गत दिवस प्रारंभ चैत्र नवरात्रि पर पूरे देश में जो उत्साह नजर आया उसका प्रमाण सोशल मीडिया के पर देखने मिला। ये आभासी माध्यम चाहे न चाहे जनमत के रुझान का मापदंड बनता जा रहा है। यद्यपि ऐसे लोग हैं जो हिंदुत्व के बहाने राष्ट्रवाद का विरोध करते हैं। इन्हें कभी अफज़ल गुरु में नायक दिखता है तो कभी उमर खालिद में। एक समय था जब कन्हैया कुमार इन्हें क्रांतिदूत प्रतीत होता था । लेकिन जब वह अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा होते न देख कांग्रेस में चला गया तबसे दिन रात मोदी और भाजपा को गाली देने वाली दुराग्राही जमात खाली हाथ थी। एक समय था जब अरविंद केजरीवाल को मोदी का विकल्प बनाने का सुनियोजित प्रयास हुआ। लेकिन दिल्ली के हालिया चुनाव में केजरीवाल का सफाया हो गया। मात्र 10 वर्ष में राष्ट्रीय पार्टी बनकर इतराने वाली आम आदमी पार्टी उसी दिल्ली में औंधे मुंह गिरी जहाँ से उसका उत्थान शुरू हुआ था। लोकसभा चुनाव में इसी जमात ने राहुल गाँधी को महानायक के रूप में स्थापित करने के लिए खूब हाथ - पाँव मारे किंतु पांसे उल्टे पड़े। और फिर हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली के चुनाव ने विपक्ष की कृत्रिम एकता के गुब्बारे की हवा निकाल दी। इसके बाद से विपक्षी बिरादरी तो बौखलाई है ही किंतु अवार्ड वापसी गैंग और मुख्य धारा से बाहर हो चुके चन्द पत्रकार भी आपा खोने लगे हैं। विदेशी ताकतों के इशारे पर भारत को अस्थिर करने की हर कोशिश अब तक यदि कामयाब नहीं हो सकी तो उसका कारण राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रति जनमानस में बढ़ता आकर्षण ही है। लोकसभा चुनाव में अति आत्मविश्वास के कारण भाजपा स्पष्ट बहुमत से थोड़ा पीछे रह गई और चंद्रबाबू नायडू तथा नीतीश कुमार के समर्थन से नरेंद्र मोदी सत्ता में लौटे तो हिन्दू समाज अपराधबोध से ग्रसित हो गया। दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय के अलावा टुकड़े - टुकड़े गिरोह जीत के जश्न में डूब गया। राहुल गाँधी तो संसद में ऐसा व्यवहार करने लगे मानो सरकार उनकी अगुआई में विपक्ष ने बनाई हो। अयोध्या, चित्रकूट और नासिक जैसे तीर्थ स्थलों में भाजपा की पराजय को हिंदुत्व के पराभव के तौर पर खूब हवा दी गई जिसकी हिन्दू समाज में तीखी प्रतिक्रिया हुई। इसीलिए जिस हरियाणा में लोकसभा की आधी सीटें भाजपा हार गई और महाराष्ट्र में उसका प्रदर्शन बेहद खराब रहा वहाँ विधानसभा चुनाव में उसने बाजी पूरे तौर पर पलट दी , जिसका कारण हिंदुत्व ही था। दिल्ली में लगातार लोकसभा की सातों सीटें जीतने के बाद भी भाजपा विधानसभा चुनाव में केजरीवाल के करिश्मे को नहीं तोड़ पा रही थी किंतु वह तिलिस्म भी टूट गया। उत्तर प्रदेश के विधानसभा उप चुनावों में भी भाजपा ने अपनी कोई जमीन दोबारा हासिल कर ली। अयोध्या से सटी मिल्कीपुर सीट में तो जीत के अंतर ने विपक्ष की बोलती बन्द कर दी। दरअसल विपक्ष देश के मूड को पढ़ पाने में विफल साबित हो रहा है। जम्मू - कश्मीर और झारखंड जैसी सफलताएं बेशक उसके खाते में आईं किंतु वे मुख्यधारा को प्रभावित नहीं कर सकीं। प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ से दूरी बनाकर विपक्षी नेताओं ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। उनकी चापलूसी में लगे रहने वाले यू ट्यूब चैनल भी महाकुंभ की भव्यता एवं जनता में उसके प्रति श्रद्धा की उपेक्षा करते हुए कमियां तलाशने में जुटे रहे। राहुल तो कई बार तारीखें बताने के बाद भी प्रयागराज नहीं पहुंचे। लेकिन जब रोजा इफ्तार की दावतों में तमाम विपक्षी नेता शिरकत करते दिखे तो ये लगा जैसे हिंदुओं को चिढ़ाया जा रहा है। छावा नामक फिल्म के प्रदर्शित होने के बाद जिस तरह से औरंगजेब को महिमामंडित करने की मुहिम चलाई जा रही है वह सिवाय भड़ास के और कुछ नहीं हो सकता। जनता से मिल रहे अभूतपूर्व समर्थन से उत्साहित भाजपा ने भी बिना लाग - लपेट के हिंदुत्व के साथ अपना जुड़ाव सार्वजनिक कर दिया। हिन्दू नव वर्ष पर नजर आया स्वस्फूर्त उत्साह इसका सबूत है। प्रधानमंत्री ने भी नये हिन्दू वर्ष के शुभारंभ पर नागपुर जाकर रा.स्व.संघ के साथ अपनी वैचारिक नजदीकी को खुलकर व्यक्त कर दिया। संघ के बारे में उन्होंने जो विचार रखे उनमें उनकी निजी आस्था तो थी ही क्योंकि वे भी संघ रूपी गुरुकुल से ही दीक्षित हैं किंतु बतौर प्रधानमंत्री उनका उद्बोधन इस बात का ऐलान है कि सत्ता में आने के बाद भाजपा को हिंदुत्व और संघ से अपना सम्बन्ध व्यक्त करने में न शर्म है और न भय। वरना जनता पार्टी की अच्छी - भली चल रही सरकार को समाजवादियों ने संघ और जनसंघ की निकटता पर दोहरी सदस्यता का विवाद उठाकर गिरवा दिया था। लेकिन समय बदल गया है। हिंदुत्व अब देश की पहिचान बनने लगा है। इसके बाद भी जिन्हें समय की आहट नहीं सुनाई दे रही , वे इस देश और यहाँ की जनता को समझने में विफल हैं। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि वे अभी भी भारत को विदेशी चश्मे से देखते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी