इन दिनों न्यायपालिका चर्चा का विषय बनी हुई है । अलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने दो युवकों द्वारा एक नाबालिग बालिका का वक्षस्थल दबाये जाने तथा पायजामे का नाड़ा तोड़ने को बलात्कार के प्रयास की बजाय यौन आक्रमण मानने वाला जो निर्णय दिया उसकी पूरे देश में रोषपूर्ण प्रतिक्रिया हुई। ज्यादातर लोगों का अभिमत यही था कि उक्त फैसला पूरी तरह से संवेदनहीन और अविवेकपूर्ण था। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसी आशय की टिप्पणी करते हुए कहा कि फ़ैसला पूरी तरह से असंवेदनशील और अमानवीय नज़रिए को दिखाता है इसलिए उस पर रोक ज़रूरी है। इसी के साथ यह भी कहा कि यह फ़ैसला क़रीब चार महीने तक सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया। इसका मतलब यह है कि जज ने उचित विचार-विमर्श करके और दिमाग लगाने के बाद यह फ़ैसला सुनाया। इस कड़ी टिप्पणी के बाद उच्च न्यायालय के संबंधित न्यायाधीश को तत्काल अपना पद त्याग देना चाहिए क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उनके फैसले को असंवेदनशील और अमानवीय बताया जाना साधारण बात नहीं है। दूसरा जो प्रकरण न्यायपालिका की प्रतिष्ठा धूमिल कर रहा है वह है दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के आवास पर लगी आग बुझाए जाने के दौरान करोड़ों रुपये के नोटों की गड्डियों का मिलना। न्यायाधीश महोदय घटना के समय पत्नी सहित म.प्र के किसी पर्यटन स्थल पर थे वरना मामला वहीं दबकर रह जाता। हालांकि शुरू में विरोधाभासी जानकारी आई। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय तक ने स्पष्टीकरण दिया कि उक्त जानकारी गलत थी और न्यायपालिका की छवि खराब करने का प्रयास किया गया। लेकिन जल्द ही नोटों की गड्डियों का वीडियो सार्वजनिक हो गया जिसे मजबूरन सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेब साइट पर भी प्रदर्शित किया जाने लगा। मामले की उच्च स्तरीय जांच शुरू हो चुकी है। जिस न्यायाधीश के यहाँ आग लगी उन्होंने मासूूमियत से कह दिया कि गड्डियां उन्होंने नहीं रखीं । उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार का एक पुराना प्रकरण भी उछल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने उनका तबादला तत्काल अलाहाबाद उच्च न्यायालय करते हुए उन्हें कोई काम न देने का आदेश भी जारी कर दिया। उधर अलाहाबाद के अधिवक्ता उनको वहाँ भेजे जाने के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं। उनका ये कहना कि ये उच्च न्यायालय कूड़ेदान नहीं है उस न्यायाधीश के लिए डूब मरने वाली बात होनी चाहिए किंतु वे निर्विकार बने हुए हैं। इन दो घटनाओं से पूरी न्याय व्यवस्था आरोपों के घेरे में आ गई है। सोशल मीडिया पर ये चुटकुला चल पड़ा है कि जिस देश में न्यायाधीश ही बिकाऊ हों तब वकील की क्या जरूरत ? इसी बीच खबर आ गई कि उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा में न्यायपालिका से जुड़े विवादों पर बहस करवाने की तैयारी कर ली है। सरकार भी सर्वदलीय बैठक बुलाकर न्यायिक नियुक्ति आयोग को दोबारा गठित करने की पहल कर रही है जिसे सर्वोच्च न्यायालय असंवैधानिक घोषित कर चुका है। उल्लेखनीय है श्री धनखड़ कुछ समय से न्यायपालिका पर तीखी टिप्पणियां करते आ रहे हैं। एक बार तो सर्वोच्च न्यायालय ने अटार्नी जनरल के जरिये उनकी टिप्पणियों पर अपना ऐतराज भी व्यक्त किया किंतु सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ट अधिवक्ता रहे श्री धनखड़ उसके बाद भी न्यायपालिका के बारे में बोलने से नहीं रुके। लेकिन संदर्भित दोनों घटनाओं के बाद न्यायिक नियुक्ति आयोग की उपयोगिता के बारे में वातावरण अपने आप बनने लगा है। स्मरणीय है इस आयोग के गठन का प्रस्ताव लोकसभा द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया। वहीं राज्यसभा में भी केवल राम जेठमलानी ने उसका विरोध किया । लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उसे रद्द कर दिया क्योंकि वह अस्तित्व में आ जाता तब न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायपालिका के असीमित अधिकार खत्म हो जाते। आयोग को पुनर्जीवित करने की कोशिश कितनी सफल होगी ये कहना कठिन है क्योंकि ऐसा होने पर कालेजियम की पक्षधर न्यायपालिका और सरकार में सीधा टकराव निश्चित है। सेवा निवृत मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ इसके विरोध में सदैव मुखर रहे। दो न्यायाधीशों के विवादग्रस्त हो जाने के बाद न्यायिक नियुक्ति आयोग एक बार फिर जनचर्चा में आ गया है। उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों के कारनामों से सर्वोच्च न्यायालय भी दबाव में है। जनमत भी कालेजियम नामक व्यवस्था के साथ जुड़ी विसंगतियों के विरुद्ध है। ऐसे में केंद्र सरकार को चाहिए आयोग के गठन का प्रयास दोबारा करे। विपक्ष का भी दायित्व है कि एक बार फिर इस मामले में साथ दे वरना न्यायपालिका में सुधार की उम्मीद धूल में मिल जाएगी। न्याय व्यवस्था में जनता का घटता विश्वास लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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