Saturday, 22 March 2025

न्यायाधीश कानून के रखवाले जरूर हैं किंतु उससे ऊपर नहीं


अलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश  बलात्कार संबंधी निर्णय की वजह से चौतरफा आलोचना झेल ही रहे थे कि दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के घर हुए अग्निकांड में नोटों की गड्डियाँ मिलने की खबर से  न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार सुर्खियों में आ गया। 14 मार्च को उनके निवास पर लगी आग को बुझाने गए अग्निशमन दल को एक कमरे में नोटों के बंडल दिखे। वर्मा जी उस समय बाहर थे।  कुल अनुमानित राशि 15 करोड़ बताई गई। आग बुझाने वालों ने उसकी सूचना अपने उच्च अधिकारियों तक पहुंचाई जहाँ से वह सरकार के जरिये न्यायपालिका के उच्च स्तर तक गई। आग तो 15 मिनिट में बुझा दी गई किंतु उसकी तपिश से श्री  वर्मा की प्रतिष्ठा झुलस गई। जिसका  तात्कालिक परिणाम उनको अलाहाबाद उच्च न्यायालय तबादला किये जाने के तौर पर देखने मिला। चारों तरफ से  प्रतिक्रिया आने लगीं कि उक्त न्यायाधीश से फौरन त्यागपत्र लिया जाए क्योंकि महाभियोग लगाकर हटाये जाने की प्रक्रिया बेहद जटिल और लंबी है।  सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसियेशन के अध्यक्ष सांसद  कपिल सिब्बल ने भी  कहा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार  की जाँच को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी की उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जिन्होंने  घटना के तुरंत सामने नहीं आने पर चिंता जताते हुए तंज कसा   कि यदि कोई राजनेता, अफसर या उद्योगपति होता तो तुंरत निशाने पर आ जाता। हालाँकि कुछ घंटों बाद ही  मामले में फिल्मी मोड़ आ गया जब पहले अग्निशमन दल ने श्री वर्मा के यहाँ नोटों की गड्डियाँ मिलने की बात से  और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने उनके तबादले और जाँच प्रक्रिया के बीच संबंध से इंकार कर दिया।  इस टिप्पणी से भले ही श्री वर्मा राहत महसूस कर रहे हों परंतु  अलाहाबाद बार एसोसियेशन ने ये कहते हुए उनकी भद्द पीट दी कि अलाहाबाद उच्च न्यायालय कोई कूड़ादान नहीं है। आगे क्या होगा कहना मुश्किल है क्योंकि  अग्निशमन दल के मुखिया अतुल गर्ग द्वारा नोटों की गड्डियाँ मिलने की बात को गलत बताये जाने के बाद श्री वर्मा को क्लीन चिट देने की जमीन तैयार कर ली गई है। वहीं एक खबर ये भी है कि श्री गर्ग ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कोई बयान नहीं दिया। दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट के बाद श्री वर्मा के विरुद्ध कारवाई की दिशा स्पष्ट होगी। इस बीच  पूर्व न्यायाधीश एसएन ढींगरा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय को श्री वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति देनी चाहिए क्योंकि न्यायाधीश कानून से ऊपर नहीं है। यदि वह हत्या करेगा तब भी  क्या मामला दर्ज करने से रोका जाएगा ? अन्य  बयानों से भी लगता है कि ज्यादातर लोग मान रहे हैं कि श्री वर्मा के यहाँ नोटों की गड्डियाँ मिलने की बात सही है। इसका कारण समाज में व्याप्त यह अवधारणा है कि    भ्रष्टाचार नामक बुराई ने न्यायाधीशों को भी घेर लिया है। लेकिन संविधान प्रदत्त रक्षा कवच के कारण वे कानून की मार से बच जाते हैं।  इस तरह के आरोपों के बाद भी उन्हें  पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करना आसान नहीं होता। लेकिन सवाल ये है कि न्यायाधीशों को भ्रष्ट बनाता कौन है? उनकी क़ाली कमाई का माध्यम भी तो कानून के पेशे से जुड़े लोग ही होते हैं  और इसीलिए संदेह की सुई सबसे पहले अधिवक्ताओं पर ही आकर रुकती है ।  मोटी फीस लेने वाले अधिवक्ताओं द्वारा न्यायालय को प्रभावित करने वाली बात देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के सामने कानून मंत्री और एक मुख्यमंत्री कह चुके हैं जिस पर वे निर्विकार बने रहे। इन अधिवक्ताओं के पक्षकारों की सुनवाई जिस प्राथमिकता के साथ होती है उसे लेकर तो उन्हीं की बिरादरी में असंतोष व्याप्त है। बहरहाल दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के घर में करोड़ों रुपये की गड्डियाँ मिलने की खबर ने न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा कर दिया है। ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि कुछ नहीं हुआ तब श्री वर्मा का तबादला इतनी हड़बड़ी में करने की जरूरत क्यों पड़ी? और उस पर अलाहाबाद बार एसोसियेशन का ये कहना कि वहाँ का उच्च न्यायालय कूड़ादान नहीं है , न्यायाधीशों के सम्मान में आई गिरावट का प्रमाण है। न्यायशास्त्र की प्रसिद्ध उक्ति है कि भले ही सौ गुनाहगार छूट जाएं किंतु किसी बेगुनाह को दंड नहीं मिलना चाहिए। और ये भी कि आरोप लगने मात्र से व्यक्ति अपराधी नहीं हो जाता। इस आधार पर श्री वर्मा को अपने बचाव का अधिकार है किंतु इसे विडम्बना ही कहेंगे कि पूरे देश से जो प्रतिक्रियाएं इस मामले में आईं उनमें से लगभग सभी में नोट मिलने की बात को सत्य मानते हुए उनको पद से हटाये जाने की मांग हो रही है। देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर विराजमान श्री धनखड़ ने जो टिप्पणी की वह न्यायपालिका के लिए विचारणीय है। लेकिन इसके लिए न्यायाधीश बिरादरी को ये समझना पड़ेगा कि वे कानून के रखवाले जरूर हैं , लेकिन उससे ऊपर नहीं। भले ही विशेषाधिकारों के दम पर वे  आम आदमी से ताकतवर हो जाते हों किंतु सम्मान हासिल करने में असफल हो रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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