Monday, 31 March 2025

हिन्दू नव वर्ष पर प्रदर्शित उत्साह में छिपे हैं भविष्य के संकेत



गत दिवस  प्रारंभ  चैत्र नवरात्रि पर पूरे देश में जो उत्साह नजर आया उसका प्रमाण सोशल मीडिया के  पर देखने मिला। ये आभासी माध्यम चाहे न चाहे जनमत के रुझान का मापदंड बनता जा रहा है। यद्यपि ऐसे लोग  हैं जो   हिंदुत्व के बहाने राष्ट्रवाद का विरोध करते हैं। इन्हें कभी अफज़ल गुरु में  नायक दिखता है तो कभी उमर खालिद में। एक समय था जब कन्हैया कुमार इन्हें क्रांतिदूत प्रतीत होता था । लेकिन जब वह अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा होते न देख कांग्रेस में चला गया तबसे दिन रात मोदी और भाजपा को गाली देने वाली दुराग्राही जमात खाली हाथ थी। एक समय था जब अरविंद केजरीवाल को  मोदी का विकल्प बनाने का सुनियोजित प्रयास हुआ। लेकिन दिल्ली  के हालिया चुनाव में केजरीवाल का सफाया हो गया।  मात्र 10 वर्ष में राष्ट्रीय पार्टी बनकर इतराने वाली आम आदमी पार्टी उसी दिल्ली में औंधे मुंह गिरी जहाँ से उसका उत्थान शुरू हुआ था। लोकसभा चुनाव में इसी जमात ने राहुल गाँधी को महानायक के रूप में स्थापित करने के लिए खूब हाथ - पाँव मारे किंतु पांसे उल्टे पड़े। और फिर हरियाणा, महाराष्ट्र और  दिल्ली के चुनाव ने विपक्ष की कृत्रिम एकता के गुब्बारे की हवा निकाल दी। इसके बाद से विपक्षी  बिरादरी तो बौखलाई है ही किंतु अवार्ड वापसी गैंग और मुख्य धारा से बाहर हो चुके चन्द पत्रकार भी आपा खोने लगे हैं। विदेशी ताकतों के इशारे पर भारत को अस्थिर करने की हर कोशिश  अब तक यदि कामयाब नहीं हो सकी तो उसका कारण राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रति जनमानस में बढ़ता आकर्षण ही है। लोकसभा चुनाव में अति आत्मविश्वास के कारण  भाजपा स्पष्ट बहुमत से थोड़ा पीछे रह गई और चंद्रबाबू नायडू तथा नीतीश कुमार के समर्थन से नरेंद्र मोदी सत्ता में लौटे तो हिन्दू समाज अपराधबोध से ग्रसित हो गया। दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय के अलावा टुकड़े - टुकड़े गिरोह जीत के जश्न में डूब गया। राहुल गाँधी तो संसद में ऐसा व्यवहार करने लगे मानो सरकार उनकी अगुआई में विपक्ष ने बनाई हो। अयोध्या, चित्रकूट और नासिक जैसे  तीर्थ स्थलों में भाजपा की पराजय को हिंदुत्व के पराभव के तौर पर खूब हवा दी गई जिसकी हिन्दू समाज में तीखी प्रतिक्रिया हुई। इसीलिए  जिस हरियाणा में लोकसभा की आधी सीटें भाजपा हार गई और महाराष्ट्र में उसका प्रदर्शन बेहद खराब रहा वहाँ विधानसभा चुनाव में उसने बाजी पूरे तौर पर पलट दी , जिसका कारण हिंदुत्व ही था। दिल्ली में लगातार लोकसभा की सातों सीटें जीतने के बाद भी भाजपा विधानसभा  चुनाव में  केजरीवाल के करिश्मे को नहीं तोड़ पा रही थी किंतु वह तिलिस्म भी टूट गया। उत्तर प्रदेश के विधानसभा उप चुनावों में भी भाजपा ने अपनी कोई जमीन दोबारा हासिल कर ली। अयोध्या से सटी मिल्कीपुर सीट में तो जीत के अंतर ने विपक्ष की बोलती बन्द कर दी। दरअसल  विपक्ष देश के मूड को पढ़ पाने में विफल साबित हो रहा है। जम्मू - कश्मीर  और झारखंड जैसी सफलताएं बेशक उसके खाते में आईं किंतु वे मुख्यधारा को प्रभावित नहीं कर सकीं। प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ से दूरी बनाकर विपक्षी नेताओं ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। उनकी चापलूसी में लगे रहने वाले यू ट्यूब चैनल भी महाकुंभ की भव्यता एवं जनता में उसके प्रति श्रद्धा की उपेक्षा करते हुए कमियां तलाशने में जुटे रहे। राहुल तो कई बार तारीखें बताने के बाद भी प्रयागराज नहीं पहुंचे। लेकिन जब रोजा इफ्तार की दावतों में तमाम विपक्षी नेता शिरकत करते दिखे तो ये लगा जैसे हिंदुओं को चिढ़ाया जा रहा है। छावा नामक फिल्म के प्रदर्शित होने  के बाद जिस तरह से औरंगजेब  को महिमामंडित करने की मुहिम चलाई जा रही है वह सिवाय  भड़ास के और कुछ नहीं हो सकता। जनता से मिल रहे अभूतपूर्व समर्थन से उत्साहित भाजपा ने भी बिना लाग - लपेट के हिंदुत्व के साथ अपना जुड़ाव सार्वजनिक कर दिया। हिन्दू नव वर्ष पर नजर आया स्वस्फूर्त उत्साह इसका सबूत है।  प्रधानमंत्री ने भी नये हिन्दू वर्ष  के शुभारंभ पर नागपुर जाकर रा.स्व.संघ के साथ अपनी वैचारिक नजदीकी को खुलकर व्यक्त कर दिया। संघ के बारे में उन्होंने जो विचार रखे उनमें उनकी निजी आस्था तो थी ही क्योंकि वे भी संघ रूपी गुरुकुल से ही दीक्षित हैं किंतु बतौर प्रधानमंत्री उनका उद्बोधन  इस बात का ऐलान है कि सत्ता में आने के बाद भाजपा को हिंदुत्व और संघ से अपना सम्बन्ध व्यक्त करने में न शर्म है और न भय। वरना जनता पार्टी की अच्छी - भली चल रही सरकार को समाजवादियों ने संघ और जनसंघ की निकटता पर दोहरी सदस्यता का विवाद उठाकर गिरवा दिया था। लेकिन समय बदल गया है। हिंदुत्व अब देश की पहिचान बनने लगा है। इसके बाद भी जिन्हें समय की आहट नहीं सुनाई दे रही , वे इस देश और यहाँ की जनता को समझने में विफल हैं। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि वे अभी भी भारत को विदेशी चश्मे से देखते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 30 March 2025

मोदी की नागपुर यात्रा ने बहुत कुछ कह दिया





        प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नागपुर में रा.स्व.संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार की समाधि पर जाकर श्रृद्धा सुमन अर्पित करना यूँ तो सामान्य बात है क्योंकि वे भाजपा में आने से पहले संघ के प्रचारक रहे हैं। और फिर संयोगवश आज डॉ. साहब का जन्मदिन भी है। प्रधानमंत्री आज संघ के वर्ष प्रतिपदा उत्सव में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के साथ सम्मिलित हो रहे हैं। उनका संघ मुख्यालय में प्रवास ऐसे समय हुआ जब हाल ही में नागपुर ने  सांप्रदायिक दंगे का कड़वा स्वाद चखा। अन्यथा ये नगर आमतौर शांत  माना जाता था। 

       महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने दंगाइयों के विरुद्ध कठोर कारवाई की जिसकी देश भर के मुसलमानों और उनकी तरफदारी करने वाले तबके में रोषपूर्ण प्रतिक्रिया हुई। नागपुर में हुए दंगे के लिए मुसलमानों ने जिन कारणों को बताया उनकी पुष्टि तो नहीं हो सकी जबकि उनको बहाना बनाकर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने जो तांडव मचाया उसके लिए न तो उनके किसी धर्मगुरु ने अफसोस व्यक्त किया और न ही राजनेता ने। उल्टे ये धमकियाँ सोशल मीडिया पर सुनने  मिलीं कि ये तो शुरुआत है, आगे भी ऐसी ही घटनाएं होती रहेंगी। 
      हालांकि राज्य सरकार ने उपद्रवियों की धरपकड़ करते हुए दंगे के सरगना के अवैध निर्माण पर भी बुलडोजर चला दिया किंतु उस दंगे के बाद देश भर के हिन्दू समुदाय में भय और चिंता व्याप्त हो गई। महाराष्ट्र सरकार पर भी सवाल उठे क्योंकि नागपुर मुख्यमंत्री श्री फड़नवीस का गृहनगर है। 

     ऐसे में प्रधानमंत्री श्री मोदी का हिन्दू नव वर्ष पर संघ मुख्यालय पहुँचकर संघ संस्थापक की समाधि पर पुष्प अर्पित करना केवल औपचारिकता नहीं बल्कि इसका निहितार्थ ये है कि संघ और भाजपा के बीच समन्वय यथावत  है। लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के उस बयान ने काफी सनसनी फैलाई  कि भाजपा को संघ की आवश्यकता नहीं रह गई है।  चुनाव के परिणामों के बाद संघ और भाजपा के  रिश्तों में तल्खी को लेकर भी काफी कहानियाँ गढ़ी गईं। लेकिन हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली के चुनाव में भाजपा की प्रचंड विजय के बाद उक्त अवधारणा निर्मूल साबित हो गई। संघ विरोधियों ने भी माना कि  उक्त तीनों राज्यों में संघ की संगठनात्मक जमावट ने भाजपा को  जीत ही नहीं दिलाई अपितु लोकसभा चुनाव के बाद उसके मनोबल में आई गिरावट को भी रोक दिया। 

     देश में हिंदुत्व का जो उभार देखने में आ रहा है वह तभी कायम रह सकेगा जब भाजपा और संघ के बीच तालमेल पूरी तरह बना रहे। प्रधानमंत्री की कार्यशैली को लेकर ये प्रचार भी होता आया है कि उनके और सरसंघचालक डॉ. भागवत के बीच मतभेद हैं। भाजपा के नये अध्यक्ष के चयन में विलम्ब के लिए भी यही कारण बताया जा रहा है। लेकिन वर्ष प्रतिपदा के दिन जब महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा की धूम है और औरंगजेब सम्बन्धी विवाद के चलते हिंदुत्व की भावना खुलकर सामने आई है तब श्री मोदी का नागपुर प्रवास बिना कहे ही उन प्रश्नों का जवाब है जो लम्बे समय से उठाये जा रहे थे। 

    राजनीति में टाइमिंग का बड़ा महत्व होता है और श्री मोदी इसमें बेहद माहिर हैं। इसीलिए उनका आज का नागपुर दौरा केवल प्रधानमंत्री का नहीं बल्कि एक स्वयंसेवक का प्रवास है। इस दौरे का संदेश बहुत ही व्यापक है। भाजपा और संघ में मतभेद का शिगूफा छोड़ने वालों को इस यात्रा ने निराश कर दिया। सच बात तो ये है कि यू ट्यूब पर देश के मिजाज को अपनी मर्जी के मुताबिक बदलने का ख्वाब देखने वाली कुंठित लोगों की जमात अब तक न मोदी को समझ सकी और न ही संघ को। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


     

Saturday, 29 March 2025

दुनिया के साथ - साथ पडोस में बदलते हालात में भारत को सतर्क रहना होगा


दुनिया भर में इस समय उथल पुथल मची है। यूक्रेन और रूस के बीच चल रही जंग रुकने का नाम नहीं ले रही। उधर डोनाल्ड ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति बनते ही अमेरिका अपने पड़ोसी कैनेडा और मेक्सिको के अलावा यूरोप के अपने पुराने साथी देशों के साथ पंगा ले रहा है। ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की ट्रम्प की धमकी से तनाव बढ़ता जा रहा है । ट्रम्प और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के बीच बढ़ते तालमेल से कूटनीतिक संतुलन में बड़े बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। प. एशिया में भी भारी उथलपुथल है। ट्रम्प के दबाव में भले ही इसरायल और हमास के  बीच कुछ समय के लिए युद्धविराम हो गया और युद्ध बंदियों की रिहाई भी दोनों तरफ से हुई किंतु इसरायल ज्यादा देर तक धैर्य नहीं रख सका और गाजा पट्टी में बारूद की वर्षा फिर शुरू कर दी। ट्रम्प द्वारा गाजा पर कब्जा कर उसका विकास किये जाने की बात से भी दुनिया भौचक है। उधर गाजा में हमास के विरुद्ध जनता के सड़कों पर उतरने से प. एशिया के हालात में चौंकाने वाला बदलाव आने की अटकलें लगने लगी हैं। इधर पाकिस्तान के अंदरूनी हालात भी दिन ब दिन गंभीर होते जा रहे हैं। अफगानिस्तान ने सीमांत इलाकों में पाकिस्तान को युद्ध जैसी स्थिति में उलझा रखा है वहीं बलूचिस्तान ने आजादी के लिए निर्णायक लड़ाई छेड़ दी है। उसे देखते हुए पाक अधिकृत कश्मीर में भी पाकिस्तान के विरुद्ध गुस्सा बढ़ता जा रहा है। वैश्विक स्तर पर तेजी से चल रहे घटनाचक्र से भारतीय विदेश नीति के साथ ही अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। ट्रम्प द्वारा आयात शुल्क बढ़ाये जाने के फैसले से भारत के निर्यात पर क्या असर पड़ेगा इसका आकलन किया जा रहा है किंतु कूटनीतिक मोर्चे पर जिस तरह की अनिश्चितता है उसके बीच भारत को अपना महत्व बनाये रखना आसान नहीं होगा। विशेष रूप से ट्रम्प और पुतिन के बीच नजदीकी से भारत और रूस के बीच चल रही जुगलबंदी में व्यवधान न आये ये चिंता बढ़ने लगी थी किंतु पुतिन के जल्द भारत आने की खबर राहत लेकर आई है जो यूक्रेन जंग के बाद पहली बार रूस से बाहर किसी देश की यात्रा करेंगे। खबर तो ये भी है कि भारत उस युद्ध को खत्म करवाने का माध्यम बन सकता है। लेकिन इस सबके बीच हमारे पड़ोस में हो रही घटनाएं भी नये समीकरणों का संकेत हैं।  पाकिस्तान में गृह युद्ध रूपी ज्वालामुखी बरसों से सुलग रहा था जो अब फटने की स्थिति में आ गया है। वहीं बांग्लादेश में शेख हसीना का तख्ता पलट होने को भारत की रणनीतिक पराजय मानने वालों को बीते कुछ दिनों में वहाँ अंतरिम सरकार के विरुद्ध शुरू हुए छात्र आंदोलन ने अपनी धारणा बदलने मजबूर कर दिया है। ये वही छात्र हैं जिनके उग्र संघर्ष ने हसीना को देश छोड़ने बाध्य कर दिया था। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाईडन उस तख्ता पलट के सूत्रधार थे। जो अंतरिम सरकार ढाका में बनी उसके मुखिया बनाये गए युनुस उसके पहले तक अमेरिका में निर्वासित जीवन बिता रहे थे। हसीना को शरण देने से बांग्लादेश के साथ हमारे रिश्ते दुश्मनी में बदल गए। वहाँ रह रहे हिंदुओं पर जिस तरह के अमानुषिक अत्याचार हुए वे उसी की प्रतिक्रिया थी। लेकिन ट्रम्प ने  सत्ता में आते ही बांग्लादेश को उसके हाल पर छोड़ दिया जिसके कारण उसकी आर्थिक स्थिति गड़बड़ा गई है। धनाभाव में उत्पादन इकाइयां  बन्द होने से लाखों श्रमिक बेरोजगार हो गए। निर्यात  बुरी तरह प्रभावित होने से अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है। जो संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार शेख हसीना की सत्ता में वापसी की जमीन तैयार होने लगी है। और ऐसा हुआ तब भारत द्वारा बांग्लादेश के प्रबल विरोध के बावजूद  उनको पनाह देने का औचित्य साबित हो जाएगा। लेकिन  सबसे ताजा खबर आ रही है पड़ोसी नेपाल से जहाँ माओवादियों के कुशासन से ऊब चुकी जनता हिन्दू राजशाही की वापसी के साथ पूर्व महाराजा ज्ञानेंद्र सिंह की ताजपोशी के लिए सड़कों पर उतर रही है। इस प्रकार हमारे तीनों प्रमुख पड़ोसियों के यहाँ भारत विरोधी सत्ताधीशों के विरुद्ध जन असंतोष खुलकर सामने आ चुका है जो परोक्ष तौर पर चीन का भी विरोध है। यदि बलूचिस्तान और खैबर पख्तून इलाके पाकिस्तान के हाथ से  निकले तब पाक अधिकृत कश्मीर के भी भारत के साथ जुड़ने की संभावना मजबूत होने लगेगी। इसी तरह बांग्लादेश में शेख हसीना और नेपाल में राजशाही यदि लौटती है तो भारत की स्थिति एशिया में और सुदृढ़ हो जायेगी क्योंकि तब चीन के साथ केवल उत्तर कोरिया जैसा देश रह जायेगा। हालांकि वैश्विक स्थिति में जो अनिश्चितता है उसे देखते हुए कुछ भी कह पाना कठिन है लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि पलड़ा भारत के पक्ष में झुकता प्रतीत हो रहा है। मालदीव और श्रीलंका में जो सत्ता परिवर्तन हुआ उसे शुरुआत में भारत विरोधी माना गया किंतु जल्द ही वहाँ के शासकों के सिर से चीन का भूत उतर गया। इस सबके बावजूद ये समय बेहद सतर्कता का है क्योंकि मौजूदा विश्व किसी विचारधारा से प्रेरित होने के बजाय व्यापार से प्रभावित है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 28 March 2025

घुसपैठियों का समर्थन देशहित के विरुद्ध


लोकसभा में गत दिवस आव्रजन एवं विदेशी विधेयक ( इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स बिल) 2025 पारित हो गया। गृह मंत्री अमित शाह ने विधेयक के प्रावधानों पर विस्तार से जवाब देते हुए  कहा कि  वैध पासपोर्ट और वीजा के बिना  भारत में प्रवेश करने पर कानून सम्मत तरीके से सख्त कार्रवाई की जाएगी।विधेयक में जाली दस्तावेजों के लिए कड़ी सजा के प्रावधान किए गए हैं। उन्होंने कहा कि वीजा की अवधि खत्म होने पर भी देश में रहने वालों को तलाश  किया जाएगा। उन्होंने विपक्ष द्वारा पेश संशोधनों का विरोध करते हुए कहा कि हमारा देश कोई धर्मशाला नहीं है। देश की सीमा में कौन आता है, कब आता है, कितनी अवधि तक आता है और किस उद्देश्य से आता है, यह जानने का अधिकार  सरकार के पास है। ऐसा करना सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि प. बंगाल की  450 किलोमीटर की सीमा ममता बेनर्जी  सरकार के कारण अभी तक असुरक्षित है क्योंकि बांग्ला देशी तथा रोहिंग्या घुसपैठिये यहीं से आते हैं। केंद्र सरकार इस सीमा पर कटीले तार लगाना चाहती है जिसके लिए  वे खुद 10 बार पत्र भेजकर राज्य सरकार से भूमि हेतु अपील कर चुके हैं, लेकिन सहयोग नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि तृणमूल  सरकार घुसपैठ करने वाले रोहिंग्या और बांग्लादेशी लोगों को संरक्षण प्रदान करती है। उन्हें आधार कार्ड दिए जाते हैं । इन कारणों से देश की सुरक्षा पर सवाल खड़े होते हैं।  1970 में बांग्लादेश से शरणार्थियों के रूप में जब लोगों का आना शुरू हुआ तब मानवीयता के आधार पर भारत ने उनको पनाह दी। 1971 के अंत तक जब बांग्लादेश बन गया तब स्व. इंदिरा गाँधी ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि शरणार्थियों को वापिस जाना होगा किंतु 1971 में आये शरणार्थियों का वापिस जाना तो दूर रहा , अब तो उनकी तीसरी पीढ़ी भी भारत में रह रही है  क्योंकि राजनीति के सौदागरों ने उनको देश का नागरिक बनाने का पूरा इंतजाम कर दिया। उनके  राशन कार्ड बनाने के बाद उनको मतदाता बनाया गया और जब आधार कार्ड शुरू हुए तब वे भी उन्हें मिल गए। आज भारत के हर हिस्से में बांग्ला देशी फैल चुके हैं। लेकिन पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में तो उनकी जनसंख्या राजनीतिक संतुलन बनाने - बिगाड़ने की क्षमता अर्जित कर चुकी है। बिहार, असम, प. बंगाल में अनेक लोकसभा और विधानसभा सीटों में गैर मुस्लिम प्रत्याशी के जीतने की गुंजाइश खत्म हो चुकी है। इसके अलावा बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के जरिये तस्करी तो होती ही है लेकिन आतंकवादी घटनाओं में भी उनका हाथ प्रमाणित हो चुका है। पाकिस्तान द्वारा प्रवर्तित अनेक भारत विरोधी संगठन बांग्लादेश में कार्यरत हैं। अभी हाल ही में नागपुर में हुए सांप्रदायिक दंगे में भी बांग्लादेशी संगठनों की भूमिका सामने आई है। प. बंगाल में पहले वामपंथी सरकार ने इन घुसपैठियों को बसाने में पूरी मदद की और जब ममता बेनर्जी सत्ता में आईं तो उन्होंने और भी तेजी से घुसपैठियों को मतदाता बनाने में उदारता दिखाई। यही वजह है कि नागरिकता संशोधन विधेयक और नागरिकता रजिस्टर को मुस्लिम विरोधी बताकर ममता सहित ज्यादातर विपक्षी दल घुसपैठियों के बचाव में जुट गए। यहाँ तक कि इंदिरा जी की विरासत थामने वाली कांग्रेस भी उनके साथ खड़ी नजर आती है। उस दृष्टि से आव्रजन और विदेशी विधेयक 2025 देर से उठाया गया सही कदम है। इसका सार गृह मंत्री श्री शाह के इस कथन में निहित है कि भारत कोई धर्मशाला नहीं है। उल्लेखनीय है प. एशिया में उत्पन्न संकट के दौरान जब लाखों लोगों ने अपने देश छोड़े तब मानवता के नाम पर यूरोपीय देशों ने उन्हें शरण दी। लेकिन कुछ ही वर्षों के भीतर  ये मुस्लिम शरणार्थी उनके लिए मुसीबत बन गए। ब्रिटेन , फ्रांस, जर्मनी, डेनमार्क सभी उनसे त्रस्त हैं। भारत में तो बांग्लादेशी और रोहिंग्या मिलाकर करोड़ों की संख्या है। इसलिए नया विधेयक जल्द कानून बने और घुसपैठियों की पहिचान कर जितनी जल्दी हो सके उनको वापिस भेजा जाना  आर्थिक और सामरिक दोनों दृष्टियों से देश हित में होगा। जो नेता और राजनीतिक दल वोटों की लालच में  इन घुसपैठियों की तरफदारी कर रहे हैं उनकी देशभक्ति पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 27 March 2025

ये न्यायिक नियुक्ति आयोग गठित करने का अच्छा अवसर है

इन दिनों न्यायपालिका चर्चा का विषय बनी हुई है । अलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने दो युवकों द्वारा एक नाबालिग बालिका का वक्षस्थल दबाये जाने तथा पायजामे का नाड़ा तोड़ने को बलात्कार के प्रयास की बजाय यौन आक्रमण मानने वाला जो  निर्णय दिया उसकी पूरे देश में रोषपूर्ण प्रतिक्रिया हुई।  ज्यादातर लोगों का अभिमत यही था कि उक्त फैसला पूरी तरह से संवेदनहीन और अविवेकपूर्ण था। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसी आशय की टिप्पणी करते हुए  कहा कि फ़ैसला पूरी तरह से असंवेदनशील और अमानवीय नज़रिए को दिखाता है इसलिए उस पर रोक  ज़रूरी है। इसी के साथ यह भी कहा कि यह फ़ैसला क़रीब चार महीने तक सुरक्षित रखने के बाद  सुनाया गया। इसका मतलब यह है कि जज ने उचित विचार-विमर्श करके और दिमाग लगाने के बाद यह फ़ैसला सुनाया। इस कड़ी टिप्पणी के बाद उच्च न्यायालय के संबंधित न्यायाधीश को तत्काल अपना पद त्याग देना चाहिए क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उनके फैसले को असंवेदनशील और अमानवीय बताया जाना साधारण बात नहीं है। दूसरा जो प्रकरण न्यायपालिका की प्रतिष्ठा धूमिल कर रहा है वह है दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के आवास पर लगी आग बुझाए जाने के दौरान  करोड़ों रुपये के नोटों की गड्डियों का मिलना। न्यायाधीश महोदय घटना के समय पत्नी सहित  म.प्र के किसी पर्यटन स्थल पर थे वरना मामला वहीं दबकर रह जाता। हालांकि  शुरू में विरोधाभासी जानकारी आई। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय तक ने स्पष्टीकरण दिया कि उक्त जानकारी गलत थी और न्यायपालिका की छवि खराब करने का प्रयास किया गया। लेकिन जल्द ही  नोटों की गड्डियों का वीडियो सार्वजनिक हो गया जिसे मजबूरन सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेब साइट पर भी प्रदर्शित किया जाने लगा। मामले की उच्च स्तरीय जांच शुरू हो चुकी है। जिस न्यायाधीश के यहाँ आग लगी उन्होंने मासूूमियत से कह दिया कि गड्डियां उन्होंने नहीं रखीं । उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार का एक पुराना प्रकरण भी उछल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने उनका तबादला  तत्काल अलाहाबाद उच्च न्यायालय करते हुए उन्हें कोई काम न देने का आदेश भी जारी कर दिया। उधर अलाहाबाद के अधिवक्ता उनको वहाँ भेजे जाने के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं। उनका ये कहना कि ये उच्च न्यायालय कूड़ेदान नहीं है उस न्यायाधीश के लिए डूब मरने वाली बात होनी चाहिए किंतु वे निर्विकार बने हुए हैं। इन दो घटनाओं से पूरी न्याय व्यवस्था आरोपों के घेरे में आ गई है। सोशल मीडिया पर ये चुटकुला चल पड़ा है कि जिस देश में न्यायाधीश ही बिकाऊ हों तब वकील की क्या जरूरत ? इसी बीच खबर आ गई कि उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा में  न्यायपालिका से जुड़े विवादों पर बहस करवाने की तैयारी  कर ली है। सरकार भी सर्वदलीय बैठक बुलाकर  न्यायिक नियुक्ति आयोग को दोबारा गठित करने की पहल कर रही है जिसे सर्वोच्च न्यायालय असंवैधानिक घोषित कर चुका है। उल्लेखनीय है श्री धनखड़ कुछ समय से न्यायपालिका पर तीखी टिप्पणियां करते आ रहे हैं। एक बार तो सर्वोच्च न्यायालय ने अटार्नी जनरल के जरिये उनकी टिप्पणियों पर अपना ऐतराज भी व्यक्त किया किंतु सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ट अधिवक्ता रहे श्री धनखड़ उसके बाद भी न्यायपालिका के बारे में बोलने से नहीं रुके। लेकिन संदर्भित दोनों घटनाओं के बाद  न्यायिक नियुक्ति आयोग की उपयोगिता के बारे में वातावरण अपने आप बनने लगा है। स्मरणीय है इस आयोग के गठन का प्रस्ताव लोकसभा द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया। वहीं राज्यसभा में भी केवल राम जेठमलानी ने उसका विरोध किया । लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उसे रद्द कर दिया क्योंकि  वह अस्तित्व में आ जाता तब न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायपालिका के असीमित अधिकार खत्म हो जाते।  आयोग को पुनर्जीवित करने की कोशिश कितनी सफल होगी ये कहना कठिन है क्योंकि ऐसा होने पर कालेजियम की पक्षधर न्यायपालिका और सरकार में सीधा टकराव  निश्चित है।  सेवा निवृत मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ इसके विरोध में सदैव मुखर रहे। दो न्यायाधीशों के विवादग्रस्त हो जाने के बाद न्यायिक नियुक्ति आयोग  एक बार फिर जनचर्चा में आ गया है। उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों के कारनामों से सर्वोच्च न्यायालय भी दबाव में है। जनमत भी कालेजियम नामक व्यवस्था के साथ जुड़ी विसंगतियों के विरुद्ध है। ऐसे में केंद्र सरकार को चाहिए  आयोग के गठन का प्रयास दोबारा करे। विपक्ष का भी दायित्व है कि एक बार फिर इस मामले में साथ दे  वरना न्यायपालिका में सुधार की उम्मीद धूल में मिल जाएगी। न्याय व्यवस्था में जनता का घटता  विश्वास लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 26 March 2025

इस तोहफे से शायद ही कोई लाभ होगा भाजपा को


कांग्रेस , सपा, तृणमूल कांग्रेस, राजद और एनसीपी  पर भाजपा सदैव ये आरोप लगाती आई है कि वे मुसलमानों का तुष्टीकरण करती हैं। हाल ही में कर्नाटक  सरकार  द्वारा ठेकों में मुस्लिमों के लिए आरक्षण किये जाने का भाजपा खुलकर विरोध कर रही है। तीन तलाक़ , सी.ए.ए,  समान नागरिक संहिता ,वक़्फ़ बोर्ड संशोधन,  ज्ञानवापी और श्रीकृष्ण जन्मभूमि जैसे मसलों पर भाजपा और मुस्लिम संगठनों के बीच खुला टकराव चल रहा है। पिछ्ले दिनों होली और जुमा एक ही तारीख़ पर पड़ने के कारण देश के अनेक हिस्सों में टकराव देखने मिले। उसके साथ ही छावा नामक फिल्म प्रदर्शित होने के बाद मुगल बादशाह औरंगजेब के प्रति हिन्दू समुदाय में उत्पन्न गुस्से के कारण बात  औरंगजेब की कब्र हटाने तक जा पहुंची। मुस्लिम समाज मोदी - योगी की जोड़ी के कारण परेशान था ही ऊपर से भाजपा की तमाम राज्य सरकारों ने भी योगी फार्मूला अपनाते हुए दंगाइयों के अवैध निर्माण ढहाने का कदम उठाना शुरू कर दिया । नागपुर के  हालिया दंगे के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने भी बुलडोजर के जरिये मुस्लिम उपद्रवकारियों पर कारवाई शुरू कर दी। उधर वक़्फ़ संशोधन के विरोध में  देश भर में प्रदर्शन हो रहे हैं। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि मुस्लिम समुदाय और भाजपा के बीच 36 का आंकड़ा कायम है। हालांकि पार्टी ने अल्पसंख्यक मोर्चा बना रखा है। अनेक मुस्लिम नेताओं को सांसद और मंत्री भी बनाया किंतु उसके बाद भी बात नहीं बनी। जनसंघ के दौर में बनी  दूरी आज भी कायम है। स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की उदारवादी छवि के चलते कुछ अविश्वास कम होता लगा किंतु  उसके पहले ही राम मंदिर आंदोलन शुरू हो गया जिसके बाद रिश्ते और तल्ख हो गए। बाबरी ढांचा ढहाए जाने के बाद जहाँ हिन्दू समुदाय भाजपा के पक्ष में झुकना शुरू हुआ तो मुसलमान हर उस पार्टी या प्रत्याशी के साथ खड़े होते दिखे जो भाजपा को हराने में सक्षम हो। 2014 में केन्द्र की सत्ता नरेंद्र मोदी के हाथ आ गई जो गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए ही मुसलमानों के लिए असहनीय हो चुके थे। उनके प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भाजपा  हिंदुत्व के मुद्दे पर ज्यों - ज्यों आगे बढ़ती गई मुसलमानों में उसके प्रति खुन्नस और बढ़ने लगी। तीन तलाक़ पर रोक और राम मंदिर के निर्माण ने नाराजगी और बढ़ा दी। वक़्फ़ बोर्ड संशोधन  के कारण भी समूचा मुस्लिम समुदाय भन्नाया हुआ है। पिछले लोकसभा चुनाव में उसने भाजपा को हरवाने के लिए जो रणनीतिक मतदान किया वह बेहद कारगर रहा। दूसरी तरफ भाजपा द्वारा 400 पार का ढोल पीटे जाने से उसके समर्थक अति आत्मविश्वास का शिकार होकर मतदान के प्रति उदासीन रहे जिसके कारण उसे उ.प्र में ही जबरदस्त झटका लगा। फैजाबाद की सीट तक वह हार गई जिसमें अयोध्या विधानसभा आती है। वाराणसी में श्री मोदी की जीत का अंतर बेहद कम होना भी मामूली बात नहीं थी। भाजपा को 240 सीटों पर रोकने में मुस्लिम मतदाताओं की गोलबंदी किसी से छिपी नहीं रही। लेकिन उसके बाद महज 6 महीने में भाजपा ने हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली के विधानसभा चुनाव जीतकर मुस्लिम ध्रुवीकरण  के साथ ही विपक्षी एकता की भी हवा निकाल दी। बंटेंगे तो कटेंगे और एक हैं तो सेफ हैं का नारा काम कर गया। हिंदुत्व राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में मजबूती से खड़ा हो गया। लेकिन अचानक आई इस खबर ने सभी को चौंका दिया कि भाजपा इस बार ईद पर मुस्लिम महिलाओं को एक किट  भेंट करेगी।  अल्पसंख्यक मोर्चे के कार्यकर्ताओं के जरिये देश भर में 32 लाख मुस्लिम महिलाओं तक सौगात - ए - मोदी किट पहुंचाई  जाएगी। इसमें गरीब महिलाओं को प्राथमिकता मिलेगी। दिल्ली से इसकी शुरुआत हो चुकी है। इस किट में कपड़े, मेवे , सेवई और चीनी आदि हैं। पार्टी इसे सबका साथ, सबका विकास नारे से जोड़ते हुए मुस्लिम समुदाय में अपनी पैठ बनाने की कोशिश में है। उसका मानना है तीन तलाक़ पर रोक से मुस्लिम महिलाओं में उसके प्रति झुकाव बढ़ा है। यद्यपि अब तक के चुनावों में इसका कोई असर नजर नहीं आया। अनुभव बताते हैं कि मुस्लिम महिलाओं में पुरुषों के विरुद्ध खड़े होने का साहस नहीं है। धर्मगुरुओं के दबाव के अलावा कमजोर आर्थिक स्थिति भी इसका कारण है। लेकिन भाजपा विरोधियों को जरूर इस कदम से परेशानी हो सकती है।  छवि सुधारने के इस प्रयास का लाभ तो भावी चुनाव परिणाम ही बता सकेंगे किंतु मुफ्त राशन, उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास और पांच लाख रु. तक के इलाज की आयुष्मान भारत योजना का भरपूर लाभ लेने के बाद भी जब मुस्लिम समुदाय ने भाजपा के प्रति लेशमात्र भी झुकाव नहीं दिखाया तब निशान - ए - मोदी से उसमें कोई  परिवर्तन आयेगा ये सोचना सतही तौर पर तो बेमानी लगता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 25 March 2025

सांसदों के वेतन - भत्तों में वृद्धि राजनीतिक मतभेदों को भुला देती है


सांसदों के वेतन ,भत्ते और पेंशन के साथ अन्य सुविधाओं में वृद्धि कर दी गई। मोदी सरकार ने 2018 में नियम बनाया था कि प्रत्येक पाँच वर्ष में उनका पुनरीक्षण किया जाएगा। गत दिवस जारी अधिसूचना के अनुसार 1 अप्रैल 2025 से बढ़ी हुई राशि सांसदों को मिलेगी। लेकिन नई दरें 2023  से लागू किये जाने से पिछली संसद के सदस्यों को दो और नये चुनकर आये सांसदों को एक वर्ष पहले से नया वेतन एवं अन्य वृध्दि का भुगतान होगा। पहले प्रथा ये थी कि सदन में इस आशय का प्रस्ताव अमूमन सत्र के अंतिम दिन लाया जाता  और सर्वसम्मति से ध्वनि मत से पारित हो जाता। उस दृष्टि से पाँच वर्ष में की जाने वाली बढ़ोतरी गलत नहीं है । सांसदों को अपने कर्तव्यों के निर्वहन के लिए पर्याप्त धनराशि और सुविधाएं मिलना आवश्यक है। भ्रमण और सत्कार के अलावा भी उनके बहुत से खर्च होते हैं जिन्हें सूचीबद्ध नहीं किया जा सकता। सत्र के दौरान तो उन्हें बैठक भत्ता मिल जाता है किंतु बाकी समय भी दिल्ली में रहने का खर्च काफी होता है। सामाजिक संपर्क विशेष रूप से विवाह आदि में उपहार जैसे व्यय बढ़ते ही जा रहे हैं। सार्वजनिक आयोजनों हेतु जनप्रतिनिधियों को आर्थिक सहयोग भी देना पड़ता है। जो जानकारी आई है उसके अनुसार सांसदों को तकरीबन 3 लाख प्रतिमाह मिलेंगे जो कि महंगाई को देखते हुए जायज है। एक जमाना था जब सांसदों पर काम का बोझ कम होता था क्योंकि विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ होते थे किंतु जबसे दोनों अलग - अलग होने लगे हैं तबसे  सांसद को भी मतदाताओं के साथ सतत संपर्क में रहना पड़ता है। ऐसे में बढ़ती महंगाई के अनुरूप एक निश्चित समयावधि में उनके वेतन भत्तों का पुनरीक्षण पूरी तरह उचित है। लेकिन अखरने वाली बात है पूर्व सांसदों को दी जाने वाली पेंशन , निःशुल्क यात्रा और चिकित्सा सुविधा। सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए तो नई पेंशन योजना लागू कर दी जिससे उनमें नाराजगी व्याप्त है। ऐसे ही  आम जनता के मन में पूर्व सांसदों को दी जाने वाली पेंशन और अन्य सुविधाओं को लेकर असंतोष है। यदि किसी की आर्थिक वाकई दयनीय है तब तो  समझ में आता है किंतु जो पूर्व सांसद आर्थिक दृष्टि से संपन्न हैं वे भी जब मुफ्त सुविधाओं का लाभ उठाते हैं तब उसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया होती है। इससे भी बड़ी बात ये है कि जरा - जरा सी बात पर एक दूसरे का विरोध करने वाले राजनीतिक दल सांसदों के वेतन - भत्ते बढ़ाये जाने के मामले में एकजुट नजर आते हैं। न तो किसी पार्टी और न ही किसी सांसद द्वारा इस वृद्धि का विरोध सुनाई देगा। बल्कि इसे कम बताया जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सवाल ये है कि जनहित के अन्य मुद्दों पर ऐसा सामंजस्य और सर्वसम्मति क्यों नहीं दिखाई देती ? सदन में तमाम ऐसे विधेयक आते हैं जिनको सार्थक बहस के बाद जल्द पारित किया जाना चाहिए। लेकिन निहित स्वार्थों के चलते गतिरोध उत्पन्न कर उन्हें लंबित कर दिया जाता है। संसद के सत्रों में कितने घंटे काम होता है और कौन सा सांसद कितने समय सदन में रहता है इसका भी खुलासा संसदीय मंत्रालय को करना चाहिए। सदन में एक मिनिट की उपस्थिति मात्र दो हजार का भत्ता पक्का कर देती है जो एक तरह से बेईमानी है। इसी तरह जो सदस्य होहल्ला मचाकर सदन को  चलने नहीं देते उनको  दैनिक भत्ते से वंचित करने के साथ ही काम नहीं तो वेतन नहीं के आधार पर मासिक वेतन में कटौती का नियम बनाया जाए। लाखों मतदाताओं का प्रतिनिधि होने वाले सांसद को अपनी गृहस्थी चलाने के लिए पर्याप्त वेतन- भत्ते  तथा सुविधाएं मिलना जरूरी है किंतु उनके क्रियाकलापों का भी मूल्यांकन होना चाहिए। सदन की कारवाई में बढ़ - चढ़कर हिस्सा लेने और उत्कृष्ट संसदीय आचरण वाले सांसदों में से सर्वश्रेष्ठ सांसद चुने जाने की परंपरा स्वागत योग्य है किंतु पूरे समय मिट्टी के माधो बने बैठे रहने वाले सांसदों के बारे में भी जानकारी प्रसारित होनी चाहिए। संसदीय प्रजातंत्र की सफलता के लिए जनता की जागरूकता बेहद जरूरी है किंतु जनप्रतिनिधियों में दायित्वबोध न हो तो फिर वही होता है जो भारत में लगभग आठ दशक से देखने मिल रहा है। ये देखते हुए जरूरी है कि निकम्मे और निठल्ले सांसदों के बारे में भी जानकारी सार्वजनिक हो। राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे सांसदों का उपयोग केवल हाथ उठाने और हल्ला मचाने के लिए करने के बजाय उन्हें जनसरोकारों से जुड़ने बाध्य करें। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना प्रारम्भ की थी। संसदीय मंत्रालय यदि उसकी सही स्थिति उजागर कर दे तो देश भर के माननीय सांसदों की अपने कर्तव्यों के प्रति रुचि का पर्दाफाश हो जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 24 March 2025

औरंगजेब और मुस्लिम आरक्षण पर संघ के विचार संज्ञान योग्य


गलुरू में  रा.स्व.संघ की प्रतिनिधि सभा के समापन पर पत्रकारों से बातें करते हुए सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर संघ का जो दृष्टिकोण स्पष्ट किया उनमें औरंगजेब और कर्नाटक सरकार द्वारा ठेकों में मुस्लिमों को आरक्षण का प्रावधान मुख्य हैं। श्री होसबोले ने औरंगजेब  समर्थकों द्वारा गंगा - जमुनी तहजीब के जिक्र  पर तंज कसते हुए कहा कि भारत के  विरोधी को आदर्श नहीं बनाया जा सकता है। ये लोग  औरंगजेब के भाई दारा शिकोह को याद क्यों नहीं करते हैं जो इस्लामिक कट्टरता के बजाय अन्य धर्मों का भी आदर करता था। उल्लेखनीय है औरंगजेब ने दारा शिकोह सहित अपने अन्य दो भाईयों की हत्या कर सत्ता पर कब्जा कर लिया था। सरकार्यवाह ने टिप्पणी की कि दिल्ली में औरंगजेब रोड को बदलकर अब्दुल कलाम रोड किया गया तो उसका कोई अर्थ है क्योंकि जो हमारी संस्कृति की बात करेंगे, उसका हम लोग अनुसरण करेगें। इसी तरह मुस्लिम आरक्षण का विरोध करते हुए उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा बनाये संविधान में धर्म के नाम पर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री रहते हुए सुशील कुमार शिंदे द्वारा मुसलमानों को आरक्षण दिये जाने के निर्णय का उल्लेख करते हुए श्री होसबोले ने याद दिलाया कि सर्वोच्च न्यायालय ने उस फैसले को रद्द कर दिया था। संघ के विरोधी उसे मुस्लिम विरोधी मानते हैं किंतु उसकी सोच राष्ट्रीय हितों से जुड़ी होने के कारण हर किसी के लिए ध्यान देने योग्य है। औरंगजेब के विरुद्ध जनमानस में आम तौर पर सम्मान का भाव कभी नहीं रहा इसका कारण उसके द्वारा हिंदुओं पर जजिया कर थोपे जाने के अलावा उनके मंदिरों को बड़े पैमाने पर ध्वस्त करना ही नहीं अपितु उसकी कट्टरता थी जिसके कारण शरीयत के विरुद्ध आचरण करने वाले को वह बर्दाश्त नहीं करता था। उसके दौर में यदि किसी मुस्लिम ने जरा भी सहिष्णु होने की कोशिश की तो उसे उसके कोप का भाजन होना पड़ा। हाल ही में प्रदर्शित छावा नामक फिल्म को देखने के बाद औरंगजेब के प्रति गुस्सा और बढ़ गया किंतु एक वर्ग विशेष ने बिना देर लगाए औरंगजेब को कुशल शासक, ईमानदार और हिन्दू मंदिरों के लिए भूमि व धन देने वाला प्रचारित करना शुरू कर दिया। यह उस धर्मांध मुस्लिम शासक के अत्याचारों पर पर्दा डालने का चिरपरिचित प्रयास था। ऐसे में संघ सरकार्यवाह द्वारा उठाया गया ये प्रश्न पूरी तरह से उचित है कि औरंगजेब की शान में कसीदे पढ़ने वाले दारा शिकोह को क्यों भूल जाते हैं? इसी तरह कर्नाटक सरकार द्वारा जारी निविदा में मुस्लिमों के लिए आरक्षण पर उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं द्वारा धर्म के नाम पर आरक्षण का प्रावधान नहीं किया गया इसलिए अब ऐसा करना संविधान विरुद्ध है । संघ की आपत्ति  इस आधार पर भी सही है क्योंकि भविष्य में ईसाई, सिख, जैन और बौद्ध समुदाय के लोग भी सरकारी ठेकों में अपने लिए मुसलमानों जैसा आरक्षण मांगेंगे जो नये विवादों का आधार बनेगा। ये देखते हुए अब इस बात की जरूरत है कि देश को अल्पसंख्यकवाद से मुक्त किया जाए क्योंकि वोट बैंक के लिए इसे बढ़ावा दिया जा रहा है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि बीते चार दशक में राष्ट्रीय राजनीति धर्म और जातिवाद के इर्दगिर्द सिमटकर रह गई है। मुसलमानों के जरूरत से ज्यादा तुष्टीकरण से केवल हिन्दू ही नाराज नहीं अपितु ईसाई, सिख,जैन और बौद्ध भी नाराज हैं। इसी तरह अगड़े - पिछड़े की खींचतान ने समाज को पहले जातियों में विभाजित किया और अब उपजातियों के रूप में नये - नये समूह सामने आ रहे हैं। आरक्षण के नाम पर जो राजनीति कांग्रेस नेता राहुल गाँधी कर रहे हैं उससे जातीय संघर्ष में वृद्धि की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में श्री होसबोले द्वारा कही गई बातों पर खुले मन से विमर्श की आवश्यकता है। चूंकि हमारे देश में चुनाव का मौसम कभी समाप्त ही नहीं होता इसलिए येन - केन - प्रकारेण उसमें जीत हासिल करने के लिए सभी राजनीतिक दल ऐसे हथकंडे अपनाते हैं जिनका दूरगामी परिणाम देश और समाज दोनों के लिए नुकसानदेह होगा। संघ कार्यवाह ने वैसे तो अन्य मुद्दों पर भी  संघ की नीति स्पष्ट की लेकिन औरंगजेब और मुस्लिम आरक्षण संबंधी उनकी टिप्पणियां सामयिक होने से संज्ञान लेने योग्य हैं। उनका ये कहना मायने रखता है कि देश के विरोधी को आदर्श नहीं बनाया जा सकता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 23 March 2025

संघ शताब्दि वर्ष में नागपुर दंगे से उठ रहे अनेक प्रश्न


     बीते दिनों महाराष्ट्र की राजधानी नागपुर में औरंगजेब की समाधि हटाये जाने के विरोध में हिन्दू संगठनों द्वारा आयोजित प्रदर्शन के दौरान हुए विवाद के बाद मुस्लिम समुदाय ने जिस तरह से हिंसा, आगजनी और पुलिस बल पर हमले की जुर्रत की वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

     संघ के शताब्दि वर्ष में उसकी जन्मस्थली नागपुर के महाल नामक उस इलाके में जहाँ संघ का मुख्यालय हो, मुस्लिम समुदाय ने जिस प्रकार की आक्रामकता प्रदर्शित की वह पूरे देश के हिंदुओं के लिए चेतावनी है। मुसलमानों के किसी भी धर्मगुरु अथवा नेता ने दंगा किये जाने की निंदा नहीं की। दूसरी तरफ हिंदुओं में पिटने के बाद आक्रोश तो है किंतु ये उस चेतावनी को उपेक्षित करने का दुष्परिणाम है जिसमें आगाह किया गया था कि बंटेंगे तो कटेंगे और उस सलाह का भी कि एक हैं तो सेफ हैं।

     नागपुर में संघ की स्थापना भले ही सौ वर्ष पूर्व हुई किंतु यह हिंदुत्व की विचारधारा का गढ़ नहीं बन सका। राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद बनवारीलाल पुरोहित के कांग्रेस से आने पर पहली बार भाजपा ने नागपुर लोकसभा सीट जीती किंतु वह जीत आगे न टिक सकी। 2014 में नितिन गडकरी संघ और भाजपा के पहले व्यक्ति बने जिन्होंने नागपुर लोकसभा सीट पर विजय हासिल की। हालांकि विधानसभा और विधानपरिषद के अलावा नगर निगम में भाजपा को सफलता मिलती रही किंतु कांग्रेस, राकांपा और शिवसेना ने भी यहाँ की राजनीति में पैर जमाये रखे।

     लेकिन  बीते दशक से विशेष रूप से देवेंद्र फड़नवीस और श्री गडकरी के उभरने के बाद नागपुर में हिंदुवादी राजनीति का दबदबा बढ़ा। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को उ.प्र के बाद सबसे बड़ा झटका महाराष्ट्र में ही लगा किंतु उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में बाजी पलट गई। कहते हैं संघ ने उस चुनाव में जमीनी काम करते हुए महायुति को ऐतिहासिक सफलता दिलवाई। भाजपा तो अपने दम पर बहुमत की देहलीज तक पहुँच गई। जिसके बल पर एकनाथ शिंदे की जगह श्री फड़नवीस मुख्यमंत्री बन बैठे।

    विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन की करारी पराजय ने विपक्षी एकता की जड़ों में मठा डालने का  काम किया और एक ही झटके में शरद पवार, राहुल गाँधी और उद्धव ठाकरे का आभामण्डल फीका कर दिया जो लोकसभा चुनाव के शानदार प्रदर्शन से जरूरत से ज्यादा उत्साहित हो चले थे।

    मुख्यमंत्री बनने के बाद से श्री फ़ड़नवीस हिंदुत्व के मुद्दे पर योगी आदित्यनाथ के नक्शे कदम पर चलने लगे जिससे मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ ही विपक्ष के पेट में भी मरोड़ होने लगा क्योंकि उनकी राजनीति अस्त होने पर आ गई। इसी दौरान छत्रपति  संभाजी के जीवन पर बनी फिल्म छावा के प्रदर्शित होते ही समूचे महाराष्ट्र में मुगल बादशाह औरंगजेब के प्रति अभूतपूर्व गुस्सा जागा और  संभाजी नगर ( पूर्व में औरंगाबाद) में बनी औरंगजेब की कब्र हटाये जाने की मांग जोर पकड़ने लगी ।

     इसी सिलसिले में नागपुर में हिन्दू संगठनों द्वारा किए गए प्रदर्शन में  एक कृत्रिम कब्र बनाकर उसमें घास - फूस भरकर एक कपड़ा ढँककर आग लगा दी गई। लेकिन कुछ लोगों ने ये अफवाह फैला दी कि वह कपड़ा एक चादर थी जिस पर कुरान की आयतें लिखी हुई थीं। इसके बाद मुस्लिम समुदाय ने वह सब किया जो दंगे के दौरान किया जाता है। आगजनी, लूटपाट और  वाहनों में तोडफ़ोड़ के जरिये हिंदुओं के इलाके में जमकर उपद्रव किया गया। यहाँ  तक कि पुलिस कर्मियों तक पर जानलेवा हमले हुए।

        नागपुर के लिए ये दंगा एक नया अनुभव था। मुख्यमंत्री का गृहनगर और संघ का मुख्यालय होने से हिन्दू समुदाय ने सोचा भी नहीं था कि मुसलमान इस तरह से हमलावर होकर उनकी जान - माल के लिए खतरा बन जाएंगे।

        दंगे से मुख्यमंत्री की साख और संघ की धाक पर सवाल उठने लगे । इसीलिए श्री फड़नवीस ने योगी शैली अपनाते हुए बड़े पैमाने पर दंगाइयों की गिरफ्तारी करने के बाद उनसे मुआवजा वसूलने और बुलडोजर चलाने की कारवाई शुरू कर दी। दंगे के पीछे बाँग्ला देश का हाथ होने की आशंका जताये जाने के बाद जाँच का दायरा बढ़ा दिया गया है ।

    लेकिन इस बारे में मुस्लिम समुदाय बजाय खेद जताने के अभी भी आक्रामक अंदाज दिखा रहा है। अनेक मौलवी सोशल मीडिया पर इसे पहली झाँकी बताते हुए भविष्य में इससे भी सख्त कारवाई करने की धमकी दे रहे हैं।

हालांकि मुख्यमंत्री इस मामले में काफी सख्त हैं किंतु नागपुर में मुस्लिम समुदाय के आक्रामक रवैये को देखते हुए संघ को भी सतर्क होना पड़ रहा है। क्योंकि इस दंगे से मुस्लिम समुदाय का जो हौसला बढ़ा है उसके बाद संघ के शताब्दि समारोह के आयोजनों में भी व्यवधान की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 22 March 2025

न्यायाधीश कानून के रखवाले जरूर हैं किंतु उससे ऊपर नहीं


अलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश  बलात्कार संबंधी निर्णय की वजह से चौतरफा आलोचना झेल ही रहे थे कि दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के घर हुए अग्निकांड में नोटों की गड्डियाँ मिलने की खबर से  न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार सुर्खियों में आ गया। 14 मार्च को उनके निवास पर लगी आग को बुझाने गए अग्निशमन दल को एक कमरे में नोटों के बंडल दिखे। वर्मा जी उस समय बाहर थे।  कुल अनुमानित राशि 15 करोड़ बताई गई। आग बुझाने वालों ने उसकी सूचना अपने उच्च अधिकारियों तक पहुंचाई जहाँ से वह सरकार के जरिये न्यायपालिका के उच्च स्तर तक गई। आग तो 15 मिनिट में बुझा दी गई किंतु उसकी तपिश से श्री  वर्मा की प्रतिष्ठा झुलस गई। जिसका  तात्कालिक परिणाम उनको अलाहाबाद उच्च न्यायालय तबादला किये जाने के तौर पर देखने मिला। चारों तरफ से  प्रतिक्रिया आने लगीं कि उक्त न्यायाधीश से फौरन त्यागपत्र लिया जाए क्योंकि महाभियोग लगाकर हटाये जाने की प्रक्रिया बेहद जटिल और लंबी है।  सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसियेशन के अध्यक्ष सांसद  कपिल सिब्बल ने भी  कहा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार  की जाँच को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी की उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जिन्होंने  घटना के तुरंत सामने नहीं आने पर चिंता जताते हुए तंज कसा   कि यदि कोई राजनेता, अफसर या उद्योगपति होता तो तुंरत निशाने पर आ जाता। हालाँकि कुछ घंटों बाद ही  मामले में फिल्मी मोड़ आ गया जब पहले अग्निशमन दल ने श्री वर्मा के यहाँ नोटों की गड्डियाँ मिलने की बात से  और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने उनके तबादले और जाँच प्रक्रिया के बीच संबंध से इंकार कर दिया।  इस टिप्पणी से भले ही श्री वर्मा राहत महसूस कर रहे हों परंतु  अलाहाबाद बार एसोसियेशन ने ये कहते हुए उनकी भद्द पीट दी कि अलाहाबाद उच्च न्यायालय कोई कूड़ादान नहीं है। आगे क्या होगा कहना मुश्किल है क्योंकि  अग्निशमन दल के मुखिया अतुल गर्ग द्वारा नोटों की गड्डियाँ मिलने की बात को गलत बताये जाने के बाद श्री वर्मा को क्लीन चिट देने की जमीन तैयार कर ली गई है। वहीं एक खबर ये भी है कि श्री गर्ग ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कोई बयान नहीं दिया। दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट के बाद श्री वर्मा के विरुद्ध कारवाई की दिशा स्पष्ट होगी। इस बीच  पूर्व न्यायाधीश एसएन ढींगरा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय को श्री वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति देनी चाहिए क्योंकि न्यायाधीश कानून से ऊपर नहीं है। यदि वह हत्या करेगा तब भी  क्या मामला दर्ज करने से रोका जाएगा ? अन्य  बयानों से भी लगता है कि ज्यादातर लोग मान रहे हैं कि श्री वर्मा के यहाँ नोटों की गड्डियाँ मिलने की बात सही है। इसका कारण समाज में व्याप्त यह अवधारणा है कि    भ्रष्टाचार नामक बुराई ने न्यायाधीशों को भी घेर लिया है। लेकिन संविधान प्रदत्त रक्षा कवच के कारण वे कानून की मार से बच जाते हैं।  इस तरह के आरोपों के बाद भी उन्हें  पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करना आसान नहीं होता। लेकिन सवाल ये है कि न्यायाधीशों को भ्रष्ट बनाता कौन है? उनकी क़ाली कमाई का माध्यम भी तो कानून के पेशे से जुड़े लोग ही होते हैं  और इसीलिए संदेह की सुई सबसे पहले अधिवक्ताओं पर ही आकर रुकती है ।  मोटी फीस लेने वाले अधिवक्ताओं द्वारा न्यायालय को प्रभावित करने वाली बात देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के सामने कानून मंत्री और एक मुख्यमंत्री कह चुके हैं जिस पर वे निर्विकार बने रहे। इन अधिवक्ताओं के पक्षकारों की सुनवाई जिस प्राथमिकता के साथ होती है उसे लेकर तो उन्हीं की बिरादरी में असंतोष व्याप्त है। बहरहाल दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के घर में करोड़ों रुपये की गड्डियाँ मिलने की खबर ने न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा कर दिया है। ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि कुछ नहीं हुआ तब श्री वर्मा का तबादला इतनी हड़बड़ी में करने की जरूरत क्यों पड़ी? और उस पर अलाहाबाद बार एसोसियेशन का ये कहना कि वहाँ का उच्च न्यायालय कूड़ादान नहीं है , न्यायाधीशों के सम्मान में आई गिरावट का प्रमाण है। न्यायशास्त्र की प्रसिद्ध उक्ति है कि भले ही सौ गुनाहगार छूट जाएं किंतु किसी बेगुनाह को दंड नहीं मिलना चाहिए। और ये भी कि आरोप लगने मात्र से व्यक्ति अपराधी नहीं हो जाता। इस आधार पर श्री वर्मा को अपने बचाव का अधिकार है किंतु इसे विडम्बना ही कहेंगे कि पूरे देश से जो प्रतिक्रियाएं इस मामले में आईं उनमें से लगभग सभी में नोट मिलने की बात को सत्य मानते हुए उनको पद से हटाये जाने की मांग हो रही है। देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर विराजमान श्री धनखड़ ने जो टिप्पणी की वह न्यायपालिका के लिए विचारणीय है। लेकिन इसके लिए न्यायाधीश बिरादरी को ये समझना पड़ेगा कि वे कानून के रखवाले जरूर हैं , लेकिन उससे ऊपर नहीं। भले ही विशेषाधिकारों के दम पर वे  आम आदमी से ताकतवर हो जाते हों किंतु सम्मान हासिल करने में असफल हो रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 21 March 2025

ये बलात्कार नहीं तो और क्या है , मी लॉर्ड


अलाहाबाद उच्च न्यायालय का एक फैसला पूरे देश में आलोचना का विषय बना हुआ है जिसमें कहा गया  कि पीड़िता के प्राइवेट पार्ट्स को छूना और पायजामे का नाड़ा तोड़ने को बलात्कार या उसकी कोशिश  में नहीं गिना जा सकता। हालाँकि फैसले में  उसे गंभीर यौन हमले के तहत माना गया है। प्रकरण  उत्तर प्रदेश के कासगंज इलाके का है। वर्ष 2021 में एक नाबालिग लड़की को धोखे से पुलिया के नीचे लाकर कुछ लोगों ने उसके साथ जबरदस्ती करने का प्रयास किया । उसी दौरान कुछ लोग आ गए तो वे भाग गए। लड़की के परिजनों ने रिपोर्ट की तो जिन दो लोगों पर बलात्कार और पास्को एक्ट में मामला दर्ज हुआ उन्हें निचली अदालत ने जो समन भेजा उसको उन्होंने उच्च न्यायालय में चुनौती दी जिसने यौन उत्पीड़न की बात तो मानी किंतु लड़की के वक्ष स्थल को दबाने तथा पायजामे का नाड़ा तोड़ने को बलात्कार या उसकी कोशिश मानने से इंकार कर दिया। उस फैसले की पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई है।  महिला संगठनों के अतिरिक्त राजनीतिक नेताओं सहित विभिन्न वर्गों द्वारा उसकी  निंदा की जा रही है। उक्त फैसले पर बड़ी पीठ क्या रुख अख्तियार करती है ये तो अभी स्पष्ट नहीं है किंतु जिन न्यायाधीश महोदय ने उक्त फैसला दिया उनकी मानसिक स्थिति का परीक्षण किया जाना चाहिए। किसी नाबालिग बालिका को धोख़े से सुनसान जगह में लाकर उसके वक्षस्थल को स्पर्श करने के साथ ही पायजामे का नाड़ा तोड़ना भी यदि बलात्कार नहीं है तो उसे क्या कहा जाए , ये बड़ा सवाल है। उल्लेखनीय है 14 सेकंड तक लड़कियों को घूरना भी अपराध की श्रेणी में आ गया है। इसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 354 सी के तहत सजा का विधान है। आरोप सिद्ध होने पर व्यक्ति को पहली बार में एक साल से तीन साल तक की सजा हो सकती  है। निर्भया कांड के बाद महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने के लिए कानून को और भी कड़ा किया गया। इसके अंतर्गत  उसे गलत इरादे से घूरना, स्पर्श करना, पीछा करना जैसे कृत्य दंडनीय अपराध में शामिल हो गए हैं। ये देखते हुए  एकल पीठ के न्यायाधीश राम मनोहर नारायण मिश्र का निर्णय किसी भी समझदार व्यक्ति के गले नहीं उतरेगा। संदर्भित प्रकरण में आरोपियों द्वारा  लड़की के साथ जो कुछ भी किया गया उसके अगले चरण में वे  जो करते इसका अनुमान सहज तौर पर ही लगाया जा सकता है। वो तो बालिका का भाग्य अच्छा था जो वहाँ से गुजर रहे कुछ लोगों ने हिम्मत दिखाते हुए उसको बचा लिया और आरोपी  भाग खड़े हुए। न्यायाधीश महोदय के विधिक ज्ञान को चुनौती देना तो अर्थहीन है किंतु  उनके परिवार में भी तो बेटी होगी। और न भी हो तब भी सामाजिक मान - मर्यादा और संस्कारों का कुछ तो ज्ञान उन्हें होगा ही। कानून की व्याख्या अलग - अलग तरीकों से की जाती है। अधिवक्ता गण अपने मुवक्किल के बचाव में तरह - तरह की दलीलें पेश करते हैं किंतु  न्याय की आसंदी पर विराजमान न्यायाधीश अपने ज्ञान, और अनुभव के आधार पर नीर - क्षीर विवेक का परिचय देते हुए  फैसला करते हैं। लेकिन उक्त न्यायाधीश ने मामले का जितना सतही विश्लेषण किया उससे उनकी प्रतिष्ठा तो तार - तार हुई ही देश की न्यायिक व्यवस्था की दुर्दशा भी उजागर हुई है। आरोपियों के कुकृत्य को बलात्कार की कोशिश न मानना  इस तरह का अपराध करने वालों के हौसले और बुलंद करेगा। हालांकि ये  सही है कि कानून बनाने मात्र से अपराध नहीं रुकते । वरना निर्भया कांड के बाद  सख्त कानून बन जाने से दुष्कर्म की घटनाएं बंद हो जातीं या कम होतीं किंतु हुआ उसके विपरीत। लेकिन जिस व्यक्ति को न्यायमूर्ति  कहा जाता है वे दुष्कर्म के प्रयास को बलात्कार की श्रेणी में रखने से इंकार करने का कोई अन्य कारण बताते तब शायद उनकी इतनी तीखी आलोचना नहीं हुई होती। इस फैसले के बारे में सर्वोच्च न्यायालय को अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना चाहिए क्योंकि  एकल पीठ ने आरोपियों को जिस आधार राहत दी वह किसी भी दृष्टि से न्यायोचित नहीं है। साधारण बुद्धि वाला भी ये कहेगा कि आरोपी युवकों द्वारा  नाबालिग बालिका के शरीर को जिस प्रकार स्पर्श किया गया और उसे निर्वस्त्र करने की कोशिश की उसके पीछे उनकी मंशा बलात्कार करने की ही थी। भले ही वे उसमें कामयाब न हो सके किंतु अपराध करने की इच्छा ही  उसके लिए दिये जाने वाले दंड का आधार होती है जिसे उक्त न्यायाधीश ने नजरंदाज कर दिया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 20 March 2025

हर मोर्चे पर असफल साबित हो रहे डोनाल्ड ट्रम्प


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दूसरी पारी की शुरुआत में जो तेजी दिखाई वह  धीमी पड़ने लगी है। समूची दुनिया को अपनी  उगलियों पर नचाने की उनकी मंशा कारगर नहीं होती नहीं लगती। न तो वे चीन और भारत को टैरिफ के मामले में झुका पाए और न ही संकट में फंसा यूक्रेन ही उनसे भयभीत होकर नत मस्तक हुआ। रूस और उसके बीच जारी युद्ध को रोकने के लिए उन्होंने जितनी भी कूटनीतिक उठापटक की वह अब तक तो हवा - हवाई ही है। न तो यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की उनके द्वारा सुझाए गए समाधान से सहमत हैं और न ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन अपने अमेरिकी समकक्ष की बात मानने को राजी दिखते हैं। ट्रम्प के दबाव में इजरायल और हमास के बीच हुआ युद्धविराम भी दम तोड़ रहा है। अपने निकटस्थ पड़ोसी कैनेडा को दबा पाने में भी वे  विफल रहे जबकि ग्रीनलैंड और पनामा नहर पर काबिज होने की धमकी भी धूल में लाठी पटकने जैसी साबित हो रही है। मेक्सिको एवं अन्य दक्षिण अमेरिकी देशों पर जो दबाव पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने बनाया था वह भी असरकारक नहीं हुआ। सबसे अधिक विफलता ट्रम्प को मिली आर्थिक मोर्चे पर क्योंकि आयात शुल्क बढ़ाकर अमेरिका के हित सुरक्षित रखने के नाम पर लिए गए निर्णय फिलहाल तो अमेरिकी जनता के लिए नुकसान का सौदा साबित हो रहे हैं। आयातित वस्तुओं के महंगे होने के भय से महंगाई बढ़ने लगी है। दूसरी तरफ अमेरिका के विश्वस्त सहयोगी यूरोपीय देश उससे छिटककर आर्थिक और सामरिक दृष्टि से आत्मनिर्भर होने के लिए कमर कसने लगे हैं। फ्रांस ने उन्हें परमाणु सुरक्षा उपलब्ध करवाने का आश्वासन देकर अमेरिकी प्रभुत्व को खंडित करने का दांव चल दिया है। वैसे भी यूक्रेन को जिस तरह ट्रम्प ने मझधार में छोड़ दिया उसके बाद समर्थक देश चौकन्ने  हैं। प्रारंभ में चीन के प्रति बेहद कड़ा रवैया दिखाने वाले ट्रम्प की अकड़ उस समय ढीली पड़ गई जब राष्ट्रपति जिनपिंग ने भी टैरिफ बढ़ाये जाने का जवाब उन्हीं की शैली में दिया और तब लचीले अंदाज में ट्रम्प उन्हें अपना दोस्त बताने लगे। उसके बाद से ही आशंका  व्यक्त की जाने लगी कि वे जिस तरह से यूक्रेन पर रूस द्वारा कब्जाए इलाके उसे सौंपकर युद्धविराम हेतु दबाव डाल रहे हैं उसी तरह जिनपिंग से दोस्ती निभाने के फेर में ताईवान पर चीन के दावे को भी मान्य न कर लें। जापान भी आशंकित  है कि उसके जिन समुद्री द्वीपों पर चीन अपना आधिपत्य जमाना चाहता है उन्हें छोड़ने के लिए अमेरिका उसे मजबूर न करने लगे। इस तरह की आशंकाएँ अमेरिका पर आश्रित अन्य देशों के मन में भी हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के उपरांत बनी वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका चौधरी बनकर उभरा। सोवियत संघ चूंकि साम्यवाद को अपना चुका था लिहाजा  ज्यादातर लोकतांत्रिक देश अमेरिका की छत्रछाया में खड़े हो गए। अमेरिका दुनिया भर में हो रही लड़ाइयों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भागीदारी करता रहा है । जिसके कारण उस पर आर्थिक बोझ बढ़ता गया। उसके  समुद्री बेड़े और वायुसैनिक अड्डे भी विश्व भर में हैं। आर्थिक संपन्नता और सैन्यबल के दम पर वह पूरी दुनिया का रिंग मास्टर बन बैठा । लेकिन इसके बाद भी वियतनाम और अफ़ग़ानिस्तान ऐसे देश हैं जहाँ उसकी सामरिक शक्ति काम नहीं आई और अपमानित होकर मैदान छोड़ना पड़ा। दूसरी बार राष्ट्रपति बनते ही ट्रम्प इस स्थिति से अमेरिका को बाहर निकालने में जुट गए हैं। यूक्रेन से वे युद्ध में की गई मदद की कीमत मांग रहे हैं। वहीं यूरोपीय देशों को ठेंगा दिखाते हुए संदेश दे दिया कि वे पूरी तरह अमेरिका के भरोसे रहने की आदत छोड़ दें। कुल मिलाकर ट्रम्प बजाय एक राष्ट्राध्यक्ष  के बजाय एक  व्यापारी की तरह व्यवहार कर रहे हैं। लेकिन दशकों से चली आ रही नीतियों को एक झटके में बदल देने की उनकी शैली विदेशों में तो छोड़ दें उनके अपने देश तक में लोगों के गले नहीं उतर रही। कहाँ तो अमेरिका बेगानी शादी में अब्दुल्ला बनने पर आमादा रहता था और कहाँ वह अपना पल्ला झाड़ने की नीति पर चलने लगा। इससे उसकी साख और धाक दोनों प्रभावित हो रही हैं। सोवियत संघ के विघटन के बाद जबसे वैश्विक अर्थव्यवस्था का दौर आया तभी से अमेरिका का प्रभाव बढ़ा। यहाँ तक कि चीन तक को पूंजी आधारित आर्थिक शैली स्वीकार करनी पड़ी। लेकिन ट्रम्प की अमेरिका प्रथम नीतियाँ उसे अलग - थलग करने का काम कर रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और पैरिस जलवायु संधि से हटने के बाद वे  सं .रा. संघ को भी अलविदा कहने के संकेत दे रहे हैं। इन सब कारणों से उनकी छवि एक अस्थिर दिमाग वाले सनकी शासक जैसी बन गई  है। घरेलू और विदेशी दोनों मोर्चों पर उनकी असफलता सामने आ चुकी  है। जो बाइडेन को अब तक का सबसे बुरा और विफल राष्ट्रपति बताने वाले ट्रम्प महज दो  महीने में फुस्स होते लग रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 19 March 2025

अंतरिक्ष को मनोरंजन और पर्यटन स्थल बनाना खतरे से खाली नहीं


5 जून 2024 को अमेरिका की सुप्रसिद्ध बोइंग कंपनी द्वारा बनाये स्टारलाइनर अंतरिक्ष यान से 10 दिन के लिए  सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर को अंतरिक्ष में स्थापित स्पेस स्टेशन भेजा गया था। उक्त मिशन का उद्देश्य अंतरिक्ष की संक्षिप्त व्यवसायिक उड़ानों के अलावा कुछ वैज्ञानिक परीक्षण करना भी था। लेकिन जिस यान में उक्त दोनों को भेजा गया था उसमें तकनीकी गड़बड़ी के कारण वह निर्धारित समय पर उनको वापस नहीं ला सका और खाली लौट आ गया। जिसके बाद पूरी दुनिया उनकी कुशलता के प्रति चिंतित हो उठी।  चिंता का कारण उस अभियान पर हुए खर्च से ज्यादा दो अंतरिक्ष यात्रियों के जीवन की रक्षा थी। बीते 10 महीने से उनकी वापसी का कार्यक्रम लगातार टलता जा रहा था। अनेक अवसर ऐसे भी आये जब उनके सुरक्षित लौटने की उम्मीदें धूमिल होने लगी थीं। उल्लेखनीय है अमेरिका में एलन मस्क नामक उद्योगपति ने भी अंतरिक्ष यात्रा को हवाई यात्रा की तरह सुलभ बनाने के क्षेत्र में कदम बढ़ा दिये हैं और उनकी स्पेस एक्स नामक एजेंसी नासा को टक्कर दे रही है । अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में वे  डोनाल्ड ट्रम्प के पक्ष में खुलकर  आ गए थे। जिन्होंने पदभार ग्रहण करने के बाद मस्क को अपना सलाहकार बना लिया । लेकिन उनका महत्व तब और बढ़ गया जब ट्रम्प ने उन्हें दोनों अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी की जिम्मेदारी सौंपी। उनकी कंपनी ने इस जिम्मेदारी को स्वीकार किया और स्पेस स्टेशन तक अपना ड्रेगन नामक यान भेजा। उसके बाद भी अनिश्चितता बनी रही। अंततः वापसी का कार्यक्रम तय हुआ और भारतीय समय के अनुसार आज प्रातः 3.27 बजे सुनीता, विल्मोर और स्पेस स्टेशन के दो अन्य अंतरिक्ष यात्री सुरक्षित लौट आये। ड्रेगन नामक यान में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में प्रवेश करते समय तापमान बढ़ने से आग लगने के खतरे से वैज्ञानिक आशंकित थे। पैराशूटों के समय पर नहीं खुलने को लेकर भी आशंका थी किंतु अंततः सब कुछ निर्विघ्न संपन्न हो गया। इस अभियान की सफलता ने नासा नामक एजेंसी की साख और धाक को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया।  लेकिन स्पेस स्टेशन में फंसे अंतरिक्ष यात्रियों की वापसी में बोइंग की विफलता के बाद मस्क की स्पेस एक्स ने जो चुनौती स्वीकार की उससे उनकी कंपनी  नासा को पीछे छोड़ सिरमौर बन गई है। इसी के साथ अंतरिक्ष में पर्यटन नामक नये व्यवसाय के दरवाजे भी खुल गए हैं क्योंकि मस्क की रुचि किसी शोध  कार्य में न होकर केवल धन कमाने में है। ऐसे में अंतरिक्ष में अनावश्यक मानवीय  हस्तक्षेप बढ़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है। दूसरे विश्वयुद्ध  के बाद अमेरिका और सोवियत संघ में अंतरिक्ष के क्षेत्र में आगे निकलने की होड़ शीतयुद्ध से प्रभावित थी। यूरी गागरिन नामक अंतरिक्ष यात्री को भेजकर उसकी सफल वापसी से सोवियत संघ ने अपना दबदबा कायम किया किंतु चंद्रमा पर पहला अंतरिक्ष यात्री उतारकर अमेरिका ने अपनी बादशाहत कायम कर ली। उस प्रतिस्पर्धा में सोवियत संघ को भारी नुकसान हुआ। उसके विघटन के बाद रूस उस भूमिका में आया किंतु तब तक अमेरिका बहुत आगे बढ़ गया। धीरे - धीरे भारत भी अंतरिक्ष विज्ञान में बड़ी ताकत बनकर उभरा और अब नासा की तरह अनेक देशों के यान प्रक्षेपित कर रहा है। लेकिन इस क्षेत्र की उपयोगिता और महत्व का विश्लेषण करें तो मौसम की जानकारी और संचार जैसे कार्यों में अंतरिक्ष अभियानों से हुए लाभ मायने रखते हैं। वैज्ञानिक शोध हेतु भी उनकी उपयोगिता साबित हुई है किंतु चंद्रमा , मंगल और शुक्र जैसे ग्रहों में जीवन की संभावनाएं तलाशने जैसे अभियानों पर बेतहाशा संसाधन खर्च करने से हासिल उपलब्धियों का मूल्यांकन करें तो हासिल आई शून्य वाली स्थिति नजर आती है। जिस तरह एवरेस्ट शिखर पर पर्वतारोहण से वहाँ गंदगी नजर आने लगी है वही स्थिति अंतरिक्ष की भी होने लगी है जहाँ अनुपयोगी हो चुके उपग्रह त्रिशंकु की तरह भटक रहे हैं। जासूसी के लिए भी उपग्रह छोड़े जाते हैं। लेकिन अंतरिक्ष विज्ञान की भी कोई सीमा तय होनी चाहिए। विज्ञान और तरक्की एक दूसरे के पर्याय हैं। इसमें शोध कभी बंद नहीं होते। उस दृष्टि से अंतरिक्ष में मानव की बढ़ती चहलकदमी उसके अबूझे  रहस्यों को तो उद्घाटित करती है किंतु उसकी शांति को भंग करने का अपराध भी अपने सिर पर लेती है। ब्रह्मांड की जो रचना है उसमें अंतरिक्ष और पृथ्वी दोनों का अपना स्थान है। जितने भी ग्रह - नक्षत्र हैं उनका वैज्ञानिक प्रभाव हमारे इस ग्रह पर पड़ता है। इसलिए अंतरिक्ष में केवल एक हद तक हस्तक्षेप स्वीकार्य होना चाहिए। उसे मनोरंजन का अड्डा और पर्यटन स्थल स्थान बनाया जाना पृथ्वी के लिए नये खतरे उत्पन्न किये बिना नहीं रहेगा। और फिर मस्क जैसे व्यवसायी इस क्षेत्र को भी बाजार बनाये बिना नहीं मानेंगे। 

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 रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 18 March 2025

औरंगजेब की कट्टरता और अत्याचारों का पर्दाफ़ाश समय की मांग



मुगल शासक औरंगजेब को लेकर देश में विवाद चल पड़ा है। उसके अत्याचारों के किस्से  सुर्खियां बने हुए हैं। कुछ हिन्दू संगठनों द्वारा महाराष्ट्र में बनी उसकी कब्र हटाने की मांग उठाए जाने पर राजनीतिक विवाद भी उठ खड़ा हुआ है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना  कब्र हटाने के विरोध में खड़ी   है। गत रात्रि नागपुर में इसी मुद्दे पर हिन्दू संगठनों  और मुस्लिम समुदाय में हुए विवाद ने सांप्रदायिक तनाव का रूप ले लिया। इस मुद्दे  के पक्ष - विपक्ष में जो बहस हो रही हैं उसमें ये देखकर दुख होता है कि देश के इतिहास को विकृत करने वाला वर्ग उस औरंगजेब के बचाव में खड़ा हुआ है जो  अन्य मुगल शासकों की तुलना में सर्वाधिक अत्याचारी माना जाता था। उसके सुदीर्घ शासनकाल में हिंदुओं के धर्मस्थलों का जो विध्वंस हुआ वह सर्वविदित है। हिंदुओं पर जजिया कर थोपने वाले औरंगजेब में इस्लामिक कट्टरता कूट- कूटकर भरी थी। अपने तीन भाईयों को मरवाने वाले औरंगजेब ने अपने पिता को कैद करने में भी संकोच नहीं किया। हालांकि उसके पूर्ववर्ती मुगल शासकों ने भी हिंदुओं के धर्मस्थल तोड़ने और उन पर अत्याचार करने में कोई  कमी नहीं की। यहाँ तक कि जिस अकबर  को  सर्वधर्म सद्भाव का प्रतीक बताकर महान बताया जाता रहा उसने भी हिन्दू राजाओं को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए आक्रामक रुख अपनाया। अय्याशी के मामले में तो ज्यादातर मुगल बादशाह विशेष रूप से शहजादे कुख्यात रहे। लेकिन औरंगजेब उन सभी में सबसे बड़ा सतालोलुप और हिंदुओं का विरोधी रहा। हिंदुओं के साम्राज्य की स्थापना करने वाले छत्रपति शिवाजी ने उसके सामने झुकने से इंकार किया तब उसने उन्हें बातचीत के लिए बुलाकर कैद तक कर लिया ।  लेकिन चूंकि  शिवाजी केवल वीर ही नहीं बल्कि चतुर भी थे इसीलिए वे उसकी कैद से निकलने में कामयाब हो गए। गोहत्या को बढ़ावा देकर  औरंगजेब ने सनातन धर्मियों को आतंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। औरंगजेब के दबाव में जब सिखों के अति सम्मानित गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम स्वीकार नहीं किया तो दिल्ली के चाँदनी चौक में उनका सिर काट दिया गया। इसी तरह उनके यशस्वी पुत्र गुरु गोविंद सिंह के चार पुत्रों में से दो मुगलों की सेना से लड़ते शहीद हुए वहीं दो को जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया। ये नितांत दुख का विषय है कि ऐसे अत्याचारी हिन्दू विरोधी मुगल शासक का बचाव करने हिंदुओं के बीच से ही एक वर्ग महज इसलिए खड़ा हो गया है जिससे मुस्लिम समाज को खुश किया जा सके। औरंगजेब को अति धार्मिक मानकर उसे  महिमा मंडित करने का प्रयास करने वाले इस वर्ग में वे इतिहासकार भी हैं जो मुगलकाल को भारत का स्वर्णयुग साबित करने में जुटे रहे। लेकिन जैसे ही उनके प्रयासों पर रोक लगी उनका विलाप शुरू हो गया। ऐसे में जिस औरंगजेब की इस्लामिक कट्टरता और हिन्दू विरोधी नीतियों ने पूरे देश को आतंकित किया उसके  समर्थन में खड़े लोगों को हिन्दू विरोधी मान लेने में कुछ भी गलत नहीं है। सनातन विरोधी मानसिकता वाले कुछ बुद्धिजीवी भी धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़कर जिस तरह औरंगजेब की तरफदारी में जुट गए हैं उसके कारण  हिन्दू समाज में गुस्सा पैदा होना स्वाभाविक है। हाल ही में प्रदर्शित फिल्म छावा में छत्रपति शिवाजी के पुत्र संभाजी के साथ औरंगजेब द्वारा की गई हैवानियत के दृष्य देखने के बाद तो गुस्सा और बढ़ता जा रहा है। इस्लाम स्वीकार न करने पर संभाजी के शरीर के विभिन्न अंगों को  काट - काटकर जिस तरह तड़पाकर मारा गया उसके बाद भी औरंगजेब की वकालत करना मानवीयता के विरुद्ध किसी अपराध से कम नहीं है। ये सौभाग्य का विषय है कि सनातनी शक्तियाँ  सही इतिहास को समाज के सामने रखने के लिए कटिबद्ध हो चुकी हैं।   देश की नई पीढ़ी को हिंदुओं के गौरवशाली अतीत और सनातन धर्म के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले वीरों की जीवन गाथा से अवगत कराना राष्ट्रीय आवश्यकता है। अकबर की महानता और औरंगजेब की धार्मिकता के बजाय उनकी इस्लामिक कट्टरता का पर्दाफाश देशहित में जरूरी है क्योंकि वे हमारे इतिहास के खलनायक हैं जबकि महाराणा प्रताप, गुरु तेगबहादुर, गुरु गोविंद सिंह, छत्रपति शिवाजी और संभाजी वास्तविक महानायक हैं ।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 17 March 2025

मऊगंज की घटना में छिपे हैं भविष्य के खतरे

म.प्र के रीवा संभाग में मऊगंज जिले के गड़रा गाँव में बीते शनिवार को जो घटना घटी वह बड़े खतरे का संकेत है। विंध्यप्रदेश कहलाने वाले इस इलाके में जातिवाद  आज भी बदस्तूर जारी है जिसे राजनीति ने बढ़ावा देकर कटुता में बदल दिया। दो माह पूर्व एक आदिवासी युवक की दुर्घटना में मौत पर इस समुदाय ने आरोप लगाया कि वह दुर्घटना नहीं अपितु हत्या थी। आदिवासी समुदाय ने एक ब्राह्मण युवक पर आरोप लगाया जिसे जांच के बाद पुलिस ने निर्दोष बता दिया। इस बात से आदिवासी वर्ग में गुस्सा था। गत शनिवार को उस युवक को आदिवासियों द्वारा बंधक बनाये जाने की खबर मिलते ही तहसीलदार सहित पुलिस बल वहाँ पहुंचा किंतु उसके पूर्व बंधक युवक की पीट - पीटकर हत्या की जा चुकी थी।  प्रशासन और पुलिस की  टीम को देखते ही आदिवासियों  ने उन पर भी हमला  कर दिया। तहसीलदार की कई हड्डियाँ टूट गईं वहीं पुलिस का एक ए.एस.आई उस हमले में जान से हाथ धो बैठा। उक्त वारदात के बाद पुलिस और प्रशासन के उच्च अधिकारियों ने घटना स्थल का दौरा कर पूरे गाँव को छावनी बना दिया। मृतक पुलिस कर्मी को शहीद का दर्जा देकर उसके परिजनों को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 1 करोड़ रुपये देने की घोषणा कर दी। हत्या के आरोपियों में से कुछ गिरफ्तार हो गए हैं। मुख्यमंत्री ने इस घटना पर गंभीर कारवाई करने की बात कही है। पुलिस महकमा भी अपने एक साथी की नृशंस हत्या से शोकमग्न है। होली के त्यौहार पर मऊगंज के उक्त गाँव में खून की जो होली खेली गई उसे महज आपसी रंजिश मान लेना सच्चाई से आँख मूंद लेना होगा। आदिवासी समुदाय ने अपने एक सदस्य  की मौत को हत्या मानकर उसके आरोपी उच्च जाति के युवक की हत्या की होती तब वह प्रतिशोध से प्रेरित कृत्य माना जाता किंतु उसके बाद वहाँ पहुंचे प्रशासन और पुलिस के दस्तों पर किया गया जानलेवा हमला यह दर्शाता है कि पूरी घटना पूर्व नियोजित थी। हत्या के आरोपी ब्राह्मण युवक का अपहरण करने के बाद उसकी हत्या जैसा कार्य आदिवासी समुदाय के स्वभाव से मेल नहीं खाता। शहरी माहौल के संपर्क में आने के बावजूद आज भी   आदिवासी शांत स्वभाव के माने जाते हैं जिनमें आपराधिक प्रवृत्ति अपेक्षाकृत कम ही है। लेकिन मऊगंज की घटना ने  गिरोहबंदी का एहसास तो कराया ही किंतु ऐसा लग रहा रहा है कि कोई अदृश्य शक्ति उन्हें भड़काने में लगी रही जिसके कारण दोहरी हत्याओं जैसा हादसा हो गया। उ.प्र की सीमा  से सटे इस क्षेत्र  में आदिवासी आबादी काफी अधिक है। विधानसभा और लोकसभा की कुछ सीटें  उनके लिए आरक्षित हैं। ये देखते हुए ऐसा माना जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में कमजोर पड़ने  के बाद नक्सली ताकतें अब नये इलाकों में अपने पैर जमाना चाह रही हैं। विंध्यप्रदेश में अगड़ी - पिछड़ी जातियों के बीच संघर्ष का इतिहास रहा है। दलित राजनीति ने भी यहाँ अपना असर दिखाया है जिसके चलते अर्जुन सिंह जैसे दिग्गज अपने प्रभावक्षेत्र सतना से लोकसभा चुनाव में तीसरे स्थान पर लुढ़क गए थे। इस इलाके में सामंतवादी मानसिकता के अवशेष आज भी मौजूद हैं। नक्सली विचारधारा के लिए ये वातावरण पूरी तरह अनुकूल है। मऊगंज की घटना को इसी कोण से देखा जाना चाहिए। हत्यारे आदिवासियों को पकड़कर उन्हें तो दंडित  किया ही जाए किंतु इतने मात्र से इस इलाके में हिंसा की आग को फैलने से नहीं रोका जा सकेगा । इसलिए खुफिया विभाग को इस वारदात की तह में जाकर नक्सलियों की भूमिका की सूक्ष्म जानकारी हासिल कर अभी से उनकी रोकथाम की व्यवस्था करनी चाहिए। म.प्र के कुछ आदिवासी बहुल जिले नक्सल प्रभावित हैं। लेकिन मऊगंज की घटना बस्तर में नक्सलियों द्वारा की गई नृशंस हत्याओं जैसी ही है । इसलिए इस ज़हर को फैलने से पहले ही रोकना होगा। वरना प्रतिशोध की आग पड़ोसी जिलों में भी भड़क सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 13 March 2025

म.प्र का बजट: हवाई वायदों से बचते हुए जमीन पर पाँव टिकाए रखने का प्रयास


म.प्र सरकार ने गत दिवस आगामी वित्तीय वर्ष का जो बजट प्रस्तुत किया वह वर्तमान परिस्थितियों के लिहाज से संतुलित है। बजट में नया कर नहीं लगाए जाने से जहाँ आम जनता ने राहत की सांस ली वहीं कर्मचारी वर्ग के भत्ते एवं पेंशन आदि को लेकर किये गए प्रावधान स्वागत योग्य हैं । किसानों के प्रति भी वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने काफी उदारता दिखाई। बजट के केंद्र बिंदु में धार्मिक पर्यटन, शिक्षा का विस्तार, ढांचागत योजनाओं पर विशेष जोर और छोटे शहरों को विकास की दौड़ में आगे लाना है। हालांकि कल्याणकारी योजनाओं पर किये जाने वाले खर्च की राशि कम नहीं है किंतु लाड़ली बहना जैसी योजना में दी जा रही मासिक राशि को यथावत रखने और भविष्य में उसे बीमा और पेंशन जैसी योजना से संबद्ध करने का प्रावधान मुफ्त में दी जा रही सुविधाओं से अर्थव्यवस्था के साथ ही उत्पादकता पर पड़ रहे दुष्प्रभाव से प्रभावित है। 4 लाख 21 हजार करोड़ का यह अब तक का सबसे बड़ा बजट होने से इस बात का प्रमाण है कि दो दशक पहले तक बीमारू राज्य की श्रेणी में रहने वाले म.प्र ने विकास के रास्ते पर तेज चाल से बढ़ने का आत्मविश्वास अर्जित कर लिया है। राजनीतिक स्थिरता और  विकासमूलक सोच के कारण  देश के इस हृदय प्रदेश में विकसित होने की महत्वाकांक्षा हिलोरें मारने लगी है। हाल ही में संपन्न वैश्विक निवेशक सम्मेलन में आये निवेश प्रस्तावों ने राज्य सरकार का मनोबल और बढ़ाया जिसकी झलक श्री देवड़ा द्वारा प्रस्तुत बजट में स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। उक्त सम्मेलन में आये निवेश संबंधी अनुबंध यदि तय योजनानुसार कार्य रूप में बदले तो प्रदेश में औद्योगिक क्रांति के साथ ही बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन हो सकेगा। मेडिकल कालेजों में सीटें बढ़ाने और कौशल विकास को बढ़ावा देने के लिए नये आई. टी. आई खोलने और उनमें उन्नत तकनीक के प्रशिक्षण पर जोर देना सार्थक सोच है। डॉ. मोहन यादव  सरकार के इस बजट में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए जो प्रावधान किये गए वे बीते कुछ वर्षों में प्रदेश और देश के कुछ हिस्सों में मिले अनुभवों से प्रभावित हैं। उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर का कायाकल्प किये जाने से वहाँ के पर्यटन में जबरदस्त उछाल आया है। यही अनुभव ओंकारेश्वर में भी किया जा सकता है। काशी विश्वनाथ परिसर से शुरू ये मुहिम राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए तुरुप का पत्ता साबित हुई। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होने के उपरांत उ.प्र के उस पिछड़े क्षेत्र में आर्थिक प्रगति का नया युग प्रारंभ हुआ है। प्रयागराज में मकर संक्रांति से महाशिवरात्रि तक चले महाकुंभ ने धार्मिक पर्यटन में छिपी आर्थिक संभावनाओं को उजागर कर दिया। उससे प्रेरणा लेकर म.प्र सरकार इस दिशा में जो कदम उठा रही है वे व्यवसायिक गतिविधियों के साथ ही रोजगार सृजन में सहायक होंगे ये कहना गलत नहीं होगा। किसी भी बजट की मजबूती आय और व्यय में संतुलन से आँकी जाती है। उस दृष्टि से श्री देवड़ा का बजट बराबरी पर खड़ा है। यद्यपि प्रदेश पर बढ़ता कर्ज भी चिंता का विषय है। ऐसा लगता है इसीलिए वित्त मंत्री ने नई मुफ्त सुविधाओं का ऐलान नहीं किया। लेकिन उसके बाद भी नई सड़कें, हवाई पट्टियां और ऐसे ही अन्य निर्माण किये जाने के प्रावधान अर्थव्यवस्था के गतिशील बने रहने के संकेत हैं। सौभाग्य से म.प्र में अपार वन संपदा है। इसके चलते आधा दर्जन से अधिक राष्ट्रीय उद्यान हैं। इसके अलावा सौंदर्य की नदी के तौर पर प्रतिष्ठित नर्मदा है जिसकी परिक्रमा लाखों श्रद्धालु प्रति वर्ष करते हैं। वाटर स्पोर्ट्स के लिए भी म.प्र धीरे - धीरे विख्यात होता जा रहा है। सड़कों का जाल बिछ जाने से प्रदेश में परिवहन सुलभ हो गया है। उसे सुविधाजनक और सस्ता बनाने हेतु राज्य परिवहन को पुनर्जीवित करने का प्रावधान सही कदम है। इससे निजी क्षेत्र की परिवहन सेवाओं द्वारा की जा रही लूटपाट रुकेगी और प्रतिस्पर्धा के कारण यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी। प्रदेश सरकार द्वारा आर्थिक संसाधनों की कमी को देखते हुए  निजी क्षेत्र के साथ भागीदारी करने की नीति समझदारी भरा निर्णय है। कुल मिलाकर यह बजट हवा - हवाई वायदों से बचते हुए जमीन पर पाँव टिकाए रखने का समुचित प्रयास है। यदि निवेशकों से बेहतर तालमेल बनाकर उनसे मिले प्रस्तावों को मूर्तरूप दिया जा सके और प्रदेश में उपलब्ध संसाधनों का बुद्धिमत्तापूर्ण दोहन किया जाए तो म.प्र आने वाले कुछ वर्षों में विकसित राज्य की कतार में खड़ा नजर आयेगा। प्रदेश सरकार के इस बजट ने यदि प्रदेश वासियों को कुछ खास नहीं दिया  तो उन पर करों का बोझ भी नहीं बढ़ाया। हाँ, एक बात जो अखरती है वह है पेट्रोल - डीजल पर बेतहाशा टैक्स। यदि सरकार इन्हें सस्ता करे तो प्रदेश में इनकी बिक्री बढ़ सकती है जो राजस्व की कमी को पूरा करने में मददगार बनेगी। स्मरणीय है म.प्र में पेट्रोल - डीजल काफी महंगा होने से सीमावर्ती जिलों के लोग पड़ोसी  राज्यों में जाकर खरीदी करते हैं, जहाँ दाम अपेक्षाकृत कम हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 12 March 2025

पाकिस्तान गृह युद्ध की चपेट में आकर टुकड़े - टुकड़े होने के कगार पर

पाकिस्तान के बलूचिस्तान इलाके में बलूच लिबरेशन आर्मी द्वारा एक यात्री ट्रेन को अगवा करने के बाद 150 लोगों को बंधक बनाकर बलूचिस्तान की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले कैदियों को रिहा करने के लिए 48 घंटे का समय दिया गया। ट्रेन में तैनात  20 सुरक्षा कर्मियों को गोली मार दी गई। बलूच विद्रोहियों के विरुद्ध सैन्य कारवाई के निर्देश दे दिये गए हैं। इस घटना ने बलूचिस्तान में चल रहे पाकिस्तान विरोधी आंदोलन के प्रति पूरी दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया है। हालांकि 1947 में पाकिस्तान के बनने के साथ ही पृथक  बलूचिस्तान और पश्चिमी सीमांत में पख्तूनिस्तान की मांग उठने लगी थी किंतु पाकिस्तान की सरकार ने उसे दबा दिया। कालांतर में पृथक सिंध हेतु भी आंदोलन शुरू हो गया। अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता की वापसी पर खुश हो रहे पाकिस्तान को उस समय जबरदस्त झटका लगा जब तालिबानी लड़ाकों द्वारा उसके उन इलाकों को खाली करने से इंकार कर दिया जिनमें  अमेरिका से लड़ाई के लिए अड्डे बनाने के लिए पाकिस्तान ने उन्हें अनुमति दी थी। अब तो तालिबानी लड़ाकों ने उन्हें अफ़ग़ानिस्तान का हिस्सा बताकर पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध छेड़ रखा है। इसी के समानांतर पृथक  बलूचिस्तान हेतु भी सशस्त्र विद्रोह के हालात बनते चले गए। सिंध का आंदोलन हालांकि फिलहाल शांत है किंतु देर - सवेर वहाँ भी पृथक सिंध की आवाज बुलंद हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। इनके अलावा जो जानकारियां आ रही हैं  उनके अनुसार पाक अधिकृत कश्मीर में भी पाकिस्तान के विरुद्ध गुस्से की आग तेज होती जा रही है। चीन की महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड परियोजना पाक अधिकृत कश्मीर के अलावा बलूचिस्तान से भी गुजरनी है किंतु दोनों स्थानों पर उसका विरोध होने से चीन और पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव पैदा हो रहा है क्योंकि इसमें  चीन के अरबों  डॉलर फंसे हुए हैं। पाकिस्तान के राजनीतिक और आर्थिक हालात पूरी तरह बिगड़ चुके हैं। अमेरिका सहित जो पश्चिमी देश भारत की नाराजगी के बाद भी उसको करोड़ों डॉलर खैरात में दिया करते थे वे  अब हाथ खींचने लगे हैं। चीन भी चौकन्ना हो चला है। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संस्थानों ने पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट कर रखा है। राजनीतिक मोर्चे पर भी देश में भारी उथल- पुथल है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान भले ही जेल में हों किंतु उनके समर्थक पूरे देश में आंदोलन पर उतारू हैं। इधर जम्मू कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद वहाँ की स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। विधानसभा और लोकसभा चुनाव में आतंकवादियों की धमकियों के बाद भी मतदान के प्रति जो उत्साह देखा गया उससे अलगाववादियों की कमर टूटी है। घाटी के अंदरूनी इलाकों में भी अब आवाजाही बेरोकटोक हो रही है। स्कूल, कालेज एवं अन्य संस्थान सुचारु रूप से चल रहे हैं। बीते 5 वर्षों में जम्मू कश्मीर में पर्यटन उद्योग में आया उछाल घाटी में आतंकवादियों के खात्मे का संकेत है। इसका असर पाक के कब्जे वाले कश्मीर पर पड़ रहा है। वहाँ भी भारत के समर्थन में  आंदोलन होने लगे हैं। कुल मिलाकर पाकिस्तान विभाजन के कगार पर आ खड़ा हुआ है। बलूचिस्तान, पश्चिमी सीमांत और पाक अधिकृत कश्मीर के मौजूदा हालात इस्लामाबाद में बैठी हुकूमत के नियंत्रण से बाहर हैं। राजनीतिक और आर्थिक हालातों का असर सेना पर भी पड़ रहा है अन्यथा वह अभी तक सत्ता पलट कर चुकी होती। इस दुर्दशा के लिए पाकिस्तान के वे नेता जिम्मेदार हैं   जिन्होंने भारत को अस्थिर करने के लिए आतंकवादियों को बढ़ावा दिया। धीरे - धीरे वे आतँकवादी सत्ता पर हावी होने लगे और भारत में अलगाववाद फैलाने के साथ - साथ पाकिस्तान को टुकड़े - टुकड़े करने पर भी आमादा हो उठे। इस प्रकार जिस सांप को भारत से नफरत के चलते पाकिस्तान ने दूध पिलाया था वह अब उसी को डसने के लिए फन फैलाये हुए है। खैबर - पख्तून और बलूचिस्तान के हालात बेहद संगीन हैं। बगावत  की ये आग पाक अधिकृत कश्मीर में भी फैले बिना नहीं रहेगी। इस प्रकार पाकिस्तान गृहयुद्ध की चपेट में आता जा रहा है। इस्लाम के नाम पर बने इस मुल्क में इस्लाम को मानने वाले ही एक दूसरे के खून के प्यासे हैं। दूसरों के लिए गड्ढा खोदने वाले खुद भी उसी में किस प्रकार गिरते हैं ये पाकिस्तान को देखकर समझा जा सकता है। उसकी दयनीय हालत  को देखते हुए ही अब तो एकाध को छोड़  ज्यादातर मुस्लिम देश भी उससे दूरी बना रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 11 March 2025

नये मेडिकल कालेज खोलने के बजाय वर्तमान कालेजों में सीटें बढ़ाना बेहतर


चुनाव प्रचार के दौरान नये मेडिकल कालेज खोलने का वायदा भी सामान्य हो चला है। म.प्र भी इससे अछूता नहीं है। बीते 10 सालों में प्रदेश के छोटे - छोटे जिलों में मेडिकल कालेज खोलने का ऐलान होता रहा । वर्तमान में 17 सरकारी मेडिकल कालेज  हैं और 9 नये निर्माणाधीन हैं। इनके अतिरिक्त दर्जन भर जनभागीदारी ( पी. पी. पी.) माॅडल से बनाने की तैयारियां हो रही हैं। देश में चिकित्सकों की कमी होने से चिकित्सा  शिक्षा के ज्यादा से ज्यादा केंद्र खोलने की जरूरत से हर कोई सहमत होगा किंतु मेडिकल कालेज केवल भवन , फर्नीचर , उपकरणों और छात्र - छात्राओं  से नहीं चलता अपितु उसके लिए सुयोग्य शिक्षकों की उपस्थिति सबसे महत्वपूर्ण  है। और कड़वी सच्चाई ये है कि जो सरकारी मेडिकल कालेज वर्तमान में संचालित हैं उनमें ही शिक्षकों की कमी है। बड़े शहरों के मेडिकल कालेजों से छोटे जिलों में स्थानांतरण किये जाने पर पहले  तो ज्यादातर शिक्षक उसे रद्द करवाने में जुट जाते हैं। सफलता नहीं मिलने पर छुट्टी लेकर बैठ जाना भी आम है। और फिर भी  बात नहीं बनती तो नौकरी छोड़कर निजी अस्पताल से जुड़ने का विकल्प चुना जाता है। आशय ये है कि जिला केंद्रों पर  सरकारी मेडिकल कालेज खोलना तो आसान है किंतु शिक्षकों की कमी के चलते उनमें गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण नहीं होने का प्रभाव वहाँ से पढ़कर निकले चिकित्सकों की योग्यता पर पड़ता है। जबसे निजी क्षेत्र भी चिकित्सा शिक्षा के व्यवसाय में उतर आया है तबसे सरकारी  मेडिकल कालेज के शिक्षकों को आर्थिक दृष्टि से ज्यादा आकर्षक अवसर उपलब्ध हैं। यही वजह है कि म.प्र के कुछ छोटे - छोटे जिलों में खोले गए मेडिकल कालेज समुचित संसाधनों के अलावा शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। इस कारण न तो सही ढंग से छात्र - छात्राओं को शिक्षा मिल रही है और न ही स्थानीय लोगों को अच्छा इलाज ही उपलब्ध हो पा रहा है। यह विसंगति किसी से छिपी नहीं है। नये मेडिकल कालेज खोले जाने के लिए ढांचागत जरूरतें पूरी की जा सकें तब तो उनकी सार्थकता है वरना वे खुद बीमार होकर सरकार पर बोझ और जनता की नाराजगी का कारण बनते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए ये सुझाव अक्सर सुनाई देता है कि  वर्तमान कालेजों में ही सीटें बढ़ाकर ज्यादा से ज्यादा नये चिकित्सक तैयार करने का लक्ष्य पूरा किया जाए। लेकिन राजनीतिक स्वार्थ और वोट बैंक की राजनीति के चलते बात आगे नहीं बढ़ सकी और नये  मेडिकल कालेज खोलने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। लेकिन नेताओं से अलग हटकर म.प्र के मुख्य सचिव अनुराग जैन ने स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा करते हुए  नये कालेज खोलने की नीति से असहमति जताते हुए वर्तमान मेडिकल कालेजों में सीटें बढ़ाकर ज्यादा विद्यार्थियों को शिक्षित करने का विचार व्यक्त किया। श्री जैन बेहद अनुभवी और कुशल नौकरशाह माने जाते हैं। केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर रहने के दौरान उन्होंने विभिन्न विभागों में उल्लेखनीय कार्य किये जिनमें प्रधानमंत्री कार्यालय भी है। म.प्र के मुख्य सचिव पर उनकी नियुक्ति भी केंद्र सरकार की पहल पर हुई वरना प्रदेश सरकार के निकट समझे जाने वाले एक प्रशासनिक अधिकारी तो अगले दिन पदभार ग्रहण करने की तैयारी कर चुके थे और उन्हें बधाईयाँ भी मिलने लगी थीं। इसलिए जब श्री जैन की नियुक्ति की घोषणा हुई तब ये माना गया कि केंद्र ने अपनी पसंद के अधिकारी को म.प्र की नौकरशाही की कमान सौंपी है जो अनेक मायनों में प्रदेश के हित में है। चूंकि मुख्य सचिव के केंद्र सरकार में अच्छे संपर्क हैं इसलिए वे नीतिगत मामलों में स्वतंत्र राय रखने का साहस दिखा सकते हैं। जिले - जिले में मेडिकल कालेज खोलने के स्थान पर मौजूदा  कालेजों में सीटें बढ़ाने का उनका विचार प्रशासनिक और आर्थिक दृष्टि से तो व्यवहारिक है ही चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता बनाये रखने में भी सहायक होगा। केंद्र सरकार ने आगामी वित्तीय वर्ष का जो बजट पेश किया उसमें मेडिकल कालेजों में सीटें बढ़ाने का प्रावधान है। बेहतर हो प्रदेश सरकार ज्यादा से ज्यादा सीटें अपने मेडिकल कालेजों के लिए स्वीकृत कराए। योग्य चिकित्सकों के अभाव में जिस प्रकार झोला छाप चिकित्सकों की बाढ़ आ गई   उसी तरह पर्याप्त शिक्षकों के अभाव में नये मेडिकल कालेज भी झोला छाप की श्रेणी में ही आ जायेंगे। बेहतर हो म.प्र सरकार अपने मुख्य सचिव के सुझाव  में निहित वास्तविकता को समझकर वर्तमान मेडिकल कालेजों में ज्यादा विद्यार्थियों के अध्ययन का प्रबंध करवाये । ऐसा करने से सरकार के संसाधन तो बचेंगे ही चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता भी बनी रहेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 10 March 2025

कांग्रेस को कोई और नहीं हराता बल्कि वह खुद को हराती है


गुजरात प्रवास के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने स्वीकार किया कि हम जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे । इसी के साथ वे बोल गए कि गुजरात में कांग्रेस के दो गुट हैं जिनमें एक भाजपा को जिताने का काम करता है। उन्होंने ऐसे लोगों को निकालने का सुझाव भी दिया। उल्लेखनीय है गुजरात भाजपा का अभेद्य गढ़ बन चुका है। हाल ही में संसद में बोलते हुए श्री गाँधी ने  कहा था कि अगली बार गुजरात में कांग्रेस उस गढ़ को ढहा देगी। पिछले विधानसभा चुनाव में वहाँ कांग्रेस ने अब तक का सबसे खराब  प्रदर्शन किया था । लेकिन गुजरात में भाजपा को हराने के उनके  सपने पर हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली की हार ने पानी फेर दिया। लोकसभा में कांग्रेस को मिली सफलता का श्रेय लूटने वाले राहुल उक्त तीन राज्यों के परिणामों की जिम्मेदारी लेने के बजाय बलि के बकरे तलाशने में जुटे  हैं । जहाँ तक बात गुजरात की है तो अतीत में कांग्रेस ने ही भाजपा में तोडफ़ोड़ करते हुए शंकर सिंह वाघेला को अपने पाले में खींचा और केंद्र में मंत्री बनाया। पटेल आरक्षण का आंदोलन चलाने वाले हार्दिक पटेल को तो श्री गाँधी ही कांग्रेस में लाये थे। गुजरात  कांग्रेस में भाजपा समर्थक तत्व घुसे हैं ये दिव्यज्ञान उन्हें अचानक कैसे हो गया ये रहस्यमय है। हालांकि उनके बयान के बाद अनेक राज्यों से कांग्रेसजन उन लोगों को पार्टी से बाहर करने की मांग करने लगे जिन्हें कमल छाप कांग्रेसी कहा जाता है। म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने तो श्री गाँधी के बयान के बाद  ये कहकर पार्टी को कठघरे में खड़ा कर दिया कि जब वे म.प्र के मुख्यमंत्री थे तब गुजरात विधानसभा के चुनाव प्रचार के दौरान उनसे कहा गया था कि रा.स्व.संघ के विरुद्ध न बोलें अन्यथा हिन्दू मतदाता नाराज हो जाएंगे। उल्लेखनीय है श्री सिंह  अपने बयानों से पहले भी कांग्रेस को मुसीबत में डाल चुके हैं। 2003 में जब  जनता ने उन्हें म.प्र की सत्ता से उखाड़ फेंका तो उसके बाद उनके अनुज लक्ष्मण सिंह सोनिया गाँधी के विदेशी मूल का विवाद खड़ा करते हुए भाजपा में चले गए और राजगढ़ से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए। बाद में वे फिर कांग्रेस में लौट आये। अभी भी वे  पार्टी नेतृत्व को परेशानी में डालने वाले मुद्दे छेड़ा करते हैं। देखना है उनके बड़े भाई उन्हें पार्टी से निकालने की मांग करते हैं या नहीं ? वैसे श्री सिंह ने अपने विधायक पुत्र को बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री से जोड़ दिया है जो खुलकर हिन्दू राष्ट्र की बात करते हैं। कांग्रेस का एक तबका तो कमलनाथ पर भी भाजपा से मिले होने का आरोप लगाया करता है। ये बात भी राजनीतिक गलियारों में चर्चित रही है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी लोकसभा चुनाव में छिंदवाड़ा में  प्रचार हेतु कभी नहीं आए। बहरहाल श्री गाँधी ने कांग्रेस का शुद्धिकरण करने की जो बात कही उसको जमीन पर उतारना आसान नहीं है। आजकल भाजपा के बारे में ये कटाक्ष आम हो चला है कि कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगाते - लगाते वह कांग्रेस युक्त भाजपा हो गई। लेकिन अब भारतीय राजनीति में विचारधारा का महत्व दिन ब दिन कम होता जा रहा है। क्षणिक लाभ के लिए किसी भी नेता को पार्टी में शामिल करने में संकोच नहीं किया जाता। राहुल भाजपा समर्थक तत्वों को बाहर करने की बात कहते समय भूल गए कि उन्हें सबसे पहले पप्पू कहकर संबोधित करने वाले नवजोत सिंह सिद्धू को कांग्रेस में लाने में उनकी भूमिका थी। दरअसल सिद्धू को लाकर वे कैप्टन अमरिंदर सिंह को कमजोर करना चाह रहे थे। इसीलिए उनको पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। उस निर्णय का दुष्परिणाम ये हुआ कि अमरिंदर और सिद्धू की लड़ाई में कांग्रेस का भट्टा बैठ गया। इसी तरह शत्रुघ्न सिन्हा को मोदी मंत्रीमंडल में जगह नहीं मिली तो कांग्रेस ने उनके लिए दरवाजे खोल दिये और पटना साहिब लोकसभा सीट से टिकिट भी दी किंतु हारने के बाद शत्रुघ्न तृणमूल कांग्रेस में घुसकर लोकसभा में आ गए। बेहतर हो श्री गाँधी ये स्वीकार करें कि कांग्रेस अपनी वैचारिक पहिचान खोने की वजह से जनता का विश्वास खो बैठी।  कुछ वर्ष पूर्व गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले अचानक उनके ब्राह्मण होने और यज्ञोपवीत धारण करने का ढोल बजाया गया। श्री गाँधी खुद को शिवभक्त साबित करने मानसरोवर तक हो आये किंतु उसके बाद भी वे जनता का भरोसा नहीं जीत सके क्योंकि उनकी विचारधारा स्पष्ट नहीं हैं। चुनाव प्रचार की शुरुआत अयोध्या में हनुमान गढ़ी से करने वाले राहुल आज तक राम मंदिर का दर्शन करने नहीं गए। करोड़ों  सनातनियों की आस्था के प्रतीक कुम्भ में जाने की जरूरत भी उन्हें महसूस नहीं हुई। ये सब देखते हुए बेहतर तो यही होगा कि वे कांग्रेस में बजाय व्यक्तिगत निष्ठा रखने वालों के उन युवाओं को आगे बढ़ाएं जो पार्टी के लिए प्रतिबद्ध हों। घिसी - पिटी नीतियों को ढोकर वे कांग्रेस के अच्छे दिन नहीं ला सकते। पार्टी से भाजपा समर्थकों को निकालने की बात कहने के पहले उनको इस बात का जवाब भी देना चाहिए कि वामपंथी कन्हैया कुमार को क्या सोचकर वे पार्टी में लाए जिनके नेतृत्व में जेएनयू में भारत विरोधी नारे गूंजते थे। दिग्विजय सिंह के इस खुलासे का भी जवाब कौन देगा कि उन्हें संघ के विरुद्ध बोलने से रोका गया। दिल्ली के अजय माकन की पीड़ा को सुनने वाला भी कांग्रेस में कोई नहीं है जिन्हें अरविंद केजरीवाल के विरुद्ध पत्रकार वार्ता करने से रोक दिया गया। सही बात ये है कि कांग्रेस को कोई और नहीं हराता बल्कि वह खुद को  हराती है क्योंकि उसके पास नेतृत्व और नीतियों दोनों का संकट है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 8 March 2025

महिलाओं का सम्मान एक दिवस तक सीमित न रहे


अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सरकारी और गैर सरकारी आयोजनों की बाढ़ है। विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती भूमिका की चर्चा के साथ उनकी समस्याओं पर भी विमर्श हो रहा है। राजनीति  में महिलाओं को नेतृत्व देने की सोच भले ही अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंची हो किंतु बतौर मतदाता उनकी शक्ति को सभी राजनीतिक दलों ने स्वीकार कर लिया  जिसका प्रमाण महिलाओं को लुभाने वाले  चुनावी वायदे हैं। इस ताकत को तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री स्व. जयललिता ने पहिचनाकर  तमाम कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं। मिक्सर ग्राइंडर जैसी चीज मुफ्त में देने की शुरुआत भी उन्हीं ने की। कालांतर में देश के बाकी राज्यों में भी महिला मतदाताओं को खुश करने के लिए राजनीतिक दलों ने और भी तरीके खोजे जिनमें बालिकाओं को निःशुल्क शिक्षा , साइकिल, मोबाईल आदि बांटना है। बात और आगे बढ़ी तो मुख्यमंत्री बनने के बाद  म.प्र में शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली लक्ष्मी योजना प्रारंभ कर महिलाओं के बीच अपनी छवि एक परिवार के सदस्य जैसी बनाई। 2023 के विधानसभा चुनाव के पूर्व  वे जो लाड़ली बहना योजना लेकर आये वह  चुनाव जिताने की गारंटी बन गई।   वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्ज्वला योजना शुरू कर सत्ता में बैठे लोगों को नया रास्ता सुझाया जिसके बाद हर राजनीतिक दल सस्ते गैस सिलेंडर के अलावा त्योहारों पर  एक सिलेंडर मुफ्त देने जैसे वायदे करने लगा। ताजा उदाहरण दिल्ली का है जहाँ महिला मतदाताओं को खुश करने का भाजपा का दांव आम आदमी पार्टी  पर भारी पड़ गया। लेकिन इसे ही महिला सशक्तीकरण मान लेना सही नहीं होगा। यद्यपि आजादी के आठवें दशक में महिलाओं की स्थिति में हुए सुधार को नकारा नहीं जा सकता। राष्ट्रपति सहित सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश, केन्द्रीय  मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, कलेक्टर, एस. पी जैसे पदों पर महिलाओं की मौजूदगी उनके बढ़ते कदमों का प्रमाण हैं। डाक्टर, इंजीनियर जैसे व्यवसायों में तो उनका पदार्पण हो ही चुका था किंतु  वित्तीय प्रबंधन सदृश क्षेत्र के उच्च पदों पर भी उनकी उपस्थिति भारतीय महिलाओं के सामाजिक और शैक्षणिक विकास को साबित कर रही हैं। देश में उद्योग - व्यवसाय के संचालन में भी पुरुषों का एकाधिकार नहीं रहा। अनेक महिला उद्यमी सफलता की साक्षात प्रतिमूर्ति बन चुकी हैं। और तो और सेना तक में महिलाओं की बढ़ती संख्या उनके हौसलों की मिसाल है। व्यवसायिक उड़ानों में महिला सह पायलट का होना आम बात है। इन सब उदाहरणों से सिद्ध होता है कि भारत में महिला को अबला या आश्रित मानने की अवधारणा बदल रही है। यद्यपि एक बड़ा वर्ग है जहाँ बालिका या महिला के प्रति आज भी उपेक्षा भाव है। उसके लालन - पालन से लेकर शिक्षा और विवाह आदि में लिंगभेद स्पष्ट नजर आता है। बावजूद उसके बदलाव की बयार को रोकना अब किसी के लिए संभव नहीं रहा। इसका श्रेय  राजनीति को तो  दिया ही जाना चाहिए किंतु समाज की मानसिकता में आया बदलाव भी इसके लिए जिम्मेदार है।  निचले तबके की बालिकाओं में भी आगे आने की ललक इसका प्रमाण है। शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में निम्न आर्थिक आय वर्ग की बालिकाओं की उपलब्धियों से महिला सशक्तीकरण के प्रति उम्मीदें बढ़ी हैं। लेकिन इन सबसे अलग जो चिंता का विषय है वह है नारी को देवी मानकर पूजने वाले देश में महिलाओं के उत्पीड़न की बढ़ती प्रवृत्ति। महिलाओं पर अत्याचार पहले भी होते थे। उस पर कुदृष्टि रखने वाले भी हर युग में रहे किंतु आज के दौर में जब लड़कियों के घर से बाहर निकलने पर रोक जैसी बातें कालातीत हो चुकी हैं और उन्हें भी आधी आबादी के तौर पर  विकास के अवसर दिये जा जा रहे हों तब उनके शोषण की मानसिकता के होते सिर शर्म से झुक जाता है।  बढ़ते यौन अपराध समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान के संस्कार के लुप्त होने का संकेत है। ये स्थिति उस अभिजात्य वर्ग में तो और भी ज्यादा है जो अपने को अत्याधुनिक मानकर महिलाओं को बराबरी का हक देने का पक्षधर रहा  है। इस विकृति का कारण तलाशें तो मोटे तौर पर यही प्रतीत होता है कि परिवार नामक संस्कारों की पाठशाला अपने कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाह हो चली है। सरकार से हर चीज की उम्मीद लगाए रखने की आदत के चलते समाज ये बात भूल रहा है कि संस्कारों का बीजारोपण सरकार का नहीं अपितु परिवार का प्राथमिक दायित्व है। महिला दिवस तो एक दिन का आयोजन है किंतु महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव जब तक समाज की चारित्रिक पहिचान नहीं बनता तब तक सभ्य , सुशिक्षित और आधुनिक होने के हमारे दावे अर्थहीन हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 7 March 2025

आज के मुंबई की पहिचान मराठी भाषियों तक सीमित नहीं रही


रा.स्व.संघ के पूर्व सरकार्यवाह भैयाजी जोशी द्वारा मुंबई के बहुभाषी होने सम्बन्धी बयान पर  उद्धव ठाकरे और उनके पुत्र आदित्य  द्वारा व्यक्त  प्रतिक्रिया उसी ओछी राजनीति का परिचायक है जिसके कारण आज बाल ठाकरे की विरासत दयनीय स्थिति में जा पहुंची है। मुंबई में दक्षिण भारतीय समुदाय के विरुद्ध बनी शिवसेना कालांतर में उत्तर भारतीयों के विरोध में उतर आई। छठ पूजा पर भी बवाल मचाया जाता रहा। मराठी भाषा को लेकर  शिवसेना का रवैया कुछ कुछ तमिलनाडु की द्रविड़ पार्टियों जैसा रहा। यद्यपि उन जैसी कट्टरता उसमें नहीं रही क्योंकि मुंबई आजादी के पहले से ही महानगर है जहाँ नौकरी और कारोबार के सिलसिले में अन्य राज्यों के लोग आकर बसते गए। 1960 तक मुंबई ( तत्कालीन बॉम्बे या बंबई) अलग राज्य था जिसमें गुजरात का भी कुछ हिस्सा था। बाद में उसे महाराष्ट्र की राजधानी बनाया गया। इसे संभावनाओं का शहर कहा जाता है , जहाँ देश भर के लोग अपने सपने साकार करने आते हैं। धार्मिक और भाषायी विविधता मुंबई जैसी और कहीं देखने नहीं मिलती।  उस दृष्टि से भैया जी जोशी का ये कहना सही है कि मुंबई में रहने के लिए मराठी सीखना अनिवार्य नहीं है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि इस महानगर के विभिन्न क्षेत्रों में अन्य भाषाओं का उपयोग होता है। उल्लेखनीय है श्री जोशी खुद मराठी भाषी हैं। उनके उक्त बयान पर उद्धव के बेटे आदित्य ने  देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने जैसी बेतुकी मांग कर डाली। विधानसभा में भी उनकी पार्टी ने  हंगामा किया जिस पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने स्पष्ट किया कि मराठी मुंबई और महाराष्ट्र की भाषा ही नहीं संस्कृति है। हर किसी की इसे सीखना चाहिए। श्री जोशी ने भी अपने बयान का गलत अर्थ निकाले जाने का स्पष्टीकरण देकर मामले को ठंडा करने का प्रयास किया। दरअसल इस विवाद  का असली कारण निकट भविष्य में होने वाले मुंबई महानगर पालिका के चुनाव हैं।  शिवसेना के विभाजन के बाद उद्धव गुट लगातार कमजोर होता जा रहा है। विधानसभा  में सीटें  घटने के बाद उसके सांसदों के भी शिंदे गुट से हाथ मिलाने की अटकलें लगती रहती हैं। ऐसे में अब मुंबई महानगर पालिका ही उद्धव और उनके परिवार  के लिए आखिरी उम्मीद बच रही है परंतु उसके पास जनता को आकर्षित करने के लिए कोई मुद्दा नहीं है। इसीलिए श्री जोशी  के बयान के बहाने वह धजी का सांप बनाने की कोशिश कर रहा है। उसे लगता है कि सत्तर के दशक की कार्यशैली को पुनर्जीवित कर वह अपनी खोई राजनीतिक जमीन दोबारा हासिल कर सकेगा किंतु ठाकरे परिवार को याद रखना चाहिए कि मुंबई के बाहर राज्य के अन्य अंचलों में उसके पैर तभी जमे जब स्व. बाल ठाकरे ने भाजपा जैसी पार्टी के साथ गठबंधन किया जो उस समय तक उत्तर भारत और हिन्दी बेल्ट की पार्टी मानी जाती थी। मुंबई में रहने वाले उ.प्र और बिहार के लोगों ने भी शिवसेना को तभी समर्थन देना शुरू किया। उद्धव को अपने चचेरे भाई और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के संस्थापक राज ठाकरे के राजनीतिक पराभव से भी सबक लेना चाहिए जो स्व. बाल ठाकरे द्वारा उत्तराधिकारी न बनाये जाने के बाद से पार्टी और परिवार छोड़कर अलग पार्टी बना बैठे। शुरुआत में राज के तेवर  चाचा के  दौर की याद दिलाते थे। उन्हें लगा वे उत्तर भारतीय लोगों का विरोध कर महाराष्ट्र में पैर जमा लेंगे किंतु दो दशक बाद भी  जहाँ के तहाँ खड़े हैं। अब न वे अन्य राज्यों से नौकरी करने आये युवाओं को मारते - पीटते हैं और न मुंबई के समुद्र तट पर छठ पूजा का विरोध करते हैं। उद्धव और उनके पुत्र मुंबई में श्री जोशी के बयान पर जो गुस्सा दिखा रहे हैं वह महज दिखावा है। मुंबई बेशक महाराष्ट्र का अभिन्न अंग है जहाँ मराठी भाषियों का बाहुल्य है किंतु उसकी पहिचान केवल मराठीभाषियों से  नहीं है। मुंबई स्थित फिल्म उद्योग में सबसे ज्यादा फिल्में हिन्दी की बनती हैं। उसके अलावा भोजपुरी, पंजाबी और गुजराती फिल्मों का निर्माण भी होता है। मुंबई फिल्म उद्योग के प्रमुख  निर्माता - निर्देशक, अभिनेता - अभिनेत्रियां, गायक, संगीतकार, पटकथा लेखक और गीतकार गैर मराठीभाषी हैं। भारतीय क्रिकेट टीम में भी अब मराठीभाषी खिलाडियों  का पहले जैसा वर्चस्व नहीं रहा। उद्योगपतियों में टाटा, अम्बानी, अडानी, बिरला , गोदरेज आदि गैर मराठीभाषी हैं। उत्तर भारतीय समुदाय यदि न हो तो मुंबई में कामगारों का अकाल पड़ जाएगा। और तो और अब मुंबई की राजनीति पर भी मराठीभाषियों का एकाधिकार नहीं है। ऐसे में उद्धव और उनके पुत्र मराठी भाषा के मुद्दे पर जनभावनाएं भड़काकर अपनी राजनीतिक वापसी चाह रहे हैं तो उनकी बुद्धि पर तरस ही किया जा सकता है। उन्हें तमिलनाडु और महाराष्ट्र में फर्क समझना चाहिए। वैसे भी उद्धव द्वारा शरद पवार और कांग्रेस से हाथ मिलाकर अपने  स्वर्गीय पिता द्वारा बनाई गई पहिचान को नष्ट किया जा चुका है। इस तरह के घिसे - पिटे मुद्दे उठाकर वे अपनी रही - सही हैसियत भी गँवा बैठेंगे। मुंबई भारत की विविधता में एकता का सबसे सुंदर उदाहरण है जिसे  किसी भाषा से बांधकर रखना बेमानी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 6 March 2025

आम आदमी पार्टी के गले की फांस बन गया किसान आंदोलन

जाब की आम आदमी पार्टी सरकार किसान आंदोलन से परेशान है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने तो यहाँ तक कह दिया कि उनका राज्य धरनों का राज्य बन गया है। स्मरणीय है जब दिल्ली में एक साल तक किसान धरना दिये बैठे रहे तब पार्टी के तमाम नेता किसानों के पक्ष में खड़े दिखते थे। उसके पीछे पंजाब विधानसभा के आगामी चुनाव थे। उस चुनाव में किसानों को लुभाने के लिए आम आदमी पार्टी ने एम. एस.पी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर फसलें खरीदने के अलावा और भी आश्वासन दिये । इन्हीं के कारण उसे प्रचंड बहुमत मिला था। लेकिन सत्ता में आने के बाद मान सरकार ने न सिर्फ किसानों के साथ वायदा खिलाफी की बल्कि समाज के अन्य वर्गों को दिये गए चुनावी प्रलोभन भी हवा - हवाई हो गए। मुफ्त बिजली जैसे कुछ मुद्दों पर भले ही वह अपनी बात पर कायम रही हो लेकिन महिलाओं को प्रति माह 1 हजार रु.  देने जैसे अनेक वायदों को पूरा करने में वह नाकामयाब रही। इसका पहला झटका उसे 2024 के लोकसभा चुनाव में लगा। जब राज्य की 13 सीटों में से उसे मात्र 3 मिल सकीं जबकि कांग्रेस 7 पर जीत हासिल करने में सफल रही। उल्लेखनीय है 2022 के विधानसभा चुनाव में कुल 117 सीटों में आम आदमी पार्टी ने 92 पर अपना परचम लहराकर दिल्ली के प्रदर्शन को दोहराया। कांग्रेस मात्र 18 सीटों पर सिमट गई।  मुख्यमंत्री सहित उसके तमाम बड़े नेता बुरी तरह परास्त हुए किंतु अकाली दल के दिग्गज प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे सुखबीर की हार चौंकाने वाली थी। अकाली दल से गठबंधन तोड़ने के बाद भाजपा मात्र 2 विधायकों तक सिमटकर रह गई। वहीं अकाली भी 4 सीटें ही जीत सके। उनका गठबंधन  नये कृषि कानूनों के कारण टूटा था जिनके विरोध में दिल्ली में कई  किसान संगठनों ने मिलकर लम्बा धरना दिया जिसकी चर्चा भारत के बाहर भी हुई। विशेष रूप से ब्रिटेन, अमेरिका और कैनेडा में बसे सिखों ने उस आंदोलन को अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर भारत विरोधी माहौल बनाने का जो षडयंत्र रचा वह दरअसल खालिस्तानी आंदोलन को पुनर्जीवित करने की रणनीति थी। दिल्ली में किसानों के धरने पर भी पंजाब से आये सिखों का ही कब्जा था। भले ही राकेश टिकैत और उन जैसे कुछ किसान नेता अन्य राज्यों के रहे हों किंतु धरना स्थल पर मिनी पंजाब का एहसास स्पष्ट रूप से किया जा सकता था। इस आंदोलन में खालिस्तानी तत्वों की घुसपैठ भी छिपी नहीं रही। भिंडरावाले की तस्वीर युक्त टी शर्टें पहने सैकड़ों  सिख  आंदोलन का हिस्सा बन गए। निहंगों द्वारा किये जाने वाले उत्पात की वजह से कानून व्यवस्था के लिए खतरा बढ़ गया। केंद्र सरकार चाहती तो बल प्रयोग के जरिये धरना खत्म करवा सकती थी, लेकिन उसे डर था कि उसका लाभ उठाकर खालिस्तानी तत्व वातावरण में ज़हर घोलने से बाज नहीं आयेंगे। 26 जनवरी के दिन लालकिले पर राष्ट्र ध्वज उतारकर  धर्म विशेष का झंडा लगाने की घटना ने आंदोलन के खालिस्तानीकरण को प्रमाणित कर दिया।  लगभग सभी विपक्षी पार्टियां उस आंदोलन के साथ खड़ी थीं क्योंकि उस आंदोलन के बाद उ.प्र और पंजाब विधानसभा के चुनाव होना थे। इसीलिए पश्चिम उ.प्र के जाट नेता राकेश टिकैत के अलावा पंजाब के सभी  विरोधी दलों ने आंदोलन का साथ दिया। चुनावों में उ.प्र में भाजपा ने तो सरकार बना ली किंतु पंजाब में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का सफाया कर दिया। उसके बाद से ही वहाँ खालिस्तानी तत्वों ने सिर उठाना शुरू कर दिया। हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हमले की वारदातों के अलावा हत्याओं का दौर भी चला। लेकिन किसान आंदोलन ठंडा पड़ गया।  किसानों को भरोसा था कि आम आदमी पार्टी सरकार उनकी मांगें पूरा करेगी। ये बात भी प्रचारित हुई कि इस सरकार को बनवाने में खालिस्तानी ताकतों का भी योगदान रहा क्योंकि कांग्रेस से उनकी पुरानी दुश्मनी थी। सच्चाई जो भी हो किंतु ये सच है कि  आम आदमी पार्टी के सत्तासीन होते ही वहाँ देश विरोधी तत्वों के हौसले बुलंद होने लगे और कानून व्यवस्था भी बदतर होती गई। जिन किसानों को दिल्ली धरने में अरविंद केजरीवाल सब्जबाग दिखाते थे वे  खुद को ठगा महसूस करने लगे और अंततः आंदोलन पर उतारू हो गए। लेकिन जब तक उनका निशाना केंद्र सरकार रही तब तक तो आम आदमी पार्टी खुश होती रही किंतु जैसे ही आंदोलन मान  सरकार की तरफ घूमा उसका किसान प्रेम लुप्त हो गया। किसान संगठनों के चंडीगढ़ कूच को रोकने पंजाब सरकार ने सभी रास्तों पर अवरोध लगा दिये और बड़े पैमाने पर गिरफ़्तरियाँ कर डालीं। हालांकि जल्द ही रिहाई भी कर दी गई किंतु किसानों को केंद्र सरकार के विरुद्ध भड़काने वाली आम आदमी पार्टी अब उनके आंदोलन को कुचलने से बाज नहीं आ रही जो उसके दोहरे चरित्र और विफलता का ताजा प्रमाण है । अपने इसी रवैये के कारण उसको दिल्ली की जनता ने सत्ता से उखाड़ फेंका। राष्ट्रीय पार्टी बनने की जल्दबाजी  में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और पंजाब दोनों में कुशासन का जो उदाहरण पेश किया उसी के कारण उसकी चमक और धमक दोनों फीकी पड़ने लगी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 5 March 2025

नेता ,नौकरशाह और न्यायाधीश सरकारी अस्पतालों में इलाज करवाएं तभी सुधार संभव


सस्ती चिकित्सा  दिन ब दिन दुर्लभ होती जा रही है। सरकारी अस्पताल आम जनता को समय पर इलाज और दवाइयाँ देने में अक्षम साबित हुए हैं। उनमें चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ की कमी से मरीज परेशान होते हैं। जाँच सुविधाओं का भी अभाव है। वहीं एक्सरे जैसी मामूली मशीनें तक खराब रहती हैं। सरकार को जब लगा कि वह चाहकर भी इस स्थिति को सुधार नहीं सकती तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आयुष्मान  भारत योजना के जरिये गरीब तबके को 5 लाख तक का इलाज निजी अस्पतालों में  भी निःशुल्क करवाने की सुविधा दे दी । गत वर्ष 70 साल पूरे कर चुके सभी वरिष्ट नागरिकों को भी  इस योजना में शामिल कर लिया गया, चाहे वे किसी भी आय वर्ग के हों। कुछ राज्य सरकारों ने तो 25 लाख तक के इलाज जैसी घोषणाएं भी कीं। यदि सरकारी अस्पताल पूरी तरह सक्षम होते तब शायद आयुष्मान भारत जैसी योजना की जरूरत नहीं होती । यही वजह है कि इस योजना ने लाभार्थियों को तो जबरदस्त सहारा दिया किंतु निजी अस्पतालों पर इसके माध्यम से जो धनवर्षा हुई वह अकल्पनीय है। फर्जीवाड़े करते हुए भी जमकर कमाई की गई। सरकार का सोचना है उसे अपना चिकित्सा ढांचा खड़ा करने में लंबा समय और धन खर्च करना पड़ेगा इसलिए उसने आयुष्मान भारत जैसी योजना लाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। हालांकि स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने सभी राज्यों में एम्स खोलने की शुरुआत कर चिकित्सा सुविधाओं के  विकेंद्रीकरण  का सराहनीय प्रयास किया किंतु एम्स के राजधानी में होने से  दूरदराज रहने वाले उसकी सेवा से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में  लोगों को बाध्य होकर निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है जहाँ उन्हें दवाइयों, जाँच और अन्य सेवाओं के लिए ज्यादा भुगतान करना पड़ता है। इसी समस्या को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने विगत दिवस  एक याचिका पर सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य सरकारें किफायती चिकित्सा देखभाल और बुनियादी ढांचा सुनिश्चित करने में विफल रही हैं। जिससे प्राइवेट हॉस्पिटलों को सुविधा मिली और बढ़ावा मिला। याचिका में तर्क दिया गया कि निजी अस्पताल मरीजों और उनके परिवारों को दवाइयां, ट्रांसप्लांट और अन्य चिकित्सा देखभाल सामग्री हॉस्पिटल की अपनी  दुकान  से महंगे दामों पर खरीदने के लिए मजबूर करते हैं।   याचिका में निजी अस्पतालों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे मरीजों को केवल अस्पताल की  दुकानों  से ही दवा खरीदने के लिए बाध्य न करें। साथ ही आरोप लगाया गया है कि केंद्र और राज्य नियामक उपाय करने में विफल रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप निजी अस्पतालों  में मरीजों का शोषण हो रहा है। उक्त सभी बातें पूरी तरह सही हैं। जिस तरह दवा  कंपनियों ने  चिकित्सा तंत्र को पूरी तरह नियंत्रित  कर रखा है उसी तरह निजी अस्पतालों के संगठनों ने सरकार में अपनी घुसपैठ करते हुए  मनमानी दरें तय करवा लीं। ज्यादातर  नेता और अधिकारी चूंकि निजी अस्पतालों में ही इलाज करवाते हैं इसलिए इनमें व्याप्त अनियमितताओं को रोकना असंभव  है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बारे में जो टिप्पणी की वह एक तरह से जनता की आवाज है, परंतु  राज्य सरकारों से सुधार की अपेक्षा करना बेमानी है क्योंकि जिस नौकरशाही और सत्ताधारी नेताओं पर  निजी  अस्पतालों की  मनमानी रोकने की जिम्मेदारी है वे उनके उपकारों से उसी तरह दबे होते हैं जिस तरह दवा कंपनियों ने चिकित्सकों को अपने उपकारों के बोझ से दबा रखा है। ज्यादातर न्यायाधीश भी निजी अस्पतालों की सेवाएं ही लेना पसंद करते हैं। इस वर्ग को जरा सी तकलीफ होने पर एयर एंबुलेंस से महानगर के महंगे निजी अस्पतालों में भेजने की सुविधा भी  मिल जाती  है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारने की बात सोचना निरर्थक है। लेकिन यदि सत्ताधारी नेता, अधिकारी और न्यायाधीश सरकारी अस्पतालों में इलाज करवाने आने लगें तब इनकी सेवाएं सुधरते देर नहीं लगेगी। अब तक का अनुभव यही है कि न्यायालय जो भी फरमान जारी करते हैं वे नौकरशाही द्वारा बनाये गए चक्रव्यूह में फंसकर गायब हो जाते हैं। इस याचिका का परिणाम भी वही होगा क्योंकि जब तक माननीय न्यायाधीश अदालत से बाहर निकलकर जनता की तकलीफों से रूबरू नहींं होते चिकित्सा व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियाँ दूर नहीं हो सकेंगी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 4 March 2025

बहुजन की राजनीति भी परिजन में उलझी

बसपा  के संस्थापक कांशीराम को भारत में डॉ. आंबेडकर के बाद दलित आंदोलन  का सबसे बड़ा प्रवर्तक माना जाता है। एक कर्मचारी संगठन से बढ़ते  हुए  राजनीतिक दल बनाकर दलित समुदाय का ध्रुवीकरण करने में कांशीराम ने बड़ी सफलता हासिल की। उसके  पहले  दलित मतदाता कांग्रेस से बंधे हुए थे। कांशीराम दलित राजनीति को मुख्य धारा में लाए। भले ही प्रारंभ में संसद और  विधानसभाओं में बसपा की उपस्थिति नगण्य रही किंतु दलितों में आत्मविश्वास भरने में उनकी भूमिका स्मरणीय बन गई। उन्होंने पार्टी  में ऐसे लोगों का चयन किया जो  दलित उत्थान के प्रति समर्पित हों। कांशीराम पंजाब के थे किंतु उन्होंने बसपा को क्षेत्र विशेष तक सीमित रखने से परहेज किया वरना । साथ ही अपने परिवार के किसी सदस्य को आगे बढ़ाने के स्थान पर उ.प्र की एक युवा महिला मायावती को अपना राजनीतिक  उत्तराधिकारी बनाया। उनके जीवनकाल में ही मायावती उ.प्र की  कई बार  मुख्यमंत्री बनने में सफल रहीं। हालांकि दलित नेता पहले भी  उच्च पदों को सुशोभित कर चुके थे किंतु वे ऐसी किसी पार्टी के सहारे वहाँ पहुंचे जिसका नेतृत्व गैर दलितों के पास था। 1992 में  बाबरी ढांचा गिरने के  बाद उ.प्र विधानसभा के चुनाव में कांशीराम ने मुलायम सिंह यादव से गठजोड़ किया जिसने जबरदस्त राम लहर के बावजूद भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया। यद्यपि  वह प्रयोग ज्यादा नहीं चला किंतु उसके बाद से बसपा विशेष रूप से मायावती के भीतर सत्ता की लालसा उछाल मारने लगी। मुलायम सिंह के साथ तो लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड के बाद उनकी निजी दुश्मनी हो गई किंतु मायावती ने विशुद्ध अवसरवाद का सहारा लेते हुए उस भाजपा  से हाथ मिलाने में भी संकोच नहीं किया जिसे उच्च जातियों की पार्टी माना जाता था। कांशीराम के अस्वस्थ हो जाने के बाद मायावती  अपने महिमामंडन को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए  जन्मदिन पर उपहारों के नाम पर बहुजन समाज का भावनात्मक दोहन करने लगीं। उनकी समृद्धि के किस्से प्रचलित हो गए। तिलक तराजू और तलवार , इनको मारो जूते चार के नारे का स्थान हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है ने लिया। बहुजन समाज पार्टी सर्वजन की बात करने लगी। मायावती आर्थिक आधार पर आरक्षण के कोटे का समर्थन करती दिखने लगीं। पार्टी के दूसरे सबसे बड़े महासचिव के पद पर कानपुर के सतीश चंद्र मिश्र को नियुक्त किया गया जो बाद में राज्यसभा  भी भेजे गए। इस समीकरण ने 2007 में मायावती को स्पष्ट बहुमत के साथ उ.प्र की सत्ता तक पहुँचा दिया जो राष्ट्रीय राजनीति के लिए चौंकाने वाली बात थी। कांशीराम के निधन के बाद मायावती को  दलित समाज की देवी के तौर पर देखा जाने लगा। लखनऊ में बने विशाल पार्क में उन्होंने कांशीराम के साथ अपनी प्रतिमा भी लगवा दी।  लेकिन सर्वजन के सहारे सत्ता में आने के बाद भी उनका जातिवादी झुकाव जारी रहा जिसके कारण  पांच साल बाद ही वे जनता द्वारा नकार दी गईं। उसके बाद से बसपा और मायावती दोनों ढलान पर आते गए। कुछ राज्यों में मामूली उपस्थिति दिखी किंतु बसपा के विधायकों का बिकाऊ होना आम हो जाने से पार्टी की साख खत्म हो गई। मायावती भी  अनिश्चितता की पर्याय बन गईं। लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिराने में उनकी भूमिका चर्चित रही जबकि कुछ घण्टों पहले वे उसके समर्थन का वायदा कर चुकी थीं। इसी तरह  उ.प्र में भाजपा के साथ सरकार बनाने के लिए दोनों के बीच ढाई - ढाई मुख्यमंत्री रहने का समझौता हुआ। पहले मायावती गद्दी पर बैठीं किंतु जब भाजपा को सत्ता सौंपने का समय आया तो मुकर गईं। इन्हीं सबके कारण उनके प्रति दलित समाज में ही अरुचि उत्पन्न होने लगी। 2014 के  लोकसभा चुनाव में उनके हाथ शून्य लगा। उ.प्र विधानसभा में भी बसपा अस्तित्वहीन हो गई। आज की स्थिति में मायावती खुद भी किसी सदन में नहीं हैं। जिस सपा से उनकी दुश्मनी सांप - नेवले जैसी थी उसी के साथ 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने गठबंन्धन कर लिया। हद तो तब हुई जब मैनपुरी में उन मुलायम सिंह का प्रचार करने जा पहुंची जिन पर अपने चीरहरण का आरोप लगाया करती थीं। इसका असर ये हुआ कि बसपा के साथ जुड़े तमाम प्रमुख नेता अलग राह चले गए। पार्टी की  टिकिटें बेचे जाने की चर्चा आम हो चली। उ.प्र में ही चंद्रशेखर आजाद नामक युवा दलित नेता मायावती के लिए चुनौती बनकर उभर गया। धीरे - धीरे बहिन जी अकेलेपन में घिरती गईं और असुरक्षा के भाव से ग्रसित होकर उन्होंने अपने भतीजे आनंद को उत्तराधिकारी बनाने की कवायद शुरू की किंतु  वह निर्णय भी बसपा के अच्छे दिन वापस नहीं ला सका। बीते कुछ सालों में आनंद को पार्टी की बागडोर सौंपने के बाद कई बार उन्होंने अपना निर्णय बदला। जिसका कोई ठोस कारण किसी की समझ में नहीं आया। गत दिवस अचानक खबर आई कि उन्होंने आनंद को उत्तराधिकार से वंचित करते हुए पार्टी से ही निकाल दिया। आज बसपा राजनीति के जिस हाशिये पर है उसका कारण  मायावती का  अविश्वसनीय होना भी है। एक समय था जब उनका नाम प्रधानमंत्री के लिए चर्चा में आने लगा था किंतु  आज  वे सांसद बनने तक के लिए तरस रही हैं। बसपा जैसी पार्टी का सत्यानाश उनके परिवार प्रेम ने कर दिया। कांशीराम ने पार्टी को दलित समाज के हितों पर केंद्रित रखा किंतु मायावती ने उसे निजी संपत्ति बनाकर दलित समाज को अपनी कठपुतली बनाने की जो कोशिश की उसका दुष्परिणाम दलित राजनीति में आये बिखराव के रूप में सामने है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 March 2025

ट्रम्प के विरुद्ध यूरोपीय एकता से वैश्विक शक्ति संतुलन बदल सकता है


द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ये पहला अवसर है जब अमेरिका के विरोध में रूस या चीन जैसे उसके परंपरागत  प्रतिद्वंदी नहीं वरन यूरोप के वे तमाम देश खड़े हो गए हैं जो कल तक उसके झंडे तले खुद को सुरक्षित समझते थे। इसका कारण बना बीते सप्ताह  वॉशिंगटन में अमेरिका के  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के बीच हुई गर्मागर्मी के बाद जेलेंस्की का ब्रिटेन आना और वहाँ तमाम यूरोपीय देशों के शिखर सम्मेलन में रूस के साथ चल रहे युद्ध में यूक्रेन को आर्थिक  और सैन्य सहायता प्रदान करने का सामूहिक निर्णय होना।  ट्रम्प द्वारा जेलेंस्की के साथ किये गए अपमानजनक व्यवहार के बाद यूरोप के लगभग सभी देशों के यूक्रेन के पक्ष में मजबूती से खड़े हो जाने को  वैश्विक राजनीति में बड़ी घटना के तौर पर देखा जा रहा है। उल्लेखनीय है इन देशों में ब्रिटेन और फ्रांस  के पास सं.रा.संघ सुरक्षा परिषद में वीटो का अधिकार है। हालांकि रूस के हमले से निपटने के लिए यदि अमेरिका  यूक्रेन को अस्त्र - शस्त्र और धन नहीं देता तब वह कभी का घुटने टेक चुका होता। अमेरिका का प्रभाव कहें या दबाव कि यूरोपीय देश भी रूस के विरोध में यूक्रेन के बचाव में आ गए। अमेरिका द्वारा रूस पर लगाए गये आर्थिक प्रतिबंधों को भी इन देशों ने समर्थन दिया जिसके कारण उन्हें गैस, पेट्रोल - डीजल और खाद्यान्न का भारी संकट झेलना पड़ा। गौरतलब है कभी रूस के पिट्ठू रहे हंगरी और पोलैंड भी इस जंग में यूक्रेन के साथ हो गए। इसका कारण रूसी राष्ट्रपति पुतिन की विस्तारवादी सोच है। डेनमार्क जैसा देश भी पुतिन की धमकियों के कारण आतंकित है। यही वजह है कि यूक्रेन ने जब नाटो संधि से जुड़ना चाहा और रूस ने इसे बहाना बनाकर उस पर चढ़ाई कर दी तब अमेरिका के कहने पर लगभग सारे के सारे यूरोपीय देश यूक्रेन की मदद के लिए खुलकर सामने आये। लेकिन बीते जनवरी माह में  ट्रम्प की व्हाइट हाउस में वापसी के बाद से अमेरिका की विदेश नीति ने जिस तरह की करवट ली वह चौंकाने वाली रही। ट्रम्प ने जेलेंस्की पर युद्ध के दौरान दी गई आर्थिक सहायता के एवज में यूक्रेन की बहुमूल्य खनिज संपदा का सौदा करने के साथ ही युद्ध विराम का दबाव बनाया । और ऐसा नहीं करने पर उसकी मदद के लिए हुए खर्च की भरपाई  करने की शर्त रख दी। कहते हैं जेलेंस्की उसके लिए राजी भी थे किंतु जब  अपने देश की सुरक्षा की गारंटी मांगी तो ट्रम्प ने उन्हें दुत्कार दिया। यद्यपि जेलेंस्की ने भी उस दौरान कूटनीतिक अनुभवहीनता का परिचय दिया । ये कहना भी गलत नहीं है कि मौजूदा हालात में जेलेंस्की की स्थिति याचक जैसी है जिसमें वे अपनी शर्त पर अमेरिका से समझौता नहीं कर सकते। वैसे ट्रम्प का रवैया भी बेहद गैर जिम्मेदाराना कहा जाएगा क्योंकि अमेरिका  के बलबूते ही यूक्रेन ने रूस जैसी महाशक्ति से टकराने का दुस्साहस किया था। ऐसे में राष्ट्रपति बदलने के बाद विदेश नीति में अचानक इस तरह का  परिवर्तन किसी देश की साख को प्रभावित कर सकता है। और अमेरिका भी उसका शिकार हुआ है। यूरोप का संगठित होकर यूक्रेन के साथ खड़ा हो जाना कोई साधारण घटना नहीं है। दरअसल दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही ट्रम्प द्वारा यूरोप पर जिस तरह धौंस जमाना शुरू किया गया उससे वहाँ के देश चौकन्ने हो गए। वे  यूरोप पर भी अमेरिकी हितों के अनुरूप आचरण करने का जो दबाव बना रहे थे उससे अमेरिका के बेहद नजदीक समझा जाने वाला ब्रिटेन तक असहज महसूस कर रहा था। यूक्रेन की मदद के लिए ब्रिटेन की पहल पर ट्रम्प द्वारा वहाँ के प्रधानमंत्री से जिस लहजे में बात की गई उसे बदतमीजी ही कहा जायेगा। यही वजह रही कि वॉशिंगटन से अपमानित होकर लौटे जेलेंस्की सीधे लंदन गए जो रातों - रात यूरोपीय एकता का केंद्र बन गया। हालांकि यूरोपीय देश अभी भी अमेरिका की मिजाजपुर्सी कर उसकी नाराजगी से बचना चाह रहे हैं किंतु ट्रम्प द्वारा हड़काए जाने के बावजूद ब्रिटेन ने जिस दबंगी से यूक्रेन को बड़े पैमाने पर आर्थिक और सैन्य सहायता देने का ऐलान किया  और अन्य यूरोपीय देश भी उसी तरह की दरियादिली  दिखाते हुए सामने आये वह अंतर्राष्ट्रीय शक्ति संतुलन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। ट्रम्प द्वारा एक साथ ढेर सारे मोर्चे खोलने से अमेरिका उस स्थिति में फंस गया है जहाँ से न तो वह बहुत आगे बढ़ पाएगा और पीछे हटने पर उसकी साख तथा धाक दोनों को धक्का लगेगा। यूरोपीय देशों का ट्रम्प  द्वारा पल्ला झाड़ लेने के बाद भी यूक्रेन के पीछे मजबूती से खड़ा हो जाना कूटनीति के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को भी काफी हद तक प्रभावित करेगा। यदि ट्रम्प सोच रहे हों कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के साथ मिलकर  दुनिया को मुट्ठी में कर लेंगे तो वे धोखे में हैं क्योंकि रूस और चीन कभी भी अमेरिका के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं करेंगे। ये भी विचारणीय है कि पुतिन और जिनपिंग ने जहां जीवन पर्यंत सत्ता में बने रहने का इंतजाम कर लिया है वहीं ट्रम्प के पास चार साल से भी कम समय है और कूटनीति में ये बात बेहद महत्वपूर्ण होती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी