बिहार चुनाव के बाद देश की राजनीति में बड़े बदलाव की आहट महसूस की जा रही है। इसका पहला बड़ा संकेत तो भाजपा ने बिहार सरकार में मंत्री नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर दे दिया जो मात्र 45 वर्ष के हैं। उनका चयन जिस गोपनीय तरीके से हुआ उससे राजनीतिक विश्लेषक ही नहीं बल्कि अंतरिक्ष से पाताल तक की जानकारी रखने का दावा करने वाले खबरखोजी पत्रकार तक आश्चर्यचकित रह गए। इस नियुक्ति से भाजपा ने तीसरी पीढ़ी के हाथ में नेतृत्व देने का संकेत दिया है। पार्टी में तमाम ऐसे चेहरे हैं जिनको संगठन के काम का समुचित अनुभव तो है ही , चुनावी व्यूहरचना में भी महारत हासिल है। लेकिन बिहार सरकार के एक युवा मंत्री को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर मोदी - शाह की जोड़ी ने एक बार फिर सबको चौंका दिया। हालांकि अभी ये तय नहीं है कि वे ही स्थायी अध्यक्ष बनेंगे या प. बंगाल का चुनाव होने के बाद किसी अन्य को संगठन की बागडोर सौंपी जाएगी? लेकिन इस निर्णय ने अन्य पार्टियों के युवा नेताओं में खलबली मचा दी है जिनकी महत्वाकांक्षाएं वरिष्ट नेताओं के लदे रहने से अकाल मौत झेलने मजबूर हैं। बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर भी बेचैनी है। भले ही कोई कुछ न कहे लेकिन राहुल गाँधी की क्षमता पर पार्टी के भीतर अविश्वास बढ़ता जा रहा है। उनकी रहस्यमय विदेश यात्राओं का औचित्य समझ से परे है। इसकी वजह से ही इंडिया गठबंधन भी उदासीन पड़ा है। उसमें शामिल पार्टियां कांग्रेस विशेष रूप से श्री गाँधी की अव्यवहारिक शैली से परेशान हैं। खबर है कि जनसुराज पार्टी की करारी हार के बाद प्रशांत किशोर चुनाव रणनीतिकार का पुराना काम शुरू करने के लिए अवसर तलाश रहे हैं। यद्यपि बिहार में उनकी पार्टी द्वारा जमानत जप्ती का कीर्तिमान स्थापित करने के कारण प्रशांत की पेशेवर दक्षता सवालों के घेरे में आ गई है किंतु प्रियंका वाड्रा से उनकी ताजा मुलाकात के बाद ये खबर तेज है कि कांग्रेस उनकी सेवाएं उ.प्र विधानसभा के अगले चुनाव में लेने पर विचार कर रही है। प्रशांत ने इसके लिए शर्त रखी है कि कांग्रेस गठबंधन की राजनीति से मुक्त होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व दोबारा कायम करे। स्मरणीय है बिहार चुनाव के दौरान भी वे सार्वजनिक तौर पर ये कहते सुने गए कि कांग्रेस को राजद से पिंड छुड़ा लेना चाहिए। उस चुनाव में राहुल और तेजस्वी के बीच जिस तरह की खींचातानी दिखी उससे ये एहसास होने लगा था कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन से ऊब चुकी है। कुछ दिनों से ये चर्चा जोरों पर है कि भाजपा जहाँ क्षेत्रीय दलों को हजम कर रही है वहीं क्षेत्रीय दल कांग्रेस को खा रहे हैं। प्रशांत , कांग्रेस के साथ कितना जुड़ेंगे ये अभी निश्चित नहीं है लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि कांग्रेस भी अब क्षेत्रीय दलों से दूर होने की इच्छुक है। उ.प्र के अलावा अन्य राज्यों में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में वह अकेले लड़ने का ऐलान कर चुकी है। अखिलेश यादव के अलावा उद्धव ठाकरे और शरद पवार से राहुल की पटरी नहीं बैठ रही। वोट चोरी का जो आरोप श्री गाँधी आये दिन लगाया करते हैं उसका जनमानस पर खास असर नजर नहीं आ रहा। दिल्ली में कांग्रेस द्वारा आयोजित रैली भी उतनी प्रभावशाली नहीं रही जितना उसका प्रचार हुआ था। इन सबका असर इंडिया गठबंधन के भविष्य पर पड़ना तय है। चूंकि लोकसभा चुनाव अभी दूर हैं इसलिए उसके पहले होने वाले चुनावी मुकाबलों में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों की बैसाखियाँ त्यागकर अपने पैरों पर खड़े होने का फैसला ले सकती है। हालांकि इसके लिए उसे नीति और नेतृत्व दोनों स्तरों पर बड़े सुधार करने होंगे। बीते कुछ दिनों में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित कुछ अन्य वरिष्ट नेताओं को सार्वजनिक रूप से जो उपेक्षा झेलनी पड़ी उससे अच्छे संदेश नहीं गये । शशि थरूर लगातार राहुल द्वारा बुलाई बैठकों में आने से बच रहे हैं । वहीं प्रियंका वाड्रा द्वारा ईवीएम का विरोध किये जाने के बावजूद सुप्रिया सुले ने लोकसभा में कह दिया मुझे उससे शिकायत नहीं क्योंकि मैं चार चुनाव ईवीएम होते हुए भी जीती। भाजपा पर वोट चोरी के श्री गाँधी के आरोपों से इतर प. बंगाल में अधीर रंजन चौधरी, ममता बैनर्जी पर 60 लाख फ़र्जी वोट बनाने का आरोप लगाकर भाजपा की बात को सच साबित कर रहे हैं। ये स्थिति कांग्रेस के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती। उसे बिना समय गंवाये अपनी दिशा स्पष्ट करनी चाहिए। आज की तारीख में न वह गठबंधन के साथ सामंजस्य बिठाने में सफल है और न ही अकेले चलने का साहस ही दिखा पा रही है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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