वैश्विक अर्थव्यवस्था में इन दिनों डॉलर, यूरो, येन और युआन सब महत्वहीन होकर रह गए हैं। पूरी दुनिया सोने और चांदी की खरीदी में जुटी है। इसका कारण प्रथम दृष्ट्या तो यूक्रेन -रूस और इसरायल - हमास युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों को माना गया क्योंकि जिस तरह से तनाव बढ़ रहा था उससे तीसरे विश्व युद्ध की आशंका बलवती होने लगी थी। हालांकि इसरायल और हमास के बीच तो फिलहाल जंग रुकी है लेकिन रूस और यूक्रेन में युद्धविराम की संभावनाएं अनिश्चितता में फंसी होने से पूरा विश्व अस्त- व्यस्त है। और उस पर भी 2025 की शुरुआत में दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प की सनक भरी हेकड़ी ने उथलपुथल मचाकर रख दी। अमेरिका की अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट को थामने के लिए उन्होंने विभिन्न देशों पर अनाप - शनाप टैरिफ थोपने के अलावा अमेरिकी वीजा के लिए कड़ी शर्तें तो लगाई हीं , अप्रवासियों को अमानुषिक तरीकों से बाहर निकालने का अभियान छेड़ दिया। चीन और भारत जैसे दो बड़े देशों ने उनकी धौंस में आने से इंकार करते हुए अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने का जो दुस्साहस किया उसकी प्रतिक्रियास्वरूप ट्रम्प की बौखलाहट बढ़ती गई तथा वे टैरिफ की दरें बढ़ाने जैसी मूर्खता करते गए। लेकिन उनके टैरिफ आतंक के सामने घुटने टेकने के बजाय चीन, भारत, ब्राज़ील और द. अफ्रीका जैसी ऊपर उठती अर्थव्यस्था वाले देशों ने अमेरिकी डॉलर की चौधराहट तोड़ने का बीड़ा उठाते हुए यूरो जैसी वैकल्पिक साझा मुद्रा प्रारंभ करने की पहल कर डाली। रूस भी उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों से उबरने के लिए डॉलर विरोधी इस मुहिम में शामिल हो गया। इसका असर यूरोपीय यूनियन में शामिल देशों पर भी हुआ और उन्होंने भी अमेरिकी दादागिरी से आजाद होने के लिए हाथ - पाँव मारना शुरू कर दिया। लेकिन ये बात भी सही है कि डॉलर की पकड़ को ढीला करना आसान नहीं है। यूरोप के विकसित कहे जाने वाले देशों में कुछ को छोड़ शेष इन दिनों मुस्लिम शरणार्थियों द्वारा उत्पन्न समस्याओं से जूझ रहे हैं। जनसंख्या संतुलन बिगड़ने की वजह से उनका समूचा आर्थिक नियोजन गड़बड़ा गया है। रूस के अलग - थलग पड़ जाने से यूरोप को कच्चे तेल और गैस के अलावा खाद्यान्न की किल्लत से जूझना पड़ रहा है। कुल मिलाकर वैश्विक परिदृश्य में आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति है। इसका मनोवैज्ञानिक असर अविश्वास के रूप में होने से प्रचलित मुद्राओं की साख का संकट मंडराने लगा। भले ही शीतयुद्ध के हालात नहीं हैं किंतु पूरी दुनिया इस समय चिंता के माहौल में जी रही है। सोना और चांदी दुनिया की सबसे पुरानी उन धातुओं में से हैं जो किसी भी मुद्रा पर भारी पड़ती हैं और जिनकी स्वीकार्यता दुनिया के सभी हिस्सों में एक जैसी है। किसी देश की मुद्रा का विनिमय मूल्य उसके पास रखे स्वर्ण भंडार से ही तय होता है। ज्ञान - विज्ञान में कल्पनातीत तरक्की के बावजूद सोने और चांदी का महत्व लेश मात्र भी कम नहीं हुआ। भारत ने तो इनके सर्वकालिक महत्व को सदियों पूर्व समझ लिया था जिसकी वजह से उसे सोने की चिड़िया जैसा विशेषण प्राप्त हुआ। भले ही हम सदियों तक विदेशी शक्तियों के गुलाम रहे किंतु भारत में सोना और चांदी ही नहीं अपितु अन्य धातुओं में निवेश की परिपाटी भी कायम रही। आज भले ही अमेरिका और चीन के सरकारी स्वर्ण भंडार दुनिया में सर्वाधिक हों किंतु भारत की जनता के निजी आधिपत्य वाले स्वर्ण को मिलाया जाए तो वह दोनों से ज्यादा निकलेगा। बीते एक वर्ष से सोने - चांदी की कीमतें जिस आश्चर्यजनक तरीके से उछाल मार रही हैं उसने भारतीय आर्थिक सोच को पुनर्स्थापित कर दिया। भारत भले ही पूर्ण विकसित देशों से पीछे हो किंतु आज भी वह सोने का सबसे बड़ा आयातक है तो उसका कारण धातुओं के निवेश में निहित सुरक्षा है। गत दिवस खबर आई कि सोने और चांदी के साथ भी तांबा जैसी धातु की मांग में अचानक तेजी आने से उसके दाम भी चढ़ने लगे । उसके अलावा प्लेटिनम आदि भी महंगे हो गए। हालांकि चांदी की महंगाई को उसके औद्योगिक उपयोग से जोड़कर देखा जा रहा है किंतु अधिकांश देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़े पैमाने पर सोने की खरीदी कागजी मुद्रा के प्रति बढ़ते अविश्वास का संकेत है। दुनिया इस बात को समझ चुकी है कि विषम हालातों में सोना ही आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है। हालांकि ये दौड़ कहां जाकर ठहरेगी कहना कठिन है । लेकिन फिलहाल जो देखने मिल रहा है उसने आर्थिक विश्लेषकों को भारतीय अर्थव्यवस्था के इस मौलिक सिद्धांत में विश्वास के लिए बाध्य कर दिया है कि वैज्ञानिक प्रगति से आई चकाचौंध अस्थायी और क्षणभंगुर है जबकि सोना और चांदी की चमक कभी फीकी नहीं पड़ेगी। ईश्वर न करे यदि विश्वयुद्ध हुआ तब जिस देश के पास जितना सोना - चांदी होगा वह उतनी ही सुविधाजनक और सुरक्षित स्थिति में रहेगा। इसीलिए इन दोनों की कीमतें आये दिन आसमान छू रही हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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