देश के मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकांत द्वारा विगत दिनों रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर जो टिप्पणी की गई वह उस लोगों के गाल पर जोरदार तमाचा है जो मानवीय आधार पर उन्हें शरण देने की वकालत किया करते हैं। मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ के समक्ष जब एक याचिकाकर्ता की वकील ने रोहिंग्या मुस्लिमों को शरणार्थी कहा तब मुख्य न्यायाधीश ने पूछा- भारत सरकार का कौन-सा आदेश है जो उन्हें शरणार्थी घोषित करता है ।अगर उनके पास भारत में रहने का कानूनी अधिकार नहीं है और वे घुसपैठिए हैं, तो क्या हम लाल कालीन बिछाकर उनका स्वागत करें? उक्त याचिका में 3 रोहिंग्या घुसपैठियों की गिरफ्तारी के बाद उनके निर्वासन के लिए कानूनी प्रक्रिया के पालन की मांग की गई थी। इस पर श्री सूर्यकांत ने तीखे शब्दों में कहा कि सुरंग खोदकर या बाड़ काटकर अवैध रूप से भारत में दाखिल होने के बाद वे कहते हैं कि अब भारत के कानूनों के मुताबिक उन्हें भोजन , आवास का स्थान और बच्चों को शिक्षा मिलना चाहिए। वे यहाँ तक बोल गए कि देश में पहले से करोड़ों गरीब हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है। मुख्य न्यायाधीश द्वारा घुसपैठियों को शरणार्थी मानकर भारत के नागरिकों जैसी सुविधाओं देने पर ऐतराज जताये जाने के बाद सवाल उठ खड़ा होता है कि उनके प्रति मानवीय दृष्टिकोण रखने की वकालत करने वाले क्या अपना नजरिया बदलेंगे या देश पर बोझ बने घुसपैठियों की आवभगत करते रहेंगे जो आंतरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा बने हुए हैं। श्री सूर्यकांत के इस सवाल के निहितार्थ को समझा जाना चाहिए कि क्या हम उनका लाल कालीन बिछाकर स्वागत करें ? देश में इन दिनों मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण चल रहा है। इसके जरिये उन मतदाताओं के नाम तो अलग किये ही जा रहे हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है या जिनके नाम एक से अधिक स्थानों की सूचियों में दर्ज हैं। लेकिन इससे भी बढ़कर यह अभियान उन लोगों को मताधिकार से वंचित करने पर केंद्रित है जिन्होंने व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार का लाभ उठाकर आधार कार्ड जैसा दस्तावेज बनवाकर मुफ्त राशन, चिकित्सा , रसोई गैस और आवास जैसी शासकीय योजनाओं का लाभ उठाने की पात्रता तो हासिल कर ही ली किंतु उससे भी बढ़कर मतदाता सूची में नाम दर्ज करवाकर निर्वाचन प्रक्रिया में भी हिस्सेदार बन बैठे। देश में इस अभियान का विरोध करने वाले राजनीतिक दल और उनके नेतागण आरोप लगा रहे हैं कि पुनरीक्षण का असली उद्देश्य मुस्लिम मतदाताओं के नाम काटना है । लेकिन जिस बिहार से इस कार्य की शुरुआत हुई, वहाँ विधानसभा चुनाव के पहले 40 लाख से अधिक नाम काटे गए किंतु इक्का - दुक्का मुसलमान ने ही शिकायत की होगी । जाहिर है अवैध रूप से बसे विदेशी भी उन लोगों में शामिल होंगे जिनका नाम अलग हुआ। फिलहाल मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण पर सबसे ज्यादा विवाद प. बंगाल में है । पहले वामपंथी और फिर ममता बैनर्जी के शासनकाल में यहाँ मुस्लिम आबादी जिस तेजी से बढ़ी उसका कारण घुसपैठिये ही हैं। प्रसिद्ध टीवी पत्रकार राजीव रंजन ने हालिया दौरे के बाद अपने साक्षात्कार में खुलकर कहा कि प. बंगाल में मुस्लिम आबादी 40 फीसदी हो चुकी है जो राजनीतिक संतुलन को अपनी मर्जी से बनाने - बिगाड़ने की ताकत रखती है। उन्होंने कुछ जिलों का जिक्र करते हुए बताया कि पूरे रास्ते भर जितनी भी दुकानें नजर आईं वे सभी मुस्लिमों की थीं । उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बांग्लादेश की सीमा से सटे जिलों में तो मुस्लिम आबादी शत प्रतिशत हो गई है। धार्मिक ध्रुवीकरण का उदाहरण देते हुए श्री रंजन ने स्पष्ट किया कि राज्य की बहरामपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी 1999 से जीत रहे थे। लेकिन 2024 के चुनाव में ममता बैनर्जी ने गुजरात के क्रिकेटर यूसुफ पठान को लड़वाकर उन्हें हरवा दिया। मुस्लिम बहुल सीट के मतदाताओं ने अधीर रंजन के साथ 25 साल का रिश्ता एक झटके में महज इसलिये तोड़ दिया क्योंकि उनके मुकाबले मुस्लिम प्रत्याशी खड़ा था जिसका बहरामपुर तो क्या प. बंगाल तक से कोई जुड़ाव नहींं है। वस्तुतः मुख्य न्यायाधीश की दो टूक टिप्पणी ने नागरिकता रजिस्टर की जरूरत को भी नये सिरे से प्रासंगिक बना दिया है। देश में जितनी कल्याणकारी योजनाएं केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा संचालित हैं उनका लाभ बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक नागरिक को मिले ये न्यायोचित है किंतु घुसपैठिये उसका लाभ उठाकर हमारा शोषण करें ये किसी भी कोण से स्वीकार्य नहीं हो सकता। मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकांत बधाई के पात्र हैं जिन्होंने अवैध घुसपैठियों को शरणार्थी मानकर देश के नागरिकों के समकक्ष सुविधाएं देने जैसी देश विरोधी मानसिकता पर कड़ा प्रहार किया है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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