प .बंगाल में एस.आई.आर का पहला चरण पूरा हो चुका है। चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों की सघन जाँच के बाद उसका प्राथमिक प्रकाशन कर दिया। जारी आंकड़ों के अनुसार, कुल 58,20,898 नाम मसौदा सूची से हटाए गए हैं। इनमें सबसे ज्यादा 24,16,852 लोग मृत पाए गए, जबकि 19,88,076 लोग स्थानांतरित हो चुके थे। इसके अलावा 12,20,038 लोग लापता, 1,38,328 नाम डुप्लीकेट और 57,604 अन्य श्रेणी में पाए गए। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए की जा रही है। इसके बाद अब जिन मतदाताओं के नाम काटे गए उनको आपत्ति व्यक्त कर आवश्यक दस्तावेजों के जरिये नाम जुड़वाने का अवसर मिलेगा जैसा बिहार में देखने मिला था। प. बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बैनर्जी एस. आई. आर के विरोध में आंदोलन करती रहीं । उन्होंने शासकीय कर्मचारियों को चुनाव आयोग से असहयोग करने भी भड़काया । यहाँ तक कि महिलाओं को एस. आई. आर करने आये लोगों को रसोई के उपकरणों से पीटने जैसा बयान भी जारी किया किंतु उनका मंसूबा धरा रह गया और चुनाव आयोग ने राज्य सरकार के असहयोग के बाद भी अपना काम पूरा कर दिखाया । आयोग देश के 12 राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण का अभियान चला रहा है। हालांकि सभी गैर भाजपा शासित राज्यों की सरकारें इसका विरोध कर रही हैं किंतु उसने निःसंकोच अपना काम जारी रखा। सबसे रोचक बात ये रही कि राजनीतिक दलों के विरोध के बाद भी जनता ने इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में उत्साहपूर्वक सहयोग किया। इसका उदाहरण बिहार है जहाँ एस. आई. आर में 65 लाख नाम कटने के बाद 16 लाख नये मतदाताओं ने अपना पंजीयन करवाया। इसके बाद मतदान के प्रतिशत में आये उछाल ने भी एस. आई. आर की सार्थकता पर मोहर लगा दी। आशय ये है कि चुनाव आयोग द्वारा संचालित इस प्रक्रिया ने लोगों में मतदाता बनने और मतदान करने के प्रति उत्साह में वृद्धि की। बिहार में जब एस. आई. आर का ऐलान हुआ तब विपक्ष ने ये दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया कि इसके जरिये भाजपा विरोधी मतदाताओं के नाम चुन- चुनकर काटे जाएंगे। उनका इशारा मुख्य रूप से मुस्लिम मतदाताओं की तरफ था। जब 65 लाख नाम कटने वाली मतदाता सूची का पहला प्रकाशन हुआ तब ऐसी आशंका जताई गई कि लाखों लोग सड़कों पर उतर आयेंगे। लेकिन पत्ता भी नहीं खड़का। हालांकि नाम कटने वाले काफी लोगों ने आपत्ति दर्ज करवाकर अपना मताधिकार सुरक्षित रखा किंतु अंतिम सूची में तकरीबन 45 लाख नाम अलग हुए जो बड़ी संख्या थी। इसके कारण मतदाता सूचियाँ शुद्ध हुईं और मतदान शांतिपूर्ण हुआ क्योंकि अवैध मतदाता परिदृश्य से बाहर थे। अब जबकि चुनाव आयोग ने प. बंगाल में भी मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित कर दी जिसमें 58 लाख नाम अलग किये गए तब ममता और उनकी पार्टी का दायित्व है कि यदि चुनाव आयोग द्वारा गलत तरीके से नाम काटे गए तो वह अपने कैडर के जरिये उनको मताधिकार दिलवाने आगे आये। अन्यथा ये माना जायेगा कि चुनाव आयोग विरोधी उनका प्रचार महज राजनीतिक प्रोपेगंडा है। रोचक बात ये है काटे गए 58 लाख लोगों में 24 लाख तो दुनिया में ही नहीं है। इस आंकड़े में मामूली गलती तो मानी जा सकती है किंतु इसे पूरी तरह गलत मान लेना भी सच्चाई से नजरें चुराने जैसा है। एस. आई. आर में भाजपा विरोधी मतदाताओं के नाम काटे जाने का आरोप भी निराधार ही है क्योंकि चुनाव आयोग तो क्या राजनीतिक पार्टियों के लिए भी ये असंभव है कि वे अपने समर्थक अथवा विरोधी प्रत्येक मतदाता की पहचान कर सकें। इसकी वजह ये है कि कोई भी आसानी से अपनी पसंद की पार्टी या प्रत्याशी का नाम उजागर नहीं करता। कुल मिलाकर चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों का प्राथमिक प्रकाशन कर गेंद ममता बैनर्जी के पाले में डाल दी है। देखना ये है कि इस प्रक्रिया को अनावश्यक और लोकतंत्र विरोधी साबित करने पर आमादा ममता और उनकी पार्टी इस प्रारूप सूची में काटे गए कितने नाम जोड़े जाने लायक साबित कर पाती हैं क्योंकि आयोग ने तो जो किया उसे सार्वजनिक करते हुए अपने काम को प्रामाणिक बना दिया , अब बारी ममता की है अपने आरोप साबित करने की।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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