदालत में जाने के साथ ही दलित कार्ड खेले बिना नहीं रहेंगे। हालांकि ये अभी तक स्पष्ट नहीं है कि उनकी भावी रणनीति क्या होगी किन्तु उनकी हरकतों से दलित वर्ग का कोई लाभ होगा ये सोचना पूरी तरह गलत है। सही बात ये है कि उन जैसे दूषित मानसिकता के लोग ही अपने समुदाय के उत्थान में बाधक बनते हैं। हाल ही में सेवा निवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई तो उच्च पदों पर बैठे आरक्षित लोगों की अगली पीढ़ी को आरक्षण का लाभ नहीं मिलने का सुझाव अदालत और उसके बाहर कह चुके हैं जबकि वे स्वयं उसी वर्ग से हैं। वहीं दूसरी तरफ श्री वर्मा हैं जो प्रशासनिक अधिकारी जैसे जिम्मेदार ओहदे पर पहुंचकर भी जहर बुझी बातें कहकर खुद तो विवादित होते ही हैं पूरे दलित वर्ग को मुख्यधारा में आने से रोकने का अपराध भी करते हैं। उनके विरुद्ध जिस तरह की उग्र प्रतिक्रियाएं आईं वे जातीय संघर्ष का कारण बन सकती हैं। बेहतर तो यही होता कि उनके आपत्तिजनक और भड़काऊ बयानों का विरोध दलित वर्ग के बीच से ही हो क्योंकि ऐसे लोग अपने अपराध छिपाने के लिए जातीय समुदाय को ढाल बनाने की चालाकी दिखाते हैं। प्रदेश सरकार ने उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश केन्द्र सरकार को भेजकर सही कदम उठाया है। अन्यथा उन जैसी स्तरहीन सोच रखने वालों का हौसला बुलंद होगा। समय आ गया है जब आरक्षण का लाभ ले रहे वर्ग को बजाय सरकार के रहमो - करम पर निर्भर रहने के अपनी प्रतिभा विकास पर ध्यान देना चाहिए। मोदी सरकार ने कौशल विकास की जो योजनाएं शुरू कीं उनका लाभ लेकर दलित वर्ग को भी स्वरोजगार के प्रति जागरूक होना चाहिए क्योंकि भविष्य में सरकारी नौकरियां कम होना तय है। आरक्षण निश्चित तौर पर जरूरी था किंतु श्री वर्मा सदृश जो लोग उसका लाभ उठाकर उच्च पदों पर बैठ जाते हैं वे बजाय पूरे समुदाय के अपने परिवार को ही आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं। इसे देखते हुए ही श्री गवई ने क्रीमी लेयर जैसा मुद्दा उठाया। बहरहाल संदर्भित प्रकरण में म.प्र सरकार ने श्री वर्मा के विरुद्ध जो भी कारवाई की वह न्यायोचित है क्योंकि उन्होंने जो कर्म किये उसका फल तो उनको भुगतना ही पड़ेगा।
-रवीन्द्र वाजपेयी
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