Wednesday, 10 December 2025

गलतियों को दोहराना राहुल की आदत बन गई



लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी का जन्म देश के प्रमुख राजनीतिक परिवार में होने से उन्होंने बचपन से ही राजनीति के उतार चढ़ाव देखे। उनका लालन - पालन प्रधानमंत्री आवास में हुआ। उस वजह से सत्ता का स्वाद  भी उन्होंने महसूस किया। पिता की हत्या के बाद पहले उनकी माताजी सोनिया गाँधी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष बनाई गईं। और उसके बाद जैसा होता आया  धीरे से राहुल भी पार्टी में सक्रिय होकर महामंत्री और अध्यक्ष बन गए। यद्यपि लंबे समय से वे संगठन के किसी पद पर नहीं हैं किंतु आज  की स्थिति में पार्टी पूरी तरह उनकी मुट्ठी में है। कहने को तो उनकी बहिन प्रियंका वाड्रा भी महामंत्री होने के साथ ही लोकसभा सदस्य हैं किंतु सोनिया जी की अस्वस्थता के कारण कांग्रेस की पूरी कमान श्री गाँधी के पास ही है। लोकसभा में भी वे दो दशक से हैं। इतनी समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि और सुदीर्घ संसदीय अनुभव के बाद भी वे अपनी और  कांग्रेस की दिशा और दशा में कोई सुधार नहीं कर सके। उल्टे खुद को हास्यास्पद बनाने के साथ ही पार्टी को भी पराजय का प्रतीक बना बैठे। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें राष्ट्रीय परिदृश्य पर नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर उभरने का स्वर्णिम अवसर मिला था। लोकसभा में कांग्रेस पार्टी की अच्छी खासी संख्या होने के अलावा अन्य विपक्षी दल भी ताकतवर हुए। कांग्रेस को मुख्य विपक्षी दल का दर्जा मिलने से श्री गाँधी स्वाभाविक  तौर पर नेता प्रतिपक्ष बने। पूरा देश अपेक्षा कर रहा था कि वे परिपक्वता का परिचय देंगे । भारत जोड़ो यात्रा के जरिये उन्हें जमीन से जुड़ने का भरपूर अवसर भी मिला। लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि तमाम अनुकूलताओं और पार्टी पर एकाधिकार के बावजूद उन्होंने निराश किया। जम्मू -कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन के बाद जब बिहार में चुनावी रणभूमि सजी तब एक बार फिर ये उम्मीद व्यक्त की जाने लगी कि चेहरा विहीन भाजपा और थके दिखने लगे नीतीश कुमार पर तेजस्वी और राहुल की जोड़ी भारी पड़ेगी। कुछ यू ट्यूबर पत्रकार तो उनके महागठबंधन को जीता - जिताया प्रचारित करने में जुट गए। राहुल ने वोट चोरी का ढोल पीटकर चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करने में पूरी ताकत लगा दी किंतु बिहार की जमीनी सच्चाई को भांपने में असफल रहकर उन्होंने पिछली गलतियाँ ही दोहराईं। और अपने साथ ही तेजस्वी सहित बाकी विपक्षी दलों की नैया भी डुबो दी। उसके बाद मोदी सरकार के पतन और  राहुल के अगले  प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी करने वाले राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार अपना मुँह छिपाते घूमते देखे गए। बिहार में महागठबंधन का झंडा लेकर घूमने वाला ये तबका अब राहुल की कार्यप्रणाली में दोष ढूढ़ने लग गया है । इंडिया गठबंधन के अन्य घटक भी उनसे छिटकने लगे। लेकिन इन सबसे बेखबर श्री गाँधी अपना रवैया  बदलने तैयार नहीं हैं। गत दिवस लोकसभा में बोलते हुए उन्होंने एक बार फिर रास्वसंघ पर अपना गुस्सा उतारते हुए आरोप लगाया कि सभी संवैधानिक संस्थाओं पर उसका कब्जा हो गया है। ये पहला अवसर नहीं है जब उन्होंने संघ पर इस तरह का आरोप लगाया हो। जब उन्हें कोई मुद्दा नहीं सूझता तब वे संघ पर निराधार आरोप लगाने लगते हैं। आज तक उनकी समझ में ये नहीं आया कि वे संघ के विरुद्ध जो बकवास करते हैं उसका हिन्दू समाज पर विपरीत असर होता है। हाल ही में जितने विधानसभा चुनाव हुए उनमें हिन्दू मतदाताओं का जो ध्रुवीकरण  हुआ उसके लिए भाजपा की रणनीति से ज्यादा राहुल द्वारा संघ की आलोचना जिम्मेदार है। महाराष्ट्र में उन्होंने वीर सावरकर के विरोध में दुष्प्रचार करने की जो गलती की उसकी महंगी कीमत कांग्रेस ने चुकाई किंतु उसके बाद भी उन्होंने अपनी गलती नहीं सुधारी। पता नहीं उनके सलाहकार कौन हैं जो उन्हें इस बात का एहसास  नहीं करवाते कि देश का हिन्दू जनमानस संघ के विरुद्ध किये जाने वाले जहरीले प्रचार को बर्दाशत नहीं करता। हाल ही में संघ के शताब्दी वर्ष आयोजन के अवसर पर सरसंघचालक डाॅ. मोहन भगवत ने कहा भी था कि जिस तरह संघ हर प्रतिबंध के बाद और ताकतवर होकर निकला वैसे ही उसकी निरर्थक आलोचना से भी इस हिन्दू संगठन की लोकप्रियता और बढ़ती है। बेहतर हो  राहुल अपने इर्द - गिर्द मंडराने वाले चाटुकार किस्म के सलाहकारों की बजाय संघ प्रमुख की बात का निहितार्थ समझें। संवैधानिक संस्थाओं पर संघ के प्रभाव का रोना रोने के बजाय उनको इस बात का अध्ययन करना चाहिये कि समाज पर संघ का प्रभाव क्यों और कैसे बढ़ रहा है  क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति वही होता है जो अपने विरोधी के गुणों से भी सीखे। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


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