जाब की आम आदमी पार्टी सरकार किसान आंदोलन से परेशान है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने तो यहाँ तक कह दिया कि उनका राज्य धरनों का राज्य बन गया है। स्मरणीय है जब दिल्ली में एक साल तक किसान धरना दिये बैठे रहे तब पार्टी के तमाम नेता किसानों के पक्ष में खड़े दिखते थे। उसके पीछे पंजाब विधानसभा के आगामी चुनाव थे। उस चुनाव में किसानों को लुभाने के लिए आम आदमी पार्टी ने एम. एस.पी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर फसलें खरीदने के अलावा और भी आश्वासन दिये । इन्हीं के कारण उसे प्रचंड बहुमत मिला था। लेकिन सत्ता में आने के बाद मान सरकार ने न सिर्फ किसानों के साथ वायदा खिलाफी की बल्कि समाज के अन्य वर्गों को दिये गए चुनावी प्रलोभन भी हवा - हवाई हो गए। मुफ्त बिजली जैसे कुछ मुद्दों पर भले ही वह अपनी बात पर कायम रही हो लेकिन महिलाओं को प्रति माह 1 हजार रु. देने जैसे अनेक वायदों को पूरा करने में वह नाकामयाब रही। इसका पहला झटका उसे 2024 के लोकसभा चुनाव में लगा। जब राज्य की 13 सीटों में से उसे मात्र 3 मिल सकीं जबकि कांग्रेस 7 पर जीत हासिल करने में सफल रही। उल्लेखनीय है 2022 के विधानसभा चुनाव में कुल 117 सीटों में आम आदमी पार्टी ने 92 पर अपना परचम लहराकर दिल्ली के प्रदर्शन को दोहराया। कांग्रेस मात्र 18 सीटों पर सिमट गई। मुख्यमंत्री सहित उसके तमाम बड़े नेता बुरी तरह परास्त हुए किंतु अकाली दल के दिग्गज प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे सुखबीर की हार चौंकाने वाली थी। अकाली दल से गठबंधन तोड़ने के बाद भाजपा मात्र 2 विधायकों तक सिमटकर रह गई। वहीं अकाली भी 4 सीटें ही जीत सके। उनका गठबंधन नये कृषि कानूनों के कारण टूटा था जिनके विरोध में दिल्ली में कई किसान संगठनों ने मिलकर लम्बा धरना दिया जिसकी चर्चा भारत के बाहर भी हुई। विशेष रूप से ब्रिटेन, अमेरिका और कैनेडा में बसे सिखों ने उस आंदोलन को अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर भारत विरोधी माहौल बनाने का जो षडयंत्र रचा वह दरअसल खालिस्तानी आंदोलन को पुनर्जीवित करने की रणनीति थी। दिल्ली में किसानों के धरने पर भी पंजाब से आये सिखों का ही कब्जा था। भले ही राकेश टिकैत और उन जैसे कुछ किसान नेता अन्य राज्यों के रहे हों किंतु धरना स्थल पर मिनी पंजाब का एहसास स्पष्ट रूप से किया जा सकता था। इस आंदोलन में खालिस्तानी तत्वों की घुसपैठ भी छिपी नहीं रही। भिंडरावाले की तस्वीर युक्त टी शर्टें पहने सैकड़ों सिख आंदोलन का हिस्सा बन गए। निहंगों द्वारा किये जाने वाले उत्पात की वजह से कानून व्यवस्था के लिए खतरा बढ़ गया। केंद्र सरकार चाहती तो बल प्रयोग के जरिये धरना खत्म करवा सकती थी, लेकिन उसे डर था कि उसका लाभ उठाकर खालिस्तानी तत्व वातावरण में ज़हर घोलने से बाज नहीं आयेंगे। 26 जनवरी के दिन लालकिले पर राष्ट्र ध्वज उतारकर धर्म विशेष का झंडा लगाने की घटना ने आंदोलन के खालिस्तानीकरण को प्रमाणित कर दिया। लगभग सभी विपक्षी पार्टियां उस आंदोलन के साथ खड़ी थीं क्योंकि उस आंदोलन के बाद उ.प्र और पंजाब विधानसभा के चुनाव होना थे। इसीलिए पश्चिम उ.प्र के जाट नेता राकेश टिकैत के अलावा पंजाब के सभी विरोधी दलों ने आंदोलन का साथ दिया। चुनावों में उ.प्र में भाजपा ने तो सरकार बना ली किंतु पंजाब में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का सफाया कर दिया। उसके बाद से ही वहाँ खालिस्तानी तत्वों ने सिर उठाना शुरू कर दिया। हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हमले की वारदातों के अलावा हत्याओं का दौर भी चला। लेकिन किसान आंदोलन ठंडा पड़ गया। किसानों को भरोसा था कि आम आदमी पार्टी सरकार उनकी मांगें पूरा करेगी। ये बात भी प्रचारित हुई कि इस सरकार को बनवाने में खालिस्तानी ताकतों का भी योगदान रहा क्योंकि कांग्रेस से उनकी पुरानी दुश्मनी थी। सच्चाई जो भी हो किंतु ये सच है कि आम आदमी पार्टी के सत्तासीन होते ही वहाँ देश विरोधी तत्वों के हौसले बुलंद होने लगे और कानून व्यवस्था भी बदतर होती गई। जिन किसानों को दिल्ली धरने में अरविंद केजरीवाल सब्जबाग दिखाते थे वे खुद को ठगा महसूस करने लगे और अंततः आंदोलन पर उतारू हो गए। लेकिन जब तक उनका निशाना केंद्र सरकार रही तब तक तो आम आदमी पार्टी खुश होती रही किंतु जैसे ही आंदोलन मान सरकार की तरफ घूमा उसका किसान प्रेम लुप्त हो गया। किसान संगठनों के चंडीगढ़ कूच को रोकने पंजाब सरकार ने सभी रास्तों पर अवरोध लगा दिये और बड़े पैमाने पर गिरफ़्तरियाँ कर डालीं। हालांकि जल्द ही रिहाई भी कर दी गई किंतु किसानों को केंद्र सरकार के विरुद्ध भड़काने वाली आम आदमी पार्टी अब उनके आंदोलन को कुचलने से बाज नहीं आ रही जो उसके दोहरे चरित्र और विफलता का ताजा प्रमाण है । अपने इसी रवैये के कारण उसको दिल्ली की जनता ने सत्ता से उखाड़ फेंका। राष्ट्रीय पार्टी बनने की जल्दबाजी में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और पंजाब दोनों में कुशासन का जो उदाहरण पेश किया उसी के कारण उसकी चमक और धमक दोनों फीकी पड़ने लगी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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