म.प्र.सरकार ने प्रदेश के छोटे - छोटे जिलों में मेडिकल कालेज खोलने का जो फैसला किया उसका उद्देश्य चिकित्सकों की कमी दूर करना है। सर्वविदित है कि चिकित्सा सेवाओं के विस्तार में चिकित्सकों की कमी सबसे बड़ी बाधा है। चिंताजनक ये भी है कि सरकारी मेडिकल कालेजों में बेहद सस्ती शिक्षा पाकर डिग्री हासिल करने के बाद बहुत कम चिकित्सकों की रुचि शासकीय सेवा में दिखाई देती है। उसका एक कारण उन्हें ग्रामीण अथवा कस्बाई सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों में नियुक्ति मिलना भी है। जो चिकित्सक स्नातकोत्तर उपाधि या उससे भी आगे की पढ़ाई कर विशेषज्ञ बन जाते हैं उनकी प्राथमिकता निजी प्रैक्टिस ही होती है। सरकार चिकित्सकों को विदेश जाने से रोकने के लिए बाँड जैसी कितनी भी व्यवस्था कर ले किंतु उससे भी चिकित्सकों की कमी दूर नहीं हो पा रही। इसीलिये निजी क्षेत्र को मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति दी जाने लगी किंतु उनकी पढ़ाई बेहद महंगी होने से वहाँ से निकले अधिकांश चिकित्सक अपनी पढ़ाई पर हुए खर्च की वसूली मरीजों से करने में जुट जाते हैं। इसीलिये केन्द्र सरकार ने देश भर में नये मेडिकल कॉलेज खोलने की नीति लागू की जिसके अंतर्गत म.प्र सरकार ने भी बीते कुछ वर्षों में छोटे - छोटे जिलों में मेडिकल कॉलेज खोलने का सिलसिला शुरू किया जो क्षेत्रीय राजनीतिक संतुलन बनाये रखने पर केंद्रित हो गया। इसी क्रम में प्रदेश मंत्रिपरिषद की हालिया बैठक में पन्ना, कटनी, धार और बैतूल में नए मेडिकल कॉलेज खोलने का निर्णय हुआ। साथ ही पहले से चल रहे मेडिकल कालेजों का उन्नयन करने के बारे में भी योजना बनी। निश्चित रूप से ये नीति स्वागतयोग्य है। पहले मेडिकल कॉलेज केवल संभागीय मुख्यालयों में ही थे। लेकिन अब प्रदेश के विभिन्न जिलों में शासकीय और निजी मिलाकर 30 - 32 मेडिकल कॉलेज हैं जिनमें क्रमशः 2700 और 2500 सीटें हैं। भोपाल में एम्स ( भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) भी है। चार नए कॉलेज खुलने पर प्रदेश में तीन दर्जन मेडिकल कॉलेज होने से सीटें और बढेंगी। इस प्रकार कुछ सालों बाद प्रतिवर्ष 5 हजार से ज्यादा नए चिकित्सक तैयार होंगे जो निश्चित रूप से अच्छा संकेत है। लेकिन चिंता की बात ये है कि जो मेडिकल कॉलेज हाल के वर्षों में खोले गए वे ही अब तक पूरी तरह स्थापित और साधन संपन्न नहीं हो सके हैं। और तो और दशकों पुराने जो मेडिकल कॉलेज हैं उनकी सेहत भी संतोषजनक नहीं है। सबसे बड़ी समस्या है इन कॉलेजों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की कमी। नये मेडिकल कॉलेज को मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया से मान्यता दिलवाने पुराने कॉलेजों से शिक्षकों को भेजा जाता है जो कुछ समय बाद अपने मूल कॉलेज में वापसी के लिए हाथ पाँव मारते देखे जा सकते हैं। और सफलता नहीं मिलने पर अवकाश पर चले जाते हैं। कुछ तो नौकरी भी छोड़ने में संकोच नहीं करते। निजी क्षेत्र वाले तो सरकारी मेडिकल कॉलेज से सेवा निवृत शिक्षकों को नियुक्त कर काम चला लेते हैं किंतु शासकीय कॉलेजों में योग्य शिक्षकों का अभाव शिक्षा का स्तर गिरा रहा है। ये देखते हुए बेहतर तो यही होगा कि जो मेडिकल कॉलेज वर्तमान में संचालित है उन्हीं में सीटें बढ़वाने की स्वीकृति मेडिकल काउंसिल से ली जाए। इसके लिए जरूरी औपचारिकताओं को पूरा करने में नये कॉलेज खोलने की तुलना में बेहद कम खर्च आयेगा और शिक्षकों की कमी भी नहीं रहेगी। नये कॉलेज को पूरी तरह स्थापित करने में लगने वाली धनराशि से पुराने मेडिकल कालेजों की क्षमता और स्तर सुधारने के बेहतर परिणाम मिलेंगे। हालांकि राजनीतिक नेता इस सुझाव को मान्य नहीं करेंगे क्योंकि जनप्रतिनिधियों के लिए कॉलेज का खुलना ही उपलब्धि है। भविष्य में उसका संचालन ठीक से हो इसकी चिंता आम तौर पर उन्हें नहीं होती। चिकित्सा जैसे सर्वोच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र की दुर्दशा का कारण सरकारी क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और अव्यवस्था ही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आयुष्मान योजना के अंतर्गत 5 लाख तक के निःशुल्क इलाज की जो सुविधा दी उसका लाभ निजी अस्पतालों को मिलने का कारण सरकारी चिकित्सा केंद्रों का अक्षम होना ही है। ऐसे में केंद्र सरकार को भी ये देखना चाहिए कि नये मेडिकल कॉलेज खोलने के बाद सुचारु रूप से संचालित हो भी पा रहे हैं या उनकी दशा भी बाकी सरकारी दफ्तरों जैसी ही है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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