Friday, 26 December 2025

भारतीय फिल्मों में सच्चाई दिखाने के दौर की शुरुआत अच्छा संकेत


इन दिनों धुरंधर नामक एक फिल्म की सर्वत्र चर्चा है।   चूंकि इसने ब्लॉक बस्टर होने का स्तर छू लिया इसलिए व्यवसायिक सिनेमा की दृष्टि से ये सफलतम फिल्मों की श्रेणी में आकर खड़ी हो गई । यद्यपि ये आम मुंबैया फॉर्मूला फिल्मों से अलग हटकर कथानक पर आधारित है जिसमें आतंकवाद, राजनीति, माफिया, जासूसी और सबसे ऊपर राष्ट्रवाद है। शुरुआत में फिल्म ने रफ्तार नहीं पकड़ी तब लगा कि वह दर्शकों द्वारा नापसंद कर दी गई किंतु एक सप्ताह के बाद वह नये कीर्तिमान बनाने लगी । कहने को तो फिल्म में अनेक नामी अभिनेता हैं किंतु खालिस मनोरंजन फिल्म न होने से इसकी सफलता पर संदेह के बादल मंडरा रहे थे। लेकिन दर्शकों ने इसके प्रति जो उत्साह दिखाया वह भारतीय फिल्म उद्योग में नये युग का सूत्रपात माना जा सकता है जिसमें केवल दिखावटी देशभक्ति की बजाय असली समस्याओं को उजागर कर लोगों को उनके प्रति जागरूक करने का मकसद है। बीते कुछ वर्षों में कश्मीर, केरल और बंगाल को लेकर कुछ ऐसी फिल्में बनाई गईं जिनमें उन सच्चाइयों को दर्शाया गया है जिन्हें देश की जनता से छिपा लिया गया। इसी तरह कुछ ऐतिहासिक और राजनीतिक हस्तियों पर बनी फिल्में भी दर्शकों द्वारा सराही गईं। इसीलिए उनके प्रदर्शित होते ही सिने जगत के चौधरियों के पेट में मरोड़ शुरू हो गया जो केवल नृत्य - संगीत, रोमांस और एक्शन को ही फिल्म की सफलता का आधार समझते रहे। आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता का सहारा लेना भी आम होता जा रहा था। ओ. टी. टी नामक माध्यम ने तो नंगेपन की हदें पार कर डालीं।  कभी - कभी तो लगता है मानों फिल्म उद्योग के पास अच्छे पटकथा और संवाद  लेखकों का बड़ा अभाव हो चला है। ऐसे वातावरण में देश से जुड़े मुद्दों पर फिल्में बनाने का प्रयास साहसिक भी है और सराहनीय भी। पहले ऐसे विषयों पर फिल्म बनाने में  आर्थिक जोखिम होने से उनमें पैसा लगाने वाले नहीं मिलते थे। लेकिन  अब फिल्म उद्योग को ये समझ में आने लगा है कि दर्शक विशुद्ध मनोरंजन और हल्की - फुलकी पारिवारिक फिल्मों के अलावा ऐसी  फिल्मों को भी टिकिट खरीदकर देखने में भरपूर रुचि लेने लगा है। भले ही ये कहा जाए कि इनके निर्माण के पीछे मौजूदा केंद्रीय सत्ता की भूमिका है किंतु जो फिल्में मनोरंजन के साथ ही लोगों को देश के सामने खड़े खतरों से अवगत कराने के साथ ही राष्ट्रवादी भावना का संचार करती हैं , उन्हें हर दृष्टि से प्रोत्साहित किया जाना जरूरी है। उस लिहाज से धुरंधर ने फिल्म निर्माण के साथ ही दर्शकों की बदलती सोच का जो संकेत दिया उससे  वस्तुवादी धरातल वाली फिल्मों का रास्ता खुल गया। कहते हैं उसके निर्माता ने फिल्म का अगला भाग भी तैयार करके रख लिया है जिसे कुछ माह बाद प्रदर्शित किया जाएगा। धुरंधर फिल्म के कथानक को सांप्रदायिक बताने वालों को कोई महत्व नहीं मिलना भी हवा का रुख बदलने का इशारा है। कुछ फिल्मी दिग्गजों को तो इस फिल्म की आलोचना करने के बाद पलटी मारने मजबूर होना पड़ा। इसका असर केवल भारत में ही होता तब वह सामान्य बात होती क्योंकि अतीत में भी दर्जनों ऐसी फिल्में बनाई जा चुकी हैं जिनके कारण देशभक्ति की भावना का संचार हुआ।  चीन और पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाइयों पर भी अनेक फिल्में बनीं जो सफल भी रहीं। आतंकवाद को आधार बनाकर भी फिल्में बनाई गईं किंतु बीते कुछ सालों के भीतर कुछ ऐसी फिल्मों को दर्शकों ने जमकर सराहा जिनमें वास्तविकता को साहसिक तरीके से फिल्माया गया। इसीलिए इनकी प्रतिक्रिया देश की सीमाओं से परे भी हुई। धुरंधर के कुछ चरित्रों को लेकर पाकिस्तान में जिस तरह से बवाल मचा उससे लगा कि फिल्म का कथानक तैयार करने में काफी मेहनत और शोध हुआ। भारत में दुनिया की सबसे अधिक फिल्में बनती हैं किंतु अभी भी हमारे फिल्म उद्योग को वैश्विक स्तर पर खास सम्मान नहीं मिलता क्योंकि वे  सच्चाई से दूर रहती हैं। आतंकवाद के विषय पर बनी कुछ फिल्मों में कहानी को ऐसा मोड़ दिया गया जिससे निंदा करने के बजाय उसके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित हुई। लेकिन अब ऐसा लगता है भारतीय फिल्म निर्माता ढर्रे से निकलकर जमीनी सच्चाई से दर्शकों को अवगत करवाने का साहस दिखा रहे हैं। इसके पीछे बड़ा कारण देश के राजनीतिक परिदृश्य में आया बदलाव भी है। इसके अलावा राष्ट्रवाद का उभार भी फिल्म निर्माताओं को अपना रवैया बदलने प्रेरित कर रहा है। धुरंधर की सफलता ने फिल्म उद्योग के  स्थापित छत्रपों के वर्चस्व को जिस प्रकार से चोट पहुंचाई उसे एक नये दौर की शुरुआत कहा जा सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

No comments:

Post a Comment