Tuesday, 30 December 2025

खालिदा की मौत के बाद बांग्लादेश फिर अनिश्चितता के साये में



ऐसे समय जब बांग्लादेश में नए चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है तब पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का निधन वहां की राजनीति में खालीपन छोड़ने के  साथ ही अनिश्चितता को बढ़ावा दे सकता है।  गत दिवस ही उन्होंने अपना नामांकन भरा था।  स्मरणीय है  दस वर्षों तक  प्रधानमंत्री रहीं खालिदा के पति जिया उर रहमान  शेख मुजीब की हत्या के बाद पहले सेनाध्यक्ष और फिर राष्ट्रपति निर्वाचित हुए किंतु उनकी भी हत्या कर दी गई जिसके बाद  बीएनपी ( बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) की कमान खालिदा जिया ने संभाली । जब शेख हसीना सत्ता में आईं तब खालिदा को भ्रष्टाचार के आरोप में दस वर्ष की सजा सुनाए गई। गत वर्ष हुए तख्ता पलट के बाद ही वे जेल से बाहर आईं । तभी से ये कयास लगाए जा रहे थे कि वे फिर से देश की सत्ता संभालेंगी क्योंकि हसीना की पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया। वैसे भी हसीना के देश छोड़ने के बाद उनकी पार्टी पूरी तरह बिखराव का शिकार हो चुकी है। इसीलिए बीएनपी के लिए रास्ता साफ नजर आ रहा था और खालिदा  की सत्ता में वापसी भी सुनिश्चित थी। कुछ दिन पहले ही जबसे उनके बेटे तारिक रहमान 17 वर्ष के निर्वासन उपरान्त देश लौटे तबसे माना जाने लगा कि वे बीएनपी का भविष्य हैं। वैसे भी बेगम जिया का स्वास्थ्य जिस तेजी से बिगड़ रहा था उसे देखते हुए तारिक उत्तराधिकारी के तौर पर उभर रहे थे। और जब चुनाव नामांकन के दौरान ही उनकी माँ चल बसीं तब सहानुभूति की लहर पर सवार होकर वे बांग्लादेश के नए निर्वाचित प्रधानमंत्री बन सकते हैं। लेकिन  इस देश की तासीर को देखते हुए कुछ भी पक्के तौर पर कह पाना कठिन है क्योंकि जिन युवाओं ने शेख हसीना के विरुद्ध जनांदोलन किया उन्होंने सीएनपी नामक पार्टी बनाकर कट्टरपंथी जमायत ए इस्लामी से गठजोड़ कर लिया जिस पर हसीना सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा था । यूनुस ने सत्ता में आते ही उसे हटाकर कट्टरपंथी ताकतों का हौसला बढ़ाया। सीएनपी  के पक्ष में युवाओं का  झुकाव देखते हुए ये गठबंधन बीएनपी की राह में रोड़ा अटकाए बिना नहीं रहेगा। हाल ही में युवाओं के नेता हादी की हत्या के बाद हुए हिंसक आंदोलन के बाद ये आशंका भी है कि यूनुस किसी न किसी बहाने चुनाव टालते रहेंगे जिससे सत्ता की कमान उनके हाथ से न निकले। अब जबकि खालिदा का निधन हो चुका है तब सभी की निगाहें उनके पुत्र तारिक पर जमी हैं। फिलहाल बांग्लादेश में कद्दावर राजनेताओं का अभाव होने से राजनीति का  दूसरा धड़ा कट्टरपंथी जमायत के अलावा ऐसे युवाओं के हाथ में आ गया है जिनकी कोई स्पष्ट सोच नहीं है। ऐसे में तारिक  प्रधानमंत्री बनने में सफल होंगे ये अनिश्चित है। हालांकि इस समय देश में उनकी पार्टी ही राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद है लेकिन 17 वर्षों तक देश से बाहर रहने के कारण वे जनता से अपना जुड़ाव किस हद तक स्थापित कर पाएंगे ये बड़ा सवाल है। रही बात भारत की तो ये सर्वविदित है कि चाहे तारिक सत्ता संभालें या किसी अन्य की किस्मत जोर मारे लेकिन ये तय है कि बांग्लादेश में इस समय भारत विरोधी तत्वों का बोलबाला है। खालिदा भी भारत के  प्रति शत्रुता का भाव रखती थीं । इस प्रकार समूचा बांग्लादेश  वर्तमान में भारत विरोधी ताकतों के हाथ में है। अवामी लीग मुकाबले से बाहर है और हिन्दू समुदाय आतंक  के साये में है। ऐसे में चुनाव के बाद भी स्थिरता लौटेगी इसमें संदेह है। सबसे बड़ा  सवाल ये है कि क्या यूनुस हाथ आई सत्ता इतनी आसानी से छोड़ देंगे ? और ये भी कि शेख हसीना का तख्ता पलटने वाले युवाओं के नेता क्या तारिक को आसानी से अपना नेता स्वीकार कर लेंगे क्योंकि जिस भ्रष्टाचार के कारण हसीना को सत्ता से उतरने बाध्य किया गया वैसे ही तो खालिदा और उनकी पार्टी पर लगे थे और देश छोड़ने से पहले तारिक भी भ्रष्टाचार से जुड़े होने के आरोप में गिरफ्तार हुए थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

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