र्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने म.प्र के एक प्रधान जिला न्यायाधीश को सेवा निवृत्ति के 10 दिन पूर्व निलंबित किये जाने के विरुद्ध प्रस्तुत याचिका की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि जजों में रिटायरमेंट की पूर्व संध्या पर बाहरी कारणों से आदेश पारित करने का चलन बढ़ रहा है। जजों द्वारा अंतिम ओवरों में छक्के मारने की इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा मैं इस पर ज्यादा बात नहीं करना चाहता।पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची भी शामिल थे। मुख्य न्यायाधीश के उक्त कटाक्ष ने सेवाकाल समाप्त होने के पहले न्यायाधीशों द्वारा कछुआ चाल छोड़कर खरगोश से भी तेज दौड़ने की प्रवृत्ति पर सार्वजनिक विमर्श का रास्ता खोल दिया है। कुछ बरस पहले देश भर के निजी मेडिकल कालेजों की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने सेवानिवृत्त होने के कुछ घंटों पहले ही जो फैसला सुनाया उसकी जबरदस्त आलोचना हुई थी। न्यायपालिका में व्याप्त विसंगतियों के बारे में चूंकि अदालत की अवमानना के डर से लोग बोलने से कतराते हैं इसलिए इस चलन को रोकने जैसी कोई मुहिम शुरू नहीं हो सकी। यहाँ तक कि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी अंतिम ओवरों में छक्के मारने की प्रवृत्ति पर चिंता जताने के बाद उस पर ज्यादा न बोलने की बात कहकर अपना पिंड छुड़ा लिया ,जो आश्चर्यजनक है। शायद इसका कारण ये हो कि कानून किसी न्यायाधीश को अपने सेवाकाल के अंतिम दिनों में फैसला लेने से नहीं रोकता। लेकिन उनसे अपेक्षा रहती है कि वे न्याय प्रक्रिया में व्याप्त विसंगतियों को दूर करें जिनकी वजह से उसकी प्रतिष्ठा पर आंच आ रही है। मुख्य न्यायाधीश नियुक्त होने के बाद श्री सूर्यकांत ने सर्वोच्च न्यायालय की कार्यप्रणाली में सुधार के जो संकेत दिये उनसे उम्मीदें बढ़ी है। उनकी संदर्भित टिप्पणी ने भी दरअसल विधि क्षेत्र में होने वाली चर्चाओं को ही अभिव्यक्त किया है। हमारे देश में कोई भी सरकार पूरे पांच वर्ष के लिए चुनी जाती है। लेकिन अगले चुनाव हेतु आचार संहिता लागू होते ही उस पर नीतिगत फैसले लेने की बंदिश लग जाती है। सरकारी आयोजन और विज्ञापन बंद हो जाते हैं। सरकारी विश्रामगृह की सुविधा छिन जाती है। लेकिन नौकरशाह और न्यायाधीश अपनी सेवानिवृत्ति के अंतिम क्षणों तक आदेश और निर्णय पारित करते हैं। हालांकि ये जरूरी नहीं कि उनका प्रत्येक कार्य या फैसला लोभ - लालच या बाहरी दबाववश लिया गया हो जैसा श्री सूर्यकांत ने कहा किंतु ये बात गलत नहीं है कि सेवानिवृत्ति के पहले न्यायाधीशों द्वारा दिये जाने वाले ताबड़तोड़ फैसलों में पक्षपात की आशंका रहती है। यद्यपि न्यायप्रक्रिया में ये प्रावधान है कि यदि न्यायाधीश उसके समक्ष सुनवाई हेतु प्रस्तुत प्रकरण पर फैसला करने से पूर्व सेवानिवृत्त हो जाए तब उसकी सुनवाई नये सिरे से होती है। हमारे देश में न्यायपालिका के प्रत्येक स्तर पर न्यायाधीशों की बेहद कमी है। इसके चलते न्यायाधीशों पर काम का बहुत दबाव रहता है। ऐसे में सेवानिवृत्ति करीब आने पर फैसला सुनाने की रफ्तार बढ़ जाती है और तब आपाधापी में वह सब होता है जिस पर श्री सूर्यकांत ने निशाना साधा। जिस न्यायाधीश के निलंबन संबंधी प्रकरण पर मुख्य न्यायाधीश ने अंतिम ओवरों में छक्के मारने वाला तंज कसा उसके द्वारा सेवानिवृत्ति के पूर्व दिये फैसले ही विवाद का कारण बने। हालांकि श्री सूर्यकांत भी बात आगे बढ़ाने से बचे किंतु जब उन्होंने मुद्दा छेड़ ही दिया तब उसे आगे ले जाने का प्रयास भी उनको करना चाहिए क्योंकि इससे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और निष्पक्षता जुड़ी हुई है। सेवानिवृत्ति के निकट आते ही किसी न्यायाधीश द्वारा दिये जाने वाले फैसलों की निष्पक्षता का प्रमाणीकरण कैसे हो इस पर विचार होना जरूरी है। और जब बात देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा ही शुरू की गई तब उसे केवल बौद्धिक चर्चा और टेलीविजन पर होने वाली दिशाहीन बहस के लिए छोड़ देना उचित नहीं होगा। बेहतर हो न्यायपालिका ही इस विसंगति को दूर करने का रास्ता निकाले।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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