Tuesday, 2 December 2025

संसद में हंगामा कर अपना ही नुकसान कर रहा विपक्ष


सद का शीतकालीन सत्र शुरू होने के पहले लोकसभाध्यक्ष द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में सदन सुचारु रूप से चलाने के लिए आम सहमति बनी थी। प्रत्येक सत्र के पूर्व आयोजित होने वाली सर्वदलीय बैठक में ऐसा ही दिखाई देता है। और फिर  सदन के भीतर वही सब होता है जो मौजूदा सत्र में लगातार दूसरे दिन देखने मिला। विपक्ष मतदाता सूचियों के  एस.आई.आर (विशेष गहन पुनरीक्षण) पर तुरंत चर्चा की मांग पर अड़ा है जबकि सरकार का कहना है वह चर्चा हेतु तैयार है किंतु कब होगी इसके लिए दबाव स्वीकार नहीं है। हंगामे के कारण सदन स्थगित हो रहा है। वैसे भी ये सत्र काफी छोटा होता है। ऐसे में बेहतर तो यही होगा कि विपक्ष  उपलब्ध समय का सदुपयोग करते हुए सरकार को घेरने की रणनीति बनाये। लेकिन विपक्ष की अगुआई कर रही कांग्रेस पुराने ढर्रे पर चलने आमादा है। वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा लगाकर वह जिस मुद्दे को गर्माना चाह रही है उसकी हवा बिहार में निकल गई। राहुल गाँधी ने पूरे राज्य में यात्रा निकालकर एस. आई. आर के विरोध में जनमत बनाने का भरपूर प्रयास किया किंतु चुनाव में सबसे बुरी हालत कांग्रेस की ही हुई। वेसोचते थे कि बिहार में 40 लाख से ज्यादा नाम मतदाता सूचियों से कटने के बाद लाखों लोग सड़कों पर उतर आयेंगे । लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। मतदान निर्विघ्न संपन्न होने के बाद सरकार बनने तक की समूची प्रक्रिया सुचारु रूप से संपन्न हो गई। जिन राज्यों में एस. आई. आर चल रहा है वहाँ  भी किसी बड़े विरोध की खबर नहीं आ रही। यहाँ तक कि प. बंगाल में ममता बैनर्जी के पुरजोर ऐतराज के बावजूद पुनरीक्षण जारी है।  मोदी विरोधी पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि वोट चोरी का मुद्दा कोई असर नहीं छोड़ सका क्योंकि इससे आम जनता को कोई नुकसान नहीं हो रहा। सर्वोच्च न्यायालय तक ने इसे रोकने से इंकार करते हुए चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करना जरूरी नहीं समझा। साथ ही मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को जरूरी बता दिया। बेहतर होता विपक्षी नेता अपने कार्यकर्ताओं को इस कार्य में सहयोग करने का  निर्देश देते जिससे कि बाद में शिकायत की गुंजाइश न रहे। लेकिन ऐसा करने के बजाय देशव्यापी विरोध करने का फैसला किया गया जो नाकामयाब ही रहा। ये देखते हुए विपक्ष संसद में ऐसे मुद्दे उठाये जिनका जनता से सीधा सरोकार हो।  जनता से जुड़े ऐसे तमाम विषय हैं जिन पर विपक्ष की सक्रियता अपेक्षित है।  सरकार की जो विफलताएं हैं उन्हें उजागर करना विपक्ष का दायित्व है। संसद का सत्र इसके लिए सबसे सही अवसर होता है। लेकिन बीते अनेक वर्षों से देखने मिल रहा है कि विपक्ष किसी विशेष मुद्दे को पकड़कर पूरे सत्र में हंगामा करता रहता है। दूसरी ओर सरकार अपने सभी विधायी कार्य संसद से बिना बहस के मंजूर करवा लेती है। राहुल सहित अन्य विपक्षी नेताओं को ये बात समझनी चाहिए कि संसद  में हंगामा करने के कारण वे जन समर्थन खो रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद 6 राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में से चार पर एनडीए की बड़ी जीत हुई। हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में कांग्रेस के साथ ही इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दलों को मतदाताओं ने जिस बुरी तरह ठुकराया वह इस बात का प्रमाण है कि वे जनता का भरोसा जीतने में कामयाब नहीं हो पा रहे।  लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष जैसे जिम्मेदार ओहदे पर आने के बाद श्री गाँधी से जिस गंभीरता और दायित्वबोध की अपेक्षा थी वे उसे पूरा नहीं कर पा रहे। इसीलिये चुनावी हार का ठीकरा उनके सिर पर फूटना स्वाभविक भी है और सही भी। बिहार चुनाव में हुई फजीहत के बाद कांग्रेस ने जिस सतही ढंग से समीक्षा की उसके कारण उनकी नेतृत्व क्षमता पर पार्टी के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं। कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने को लेकर चल रही खींचतान को रोकने में पार्टी हायकमान जिस तरह असहाय नजर आ रहा है उसके लिए भी श्री गाँधी की लापरवाही  जिम्मेदार है। वे खुद तो कोई निर्णय करते नहीं और दूसरा कोई करे ये भी उन्हें नागवार गुजरता है। इन्हीं वजहों से वे कांग्रेस पर बोझ बन चुके हैं। वोट चोरी के मुद्दे पर अभी तक उन्होंने जितने भी खुलासे किये उन्हें भले ही किसी बम का नाम दिया गया किंतु वे सब फुस्स निकले। लोकतंत्र में जनता की नब्ज और मिजाज को जानने वाला दल और नेता ही सफल होता है। भाजपा और नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव में लगे झटके को गंभीरता से लेते हुए अपनी कमियाँ दूर कर विधानसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया। वहीं राहुल और उनके सलाहकार 99 सीटों के फेर में फंसकर रह गए जिसका नतीजा कांग्रेस को  लगातार पराजयों के रूप में देखने मिला। उम्मीद थी कि बिहार चुनाव में हुई शर्मनाक हार से सबक लेते हुए श्री गाँधी अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करेंगे किंतु संसद के मौजूदा सत्र की शुरुआत में ही उनका रवैया देखकर लग गया कि उन्होंने गलतियों को सुधारने की बजाय दोहराते जाने की कसम खा ली है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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