Wednesday, 24 December 2025

करोड़ों अपात्र मतदाता बाहर होने से फर्जी मतदान रुकेगा


बिहार के बाद देश के अनेक राज्यों में चुनाव आयोग ने एस.आई.आर (विशेष गहन पुनरीक्षण) का कार्य संचालित किया। इनमें उ.प्र को छोड़कर बाकी की मतदाता सूची का प्रारूप प्रकाशित हो चुका है। अभी तक जो जानकारी आई उसके अनुसार तमिलनाडु में सर्वाधिक नाम काटे गए। उ.प्र. में पुनरीक्षण की तारीख बढ़ा दी गई है। इस प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस सहित ज्यादातर विपक्षी दलों ने काफी हल्ला मचाया। सड़क से संसद तक इसे लोकतंत्र विरोधी बताकर रद्द करने की मांग की। सर्वोच्च न्यायालय में असंवैधानिक साबित करने के लिए भी दलीलें दी गईं। लेकिन बिहार चुनाव निर्विघ्न संपन्न होने के बाद विपक्ष की आवाज धीमी होने लगी। हालांकि कांग्रेस के दिमाग से अभी भी वोट चोरी निकल नहीं रही। राहुल गाँधी जर्मनी में घूम - घूमकर हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव के नतीजों को वोट चोरी की उपज बताने में जुटे हैं। हाल ही में उनके नेतृत्व में पार्टी ने दिल्ली में एक बड़ी रैली भी आयोजित की थी। उसके पहले भी देश भर में एस. आई. आर विरोधी आंदोलन आयोजित किये। जिन 12 राज्यों में मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण हुआ और लाखों की संख्या में नाम काटे गए उनमें भाजपा शासित म.प्र , राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ की प्रारूप मतदाता सूचियों में लाखों मतदाता कम होने के बाद गैर भाजपा राज्यों का ये आरोप निराधार साबित हो गया कि  एस.आई.आर का निशाना केवल विपक्षी दलों की सत्ता वाले राज्य हैं। इस समूची प्रक्रिया में एक बात प्रमुखता से उभरकर सामने आई कि जो नाम काटे गए उनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है जो इस दुनिया में नहीं हैं। उसके बाद दूसरी जगह चले गए  और फिर लापता तथा ऐसे मतदाता जिनके नाम दो बार दर्ज थे। एस. आई. आर के बाद प्रकाशित प्राथमिक सूची में यदि  गड़बड़ी है तो उसे सुधारने के लिए मतदाता के पास पर्याप्त समय रहता है। लेकिन इस कार्य में मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी कहीं ज्यादा है। यदि उनका संगठन वाकई सक्रिय है तब वे इन सूचियों में गलतियों को सुधरवाने में सफल रहते हैं। अन्यथा अंतिम प्रकाशन होने के बाद किया गया विरोध सांप के निकल जाने के बाद लकीर पीटते रहने जैसा होकर रह जाता है। राजनीतिक आरोप - प्रत्यारोप से इतर देखें तो मतदाता सूची में मृत हो चुके लोगों का नाम होना पूरी तरह गलत है। इसके अलावा एक स्थान से काम - धंधे की तलाश में अन्य स्थान पर चले गए व्यक्तियों का नाम अलग किया जाना भी सही है। बहुत से ऐसे नाम भी मतदाता सूचियों में बने रहते हैं जिनका  कुछ अता - पता नहीं है। ये बात भी गौरतलब है कि जहाँ - जहाँ एस. आई. आर की प्रक्रिया हुई वहाँ लाखों मतदाता आयोग द्वारा मांगी गई जानकारी देने में असफल रहने के कारण  बाहर किये गए। बिहार में जब 65 लाख नाम कटे तब प्रथम दृष्ट्या चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक था। लेकिन प्राथमिक प्रकाशन के बाद केवल 16 लाख मतदाता अपना नाम जुड़वाने आगे आये जिनमें पहली बार मतदाता बने युवा भी शामिल थे। चुनाव के बाद भी कोई ये साबित नहीं कर सका कि किसी को जिताने या हराने के लिए लाखों नाम काटे गए। बिहार के बाद जब प. बंगाल में मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण शुरू हुआ तब मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने उसका खुलकर विरोध ही नहीं किया अपितु  व्यवधान पैदा करने का भरपूर प्रयास भी किया  । इसी तरह तमिलनाडु और केरल की सरकारें भी शुरुआती विरोध के बाद ठंडी पड़ गईं। अब तक जो देखने मिला उसके अनुसार एस. आई. आर पूरा हो जाने के बाद देश भर में करोड़ों अपात्र मतदाता  अलग हो जाएंगे जिससे फर्जी मतदान रुकेगा। साथ ही निर्वाचन प्रक्रिया से वे तत्व बाहर होंगे जो गलत तरीके से मतदाता बने या बनाये गए थे। ऐसे लोगों के पास जो मतदाता पहचान पत्र होता है उसकी मदद से वे तमाम शासकीय योजनाओं का लाभ भी उठाते रहे हों तो आश्चर्य नहीं होगा। बहरहाल राहुल गाँधी और ममता बैनर्जी जैसे नेता एस.आई.आर का कितना भी विरोध करते रहें लेकिन जनता ने जिस उत्साह के साथ चुनाव आयोग के अभियान में सहयोग दिया उससे उसकी सार्थकता प्रमाणित हो गई। इसी तरह वोट चोरी के  हल्ले को लोगों ने अनसुना कर दिया। ऐसे में श्री गाँधी द्वारा जर्मनी के लोगों को इसके बारे में बताना हास्यास्पद ही है। बेहतर हो विपक्ष व्यर्थ के मुद्दों को छोड़  भावी चुनौतियों का सामना करने खुद को तैयार करे वरना उसे आगे भी निराशा का सामना करना पड़ेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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