Tuesday, 9 December 2025

घरेलू पूंजी ने आत्मनिर्भरता का एहसास कराया


अमेरिका द्वारा बढ़ाये गए टैरिफ के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव उतना नहीं हो सका जितना कि आशंका जताई जा रही थी। हालांकि निर्यात पर उसका थोड़ा असर हुआ किंतु भारत ने समय रहते वैकल्पिक बाजार तलाशकर अमेरिकी दबाव को काफी हद तक कम कर दिया। इसी बीच खबर आई कि विदेशी निवेशकों ने हाल ही में 10000 करोड़ रु. के शेयर बेचकर भारतीय पूंजी बाजार से अपना पैसा निकाला। डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत गिरते जाने के लिए विदेशी निवेशकों द्वारा की जा रही बिकवाली को भी बड़ा कारण माना जा रहा है। लेकिन चिंता के बादलों के बीच उम्मीद की किरण के रूप में भारतीय संस्थागत निवेशकों ने 19000 करोड़ निवेश करते हुए बाजार में पूंजी का संकट उत्पन्न नहीं होने दिया। हालांकि ऐसा पहले भी होता रहा है जब विदेशी निवेशकों द्वारा की गई भारी बिकवाली के दौरान  छोटे - छोटे भारतीय निवेशकों ने शेयर बाजार को गुलजार रखा। विशेष रूप से म्यूचल फंड में मध्यमवर्गीय निवेशकों ने अपनी बचत लगाकर अच्छा मुनाफा भी कमाया। जहाँ तक बात विदेशी पूंजी की है तो वह ज्यादा ब्याज या मुनाफे के फेर में ही भारत में निवेश होती है। विदेशियों को भारत की प्रगति से कुछ लेना - देना नहीं होता किंतु घरेलू निवेशक के मन में देश की प्रगति का भाव किसी न किसी रूप में रहता ही है। बीते दो दशकों से भारत के पूंजी बाजार में जो रौनक  है वह मध्यमवर्गीय निवेशकों के कारण ही है जो पहले केवल बैंकों से मिलने वाले ब्याज पर ही निर्भर होता था। चूंकि बैंकों द्वारा जमा राशि पर दिये जाने वाले ब्याज की दर काफी कम हो गई लिहाजा  प्रौढ़ावस्था के लोग भले ही बैंकों में अपनी बचत करते हों किंतु नई पीढी़ के निवेशक पूंजी बाजार के उतार - चढ़ाव का सामना करने में नहीं डरते। यही कारण है कि  निजी क्षेत्र को आम जनता से मिलने वाली पूंजी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। सबसे खास बात ये है कि ये निवेशक केवल चुनिंदा बड़ी कंपनियों में ही पैसा नहीं लगाते अपितु गैर परंपरागत व्यवसायों में भी निवेश करने में आगे आ रहे हैं। इसका सकारात्मक प्रभाव देखा जा सकता है। अर्थव्यवस्था के लिए ये शुभ संकेत है कि बड़ी संख्या में युवा पेशेवर बजाय नौकरी करने के अपना व्यवसाय शुरू कर स्वरोजगार की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं। विदेशों में कार्यरत हजारों युवाओं ने बीते कुछ सालों में भारत आकर खेती, व्यापार और उद्योग  में अपनी प्रतिभा और परिश्रम के झंडे गाड़ दिये। दुनिया के बाजारों में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करवाने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था में जो गतिशीलता आई उसका बड़ा कारण एक तो विशाल घरेलू बाजार है , वहीं दूसरी तरफ  विदेशी पूंजी जरूरी होने के बाद भी अब  मजबूरी नहीं रही। दुनिया के तमाम बड़े देश और वित्तीय संस्थान भारत के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने लालायित हैं तो उसका कारण हमारी आर्थिक आत्मनिर्भरता ही है। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का उत्साहजनक प्रदर्शन भी अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है। मोदी सरकार ने रक्षा सौदों में तेजी लाकर जहाँ देश के सुरक्षा तंत्र को सुदृढ़ किया वहीं उसके समानांतर घरेलू स्तर पर रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र के प्रवेश का रास्ता खोलकर भारत को निर्यातक बनाने की स्थिति में ला खड़ा किया जिसका असर दिखने भी लगा है। डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लादे गए टैरिफ के बाद भी यदि भारतीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने से बची हुई है तो उसका कारण घरेलू स्तर पर बढ़ती क्रय शक्ति के साथ ही बढ़ती घरेलू पूंजी भी है। इससे बौखलाए ट्रम्प अब और टैरिफ थोपने की धमकी दे रहे हैं किंतु उससे विचलित हुए बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी ने पिछले दिनों रूस के राष्ट्रपति पुतिन के साथ दिल्ली में वार्ता करते हुए आपसी संबंधों को जो मजबूती प्रदान की वह सीधे - सीधे अमेरिका को चुनौती है जो भारत और रूस के रिश्तों में दरार पैदा करने की हरसंभव कोशिश कर रहा है। समूचे परिदृश्य पर नजर डालने पर लगता है कि देश अब अपनी समस्याओं से निपटने के लिए आत्मविश्वास से भरपूर है। घरेलू निवेशकों द्वारा शेयर बाजार से निकली विदेशी पूंजी से दोगुनी लगा देने से आत्मनिर्भर भारत अब हकीकत में बदलता प्रतीत हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


No comments:

Post a Comment