रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत दौरा ऐसे समय हो रहा है जब वैश्विक राजनीति में उथलपुथल मची हुई है। यूक्रेन और रूस के बीच चले आ रहे युद्ध ने पूरी दुनिया को दो धड़ों में बाँट दिया है। हालांकि सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस ने साम्यवादी विचारधारा पर आधारित सामाजिक आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को तिलांजलि दे दी। इसकी वजह से अमेरिका और यूरोप के साथ उसके व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्ते काफी सुधरे। इसका एक कारण ये भी है कि सोवियत संघ का विखंडन अमेरिका की दूरगामी योजना का ही हिस्सा था। विश्व व्यापार संगठन के प्रादुर्भाव के बाद अर्थव्यवस्था का जो वैश्वीकरण हुआ उसने पूरी दुनिया को बड़े बाजार में तब्दील कर दिया। रूस ही नहीं बल्कि साम्यवाद की कट्टरता के पक्षधर चीन तक ने उदारवादी आर्थिक नीतियों को अंगीकार कर लिया। इसमें दो मत नहीं कि बीते तीन दशक में चीन दोध्रुवीय दुनिया की व्यवस्था को बदलकर अमेरिका तथा रूस की टक्कर में आर्थिक, वैज्ञानिक और सामरिक शक्ति बन बैठा। उसके साथ ही भारत ने भी विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का बीड़ा उठाते हुए सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का गौरव हासिल कर लिया जिससे दुनिया के ताकतवर देशों के किसी भी जमावड़े में भारत की मौजूदगी अनिवार्य बन गई है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भारत ने कूटनीतिक स्तर पर भी खुद को स्थापित किया और यही वजह है कि सभी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर वे प्रभाव छोड़ देते हैं। रूस के राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा इसका प्रमाण है। यूक्रेन युद्ध के पहले से ही दोनों के बीच काफी मधुर संबंध विकसित हो चुके थे। इसीलिए उस युद्ध के शुरू होने के बाद भारत ने अमेरिकी दबाव को दरकिनार करते हुए तटस्थता का रास्ता चुना। यद्यपि परोक्ष रूप से ये नीति रूस का समर्थन थी क्योंकि अमेरिका सहित समूचे यूरोप ने पर कठोर प्रतिबंध लगाकर उसके साथ व्यापारिक रिश्ते खत्म कर दिये । इसका उद्देश्य रूस की आर्थिक कमर तोड़ना था ताकि वह युद्ध को लंबा न खींच सके। लेकिन तब भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदकर उसे जबरदस्त सहारा दिया। हालांकि उस खरीद से हमको भी बड़ा लाभ हुआ क्योंकि रूस ने भारत को रूपये में भुगतान की सुविधा प्रदान की। लेकिन इसकी वजह से भारत को अमेरिकी नाराजगी झेलनी पड़ी । डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनते ही टैरिफ नामक हथियार का प्रयोग करते हुए रूस से व्यापारिक रिश्ते तोड़ने का दबाव बनाया। लेकिन श्री मोदी ने उसके सामने झुकने से इंकार करते हुए रूस से रिश्ते और मजबूत करने का संकेत दिया। ट्रम्प को यह नागवार गुजरा और वे भारत को परेशान करने नये - नये तरीके अपनाने लगे। लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। दूसरी तरफ पुतिन भारत के प्रति अपना दोस्ताना जाहिर करने में आगे - आगे रहे। चीन में हुई एस.सी.ओ ( शंघाई सहयोग संगठन) की बैठक में उन्होंने श्री मोदी को अपनी कार में बिठाकर पूरी दुनिया को संदेश दे दिया। गत दिवस उनके नई दिल्ली आगमन पर श्री मोदी ने भी उनको अपने वाहन में बिठाकर ट्रम्प को बता दिया कि भारत उनकी धौंस से अप्रभावित है। पुतिन की इस यात्रा में रक्षा क्षेत्र में बड़े सौदों के अलावा काफी ऐसे समझौते हो रहे हैं जिनसे द्विपक्षीय व्यापार में और वृद्धि होगी। एक दूसरे के सैन्य क्षेत्र का उपयोग करने के बारे में जो सहमति बनने की खबर है वह इस उपमहाद्वीप के शक्ति संतुलन को गहराई तक प्रभावित करेगी। पुतिन की इस यात्रा को विश्व मीडिया ने जिस तरह बढ़ - चढ़कर प्रचारित किया उससे इसका महत्व साबित हो गया है। रूसी राष्ट्रपति ने नई दिल्ली आकर श्री मोदी के बारे में जो कुछ कहा उससे डोनाल्ड ट्रम्प निश्चित तौर पर भन्नाए होंगे किंतु भारत ने सदैव इस बात पर जोर दिया है कि वह अपने हितों को ध्यान रखकर ही अपनी विदेश और व्यापार नीतियां तय करेगा और किसी का दबाव उसे स्वीकार नहीं है। श्री मोदी और पुतिन के बीच की आपसी समझ का दिन ब दिन मजबूत होना दोनों के लिए शुभ संकेत है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका भारत विरोधी रुख पर आमादा है तो रूस जैसी महाशक्ति खुलकर हमारे साथ है। पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद अमेरिका जहाँ खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़ा नजर आया वहीं चीन ने दबी जुबान ही सही किंतु उसके प्रति हमदर्दी दिखाई । इन दोनों महाशक्तियों द्वारा भारत के जन्मजात दुश्मन की पीठ पर हाथ रखने के बाद भी भारत विचलित नहीं हुआ तो उसका बड़ा कारण रूस का ठोस समर्थन ही था। इस यात्रा से श्री मोदी और पुतिन की नजदीकी और बढ़ेगी। इस संबंध में ये बात ध्यान रखने वाली है कि जितनी जरुरत आज भारत को रूस के समर्थन, सहयोग और संरक्षण की है उतनी ही रूस को भी भारत का साथ आवश्यक है। महाशक्ति होने के बाद भी पुतिन विश्व समुदाय में अकेले पड़ते जा रहे थे किंतु श्री मोदी जैसे दिग्गज नेता के साथ जुगलबंदी से उन्हें हाशिये पर धकेलने की अमेरिकी कूटनीति अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पा रही।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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