म.प्र के बालाघाट में 12 नक्सलियों का आत्म समर्पण शुभ संकेत है। हाल ही में इसी जिले में नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में एक युवा पुलिस इंस्पेक्टर जान से हाथ धो बैठा था। खनिज संपदा से संपन्न बालाघाट जिला नक्सलियों की गतिविधियों का बहुत पुराना गढ़ रहा है अतीत में उनके द्वारा कई नेताओं की भी हत्या की जा चुकी है । समीपवर्ती कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में भी उनकी आवाजाही रही। सर्वविदित है नक्सलियों की गतिविधियाँ मुख्य रूप से खनिज और वन्य संपदा संपन्न क्षेत्रों में ही देखी जाती हैं। इसके अलावा वे राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों को ही अपना कार्यक्षेत्र बनाते रहे हैं जिससे कि एक में वारदात कर दूसरे में भाग सकें। बालाघाट जिले की सीमाएं भी छत्तीससगढ़ और महाराष्ट्र से मिलती हैं। इसीलिए म.प्र का यह जिला उनको रास आता रहा। इसके अलावा निकटवर्ती मंडला भी आदिवासी बहुल और वन्य संपदा संपन्न होने से नक्सलियों की पसंद बना रहा किंतु उनका आतंक ज्यादातर बालाघाट जिले में ही है। इसमें भी दो राय नहीं है कि जिस तरह चंबल संभाग में डकैत समस्या को समाज और शासन - प्रशासन से जुड़े कुछ तबके खाद -पानी देते थे लगभग वही स्थिति नक्सलियों के साथ भी है। उनके मुखबिर पुलिस की गतिविधियों की जानकारी उन तक पहुंचाते रहे हैं। इसी तरह खनिज व्यवसायियों से की जाने वाली वसूली भी बिचौलियों के जरिये ही होती है। यद्यपि बालाघाट में नक्सलियों का जाल छत्तीसगढ़ जैसा बड़ा और मजबूत तो नहीं बन पाया किंतु उनका आतंक पूरी तरह महसूस किया जा सकता था। म.प्र में नक्सली आतंक से निपटने के लिए पुलिस विभाग ने विशेष व्यवस्था कर रखी थी। इसीलिए बीते कुछ वर्षों में प्रदेश में कोई बड़ी वारदात तो नहीं कर सके किंतु उनका डर लोगों के मन - मस्तिष्क पर हावी था। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा 31 मार्च 2026 तक नक्सल समस्या के खात्मे का जो संकल्प लिया गया उसके कारण बीते कुछ महीनों से विभिन्न राज्यों में सक्रिय नक्सली गुटों में जो दहशत है उसका प्रमाण बड़ी संख्या में उनके हथियार डालने से मिल रहा है। हिडमा नामक बड़े नक्सली के अलावा अन्य के मारे जाने से नक्सलवादियों के संगठन कमजोर होने लगे हैं। यही वजह है कि आये दिन नक्सलियों द्वारा हथियार डालकर मुख्य धारा में शामिल होने के समाचार मिल रहे हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र और तेलंगाना में भी नक्सलियों द्वारा लगातार आत्म समर्पण किये जाने से लगता है केंद्र सरकार द्वारा तय की गई समय सीमा के भीतर ही उनके आतंक से देश को मुक्ति मिल जायेगी। यदि ऐसा हुआ तो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बना हुआ बड़ा खतरा समाप्त होने के साथ ही आदिवासी बहुल देश के बड़े हिस्से में विकास की गंगा बहने का शुभारंभ भी सकेगा। ये बात सही है कि यदि शासन चाह ले तो आतंकी और अपराधी की कमर तो़ड़ना असम्भव नहीं होता। डाकू समस्या का उन्मूलन भी तभी हो सका जब दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ प्रयास किये गए। जब म.प्र, उ.प्र और राजस्थान में फैले डाकुओं को लगा कि उनके लिए जान बचाना कठिन है तब उन्होंने हथियार रखकर समाज के साथ जुड़ने की अकलमंदी दिखाई। लेकिन उनमें और नक्सलियों में सबसे बड़ा बुनियादी फर्क ये है कि डकैतों की कोई विचारधारा नहीं थी। वे सामाजिक शोषण , अत्याचार अथवा सामान्य अपराधी मानसिकता से ग्रसित होकर हथियार उठाते थे। लेकिन नक्सलियों की पीठ पर चीन पोषित माओवादी विचारधारा का हाथ है जिसका उद्देश्य भारत में खूनी क्रांति के जरिये साम्यवादी शासन व्यवस्था कायम करना है। आदिवासियों का उत्थान और वन संपदा के संरक्षण जैसे उनके नारे महज दिखावा हैं। ये बात प्रमाणित हो चुकी है कि अपने को गरीबों और शोषितों का मसीहा कहने वाले नक्सली उनके सबसे बड़े दुश्मन साबित हुए जिन्होंने उनके विकास के रास्ते अवरुद्ध कर दिये। यदि नक्सली आतंक न होता तब प. बंगाल,बिहार, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और म.प्र. के आदिवासी इलाकों में विकास का सूर्योदय हो चुका होता। उस दृष्टि से श्री शाह ने जो दृढ़ संकल्प लिया वह राष्ट्रहित के साथ आदिवासियों के जीवन को संवारने की दिशा में बड़ा कदम है। बालाघाट में हुए नक्सली आत्म समर्पण के लिए म.प्र की मोहन यादव सरकार भी बधाई की पात्र है। उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले कुछ महीनों में म.प्र भी नक्सली आतंक से मुक्त हो जाएगा।
-रवीन्द्र वाजपेयी
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