Monday, 1 December 2025

नक्सली आतंक आखिरी साँसें ले रहा

 केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक नक्सली आतंक के खात्मे का संकल्प लिया तब विपक्ष ने इसे  बड़बोलापन माना। लेकिन सरकार की चेतावनी के बाद भी नक्सलियों ने हथियार डालने से इंकार किया तब सुरक्षा बलों ने उनको घेरकर मारने का अभियान शुरू किया। छत्तीसगढ़, म.प्र, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र के बड़े इलाकों में नक्सली आतंक के कारण जनजीवन त्रस्त हो चुका था। भोले - भाले आदिवासियों को धमकाकर हिंसा के अंधे रास्ते पर धकेलने का जो षडयंत्र चीन के इशारे पर सत्तर के दशक में प. बंगाल की नक्सलबाड़ी नामक स्थान में रचा गया वह योजनाबद्ध तरीके से अनेक राज्यों में फैलता गया। इसकी विशेषता ये रही कि घने जंगलों से घिरे आदिवासी बहुल क्षेत्रों को नक्सलियों ने अपना निशाना बनाया जो विकास की मुख्य धारा से कटे हुए थे। वहाँ सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव की वजह से गरीब आदिवासियों को भड़काने में चीन परस्त वामपंथी सफल हो गए। दूसरी खास बात ये रही कि नक्सलियों की ज्यादातर मौजूदगी खनिज संपदा संपन्न इलाकों में रही जो इनकी आय का स्रोत भी बन गए। नक्सलियों के पास आधुनिक हथियार और सैन्य प्रशिक्षण के पीछे भी चीन का हाथ सर्वविदित है। इनकी विचारधारा साम्यवादी क्रांति से प्रभावित है इसलिए संसदीय लोकतंत्र में इनका विश्वास नहीं है। हालांकि साम्यवादी पार्टियां चुनाव लड़कर विधानसभा  और संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती रही हैं। प. बंगाल , त्रिपुरा और केरल में तो वे सत्ता में भी रहीं। हालांकि अब उनकी पकड़ केवल केरल में ही बची है। देश के अन्य हिस्सों में श्रमिक संगठनों के जरिये जो साम्यवादी प्रभाव दिखता था वह भी उदारीकरण के बाद निर्मित परिस्थितियों में कमजोर होता गया। लेकिन शिक्षा, साहित्य, कला, पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों में बैठे वामपंथी इस विचारधारा के पोषक बने रहे। कांग्रेस के शासन में इनको खूब महत्व मिलता रहा। इसी वर्ग को शहरी नक्सली कहा जाता है जो जंगलों में बैठे सशस्त्र नक्सलियों या माओवादियों को नैतिक समर्थन देता है। हाल ही में खूंखार नक्सली सरगना हिडमा को सुरक्षा बलों द्वारा मार गिराए जाने के बाद दिल्ली में जेएनयू नामक वामपंथियों के गढ़ के छात्रों द्वारा प्रदूषण के विरुद्ध  प्रदर्शन में अचानक  नारे लगने लगे कि हर घर से हिडमा निकलेगा। ऐसे ही नारे आतंकवादी अफजल गुरु की फांसी के बाद सुनाई दिये थे। हिडमा की मौत पर वरिष्ट  कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भी जो बयानबाजी की वह भी बहुत कुछ कह गई। लेकिन इस सबसे प्रभावित हुए बिना श्री शाह ने नक्सलियों को हथियार छोड़ मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित करने का प्रयास जारी रखा जिसके अनुकूल परिणाम भी आने लगे। नक्सलियों के परिवारजनों से अपील जारी करवाने का भी असर दिखा। जिन माओवादियों ने हथियार रखकर आत्मसमर्पण किया उनके पुनर्वास और कौशल विकास हेतु प्रशिक्षण का प्रबंध किये जाने से बड़ी संख्या में नक्सली मुख्य धारा में लौटने लगे। इसमें दो मत नहीं हैं कि इस आतंक को राजनीति और पुलिस का संरक्षण भी मिलता रहा। वामपंथी विचारधारा में रचे- बसे अनेक वरिष्ट नौकरशाह भी नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं। इसीलिए आत्मसमर्पण का सिलसिला जारी रहने के बावजूद बड़े माओवादी नेता  मुख्यधारा में आने से इंकार करते रहे। लेकिन अचानक वातावरण  बदलने लगा। सुरक्षा बलों द्वारा बड़ी संख्या में उन माओवादी दिग्गजों का काम तमाम किया जाने लगा जिन पर करोड़ों रु. के इनाम थे। हिडमा इनमें सबसे बड़ा नाम है। इस सबसे वामपंथी दलों में घबराहट फैली जिसका प्रमाण उनके बयान उस बयान से मिला जिसमें नक्सलियों को मारने के अभियान को रोककर उनसे बातचीत करने की मांग सरकार से की गई। उसके कुछ दिनों बाद माओवादियों ने सरकार को खबर भेजी कि वे बातचीत हेतु राजी हैं किंतु गृहमंत्री श्री शाह ने दो  टूक कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से साम्यवादी विचारधारा का प्रचार करने में कोई ऐतराज नहीं है किंतु हथियारों के जोर पर इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। उनकी सख्त प्रतिक्रिया का असर लगातार हो रहे आत्मसमर्पण के रूप में देखने मिल रहा है।  यही स्थिति जारी रही तो बड़ी बात नहीं 31 मार्च 2026 के पूर्व ही माओवादियों के हौसले पस्त हो जाएं।  ध्यान देने लायक बात ये है कि जो नक्सली अपने विरोधी की नृशंस हत्या करने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते वे अपनी जान खतरे में पड़ते ही हथियार डालने को दौड़े आ रहे हैं। दरअसल खूनी क्रांति के लिए बंदूक उठाकर जंगलों में फैले ये नक्सली कालांतर में अपराधी बन गए। आदिवसियों के हितों की रक्षा और जल, जंगल और जमीन के संरक्षक बनने  का इनका दावा महज दिखावा था। यही वजह है कि जैसे ही केंद्र सरकार ने उंगली टेढ़ी की तो इनकी कमर टूटने को आ गई। इस उपलब्धि का सबसे बड़ा लाभ नक्सल पीड़ित इलाकों में विकास की शुरुआत से होगी जिसमें वे रुकावट बने हुए थे। गृहमंत्री श्री शाह की प्रशंसा करनी होगी जो अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लगातार आकर सुरक्षा बलों का मार्गदर्शन करते रहे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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