Thursday, 25 December 2025

वरना साँस का संकट पूरे देश को घेर लेगा


बीते कुछ दिनों से पश्चिमी उ.प्र से , हरियाणा और राजस्थान तक फैली अरावली पर्वतमाला को खनन माफिया से होने वाले नुकसान से बचाने हेतु हो रहा आंदोलन चर्चा का विषय बना हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय के एक ताजा फैसले के कारण ऐतिहासिक अरावली के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। न सिर्फ पर्यावरण प्रेमी अपितु इस क्षेत्र में रहने वाले आम नागरिक के मन में भी अरावली को खनन माफिया के हवाले किये जाने के फैसले से गुस्सा है। यद्यपि केंद्र सरकार ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए तत्काल प्रतिबंधात्मक कदम उठाये हैं परंतु  ऊंचाई के आधार पर  पहाड़ की परिभाषा तय करने के बाद अरावली में उत्खनन का रास्ता साफ होने से इस अंचल के रहवासियों में चिंता और गुस्से की लहर दौड़ पड़ी। इसकी रोषपूर्ण प्रतिक्रिया समूचे देश में होने से केंद्र सरकार भी हरकत में आई और उसने कुछ कदम उठाये। हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि इनसे  अरावली को बचाने में सफलता मिलेगी या नहीं किंतु इतना तो हुआ कि पर्यावरण संरक्षण को लेकर लोग मुखर हुए। अरावली की नैसर्गिक संरचना को नष्ट करने से दिल्ली, उ.प्र और अन्य निकटवर्ती राज्यों में राजस्थान के मरुस्थलों से आने वाली आँधियों के जरिये धूल उड़कर फैलने का खतरा जो बताया जा रहा है वह निराधार नहीं है। ऐसा होने पर खेतों  के अलावा पेड़ - पौधों की सेहत भी बिगड़ेगी। उल्लेखनीय है खनन माफिया की धन कमाने की वासना के कारण देहरादून के आसपास की प्राकृतिक संरचना बुरी तरह बिगड़ चुकी है। समूचे गढवाल अंचल में भी पहाड़ों के साथ किये गए निर्मम व्यवहार का दुष्प्रभाव जल्दी - जल्दी दिखाई देने लगा है। इसे लेकर चिंता तो खूब व्यक्त की जाती है लेकिन जो किया जाना चाहिए वह नहीं होने से हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं। इसके अलावा हिमालय के बाकी हिस्सों में भी मानवीय हस्तक्षेप के कारण प्रकृति का कोप समय - समय पर प्रकट होता रहता है। इस साल बरसात के मौसम में जितने भूस्खलन हिमालय के विभिन्न हिस्सों में हुए वे भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्व संकेत हैं। विकास की अंधी दौड़ में  प्रकृति और पर्यावरण से छेड़छाड़ कितनी महंगी पड़ती है ये देश की राजधानी दिल्ली और उसके हिस्से बन बन चुके नोएडा तथा ग़ाज़ियाबाद में रहने वालों से पूछा जा सकता है। कहने को दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय महानगर है। शहरी विकास की सभी योजनाएं वहाँ लागू हैं। पूरी सरकार वहाँ रहती है। संसद और सर्वोच्च न्यायालय है। देश - विदेश से आवागमन की भरपूर सुविधाएं हैं।ढेर सारे  पांच सितारा होटल हैं। लेकिन एन.सी.आर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में रहने वाले शुद्ध हवा में सांस लेने को तरस रहे हैं। संसद से सर्वोच्च न्यायालय तक में इसकी चर्चा होने के बाद भी कोई समाधान नजर नहीं आता। जो कदम उठाये भी जाते हैं वे अपर्याप्त साबित होने से लोगों की मुश्किलें बजाय खत्म होने के और बढ़ती जा रही हैं। सरकारें बदलने के बावजूद दिल्ली की दुर्दशा दूर नहीं हो रही। इससे स्पष्ट है कि प्रकृति से लड़कर पर्यावरण का संरक्षण नहीं किया जा  सकता। इसके बाद भी अरावली के सीने पर जेसीबी चढ़ाना जानबूझकर अपने विनाश को न्यौता देना है। हालांकि कुछ लोग ये प्रचारित कर रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की गलत व्याख्या की जा रही है। लेकिन ये कहना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं होगा कि समूचे देश में खनन व्यवसाय में लगे तत्वों ने नेताओं और नौकरशाहों के संरक्षण में प्रकृति और पर्यावरण के साथ जो अत्याचार किया वह अक्षम्य अपराध ही नहीं अपितु भावी पीढ़ी के जीवन को संकट में डालने का कारण बनेगा। गत दिवस दिल्ली उच्च न्यायालय ने घरों  के भीतर हवा को साँस लेने लायक बनाने लगाए जा रहे एयर प्यूरीफायर पर 18 फीसदी जीएसटी होने पर ऐतराज जताया किंतु सरकार जीएसटी पूरी तरह घटा  दे तब भी घर के भीतर की हवा भले ही साफ हो जाए लेकिन लोग घरों में ही कैद नहीं रह सकते। विद्यार्थियों के अलावा नौकरपेशा वर्ग को बाहर जाना ही पड़ता है। इस बारे में चीन की राजधानी बीजिंग का उदाहरण दिया जा रहा है जो एक दशक पूर्व तक दुनिया का  सबसे प्रदूषित शहर  था किंतु अब स्थिति पूरी तरह बदल गई और वहाँ का पर्यावरण सुधर गया। दिल्ली की हवा को साँस लेने लायक बनाने के लिए बीजिंग मॉडल को अपनाया जा सकता है। लेकिन केवल दिल्ली ही क्यों साँस लेने हेतु शुद्ध हवा प्रत्येक देशवासी का अधिकार है। इसलिए जरूरी हो गया है कि पर्यावरण की मौजूदा स्थिति में जरूरी सुधार हेतु युद्ध स्तरीय प्रयास किये जाएं वरना साँस का संकट पूरे देश को घेर लेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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